सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 261–270

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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YES ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) सही घर देना - वादीने यह अर्थ किसका निकाला? फिर जो लोग, और वैश्यरूपधारी शिवका खाट पर सोनेका ' पृथक-तुका महानन्दा सोना ' अर्थ करते हैं; उनपर वादी कैसे आपत्ति पृथकू खाटपर पाठ उठाते हैं? या था: यदि अर्थं वदला था; तो ' अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे नामि निघत्ते ' का अर्थ भी वादीको बदलना चाहिये था, परन्तु कैसे श्रपनी उत्तररणकी दुर्बलतावश लिख दिया कि - ' यह वाक्य बीचमें इ श्रावस्त घुसेड दिये गये हैं ' । रानीका तथा घोड़ेका वर्णन तो वादीने ६ श्रश्वमेधमें मान लिया, फिर अवको कपड़ेसे क्यों ढकते हैं - यह शवपरास बादीने कुछ नहीं बताया । इन व्याजोंसे प्रत्युत्तर नहीं हो जाता । श्रीमहीधरादिने इसीको अवलम्बित करके तो लिखा था, चलको जिसपर आप लोग आपत्ति उठाते हैं । स्वा.द.जीने तो उसे बको चालाकी से छिपा दिया: हमने उसे प्रकट कर दिया । इस प्रकार करेगा वादी पाशमें बँध गया । वादीने उसे लिखा तो सही; इस बदल दलदल में घुसा भी सही; पर आगे घबड़ा गया । उसमें फँस अन्य गया । यदि शतपथ में प्रक्षेप है; तो उसे उद्धृत करनेवाले सेब श्रीमहीधरके व्याख्यान में भी वादी उसे प्रक्षिप्त मान ले; उसे को संवांदी क्यों व्यथे कलङ्कित करता है? पं ० नरदेवजी शास्त्रीने अपने उसका इ ' ग्वेदालोचन ' ( पृ. २६८ ) में ठीक ही लिखा था कि ' स्वा. द. जीने है । यजुर्वेदभाष्यकार महीधराचार्य... के भाष्यका खण्डन तो किया: हिषी किन्तु जिन शतपथादि- ब्राह्मणोंके आधार और प्रमाणसे वे पृथकू [ महीधरा दि ] इस प्रकारका भाष्य करनेपर वाध्य हुए उन CC - 0. Ankur Joshi पथिकका भ्रम | II त्राह्मणों [ ब्राह्मणग्रन्थों ] के विषय में मौन साध लिया ' । जो अर्थ शतपथमें बदलते हो; वही महीधरभाष्य में भी चदल सकते हो । आगे बुद्धदेवजीका ' निर्लज्जोंको वेदकी हत्या करनेमें तनिक भी संकोच नहीं होता ' यह वाक्य निरर्थक गाली मात्र है । जब श्रश्वमेधका श्रश्व मृतक ( संज्ञप्त ) है; तब विद्यालङ्कारजीकी विद्याने मृतक घोड़ेका रानीसे समागम कसे बता दिया? ऐसी विद्या तो धन्य है, जो दूसरोंको ' पामर तथा अविद्याजाल वाला ' बताती है, और अपने अज्ञानको नहीं समझती । वस्तुतः मृतक अश्वका रानीसे समागम बनाकर जो उसके जीवनमें भी सम्भव नहीं हो सकता - विद्यामानं एडजीने अपने साम्प्रदायिक - गालियोंकी धूल उड़ाकर अविद्यान्धकार - फैला दिया है । ' गणानां त्वा ' मन्त्रके महीधर भाष्यपर हम ' श्रालोक ' ( ५-६ ) में लिख चुके हैं, वादी उसपर कुछ नहीं लिख सका 1 ' यह प्रक्षिप्त है, वह अनुक्षिप्त है, यह वेदानुकूल नहीं है, यह स्वा. दयानन्द ने लिखा है, यह श्रीजयदेवने लिखा है, यह श्री आर्य-मुनिने लिखा है, यह श्रीबुद्धदेवने कहा है । इस लिखने के सिवाय वादी के पास कुछ भी मसाला नहीं है । वादीके अपने ज्ञानपर तो परमात्माकी कृपा है; दूसरोंका सभी कुछ उधृत करके उसे रखकर वादी दिखा देता है कि मैंने भी २३० पृष्ठोंकी पुस्तक लिखी है, मैं भी ' शास्त्रार्थमहारथियोंसे उलझनेवाला हूँ ' । महाशय! स्त्रीका अश्वसे मैथुन कोई भी नहीं कहता । हम यही Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) तो श्म तथा ६ ठे पुष्पमें सिद्ध कर चुके हैं कि - प्रकृतस्थल में घोड़ा मारा जा चुका है, इसमें हमने रामायणका तथा महाभारत आदिका प्रमाण भी दिया था, यह भी बतलाया था कि - यज्ञमें जब पतिसे भी स्त्रीको कामवासनाका निषेध है; तब मृतक व बेजोड़ कामवासनाका गन्ध कैसे सम्भव हो सकता है? श्री-चतुरसेन शास्त्रीकी ' व्यभिचार ' पुस्तकमें अमेरिकन - स्त्रियोंका कुत्तोंसे संयोग तो सुना जाता है; व्यभिचार ( ले. आयुर्वेदाचार्य श्रीचतुरसेन शास्त्री - सं. १६८३ ) ( पृ. ६२-६३ ) ' हाल ही में बिलायतमें एक सनसनी -भरा मुकदमा चला था, जिसमें