सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 291–300

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 291–300

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५४४ ] भी कई बातों का ज्ञान प्राप्त होगा । पथका अन्य ). में स्वामीने ' सह नाववतु सह नौ भुनक्तु का श्राशा ( १ ऋभाभू अर्थ लिखा है- ( सह नाव. ) हे सर्वशक्तिमन् ईश्वर! आपकी रखना कोही कृपा, रक्षा और सहायसे हम लोग परस्पर एक - दूसरेकी रक्षा करें । कोरे ( सह नौ भु. ) और हम सब लोग परम प्रीतिसे मिलके सबसे उत्तम ऐश्वर्यं... आनन्दको भोगें । यह अर्थ स्वा. द. जीने तै.. बो चाहिये ( १ प्र. १ अनु. ) के वाक्यका दिया है । यहां हम प्रपा. लिखा है, पर सं. वि. में अष्टम प्रपा, लिखा है । यह पहली भूल है । हुए थे साना ( २ ) इसमें ' नौ ' यह द्विवचनान्त है । यह गुरु - शिष्य के लिए. टी कामे अथवा यजमान - पुरोहितादि के लिए है, पर स्वामीजीने द्विवचनका श्रर्थ नहीं किया । यदि आरण्यकको बहुवचन इष्ट होता; तो वात् । सी- ' सह नोऽवतु, स्वह नो भुनक्तु, सह वीर्यं करवामहै, तेजस्वि नोऽधीतमस्तु मा विद्विषाम है? होता; पर आरण्यकने ऐसा नहीं. उन हावा लिखा, उसने ५ बार भी न. थककर द्विवचन ही दिया है; पर उनका स्वामीने बहुवचनका अर्थ किया है । इससे यह भी सिद्ध होगया नहीं कि - खामी प्राचीन - साहित्यके वचनोंके अर्थ उनके शब्दोंकी मानते अनुकूलतासे न करके अपनी इच्छासे किया करते थे । माना ( ३ ) ' सह नौ अवतु, सह नौ भुनक्तु ' इन दोनों वाक्योंमें ' नौं ' के हैं; यह कर्म है, द्वितीयाका द्विवचन है, ' युष्मदस्मदोः षष्ठी चतुर्थी-द्वितीयास्थयोर्वा - नावौ ' ( पा. ८ १ २० ) से द्वितीया में निष्पन्न है, किसी पर स्वामीने ' हम लोग ' अर्थ करके उसे प्रथमान्त - कर्ता बना; कॉको दिया है । यदि ' नौ ' यह कर्ता होता; तो क्रिया भी तद्नुसारः CC - 0. Ankur Joshi स्वामीका प्रर्थं प्रशुद्ध { II: द्विवचनान्त होती, क्योंकि यह कर्तृवाच्य है, कर्ताके अनुसार ही क्रिया में वचन होता है । पर यह एकवचनान्तहै । ( ४ ) स्वामीजीने ' नौ'का ' हम लोग ' अर्थ करके उस द्वितीयान्तको प्रथमान्त बना दिया, पर प्रथमा, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमीमें वां - नौ आदेश नहीं होते; द्वितीया, चतुर्थी, और षष्ठी में होते हैं । स्वामीने प्रथमाविभक्तिका अर्थ किया है, तब उसमें ' नौ ' नहीं हो सकता । फिर प्रथमाद्विवचनान्त कर्ता क्रिया भी द्विवचनकी होनी चाहिये थी; पर नहीं हैं, वह होनेपर एक-वचनान्त है. ' अवतु, भुनक्तु ' । यह स्वामीजी की अन्य भूल हुई । ( ५ ) फिर ' नौ'को कर्ता तथा प्रथमान्त मानकर अर्थ करनेपर क्रियामें ' हम लोग ' भी उत्तम पुरुषका द्विवचन होना चाहिये था, पर वहां प्रथमपुरुषके एकवचनकी क्रिया है; अतः यह सम्बन्ध भी नहीं जुड़ सकता । ( ६ ) ' सह नौ भुनक्तु ' का अर्थ स्वामीने किया है- ' हम सब लोग आनन्दको भोगें ' । यहां भी स्वामीजीकी भूल है । भुज्-धातुके तीन अर्थ होते हैं, १ खाना, २ भोगना, ३ रक्षा करना । इनमें ' भुजोऽनवने ' ( पा. १।३।६६ ) से खाने और भोगने अर्थ में भुज - धातुको आत्मनेपद होता है, और रक्षा- अर्थमें परस्मैपद ।. जैसे- ' वृद्धो जनो दुःखशतानि भुङ्क्ते ' में ' भोगना ' अर्थ होनेसे आत्मनेपद है । ' श्रोदनं भुङ्क्ते ' में खाना अर्थ होनेसे श्रात्मनेपद है । ' महीं भुनक्ति ' में रक्षा अर्थ होनेसे परस्मैपद है । उक्त-कण्डिकामें ' भुनक्तु ' यह परस्मैपद है, सो इसका अर्थ ' रक्षा ' सं ०६० ३५ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ] २४६ करना चाहिये था; परन्तु स्वामीने यहां ' भोगना ' अर्थ किया है - यह उनकी अन्य भूल है । भोगना अर्थ होनेपर आत्मनेपद होता । ( ७ ) केवल यहीं स्वामीने यह अशुद्ध अर्थ नहीं दिया, बल्कि – अपनी संस्कारविधिमें भी ऐसा ही अर्थ दिया है । देखिये-' हम स्त्री - पुरुष, सेवक - स्वामी, मित्र - मित्र, पिता - पुत्रादि ( सह ) मिलके ( नौ ) हम दोनों प्रीतिसे ( अवतु ) एक - दूसरेकी रक्षा किया करें ' ( गृहाश्रम. पृ. २४५ ) । यहां भी ' नौ ' का