सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 331–340

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) | ६२३ ६२४ / हो जाता है; वैसे विद्युतूरूप परमात्मामें भी तार भी भेद समझना चाहिये । होता है । औपाधिक भगवान्‌के काले वालने देवकी के गर्भ में प्रविष्ट २५ प्रश्न -कृष्णावतारका रूप धारण किया ( विष्णु. ५।१ ) ( महा. 7 जीरो होकर में होता आदि. १६६ अ. ) कृष्णजी विष्णु वा नारायण ऋषि इन दोनों में किसकी खोपड़ी के काले बालका अवतार थे? बालके अवतार अघम वे ईश्वरावतार कैसे माने जा सकते हैं? । नालाग २५ उत्तर विष्णुपुराण में श्रीनारायणको बहुत गया है । ' एवं संस्तूयमानस्तु ' भगवान् परमेश्वरः धारण, ' केशं सित - कृष्णं महामुने ' ( ५१-११५ ) वसुदेवस्य एक ही भगवान् बताया । उज्जहारात्मनः या पत्नी देवकी अमित देवतोपमा । तत्रायमभवद् गर्भो मत्केशो भविता पुनः ' ( ५।१।६३ ) कहीं वह अङ्ग अङ्गीसे पृथक् नहीं माना जाता । क्या स्त्री - पुरुषके श्रङ्ग से है, कहीं उत्पन्न पुरुष उसी गुप्त अङ्गके अवतार माने जाते हैं, वा उसी रती है । स्त्री - पुरुषके? यह वादी अपने पर घटाकर समझ ले । इस पड़ता विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) में हम स्पष्टता कर चुके हैं ( पृ. ३०२-बभूव । ३०३ ) कठोपनि २६ प्रश्न – सारे अवतार उत्तर - प्रदेशमें ही क्यों हुए । भारत-के अन्य भागों वा देशोंमें क्यों नहीं हुए? पंखे २६ उत्तर-: - उत्तर - प्रदेश ब्रह्मावते माना जाता है; वह भारत-पुरुषक वर्षका केन्द्र तथा श्रेष्ठ माना गया है । अतः भगवान्ने भी = एक ही अपने अवतरणकेलिए उसीको प्रायः चुना? इसीलिए मनुस्मृति-मैं इस ब्रह्मावर्त को सब तरहके आचरणोंके सिखलाने का केन्द्र CC - 0. Ankur Joshi अवतार - सम्बन्धी शङ्काग्रोंका समाधान [ ६२५ माना जाता है । जैसेकि - ' एतद्देश- प्रसूतस्य स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन, पृथिव्यां सकाशादग्रजन्मनः । मनुजीका पद्म भारतवर्षके सर्वमानवाः ' ( २।२० ) यह अवतार ' ब्रह्मावर्त ' भागकेलिए कहा गया है । भी शिक्षार्थ प्राय: इसी ब्रह्मावर्त में हुआ करता है २७ प्रश्न - सारे अवतार क्षत्रिय वंश में क्यों । जातियों में क्यों नहीं जन्मे? केवल हुए? अन्य एक अवतार परशुरामजी ब्राह्मणों में पैदा हुए; तो उनको भी रामावतारने निस्तेज कर दिया | परास्त करके उत्तर २७ – अवतार विष्णुके ही होते हैं । वे शासक होनेसे पालक हैं । सो शासन प्रायः क्षत्रिय - वर्णमें ही होता है । परशुराम ब्राह्मण थे; तथापि उनमें भी क्षात्र अंश था, यह पौराणिक इतिहासमें स्पष्ट है । जब परशुरामका कार्यकाल समाप्त होनेको हुआ; तव श्रीराममें ही उनका तेज समा गया । अध्यात्म-रामायणमें ' मत्तेजः पुनरादास्ये त्वयि दत्तं मया पुरा ' ( १/७/२७ ) यह श्रीरामने परशुरामको कहा था । समयपर पिताका तेज पुत्रमें आ जाता है, पुत्र पिता का ही एक अंश होता है । इस 6 विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में पृ. १६६ -१७० में देखना चाहिये । २८ प्रश्न - वाराह अवतारके मन्दिरोंमें उसकी मूर्तिको उसका स्वाभाविक प्रियभोजन त्रिष्ठा क्यों नहीं भेंट की जाती है । उसको मीठा - पूड़ी आदि भेंट करके उसका अपमान क्यों किया जाता है? - वाराहकी पूजार्थ. मेहतरोंको पुजारी क्यों नहीं नियत किया जाता है? Collection Gujarat स ०. ध An ० eGangotri ४० Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( १ ) | ६२६ ] उत्तर २८ - यह वराह वनके सूकरका अवतार माना जाता है, फिर भी दिव्य है । वनका सूकर विष्ठा नहीं खाता; किन्तु सुअरकी आगेकी दाढ़ नहीं होती; जड़ें खाता है । भंगियोंवाले रखतां अवतारकी दाढ़ होती है, जिसपर वह पृथिवीको पर इस अज्ञानपूर्ण है । इस विषयमें विशेष है । अतः यह शङ्का वादीकी । इस निबन्धके ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३६३-३६६ में देखना चाहिये प्रश्न के उत्तर में भी हम इसपर प्रकाश डाल चुके हैं, आगे भी । क्ष्म वराह अवतारको मारकर उसका दाँत २६ प्रश्न - शिवजीने दिया; कूर्मकी खोपड़ी उखाड़ ली । ( शिवपु. शतरुद्र सं. तोड़ आ. ) - ऐसा को अवतार कैसे माना जा सकता है, जिनकी ११-१२ दुर्गति शिवने कर डाली? २६.