किसी मेम पर कुत्तेसे व्यभिचार करनेका अपराध लगाया गया था, पर अपराध किसी तरह साबित होता नहीं था । दैवयोगसे जजकी स्त्री भी कुत्तेसे रमण करती थी, और उसने इस मामले में एक भेदकी वात जज- साहिबको बता दी कि - उस स्त्रीके कूले ( पाश्वे ) देखे जायँ कि वहाँ कुत्ते के पंजे के निशान तो नहीं हैं निशान देखे गये और पाये गये स्त्रीको . दण्ड मिला । पर उस स्त्रीको यह विचार हुआ कि - यह रहस्य किस तरह ज्ञात हुआ? अन्त में उसे पता लग गया कि जज-साहबकी स्त्रीने बताया है । वह समझ गई कि - अवश्य वह भी यह काम करती है, उसने भरे इजलासमें जज- साहिबकी स्त्रीको तलब करके उसके कूले भी देखे; और पंजेके निशान पाये । : दैवयोग से मैं ( चतुरसेन ) एक रोगीकी चिकित्सार्थ एक सद्-CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम गृहस्थके घर ठहरा था; रोगीकी सेवा के लिए एक स यूरोपियन साथ थी । यह स्त्री कोई ४५ वर्षकी थी । मगर बहुत रसिया श्रीर हँसमुख । हम लोग लगभग एक महीना इस स्थान पर ए रहे । बहुधा चाँदनी रातमें देरतक गपशप चलती थी । बात बातमें इस प्रकारका प्रसँग भी आ गया । मैंने कहा- मैदा ह ईश्वर के लिए सच कहना- तुम अनेकों पुरुषोंमें यह स्वतन्त्र जीवन " व्यतीत करती हो - क्या तुम्हारा जीवन विशुद्ध है? उसने डाक्टर! मैंने तो बहुत ही सावधानी और धैर्यसे दिन काट कहा-दि हैं, किन्तु मेरी बहुत - सी सहेली ऐसी नहीं हैं । मेरी एक सहेली क कुत्ता पाल रखा है और उससे वह अपनी आवश्यकता वि करती हैं । मैंने आश्चर्यसे कहा - कुत्ता! क्या कुत्ते से वह मेर त काम लेती हैं? उसने गम्भीरता से कहा- हां, वे कुत्ते ट्रेन्ड लि श्र जाते हैं, स्त्रीका उपयोग उन्हें सिखाया जाता है, उन्हें उप खाना और रहना मिलता है । रोज नहाते हैं, वे बहुत डा सावधानी से वह कार्य करते हैं, और मनुष्यसे अधिक देते हैं; उस समय वे अगले पैरोंसे स्त्रीको अगल - बगल कसन पकड़ लेते हैं, उसका मुख स्त्रीकी छातीपर रहता है । जो डाव लग इनसे काम लेती हैं, वह फिर मर्दको पसन्द नहीं कर सकती । पृथ पर जीवितका भी नहीं; बल्कि मृतक अश्वका संयोग त्रिकालमें भी सुना नहीं जा सकता । इसका स्वप्न तो पहले लि पहल एक बालब्रह्मचारीके ' ज्ञान ' में भाभू. में आया; जीन उसीने यह गलत प्रचार करके महीधरको बदनाम किया । कई Gujarat, An eGangotri Initiative

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) ४६२ पियन उस समय अश्वको मृतक बतानेवाले स्थलोंको प्रक्षिप्त बताकर सिया श्रीर नम बलात् रानीका घोड़ेसे प्रसम्भवी मैथुन कराता है; यह उसीका पर अपने शब्दों में ' महापाप ' तथा ' पामरपन ' है । तब ' रेतो मूत्र एल । बात बिजहाति ' मन्त्रका उद्धरण ‘ व्यर्थ है । श्रीमहीधरभाष्यपर ही सिवाय गाली बरसानेके वादी, और कुछ नहीं लिख सका । न्त्र - जीवन हमने सिद्ध कर दिया था कि – प्रश्व मृतक है, और श्रीमहीधर भी सने कहा- कहीं भी उसका रानीसे संयोग नहीं मानते । केवल अङ्गका अङ्गसे स्पर्शमात्र है; जिसका प्रयोजन है गर्भाशयका शोधन आदि । काट सहेली दिये क्या विशेष- चिकित्सा भी वेदविरुद्ध हो जावेगी; जो वेदसे ही व्यकता पूर्व निकली है । अभी वादी वैद्यक तथा डाक्टरी के अनुभव वढ़ावे; वह मेर तब शास्त्रीय वातोंके मर्मका पता चलेगा । स्वा. द. प्रसूता स्त्रीके श्रृङ्गको संकुचित करनेकी सूचना दे गये थे । आर्यसमाजी उन्हें उपदेशक श्रीवालकृष्णजीने उसकी ओषधि ' मोचरस ' ढूंढ डाली । इस प्रकार अश्वके ही पदार्थसे छापेखानेके रूलर तैयार बहुत कार होते हैं, जिससे वेदादि पुस्तकें भी छपती हैं, इस प्रकार अङ्ग-ल कसन संशोधन के लिए भी कुत्ता घोड़ा आदि पशुओं के पदार्थोंसे ऐसी जो डाक्टरी दवाइयां बनती हैं, इनका कसौली आदिमें पता सकतीं । लगाइये । कुत्ते काटनेका टीका कुत्ते के पदार्थसे बनाया जाता है । संयोग पृथक् विषय होनेसे इसमें वेदविरोध नहीं । तो यह विषय कामशास्त्र से सम्बद्ध भी हो सकता है । डीडवाना या करे लिखित - शास्त्रार्थमें आर्यसमाजी शास्त्रार्थमहारथी श्री लोकनाथ-। जीने ( प्र. ६१-६२में ) ' वेदमें कामशास्त्र के बीज ' भी माने थे । या CC - 0. Ankur Joshi पथिकका भ्रम | ४ ९ ३ ' आलोक ' ( ५ ) में हमने श्रीमनोहर - विद्यालङ्कारका लेख भी उद्धृत किया था । पुरुषको वाजीकरण करना पड़ता है, वहां वाजी अश्वका नाम है । अथर्व में ' यावदङ्गीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत् । यावदुश्वस्य वाजिनः तावत्ते वर्धतां पसः ' ( ६ ७२१३ ) यहाँ पुरुषके श्रङ्गको अश्व के श्रङ्ग जैसा बताना कहा है । सो यदि वादी भी डाक्टरीकी इधर जाँच कर लें, तो उसे गाली न निकालनी पड़े । शेष बातोंपर कि - ' गणानां त्वा ' का मृतक अश्वसे कोई सम्बन्ध नहीं, रामायण में पुत्रेष्टिके प्रसङ्गमें अश्वमेघका कोई प्रसङ्ग नहीं- आदि बातोंपर हम ' आलोक ' ( ५-६ ) में प्रकाश डाल चुके हैं, जिसपर वादी कुछ नहीं लिख सका, और न ही लिख सकता है । ( ६४ ) शिवदूतीके अण्डकोषभक्षणपर हमने वास्तविकता वहांका प्रकरण दिखाकर बताई थी; इससे इतिहासकी सत्ता नष्ट क्यों होगी? शिव भी महान् देव हैं, प्रलयके देव हैं, वे कोई लौकिक व्यक्ति नहीं हैं । यह पुराणादिमें प्रसिद्ध है । शिवदूती भी उनकी प्रलयकारिणी देवी थी, यह पुराणने स्वयं ही लिखा था, हमने उसका प्रमाण भी उद्धृत कर दिया था । यह सब देव थे, मनुष्य नहीं । इसमें लौकिक इतिहास नहीं, अतः इसमें भ्रमका कुछ भी अवकाश नहीं है । इसपर वादी कुछ भी नहीं लिख सका, और न कभी लिख सकता ही है । इस विषयपर हम आगे भी अग्रिम एक निबन्धमें लिखने वाले हैं । Collectic Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 264

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४६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रूडिशब्द यदि वादी वेदमें नहीं मानता, पर उसके सम्प्रदायाचार्य स्वा.द.जी ‘ परन्तु सब ऋषि - मुनि वैदिक शब्दोंको यौगिक और योगरूढ तथा लौकिक शब्दोंको रूढि [ यौगिक, योगरूढ ] भी मानते हैं ' ( नामिक पृ. २ ) तथा नेता श्रीभगवद्दत्तजी भी वेदमें ' योगरूढ ' शब्द मानते हैं, यह हम ' आलोक ' ( ८ ) में बता चुके हैं, तब वादीको वेदमें इतिहास भविष्यतरूपसे मानना पड़ेगा । क्योंकि - व्युत्पत्ति करके फिर उस शब्दको एक में ही रूढ करना यह वादीके विरुद्ध ही तो होगा । वादी इस विषय में भी कुछ भी नहीं लिख सका । यदि वादीको अपने ' स्वा. द. फे वेद-भाष्यानुशीलन ' में कुछ महत्त्व दीखता है; तो उसे वह हमारे पास भेज दे, हम उसका प्रत्युत्तर दे देंगे, क्योंकि -असत्य-वक्ताओंके पैर कभी नहीं होते; अतः उनका गिरा देना स्वाभाविक बात हो जाती है । उसने उसमें भी आर्यसमाजियोंके मतका संग्रह कर रखा होगा; जैसा कि उसकी सदाकी प्रकृति रही है, अपना उसका ज्ञान वहुत न्यून मात्रा में रहता है । यदि वादी मन्त्रभागको ही ईश्वरीय ज्ञान मानता है, वही उसका इष्ट मन्त्रभाग इतिहास - पुराणको स्वयं याद करता है । स्वा. द. जी उससे ब्राह्मणभाग लेते हैं । मन्त्रभाग उस पुराणको भी परमात्मासे बनाया मानता है । देखिये- ' ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टान्जज्ञिरे ' ( ऋ. ११/७/२४ ) सो वह ब्राह्मणभाग भी परमात्मासे प्रणीत होनेसे वेद सिद्ध हुआ; ऋषिकृति सिद्ध न हुआ । इसपर वादी आर्यसमाजी CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम वेदभाष्यकार श्रीजयदेवजी विद्यालङ्कारका अर्थदेखे-मन्त्र, सामवेद... अथर्ववेद के मन्त्र, यजुर्वेद सृष्टि दो प्रलय आदिके वर्णन करने हारे मन्त्र और,, उत्प ब्राह्मणभाग सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं । ', ३१ स्वा. द. जी भी वेदमें ' इतिहास - पुराण ' से ' ब्राह्मणभा ग्रहण करते हैं; देखो ऋभाभू । इससे वादीका पक्ष गिर स्वा. द. जी ' इत्यपि निगमो भवति ' यह यास्कीय - गया..-. वाक्य - बेट वचन के लिए मानते हैं । देखो स.प्र. । सो निरुक्तकारने पूर्ण पुरुषेण सर्वम् इत्यपि निगमो भवति ', यह लिखकर वचनको वेद सिद्ध कर दिया । यह श्वेर्ताश्वतरोपनिषद्का है । आर्यसमाजी - प्रेस वैदिकयन्त्रालयने इसे आरण्यक ( तैत्तिया ) १० ) का बताया है । सो आरण्यक तथा उपनिषद् भी वेद सिर हुए । शेष रहे वैद्यनाथ आदि; यह तो स्वा.