अर्थ स्वामीने प्रथमाका किया, ' अवतु ' का अर्थ उत्तम पुरुषका किया । यहां स्वामीने बहुवचनका अर्थ न करके द्विवचनका अर्थ किया-. यह तो ठीक है, पर शेष भूल है । यहाँपर स्वामीने ' सह नौ भुनक्तु'का अर्थ - मालूम नहीं क्यों छोड़ दिया? कदाचित् इसलिए कि — यहाँ उनको ‘ भुज् ' धातुका परस्मैपद देखकर ' रक्षा ' अर्थका विचार आ गया हो; फिर दोबारा रक्षा अर्थ करने में उन्हें पुनरुक्ति प्रतीत हुई हो, इसलिए कदाचित् छोड़ दिया हो । ( ८ ) यदि कहा जावे कि यहां स्वामीने व्यत्यय से ' नौ ' को प्रथमान्त बनाया हो; यह भी ठीक नहीं; तब प्रथमामें ' नौ ' न -लिखा जाता; ' आवा ' लिखा जाता; क्योंकि - ' प्रथमा ' में ' नौ ' नहीं. होता । आरण्यकको यदि यह इष्ट होता; तो वह क्रियामें भी उत्तम पुरुष और द्विवचन देती । यदि यह कहा जावे कि-स्वामीने इसमें क्रियाके वचनमें भी व्यत्ययवश द्विवचन माना-CC - 0. Ankur Joshi Collection व्यत्यय में अव्यवस्था हो, यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब फिर क्रियामें न होकर उत्तम पुरुष होना चाहिये था, आवाम् - धवार प्रथम पु धेयम , भुनजाव अथवा भुनजाव है ' होता । यदि कहो कि पुरुषका भी व्यत्यय हो जावेगा वाक्य यह अव्यवस्था लाना हुआ । इसमें पहले; व्यत्ययसे द्विवचन में बहुवचन माना गया, फिर व्यत्ययसे परम मानी गई, फिर एकवचनान्त क्रिया में व्यत्ययसे ' नौ में प्र कर्ता द्विवचन गया, फिर प्रथमपुरुषकी क्रियामें व्यत्ययसे उत्तम मन की प्र गया; इस प्रकार स्वेच्छानुसार अर्थ करनेपरं पुरुष मात हम " ब्रे अव्यवस्था आ पड़ेगी, और वेद भी मर्यादाहीन हो जबया पु भाषा फिर व्यर्थ हो जावेगी । फिर तो कोई भी अपना जैसा चाहेगा, अपनी इच्छानुसार मगर पहले व्यत्ययः करके विभकि हम द आदिका अर्थ बदलकर क्रिसी भी अर्थको निकाल दिया करेग ' अबू ' ( ८१ ) और फिर व्यत्यय वेदमें हुआ करता है, परन्तु रत्त समाजानुसार यह वेदका मन्त्र नहीं, यह कृष्णयजुर्वेदका है । नहीं । कृष्णयजुर्वेदको आर्यसमाज वेद नहीं मानती । तब व्यत्यय करनेवाला है, ज कृष्णयजुर्वेदको भी वेद मानना पड़ेगा । और फिर यह कलि परमा कृष्णयजुर्वेदकी किसी संहिताकी भी नहीं है, किन्तु धारष्पककी है । परमा आरण्यक और उपनिषद् ब्राह्मणभाग माना जाता है; न ( श्रार्यसमाजको ब्राह्मणभागको भी वेद मानना पड़ेगा । इससे रखे समाजके सिद्धान्तका भङ्ग होकर उसका वैदिक धर्म तुम है कोई. जावेगा; वह सनातनधर्म बन जायेगा; ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेला ' पू श्र Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) २४६ 7 उसको अपनाना पड़ेगा । प्रथम पु ' धेयम् ' यह सिद्धान्त भी प्रश्न होगा कि आरण्यकके इन दो वाव, भार ( ख ) अब हमपर है? तो सुनिये - इम बतलाते हैं ।— ' सह वाक्योंका सत्यार्थं क्या यहाँ क्रियामें प्रथमपुरुष और एकवचन है; तब यहाँ त्ययसे न भव ' अध्याहार करना पड़ेगा । ' परमात्मा ' परमात्मा ' इस पदका नौ प्रस ' कर्ता होगा, ' नौ ' द्वितीयान्त कर्म है, ' अवतु ' यह कर्ता परमात्मा-वचन एकवचनान्त क्रिया है । अर्थ होगा- ' परमात्मा पर की प्रथमपुरुषकी पुरुष - मान हम दोनोंका इकट्ठा अवन करे ' । बेमें ( ग ) आगे है - ' सह नौ भुनक्तु ' यहाँ भी वही बात है । यहां स जायगा । ' भुज् ' धातुको परस्मैपद होनेसे उसका ' रक्षण ' अर्थ है - यह 1 मनमाह पहले वतलाया जा चुका है । अब अथ - बिक हम दोनोंको इकट्ठा पाले । अब हम या ' अ ' धातुका भी अर्थं ' रक्षण ' और तु ' रक्षण ' यह तो पुनरुक्ति हो जावेगी । वेदका है । नहीं । अबू धातुके १६ अर्थ होते हैं, करनेवाला है, जिसका तात्पर्य प्रसन्न रखना है । करि परमात्मा हम दोनोंको ( सह अवतु ) हुआ कि वह परमात्मा पर भी प्रश्न होगा कि-भुज् धातुका भी अर्थ पर हम कहते हैं कि-उसमें एक तृप्ति अर्थ भी अव अर्थ होगा कि वह इकट्ठा प्रसन्न रखे, वह की है । परमात्मा हम दोनोंको ( सह भुनक्तु ) इकट्ठा पाले । है; ( घ ) वादी हमसे इसपर प्रमाण पूछ सकता है, पर वह याद से शार्क रखे कि धातुपाठ में ' अन् ' धातुके १६ अर्थ प्रत्यक्ष हैं; तब इनमें तुम कोई