उत्तर — यह वादीकी पुनरुक्ति है । वाराह कूर्म श्रादिके विषयमें इमा आलोक ' ' ( ७ ) में लिख चुके हैं; पाठकोंको: वह म पुष्प मँगा लेना चाहिये । -श्रीकृष्णजी गोलोक में शिवजी की गायें चरायां ३०. प्रश्न -१ करते हैं, ( शिवपुः रुद्र सं. २६. ); तब क्या कृष्णजी का गायें चराना पुश्तैनी पेशा है, इसके सिवाय उन्हें अन्य कोई धन्धों ही नहीं है? -३० उत्तर -- गोलोक में यदि शिवजीकी गौएँ चराना - श्रीकृष्ण-द्वारा लिखा है, उसका भाव यह है कि - ' तव ( पशुपतेर्महादेवस्य इमे पञ्चःपशको विभक्ता ग्राम:: अथर्व ( १२ ( ६ ) इस मन्त्रका देवता ' रुद्र पशुपति ' है । इसलिए शिवको ' पशुपति ' कहा जाता CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शङ्काओं का समाधान है शिव महान् देव हैं । ' गौ ' ( बैल ) उनका गौएँ उसी का अंश हैं । यदि श्रीकृष्णका गोचारण वाहन है । नहीं · इससे सूचित किया गया है कि - गायकी सेवा लिखा है । श्री कृष कव्य है । गायकी विशेषता होनेसे ही उसे करना स बादी कहा जाता है । इसी विशेषताको देखकर ' वेदमें ' अ ' गोकरुणानिधिः ' लिखनी पड़ी । सो शिवपुराणका वादीके श्राचार्य मक्क ' सेवा ' का वाद है 1 । गो - सेवासे सभी उक्त क्ष कर देवताओंकी हो जाती है । गो - सेवा करते - कराते हुए भगवान कई क कार्यों का भी निर्वाह किया करते हैं । इससे जनताको संसारी श्र जाती है कि गो - सेवा करनेसे तुम्हें सब ऐश्वयं मिलेंगे । शिक्षा तसे ८, ३१ प्रश्न — कृष्णका ससकी आड़ में परनारियोंके साथ सु कथन व्यभिचार - क्रमा चला करता था. ( ब्रह्मवे. कृष्णजन्म खं. श्र बादिय आनन्द रामाः राज्यकाण्ड ३।३०-३१, ४५-४७, ७७ ) क्या कृश्ते का ' निर्मलः चरित्रपर लान्छन लगानेवाले इन मन्थोंको शास्त्रमा कोई कृष्ण के प्रति सनातनधर्मकी शत्रुताकी भावना व्यक्त नहीं कर रहा! सब उ ० ३१ - रासक्रीडामें गोपियों के साथ श्रीकृष्णका व्यभि अपनी कुछ भी नहीं; किन्तु विशुद्ध प्रेम की बालीडर है । बादीने स उन्हें श्रीमद्भाग का श्लोक देखा ही हुआ है । वहाँ लिखा है - पा बेशित ऽक्रः ( स्वप्रतिबिम्ब - विभ्रमः ( १० | ३३ | १७ ) यहाँ अभक ( बात ) घाना की अपनी प्रतिबिम्ब से जैसे क्रीडा बताई गई है, इस अभेक ( बालक ): श्रीकृष्णकी भी अपने प्रतिविम्वस्वरूप नहीं सकता बालाओं से क्रीडा बताई गई है । अपने प्रतिबिम्बसे वंच Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) [ १८ ] होता; किन्तु क्रीडामात्र कर रहा होता है; तब न है ॥ नहीं कर रहा प्रतिबिम्बसे मैथुन कैसे हो सकता है? क्या लेखा है |? श्रीकृष्णका अपने मैथुन कभी कर सकेगा? नासा | वादी अपने प्रतिबिम्बसे श्रीकृष्णका शत्रु नहीं है । क्या कभी भगवानका सनातनधर्मसे शत्रुता कर सकता है? विरोधी तो शत्रुता आचार | मक भी भगवान् अपनाकर श्रीकृष्णको कर सकता है । वादी कई हथकण्डे उक्त कक्ष करना चाहते हैं I । वे उन्हें केवल मनुष्य बताते हैं । श्रकी ' ( फलङ्कित व्रजवालाओं को खरी - खासी युवतियाँ बना देते सारी धन | कई छोटी आयुकी हूँ और ७-८ वर्षके श्रीकृष्णको युवा बना देते हैं, यह श्रीमद्भाग-शिक्षा तसे विरुद्ध है । करो तुम आक्षेप भागवतपर; और भागवत के कयनको छिपाकर ८... उसमें अपनी कल्पना लादो; यह तो सांध वादियों का पुराणपर आक्षेपार्थ निष्कारण - द्वेष ही है । भगवान्-का अपनी सब. स्त्रियोंसे अब भी रमण हुआ करता है, यह = कृष् कोई बुरी बात भी नहीं है । आशा है - वादी अपने दिमागकी. स्त्र आद सब गन्दगी निकालकर जब विचार करेंगे; तब कोई भी उनकी कर रहा! अपनी लघु - शङ्का उन्हें बहा नहीं सकेगी, कोई भी: दीर्घशङ्का व्यभि उन्हें दवा नहीं सकेगीः । भगवान् तो यह कहते हैं- ' न मय्या दीने देशितधियां पुःसां कामः कामाय कल्पते । भर्जिता कथिताः घाना प्रायो बीजाय नेष्यते ' ( श्रीमद्भागवत १०।२२।२६ ) जो ( चालक ) मुझमें अपनी बुद्धि लगा दिया करते हैं; उनका ' काम ' कामे इस प्र नहीं रह जाता; वह जल जाता हैं, अंकुर उत्पन्न नहीं कर स्वरूप ब्रह सकता । धानको भूनकर फिर पृथिवीमें बोनेसे उससे कुछ ःभी-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. अवतार - सम्बन्धी शानोंका समाधान । ६२६ अंकुर नहीं निकलता । भगवान्‌के चरित्र बतानेवाला श्रीमद्भागवतपुराण कहता है-' गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम् । योन्तश्चरति सोध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक ' ( १०।