सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 321–330
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) for / ६०३ अपने बहनोई अर्जुनकी मदद करनामात्र था । उनका उद्देश्य कवि लोक - कल्याण और गीताकी बताई कसौटीको पूरा करना यताम् । भी नहीं था । अपने परिवारका कल्याणमात्र था । नुसार २३०५ - यह वादीका आक्षेप कितना हास्यास्पद है, जबकि रास्ते भगवान् स्वयं ' यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति, अभ्युत्थानम-क्या धर्मस्य, विनाशाय च दुष्कृताम् ' ( ४।७-८में ) अपने अवतार होनेके मारा कारणोंपर प्रकाश डाल रहे हैं । श्रीकृष्णने सैकड़ों दैत्योंको ( जिन्होंने भूमण्डलभर में साधुत्वका गला घोंट रखा था; और स्वयं श्राततायी बनकर प्रजाओं को कष्ट पहुँचाना, उनकी लड़कियोंको प्राप्त कर उनको अपनानेके हथकण्डे अपनाना, उसमें सफलता न ७६ से होनेपर उन्हें जेलखाने में डाल देना, अवैध हिंसाको अपनाना, - महा. प्रज्ञाके लड़कोंको, गौत्रों एवं ब्राह्मणोंको मार डालना आदि पापकर्म जारी कर रखे थे - ) मारकर साधुओंकी रक्षा करके लिखा ' परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ' को चरितार्थ किया; निए और फिर जगत् - भर के आतताइयों तथा उनके सहायकों को मूर्ख दुर्योधनके पक्ष में मिलवाकर उन्हें मरवा दिया, इस प्रकार झूठा धर्मकी ग्लानि दूर की । एतदर्थ श्रीमद्भागवत आदि पुराण तथा महाभारतका पारायण करने से सब शङ्काएँ दूर हो सकती हैं । दे * कंस उग्रसेनका लड़का एवं श्रीकृष्णका मामा था; तथापि कालनेमि दैत्य की प्रच्छन्न- प्रसूति होनेसे. ( यह पुराणोंमें स्पष्ट है ) नहीं अपने पिता को भी जेल में डालनेवाला तथा गो - ब्राह्मण लेना होनेसे इसको तथा उसके सैकड़ों - बालघाती मुसंडे साथी दैत्योंको मारकर ग CC - 0. Ankur प्रवतार - सम्बन्धी शोंका समाधान [ ६०५ श्रीकृष्ण भगवान्ने मथुरा, वृन्दावन, द्वारका, देहली, पंजाब तथा सम्पूर्ण भूमण्डलको निष्कण्टक कर दिया । शिशुपाल, दन्तवकॆत्र, जरासन्ध, शाल्व, नरकासुर, कालयवन आदि अनेकों दैत्यों एवं विधर्मियोंको मारकर गीताकी कसौटी पूरी की । इसमें अर्जुनकी कुछ भी सहायता नहीं थी । कंस आदिको किसी पारिवारिक शत्रुतांका वदला लेनेकेलिए नहीं मारा था, कंस उनका मामा होनेसे परिवार ही था, न इससे उनके बहनोई अर्जुनकी कुछ मंदद हुई, किन्तु ' अभ्युत्थानमधर्मस्य, धर्मस्य ग्लानिर्भवति ' इन कारणोंको देखकर उनको हटवानेके-लिए अवतार ग्रहण किया । पापियों का भार पृथिवी से हटायां । जो कि वादी कहता है कि - ' उनका उद्देश्य भी लोक - कल्याण नहीं था ' इसपर वादी अपने प्रमाणित श्रीदेवीभा.का वचन सुने । देवी कहती है- ' यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरतुलतेजसः 1... क्षितिभा रंसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः ', ( ४ / २० / २-३ ) ' ततस्तेनाथं शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः । लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषे-ष्विह ' ( ४ | १२ | ६ ) । ' कृष्णका कार्य अपने रिश्तेदारोंका कल्याणमात्र था ' यह कहना भी गलत है । ' श्रीकृष्णने ही तो अपने यदुवंशियोंको भी जब वे पृथिवीका भार सिद्ध हुए थे उन्हें मरवा डाला । गीता यद्यपि अजु नको सुनाई गई थी; तथापि उसके माध्यमसे सम्पूर्ण ' जगत्का कितनी- कल्याण किया? उन्हींकी " नीतिसें ' आजके नेता भी जेलखनिकों कृष्णसदन मानकर उसमें रहकर Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( C ) भारतको भिन्नधर्मी - अंग्रेजोंसे स्वतन्त्र करा सके; और उन्हें अपने देशों में भिजवाया । कौरवों तथा उनके साथियोंको मरवाना भी अधर्मके दूरीकरणार्थ था । धर्मराज युधिष्ठिर को राज्य दिलाकर धर्मकी प्रतिष्ठा की । इस प्रकार गीताकी कसौटीसे श्रीकृष्ण अवतार सिद्ध हो ही गये । ६ प्रश्न — श्रीकृष्णने कहा है- हे अर्जुन! युद्धक्षेत्रमें तेरे सभी शत्रु काल - द्वारा मारे जा चुके हैं, तू इन मरोंको मारकर निमित्तमात्र बनकर यश प्राप्त कर ले । जो जन्मा है, उसकी मृत्यु तो अनिवार्य है ( गीता ११।३२-३३ ) इससे कोई भी प्राणी अपनी निश्चित आयुके समाप्त होनेपर ही मरता है, पूर्व नहीं । राम - रावण, कृष्ण - कंस आदि सभी अपनी निश्चित आयु तक जीवित रहे; बाद रामने सरयूमें डूबकर, रावणने युद्धमें मारे जाकर, कृष्णके पैरमें व्याधने बाण मारकर - सभी ने अपनी पूर्ण आयु भोगकर मृत्यु प्राप्त की । अब भी रोजाना लाखों जीव आयुकी समाप्तिपर मरते हैं; तब ईश्वरावतारकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । तब दुष्टोंके नाशार्थं अवतारकी आवश्यकता सिद्ध करें । ६ उत्तर - कालद्वारा मारनेकी बात कहते हुए वादीने गीताके श्रीकृष्णके इस वचनको जान - बूझकर छिपाया है कि- ' कालोस्मि लोकक्षमकृत् प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ' ( ११/३२ ) ' सर्वे चैते [ कालेन मया श्रीकृष्णेनैव ] निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्! ' ( ११।३३ ) यहां भगवान् ने अपने - आपको CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शङ्खानोंका समाधान [ ६०७ द्दी उनका काल बताया है । इसी प्रकार ' अहमेवाक्षयः । ( १० | ३३ ) ' मृत्युः सर्वहरश्चाहं ' ( १० | ३४ ) यहाँ भी भगवानने काल प्राणियोंका काल तथा मृत्यु अपनेको कहा है । श्रीमद्भागवतमे सर | श्रीकृष्णको ' कालचक्रायुध ' ( १०/६०/४७ ) कहा है; तब । कथन स्वयं प्रत्युत्तरित होगया । वादीका अवतार केवल राक्षसोंके मारनेकेलिए ही नहीं होता पृथ्वीका भार उतारने तथा लोक - शिक्षार्थ भी होता है । जैसेकि , किन्तु श्रीमद्भा में कहा है- ' मर्त्यावतारस्त्विह मत्यशिक्षणं रक्षोवधायेव । न केवलं विभोः ' ( ५।१६।५ ) यही. देवीभागवत में भी , कहा गया । है ( ८ । १० । १५ ) । वादी यह जाने कि- रावण- हिरण्यकशिपु दिने तो वर द्वारा अमरता प्राप्त कर रखी थी; तब वे अवतार के बिना अन्यसे मारे नहीं जा सकते थे; तब नृसिंह- राम आदि दिल्ल मानुषावतारों की अवश्य आवश्यकता थी । शेष वादी से आक्षिप्त राम - कृष्णकी लौकिक - मृत्यु नहीं कही जा सकती | उन्होंने स्वेच्छानुसार मायिक- मानुषीरूप त्यागकर दिव्य - विष्णुरूप ग्रहण किया । वे अभौतिक थे, भौतिक शरीर उनका नहीं था, जिससे उनकी मृत्यु मानी जावे । पर जीव कर्मानुसार ही मरता है । अवतारकी मृत्यु नहीं होती, क्योंकि-वह बद्ध नहीं होता, किन्तु नित्य - मुक्त होता है । कर्मबद्ध जीवा कर्मानुसार शरीर छूटना उसके शरीरकी मृत्यु कही जाती है । ईश्वरावतारके बिना अमरताका वर प्राप्त कर चुके हुए अलौकिक शक्ति प्राप्त कर चुके दैत्य - राक्षसोंको मारने के लिए Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) [ ६०५ ६०८ / यः काल श्रवतारः ( दिव्यादिव्य