सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 271–280
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ५०४ / यह बेरस ऐसे वाक्य तो अब भी दीवारोपर चिपके इश्तिहारोंमें त मिलते हैं कि- ' टाटा मिलमें मज़दूरोंकी चर्बी खूनका हवन ' लिखे करण दांग क्या है कि - अमुक मिलमें मजदूरोंको सपर भी मारकर उनकी चर्बी और लहू निकालकर उससे सचमुच हवन वहन किया जाता है? वस्तुत: इस प्रकारके वाक्य अन्य अभिप्राय रखते हैं कि वहां मजदूरोंसे अधिक काम लेकर उनकी चर्बी-लहू सुखाया जाता है, वैसे ही यहाँ भी वास्तोष्पतिको जो उसको मकानका देवता है, जैसे कि - स्वाद. भी ' ॐ वास्तुपतये नमः ’ ' । गोसी कहकर वास्तुके मध्य में वास्तुके पतिको पाकका भोग रखवाते हैं; ए कि वा उस देवताको नमस्कार कराते हैं; सो उसके निमित्त पशुका कहका ं यजन, ( ' यज देवपूजा - सङ्गतिकरण- दानेषु ' ) दान आया है । तब देकर उसमें उस पशुका पूरा दान होनेसे उसके वसा आदि भी दत्त बधाई हो जाते हैं । यह मानसिक हवन ( दान, हु दानादनयो: ' ) हो जाता है; जब इस प्रकार सुव्यवस्था लग जाती है; तब वादीको दहीं गायको जबर्दस्ती मरवाने की उत्कण्ठा कैसे रहती है? यह हमें भी संव ' समझ नहीं आती । धन्य है इस प्रकारकी वैदिकम्मन्यता । ( ७ ) क्या वह विधर्मियोंका एजेन्ट है? उक्त बातपर स्वामीका भी है एक दृष्टान्तवादी देखे । काट - जैसेकि - ' समर्पण ' में स्वा. द. जीने भी स.प्र. में लिखा है- ' देह के भी अपेणसे नखशिखाग्र- पर्यन्त देना कहाता है । उनमें जो कुछ अच्छी-गया । बुरी वस्तु है, मलमूत्रादिका भी अर्पण कैने कर सकोगे '? ( पृ. २३४ ) । वादी जैसे वेदमें वैसा श्राभास होनेपर वहां अर्थक्री CC - 0. Ankur आपस्त के वचनकी व्यवस्था [ º व्यवस्था करता है, वैसे यहां पर भी करे । गायका वधिक न चने । यह पाठ वादीने उदयनारायसिंह वाले गोभिलगृह्यसूत्र से दिया है । ऐसे पाठोंकी व्यवस्था उस गोभि गृ. की प्रथमावृत्तिकी विस्तीर्ण भूमिकामें लिखी हैं, पथिक नहीं देख ले । ( ङ ) ' घेन्वनडुहयोर्भेदयम् ' पर हमने ' आलोक ' ( ६ ), पृ. ३८४-८६ में मीमांसा की थी; उसमें आप घ. सूत्रों का पूर्वापर दिखलाकर हमने टीकाकार श्री हरदत्तका भ्रम दिखलाया था, पर गायका वधिक बनना चाहता हुआ । पथिक कहता है- ' शास्त्रीजीने यहां धूर्तता से काम लेकर टीकाको मानना अस्वीकार कर दिया ' । चहां हमने दिखलाया था कि- ' एकखुर... गवाम् ' ( २६ ) में गाय-बैलको आपधसू. ने अभक्ष्य बतलाया था; तब ' घेन्वनडुद्द्योर्भेक्ष्यम् ' में गाय - बैलका मांसभक्षण कैसे इष्ट हो सकता है? फिर आपस्तम्बने यह मत ' वाजसनेयक ' ( शतपथ ) का बताया था; पर उसमें तो ' तस्माद् धेन्वनडुहयोर्नाश्नीयात् ' ( ३.११२ / २१ ) यह निषेध किया है; तब श्रापस्तम्वने यह वाजसनेयकका मत कैसे लिखा? वस्तुतः श्रापस्तम्बसूत्रमें ‘ घेन्वनडुहयो भेदयम् ' में ' मांस ' अर्थं इष्ट नहीं, किन्तु ३१ सूत्रमें ' आनडुह - बैलसे कृष्ट अन्न तथा बैलके कारण से अनडुही ( गाय ) में उत्पन्न दूधको वाजसनेय ( याज्ञवल्क्य ) के ' अनाम्येव ' इस कथनसे उपयोगा हूँ कहा है, जो शाला-प्रवेशककेलिए निषिद्ध था । व्यवस्था लगाना कोई सरल कार्य नहीं होता । Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५०६ ]. श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वादी यहाँपर अपने मान्य ' कृष्णकी या कंसकी ' ( पृ. २७ ) के निबन्धको देख ले | वहां लिखा है- ' स घेन्वै चानडुहश्च नानी-यात् । तदु होवाच याज्ञवल्क्यः - अश्नाम्येव अहम्, अंसलं चेट् भवति ' । इसका शब्दार्थ इस प्रकार है- ' वह ( यजमान ) गायका और बैलका न खावे... इसपर याज्ञवल्क्य बोले- ' मैं तो खाऊँगा; यदि बलवर्धक होगा ' । यहां ध्यान देनेकी बात यह है कि इस सारे सन्दर्भ में ' मांस'का शब्द कहीं नहीं । यहाँ ' मांस ' शब्द कहांसे आ टपका?.. यज्ञसमाप्तिसे पहले खाना देवोंका अपमान है । इसपर प्रश्न उठा कि यदि ( यजमान ) बिल्कुल भूखा रहेगा; तो यज्ञ कैसे करेगा? सो कुछ खाना तो अवश्य चाहिये, जो खाया भी न खाएके बराबर हो; अर्थात् - जिसकी हवि ग्रहण नहीं करते, वह पदार्थ, अर्थात् कोई जङ्गली - फल वा कन्द खा ले? जिससे