सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 301–310

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 301 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १६४ ] यकोपनिष जावेंगे? अब प्रकरण पर आइये-दजीने तब विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा- अत्र ' पुराण ' शब्दः कस्य दारवस्थ ( यहां पर पुराण - शब्द किसका विशेषण है? इसपर विशेषणमिति क्रम खामीने कहा- ) ' पुस्तकमानय, पश्चाद् विचारः कर्तव्य इति - आले लाओ, फिर विचार होगा ) ' तदा माधवाचार्येण वेदस्य ( पुस्तक पत्रे निस्सारिते ( तव माधवाचार्यने वेदके दो पत्रे निकाले ) ईश्व स्वामीके शब्द बृहदारण्यकको स्वामी के मतमें वेद सिद्ध कर लेकर मे यह रहे हैं; क्योंकि वे पत्रे उक्त उपनिषद्के थे । ' इतिहास नोच्छेदार इसपर झूठा चेला टिप्पणी करता है - ' इदमपि पण्डितानां प्राथमें मते, नैव स्वामिनः ' ( यह पण्डितोंका मत है, स्वामीका नहीं ) है यह बात कितनी गलत है! ' वेदके दो पत्रे ' यह तो स्वामीके द शब्द हैं, पण्डितोंके नहीं । पण्डितोंने ' बृहदारण्यक ' कहा, वेद - नियोग तो नहीं कहा । स्वामीने ही बृहदारण्यकके उन पत्रोंको ' वेदके के. स्थानी पत्रे ' ' कहा । यह काशीशास्त्रार्थ स्वामीका ही तो लिखा है, का सनातनी पण्डितोंका नहीं । इससे स्पष्ट सिद्ध है कि- स्वामी नते हैं. बृहदारण्यक उपनिषद् को भी वेद मानते थे, नहीं तो उपनिषद्के वाविव पुत्रोंको ‘ वेदके पत्रे ' क्यों कहते? | वस्तुतः जब तक काशीशास्त्रार्थ का जीवित हैं; तब तक स्वामीके सिद्धान्त मरे हुए हैं, और उनके थे? श्रा टिप्पणीकर्ता चेले असत्यवादी हैं- ऐसा विद्वान् लोगोंको पता I लगता जावेगा । तो दोस्तदा स्वामिनोक्तम् - पुराणानि ब्राह्मणानि नाम सनातनानि केवल पं इति विशेषणम्, तदा बालशास्त्र्यादिभिरुक्तम्- ब्राह्मणानि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat काशीशास्त्रार्थ - समीक्षा [ ५६५ नवीनानि भवन्ति किमिति? तदा स्वामिनोक्तम्- ' नवीनानि ब्राह्मणानि - इति कस्यचित् शङ्कापि माभूदिति विशेषणार्थ इससे स्वामीने पुराणसे ब्राह्मणोंको: ' । लिया, और उनको सनातन बताया । अत्र जो उन ब्राह्मणोंको स्वानीके अनुयांयी नवीन कहते हैं; वह बात कट गई । जैसे मन्त्रभाग सनातन है, वैसे उसके साथ रहनेवाला ब्राह्मणभाग भी सनातन सिद्ध हुआ । ( छ ) पृ. ८०६ ' तदा स्वामिनोक्तम्- ' अन्यत्र अस्ति इतिहास-पुराणशब्दो विशेषणम् । तद् - यथा- ' इतिहास - पुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः ' इत्युक्तम् ' । यह वचन स्वा. द. जीने स्वयं वेदके वचनरूपमें उपस्थित किया, क्योंकि वे छान्दोग्य - बृहदारण्यकादि उपनिषदोंको पहले वेद ही मानते थे । इसपर वामनाचार्यादिने कहा- ' अयं पाठ एव वेदे नास्ति ' ( यह पाठ ही वेदमें नहीं है ) । इसपर स्वामी ने कहा- ' यदि वेदेषु श्रयं पाठो न भवेच्चेद् मम पराजयः । यद्ययं पाठो वेदे यथावद् भवेत्, तदा भवतां पराजयश्चेति इयं प्रतिज्ञा लेख्या, तदा सर्वैर्मोनं कृतम् ' ( स्वामीने कहा कि- ' इतिहास-पुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः ' यह पाठ यदि वेदोंमें न हो तो मेरा पराजय लिख लीजिये । यदि वेदमें यह पाठ हो, तो आपका पराजय होगा यह प्रतिज्ञा लिख लीजिये; तब सब पण्डित चुप हो गये ) । स्वामीजीके इस सिंहनादसे सिद्ध हो रहा है कि वे छान्दो-ग्यादि उपनिषदोंको वेद मानते थे । नहीं तो उपनिषद् के वचनको वे वेदवचन होने की घोषणा कभी न करते । वादी ही बतावे-. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 302

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 302 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