अनुकूल अर्थ कर दीजिये । हमने ' तृप्ति ' अर्थं लेकर वंदना ' खूप प्रीणने ' वा प्रीति अर्थ करके उक्त अर्थ किया है, फिर भी CC - 0. Ankur ' सह नाववतु'का श्रर्थ [ ५४ ९ हम प्रमाण देते हैं । रघुवंशमें लिखा है-' किन्तु वध्वां तवैतस्याम् श्रदृष्टसदृशप्रजम् । न माम् श्रवति सद्वीपा रत्नसूरपि मेदिनी ' ( १ ९ ६५ ) राजा दिलीप पुरोहित वसिष्ठ-जीसे कहता है कि आपकी इस बहूमें मैंने सन्तान नहीं देखी है; तब मुझे यह सारी रत्नोत्पादक भी पृथिवी ( न भवति ) इसका यह अर्थ नहीं है कि यह पृथिवी मेरी रक्षा नहीं करती, क्योंकि - पृथिबीकी रक्षा तो वही करता था, पृथिवी उसकी थोड़े रक्षा करती थी । इसका वास्तविक अर्थ यह है - ' पुत्र न होनेपर रत्नप्रसविनी भी पृथिवी मुझे तृप्त नहीं करती, प्रसन्न नहीं करती । इसपर प्रसिद्ध टीकाकार श्री मल्लिनाथकी साक्षी भी देख लीजिये - ' अव धातू रक्षणमतिप्रीत्याद्यर्थेषु उपदेशाद् त्र प्रीणने ' | ( ङ ) हमारा पक्ष सिद्ध होगया । श्रीसायणाचार्यने भी सम्भवतः आरण्यकमें ऐसा ही अर्थ किया है । यदि वादी इसमें लौकिक प्रमाण न मानकर वैदिक प्रमाण चाहे; तो उसे भी सुने - शतपथब्रा में लिखा है- ' एष ह वा अनद्वापुरुषो यो न देवान् प्रवति, न पितॄन् ' ( ६ | ३ | १ | २४ ) यहां भी ' जो देवताओंकी ( न अवति ) रक्षा नहीं करता, वह अनद्धापुरुष है ' यह अर्थ.. नहीं है; क्योंकि - देवता ही मनुष्यकी रक्षा करते हैं । सो यहां भी पूर्ववत् अर्थ है - ' यो न देवान् ( अवति ) प्रीणयति, अर्चयति वा ' । इसलिए ऐतरेयत्रा. में इस प्रकारके वाक्यमें ' यो न देवान् अर्चति, न पितन् ' ( ८२८ ) यह पाठ आया है । हमारा पक्ष Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सिद्ध हो गया । इससे क्या माना जावे कि- स्वामी व्याकरणका इतना साधारण ज्ञान भी नहीं रखते थे, अथवा स्वेच्छानुसार तोड़ - ताड़ ' करके अर्थ बदल देते थे; यह वादी स्वयं बता सकता है । ( ८२ ) अथवा यहां एक अन्य बात भी कही जा सकती है । - कि- स्वा. द. जीने इस मन्त्रमें सचमुच व्यत्यय ही माना हो । व्यत्यय होता है वेद में; और स्वामी पहले ब्राह्मणभाग - आरण्यक, 4- * उपनिषत् तथा सभी शाखाओंको वेद मानते थे, पीछे बदल गये । इसमें वैसे तो उनके बहुत प्रमाण मिल सकते हैं, पर यहां ..कुछ दिये जाते हैं । ( क ) यदि स्वामी केवल सं. आदि चार पोथियोंको ही वेद मानते; तो वेदके प्रेमी वे अपनी पुस्तकोंके आरम्भ में उन्हींके मङ्गलाचरण करते, पर स्वामीने ऐसा नहीं किया । ऋभाभू. के आरम्भ में स्वामीने ' सह नाववतु ' इस तैत्तिरीय आरण्यक -* जो कृष्णयजुर्वेद है - का मङ्गल दिया है । ( ख ) अपनी संस्का.वि.के आरम्भमें भी यही ' सह नानवतु ' तैत्तिरीयारका मन्त्र दिया * है । ( ग ) अपने स. प्र. की आदि में भी ' शन्नो मित्रः.. नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो!.. अवतु वक्तारम् ' यह आरण्यक वा उपनिषद्का ही मङ्गल दिया है । इससे स्पष्ट है कि - स्वाद. ब्राह्मणभाग तथा तदन्तर्गत: आरण्यक उपनिषदादिको भी वेद माना करते थे । CC - 0. Ankur Joshi Collection काशीशास्त्रार्थ - समीक्षा काशी- शास्त्रार्थ समीक्षा । ( ३ ) काशी - शास्त्रार्थको लीजिये । - एको दिगम्बरः - दयानन्द सरस्वती ऋग्वेदादिसत्यशास्त्रेभ्यो निश्चयं कृत्वा । वदति - ' वेदेषु पाषाणादिपूजनविधानं रुद्राक्षत्रिपुण्ड्रादिधारणं सं ' च नास्त्येव ' । यह ध्यान रखना चाहिये कि पहले स्वाङ्ग, मूर्तिपूजा भी करते थे, रुद्राक्षकी माला भी धारण करते है । वैष्णवोंसे उनने शास्त्रार्थ भी किया था, जयपुरके राजाको क्षेत्र भी बनाया था । रुद्राक्षमालाएँ भी स्वामीने वितरण की है । यह उनके जीवन - चरित्रमें स्पष्ट है, पर अब यहां बदल गई यह उनका समय - समयपर बदलनेका आदिम प्रमाण है । यहां उन्होंने वेदोंमें पाषाणादिकी पूजा नहीं मानी । • लाजपतरायजीने अपने बनाये स्वा. द. जीके जीवन - चरित्रों बताया है कि- स्वामीजी अपना मत अन्त तक बदलते रहे । फिर आगे लिखा है - ' एतत् वेदविरुद्धाऽप्रसिद्धाचरणे महत्ता भवति इतीयं वेदादिषु मर्यादा लिखितास्ति ' । यह शास्त्रार्थं सं. १ ९ २६ में हुआ था । स्वामीने काशीराजे पूछा कि - ' वेदानां पुस्तकानि आनीतानि न वा? उन्होंने छा ‘ वेदाः पण्डितानां कण्ठस्थाः सन्ति, किं प्रयोजनं वेदानाम् ' । पृ. ८०२ स्वामीने पण्डितों से पूछा- ' युष्माकं वेदानां प्रामासं स्वीकृतमस्ति न वा? ' । ताराचरणः - सर्वेषां वर्णाश्रमस्थानं वेदेषु श्रामाण्यस्वीकारोस्ति । दया ० - वेदे पाषाणादि मूर्तिपूजनर यत्र प्रमाणं भवेत्; तद् दर्शनीयम् ' ( यहां स्वामीने शुरू - शुरू Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) १५२ ] ही चर्चा की है । वेदमें मूर्तिपूजन दरशानेका प्रमाण गम्बर... वेदी पण्डितों से मांगा ) । तारा०- वेदेषु प्रामाण्यमस्ति वा नास्ति, कृत्वा से परन्तु वेदानामेव प्रामाण्यं नान्येषामिति यो ब्रूयात्, तं प्रति दिघार किं वदेत्? । स्वामी- वेदविचार एव मुख्योस्ति, तस्मात् स एवादौ ले स्वा.इ. कर्तव्यः । कुतः? बेदोक्तकर्मैव मुख्यमस्त्यतः । ( यहां स्वामीने करते थे । वेदको ही मुख्य मानकर वेदका ही प्रमाण मांगा । फिर स्वामीने जाको र मनुस्मृति आदिको भी स्वयं ही वेदमूलक माना- ) मनुस्मृत्यादी-की न्यपि वेदमूलानि सन्ति, तस्मात् तेषामपि प्रामाण्यमस्ति, न तु दल गये, वेदविरुद्धानां वेदाऽप्रसिद्धानां येति ' । माण है । ( ख ) फिर पं ० ताराचरणने पूछा कि - मनुस्मृतेः क्वास्ति वेदे नी । मूलमिति? । ( मनुस्मृतिका वेदमें मूल कहां पर है? ) इसपर नवारित्रो स्वामी ने कहा कि - ' य ' किञ्चन मनुरवदत्, तद् भेषजं भेष-लते रहे । जताया: ' इति सामवेदे ( सामवेद में ' य ' किञ्चन मनुरवदत् ' यह महत्य मनुस्मृतिका मूल है ) । पाठकों को यह याद रख लेना चाहिये कि - स्वामीने यहां । शी राज सामवेद के ब्राह्मण के प्रमाणको सामवेद कहा है । इससे अत्यन्त होंने कहा- ही स्पष्ट है कि- स्वामी पहले ब्राह्मणभागको भी वेद मानते थे, म् ' । पीछे बदल गये । जबकि स्वा. द. ने इस शास्त्रार्थके शुरू में वेद-प्रामास वेदकी स्वयं चर्चा चलाई; और मनुस्मृतिको स्वयं ही वेदमूलक कहा, श्रम स्थान तब पण्डितोंने पूछना ही था कि- मनुस्मृतिका वेदोंमें कहां मूल विपूल है? । स्वामीने ऊपरका उत्तर दिया, उसमें सामवेदका प्रमाण शुरू - शु 1. दिया, पर वह प्रमाण सामवेद के ब्राह्मणका था । उसे सामवेद काशीशास्त्रार्थ- समीक्षा [ ५५३ बताना स्पष्ट सिद्ध कर रहा है कि स्वामी उस समय ब्राह्मरणको वेद मानते थे — ' इति सामवेदे ' यह स्वामीके स्पष्ट शब्द हैं; जो अब तक भी मुद्रित हैं । इसकी भाषा करनेवालेने चालाकी की है । उसने ' सामवेद ' का अर्थ ' सामवेदके ब्राह्मण में ' यह कैसे कर दिया? जबकि पं ० तारा.के कथनकी भाषा यह की गई है- ' मनुस्मृतिका वेदों में कहां मूल है? तब उसका उत्तर भी यही उचित था कि-' जो - जो मनुजीने कहा है '.. ऐसा सामवेद में कहा है । संस्कृत में ठीक लिखे होनेपर भी. उसके हिन्दी अनुवाद में हेर - फेर करना-यह किसी पीछेके चेलेका काम है, ऐसा करनेपर तो आम्रान् ' पृष्टः कोविदारानाचष्टे ' न्यायकी चरितार्थता हो जाती है । पूछा गया है कि- वेदमें मूल बताओ, और हिन्दी अनुवादमें बताया जाता है कि - वेद के ब्राह्मण में देखो । इससे दो बातें सिद्ध होती हैं । एक तो ' सामवेद ' का हिन्दी में ' सामवेदब्राह्मण ' अर्थ करना सिद्ध करता है कि - वेदसे वेदका ब्राह्मणभाग भी गृहीत हो जाता है । दूसरी बात चालाकी की है कि-प्रायः हिन्दी - पढ़े लोगोंपर इसका बुरा प्रभाव न पड़े कि - स्वामी ब्राह्मणभागको पहले से ही वेद मानते थे । इसलिए वहां पीछे ' ब्राह्मण ' अर्थ बढ़ा दिया गया । पर इससे यह अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है कि- स्वामी पहले ब्राह्मणभागको वेद मानते थे । पर इस बातको छिपाने के लिए चेलेंजी इसपर टिप्पणी करते हैं-' इदं पण्डितानामेव मतमङ्गीकृत्य उक्तम्, नेदं स्वामिनो मतमिति बेद्यम् ' ( यह कहना उक्त पण्डितोंके मतके अनुसार ठीक है, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५५४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) परन्तु स्वामीजी तो ब्राह्मणपुस्तकोंको वेद नहीं मानते, किन्तु