३३।३६ ) ( जो गोपियों तथा उनके पतियोंके अन्दर भी विचर रहा है, और क्रीडा कर रहा है । ' तद्भषु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः । श्रात्मस्वरूपरूपोसौ व्यापी वायुरिव स्थितः ' ( विष्णुपु. ५।१३।६१ ) तथा समस्तभूतेषु नभोग्निः पृथिवी जलम् | वायुश्चासौ तथैवासौ व्याप्य सर्वमवस्थितः ( ६१ ) यथावद् वीर्यमालोक्य न त्वां मन्यामहे नरम् । ( ५१३५ ) ' बाल-त्वं चातिवीर्यत्वम् ' ( ७ ) इस विष्णुपुराणके वचनमें श्रीकृष्णको भी परमात्मा तथा अमनुष्य बताया गया है । ' तस्येच्छयात्त-वपुषः कुत एव बन्ध: ' ( भा. १० | ३३ | ३५ ) ( जब योगी भी बन्धनमें नहीं आते हैं; तब अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाला भगवान् भला बन्धनमें कैसे आ सकता है? ' अस्यापि देव! वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य, न तु भूतमयस्य कोपि ' ( श्रीमद्भा. १ | १४ | २ ) भगवान्‌का शरीर भौतिक नहीं होता, किन्तु दिव्य होता है । तब भगवान् वादीके दुरभिप्रायके विषय नहीं हो सकते । जिस पुस्तकमें जैसी बात लिखी हो; उससे विरुद्ध दुरभिप्राय निकालना यह वादीकी धींगाधींगी है । आशा है - जब वादी इस बात पर विचार करेगा; तब उसे इन क्षुद्र - पुस्तिकाओं को छपवाकर हिन्दुजातिके दिल दुखाने की आवश्यकता नहीं रह जायगी । ' वादीको चाहिये कि - दोषदर्शी वा ' छिद्रकी उपासना करनेवाला न बनकर हंस बने । तब उसका शुभ होगा । आनन्दरा में रामोपासकका कृष्णोपासककी ईर्ष्यासे कहा हुआ गलत दोषारोप है; आगे रामोपासकने यह स्वयं स्पष्ट कर दिया है, वादीने उसे छिपा दिया है । इस विषयमें अगले निबन्ध ( सं. ५६ ) में देखो । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 334

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पुराण १८ या २६? कण्टकशोधनमें पुराणेतिहास - चर्चा ( १३ ) यह पुराणोंपर आक्रमणोंके व्यसनी । दयानन्दियोंका काम ही यह रहता है कि वे वैदिक-कई प्रकाशनके नामसे वेदका कुछ भी न बताकर पुराणों पर कीचड़ उछाला करें । वे पुराणोंके पारायण केवल दोषदृष्टिसे किया करते हैं । जोंक स्तनसे भी दूध न लेकर बलात् गन्दा लोहू ही निकालकर पीया करती है । इससे उसकी वृत्ति भी बन जाया करती है । अस्तु, अब इस ' कण्टकशोधन ' में हम उन पुराण-इतिहासपर किये जाते हुए आक्षेपोंके बलाबलपर कुछ विचार करते हैं । ' आलोक ' - पाठक इधर ध्यान देंगे । हम स्वयम् आक्रामक नहीं हैं, पर आत्मरक्षा में हमें अपने पर किये हुए उन आक्रमणोंका प्रत्युत्तर देना ही पड़ता है । यदि इन लोगोंने अपना यह ढंग न छोड़ा; तो हमें भी सीमा पार करके इनके घरपर भी पहुँचकर इनपर आक्रमण करना पड़ेगा । तब इनकी तोपों के मुँह स्वयं बन्द होंगे, क्योंकि इनकी नीति ही ऐसी है-खामखाह दूसरोंको छेड़ते रहना । श्रीपं ० माधवाचार्यजी कहा करते हैं; यह लोग ' शान्तिः शान्तिः की भाषाको नहीं समझते; प्रत्याक्रमणकी भाषाको ही समझते हैं । हमारे सामने पौराणिक - गप्पदर्पण, पुराण किसने बनाये, श्रीमद्भागवतसमीक्षा, गीताविवेचन, अवतार -रहस्य, शिवलिङ्ग-पूजा क्यों, गीताविमर्श, गीताका सच्चा स्वरूप, मूर्तिपूजा - रहस्य, आदि कई पुस्तकें पड़ी हैं । इनमें बहुतसे प्रमाणोंका उत्तर CC - 0. Ankur Joshi Collection आलोक ' ' ( ६-७-८ ) में दिया जा चुका है, बचे - खुचे प्रत्युत्तर इस सुमन में वादियोंके आमसे दिया आक्रम इनमें कई आपका तो हम पृथक् निर्देश करेंगे जा रहा है । होता अधिक स्थान न होनेसे हम केवल उत्तर ही देते चलेंगे;, पर पान श्रमं होता उसमें स्वयं आक्षेपोंका अनुमान कर लेंगे । अब घटती ' पेटन टैंक ' तोड़ना शुरू करते हैं । जनता देखे ।