} श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ५६६ ' इतिहास - पुराणः पश्चमो वेदानां वेद: ' यह वचन वादियोंके किस तथाकथित वेदमें है? पर इसपर झूठा टिप्पणीकार टिप्पणी करता है - ' इदमपि तन्मतमनुसृत्य उक्तम्, नेदं स्वामिनो मतमिति वेदितव्यम् । एते पत्रे तु गृह्यसूत्रस्य अभवतामिति ' । : यह टिप्पणी कितनी झूठी है । जब दिया वचन स्वा.द.ने वेदका नाम लेकर छान्दोग्य उपनिषद् का; पण्डितोंमें वामनाचार्यने कहा कि यह वचन वेदका नहीं, और स्वामीने बिगुल बजाकर कहा कि यह वचन यदि वेदका न हो; तो मेरी हार होगी ' । अव टिप्पणीकर्ता उस.स्वा. द. जीके वेदकी प्रतिज्ञा करके कहे हुए वचनको गृह्यसूत्रका बताकर स्वा. दु.जीको स्वयं पराजित सिद्ध कर रहा है । स्वामीने उस वचनको गृह्यसूत्रका कहां कहा है? दिखाओ काशीशास्त्रार्थ में । वस्तुतः: इस टिप्पणीकारने यहां सर्वत्र पण्डितोंका खण्डन न करके यह स्वा. द. जीका ही खण्डन क्रिया है । क्या स्वा. द. जी इतने अज्ञानी थे कि गृह्यसूत्रके पत्रेको: उन्होंने वेदका पत्रा कह दिया? वस्तुतः ' इतिहास - पुराणः पञ्चमो वेदानां वेद: ' यह छान्दोग्य उपनिषद् ( ७ | १ | ४ ) का वचन है । देखिये स.प्र. ११ पृ. २०६ में स्वा. द. जी की साक्षी । उसीको स्वामीने, वेदवाक्य कहा है, यहाँ गृह्यसूत्रके पत्रोंकी कोई बात नहीं । न गृह्यसूत्र की कोई चर्चा ही थी । यह तो टिप्पणीकारने अपने स्वामीके कटे नाकको छिपाने के लिए गृह्यसूत्र का नाम ले लिया कि लोगों का विचार अन्यत्र चला जावे, इधर न जावे ।: - ( ज ) पृ. ८०६ ' तदा. माधवाचार्येण द्वो पत्रे वेदस्य निस्सार्य CC - 0. Ankur Joshi Collection काशीशास्त्रार्थ समीक्षा [ ५६० 44 सर्वेषां पण्डितानां मध्ये प्रक्षिप्ते । अत्र यज्ञसमाप्तौ [ नवमे? ] दिवसे पुराणानां पाठं शृणुयादिति लिखितम् ' दशमे ब्राह भी स्वामीने शतपथके पत्रों- जिनमें ' नवमे ' ऽहन् । यहाँ । सम किनिन् पुराणमाचक्षीत ' पाठ था - को वेदके पत्र कहा है ।... सम्ब इस पर झूठा टिप्पणीकार टिप्पणी करता है - ' इदमरि पर तमतमेव नैव स्वामिन इति ' ( यह भी पण्डितोंका ही स्वामीजी का नहीं ) जब यह ' वेदस्य पत्रे ' शब्द स्वामीके मत है । कह तब यह मत स्वामीका ही हुआ, पण्डितोंका कैसे हुआ? स्वा है । स्वा वे झ यह काशीशास्त्रार्थं पण्डितोंने छपवाया था? । यहाँ भी टिप्पणी-कार ने पूर्व की भांति सफेद - झूठ बोल दिया । परा तोप ( झ ) ' तस्मादुपनिषदामेव ग्रहणं नान्येषाम् । यदि हो पाठो भवेद् ब्रह्मवैवर्तादयोऽष्टादशग्रन्थाः पुराणानि चेति, कापणे वेदेषु पाठो नास्त्येव - इत्यर्थकथनस्य इच्छा कृता ' । पण्डिते पूर्वप कहे हुए पुराण - विषयक प्रमाणका स्वामीजी को उस समय कुछ, ) ( स्वा उत्तर न सूझ पड़ा । कुछ समय तक सोचते रहे । फिर काशी- पता शास्त्रार्थमें अन्तमें लिखा है कि- ( स्वामीजीने यह उत्तर की हैं । इच्छा की कि यदि यह वेदमें पाठ हो कि ब्रह्मवैवर्त आदि १६ वचन ग्रन्थ पुराण हैं, पर ऐसा वेदमें पाठ नहीं ) यहां पर भी बही श्रव झूठा टिप्पणीकार चेला वही पहले वाली झूठी रट लगाता है- स्वाम द्रमपि तन्मतमेवास्ति, न स्वामिन: ' [ यह भी पडितों का ही अन्त मत है - स्वामीका नहीं ]. नही यहाँ भी सत्यका कितना गला घोंटा गया है । यह पाठ वेद - व Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 303

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 303 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ ५६० श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) १६६ 1 नो दशमे था । स्वामीने उसे वेद - वचन बताया; क्योंकि वे उस रे । यहाँ ब्राह्मण • ग्रन्थका वैसा ही मानते थे 1 । हां, उस समय स्वामी! पुराण-" किञ्चिन् समय पण्डितोंसे दिये गये वचनका समाधान न कर सके सम्बन्धी, पर काशी - शास्त्रार्थके अनुसार उसका उत्तर बतानेकी इच्छा की - ' इदमपि कि इस वेद - वचनमें १८ पुराणोंका नाम नहीं है; पर बाहर न सत कहने से पण्डितों को इस बातका क्या पता लगना था; नहीं तो नीके है वे इसका प्रत्युत्तर भी देते । उन्हें सपना तो नहीं आना था कि-? स्वा.दु. यद्द कहना चाहते हैं; अत: वहां पण्डितोंको स्वा.द.जीके क्या टिप्पणी- पराजित हो जानेकी घोषणा करनी ही पड़ी । चुप्पी हो जानेसे तो पराजय बहुत स्पष्ट हो जाया करता है, नहीं तो क्या पराजित दि हो होने वाले के सिर पर सींग लग जाया करते हैं? - काप्येवं! ( ब ) पृ. ८०७ ' दयानन्द - स्वामिनः चत्वारः पूर्वोक्ताः डि पूर्वपक्षाः सन्ति, तेषां चतुर्णां प्रामाण्यं नैव वेदेषु निस्सृतम् ’ मय कुछ ( स्वा. द. के चार पहले कहे हुए पूर्व - पक्ष थे । इन चारों की प्रमा-काशी- यता वेदोंसे नहीं निकली । ) यह काशीशास्त्रार्थके अन्तके शब्द कहते हैं । इससे स्पष्ट है कि स्वयं स्वा. द. जी ही ब्राह्मण - उपनिषदोंके ६ वचनों वेद - वचन कह रहे थे । हां, पण्डितोंने