मन्त्रभागको वेद मानते हैं पृ. ८०६ ) यह टिप्पणी कितनी झूठी है । पण्डितोंने कोई ऐसी बात नहीं कही कि हमें मनुस्मृतिका मूल ब्राह्मणभागसे दिखलाओ । पण्डितोंने तो मनुस्मृतिकी बात ही नहीं चलाई थी । स्वयं ही स्वामीने मनुस्मृतिको वेदमूलक बताया, फिर पण्डितोंने पूछना ' ही था कि- मनुस्मृतिका मूल किस वेदमें है? ' तो स्वामीजीने ' बद्वै ' किञ्चन ' इस सामवेदके वचन में मनुस्मृतिका मूल बताया । यहाँ पण्डितोंका मत कहाँ है, यह तो स्वा. द. जीका ही मत है, चेलेजी असत्य बोल रहे हैं । पण्डितोंने निर्बन्ध नहीं किया था कि- मनुस्मृतिका मूल ब्राह्मणभागसे बताओ । सो यह स्पष्ट है कि - ब्राह्मणभागको वेद कहना स्वामीजीका ही मत है । तभी तो " वे ब्राह्मणभागका वचन वेदके नामसे देते थे । देखिये— प्रथम सं.प्र. ( १४६-१४७ पृष्ठों ) में भी स्वामीने यही लिखा कि- ' और वेदमें प्रमाण भी किसीका नहीं है ऋषि - मुनियोंकी किई भी कोई स्मृति नहीं, सिवाय मनुस्मृतिके- ' यद्वै ' किञ्चन मनुरवदत् तद् भेषजं ' यह छान्दोग्य उपनिषद् की श्रुति है । यहां भी स्वामीने उपनिषद् अथवा ताण्ड्य ब्राह्मणको वेद माना । श्रुति भी वे वेदको मानते थे । देखो ( ऋ.भा.भू. ) । ( ग ) इनसे यह भी सिद्ध हुआ कि सं ० १६२६ में भी उनका यही मत था, और सं. १६३२ में प्रथम स.प्र. बनानेके समय • तक भी. उनका यही मत था । केवल यहीं नहीं, स्वामीजीके CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वामी के मत में ब्राह्मण भी वेद अन्य प्रमाण भी देखें । ( घ ) द्वितीय स.प्र. में भी स्वामीने है- ततो मनुष्या अजायन्त ' यह यजुर्वेद में लिखा है लिमा यजुर्वेद के शतपथब्राह्मणकी श्रुति है । इसे भी उन्होंने, पर यह वेद माना ४. परन्तु पीछे चेलोंने पाठ बदल दिया; लिखा कि- ' यजुर्वेद । । उसके ब्राह्मणमें ' । फिर भी ' यजुवेद ' शब्द बना ही और : यजुर्वेदके ब्राह्मणमें है । रहा । वह । ( ङ ) अन्य भी स्वामीका प्रमाण देखिये- ' अङ्गादङ्गन् ' सम्भवसि ' को स्वामीने सामवेदका वचन स. प्र. ( तृतीय संस्करण । तक नियोग- प्रकरण में माना है, पर यह भी वचन सामवेदके ताण्ड्य ब्राह्मणका है - उसे स्वाभीने सामवेदका मानकर ब्राह्मर भागको वेद मान लिया । पीछे चेलोंने वहाँ भी पाठ बदल दिया ॥ न अब किसकी शक्ति है कि यह कह सके कि पहले स्वा स ब्राह्मणभाग एवं उपनिषदादिको वेद नहीं मानते थे? । य ( ८४ ) अब काशी - शास्त्रार्थमें पुनः इसकी पुष्टि देखें- ' अ ज बहु भर्युगपत् पृष्टम् - प्रतिमा शब्दो वेदे नारित किम्? ( फिर बहुको ) पण्डितोंने इकट्ठ े हल्ला करके पूछा कि वेद में ' प्रतिमा ' शब्द है । वा नहीं? पृ. ८१० ) । तदा स्वामिना उक्तम्- सामवेदस्य ब्राह्मये [ चेति ' । इस पाठ में स्पष्टतया चेलोंकी मिलावट है । यहां ' व व्यर्थ है, जबकि सामवेदका ब्राह्मरण ही कहा है, तब ' च ' शब्द उ क्यों कहा गया? यहां स्वामीने यह कहा होगा कि ' सामवेदै- त इति ' । यह हमारा अनुमान ही नहीं है, बल्कि ठीक भी है । क क्योंकि- क- जब पण्डितोंने ' प्रतिमा ' शब्द वेदमें पूछा है; तब स्वामीन I Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 297

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ ५५६ / नेलिया ' सामवेद ' कहा होगा, नहीं तो- पण्डित तो कहें कि वेद में भी पर " दिखलाओ, और स्वामीजी उन्हें उस वेदके ब्राह्राण में दिखलाएँ । द्र माना वह यह तो ' आम्रान् पृष्टः कोविदारान् आचष्टे ' न्यायकी चरितार्थता वेद और । होगी । सो इस पाठ में भी दो बातें सिद्ध होती हैं । एक यह है कि - वे सामवेदके ब्राह्मणको भी सामवेद कहते थे । दूसरी चालाकी यह है कि - सीधा ' सामवेदे ' लिख देनेसे बुरा प्रभाव ङ्गादार पड़ेगा । इसलिए पीछे वहां चेलोंने ' सामवेदस्य ब्राह्मणे ' यह | संस्करस पाठ ' सामवेदे ' के स्थान बदल दिया । नहीं तो जब प्रकरण नामवेद के बेदकी अनुकूलताका चला हुआ था; और स्वामीने स्वयं ही वेद-ब्राहारा वेदकी अनुकूलताकी चर्चा शुरू की थी; तब उसमें स्वयं ही दिया । ब्राह्मणभागका प्रमाण क्यों दिया? इससे स्पष्ट है कि - वे उस स्वाइ समय ब्राह्मणभागको