द.जी से विरुद्ध लिह करते हैं । अतः उनका मत माननीय नहीं । हम उ निराकरण अन्यत्र करेंगे । वादी स्वा. द. का मत मानेगा, ह तद्विरुद्ध वैद्यनाथजीका; यह वह बतावे? वादीने लिखा था हि ' उपनिषदें स्वयं अपनेको वेद नहीं कहतीं ' इसपर हमने ' आलोक ' क ( ७ ) पृ. ६०६-६१२ में इतना लिख दिया कि -वादीका मुख बन हो गया । ( ख ) ( छान्दोग्य ' के वचनपर हमने जो मीमांसा की थी, दि पर भी वांदी चुप हो गया । उसमें हमने ' नियोगका प्रकार है । बताया था, उससे वादीका मुख बन्द हो गया । हमने छान्दोक Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 265

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४ ९ ६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) aar की व्यवस्था बताई थी कि बहुत - सी अपनी खियों में कोई - वे एक पतिकी शय्या पर आ जावे तो उस समय पति यदि उसकी ष्ट, उत्पन इच्छा पूरी न करे, तो उसे पाप लगता है । श्रीपं. माघ जीने भी भाग..अ . सम्भवतः यही व्यवस्था लिखी थी । देखिये- ' यदि राजा आदि जिस व्यक्तिकी एकसे अधिक पत्नियें हों... सो उनमें से कोई भी वैध पत्नी ऋतुधर्मिणी हो, तो पतिको उसकी उपेक्षा नहीं करनी गिर गया । चाहिये ' ( दूधका दूध पृ. २७ ) । इसलिए इसमें हम दोनोंका क्य कुछ भी विरोध नहीं । और फिर सबकी सूझ एक जैसी भी नहीं होती; अतः कभी भिन्नता हो जानेपर दोष भी कुछ नहीं खकर हो सकता ।. षका है । ( ग ) आगे वादी की पुस्तक के सम्पादक हमारे विद्यार्थीजी ने ' परिहरेत्’का ‘ अपहरेत् ' अर्थ किया था । हमने इसपर वेद आलोचना की थी कि - विद्यार्थीजीने बिना प्रमाण ' परिहरेत्'का ि ' अपहरेत् ' अर्थ कैसे कर दिया म उसक ' ब्रह्मचारीजीका अर्थ उचित ही है गा श्रीदेवेन्द्रनाथजीने भी किया है ' । था कि ? इसपर वादी कहता है कि-I । ऐसा ही अर्थ आर्यजगत्के तब क्या एक आर्यसमाजीका वह अर्थ ' सिद्ध ' होगया? विद्यार्थीजी तो हमारे लेखोंको चोरीके ' आलो कहते हैं; वे भी क्या दूसरोंकी चोरी करनेवाले बन गये । मुख बद ' साध्य ' प्रमाण ‘ सिद्ध ' नहीं हुआ करता । एक ' साध्य ' अर्थको सिद्ध करनेकेलिए अन्य ' साध्य ' अर्थ वादीने उपस्थित कर थी, दिया । यह भी ' साध्यसम ' हो गया प्रकार ।. शेष रहा. श्रीविष्वक सेनाचार्यजीका अर्थ; वह भी ठीक नहीं । छान्दोक CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम [ ४६७ ‘ परिहरेत् ' में ' परि ' पृथक् नहीं है; किन्तु ' परिहरेत् ' इकट्ठा है । यह वैसा अर्थ है, जैसे स्वा. द. जीने ' जातिपरिवृत्तौ ' का भाभू. में ' परितः वृत्तिः ' ऐसा अशुद्ध अर्थ कर दिया । ' उपसर्गेण धात्वर्थी चलादन्यत्र नीयत्ते ' के अनुसार यहाँ ' परिहरण ' अर्थ है, ' अप-हरण ' नहीं | ' अपहरण ' अर्थमें कोई प्राचीन प्रमाण भी नहीं । श्रीशङ्कराचार्यजीका अर्थं वादी के अनुसार नियोगका एक प्रकार भी हो सकता है; तो क्या बादी स्वाद के नियोगको भी ' अनु चित, अश्लील वा व्यभिचार फैलाने वाला और स्वामीके भङ्गकी वरङ्गमें प्रसूत समझेगा? ( ६६ ) प्रतिपक्षीने वैलसे भोग करें ( उपयोग लें ) ” यहाँ स्वयं ( उपयोग लें ) यह व्रकेटमें लिखा था, अब लिखता है - ' नी. क्षी. वि ' पृ. १७२ में ' ब्र'केट ' मुद्रणालयकी भूल है । इससे वादीकी ' असत्यप्रियता ' पता लगती है । स्वयं वादीने ' ब्र'केट ' लिखा, पर अब ब्रैकेटको वह मुद्रकोंके गले मढ़ता है, यह तो उसकी गुरु - परम्परा चली आई हैं । स्वा. द. जीने प्रथम-स.प्र. में मृतक श्राद्ध माना था, फिर उनका मत बदल गया; तब तीन - चार साल के बाद उसको छापेखाने वालों पर डाल दिया । इससे यह ब्रैकेट स्वा. दु.के संस्कृतभाष्य वाले यजुर्वेदके भावार्थ-में भी था । यदि ब्रैकेट नहीं था, तो ' उपयोग लें ' यह लिखना ही काफी था; फिर ' भोग करें ' यह भ्रामक शब्द लिखने की आवश्यकता भी क्या थी? अब देखिये इस वादीकी असत्यता । नीक्षीवि. पृ. १७२ स ० ध ० ३२ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 266