यह चतुरता भी वही श्रवश्य की कि स्वामी से ही वेद - वचन सभी कहलवाये, और ता है- स्वामी ने सभी वेद - वचन उपनिषद् वा ब्राह्मण ग्रन्थोंके ही कहे । नौका है अन्तमें भी स्वामीने यही कहा है कि वेदोंमें हमारा पूर्वपक्ष नहीं दिखलाया गया ( यहां सभी स्थलों में स्वामीने जो स्वयं पाठ वेद - वचन कह कर दिये; उनमें मन्त्रभागका एक भी वचन नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. काशी - शास्त्रार्थ [ ५६६ दिया । किन्तु सभी वे वेदके नामसे कहे हुए वचन उपनिषद् वा ब्राह्मणभागके ही बोले । इससे छान्दोग्य- वृहदारण्यक आदि उपनिषद् वा शत-पथादि - ब्राह्मणग्रन्थ स्वामीजी के अनुसार सं ० ११६२६ में भी वेद रहे; सं ० १ ९३२-३३ तक भी स्वामीजीके यही विचार रहे । फिर सन् १८७८ ( सं ० १६३५ ) में उनने अपना मत बदल दिया; क्योंकि - इस प्रकार वे स्वयं निगृहीत हो जाते थे; तब उन्होंने अपनी जान छुड़ानेकेलिए उपनिषद् वा ब्राह्मणको वेद मानना बन्द कर दिया, और वर्तमान चार संहिताओंकी पोथियोंको वे वेद मानने लगे, और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका छपवाई । जब-जब उन्होंने अपना प्राचीन मत बदला; उसमें कारण यही होता था कि वे शास्त्रार्थोंमें निगृहीत हो जाते थे, फिर उनके पास इसके सिवाय और कोई चारा नहीं था कि वे अपना मत बदल दें । फिर वे जानबूझकर वैसे नये वक्तव्य जनतामें प्रसारित कर देते थे । जब कोई विद्वान् इस पर उनके ग्रन्थों में विरोध दिख-लाता; तवं वे नाटक खेलकर उससे वह अपनी पुस्तक देखते, और फिर कह देते थे कि यह मुद्रकों तथा प्रूफ शोधकों वा हमारें कि योंकी असावधानतासे छपा है - इत्यादि । यह सव चालाकियोंके हथकंडे थे; जिनमें भोली जनता फंस जाती थी । इससे सिद्ध हुआ कि - स्वाद. आप्त नहीं थे । पहले कुछ मत रखते थे, बाद में बदल जाते थे । अस्तु । यदि ' सह नाववतु ' स्वामी के मत में वेद नहीं है; तो उसमें व्यत्यय भी सिद्ध नहीं An eGangotri Initiative

पृष्ठ 304

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 304 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) हो सकता, स्वा.द.जीका इसका अर्थ अशुद्ध सिद्ध हुआ । इनमें उनकी = अशुद्धियां सिद्ध हुई । ( ८५ ) प्रसंगसे हम ' दयानन्द - सिद्धान्तप्रकाश ' के किये हुए एक - दो आक्षेपों पर भी विचार करते हैं । उसके पृष्ठ १६२ में उसके लेखकने ' कल्म ' शब्दपर बड़ा बल दिया है । उसने लिखा है- ' न काशी के उस समयके बालशास्त्री विद्वान् उत्तर दे सकते थे; और न आज तक किसी सनातनी वैयाकरणने उत्तर दिया है । पृ. २३१ पर फिर वह लिखता है - ' उनके बालशास्त्री और विशुद्धानन्द तो इस प्रश्नका भी उत्तर नहीं दे पाये कि - व्याकरणमें ' कल्म ' संज्ञा कहीं पर की है, अथवा नहीं? आज तक वह प्रश्न ज्योका त्यों है ' । 1. इससे मालूम होता है कि यह वादके मतानुसार स्वामीने सनातनधर्मियों पर बड़ा भारी प्रश्न कर डाला था; जिसका उत्तर सनातनधर्मी विद्वान् न दे सके थे; न दे सकेंगे; न दे ही सकते हैं । पर हम तो इस प्रश्नको साधारण - सा प्रश्न समझते हैं; और उस प्रश्नका उत्तर संक्षेपसे दे रहे हैं । आशा है - आगे प्रतिपक्षी फिर कभी ऐसा दोष नहीं देगा । कदाचित् वह स्वयं इसका ज्ञान न होनेसे इसका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो? महाभाष्य ( १ | ४ | ३ | ५१ ) में ' विपरीतं तु यत् कर्म तत् ' कल्म ' कवयो विदुः ' यह वार्तिक आया है । इसीके भाष्यमें प्रश्न है-किमिदं कल्मेति? वहाँ उत्तर है- ' अपरिसमाप्त ' कर्म कल्म | न वा अस्मिन् सर्वाणि कर्म - कार्याणि क्रियन्ते । किं तर्हि? CC - 0. Ankur Joshi ' ऐधिवम् ' पर विचार Collection Gujarat. An द्वितीयैव । ' होता यह कथित कर्म से अन्य कर्मकी पूर्वाचार्यसि दूसरी संज्ञा है । यहाँपर कपिलक आदि गणमें गृहीत की हुई । होनेसे । में, ' ५ ' को ' ल ' कर दिया गया है; पर इस पूर्वपक्षका वहां स समय किया गया है । वहां श्लोक - वार्तिक है- ' यस्मिंस्तु कर्मण्युपजायतेऽ खोलव यद् धात्वर्थयोगापि च यत्र षष्टी । तत् कर्म कल्मेति च । , कम नोक्तं धातोर्हि वृत्तिर्न र - लत्वतोस्ति ' । वार्तिकका यह श्राशय है । अङ्गस्य कि – कर्मके ‘ र्’को ' ल ' कह देनेमात्र से उसका अन्य अर्थ न ( व्याकर हो जाता । वर्णविकार कर देनेपर भी ' पांसुर, पांसुल ' शब्द स्थानिक पर्यायवाचकता ही है, विशिष्टता नहीं; आवश्यकता नहीं । ( ८६ ) जोकि वादी ( वै. ना. ) ' इणः षीध्वं ' गये श्री दीक्षितके ' ऐधिढ्वम् ' प्रयोगपर लिखता सुतराम् अशुद्ध है; क्योंकि - यहाँपर सान्त अङ्ग इन्तः अङ्ग नहीं । सूत्र इणन्त अङ्गपर ( १५६ ) • यह वादी की अपनी कल्पना नहीं है, अतः संज्ञाभेदर्श श्रायाह स्थानिक सूत्र से सिद्ध किने ढत्वं भ है कि- ' यह प्रयोग यह तो पाया जाता है । इरान्त के इस ही लागू होता है । दिखलाय स्थानिव किन्तु उसने से । उपस्थित स्वा. दाजी के प्रख्यातिकसे अपहृत किया है । स्वा. दु.जीओ बवायावः वैयाकरण सिद्ध करनेकेलिए श्रीदीक्षित पर दोष देना आवश्यक होनेसे न था; पर वादीने ऐसा किया है । पर वादीने स्वामी के ' नादार उसको स्व भक्त ' बनकर उल्टा स्वामीजीकी वैयाकरणों में नाक कटना है । को आय है । इससे वादी श्रीवैद्यनाथका व्याकरणमें ज्ञान न्यून मात्र eGangotri Initiative

पृष्ठ 305

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 305 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) [ 11 १७२ 7 होता है । इस बुक्तिका खण्डन वैयाकरणशिरोमणि म.म. पं ० ने ' सिद्धान्तकौमुदी ' की तत्त्वबोधिनी टीकाकी टिप्पणी-( शिवदत्तजी में तथा सटिप्पण सिद्धान्तकौमुदी ( मूल ) की टिप्पणी में बहुत समयसे , पूर्व कर रक्खा है । वादी म.म.जीका कथन क खण्डन खोलकर सुने । वे ' ऐधिवम् ' पर लिखते हैं-पजायते । ' वेदाङ्ग - प्रकाशकर्त्रा ( दयानन्देन ) तु सलोपस्य स्थानिवत्त्वेन कस श्राशय अङ्गस्य इणन्तत्वव्याघाताद् नात्र ढत्वप्राप्तिः ' इत्युक्तम्; तन्तु है । अर्थ नहीं व्याकरणरहस्यानभिज्ञत्वसूचकम् । स्थानिवत् ' इति सूत्रेण स्थानिवद्भावविषये आदेशप्रयुक्तवारणे तु ' नायकः ' इत्यादौ शब्दक ज्ञाभेदर्श श्रायाद्यादेशानुपपत्तिरिति भूयान् उपप्लवः स्यात् । तस्मादत्र स्थानिवद्भावेपि आदेश - प्रयुक्तकार्यस्य अवारणाद् इणन्तनिमित्तं ढत्वं भवत्येव - इति बोध्यम् ' । सद्ध किये यहां महामहोपाध्यायजीने सलोपके स्थानिवद्भाव होनेपर वह प्रयोग जाता है इरान्त न होनेसे इन्तनिमित्तक ढत्व न हो सकेगा - स्वा.द.जी-होता है के इस आक्षेप के करनेपर स्वाद का व्याकरण विषयक अज्ञान दिखलाया है । उनका तात्पर्य यह है कि यदि ऐसे अवसरों पर उसने स्थानिवद्भाव मानकर आदेश न किये जाएंगे; तो बहुत गड़बड़ियां ..जीको उपस्थित हो जावेंगी; तब तो ' नायक ' आदि प्रयोगों में ' एचो s यावश्यक “ बायावः ' भी नहीं हो सकेगा । ' नी ' धातुको बुलू होकर ' नादा होनेसे ' ई ' को ' ऐ ' वृद्धि होकर फिर ' वु ' को ' अंक ' करनेपर त्ि उसको स्थानिवद्भाव से ' वु ' मानकर अच् सामने न होनेसे को धाय न हो सकेगा । यहां स्थानिवद्भाव ' ऐ ’ होनेपर अच्परकत्वके न मार CC - 0. Ankur ' ऐद्विम् ' पर स्वामीकी भूल [ ५७३ विघात होनेपर भी यदि ' ऐ ' को ' आय ' होकर ' नायकः ' बनता है; इसी प्रकार ' ऐधिदवम् ' में भी इणन्तनिमिन्त जावेगा । ' कतरत् ' में ' सु'को श्रद्ड् करनेपर ढत्व हो ही उसके स्थानिवद्भाव • करनेसे हलादिता हो जानेके कारण म - संज्ञा न होनेसे कतर की टिका लोप न हो सकेगा - इत्यादि बहुतसे दोष आते हैं । • अव हम स्वा. द. जीके माख्यातिकका ही एक उद्धरण देते हैं, जिसमें स्वा. द. जी तथा उनके भक्त श्रीवै. ना. जीका मुख विल्कुल बन्द हो जावेगा 1 । और स्वा. द. जी अवैयाकरण. सिद्ध हो जावेंगे । देखिये— ' आख्यातिक ' ( पृ. ६४ भ्वादि ) में स्वामीने ' प्रभृद्वम् ' प्रयोग लिखा है । इसमें भी ' घि च ' से ' स् ' का लोप है, फिर स्वामी के अनुसार उसके स्थानिवद्भाव होने पर इणन्तत्वनिमित्तकै विधात हो जानेसे ‘ इणः षीध्वं’से ‘ धू'को ' द ' नहीं हो सकेगा । फिर स्वामी दयानन्दने वहाँ ' ध ' को ' ढ ' क्यों किया? क्या है स्वा.द. जीवा उनके अनुयायियोंके पास इसका कोई उत्तर! इस प्रकार ' अकृवम् ' आदि बहुतसे प्रयोग अशुद्ध हो जावेंगे । इस कारण श्री वै. ना. जीका यह आक्षेप निर्मूल है । ( ८७ ) अब प्रतिपक्षी श्रीदीक्षितकी अन्य अशुद्धि बताता है । कि - ' विदांकुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम् ' से ' विदांकुर्वन्तु ' प्रयोग विकल्प-से बनता है, ' पक्षमें ' विदन्तु ' । दीक्षित दिने उक्त सूत्रके ' इति ' से यह व्यवस्था बनाई है कि- ' पुरुषवचने न विवक्षिते, अतः ' विदाङ्करोतु आदि सभी वचनों और तीनों पुरुषोंमें बनेगा; Joshi Colection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 306