पुरुष ) की आवश्यकता अवश्य ही रहती है । सरयू में डूबना कहना वादीका गलत हैं, इसका जागवतमे सब रामका ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. २५१-२५२ ) में चुके हैं । वादीका प्रत्युत्तर हम मारने से श्रीकृष्णका पैर बिंध गया था; उससे व्याधके बाण तो नहीं हुई, उन्होंने स्वेच्छानुसार ही ऐहिक - लीला मृत्यु किन्तु संवरण की । जैसेकि... प्र ० ७ - राम वा कृष्णादि किसी भी अवतार ऐसा घ कौनसा कार्य किया; जो मनुष्य नहीं कर सकता था, जिसकेलिए गया उन्हें ईश्वरावतार माना जा सके? । आदिने.... उ ० ७ - राम कृष्णादिकान जब मनुष्यावतार ग्रहण करना के बिना दिखलाया है; तो उन्होंने प्रायः मनुष्यों वाले ही कार्य करने थे । दिव्य जब नाटक में.. पुरुष गर्भवती स्त्रीका रूप ग्रहण करता है; तब वैसे ही धीमे - धीमे चलना, अपनी दुर्बलता दिखलाना, पेटका हीं कही बड़ा होना उसे दिखलाना पड़ता है, तथापि उनः ( अवतारों ) में योगका दिव्यता भी कुछ हुआ ही करती है । उसे अन्य नहीं कर सकता । क- शरीर रावण - जैसे अलौकिक शक्ति राक्षसको, बिना दिव्य - बलके अन्य जीव जीव कौन मार सकता था? श्रीकृष्णका भी बड़े - बड़े बलवान् क्योंकि दैत्योंका वध, महाभारत - युद्ध में अल्पसंख्यकोंको जितवाना, जीवका वर्षकी आयु में अंगुलिपर गोवर्धन पर्वत उठाना, दावाग्निका है ॥ पान, कालिय- नामक भीषण नागके फणोंपर नाचना, १० वर्षकी आयुमें प्रबल - दैत्याः कंसको मारना, द्रौपदीके वस्त्र बढ़ाकर के लिए इसकी नग्नता बच्चाना, पृथिवीका भार उतारना अवतारके CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शोंका समाधान अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता था । क्या मनुष्य १६१०८ रानियोंको रख वा उन्हें प्रसन्न रख सकता है? सबसे दस - दस लड़के वा एक लड़की उत्पन्न कर सकता है? क्या वादी मच्छ, कच्छ वा सुअर बन सकता है? वह सुअर बनकर क्या खायेगा? क्या कच्छ बनकर सारे जगत्को पीठपर रख सकता है! क्या सुअर बनकर कीचड़में धंसकर प्रलयके जलमें डूबी हुई पृथिवीको बाहर निकाल सकता है? यदि नहीं, तब अवतारों के - मनुष्यसे असाध्य कार्य भी सिद्ध हो गये । प्र ० ८ महाभारत ( सभा. १४/६७ ) में श्रीकृष्णने कहा है । कि- ' हम जरासन्धके भयके मारे मथुरा छोड़कर द्वारकाको भाग गये थे ' । क्या प्रबल शत्रुसे डरकर भाग जाना कृष्णके . ईश्वरत्वका खुला उपहास नहीं है? • उ ० ८ – इसका उत्तर ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. २१४ ) में आ चुका प्र ० ६ श्रीकृष्णके १६१०८ रानियाँ होना क्या कृष्णजीको योगीश्वरके स्थानपर भोगीश्वर सिद्ध नहीं करता है? क्या अधिक • विषयी होना भी स.ध. में योगी होनेकी पहचान है? उ ० ६ - वादी प्रश्न ७ में कह चुका है कि - ' श्रीकृष्णावतारने उऐसा कौनसा कार्य किया, जो मनुष्य नहीं कर सकता है, जिसके लिए उन्हें ईश्वरावतार माना जा सके ' । अब वह बतावे कि - मनुष्य क्या. १६१०८ रानियां कर सकता है? यदि नहीं; तब वे अलौकिकतावश ईश्वरावतार हुए या नहीं? ईश्वरकी तो स ०६० ३६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) सभी जगत्भरकी स्त्रियां अपनी हैं, क्या इस बातको वादी नहीं मानता है? १६१०८ रानियाँ होनी उन्हें योगीश्वर सिद्ध करती हैं, भोगीश्वर नहीं । बड़ेसे बड़ा भोगी भी इतनी रानियां नहीं रख सकता । आजकल एक भी स्त्रीवाला पुरुष उस स्त्रीके