वेद मानते थे, और उन्हें ब्राह्मणोंके वचन याद भी थे । इस चर्चासे एक चतुर - जज या चतुर- वकील स्वामी-जीको निगृहीत कर सकता है । बहुत ( ख ) अब आगे के लेखसे फिर भी स्वामीका अभिनाय शब्द है । • ज्ञात हो जावेगा । ' तदा तैरुक्तम्- किं च तद्- ( वेद ) वचनमिति? - ब्राह्मणे [ पण्डितोंने वह वेदवचन पूछा था, इसलिए उन्होंने कहा कि-यहां घ ' ' वह वेदवचन कौनसा है? तब स्वामीने कहा- ] ' तदा स्वामिना ' च ' शब्द उक्तम्- ' देवतायतनानि कम्पन्ते, दैवत - प्रतिमा हसन्ति ' इत्यादीनि ' सामने तदा तैरुक्तम्- ' प्रतिमा ' शब्दस्तु वेदे वर्तते, भवान् कथं खण्डनं भी है । करोति? [ तब पण्डितोंने कहा कि इस प्रकार जब तुम्हारे स्वामीने ' अनुसार ही ' प्रतिमा ' शब्द वेद में है; तब वेदप्रमाण चाहनेवाले CC - 0. Ankur Joshi काशीशास्त्रार्थ- समीक्षा [ ५५७ तुम प्रतिमोपासनाका खण्डन कैसे करते हो? इससे भी स्पष्ट हो रहा है कि स्वामीने इस वचनको वेदका वचन कहकर बोला थान नहीं तो स्वादजी यहां उट्टङ्कना कर सकते थे कि यह वेद-पंचन नहीं है, किन्तु ब्राह्मणका वचन है, पर यह उट्टङ्कना न करनेसे स्पष्ट है कि उनके मतसे यह ब्राह्मणका वचन स्पष्ट वेद-• वचन है, और हो भी क्यों नहीं, जबकि उन्होंने शुरू - शुरू में , ' वेदसे दिखलाओ ' की चर्चा भी स्वयं शुरू की; और स्वयं ही वेदका वह वचन दिया भी; तब स्वयं ही स्वामीसे कहा हुआ वह वचन वेदभिन्नवचन कैसे हो सकता है? ( ग ) इसमें चेलोंने फिर झूठी टिप्पणी की है - [ ' अत्रापि तेषाम् अवेदे ब्राह्मणग्रन्थे वेदबुद्धित्वाद् भ्रान्तिरेवास्ति - इति वेद्यम् ] ( अर्थात् उन पण्डितोंकी अवेद - ब्राह्मणग्रन्थोंमें वेदबुद्धि होनी उनकी भ्रान्ति बतलाता है ) विद्वान पाठकोंने जान लिया होगा कि यहां ' उल्टा चोर कोतवालको डांटे ' यह उक्ति चरितार्थ हो रही है । यहां चोरकी चोरी पकड़ी गई है । स्वयं ही स्वामीने वेद - वेदकी चर्चा की; तब पण्डितोंने पूछा कि क्या वेदमें प्रतिमा शब्द नहीं है? तव स्वामी ने कहा कि- वेद में ' प्रतिमा ' शब्द तो है? तब उन्होंने कहा कि - वेद में कहां है? तब स्वामीने बताया होगा कि - सामवेद में है, पर अब चेलोंने पाठ बदल दिया । जब पूछताछ वेदकेलिए चली हुई थी, तो स्वयं ही स्वामीने षड्विंश-ब्रा का प्रमाण क्यों दिया? पण्ड़ितोंने वेदके नामसे ब्राह्मणका प्रमाण दिया होता; और स्वामीजीने भी उन्हींके अनुसार उन्हें Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) वेदवचन कहा होता, तब तो टिप्पणीकारकी यह टिप्पणियां ठीक होतीं; पर पण्डितोंने न तो वेद - प्रमाण पूछनेकी चर्चा चलाई; न ही उन्होंने एक भी वचन वेदका स्वयं दिया; स्वामीने ही स्वयं वेदके प्रमाणोंकी मांग की, और पण्डितोंके वेदवचन मांगने पर स्वयं ही वेदवचन देते रहे, और वेदवचनों पर दिये ब्राह्मणग्रन्थोंके वचन, तो स्पष्ट है कि यह वेदके वचन पण्डितोंके मतसे नहीं दिये गये, किन्तु स्वा. द. जीके अपने मतसे दिये गये; तब टिप्पणीकारको इसमें स्वामीकी भ्रांति कहनी चाहिये थी, पण्डितोंकी भ्रांति उसने कैसे बताई? । इसीसे बहुत स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि - स्वा. द. जी पहले ब्राह्मणभागको वेद बड़े धड़ल्ले से मानते थे । नहीं तो उस समय स्वामी अपने अनुसार ' संवत्स -रस्य प्रतिमां यां त्वां रात्रि! उपास्महे ' ( अथवं. ३ | १० | ३ ) यह मन्त्रभागका वचन बोल सकते थे । इसलिए न बोला होगा कि-इससे उस समय प्रतिमोपासना वैदिक सिद्ध हो जाती । यह मन्त्र उनके विचारमें तो आया ही होगा । तभी उसका स्वामीने ऋभाभूमें पीछे जाकर अर्थ बदला । -यह शास्त्रार्थं सं. १६२६ में हुआ था, सं. १६३२ में प्रथम स.