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४६८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) पं. ११-१२-१३ में वह पं ० माघ, जीको लिखता है, ' यहाँ पर आप ( पं ० माघ. ) ने म.दया, जीके भाष्यको उद्धृत करते हुए चोरीकी है । उनके भाष्यमें ' भोग करें ' के आगे ब्रकेट में ( उपयोग लॅ ) स्पष्ट दिया है, जिससे ' भोग ' का अर्थ स्पष्ट प्रकट हो जाता है ' । अब विद्वान् देखें कि - पृ. १७२ पं. ६ में वादीने ( उपयोग लें ) यह ब्रैकेटमें लिखा हैं, फिर पं ० माध.जीको उसने स्पष्ट शब्द भी लिखा है कि - ' ब्रकेट में स्वामीजीने ' उपयोग लें ' यह स्पष्ट लिखा है ' । अब वादी बतावे कि उसके लेखमें यह इतना वाक्य जिसमें ब्रैकेट भी स्पष्ट है, और ' ब्रॅकेट ' शब्द भी स्पष्ट है; क्या ' मुद्रकोंने यह शब्द डाल दिये? वस्तुतः यह चेले - चांटे भी अपने दोषको मुद्रकों पर मढ़ना अपने स्वामी से सीखे हैं । इस प्रकार इनके असत्य बहुत हैं । यदि हम सबका संग्रह करें, तो एक स्वतन्त्र पुस्तक तैयार हो जावे । ( ६७ ) वादी लिखता है - ' मुनियोंका पशुपक्षियोंसे सम्भोग मानना पामरपन है ' पर वादीने ' अनेकधा कृताः पुत्रा ऋषिभिश्व पुरातनैः । न शक्यन्तेऽधुना कतु शक्तिहीनैरिदन्तनैः ' इस पद्यको प्रमाण माना है ( पृ. ७३ ) सो पशु - पक्षिणियोंसे सन्तान पैदा करना उसीका उदाहरण है । यहाँ सम्भोग लक्ष्यं नहीं है, किन्तु सन्तति उत्पन्न करना लक्ष्य है । यह तो उनकी अमोघ वीर्यताका प्रमाण है । यसमाजी स्वाद. जीके नियोगको परपुरुषकी स्त्री से बिना मन्त्र वा बिना विवाह किये भी सन्तान उत्पन्न करना लक्ष्य होनेसे दूषित मानते हैं । इसी प्रकार मन्दपाल आदिका भी ' क नु शीघ्र-CC - 0. Ankur Joshi Collection भिन्न जन्तुनोंसे संतान [ मा X अपत्यं स्यात् ' ' सुबहुप्रसवान् खगान् ' ( महा. ११२३१ / लक्ष्य था; और यह पशु - पक्षिणियोंसे सन्तानकी १५-१६ ) यहाँ यह •यस्माद् बीज प्रभावेन तिर्यग्जा ( पशुपक्षिण्युत्पन्नाः उत्पति सि ) नृपते. ऽभवन् ( १०/७२ ) इस मनुपद्यका उदाहरण है । इसपर भट्टने लिखा है- ' तियग्जाति- हरिण्यादिजाता च्यपि श्री कुल्लू कर ऋष्यशृङ्गादवः इसमें वज्रसूचिका - उपनिषद्को - जिसे वादी प्रमाण । देन भी देखिये - वहां लिखा है- ' जात्यन्तरजन्तुषु अनेकजातिसम्भव मानते है. टाल महषयो बहवः सन्ति, ऋष्यशृङ्गो मृग्याः ' इत्यादि । इसका ' जातिनिर्णय ' में आर्यसमाजी श्री शिवशंकरजी का. ती. ने सिख बद आ है - ' विजातीय - जन्तुग्रोंमें अनेक जात्युत्पन्न बहुत ऋषि विद्यमान है । मत जैसे - हरिनीसे ऋष्यशृङ्ग, शृगालसे जम्बूक, शशकसे गेल सह ( पृ. ३२० ) । वादी भविष्यपुराणके श्लोक स्वयं उद्धृत करते है घात उसमें लिखा देखिये - ‘ हरिणीगर्भसम्भूतः ऋष्यशृङ्गो महामुरं उसक ( ब्राह्म. ४२।२६ ) उलूकीगर्भसम्भूतः कणादाख्यो महासुनिः ( ६ ) बादी ' उसमें मुनि भी वही जाति एवं आकृति वना लिया करते है ( उपर जैसे कि - महाभारत में मुनि - दम्पती मृग - मृगीका रूप धारण करो पर अपनी इच्छा पूर्ण कर रहे थे कि - पाण्डुने बाण मार दिए गलती और मुनिसे शाप पाया । इसमें यजुः १६/७६ का कोई रि प्रथम नहीं । पशु - पक्षियोंमें भी कहीं - कहीं आजकल मानुष उसे बताय प्रत्यक्ष है । अमोघ - वीर्य मुनियोंके शुक्रसे पशुपक्षिणियोंमें मुद्रक उनकी शक्तिविशेषवश मानुषी उत्पत्ति भी हो सकती है । पर दी उसपर वादीका यह कहना कि- ' क्या मुनि लोग बहुरूपिये । सूचन Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 267