तोरणार्थ कितनी वाजीकरण श्रोषधियोंका सेवन करता है, ' कुश्ते खाता है, धातुओंकी भस्में खाता है, छवारा - बादाम खाता है, कई मुसलोपाक, कौंचपाक, मकरध्वज आदि रसायन खाता है । कई इसीलिए मद्यपान करते हैं, अण्डे चट कर जाते हैं, मांस खाते हैं; परन्तु स्त्रियोंको इन वस्तुओं की आवश्यकता नहीं पड़ती । हजारों स्त्रियों वालेको यदि वह भोगी है; तब तो उसे भोगके सिवाय और कोई कार्यका समय मिल ही नहीं सकता । युद्धोंमें तो भला वह जायगा ही क्यों? पर इतनी स्त्रियों-' वाले भी श्रीकृष्ण अपनीं सभी स्त्रियोंको प्रसन्न रख सके; सब संसारी कार्य भी कर सके, दैत्यों से युद्ध भी कर सके । सन्तानें भी पैदा कर सके, यह सभी उनकी योगीश्वरताका परिचायक है, भोगीश्वरताका नहीं । " योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि ' । योगीश्वर हीं ' बहुत शरीर बनाकर कई कार्य एक साथ कर सकते हैं । यहीं श्रीकृष्णने अपना पूर्णावतारत्व ' दिखलाना था - " मौने मौनी, गुणिनि गुणवान्, पण्डिते पण्डितोऽसौ, मूर्खे मूर्खो, युवतिषु युवा, वाग्मेिषु प्रौढ - वाग्ग्मी, नारदने यही कौतुक श्रीकृष्णाका देखा था और आश्चर्यमें पड़े अवतार - सम्बन्धी शङ्काका समाधान भोगी तो कुछ अधिक स्त्रियाँ होजानेपर कितना हो जाता है; यह बात ' बिलाद् बहिविलस्यान्तः व्याउन स्थितमाजर सर्पयोः I । मध्ये चाखुरिवाभाति पत्नीद्वययुतो नरः ' ( दो पत्नीबाई पुरुषका वह हाल होता है; जो उस चूहेका होता है जो हो । बिलसे बाहर निकलता है; तो बाहर ठहरी, त्रिलो उसे दबोचती है; बिलके नीचे जाता है; तो नीचे हुई दिल्ली . सांप उसे खाना चाहता है । ) इस पद्यसे स्पष्ट हो रही ठहरा है हुधा | । सब स्त्रियाँ जो नरकासुरके जेल में थीं, श्रीकृष्ण भगवान शरण आई थीं । श्रीकृष्णका उन्हें सम्भाल लेना उनकी शकि विशेषको सूचित करता है । सो अतिमात्रा में स्त्रियां श्रीकृष् लोकोत्तर - शक्तिशालिता तथा योगीश्वरता की, छावताररूपताकी परिचायिका हैं । इतनी स्त्रीवाला होना फिर भी राजयक्ष्मारे पीडित न होकर स्वस्थ बने रहना, लोकव्यवहार में त्रुटि न होने देना उनके योगीश्वरताके परिचायक हैं । अधिक विषयी होन श्रीकृष्णका कभी प्रसिद्ध नहीं रहा । अपनी स्त्रियोंका ऋतुकाब गमन करना विषयासक्ति नहीं गिना जा सकता । प्र ० १० – नृसिंह अवतारके वध करने, उसके सर कटरे, वा देहकी खाल उतारनेकी घटना ( लिङ्गपु. पूर्वार्ध ६६. जिसकी इतनी दुर्गति हो, वह ईश्वरावतार कैसे माना जा सक हैं? | T:: उ ० १० — इसका उत्तर उत्तर ' ( आलोक ' ( ७ ) पृ. १६८-१७२, ४५० में दिया जा चुका है. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat, An eGangotri Initiative
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1 श्रीमनातनधर्मालोक ( 8 ) ६१२ व्याकुल प्र ११ - मत्स्य, कूम, वाराह, नृसिंह, हयग्रीव अवतारों-बतमार- रूपी पशुओं वा जीवोंको ईश्वरावतार कैसे माना जा सकता है, पत्नीबाई जबकि इन्होंने साधु - रक्षा, दुष्टों का विनाश एवं धर्मका प्रचार जो जिल कभी नहीं किया था? ये नई दिल्ली एवं मूर्ख निरे पशु थे 1 हरा हुआ उ ० ११ - वादी के इस भिन्न राम - कृष्ण आदि भगवान हे विनाश और धर्म - प्रचार की शक्ति श्राप खण्डित हो गया । श्रीकृष्णकी पशु कहना वादीका अपना जीव - जन्तु बिल्कुल बे - पढ़े लिखे मूक आक्षेपसे मालूम होता है कि - इनसे अवतारोंने