यज्ञ भी होता रहे, और देवोंका अपमान भी न हो । वही बात यहां दोहराई गई कि -गायका अर्थात् दूधके बने पदार्थ मक्खन, मलाई, दही, मावा आदि न खावे, तथा बैलका अर्थात् खेती से उत्पन्न पदार्थ न खावे । इसपर याज्ञवल्क्य वोले कि - सोमपान लम्बा यज्ञ है । इसलिए यदि दुर्बलता अनुभव हो, तो कोई पुष्टिकारक पदार्थ भारी न हो, थोड़ा - सा खानेसे काम दे जावे; खा लेनेमें कोई हर्ज नहीं । जहां वाक्य में मांसका गन्ध भी नहीं; वहां ' मांस ' शब्द घुसेड़ना फिर स्त्रीलिङ्ग-पुंलिङ्ग, गाय - बैल दोनोंके पृथक् - प्रहरणका कोई तात्पर्य न हो, अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection सायणपर झूठा दोष ५ कैसे ठीक हो सकता है? भला हम रोज बोल व्यवहार नहीं देखते हैं? जब कोई लड़की - चाल वि की ससुराल में नह उस घर के लोग शिष्टाचारवश आग्रह करने लगे मेघ लीजिये; तो उस समय प्रायः कहा जाता कि योजन है - ' भाई! बेटी का धर्म नहीं । हम बेटीका नहीं खाते ' । तो क्या यहां हो जायगा कि हम बेटीका मांस नहीं खाते ' ( यह अर्थ में पृ. २८ ) ' तस्मारा || दीक्षितस्य अश्नीयात् ' ( ऐत. ६/६ ) तो क्या यहां गाय कि — दीक्षितस्य मांसं नाश्नीयात् '? ( पृ. २६ का भाव यह ) अर्थ हो निषे यहाँपर श्रीबुद्धदेवजीने सायणपर व्यर्थ कलंक लगाय भी कि - ' यहाँ तो हजरत ( सायण ) यह लिखते हैं- दीक्षिताल इसम नाश्नीयात् ' । पर ' घेन्वै अनडुदृश्य ' के सम्बन्ध में ' मांस ': को वस्तुतः बुद्धदेवजीने सायणपर यह दोष, बिना उसके मायके श्रागच होग लगाया हैं । सायणकी व्याख्या इस शतपथ कण्डिकाकी " आत बुद्धदेवजीने वा वादीने देखनी हो; तो आलोक ' ' ( ६ ) पृ. ३ शब्दो देखें । इससे मालूम होता है कि - वादी लोग अपनी श्र भोजन देखकर दूसरोंकी आंखों से देखा करते हैं । अतः पथिकका गावः । भी खण्डित हो गया; जो कि वह आपस्तम्ब के सूत्र से गो कहा सिद्ध करना चाहता है । अव वह अपने शब्दों में ही बताने हि श्रीणी वह ' ' कसाई ' है या ' गोरक्षक '? सम्यक * ( च ) स्वयं श्री हरदत्तने ' गौतमधर्मसूत्र ' में लिखा है कि ' माँस ' ‘ धेन्वनडुहौ च अभक्ष्यौ ' ( २/८/३० ) और आप, घसू. में पे ' छागक लिखा है । वसिष्ठध में भी ' धन्वनड्वाहौ मेध्यौं वाजसनेत Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ५०८ ] विज्ञायेते ' ( १४ । ३४ ) यह लिखा है । यहाँ ' मेध्य ' का अर्थ ' भय ' चाल में किन्तु ' मेधाके अनुकूल ' अर्थ है; क्योंकि - गायका -ल नहीं; दूध जाधवर्धक होता है; और बैल उस दूधका कारण होता है । क- योजन यदि बैल गायमें गर्भं न धारण करे; तो गायका दूध ही कैसे बेटी का हो? तब दोनों ही मेध्य तथा अभक्ष्य बताये गये । बोधायनध. अर्थ ते चान्द्रायणं चरेत् ' ( १ | १६ | ६ ) यहाँ ' तस्माद्ध गाय - बैलके वधका प्रायश्चित्त कहा है I । कात्यायनश्रौतसूत्र में भी इ अर्थ हो निषेध कहा है- " धेन्वनडुहयोर्नाश्नीयात् ' ( ७ / २।२२ ) शतपथब्रा. में भी निषेध कहा है ( ३ | १ | २ | २२ ) । अब वादी स्वयं बतावे कि-क लगाये । इसमें धूर्तता किसकी हुई? तुम्हारी वा हमारी? वह यहां गाय-चितव' को जबर्दस्ती मरवाना चाहता है । यह धूर्तता व उसकी सिद्ध श्रागम होगई । यह ' धूर्तता ' आदि शब्द उसी के हैं, हमारे नहीं । वह भाय्यदेव ' आत्मवत् सर्वभूतेषु ' याद रखे । यदि वह अपने लिए ऐसे कादी शब्दोंका प्रयोग पसन्द नहीं करता; तो दूसरोंकेलिए भी न करे । पृ. ३ हम ' आलोक ' ( ६ ) में स्पष्ट कर चुके हैं कि- जहाँ ' गाय'को श्र भोजनरूपमें कहा गया हो; जैसेकि श्रीयास्कने लिखा है- ' अवसं किका गाव: पथ्यदनम् ' ( १ | १७ | २ ) यहां गायको मुसाफिरीका भोजन से गोम कहा है । सो यहाँ ' गो ' शब्द गोदुग्ध - वाची है, जैसे कि -‘गोभिः तावे श्रीणीत मत्सरम् ' ( निरु. २ | ५ | ४ ) में; यह हम ' आलोक ' ( ६ ) में सम्यक्तया स्पष्ट कर चुके हैं । यह भी वहाँ कह चुके हैं कि-है कि ' माँस ' शब्द ' दूध'का वाचक भी होता है । स्वा.