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 306 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) परन्तु अगले सूत्रमें ' अभ्युत्सादयामक्रः ' " इति छन्दसि ' सूत्रमें भी ' इति ' पड़ा है, वहांपर दीक्षित जी ' इति ' पदसे ' पुरुष और वचनकी विवक्षा नहीं है ' इस अर्थको नहीं ग्रहण करते । इससे विद् - धातुके सभी पुरुषों और वचनों में दीक्षितादिका ' विदाङ्करोतु ' आदि प्रयोग पाणिनिके विरुद्ध है ' ( द.सि.प्र. पृ. १५६ ) यह वादीका कथन भी जो कि उसने स्वा.द. जीके ' आख्या-तिक ' से लिया है —- व्यर्थ है । ' विदांकुर्वन्तु ' सूत्रमें ' इति ' शब्द प्रकार - वाची होनेसे अन्यका उपलक्षक है; अतः इसमें सारे लोटू में आम् - कृ करना पाणिनिसे विरुद्ध कैसे हो गया? तभी तो ' वासुदेव विजयकाव्य ' में जो अष्टाध्यायीपर बना हुआ है; उसमें ' विदांकुरु श्रीमति! पुत्रि! नो गिरः, स्फारादरेति प्रतिपित्सुरा-गमान् । गुरोः सदाध्यापयतोऽनुशासनं नम्रण मूर्ध्ना बिभरान-कार सा ' ( ११२६ ) यहाँ पर मध्यमपुरुषके एकवचनमें भी प्रयोग देखा गया है । पञ्चतन्त्रके अपरीक्षितकारक में उद्धृत पद्य ' शूरः सुरूपः सुभगश्च वाग्ग्मी, शस्त्राणि शास्त्राणि विदाङ्करोतु में भी एकवचन प्रथम- पुरुषका प्रयोग है । क्या पञ्चतन्त्रकार श्री दीक्षित के पीछे पैदा हुए, जो कि उन्होंने श्रीदीक्षितका मत अनुवृत्त कर लिया? काशिकाकार आदि सभी प्रामाणिक व्याख्याताओं ने जिनके सहारे स्वा. द. जीने अपना अष्टाध्यायी भाष्य किया है, देखो उसके ४ र्थ ५ म आदि अब तक अप्रकाशित भाग; उनमें सारी काशिका ही तो भरी है, यह श्रीजिज्ञासुजीने बताया था; तथा CC - 0. Ankur Joshi Collection ' विदाङ्करोतु ' पर स्वामीकी भूल [ im कातन्त्र- त्र - जैनेन्द्र आदि व्याकरणोंमें भी इसमें अकेले स्वा. द. जीका मत ही कैसे मान ऐसा लिया ही माना है. क जैनेन्द्र - व्याकरण पञ्चम - शताब्दीका है; उसमें जाय? है, चान्द्रव्याकरण, सरस्वतीकण्ठाभरण भी ऐसा , काशिका शताब्दी ), प्रक्रियाकौमुदी, माधवीय- धातुवृत्तिमें अष्टाध्यायीस ' भाषावृत्ति ' ( १६ वीं शताब्दी ) उसपर ' सृष्टिधरा ', टीका पान है - ' वक्त्रं संवृणु नान्नलेन चपले, पङ्केरुहस्याथवा प्राचीर लक्षा वीक्ष्य विदाङ्करोतु भगवान् ' । इसमें भी ' विदाङ्करोतु; ब्लें ' का प्रयोग है । श्री हरदत्तने पद्मञ्जरी में लिखा है- ' कश्चित्तु भाष्यवार्तिक शब्द कारानुक्तत्वाद् उपलक्षणं नेच्छति, स ' इति ' करणस्य प्रयो श्रा ब्रवीतु ' ( जो इसमें अन्य पुरुषों तथा वचनोंका उपलक्षण नह थी सूत्रमें नहीं मानते; वे ' इति ' कहनेका प्रयोजन बतावें ) । इसमें एक अन्य उदाहरण भी देखना चाहिये । ' पद्दनोगा ' श्र ... शसूप्रभृत्तिषु ' यहां ‘ प्रभृति ' शब्द ' प्रकार ' अर्थ में है; इसीलि । श्रा भाष्यमें ' ककुद्दोषरणी ' यह ' शस ' से पूर्व ' औ ' में भी ' दोषर आदेश किया गया है । ' स्वान्तं हृन्मानसं मनः ' अमरकोके बच श्री इस वचनमें ' सु ' में भी ' हृदय ' को ' हृद् ' ' पदङ्घ्रिश्चरणोऽस्त्रियाम सक सु में भी पादको ' पद ' देखा गया है, इसे पाणिनि से विरुद्ध नहीं स्वर माना जाता; वैसे ‘ विदाङ् कुर्वन्तु इति ' इस सूत्र में समझ लेना पर चाहिये । यहां भी ' इति ' शब्द प्रकारार्थंक- एवब्जातीयक स्पष्ट है । स्वा. द. जीने आख्यातिक में ' विदाङ्करोतु ' को ' भाध्यसे विस्ट ' माना है, पर भाष्य में तो ' विदांकुर्वन्त्विति ' यह सूत्र व्याख्यात प्रथ Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 307