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ५०० ] - १६ ) चढ़ी उत्तर देने में अशक्ति बता रहा है । जिसे प्रणिमादि यह वादको सिद्धि प्राप्त हो; वह कई प्रकार के रूप बना सकता है, इसमें सृष्टि-ऋपयो नहीं है, क्योंकि - सामान्यशास्त्र के अपवाद भी हुआ क्रमविरुद्धता श्रीकुलर करते हैं । इस विषय में हम अन्यत्र लिख चुके हैं । वादी उत्तर शृङ्गादव देनेमें शक्ति न होनेसे ' पामरपन ' की गाली कहकर विषयको मानते है. टाल रहा है । तिसम्म ( ६८ ) ' तीतरका शोरखा ' आदि पहले स्वा.द. मानते थे, पीछे सका बदल गये । फिर उसका दोष मुद्रकोंपर तथा श्रीज्वालादत्त ने हि श्रादिपर डाल देना वादीका यह महान् असत्य है । स्वामीका धमान है । मत बदल जाता था, पर वह दोष अपनेपर न देकर अपने से गोरख सहायकों पर दे देते थे; यह उनके साथ स्वामीका ही विश्वास-करते हैं । घात था । जिस सम्प्रदायका बीज ही असत्यपर प्रतिष्ठित हो, महामुरं उसके चेले - चांटोंका भी यह हाल क्यों न होगा? | यही हाल निः ' ( ६ ) वादीका भी है । जैसे अभी - अभी हमने दिखलाया है कि उसने करते । ( उपयोग लें ) यह ब्रकेट स्वयं लिखा, और ' ब्रैकेट ' शब्द भी लिखा; पर अव भगवान स्वरूपका पत्र पाकर बदल गया; और अपनी नार दि. गलती मुद्रणालयपर डाल दी । स्वा. द. जीने स.प्र. तथा सं.वि.के नई प्रथम संस्करण रद्द नहीं किये । स. प्र. में तो भाषाका अशुद्ध होना परं बताया था । मृतक श्राद्धका दोष उन्होंने दो - तीन साल बाद मुद्रकॉपर डाल दिया, जिसकी सूचना उन्होंने वेदभाष्यक़े अङ्क-श्री है । पर दी । जो और भी कुछ परिवर्तन करते थे; उसकी भी वे पिये में सूचना देते रहते थे, जैसेकि - प्र. स. प्र. में उन्होंने रोहिणीको CC - 0. Ankur Joshi गोभिलवचनका समाधान [ ५०१ पहले भूलसे ' बलदेवकी स्त्री ' लिख डाला, फिर वेदभाष्य के अङ्क-पर ' बलदेवकी माता ' लिखा । अतः प्रथम स.प्र. तथा प्र. सं.वि.से उद्धरण दिये ही जा सकते हैं । इस प्रकार संस्कारविधिके द्वितीयसंस्करणकी भूमिकामें भी स्वामीने स्पष्ट लिख दिया है कि- ' इससे यह न समझा जावे कि - प्रथम - विषय युक्त न था, और युक्त छूट गया था; उसका संशोधन किया है ' । तव वादीका प्रथम - संस्करणोंको ' स्वामी द्वारा रद्द कर देना ' कहना उसका अपने शब्दों में ' छिछोरपन ' है । जबकि स्वयं उसने नीती वि. में स्वामीजीका तीतर आदि मांसकेलिए लिखा था कि-' यह एकदेशी मत है ' । जब ऐसा है; तब इसमें पं ० भीमसेन-आदिका दयानन्दजीके साथ विश्वासघात वताना वादीकी अपने शब्दों में ' धूर्तता ' है । हमने जो त्रिगुणात्मकता दिखलाकर ( पृ. ६१६-१७में ) मांसका समाधान किया था; और स्वा. द. का मांसभक्षियोंको मांस खिलाना स. प्र. से दिखलाया था; वादी उसपर चुप्पी लगा गया । देखिये- भाभू. में लिखा है- ' यथा मांसाहारी पुष्टं पशुं दृष्ट्वा इन्तुमिच्छति ' ( शता.पू. ५५१ ) ' यथा मांसाहारी पुष्टं पशुं दृष्ट्वा तन्मांसभक्षणेच्छां करोति ' ( भाभू. पृ. ६७५ ) ' जैसे मांसाहारी मनुष्य पुष्ट पशुको मारके उसका मांस खा जाता है ' ( शता.पू. ६८० ) सो इस प्रकारके वचन उन मांसभक्षियों में चरितार्थ हो जाते हैं । ( ख ) वादीने गोभिलग्र का ' कृष्णया गवा यजेत ' प्रमाण दिया था; हमने उसका समाधान दिया था कि - गाय वेदानुसार Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 268

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५०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ' अघ्न्या ' होती है, पर यदि जहाँ मारना प्रथं प्रतीत होता हो; और ' गो ' शब्द आ जावे; तब वहाँ ' गो ' शब्द अन्य कृष्ण पशुका वाचक हो जाता है ' इस पर वादीकी बोलती बन्द हो गई । वादी इसका अन्य उदाहरण देखे- ' शसने न गावः ' ( ऋ. १०/८६/१४ ) इस वेदमन्त्रमें ' शसने ' का अर्थ ' हिंसास्थान ' है । आर्यसमाजके चतुर्वेद - भाष्यकार श्रीजयदेव - विद्यालङ्कारने भी इसका अर्थ ' हत्यास्थान ' किया है । यदि ऐसा है; तब ' हत्यास्थान ' में ' गो ' शब्द आने से क्या वादी ' गायकी हत्या ' अर्थ मानकर अपने ' वैदिकधर्मकी जय ' करेगा; और वेदको वाममार्गका ग्रन्थ मान लेगा? यह वादी स्वयं बतावे । वादी अन्य भी वेदका इस प्रकारका मन्त्र देख ले ' वि पर्वशः चकते गाम् इव प्रसिः ' ( ऋ. १८१७६६ ) यहां असि ( तलवार ) से ' गो'का काटना कहा है; तब क्या वादी इससे गायका खड्गसे काटना वेदसम्मत तथा वेदकालीन मान लेगा? यदि वादी वेदमें ' गौ'का ' अघ्न्या ' ' नाम देखकर फिर यहाँ वधस्थानमें ' गौ'का तथा काटने अर्थ में ' गो'का ' गाय ' न करके ' अन्य पशु ' ही अर्थं करेगा, जैसा कि श्रीसायणने और उनके अनुसार श्रार्यसमाजी - भाष्यकार श्रीजयदेवने किया है, और इसी प्रकार दूसरे मन्त्रमें भी ' गो ' का अर्थ ' पशु ' कर लेगा; वैसे ही गोभिलसूत्र में भी ' अघ्न्या ' के अनुसार ' कृष्णया गवा ' से अन्य स्त्रीपशु लिया जायगा । तब वादी जबर्दस्ती गायकी हत्या क्यों करता है? वेदमें तथा गृह्यसूत्र दोनों स्थलोंमें समान समाधान CC - 0. Ankur Joshi Collection गोभिलवचनका समाधान III होगा । यज्ञका भी हमने ' पशुना रुद्र यजते व्याकरणका उदाहरण देकर ' पशु रुद्राय प्रयच्छति यह दिखलाकर ' यज ' धातुका वहाँ ' देवपूजा - सङ्गतिकरण- ' अर्थ लिख इस धातुपाठ द्वारा ' देवोह श्यक दान ' बताया था । इसपर तब का मुख बन्द हो गया; एक भी शब्द इसके विरोध में रोक भार वहन किया सका 1 ( ग ) यह भी हमने लिखा था कि- ' पायसेन वा ' रखते उत्तरपक्ष है । उत्तरपक्षको अन्तमें रखना पड़ता है । उसको व वह मकार लहू सामश्रमीने ‘ अधमः कल्पः ' कहकर ठीक नहीं किया ' । गेती कहक प्रेमी पथिकने श्रीसामश्रमीजीकी वकालत करते हुए कि- बा जैसे लालबुझक्कड़ पण्डित सामश्रमीजी नहीं थे ' यह कहा यजन गाली तो दे दी, पर हमारी इस बातका प्रत्युत्तर न देकर उसमें ही अनायास ' लालबुमक्कड़ ' पदवीको पा गया । बधाई हो ज जा अन्तिम पक्ष क्या पूर्वपक्ष हो जाता है? जाता ( घ ) हमने लिखा था कि- मूलसूत्र में ' मांस ' शब्द नहीं गायको वादीने इसपर ' वसाम्, आज्यं मांसं पायसम् ' इति संयूय ' समझ यह सूत्र दिया । इसका उत्तर भी हम ' आलोक ' ( ७ ) क्या व चुके थे कि - ' जैसे ब्रह्राचारीका भूतोंको दान आया है ( ए एक ह २/२/२० ), यहाँ ब्रह्मचारीकी चर्बी, माँस आदि काट - क भूतोंको पृथक् - पृथक् नहीं दिये जाते; वैसे ही यहाँ भी अपेरण लेना चाहिये । इसपर भी वादीका मुख बन्द हो गया । बुरी व चोल नहीं सका ( पृ. २३ Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) १०४ / यह ऐसे वाक्य तो अब भी दीवारोपर चिपके इश्तिहारोंमें ति श्रये लिखे मिलते हैं कि - ' टाटा - मिलमें मजदूरोंकी चर्बी - खूनका हुवन ' करण - द क्या है कि - अमुक मिलमें मजदूरोंको इसपर भो मारकर उनकी चर्बी और लहू निकालकर उससे सचमुच हवन वहन किया जाता है? वस्तुतः इस प्रकारके वाक्य अन्य अभिप्राय रखते हैं कि वहां मजदूरोंसे अधिक काम लेकर उनकी चर्बी-वह लहू सुखाया जाता है, वैसे ही यहाँ भी वास्तोष्पतिको जो उसको मकानका देवता है, जैसे कि - स्वाद भी ' ॐ वास्तुपतये नमः ’ | गोव कहकर वास्तुके मध्यमें वास्तुके पतिको पाकका भोग रखवाते हैं; हुए कि वा उस देवताको नमस्कार कराते हैं; सो उसके निमित्त पशुका - कहा यजन, ( ' यज देवपूजा - सङ्गतिकरण- दानेषु ' ) दान आया है । न देश उसमें उस पशुका पूरा दान होने से उसके वसा आदि भी दत्त बधाई हो जाते हैं । यह मानसिक हवन ( दान, हु दानादनयो: ' ) हो जाता है; जब इस प्रकार सुव्यवस्था लग जाती है; तब वादीको ब्द नहीं गायको जबर्दस्ती मरवानेकी उत्कण्ठा कैसे रहती है? यह हमें भी संयूय '? समझ नहीं आती । धन्य है इस प्रकारकी वैदिकम्मन्यता । ( ७ ) क्या वह विधर्मियोंका एजेन्ट है? उक्त बातपर स्वामीका भी गया है । एक दृष्टान्तवादी देखे । काट - छ जैसेकि - ' समर्पण ' में स्वा. द. जीने भी स.प्र. में लिखा है - ' देहके मी अपेण से नखशिखा - पर्यन्त देना कहाता है । उनमें जो कुछ अच्छी-गया ॥ बुरी वस्तु है, मलमूत्रादिका भी अर्पण कैने कर सकोगे '? ( पृ. २३४ ) । वादी जैसे वेदमें वैसा आभास होनेपर वहां अर्थकी CC - 0. Ankur प्रापस्त के वचनकी व्यवस्था [ ५०५ व्यवस्था करता है, वैसे यहां पर भी करे । गायका वधिक न बने । यह पाठ वादीने उदयनारायणसिंह वाले गोभिलगृह्यसूत्र से दिया है । ऐसे पाठोंकी व्यवस्था उस गोभि गृ. की प्रथमावृत्तिकी विस्तीर्ण भूमिकामें लिखी हैं, पथिक वहीं देख ले । ( ङ ) " धेन्वनडुहयोर्भक्ष्यम् ' पर हमने आलोक ' ' ( ६ ), पृ. ३८४-८६ में मीमांसा की थी; उसमें आप.