द. जीने ही ' छाकी वि ar ' में ' करेका (? ) दूध ' अर्थ लिखा है । सो जिसने CC - 0. Ankur Joshi मांस - लहूका भाव ५०६ हरदत्तके अर्थमें ' मांस'का अर्थ ' दूध ' भी हो सकता है । कई लोग गाय के दूध को इसलिए नहीं पीते; क्योंकि वह गोमाता के रक्तका दूसरा रूप हैं; तभी तो मानुषी स्त्री के स्तनोंमें तब तक दूध नहीं आता; जब तक उसका रजोधमें बन्द नहीं होता । जब वह रक्त ६ महीने तक बन्द रहता है; तभी वह सुफेदरूपमें होकर कुर्चोंमें दूध रूपमें आता है; इसलिए शरीरसं ताजे निकले हुए वे दोनों उष्ण होते हैं । जब बच्चा कुछ वढ़ कर स्तनोंका दूध अधिक मात्रा में लेने लगता है; तब दुबल माँ दुःखित होकर कहती है- ' मेरे लहूको यह चूसता जा रहा है, मेरे माँसको खाकर मुझे दुवला करता जा रहा है । उस समय वच्चेको ' अन्न - प्राशन ' करके धीरे - धीरे अन्नकी ओर प्रवृत्त करना पड़ता है । पर हम तो दूधको रससे सीधा बना हुआ मानते हैं । वादी मजदूरकी भांति मकान गिराने वाला तो है, मकान बनानेका तो नक्शा भी उसे समझ नहीं आ सकता । अब भी यदि वादी इनमें हमारी पूर्वापर - प्रकरणानुगृहीत व्यवस्था न मानकर ' गोमांस ' को वह भक्षणीय मानता है; तो बड़े प्रेमसे गोमांसका प्रयोग करे । यदि सनातनधर्म में गाय भक्ष्य होती; चाहे वेदके कथनसे, चाहे पुराणके कथनसे; तो गायका माँस खानेमें भी सनातनधर्मकी प्रवृत्ति किसी रूप में होती; पर नहीं है; श्रतः स्पष्ट है कि - स.घ.में भी वही व्यवस्था है, जिसे हमने लिखा है । वे तो इस चुरे नामके लेने में भी घबराते हैं । इसी स.ध. का ही प्रभाव स्वा. दु.जी पर तथा आर्यसमाजपर भी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) पड़ा है कि - वे भी गायको पून्य - दृष्टिसे देखते हैं । सो सनातन-धर्मी किसी टीकाकारका भ्रामक अर्थ प्रमाणित नहीं करते । इस विषय में पूरी स्पष्टता पाठकोंको ' आलोक ' ( ६ ) में मिलेंगी । ७ म पुष्पमें भी हमने सिद्ध कर दिया था कि - पथिकके लेखके गर्भमें आने तथा उसके प्रसवसे भी बहुत पूर्व हमने गायके अघ्न्यात्वविषयमें ‘ सिद्धान्त ' में लिख डाला था; तब उसे असत्य व्यवहार करके जनवञ्चन नहीं करना चाहिये । ( छ ) कई टीकाकार जो इस प्रकारका कहीं - कहीं अर्थ करते भी हैं; उसमें उनका अपना दृष्टिकोण होता है । उसको भी हम स्पष्ट कर देते हैं । वह यह है कि- ' तस्माद् यज्ञे वधोऽवधः ' ( ५/३६ ) यह मनुस्मृतिका कथन है कि - यज्ञमें वधको वध नहीं माना जाता । यही बात श्रीयास्कने भी कही है - ' अध्वरः, ध्वरतिहिंसाकर्मा, तत्प्रतिषेधः ( १/८/१ ) अर्थात् अध्वर यज्ञका नाम है । उसमें ध्वृ धातुका अर्थ ' हिंसा ' होता है, उसके ब ' ध्वर ' शब्दमें साथ लगा हुआ ' नव ' उस हिंसाको ' अहिंसा ' सिद्ध कर देता है । यज्ञ है वेदका विषय; सो यास्कने कहा है- ' आम्नाय वचनाद् अहिंसा प्रतीयेत ' ( १ | १६ | ६ ) वह हिंसा दीखती हुई भी वेदके वचनसे ' अहिंसा: ' मानी जाती है । यही मनुस्मृति में भी स्पष्ट है- ' या वेदविहिता हिंसा नियताऽस्मिँश्चराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद् वेदाद् धर्मो हि निर्वभौ ' ( ५।४४ ) । ' नाऽवेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत् ' ( ५।४३ ) । स्वा. द. जीने भी इस अर्थ-याज्ञिक हिंसा हिंसा [ ५११ छान्दोग्यका वचन उद्धृत किया है- ' अहिंसन् वाला भूतानि तीर्थभ्यः ' इसे हम पहले लिख चुके हैं । इसपर अन्यत्र स्पष्टता • देखने के इच्छुक ' आलोक ' ( ६ ) में ' याज्ञिक - पश्वालम्भ ' में देखें | उस दृष्टिकोणसे वे टीकाकार क्वचित् वैसा अर्थं लिखते हैं । यज्ञ होता है ५ प्रकारका १ देवयज्ञ, २ ऋषियज्ञ, पितृयज्ञ , ४ भूतयज्ञ, ५ अतिथि ( नृ ) यज्ञ । सो इन यज्ञोंमें होती हुई हिंसा-को भी ' अहिंसा ' माना जाता है । इसलिए याज्ञिक- गोवधको झ भी कई लोग अहिंसा मानते हैं । यह अपना - अपना दृष्टिकोण I होता है । उस - उस दृष्टिकोणके उत्तरदायी वे स्वयं होते हैं । पर इ हम तो यह समझते हैं कि - गाय - बैलका विशेष नाम ' श्रध्या, ह अघ्न्य ' जो रखा हुआ है, अन्य पशुविशेषका नाम चाहे वे दूर पृ. देनेवाले भी हैं — ' अघ्न्या, अघ्न्य ' यह विशेष नाम नहीं रखा गया, इससे क स्पष्ट है कि - गाय - बैल चाहे यज्ञ हो, चाहे यज्ञ के बाहर हो, यह तो वय ही हैं । सो जहाँ इनके वधका आभास हो, वहाँ ' गो'का पा अर्थ अन्य स्त्री- पशु तथा ' अनडुह ' का अर्थ अन: - वहन करने न्य ( छकड़ा उठाने वाले अन्य पशुका नाम समझना चाहिये । धा अन्य पशुओंका भी वध फिर कई हानियोंको लक्ष्य करके कलिवर्जित कर दिया गया है, वह भी अब कर्तव्य नहीं । आशा भाष है - वादी समझ गया होगा । न समझे, फिर भी हमारी ' धूर्ता ' पदा ही कहता जाय, तो वह भले ही गोवध करे - करावे; उसका क्या उत्तरदायित्व उसपर है, हमपर नहीं । हमने पूर्वापरकी सङ्गतिका तथा अविरोधपूर्वक समन्वय कर दिया है, पर वादी के पास वे व्रहार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative
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/ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५११ ५१२ तानि प्रक्षिप्तता, तथा नाममात्रसे वेदविरुद्धता कहने के अतिरिक्त अन्य पता कोई बल ही नहीं । ( ज ) अनुस्तरणी पर हमने ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६१८ देखें । में तथा ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ३८४-८५ में व्यवस्था कर दी थी पथिककी लेखनीने ‘ परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम् ' इस न्याय से उसे, तृयज्ञ स्वीकृत कर लिया । , हिंसा- ( ६६ ) अब वादी बृहदारण्यक के ' मांसौदनं ' पर चलता है, को इसपर हम ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. ३२०-३३० ) ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. - कोरस ६१-१०३ ) ( पू. ६१८-६१६ आदि ) में लिख ही चुके थे । उसमें | पर हमने सिद्ध कर दिया था कि - पाठ तो बृहदारण्य में ' मांसौदनं ' रहत्या ही है, पर उसका अर्थ ' माषौदनम् ' है । इसपर प्रमाण भी हमने दू पृ. ३२३ में दिया था । यह भी लिखा था कि - ' तब श्रीशिवशङ्कर-इससे काव्यतीर्थंका ' भाषौदनं ' पाठ बदल देना अनधिकार - चर्चा है । हो जोकि काव्यतीर्थजी के पीछे के जे. पी. चौधरी आदिने भी ' माषौदनं ' गो ' का पाठ माना है; यह ' अन्धस्येवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पढ़े ' कर न्यायकी चरितार्थता है । जब उक्त प्रमाण में ' मांस ' का ' भाष -हवे । धान्य ' अर्थ भी हुआ करता है, हम ६-७ पुष्पोंमें सिद्ध कर कर चुके हैं; आ. स. के मान्य म. म. श्री आर्यमुनिजीने भी मीमांसाये-आशा भाष्यम् ( ३।८।४२-४३-४४ ) में ' मांस ' का ' भाष ' आदि मांसल धूर्तता पदार्थ अर्थ किया है; तव पाठ - परिवर्तनकी आवश्यकता भी उसका क्या? ' इसपर पथिक कुछ भी बोल नहीं सका । हमने वहाँ ' माँस ' सङ्गविका जो ' भाष ' अर्थ किया है, वहां ' अतो माषान्नमेवैतद् नासो ब्रह्मणा स्मृतम् ' ( १५२- १५३ ) यह प्रजापतिस्मृतिका मांसार्थे प्रमाण दिया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat मांसका अर्थ माष । ५१३ था । गरुडपुराण - प्रेतकल्पमें भी लिखा है कि- श्राद्धादिमें मांसादिका प्रयोग लिखा हो; वहां कलिवन्यतावश जहां स्थान माषका प्रयोग पिण्डं दद्यात् खगेश्वर! पल - पैतृकम् ' ( ११ | ३७ ) ' अमेध्या वै माषाः ' यह मीमांसायभाष्य में ( ३ । ८ । वादी कहता है कि-आर्यसमाजी करते हैं ' । मांसके समझना चाहिये- ' दशमेऽहनि मांसेन माषेण तद् ( मांस ) - निषेधाद्वा कलौ न | माषकी मांससे समताके ही कारण शास्त्रीय वचन सुप्रसिद्ध है । सम्भवतः ४२ ) म. म. आर्यमुनिजी ने भी लिखा है । ' श्रीदी. शा. ने वही अर्थ किया है, जो यह भी उसका कथन गलत है । जिस प्रजापतिस्मृतिके वा गरुडपुराण - ' प्रेतकल्प ' के वचनसे हमने यह अर्थ दिया था, वा दिया है; प्रजापतिस्मृति तथा गरुड-पुराण क्या आर्यसमाजकी पुस्तकें हैं? । आर्यसमाजी लोग मनुस्मृतिका लंगड़ी करके कुछ उसको तो प्रमाण मानते हैं, अन्य स्मृतियोंको तो विल्कुल नहीं मानते । आर्यसमाजियों ने तो यहाँ अपनी सदाकी प्रकृतिके कारण पाठ ही बदल दिया है, ' माषौदनं ' कर दिया है । हमने ऐसा अनधिकृत - परिवर्तन भी नहीं किया; तब वादीका दोष देना निर्मूल है । स्वा. शङ्कराचार्य पर जो कि पथिकने दोष दिया था; उसका समाधान हमने ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १००-१०३ में दिया था; बादीका उसपर भी मुंह बन्द हो गया । उस ओषधिका नाम जब बैलके नामसे है; जैसेकि - भावप्रकाशमें लिखा है- ' ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी ब्राह्म इत्यपि ' यहां ऋषभक - श्रोषधिके नाम स ० ध ० ३३ . An eGangotri Initiative