— हम वादियो ( १ ) प्राक्षेप - - ' षडूविंशतिपुराणानां मध्येऽप्येकं पठेद् वा भक्तियुक्तस्तु स मुक्तो नात्र संशयः शृणोति यः । है ' प ' ( शिवपु. उमर का क १४१ ) इससे स्पष्ट है कि- शिवपुराण बननेके समय २६ थे वादको १८ संख्या निश्चित कर दी गई । पुरान पुराण परिहार— ( क ) शिवपुराण स्वयं पुराणोंका १८ होना बता लब्धव प्रणिन है । देखिये - ‘ व्यस्तेऽटादशघा चैव पुराणे द्वापरादिषु । चतुर्तकेश १२०-संक्षिप्ते कृते द्व ैपायनादिभिः ’ ' ( विद्येश्वरसं. २५८ ) प्रोक्तं शिवपुर निर्वाच हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ' ( ५६ ) । जब ऐसा है; तब शिवपुराण ' शिव पुराणोंको २६ कैसे कह सकता है? गये, य ( ख ) व्यासजीका पुराणोंसे सम्बन्ध वादी भी मानता है । अन्य यह वह याद रखे कि - श्रीव्यासजीका १८ संख्यासे विशेष शेष था । तभी तो पुराण भी १८, उपपुराण भी १८, और औपपुराण ' वि भी १८ उन्होंने रखे । ' गीता ' के अध्याय भी श्रीव्यासजीरे विशेष १८ रखे, महाभारतके पर्व भी १८ । महाभारतकी सेना त्र १८ अक्षौहिणी । महाभारत - युद्ध भी १८ दिन हुआ । श्रीमद्भकः वहां के श्लोक भी १८ सहस्र | अतः पुराणोंकी संख्या भी १८ ही बीस लोग Gurat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 335

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) RR ] भी तुक नहीं । १८ के दो अङ्कांके मिलानेसे ११२ की कुछ प्रतीक है । २६ के अङ्कोंको जोडनेसे ८ अङ्क होता है, यह ब्रह्मका प्रतीक है, जो ( माया ) आठ के पहाड़ेकी तरह पर श्री होता है, जो मायाका गे, पार बढ़ती रहती है; पर नौ के पहाड़ेके अङ्कोंकी भांति ब्रह्म भी वादियो । घटती - है तब ब्रह्मके बोधक पुराण भी १८ ठीक हैं । पूर्ण रहता शिव, उमासं. ( १ | ४१ ) का पद्य तो ' संमुखे शंकरं दृष्ट्रा ' ( ग ). पोति ष: है ' घडूविंशतिपुराणानां नहीं । इस अध्याय में पुराणोंकी संख्या-पु. उमाएं का, कोई प्रकरण ही नहीं है । उमासं. के ४४ वें अध्यायमें १८ २६ पुराम पराणोंका ही श्रीव्यासद्वारा प्रकाशन आया है । जैसे कि- ' एवं वव्यवरो व्यासो महेशान्मध्यमेश्वरात् । श्रष्टादश पुराणानि नाचत प्रणिनाय स्वलीललया ' ( ११६ ) । फिर उन १८ पुराणोंके नाम - चतुर्बको १२०-१२२ पद्योंमें आये हैं । उन १८ पुराणोंका परिचय तथा शिवपुराणं निवेचन ४४/१२५ से १३५ पद्य तक उमास में आया है । तब शिवपुराण शिवपुराण के समय २६ पुराण थे, ( पीछे १८ निश्चित कर दिये गये, यह बात वादीकी ठीक सिद्ध न हुई, क्योंकि इसमें कोई नानता है । अन्य साक्षी नहीं । विशेष ( घ ) हां, उमासं. ( ११६५ ) में यह पद्य अवश्य मिलता है-पपुरा ' षडविंशकमिति ख्यातं ' सो यह पद ' षडविंशकम् ' शिवका व्यासजी विशेषण हैं । सांख्य में २५ तत्त्व 6. माने गये हैं । उनमें २५ वीं सेना तत्त्व ' पुरुष ' है- ' न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ' ( सांख्यकारिका -३ ) मान बहां पुरुषसे आत्मा विवक्षित है, परमात्मा नहीं । अतः कई ही लोग सांख्यको ' निरीश्वरवादी मानते हैं, और उसे तामस -CC - 0. Ankur पुराण १८ या २६? [ ६३३ . दर्शन भी कहते हैं । जैसे कि पद्मपुराण ( उत्तर. २३६/१२ ) में स्पष्ट है; पर यहां शिवपुराण में आस्तिकता इष्ट होनेसे शिवको २६ वां तव ( परमेश्वर ) बताया है । ( ङ ) अथवा यह पुराणोंमें प्रसिद्ध है कि प्रत्येक कल्पके प्रत्येक द्वापरमें विभिन्न व्यास पुराणोंका संस्करण किया करते हैं । इस श्वेतवाराह - कल्पमें २८ द्वापर बीत चुके, सो पुराणों के संस्करण भी २८ हो चुके; पर यह शिवपुराणका वचन २६ वें द्वापरका हो; तो उन पुराणोंके एक - एकका २६ वार संस्करण हो चुकनेसे शिवपुराण भी एक प्रकारसे २६ हो चुके हों, उनमें एकके भी भक्तिपूर्वक पढ़नेसे मुक्ति होती है - यह पुराणके उक्त वचनका अभिप्राय हो - यह भी सम्भव हो सकता है । मुसलमानी क्रूर आक्रमणसे हमारे साहित्यका पर्याप्त विनाश हो चुका । उसमेंसे बचे - खुचे पुराणोंके संस्करण - किसी पुराणका कोई सा संस्करण, क्रिसीका दूसरा संस्करण हमें मिल रहा हो, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं; इसी कारण पुराण में स्वयं कल्पभेद कई बार दोहराया जाता है । अत: इस दूरके दृष्टिकोणको अपनाने से भी हमें संगतिकाः प्रकाश - किरण मिल सकता है । केवल खण्डनात्मक दृष्टि वा अश्रद्धा रखने से पतंदादिक रहस्ये नहीं खुल सकते । श्रद्धासे ही सत्यकी प्राप्ति होती है - ' श्रद्धया सत्य साइयतेः ( यजुः माध्यं. १६३० ) ( च ) वस्तुतः वादीका आक्षिप्त पद्य उमा सं. ११४१ में न होकर १३ ४१ में है; पर वहाँ पूर्वापर-प्रकरण में कहीं जिम २६ पुराणोंको नाम नहीं दिये गये अतः Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 336