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 307 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ना है विरोध कैसा? ही नहीं, तब - इति छन्दसि ' के ' इति ' में दीक्षितका ? शेष रहा तो ' विदामन् यह आवश्यक नहीं कि यदि एक स्थानमें ऐसा है स्वरूपग्रहण, तो सभी स्थान ऐसा हो जाय । यदि टाध्यायीवर ' इति ' प्रकारार्थक है; है तो गङ्गायां महिष्यस्तरन्ति ' में भी घोष: ' में लक्षणा, प्राचीन ' गङ्गायां लक्षणा हो जाय — यह आवश्यक नहीं । वदि ' विदांकुर्वन्त्विति'मैं श्रवा देख औौर उसके अग्रिमसूत्र ‘... विदामन्निति छन्दसि ' में दोनों ‘ इति ’ का प्रयोग! समानार्थक होते; तो दूसरे सूत्रमें भी वही पहला ' इति ' त्र्यवार्तिक शब्द श्रावृत्त हो जाता; तो दोबारा ‘ इति ' के लिखनेकी क्या आवश्यकता प्रयोकर थी? नार इसके अतिरिक्त यह दृष्टान्त विषम भी है । विद् वाले 1 लौकिक - सूत्रमें केवल लोट्लकार ही था; पर उससे अग्रिम इनोमा ' अभ्युत्सादयां ' इस वैदिकसूत्रमें केवल ' लुङ् ' नहीं है, किन्तु इसीलिए श्राशीर्लिङ् भी है; केवल एकवचन नहीं है; किन्तु अन्यमें बहु-दोष ' ' वचन भी साथ है; तब यहां प्रकारवाचकता कैसे हो सकती थी? नरकोष और फिर वैदिक - प्रयोग वेदके एक स्थलमें एक ही प्रयुक्त हो या सकता है, दूसरा नहीं । अतः वहां ' इति ' शब्द वैदिक - प्रयोगोंकी कह नहीं स्वरूपपरकतामें स्पष्ट है; वहां प्रकारवचन अर्थ नहीं हो सकता । मना पर ' विदाङ्कुर्वन्त्विति ' सूत्रमें लक्ष्यानुरोधवश प्रकारवचनता क स्पष्ट है । विरुद्ध ' ( क ) ' पाणिनिसूत्र ' में ' विदाङ् कुवैन्त्विति - अन्यतरस्याम्'मैं प्रथमपुरुषका बहुवचन निपातित देखकर वहुवचन में ही उसका CC - 0. Ankur Joshi ' विदाङ्करोतु पर विचार [ ५७७ पाणिनीय होना और अन्य वचन वा पुरुषोंमें उसे अशुद्ध मानना वादीका ठीक नहीं । यदि ऐसा माना जायेगा; तो ' प्रसितस्कभितोत्तभितचत्त - विकस्ता.... ' ( पा. ७/२/३४ ) में ' त्रिकस्ताः ' इसे बहुवचनमें निपातित देखकर क्या एकवचनमें ' उत्तानाया हृदयं यद् विकस्तम् ' प्रयोग दिखलाना पाणिनिविरुद्ध होनेसे Collection Gujarat अशुद्ध हो जावेगा? इस सूत्र के अन्तमें भी ' इति ' है । ( ख ) ' दाधर्तिदर्धर्तिबोभूतु - तेतिक्ते - प्रलपि ' ( पा. ७१४।६५ ) में ' अलर्षि ' को सिपमें निपातित देखकर ' अलर्ति दक्ष उत्त ' में तिप्का प्रयोग पाणिनिसे निपातित न होनेसे क्या अशुद्ध हो जावेगा? इस सूत्र के अन्तमें भी ' इति ' है - यह वादी याद रखे । इस प्रकारके श्री पाणिनिके अन्य भी बहुतसे उदाहरण दिये जा सकते हैं; पर यदि वादी उनमें अविवक्षा मानता है; तो ' विदाङ्कुर्वन्त्विति ' में भी प्रथमपुरुष - बहुवचनकी विवक्षा नहीं है । वस्तुतः यह अन्य कुछ नहीं; मृतक - स्वा. द. जीकी भक्ति दिखलानेकेलिए यह श्री-दीक्षितपर प्रहार है कि - दयानन्दकी संस्थामें वृत्ति चलती रहे । ( ग ) इस प्रकार तस्यादित उदात्तमर्धह्नस्वम् ' ( पा. १२२/३२ ) में भी ' ह्रस्व ' विवक्षित हो; तो दीघ - स्वरित और प्लुतस्वरितमें उत्तरभागमें अनुदात्त और पूर्वभागमें उदात्त न होना चाहिये, पर यह अनिष्ट है - इससे भी पाणिनि की अविवक्षाशैली भी हुआ करती है; जिसे श्रीदीक्षित श्रादिने लक्ष्योंको देखकर स्पष्ट कर दिया है; उन पर दोष देना साम्प्रदायिकता है । ( ८ ) यह श्रीदीक्षितपर आक्षेप श्री वै.ना. जीने खा.द.जीको . Aangri Initiative

पृष्ठ 308

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 308 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५७८ अद्वितीय - वैयाकरण सिद्ध करने तथा स.ध. पर प्रहार करने के-लिए लिखे; अब वादीने हमें भी विवश कर दिया है कि हम भी स्वा. द. जीकी अद्वितीय वैयाकरणता ' उस आख्यातिक आदि-से ही दिखलावें, उसपर हमारा दोष न माना जावे । उससे पूर्व ' दयानन्दलेखावली ' में. रमाके प्रति भेजे हुए स्वा.द. जीके पत्रका भी कुछ आदर्श हम प्रस्तुत करते हैं-( क ) अभ्यस्तसंस्कृतविद्याया भवत्याः शुभां कीर्ति निशम्य उत्पन्न - स्वान्तानन्देन मया श्रीमतीं प्रति लेखद्वाराऽभिप्रायं प्रकाश्य एवमेव भवत्या अभिप्रायं ज्ञातुमिच्छामि ' ( पृ. १६ ) यहाँ कर्म-वाच्यके वाक्यमें स्वामीजीने क्रिया कर्तृवाच्यकी दे दी । ( ख ) ‘ यथा गार्ग्यादयः कुमार्यो " स्त्रीजनादिभ्यो यावान् सुख-लाभः प्रापितः ' यहाँपर कर्तृवाच्य के वाक्यमें ' कर्मवाच्य'का ' क्त ' स्वामीने लिख दिया । ( ग ) ' तावान विवाहे कृतेऽनेकप्रतिवन्धक-श्वाप्त्या प्रापितुमशक्यः ' यहां ' प्रापितु " अशुद्ध है, इट् होनेसे यहाँ ' रिप ' का लोप नहीं हो सकता । ( घ ) ' यद्यत्र आगमनाभिलाषाऽस्ति चेत् ' ( पृ. १७ ) यहां स्वामीने घञन्त पुंलिङ्ग ‘ अभिलाष ' को स्त्रीलिङ्ग में करके अशुद्धता कर दी । ( ङ ) तावान् व्ययो भवत्याऽत्र प्राप्तेऽवश्यं लभ्येत ' यहां पर ' प्राप्ते ' के स्थान ' प्राप्तया ' चाहिये । ( च ) दूसरे पत्र में ' हम -प्यत्र पञ्चविंशतिर्दिनानि स्थातुमिच्छामि ' ( पृ. २० ) यहां ' पञ्च- ' विशविं ' यह द्वितीया चाहिये । इनमें स्वामी की छ: अशुद्धियां हैं । अब कुछ ‘ आख्यातिक ' में स्वा. जीकी ' अद्वितीय वैयाकरण-CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रख्यातिकको प्रशुद्धियाँ • शिरोमणिता दिखलाते हैं । हमने उनकी पूरी ५ ' लोकालोक ' के ' शङ्कासमाधानाङ्क ' में दिखला दी अशुद्धियां है हैं, स्वाली इव पुलाक ' न्यायसे दिङ्मान यहाँ भी दिखलाते हैं।