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५१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) बैलके नामसे लिखे हैं, सो आचार्य शङ्करको भी उस बैल नाम-वाली ओषधि इष्ट थी । उस सन्दर्भकी उन्होंने हिन्दी तो की नहीं; तब वादीके पास क्या प्रमाण है कि- आचार्य शङ्करने बैका अर्थ कर दिया? ' मांस'का अर्थ फलके गुदेका भी होता है । जैसे कि बृहन्निघण्टुमें - ' आम्रस्यामःफले भवन्ति युगपन्मांसास्थिमज्जादयः, लक्ष्यन्ते न पृथक् - पृथक् स्फुटतया पुष्टास्त एव स्फुटाः ' यहां मांस फलके गुदेका नाम, अस्थि गुठलीका नाम, मज्जा रसका नाम है । ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६२३ में हमने लिखा था कि - पुराण-इतिहास गायका हनन निषिद्ध करते हैं, आर्यसमाजने भी वहींसे यह सीखकर पौराणिकता अपनाई है, वादीका इसपर भी मुख बन्द होगया । सो ' माषौदनं ' पाठ बदलना आर्यसमाजियोंकी अनधिकार - चेष्टा है; जब उपवेद - सुश्रुतसंहिता शारीराध्यायमें ' तैलमाषोत्तराहारा ' में माषका आहार कहती है शारी. ८ में भी ' स्त्रियं तु तैलमाषाभ्यां ' वही मांसका अर्थ ' माष ' भी है, इसमें हम स्मृतिका प्रमाण भी दे चुके हैं; तब हमारा पक्ष सिद्ध हो वदलने की आवश्यकता क्या? यदि ' शसने न रखनेसे लोगोंको ‘ गोहत्या ' का भ्रम होता है; तो गर्भिणी - स्त्रीको , और चरकसं. कहा है, और तथा पुराणका ही गया, पाठ गावः ' में ' गावः ' क्या आप वहां पाठ बदलकर ' शसने न पशवः '; अथवा ' जीवाः ' कर देंगे? क्या आपकी यह अनधिकार चेष्टा नहीं होगी? श्रीशङ्करस्वामीका अभिप्राय भी हमने ७ म पुष्पमें बतला दिया था ( देखो पृ. १०१-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंका प्रभाव १०३ ); तब वैसिमा के २०२ प्र. में वादीका उनपर अज्ञानमूलक है । श्राता ) बा ( ७० ) मांसमुपसिच्य ' हमने ७ म पुष्पमें मन्त्र इत दिया उसकी काण्डसंख्या मुद्रकोंकी असावधानतासे गलत सरवादी कहता है कि- ' ऐसा ज्ञात होता है कि किसी छप गई ब्रह की पुस्तक आपने प्रतिलिपि कर ली, मूल - अथर्ववेदका स्वाध्याय नहीं दिए पश अन्यथा ऐसी भयङ्कर भूल नहीं करते ' । वादी तो अपनी तम्य को भी मुद्रकके मत्थे मढ़ता है, जैसे- ( उपयोग लें ) के अपने लिये गलती हुए ब्रकेटको, बल्कि स्वयं लिखे हुए ' व'केट ' शब्दको म मुद्रणालयकी अशुद्धि मानता है, पर हमारी मुद्राशुद्धिको से ( २६ हमारा अथर्ववेदका स्वाध्याय न करना बताता है । बेचारेके पास यदि कोई अन्य मसाला नहीं है, तो चलो यही सही । ' आलोक ' मह ( ६ ) पृ. ४२१-४२२ में हमने उस मन्त्रका पूर्वापर दिखलाया ही था, काण्ड आदिकी संख्या भी लिखी थी; बल्कि सप्तम पुष्पके उसी प्रभा ६१६ पृष्ठकी पं. २५ में भी इसी मन्त्रकी संख्या ६६ ( ४ ) ७ लिखी पुरा थी; तब उसे न देख - भालकर उक्त दोष मढ़ना क्या वादीकी अपनी भयङ्कर भूल नहीं? किया ( ख ) शेष जो वादीने ' मांस ' का अर्थ स्वा.प्र.मु.के अनुसार नृण बदला है कि - ' मनः- प्रसादक पके फलका मृदु - भाग ' । सो वह स्वग मेवो आक्षेप्य स्थलों में भी वही अर्थ कर ले । वह जो कन्द आदि ।और अर्थं करना प.माध.जीपरं श्रार्यसमाजका प्रभाव बताता है । श्रीम यह भी वादीका कहना गलत है । आर्यसमाजियोंने ही वह Gujarat: An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ११६ / से सीखी हैं । देखिये कुछ पौराणिक पद्य - अघ्न्या ' बात पुराणों वृति गवां नाम क एता हन्तुमर्हति । महच्चकाराऽकुशलं वृषं यः ' ( महा. शान्ति, २६२/४७ ) ' प्रोषधीभिस्तथ दया था. गां वाऽऽलभेन्तु ते न तादृशा: ' ( २६३।३३ ) । अव स्कन्दपुराणमें ब्रह्मन्! यजेरन् छप गई । देखिये- ' अहिंसे परो धर्मः तत्र वेदेस्ति कीर्तितः । साक्षात् पुस्तकरे यज्ञे नहि वेदस्य सम्मत: ' ( वैष्णवखण्ड वासुदेवमाहा-किया, - पशुवधो त्म्य ६ । १४ ) । तस्माद् व्रीहिभिरेवासौ यज्ञः क्षीरेण सर्पिषा । नी गरी ने मेध्यैरन्नरसैश्चान्यैः कार्यो न पशुहिंसया ' ( स्कं. २।६।