प्र. बनाया; तब भी ब्राह्मणको स्वामी वेद मानते रहे । फिर सं. १६३५ में पहले - पहल भाभू. छपी; उस समय उनका मत बदला, और सं. १६३७ के समय छपे हुए ' भ्रमोच्छेदन ' के समय उनका परिवर्तित मत पक्का होगया । यहां जो भाषाकी: टिप्पणी में चेलोंने लिखा है- ' देवतायतनानि कम्पन्ते, दैवत- ' CC - 0. Ankur Joshi Collection काशीशास्त्रार्थ - समीक्षा X प्रतिमा इसन्ति ' यह वेदवचन नहीं है, किन्तु सामवेद के ब्रा. का है [ कितनी गलत बात है, जब स्वामीने ही सर्व परिंग मे वि वचन कहकर उसे दिया; तब परन्तु वहां भी वह प्रक्षिप्त है, यह चेलोंकी टिप्पणी भी स्वयं दिया; तो क्या स्वामीने एवं प्रक्षिप्त प्रमाण दे दिया उसमें परिवर्तन कैसे किया पॉ क्योंकि वेदोंसे विरुद्ध गया!! बा है ' । गलत है । वचन तो वेदका स्वामी बन स्वयं ही वेदका कहकर वेदविद्ध ? यह बात कौन नैयायिक स मान वेदो सकता है । वस्तुतः टिप्पणीकारका मत स्वामीका पहलेका मह बच ही काट रहा है । इस प्रकार जिस सम्प्रदायकी आधारमिति स्वार ही असत्यपर प्रतिष्ठित हो; वह सम्प्रदाय भी भला सत्यवानी मान वा छलरहित कभी हो सकता है? कह ( घ ) आगे ' यस्मिन् मन्त्रे प्रतिमाशब्दोऽस्ति स मन्त्रो ' बचन मत्यलोकविषयोऽपितु ब्रह्मलोकविषय एवेति ' ( पृ. ८०३ ) तद सम परस्य स्वर्गस्य च नाम ब्रह्मलोकस्येति ' यहां स्वामीने षड्विंशत्रा के परित वचनको ' मन्त्र ' कहा । इससे भी उसका वेदत्व सूचित किया इसस गया है, यहाँपर स्वर्गलोक भी स्वामीने आकाशमें सूर्यादिलोको उपनि माना, पीछे बदल गये । यहाँ पर उन्होंने सूर्यपूजा कहकर मूर्ति विज पूजा भी मान ली । वेदप ( ङ ) अब आगे के स्वामी के वचनोंसे ब्राह्मणभाग की वेदना कि सिद्ध होती है, पाठक देखें । - ' तदा विशुद्धानन्द - खामिनोच्य काटन ' मनो ब्रह्म त्युपासीत, आदित्यं ब्रह्म - त्युपासीत ' इति यथा प्रतीो टिप्प उसने पासनमुक्तम्, तथा शालग्रामपूजनमपि ग्राह्यम् इति ( रु. Gujarat: An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) १६० / ने कहा- जैसे ' आदित्यं ब्रह्म त्युपासीत ' में प्रतीको- ' विशुद्धानन्दजी कही गई है, वैसे शालग्रामकी पूजा भी जान लेनी पासना गया || चाहिये ) । स्वामीने कहा- ' यथा श्रादित्यं ब्रह्म त्युपासीत ' इत्यादि इसपर स्वामीचे वचनं वेदेषु दृश्यते, तथा पाषाणादि ब्रह्म त्युपासीत - इति वचनं वेदविद्ध - कापि वेदेषु न दृश्यते ' ( जैसे आदित्यं ' ब्रह्म त्युपासीत ' यह वचन व्यिक मार वेदोंमें मिलता है, वैसे पाषाणादि ब्रह्मकी उपासना करे ' ऐसा लेका यह वचन वेदोंमें नहीं मिलता ) इससे भी स्पष्ट हो रहा है कि-धारणिति स्वामी इन ब्राह्मणों वा उपनिषदोंके वचनको उन दिनों बेद सत्यवादी मानते थे, तभी तो उन्होंने ' आदित्यं ब्रह्म ेत्युपासीत'को वेदवचन कहा, और सूर्य की पूजा भी उन दिनों मानते थे । पण्डितोंने यह मन्त्रो ३ ' वचन दिया तो सही, पर उसे वेदवचन नहीं कहा, यह श्रार्य-०३ ) र ' समाजके छपाये हुए काशी - शास्त्रार्थ में ही स्पष्ट है; पर स्वामीने वंश पण्डितोंके दिये हुए उसी प्रमाणको स्वयं ही ' वेदवचन ' कहा हैं, तकिया इससे क्या स्पष्ट नहीं कि वे ब्राह्मणभाग तथा छान्दोग्य आदि देलोको उपनिषदों को वेद मानते थे, जिस काशीशास्त्रार्थको स्वा.द.का कर मूर्ति- विजयस्मारक घोषित किया जाता है, उसीने आर्यसमाजके बेदपक्षकी नाक काट डाली है । टिप्पणीकारने प्रयत्न किया है कि - कटी नाक किसी प्रकारसे जुड़ जाए; उसने पण्डितोंके नाक नोय काटने की चेष्टा की है, पर कटा फिर भी स्वाद का नाक ही । प्रतीको टिप्पणीकारने यहाँ स्वामीका हीं खण्डन किया है, पर असत्यतासे उसने नाम पण्डितोंका ले लिया है, पर विद्वानोंकी दृष्टिमें " CC - 0. Ankur Joshi स्वामी सूर्यपूजा मान गये [ ५६१ · टिप्पणीकारकी टिप्पणीका टिप्पणीकारकी टिप्पणी कुछ भी महत्त्व नहीं, उल्टा जी ब्राह्मणभाग से यह बहुत स्पष्ट होगया है कि- स्वाद वा उपनिषद् - धारण्यकको वेद मानते. बदल गये । थे । पीछे इसपर झूठे चेलोंने टिप्पणी दी है कि- ' इदमपि -मतानुसारेणोक्तम्, नेदं स्वामिनो पण्डित-पण्डितोंके मतके अनुसार मतमिति वेद्यम् ' ( यह भी यह कितनी झूठी है, यह स्वामीका मत नहीं है ) । टिप्पणी है । पण्डितोंने ' आदित्यं ब्रह्मत्युपासीत इसे वेदवचन कहा भी नहीं; स्वामीने ' अतः स्पष्ट है कि- स्वामी उपनिषदोंको स्वयं इसे वेदवचन कहा, स्वामी उपनिषद्को भी वेद मानते थे । यदि वेद न मानते, और स्वा. विशु. जीने ही ऐसा कहा होता; तव तो स्वा.