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६३४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) यह वहां लिपिकरका लेख माद ही प्रतीत होता है । जबकि वेदको आठ विकृतियों ( जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ, घनपाठों ) से पयांप्त रक्षा करनेपर भी अब भी उसमें कई पाठभेद मिलते हैं; तब असुरक्षित पुराणोंमें लिपिकरोंके प्रमाद-से कहीं - कहीं पाठभेद रह गया हो; तो इसमें क्या असम्भव है? यदि शिवपुराणके समय २६ पुसरण होते; तो उसमें यत्र भी कहीं इस कथनकी अ'वृत्ति प्राती; क्योंकि तात्पर्यनिर्णायक छः लिङ्गों में अभ्यास ( आवृत्ति ) भी एक लिङ्ग होता है । ग्रन्थकार अपने सिद्धान्तको कई बार आत्त करता है - यह स्वाभाविक है । पर पुराणोंकी संख्या २६ है - इस विषय में अन्य कहीं प्रवृत्ति नहीं आई । जब तक वादी कमसे कम अन्य तीन - चार स्थलोंमें पुराणोंकी २६ संख्याका निर्देश न दिखलावे; तब तक उसका पक्ष सिद्ध ही रहेगा । वहाँपर अष्टादशपुराणानां मध्ये ऽप्येकं शृणोति यः 3 यह माटो, इसमें तो कोई छन्दोभन है और न ही कोई अन्य पूर्वापर की असङ्गति दीखती है । अतः षड्विंशतिपुराणानां ' में लिंपिकरका प्रमाद स्पष्ट है । ' पहले पुराण रक्षाये फिर १६ कर दिये गये ' इससे न तो कोई हमारी पक्ष हानि है; और न ही वादीकी कुछ इससे इष्ट सिद्धि है । पुराणोंका जन्म - सिद्ध विरोधी चादी जो १८ पुराणोंसे भी सन्तुष्ट नहीं; क्या वह २६ पुराणोंसे सन्तुष्ट होता ( छ ) अथवा सम्भव है कि- शिव - सम्बन्धी पुरातन वृत्तको CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंपर प्रक्षेपका उत्तर ६३५ बताने वाले कई २६ ग्रन्थ रहे हों. वे ही वहां विवक्षिन अथवा ' षट्त्रिंशति - पुराणानां ' पाठ हो वहाँ १८ पुराण रहे, हों १८ । ऋ उपपुराण मिलाकर ३६ संख्या कही गई हो । फलतः प्रतिपक्षी जबतक भिन्न - भिन्नः पुराणोंमें, अथवा उसी शिव पुराणमें जर तब त्तक ‘ षड्विंशति - पुराणानां ’ जैसा पद्य कमसे कम ३-४ स्थलोंचे एक न दिखलावेगा; तब तक उसका पक्ष असिद्ध ही रहेगा । ( २ ) पूर्वपक्ष - भागवत ( १२/८ ), देवीभागवत ( १३ ) ( उत्तर: २३६ ), ब्रह्मवैवर्त ( कृष्ण खं. १३१ ), मत्स्य ( अ,. ५३ पद्म ), भविष्य ( प्रतिसर्गे, ३ | २८ ) आदि पुराणोंमें + १८ पुराणोंके नाम भिन्न - भिन्न हैं । कहीं शिवपु के स्थान वायुपु.; कहीं नारद है स्थानः नृसिंह, आया है । लोक तथा अध्याय -संख्या: भी १६३ गड़बड़ीफ़ है ।: ( ख ) भागवत के. १८ सहस्र ( १२ । ३३ । ६७ ) लोकोप पूजा , १४१८० पद्य मिले हैं, ३८२ कप निकाल डाले गये हैं । ( ग ) और इसके कर्ता भी वोपदेव हैं ( स.प्र. ११ पृ. २१४ ) ' स.ध. के विद्वान् कुछ स्वर्गीय पं. अखिलानन्दजी ने भी S ( दया. दि. १०/८७ में ) यही नाम माना है । ( मागसम्मी पू. २५-२६ ) । पुराणोंके आधारपर यह जाए नामभेदका कारण क्या कोई पौराणिक विद्वान बिता सकता है! लिया उत्तर पक्ष- ( क.अ. ) यह तो वादीने बच्चों की सी लघुश की है । वेदकी रक्षा आठ विकृतियों ( पद, जटा पाठादि ) द्वारा । मिल की गई है । तथापि उनमें भी कहीं पाठभेद, तथा मन्त्रसंख्याभेद क छार्च भी मिलता है कहीं मंण्डल है, कहीं अष्टक में यदि उसे एक पूरा सूक्त है; तो अथर्व में उसी के दो सूक्त ' बने हुए है । गया Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 337

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६३६ ] रहे हो । किसी में ' बालखिल्य सूक्त हैं, किसीमें नहीं । साम में भी मैं भेद हैं । अथवे में कहीं सूक्त - संख्या के पर्यायों में भेद है; प्रतिपक्षी , कई ऐसे पुराणों में भला ऐसा असम्भव कैसे हो? किसी तब अरक्षित में जब एक पुरा।एका पाठ अन्य पुराणमें चला गया हो, यह भी सम्भव स्थलों में है; यही पद्योंकी न्यूनाधिकताका कारण हुआ करता है । ( आ ) आक्षेप्ताको ज्ञान रखना चाहिये कि एक ही पुस्तकके , पदा भिन्न - भिन्न संस्करण भी हो जाते हैं । वहाँ कहीं नामभेद, तथा ५३ ), पृष्ठसंख्याभेद, पाठक्रमभेद एवं ग्रन्थवृद्धि हो जानेसे प्रन्थपरिमाण-नाम भेद भी हो जाया करता है । इसमें अनुपपत्ति वा भिन्नकर्तृ कता रद के नहीं हो जाती । इसी आक्षेप्ताका ' शिवलिङ्गपूजारहस्य ' मार्च श्री १६५६ में निकला था; फिर उसीका द्वितीय- संस्करण ' शिवलिङ्ग-लोको पूजा क्यों? इस नाम से १६६० में निकला । पहलेका मू ० ॥ = ) = ( स ) और दूसरेका १८ ) है । वस्तु वहीकी वही, कुछ पाठ आगे, विद्वान् कुछ पीछे कर दिया, कुछ वृद्धि कर दी, कुछ घटा दिया; केवल यही नामका भेद है । तब क्या इन संस्करणोंके कर्ता भिन्न - भिन्न हो रं यह जाएँगे? श्रथवा उसमें अन्य द्वारा प्रक्षेप वा परिवर्तनं मान ना है! लिया जायगा? | ( इ ) श्रीकालिदासके अभिज्ञानशाकुन्तल के दो संस्करण + द्वारा मिलते हैं; एक छोटा, दूसरा मोटा । ऐसे परिवर्तनों से भिन्न-याद कर कता नहीं हो जाती । इससे स्पष्ट है कि पहले कालिदासने यदि उसे छोटा बनाया; फिर उसे दूसरी बार लिखा; तो वह बढ़ हुए गया । इसने ' श्री सनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ संस्कृतमें १० हज़ार CC - 0. Ankur Joshi पुराणोंमें भेदका कारण [ ६३७ पृष्ठोंमें संस्कृतमें लिखा हुआ है । पहले इसका नाम ' वेदपुराणयो-रेकवाक्यता ' था, जिसका अंश ' सूर्योदय ' काशी में निकला । यह २५० पृष्ठोंका था । फिर ५०० पृष्ठोंका बना । फिर १००० पृष्ठोंका हुआ; और वर्तमान नाम होगया, और फिर उसके १०,००० पृष्ठ होगये । अब उसीकी ग्रन्थमाला हिन्दीमें निकल रही है, जिसके प्रायः ६ सहस्र पृष्ठ निकल चुके हैं । सारा छप जाय, तो इसकी कमसे कम २० सहस्र पृष्ठ संख्या होगी । अव वादी समझे कि इसके भिन्न - भिन्न संस्करण सभी छपे हुए मिलें; सबमें परिवर्तन एवं परिवर्धन स्वाभाविक है । इसी ग्रन्थमालाके १-२ पुष्पोंकी पृष्ठसं. २० थी; अव ( द्वि.सं. में ) साढ़े तीन सौके लगभग है । इसका ३ य पुष्प समाप्त हो चुका है, जब इसका द्वितीयसं होगा; अबसे प्रायः दुगना होगा | -- किसी एकके पास एक संस्करण हो, दूसरेके पास दूसरों; और मिन्न-भिन्न संस्करणोंमें प्रकाशकं भिन्न - भिन्न हो जावें । कोई तीसरा श्रोता - जैसा दीघबुद्धि दोनों संस्करणोंको देखें, और कहे किं-इन भिन्न - संस्करणोंका ' कर्ता भिन्न - भिन्न है, दूसरे संस्करणमें किसीने प्रक्षेप कर दिये हैं; ऐसे सममदार ( १ ) की बुद्धिका जो मूल्य है, वहीं व्याप्ताको बुद्धिका भी है । ( ई ) यह तो हुआ लौकिक दृष्टिकोरण; परन्तु पुराणोंमें तो ' कल्पभेद ' बहुत प्रसिद्धा ' है । और वर्णित भी है- ' कल्पभेदकथा चैव श्रुता ' ( शिव कोटिरुद्रः १३४ ) । एक कल्पमें कितने द्वापर ' होंगे यह वादी स्वयं गिनते । प्रत्येक द्वापर में श्रीव्यास पुराणों-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६४० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ( ५ ) चित्सुखाचार्य ( नवमशताब्दी ) में श्रीमद्भा की टीका लिखी थी, ऐसा श्रीधरस्वामीने ' विष्णुपुराण ' की टीका में लिखा है, और श्रीमध्वाचार्य तथा विजयध्वजतीर्थने भी ऐसा ही लिखा है । इससे स्वा. द. जी तथा दयानन्दियोंका अनुसन्धान गलत सिद्ध हुआ । .. ( आ ) वस्तुतः श्रीवोपदेवने भागवतकी विषय - सूची तैयार की थी; और भागवतकी ' परमहंसप्रिया ' टीका भी लिखी थी । उसी विषयमें ' मुक्ताफल ' और ' हरिलीलामृत ' ( भागवता सारांश ) भी लिखे । स्वयं हेमाद्रिने सी वोपदेवके ' साहित्ये त्रय एव भागवततत्त्वोक्तौ त्रयस्तस्याच ' के तीन ग्रन्थ उसकी ' मुक्ता फल ' टीकामें सूचित किये थे । सो ' श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं च मयेरितम् । विदुषा वोपदेवेन श्रीकृष्णस्य यशोन्वितम् ' यह जो स.प्र. ( ११ पृ. २१४ ) में स्वादः जीते अपना निजका बनाया श्लोक लिख दिया है; वह गलत है । यदि ठीक हो भी तो उसमें ' ईरितम् ' का अर्थ ' निर्मित ' नहीं है, ' कथित ' वा ' प्रोक्त ' है । ( इ ) सध के मान्य विद्वान् पं ० अखिलानन्दजी की - साक्षी देवा वादीका स्फ़ेद झूठ है । सनातनधर्मी अखिलानन्दजीने दयानन्द-दिग्विजय ' ग्रन्थ कोई नहीं बनाया । उसे तो दयानन्दी- अखिलानन्दने बनाया था । उसी दयानन्दीका उद्धरण सनातनधर्मीके नामसे देना वांदी की कितनी प्रवंचना है । इन असत्य प्रेमियोंको क्या परलोक का अय भी नहीं! जब अखिलानन्दजी उस अज्ञानको छोड़कर सनातनधर्मी बन गये, उस समय उन्होंने ' सनातनधर्म-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों की अनादिता [ ६४५ विजय ' महाकाव्य बनाया, उस ( ११/३४ ) में उनने ६४ व्यास - प्रोक्त बताया है । अन्यत्र भी उन्हीं अखिलानन्दजीने पुराणोंको लिखा है- ' सर्वा अपि [ पौराणिक्यः ] । कथाः सत्याः । मूलकाः । वेदव्यासः पुनस्तासां प्रवक्ता नात्र संशयः पुनस्ता वेद-१०४ ) इसमें श्री अखिलानन्दजीने अन्य भी स्पष्टता । ( १५१०३ | अब मैं वादीको कहूँ कि अपने दयानन्दी- अखिलानन्दजी कर दी है । की सि इस उक्तिको मानकर वह पौराणिक कथाष्योंको व्यासप्रोक्त श्रीर सत्य माने; तब क्या यह मानकर वह अपने पक्षको की सत्यता-की घोषणा करने को तैयार है? । उस ( ३ ) पू ० - कहीं विष्णुपुराणको पाराशर ऋषिका, सन्दको सा शिवजीका, पद्मको ब्रह्माका, भागवत्तको शुक्रका, ब्रह्मको ब्रह्लादा. एव बनाया बताया जाता है । भविष्य. ( प्रति. ३ २८८-१५ ) के फ अनुसार पुराण ब्रह्माजीमे चनाये | ' लब्धविद्येन विधिना प्र सृष्टिं वितन्वता । प्रथमं सर्वेशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । स अनन्तरं तु वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः 4 । प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां तन्मुखादभवत् तत: ' ( शिव वायुसं. ११३१-३२ ) पुराण पाराशा- ' ई जीने बनाये ( चिष्णु. २/१/२६, ३० ) | हर द्वापर में पुराण बन हैं - एवं ' व्यस्ताश्च वेदाश्च द्वापरे - द्वापरे द्विजाः 1 । निर्मितानि पुरा दि खानि अन्यानि च ततः परम् ( शिव, वायुसं. २१/३५ ) इस प्रकार वन पुराण सृष्टिके आदि के तथा व्यासकृत सिद्ध नहीं होते ' । वां उ ० – इससे तो पुराणों की अनादिता सिद्ध होती है । व्यासी अत्तादि पुराणोंके प्रणेता नहीं, किन्तु प्रवक्ता वा सम्पादक है स ० ध ० ४ ९ Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ ६४ I श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) 1 I ( नवमशताब्दी ) में श्रीमद्भा, की टीका लिखी नन्दबीने I • ( ५ ) चित्सुखाचार्य ' विष्णुपुराण ' की टीका में लिखा है, वेद. थी, ऐसा श्रीधरस्वामीने तथा विजयध्वजतीर्थने भी ऐसा ही लिखा २०१०३ और इससे श्रीमध्वाचार्य स्वा.द.जी तथा दयानन्दियोंका अनुसन्धान गलत दी है । है । न्दजी की सिद्ध हुआ श्रा ) वस्तुतः श्रीवोपदेवने भागवतकी विषय - सूची तैयार क्त श्रीर की थी; और भागवतकी ' परमहंसप्रिया ' टीका भी लिखी थी । सत्यता- उसी विषय में ' मुक्ताफल ' ' और ' हरिलीलामृत ' ( भागवतका सारांश ) भी लिखे । स्वयं हेमाद्रिने भी वोपदेव के ' साहित्ये त्रय स्कन्दको एव भागवततत्त्वोक्तौ त्रयस्तस्याच ' के तीन ग्रन्थ उसकी ' मुक्तान ब्रह्मास फल ' टीकामें सूचित किये थे । सो ' श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं -- १५ ) छ मयैरितम् । विदुषा वोपदेवेन श्रीकृष्णस्य यशोन्वितम् ' यह जो अजा- स.प्र. ( ११ पृ. २१४ ) में स्वा. द. जीने अपना निजका बनाया श्लोक स्मृतम् । लिख दिया है; वह गलत है । यदि ठीक हो भी तो उसमें ' ईरितम् ' का अर्थ ' निर्मित ' नहीं है; ' कथित ' वा ' प्रोक्त ' है । नाराशर ( इ ) सध के मान्य विद्वान् पं ० अखिलानन्दजी की साक्षी देना चादीका स्फ़ेद झूठ है । सनातनधर्मी अखिलानन्दजीने दयानन्द-पुरा • दिग्विजय ' ग्रन्थ कोई नहीं बनाया । उसे तो दयानन्दी - अखिलानन्दने न प्रकार बनाया था । उसी दयानन्दीका उद्धरण सनातनधर्मी के नामसे देना बांदीकी कितनी प्रवंचना है । इन असत्य - प्रेमियोंको क्या परलोक यस का अयं भी नहीं? जब अखिलानन्दजी उस अज्ञानको छोड़कर सनातनधर्मी बन गये, उस समय उन्होंने सनातनधर्म-CC - 0. Ankur Joshi पुराणों की अनादिता [ ६४१ विजय ' महाकाव्य बनाया, उस ( ११ ३४ ) में उनने पुराणोंको व्यास - प्रोक्त बताया है । अन्यत्र भी उन्हीं अखिलानन्दजी लिखा है - ' सर्वा अपि [ पौराणिक्यः ] कथाः सत्याः ने पुनस्ता वेद-मूलकाः । वेदव्यासः पुनस्तासां प्रवक्ता नात्र संशयः । ( १५५१०३-१०४ ) इसमें श्री अखिलानन्दजीने अन्य भी स्पष्टता कर दी है । अब मैं वादीको कहूँ कि अपने दयानन्दी- अखिलानन्दजीकी इस उक्तिको मानकर बह पौराणिक कथाओंको व्यासमोर सत्य माने; तब क्या यह मानकर वह अपने पक्षकी असत्यता-की घोषणा करने को तैयार है? ( ३ ) पू ० - कहीं विष्णुपुराणको पाराशरऋऋषिका, स्कन्दको शिवजीका, पद्मको ब्रह्माका, भागवतको शुक्रका, ब्रह्मको ब्रह्माका बनाया बताया जाता है । भविष्य. ( प्रति. ३२८८-१५ ) के अनुसार पुराण ब्रह्माजीने चनाये । ' लब्धविद्येन विधिना प्रजा-सृष्टिं वितन्वता । प्रथमं सर्वेशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं तु वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः । प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां तन्मुखादभवत् व्रत: ' ( शिव वायुसं. ११३१-३२ ) पुराण पाराशर-जीने बनाये ( चिष्णु. ११११२६, ३० ) । हर द्वापरमें पुराण बनते हैं - ' एवं व्यस्ताश्च वेदाश्च द्वापरे - द्वापरे द्विजाः । निर्मितानि पुरा-खानि अन्यानि च ततः परम् ( शिव, वायुसं. ११३५ ) इस प्रकार पुराण सृष्टिके आदि के तथा व्यासकृत सिद्ध नहीं होते ' । उ०- इससे तो पुराणोंकी अनादिता सिद्ध होती है । व्यासजी अनादि पुराणों के प्रणेता नहीं, किन्तु प्रवक्ता वा सम्पादक हैं, स ० ध ० ४१ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 340

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६४२ } श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) जैसे वे वेदके हैं, क्योंकि वेदोंका व्यास भी व्यासजी द्वारा ही गया है । पर इससे वे वेदोंके कर्ता नहीं मान लिये जाते । कहा भी कर्ता नहीं, संयोजक हैं । ' कर्ता ' इसी प्रकार वे पुराणोंके तो वे पुराणोंके ऐसे कहे जाते हैं, जैसे श्री भट्टोजिदीक्षितको वैया, सिद्धान्तकौमुदीका ' कर्ता ' कहा जाता है । पर श्रीदीक्षितने उसका क्या बनाया? सूत्र श्रीपाणिनिके, वार्तिक श्रीकात्यायन-के, अर्थ और उदाहरण और फक्किका भाष्य- काशिका श्रादिके । ' कृ ' धातु अनेकार्थेक होनेसे ( देखो ' आलोक ' ( ६ पृ. ८१-८५ ) ' कर्ता ' का अर्थ प्रवक्ता भी होता है । सो सब द्वापरोंमें श्रीव्यास-द्वारा पूर्वपरम्परासे आये हुए अनादि - पुराणका नूतन संस्करण होनेसे. पुराणोंके वे उद्धारक हुए । इसलिए पुराण सृष्टिकी आदिके सिद्ध हुए; क्योंकि पुराणमें ही ' पुराण ' का विग्रह यही आया है — ' पुरा परम्परां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम् ' ( पद्म. १।२।५४ ) । वेदोंके पूरक होनेसे भी पुराण हैं, पूरणात् पुराणम् । ( आ ) ' पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् ' इस वादीसे दिये हुए पुराण-वचनमें भी ब्रह्माजीद्वारा भी पुराणोंका बनाया जाना नहीं कहा, किन्तु ‘ स्मृतम् ' स्मरण करना कहा है । सो स्मरण करना पूर्व -स्थित वस्तुका ही होता है । इससे पुराणोंकी अनादिता स्पष्ट है; बल्कि श्रीमद्भा. पुराणमें तो पुराणोंका भी ब्रह्माके सभी मुखोंसे प्रकट होना लिखा है- ' इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ' ( ३।१२।३६ ) तभी तो वेद ( अथर्व. १ ९ | ४ | २४ इत्यादि बहुत स्थलों ) में ' पुराण ' का नाम भी पुराणों की श्रनादिता [ ६४ ] आता है । यदि उस वेदस्थित ' पुराण ' शब्दका अर्थ सम्बन्धी मन्त्र ' यह अर्थ दयानन्दी - वादी करेगा ' सृष्टिविद्या. ; तो मामू स्वा.द.जी के कथनानुसार वे मन्त्र पुराणेतिहाससंज्ञक । वेद भी नहीं रहेंगे - यह वह याद रखे; नहीं तो फिर ' होलान स्वामी द्वारा ब्राह्मणभागके वेदत्वका किया इस युतिये । गलत सिद्ध हो जावेगा । कौन नहीं जानता कि- हुआ खण्डन भी श्रव सृष्टि एवं प्रलव का प्रतिपादन ' सर्गश्च प्रतिसर्गश्च ' यह पुराणका. सिद्ध चेदका नहीं । मुख्य विषय है, मिन्न ( इ ) वस्तुतः वादीको याद रख लेना चाहिये कि - श्रीवेदव्यास परमात्माके अवतार थे । उन्होंने जहां वेदका प्राकट्य किंवा वह है पराशइ पुराणेतिहासका भी । अथर्ववेदसं. में पुराण - इतिहासका नर बादी आया ही है । उपनिषदात्मक - वेदमें भी ' इतिहासपुराणं पच परार वेदानां वेदम् ' ( छा. ७ । १ । २, ४ ) पुराणको पञ्चम वेद माना है । पुराण ‘ यो ब्रह्माणं चिदधाति पूर्वं यो वै वेदाश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( रखेल, उत्तर ६/१८ ) यहाँ वेदोंको ब्रह्माको देना कहा है । सो वेद में पञ्चम - नेर । व्यास पुराण - इतिहास भी स्मृत होनेसे ब्रह्माजीको वेदोंके साथ पुराए ' चाल भी दे दिये गये । फिर ' प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मण उद्घ स्मृतम् ' यह बात ठीक ही सिद्ध होगई । इसी कारण यह वल पुरा भी बहुत पुराणों में आया है । परमात्मा भविष्यका वृत्त जानका अथव उसे पुराणेतिहासरूपमें निबद्ध भी कर सकता ही है । परमात्मा - छपवा के लिए स्वा. द. जीने स. प्र. ९ ३ वें समु. ( पृ. ३०३ ( १२ ) में लितं श्रथव है कि- ' वह ईश्वर ही नहीं, जो सर्वज्ञ न हो, न भविष्यत्‌को अद CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujrat. An eGangotri Initiative