२८ ) तत्रापि लिखे वीजैर्यष्टव्यमजसंज्ञामुपागतैः । त्रिवर्षैकालमुषितैनं येषां पुनरुद्भवः ' को भी द्वि को श्री ( २६ ) ' सनातनस्य धर्मस्य रूपमेतदुदीरितम् । तदतिक्रम्य यो वर्तेद् के धर्मध्नः स पतत्यधः ' ( ३१ ) । अब वादी बतावे कि - स्कन्दपुराण बा पास लोह महाभारतके उक्त प्रमाण आर्यसमाजसे पीछे वने, वा पहले से ही थे? यदि पहलेसे ही थे; तो आर्यसमाजपर उनका ही खलाया । के उसी प्रभाव पड़ा, यह कट्टर दयानन्दी - पथिकको मानना ही पड़ेगा । पुराण उसका गला पकड़ कर उसे मनवा लेंगे । - लिखी वादीकी वहीं पर विशेष गुणवालोंके लिए पशुवध भी अभ्यनुज्ञात किया गया है । जैसेकि - ' राजसानां तामसानाम् श्रसुराणां तथा नृणाम् । यथागुणं भैरवाद्या उपास्याः सन्ति देवता: ' ( २।६।२३ ) अनुसार सो वह स्वगुणानुगुणात्मीयदेवतातुष्टये भुवि । हिंस्रयज्ञविधानं यत् तेषा-आदि मेवोचितं हि तत् ' ( २४ ) । ऋऋषियोंको अहिंसायज्ञ स्वीकृत था; और देवताओंको पशुयज्ञ । इत्यादि वर्णन महाभारत तथा ही वह श्रीमद्भागवतादि - पुराणोंमें भी आता है । हम कुछ पद्योंका संग्रह श्रासने पुराणोंसे सीखा ५१७ यहाँपर कर देते हैं।-' विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणाः । वायसः सुमनोभिश्च तस्यापि यजनं स्मृतम् ' ( महा. शान्ति, २६५।११ ) यहाँ पायस तथा फूलोंसे विष्णुयज्ञ कहा है । ' यज्ञियाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परि-कल्पिताः । यच्चापि किञ्चित् कर्तव्यमन्यचातः सुसंस्कृतम् । महत् - सत्त्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवाईमेव तत् ' ( १२ ) । ' तस्माद् हिंसा न यज्ञिया ' ( २७२।१८ ) ' अहिंसा सर्वभूतेभ्यो धर्मभ्यो ज्यायसी मता ' ( २६५।६ ) ' नहि यज्ञे पशुगरणा विधिदृष्टाः पुरन्दर! धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो! नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते । आगमेनैव ते यज्ञं कुर्वन्तु यदि चेच्छसि । विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान् भवेत् । यज वीजः सहस्राक्ष! त्रिवर्षपरमोषितैः ' ( श्राश्वमेधिक ६१ १२-१६ ) ' भूतदया तथा । सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत् सनातनम् ' ( ६१।३४ ) तब क्या पुराणोंने यह सनातनधर्म श्रार्यसमाजसे सीखा, क्या यह पुराण आर्य-समाज बनने से पीछे बनाये गये? वा कलके पैदा हुए आर्यसमाजने पुराणोंसे सीखा? अब आशा है - वादी भविष्य में इस विषय में ' आर्यसमाजका प्रभाव ' न कहकर आर्यसमाज पर पुराणोंका प्रभाव हो जाना मानेगा । असत्य को छोड़कर सत्य-ग्रहणका नियम माने, उलटा चलनेपर वह ' सत्यके ' ग्रहण करने और असत्यके छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये ' इस अपने आचार्यके ४ र्थ नियमकी हत्या करेगा । वस्तुतः सृष्टिके त्रिगुणात्मक होनेसे सृष्टिके लोगोंसे किये जाते यज्ञ भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५१८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) त्रिगुणात्मक हैं । सात्त्विककेलिए हिंसक यज्ञ, तथा राजस-तामसकेलिए भिन्न यज्ञ हैं । गिन लो सारे संसारको; उसमें मांसपार्टी बड़ी है वा घासपार्टी? व्यवस्था सबकेलिए ही करनी पड़ती है । ( ग ) पञ्चतन्त्रमें ही देख लो, वहाँ ' अजैयष्टव्यम् ' का अर्थ किया है - ' श्रीहयस्तावत् सप्तवार्षिका: ' ( शशकपिञ्जलकी कथा में ) तब क्या पञ्चतन्त्र भी आर्यसमाजियोंसे पीछेका बना हुआ पुस्तक है? आयुर्वेदकी पुस्तकें जिनमें जड़ी - बूटियों के नाम पशुपक्षियोंके नामसे रखे गये हैं; देखिये - श्रायुर्वेद - निघण्टुः तब वे क्या आर्यसमाजसे प्रभावित हैं; यह तो वादी ' संसारका आठवाँ महाश्वर्य ' बता रहा है!!! ( घ ) वादीका यह कहना भी गलत है कि- ' पौराणिक लोग पुराणों में श्लोकोंका यौगिक अर्थ करते हैं, यह स्वा. द. वा आर्य-विद्वानोंके लेखका प्रभाव है ' वाह! क्या आर्यसमाजसे पूर्वं शब्द केवल रूढ हुआ करते थे; यौगिक सर्वथा नहीं हुआ करते थे? स्वा. द. जी भी वेदमें केवल यौगिक अर्थ नहीं मानते, योगरूढ भी मानते हैं, यह हम ' आलोक ' ( ८ ) में लिख चुके हैं; तब वादीका केवल यौगिकतावाद भी पीसा गया । ' गोकर्णा सुमुखीकृतेन इपुरंगा ' ( कर्ण. ६०/४२ ) इस महाभारतके पद्यमें ही ७ बार प्रयुक्त ' गो ' शब्द यौगिक ही तो है, भिन्न - भिन्न अर्थ रखता है; तृव क्या वादी यहां रूढ अर्थ कभी कर सकता है? ( ङ ) ' महोक्ष ' वा महाजं वा पचेत् ' इसका ' आलोक ' ( ६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection सायरणपर झूठा कलंक १२ में किया हुआ अर्थ हमारी अपनी गवेषणा है । ' अर्थ, ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' की एकवाक्यता आदि पचू ' घातुम समाजसे हमने उधार नहीं ली । इसघर यह किसी श्र ले । सका । यदि श्रीरामदेव आदिने इसपर कुछ वादी लिखा कुछ कह नहीं कि अपना भिन्न अर्थ है । वह अथ मैंने वादीकी है, तो उना कह देखा है, इससे पूर्व मुझे उसका पता तक भी नहीं इस था पुस्तकों । से वाद उनका और मेरा अर्थ मेल खाता है, तब ' आर्यसमाजसेव न ख अर्थ लिखा गया ', यह वादीकी बात कट गई । ७ म पुष्पमें हसरे अप अपने सं. २००३ के गायके अघ्न्यात्वके उल्लेखका उद्धरण किया नाभ है, वादी उसपर भी चुप्पी लगा गया । वाद ( च ) जोकि वादीने पृ. २०८ - २०६ में शतपथका उद्धरण और कन्ध उसका अर्थ देकर अन्तमें लिखा है कि- इसपर सायण - भाष्यसे ज्ञान भी गोमांसभक्षण सिद्ध होता है ' यह पथिकका घोर प्रसत्यवार, पूर्वोच मालूम होता है - उसने स्वयं शतपथका सायणभाष्य नहीं दे दिया केवल श्रीबुद्धदेवजीके ट्रैक्टको देखकर ऐसा लिख दिया । पुरा श्रीसायणने शालाप्रवेशक केलिए गायका दूध और बैलसेट पुराण अन्नका अर्थ किया है । प्रकरण भी वही है, पर याज्ञवल्को निका उस दूध और अन्नका अपने लिए खाना माना है । अव अपन असत्यवक्ता पथिक बोले कि उसने यह सायणभाष्यका क्या ' अटकलपच्चू ' लिख दिया? श्रीबुद्धदेवजीने भी साथण इस प्र यही कलङ्क लगाया था - यह सायणभाष्य न देखनेका परिक्षा ' गो है । हमने शतपथके उक्त स्थलके सायणभाष्यका उद्धारा गुणव Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) १२० / ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ३७५-३८० में दे दिया था, वादी वहींसे देख नसी आहे ऐसे असत्यवादी भी अपने आपको वैदिक मानते हैं-कह ले ' किमाश्वर्यमतः । परम्!!! स्वा. द. जीने ' असत्यवक्ताओंको ' असुर ' तो नहीं है । जब शतपथके उस स्थलमें ' मांस ' शब्द नहीं है; तब उ कहा स्तक वादीने उसका मनमाना अध्याहार कैसे कर लिया? ' धन्वन-दुइयोर्नाश्नीयात् ' यह षष्ठी है; इसका अर्थ हैं कि - ' गाय - बैलका जसे नखावे ' पर बादीने द्वितीयाका अर्थ कैसे कर दिया? क्या ब पमें हरे । अपनी मर्जी है, जो चाहा अर्थ कर लिया! ' दीक्षितस्य रण किया नाश्रीयात् ' का वादी यही अर्थं करेगा कि - ' दीक्षितको न खावे, वा दीक्षितका मांस न खावे? ' असल ' का अर्थ वादीने ' मोटे श्री कन्वेवाला ' कैसे कर लिया, क्या वादीको संस्कृतसाहित्यका माध्यमे ज्ञान नहीं है? इस विषयपर मीमांसा वादी ' आलोक ' ( ६ ) सत्यवाद, पूर्वोक्त पृष्ठमें देखे । शेष जो वादीने श्रीत्रिपाठीजीका उद्धरण नहीं देख दिया है, वह ' तथाकथित ' के अभिप्रायसे है, अर्थात् जो वह पुराणादिमें है, वही वेदमें भी, सो जो वेदमें अर्थ होगा, वहीं लसे पुराणादिमें भी । यही उनका अभिप्राय है । दूसरोंको गालियाँ ये निकालकर वादी अपनी गोभक्ति प्रदर्शित करता है, अब वह छाव वह अपने तथाकथित ऋषिकी ' गोभक्ति ' भी देखे । – का ' गोस्वामी ' का वेद में ' अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व ' ( ऋ. १८३३ | ४ ) चाय इस प्रकार गौरवसे नाम आया है, पर ' गोस्वामी ' के प्रचलित परिणार ' गोसाई ' शब्द का अर्थ स्वा. द. जी लिखते हैं- ' गो'शब्देन पशु-उद्धा गुणवान् साई ' ' शब्देन यवनाचार्य: ( ' गो ' नाम पशुगुणयुक्त, CC - 0. Ankur Joshi सायणपर झूठा दोष [ ५२८ ' साई ' शब्दसे मुसलमानोंका आचार्य ( पीर ) ' ( वेदविरुद्धमत-खण्डन शता. पृ. ८०६-८०७ ) । ' गोलोक ' कितना पवित्र लोक माना जाता है, उसपर स्वा. द. जी लिखते हैं- ' गवां पशूनां यो लोकः, स तु दुःखरूपो दुर्गन्धरूपत्वात्; तत्र ये वसन्ति, तेपि असभ्या विद्याहीना आभीरवन्मूर्खा विज्ञेयाः ( गो आदि पशुओंका लोक दुर्गन्ध के बढ़नेसे दुःखरूप होगा, उसमें जो वसते हैं, वे अहीरोंके तुल्य मूर्ख विद्याहीन असभ्य जानने चाहियें ' ( शता.सं. पृ. ७६८-७६६ ) यह है स्वामीकी गोभक्ति! इस प्रकार जो श्रीध. दे. आदि आर्यसमाजी सायणभाष्य अथर्व ( ३।