ध. सूत्रोंका पूर्वापर दिखलाकर हमने टीकाकार श्री हरदत्तका भ्रम दिखलाया था, पर गायका वधिक बनना चाहता हु । पथिक कहता है - ' शास्त्रीजीने यहां धूर्तता से काम लेकर टीकाको मानना अस्वीकार कर दिया ' । यहां हमने दिखलाया था कि - ' एकखुर... गवाम् ' ( २६ ) में गाय-बैलको आपधसू.ने अभक्ष्य वतलाया था; तब ' वैन्वनडुह्योर्भेक्ष्यम् ' में गाय - वैलका मांसभक्षण केसे इष्ट हो सकता है? फिर आपस्तम्बने यह मत ' वाजसनेयक ' ( शतपथ ) का बताया था; पर उसमें तो ‘ तस्माद् धेन्वनडुह्योर्नाश्नीयात् ' ( ३.११२ / २१ ) यह निषेध किया है; तब आपस्तम्बने यह वाजसनेयकका मत कैसे लिखा? वस्तुतः आपस्तम्बसूत्रमें ' घेन्वनडुहयोभेक्ष्यम् ' में ' मांस ' इष्ट नहीं, किन्तु ३१ सूत्रमें ' आनडुह - वैलसे कृष्ट अन्न तथा वैलके कारण से अनडुही ( गाय ) में उत्पन्न दूधको वाजसनेय ( याज्ञवल्क्य ) के ' अश्नाम्येव ' इस कथनसे उपयोगाई कहा है, जो शाला-प्रवेशककेलिए निषिद्ध था । व्यवस्था लगाना कोई सरल कार्य नहीं होता । Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ' प्रन्या ' होती है, पर यदि जहाँ मारना घथं प्रतीत होता हो; और ' गो ' शब्द आ जावे; तब वहाँ ' गो ' शब्द अन्य कृष्णपशुका वाचक हो जाता है ' इस पर वादीकी बोलती बन्द हो गई । वादी इसका अन्य उदाहरण देखे- ' शसने न गावः ' ( ऋ. १०/८६/१४ ) इस वेदमन्त्रमें ' शसने ' का अर्थ ' हिंसास्थान ' है । आर्यसमाज के चतुर्वेद - भाष्यकार श्रीजयदेव - विद्यालङ्कारने भी इसका अर्थ ' इत्यास्थान ' किया है । यदि ऐसा है; तब ' हत्यास्थान ' में ' गो ' शब्द आने से क्या वादी ' गायकी हत्या ' अर्थ मानकर अपने ' वैदिकधर्मकी जय ' करेगा; और वेदको वाममार्गका ग्रन्थ मान लेगा? यह वादी स्वयं बतावे । वादी अन्य भी वेदका इस प्रकारका मन्त्र देख ले ' वि पर्वशः चकते गाम् इव असिः ' ( ऋ. १८७६६ ) यहां असि ( तलवार ) से ' गो'का काटना कहा है; तब वया वादी इससे गायका खड्गसे काटना वेदसम्मत तथा वेदकालीन मान लेगा? यदि वादी वेदमें ' गौ'का ' अघ्न्या ' ' नाम देखकर फिर यहाँ वधस्थान में ' गौ'का तथा काटने अर्थ में ' गो ' का ' गाय ' न करके ' अन्य पशु ' ही अर्थं करेगा, जैसा कि -श्रीसायणने और उनके अनुसार श्रार्यसमाजी - भाष्यकार श्रीजयदेवने किया है, और इसी प्रकार दूसरे मन्त्रमें भी ' गो ' का अर्थ ' पशु ' कर लेगा; वैसे ही गोभिलसूत्र में भी ' अघ्न्या ' के अनुसार ' कृष्णया गवा ' से अन्य स्त्रीपशु लिया जायगा । तब वादी जबर्दस्ती गायकी हत्या क्यों करता है? वेद में तथा गृह्यसूत्र दोनों स्थलोंमें समान समाधान CC - 0. Ankur Joshi Collection गोभिलवचनका समाधान [ " पू ० होगा । यज्ञका भी हमने ' पशुना रुद्र यजते व्याकरणका उदाहरण देकर ' पशु रुद्राय प्रयच्छति यह द ' अ दिखलाकर ' यज ' धातुका वहाँ ' देवपूजा - सङ्गतिकरण- लिख इस धातुपाठ द्वारा ' देवोद श्यक दान ' बताया था । तब इसपर भी मारव का मुख बन्द हो गया; एक भी शब्द इसके विरोध में सका । ( ग ) यह उत्तरपक्ष है । सामश्रमीने ‘ प्रेमी पथिकने वह न किय भी हमने लिखा था कि- ' पायसेन ' रखते वा व उत्तरपक्षको अन्तमें रखना पड़ता है । उसको मकार अधमः कल्पः ' कहकर ठीक नहीं किया ' । गोरु कहक श्रीसामश्रमीजीकी वकालत करते हुए कि बाउ जैसे लालबुझक्कड़ पण्डित सामश्रमीजी नहीं थे ' यह कहकर यजन गाली तो दे दी, पर हमारी इस बातका प्रत्युत्तर न देकर उसमें ही अनायास ' लालबुझक्कड़ ' पदवीको पा गया । बधाई हो जा अन्तिम पक्ष क्या पूर्वपक्ष हो जाता है! जाता ( घ ) हमने लिखा था कि- मूलसूत्र में ' मांस ' शब्द नहीं, गायको चादीने इसपर ' साम्, आज्यं मांस, पायसम् ' इति संयूब समझ यह सूत्र दिया । इसका उत्तर भी हम ' आलोक ' ( ७ ) क्या व चुके थे कि - ' जैसे ब्रह्मचारीका भूतोंको दान आया है । एक ह २/२/२० ), यहाँ ब्रह्मचारीकी चर्बी, माँस आदि काट भूतोंको पृथक - पृथक नहीं दिये जाते; वैसे ही यहाँ भी अपे लेना चाहिये । इसपर भी वादीका मुख बन्द हो गया । बुरी व ( पृ. २३ चोल नहीं सका Gujarat. An eGangotri Initiative