— ( ( १ ) आख्यातिक ( तनादिगण ) में स्वामीने: ' अणु नि ऋणुधातुका प्रयोग लिखा है, इसमें उवरणान्त धातु अथवा प्रत्यय न होनेसे उवङ् प्राप्त नहीं । यहां यण, चाहिये ' अवनि ' नहीं तो फिर तनादिके ' कुर्वन्ति ' के स्थान पर भी ' कुखानि प्रयोग ठीक माना जावे । श्र ८. एक आर्यसमाज्ञी - व्याकरणाचार्य (? ). ने इसे टङ्कारापत्रिक श्र ( ६८ ) में ' ऊर्णुवन्ति ' बनाकर उवको सिद्ध किया था; श्राम स्व तो यह है कि हमसे तनादिकी लिखी धातुको उसने श्रदाति ' ऊ " ' कैसे बना दिया!! 73 ( २ ) ' पिपूर्धि ' ( जु. ) यहां पर ' धि ' नहीं हो सकता । पृष्ध आख्या. ( पृ. १३४ ) में ' वी ' धातुसे निकाली ' ई ' -धातुके अ ' इयाय ' लिख दिया, जो कि ' अयाञ्चकार ' चाहियेोः । ( ४ ) इसक नः द्विवचन स्वामीने ' ईयतुः लिखा, वह भी अशुद्ध है, और अभ्यासमें दीर्घ कैसे कर डाला? । ( ५ ) षूङ् धातुके लिट् क ' सुषुविषे - सुसूषे, सुषुविट्वे - सुषूट्वे ' यह वैकल्पिक इट् है । उसे ‘ थ्युकः क्रिति ' बाधित करेगा, फिर क़ादिनियमसे मि इटू होगा । जैसे स्वामीने ' सस्वरिम ' में किया है । एक एक I नन्दीने समाधानका, प्रयत्न किया, पर उसमें सफल नहीं है चा सका; नहीं तो फिर उसे स्वामी से प्रोक्त: ' सस्वरिम ' इस लि ज्ञा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 309

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 309 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) १८० ] शुद्धियां मानना चाहिये । ई, स्वा इको भी अशुद्ध - ममजे ( लिट्का उत्तमपुरुष लू ) यहां वैकल्पिक ( ६ ) ममार्ज दान से लिटके ' थ ' का बनाकर वृद्धि शुद्ध है । एक ' से ङित् करके ' मृजेरजादौ संक्रमे ( कूङिति ) अथवा सु ' कमपित् : ' भाष्योक्त वैकल्पिक वृद्धि की है । लिट्लकार -विभाषा वृद्धि यह ... को सार्वधातुकङित् बताना उसकी पहली अज्ञता है, क्योंकि-' कुष्वनि ' श्रपित् - लिट् श्राधेधातुक - कित् होता है, ङित् नहीं । फिर वृद्धिके अभावपक्षमें कित् होनेसे गुण नहीं हो सकेगा । ' थ ' में तो कारापत्रिक स्वामीने ' ममाज - ममृज ' ठीक ही लिखा है; परन्तु उ ० णल में या; श्रक्ष चाहिये । नित्यवृद्धि अदादिष ( ७ ) पृ. ८१ में स्वामीने ' चक्लृम्महे - चक्लृन्महे, तथा ४-पृष्ठमें ‘ जुगुब्व, जुगुम्म ' ( गुप् ) यह ( ४ ५ म संस्करणोंमें ) दो रूप कला । [ अशुद्ध लिखे हैं, यहाँ प्रत्यय होनेसे ' प्रत्यये भाषायां नित्यम् ' नित्य अनुनासिक चाहिये, पर वह भी अशुद्ध है, पदान्त यस् ( ४ ) इत्र न होनेसे अनुनासिक और जश्त्व दोनों प्राप्त नहीं | आख्यातिक-और के छठें संस्करणमें किसीने स्वामीजीकी अशुद्धियोंको ठीक करके प्रक्षेप किया है । इट् ( ६ ) पृ. १८५ लेयात् - लायात् । यहाँ ' कित् ' होनेसे ' विभाषा म लीयतेः ' वाला आत्व नहीं हो सकता, वह एविषयमें होता है । एक पक्ष में किंतु होनेसे गुण भी नहीं हो सकता । ' लीयात् ' ही ल नहीं चाहिये । वादीने ' लीड ' से यह प्रयोग बनाये हैं, इतना भी उसे इसलि ज्ञान नहीं किंतु आत्मनेपदी होती है । CC - 0. Ankur Joshi ' स्तादित ' की प्रशुद्धि [ ५८१ ... ( १० ) ' ज्वरत्वर ' ( पृ. ११८ ) में किस्- ङित्की अनुवृत्ति नहीं ती पर स्वा. द. ने लिख दी है - यह शुद्ध है । पर दयानन्दी वादीने कहा है कि- ' काशिका ' में ' कूङिति ' की अनुवृत्ति मानी है । पर यदि वादी काशिकाको प्रमाण मानता है, तो उसे ' विदाङ्करोतु ' भी मानना चाहिये, पर श्राख्यातिक्रमें उसे नहीं माना । काशिकाका यहाँ दीक्षितने सोपपत्तिक खण्डन कर दिया है । इस अशुद्धिमें हम स्वामी की भी साक्षी देते हैं । ' उपादि-कोष ' ( ११६६ ) में उनने ' श्रोतुः ' सिद्ध किया है, और लिखा है-' अव् धातोर्व्वर - त्वरेति उपधावकारयोस् ' । अब वादी बनावे-यहाँ ' तुन ' कित्- ङित् कैसे है?! ( ख ) स्वामीने यङ्लुगन्तमें ' ज्वर - त्वर ' के उदाहरणमें जोजूर्ति भी लिखा है । वादी बतावे कि- तिपू कि - ङित् कैसे है । ति की अनुवृत्ति लिखना अशुद्ध है । . ( ११ ) ' स्त्रैणताद्धित ' ( पृ. २२ ) में स्वामीने ' ब्राह्मणी ' में ङीष् ( ४ | १ | ६३ ) किया है, जबकि जाति होनेपर भी शार्ङ्गरवादिपाठ-वश ङीन् ( ४ | १/७३ ) चाहिये । इसपर दयानन्दी वादी लिखता है कि- काशिका ( पृ. २६४ ) में भी देख लेना, वहाँ स्पष्ट ही ' ब्राह्मणी ' में जाति - लक्षण ङीष् किया है । ' पर इसपर वह याद रखे कि- काशिकाका इस विषयमें श्रीदीक्षितने यह कह कर खण्डन किया है- ' ब्राह्मणीत्यत्र तु शार्ङ्गरवादि - प्राठाद् ङीना ङीष बाध्यते ' । यदि वादी काशिकाको ही प्रमाण मानता है; Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 310

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) तो उससे प्रदर्शित ' बिदाकरोतु ' को भी माने, जिसे स्वा. द. जी नहीं मानते । वास्तवमें श्रीदीक्षितका ही मत ठीक है, क्योंकि-दोनों सूत्र जातिवाचकतामें प्रत्यय कहते हैं; तब पर - डीन् समान विषयमें पूर्व - डीको बाँध लेगा । अब ' ब्राह्मणी ' में नित होनेसे श्रादा होगा, अन्तोदात्त नहीं । इसलिए अथर्व. ५।१८ १२, १६।११ में ' ब्राह्मणी ' में ङीन् होनेसे नित्त्वप्रयुक्त प्रद्युदात्त दिया गया है । चारों वेदसंहिताओं में ' ब्राह्मणी ' ङीषन्त अन्तोदात्त नहीं दिखलाया गया । यदि कहीं ङीषन्त ब्राह्मणी आया भी होगा; तो वह ' पुंयोगादा ' - ( ४ | १ | ४८ ) से ' ब्राह्मणस्य स्त्री ' इस पुंयोग अथमें होगा, जाति- ङीष् नहीं; क्योंकि वह तो जाति-विषयक पर ङीनसे बाधित होता है । हाँ, पुंयोगलक्षण ङीष् भिन्न अर्थ होनेसे ङीन्से वाधित नहीं होगा । इसलिए काशिका-ने भी लिखा है - ' जातिलक्षणो ङीष् अनेन ( जातिलक्षण- डीना ) बाध्यते, न पुंयोगलक्षणः ' । स्वा. द. जीने भी स्त्रैण ( १३५ सूत्र ) में लिखा है - ‘ यहाँ जातिकी अनुवृत्ति आने से पुंयोगमें प्राप्त ङीष्का बाधक यह सूत्र नहीं होगा । ' सो ' पत्नी ' इस पुंयोग - अर्थ में ' ' योगा ' ङीष् होगा, ' जातेरस्त्री ' वाला ङीष् नहीं । 1 इसपर टं. प. के सम्पादकजीने जो लिखा है- ' ब्राह्मणी के दो अर्थ होते हैं, एक ब्राह्मणकी वाणी, दूसरा ब्राह्मणकी पत्नी । पहले अर्थ में ङीन होता है, दूसरे [ ब्राह्मणस्य पत्नी ] अर्थ ' जातरस्त्री ' से डीप ही होता है । जातिलक्षण डीषन्त अन्तोदात्त-: ब्राह्मणी के प्रयोग वैदिक साहित्यमें भरे पड़े हैं । ' ब्राह्मणी ' पर विचार यह दोनों बातें गलत हैं । ' ब्राहारणकी वाणी ' कोई नहीं; तब उसमें ङीन नहीं हो सकता; क्योंकि ङीनके ' जाति ' की अनुवृत्ति आती है । स्वा. द. ने भी उसमें सूत्रमेह अनुवृत्ति मानी है । दूसरा पक्ष भी उनका गलत है, क्यों जातियों हव ' ब्राह्मणस्य पत्नी ' यहाँ भी जाति- अर्थ नहीं पुंयोग , अर्थठी योग में पुंयोगादाख्यायाम् ' ( ४ | १ | ४८ ) प्रवृत्त होना है ' जातेरस्त्री ' यह जातिलक्षण ङीष् नहीं । पुंयोग और जाति भिन्न - भिन्न पदार्थ हैं । ' पुंयोग ' जात्यर्थक नहीं होता; तब कि उ का ‘ जातेरस्त्री ' ( ४ । १ । ६३ ) ङीष् भी प्रवृत्त नहीं होता । वैदिक साहित का में ' ब्राह्मणी ' में कहीं यदि ङीष् दिखलाई देता है, तो वह को मा बाला होगा; उसे हम भी पहले दिखला चुके हैं, जाविल्स ने ङीषू नहीं होगा । सम्पादकजीने ' ब्राह्मणस्य पत्नी ' इस पुंके अथेंमें ‘ जातेरस्त्री ' ङीष्की प्रवृत्तिकी प्रतिज्ञा की है; पुंयोग है प्रा जाति - यह भिन्न - भिन्न अर्थ है । तभी ' शूद्रा - चामहत्पूर्वा बाहि जातिमें ' टाप् ' शूद्रा, तथा पुंयोग अर्थ में ' शुद्री ' ङीष् माना है । श्रा अतः उनका पक्ष गलत: है । यदि उन्होंने अपना पक्ष बदला पर स्वयं ही उनकी पक्ष हानि होगी । अथवा कहीं वैदिक - साहित् व्या . ' ब्राह्मणी ' में जा तिलक्षण ङीष् भी हो; तो ' छन्दसि दृष्टानुविति पर इस सिद्धान्तवश कथञ्चित् मान भी लिया जावे; पर साहित्यमें वह अशुद्ध है; क्योंकि जातिलक्षण ङीप् ‘ ब्राह्मण’के शार्ङ्गरवादिगणके अन्तर्गत होनेसे जैन नह बाधित हो जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: An eGangotri Initiative