द. जी उसकी वातकी कि - ‘ आदित्यं ब्रह्म - इत्युपासीत काट कर सकते थे छान्दोग्य ' यह वचन वेदका नहीं, यह तो उपनिषद् ( ३ | १६ | ४ ) का है, किन्तु न काटनेसे, बल्कि पण्डितोंके उसे वेदवचन न कहने और स्वामीके कहने से यह स्पष्ट सिद्ध है कि - स्वामी उसे स्वयं वेदवचन उस समय छान्दोग्य आदि-उपनिषदोंको वेद मानते थे । जब तक काशीशास्त्रार्थकी कापी जीवित है; तब तक यह सिद्ध होता एक भी रहेगा कि - स्वा. दयानन्द अपना मत आये दिन बदला करते थे । और स्वा.द.ने . प्रत्थरपूजा वैदिक नहीं मानी; पर ' सूर्यपूजा ' मानकर चाहे स्वामीने मूर्तिपूजाके आगे सिर झुका लिया । क्योंकि - स्वामी जड़की पूजाको मूर्तिपूजा मानते हैं । देखिये स.प्र. में उनके शब्द– स ०६० ३६ Colleton Gujarat. An eGangotri Initiative

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५६२ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ' जैसी यह पृथिवी जड़ है, वैसे ही सूर्यादि लोक [ भी जड़ ] हैं ' ( स.प्र, २ पृ. १६ ) ' क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है? किसी जड़ - पदार्थ के सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा है ' । ( स.प्र. ११ पृ. २३० नानकमत - प्रकरण ) इससे भी स्वा. द. जीका पक्ष कट गया | गये थे पत्थरपूजा हटवाने; पर सूर्यपूजा गले आ पड़ी I । ' गये थे रोज बक्शवाने, नमाज गले आ पड़ी ' । स्वा. द. जी फर्रुखाबादकी पाठशाला खोलने के समय वहांके छात्रोंसे सूर्यको अध्यें दिलवाते थे । यह ' आर्यसमाजका इतिहास ' प्रथमभागमें पं ० नरदेवजी शास्त्रीने स्पष्ट लिखा है । तभी तो स्वा.द. जीने ' यदा देवतायतनानि कम्पन्ते, दैवतप्रतिमा इसन्ति ' इस वेदके नामसे दिये गये अपने ही प्रमाण में ' दैवतप्रतिमाः ' से सूर्यमूर्तिका ही ग्रहण किया है, तब सूर्यादि उपासना भी मूर्ति-पूजा तथा वैदिक - पूजा सिद्ध होजानेसे स्वामीका पक्ष गिर गया । तभी तो स्वामीने ' इष्टापूर्ते स ँ सृजेथाम् ' इस मन्त्रमें ' वापी-कूपतडाग - आराम आदिका ' पूत ' से जो ग्रहण किया है, उसीमें ‘ देवतायतन ' ( देवमन्दिर ) भी साथ है । ( च ) अब आगे देखिये - ' ततो माधवाचार्येणोक्तम्- ' पुराण-शब्दो वेदेषु अस्ति न वा? ( श्रीमाधवाचार्यने कहा कि पुराण-शब्द वेद में है, या नहीं? इसपर स्वामीने कहा ) ' तदा स्वामिनो -कम्- ' पुराणशब्दस्तु बहुषु स्थलेषु वेदेषु दृश्यते ( पुराणशब्द वेदों में बहुत स्थलों में है ) । ' तदा विशुद्धानन्दस्वामिनोक्तम्- ' एतस्य महतो भूतस्य CC - 0. Ankur Joshi Collection काशीशास्त्रार्थ - समीक्षा निःश्वसितमेतद्... इतिहासः, पुराणं ' इत्यत्र बृहदारण्यकोपनि ' पठितस्य सर्वस्य प्रामाण्यं वर्तते न वा? ( विशुद्धानन्दजीने कि- एतस्य महतो भूतस्य... इतिहासः पुराणं ' यह सारा बचन प्रमाण है, वा नहीं ) तदा स्वामिनोच्म बृहदारण्यकश व प्रामाण्यम् - इति ( हाँ, यह सारा ही वचन - आप वा प्रमाण है ) । इससे स्पष्ट ही इतिहास - पुराणको भी स्वामीने निःश्वास माना; चाहे वे यहां पुराणसे १८ ईश ही ब्राह्मणभाग लें । पर पीछे वदल गये पुराण न लेकर से यह । भाभू में ' इतिहास पुराणं ' वाले अंशको स्वा. द. जी छिपा गये, बल्कि ' भ्रमोच्छेद उसे वेदविरुद्ध संकेतित कर दिया, और काशी शास्त्रार्थम मते अंशको मान लिया । इससे स्पष्ट मालूम हो यह रहा है कि स्वा.द.जीका स्थिर मत नहीं था. बदलते रहते थे । यदि वे शब्द होते; त्तो उनके यह वर्तमान सिद्धान्त भी बदल जाते, नियोगको तो वे छापेखानेवालोंपर दोष मढ़कर बदल देते । उसके स्थान पत्रे विधवाविवाह मान लेते; अब उन्होंने चेलोंको कहींका सी सना रखा । वे चेले आजकल नियोगपर शास्त्रार्थं तो करते हैं प वृहद अपने समाजमें उन्होंने उसे चालू नहीं किया । विधवाचितह पुत्रों स्वामी क्षतयोनिका वेदविरुद्ध मानते हैं, चेले उसीका प्रा जीवि कर रहे हैं । इससे स्पष्ट है कि- स्वामी प्राप्त नहीं थे? । टिप्पर उनकी दुकानदारी स्थिर होगई है, पर उनके अनुयायी छिपे ज्ञ लगत स्वाद से विरुद्ध बोल रहे हैं । यदि कोई रोक न रही, तो यो इति द्विनोंके बाद स्वाद के सभी: सिद्धान्त पुस्तकोंमें ही केवल ए Gujarat. An eGangotri Initiative