३० ) के विनियोगमें ' सुराकुम्भनिनयनं त्रिवर्षवत्सिकाया गोः पिशितानां प्राशनं, सुराया: पायनं च कुर्यात् ' में दोष देते हैं, वे याद रखें कि-श्री सायरने ७।५।५ में लिखा है- ' श्रवध्यानां परमावत्रिगाँ ( अवध्य सब प्राणियों में अत्यन्त उत्कृष्ट गाय हैं ) और प्रकृत मन्त्रमें भी ' अघ्न्या ' शब्द है; जिसका अर्थ श्रीसायणने लिखा है- ' अघ्न्याः ' । गोनाम एतत् । अहन्तव्या गाव इव ' । जब इस प्रकार श्रीसायण गोहननका निषेध स्वयं कर रहे हैं; तब यहां ' पिशित ' का अर्थ ' मांस ' नहीं हो सकता । सो जैसे मनु. ( ६४६ ) में ' मांस ' वाचक ' आमिष ' का अर्थ ' सुखभोग ' है; इस प्रकार ' पिशित ' का अर्थ भी ' भोग ' है; सो गोदुग्धके खोये - बर्फीका आशय है । ' सुरा ' का अर्थ ' सोम ' है-इस विषय में स्पष्टता ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४२५, ४२३ में देखनी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) चाहिये । इन्हींका वितरण प्रकृत साम्मनस्यका उत्पादक है । इस प्रकार सायरणादिके भाष्य में कहीं ऐसा भ्रम पड़े; तो वहां ' अवध्यानां परमोवधिर्गौः ' यह सायणका तथा ' अघ्न्या ' यह वेदका सिद्धान्त स्मरण करके भ्रम दूर कर लेना चाहिये । ( ७१ ) सत्यवतीको जो कि वादी ' कैवर्तकन्या ' बताता है; इसका हम उत्तर ७ म पुष्पमें दे चुके हैं कि वह कैवर्तके वीर्यसे उत्पन्न नहीं हुई थी, किन्तु कैवर्तसे पालित थी ' । उसमें स्वा. द. जीका बच्चेका धायसे पालनेका वर्णन भी दिखलाया था; तब क्या स्वामीजीकी धायसे पाले बच्चे उसी धायके हो जाएँगे? जाति भी क्या उनकी उस धायवाली हो जाएगी? तब तो स्वामीजीने बच्चेकी जाति भी उच्छिन्न कर डाली! क्या पन्ना - दाईसे पाला हुआ राना उदयसिंह उस दाई वा दासीका लड़का हो जायगा? इसपर भी वादी कुछ न बोल सका । करणको ' राधेय ' ( राधाका लड़का ) कहा जाता है ( महाभारत १ / १६२।२३ ); पर वह राधासे पालित था, राधासे पैदा नहीं हुआ था; पर पैदा न होनेपर भी, केवल पालनेमात्रसे भी उसे ' राधेय ' कहा जाता था; पर इससे यह नहीं कि वह कुन्तीका पुत्र न होकर राधाका पुत्र हो जावेगा? इसी प्रकार उसी कुन्ती के लड़के कर्णको ' सूतज ' ( महा. कर्ण, ६।५१ ) ' सूतात्मज ' ( ८६।३७ ) कहा जाता है, पर ऐसा भी सूतसे पालित होने के कारण कहा जाता है, सूतवीर्योत्पन्न होनेसे नहीं । इसे हम अन्यत्र ( पृ. १४२-१४६ ) स्पष्ट कर चुके हैं; तब क्या वादी ' सूतात्मज ' शब्द देखकर CC - 0. Ankur Joshi Collection उसे पालक - पिता सूतका ' निषादजा ' कहने से भी किन्तु निषाद से पालित है - ' पुत्रीव पाल्यमाना सा पथिकका भ्रम X आरिस पुत्र मान लेगा? यदि वह निषादकी पुत्री नहीं, ख वा ही । जैसेकि देवी नहीं हो उ लि भागवत में स्पष्ट स्त्रि दाशगेहे व्यवर्धत ' ( २ । १ । ४७ ) ' पान थे । ( उपरिचरवसोः पुत्री ) ( ४८ ) । शिवपुराण में भी देवी आदि पुराणोंकी तरह ' निषादजा ' यह ' निषादसे पालिता भाग नाम है; अथवा निषाद मछली को काटकर उस लड़की के होनेमें हेतु बना; इसलिए उसे ' निषादजा ' कहा गया है । बन ‘ वीवरीगर्भजस्य ' यह श्रीस | मश्रमीके शब्द हैं, इसका भी पहुंचे भांति समाधान है । कर्णको ' राधागर्भभारभूत सुतापकर स्मृत वेणीसं. ३ य अङ्कमें ( ३५ पद्यसे पूर्व ) कहने से भी वह राजाचा है, गर्भेज न होकर कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न ही रहेगा । तब सत्यवतीको SHE ' कैवर्तकन्या ' मलाहकी लड़की कहते हुए वादी का खण्डन हो पशु-गया; जबकि वह उपरिचरवसुके वीयेसे उत्पन्न हुई थी । इस सम्म ७ म पुष्पमें स्पष्ट कर दिया है । देवीभागवत ( २।१ ) में भी ब पक स्पष्ट है | चकन ( ख ) पराशरकी माताको श्वपाकी जब तक मूल इतिहासे ' श्राव वादी सिद्ध न करे; तब तक यह साध्य बात रहेगी, सिद्ध नहीं । की ह अत्रिस्मृति ( ३७८ ) में निषाद ब्राह्मणका तथा चाण्डाल - ब्राह्मण है । ( ३८१ ) का, इस प्रकार चाणक्यनीति ( ११/१७ ) में भी बना कुछ आया है, सो यहाँपर भी यदि कहीं ' श्वपाक ' शब्द आया? इनक उपस्ि तो वह भी ब्राह्मणी की पारिभाषिक संज्ञा है, वास्तविक नहीं है । Gujarat. An eGangotri Initiative