साघुरक्षा और दुष्टोंका किया था, इससे वादीका अपना मत्स्य कूम आदि अवतारोंको निरा पशुत्व है । विष्णुभगवान् ने यह शरीर ररूपताकी तत्तत्कालोपयोगी धारण किये थे । यदि वादी नाटकमें स्त्रीपात्र-जयक्ष्मासे का पार्ट पूरा करे; स्तनोंके स्थान चोली के नीचे गेंदें रख ले, टे न होते यी होन तत्र क्या वह सचमुच स्त्री वन जावेगा; उसे पूर्वका ज्ञान नष्ट हो जावेगा; जो कि वादी उन्हें बे - पढ़े लिखे एक मूर्ख तथा मूक तुका बताता है? क्या वह नहीं जानता कि - ' विद्वा ँ सो हि देवाः ' कांट ( शत. ३ | ७ | ३ | १० ) कि सभी देवता जन्मसे ही विद्वान् होते हैं; इस विषय में उसे ' आलोक ' ( ४ ) देखना चाहिये । ६. मत्स्यावतारने वेदोंके आहर्ता दैत्यको मारकर वेद बचाए-जा सकत ' वेदानुद्धरते ( मत्स्यरूपे ), जगन्ति वहते ( कूर्मरूपे ), भूगोलमुद्-. विभ्रते ( वराहरूपे ) ' तभी तो वैदिकधर्मका प्रचार हुआ । मनुसे ७२, ४६० मत्स्यावतारकी जलप्लावन ( प्रलय ) के विषय में संस्कृतमें बातचीत हुई, यह शतपथब्रा, में स्पष्ट है । क्या महान् देव विष्णुभगवान्का CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रवतार - सम्बन्धी शङ्काका समाधान । ६१३ उक्त रूप धारण करनेपर पूर्वका ज्ञान लुप्त हो गया था? वस्तुतः वादी केवल गालियां निकालनेका अभ्यासी है । कूमेने ' जगन्निवहते ' पृथिवीको धारण करके उसकी रक्षा की । तत्र पृथ्वी जोवोंका आधार वनी; तव धमकी प्रतिष्ठा हुई । प्रजाकी सृष्टि हुई । तब धर्म किया जा सका । वराह, नृसिंह तथा हयग्रीव आदि अवतारोंने धर्मके विध्वंसक, आततायी हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, हयग्रीव आदि वैदिकधर्मके द्वेषी दैत्योंको मारकर सत्पुरुषोंकी रक्षा की, और ' यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति, विनाशाय च दुष्कृताम् ' इस गीतावचनको कसौटी पूरी की, ' धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ' इस अपने वचनकी पालना की । वादीकी कलिमल - कलुषित बुद्धिको यह न सूझे; तो इसमें किसका दोष? प्र ० १२ मोहिनीको क्या इसीलिए अवतार माना गया कि- वह बहुत खूबसूरत औरत थी; और इससे उसने दानवोंको आकर्षित करके उनसे छल करके सारा अमृत देवताओंको पिला दिया, और दानव धोखेमें रह गये थे? अथवा शिवजीके साथ कामक्रीडा करके उनका शुक्रपात करा दिया, जिससे सोने-चांदी की खानें बन गई थीं; उसीसे उसे अवतार मान लिया गया? ( भाग ८ | ११२ ) । उ ० १२ – इसका उत्तर ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. ३६७-३६८ ) में दे दिया गया है । यहां दैत्योंसे राजनीति की गई थी । राजनीतिमें छल आदिको नहीं देखा जाता । मायावीसे माया करना वैदिक Bujarat. An eGangotri Initiative
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६१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) राजनीति है । ' त्वं मायाभिरप मायिनोधमः ' (. ) प्र ० १३ - भागवत ( १०/३१/२ ) में गोपियोंने श्रीकृष्णको ' सुरतनाथ ' सम्भोगके पति बताया है । इससे उनके ईश्वरत्वमें कौनसे चार चाँद लगाये हैं? उ ० १३ – ' सुरतनाथ'का उत्तर ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. २११-२१२ ) में आ चुका है । प्र ० १४ - सती तुलसी वा वृन्दाके साथ उनके पतियों का रूप बनाकर इन्हें धोखा देकर व्यभिचार करनेपर उन सतियो के शापोंके कारण विष्णुजीको दण्ड भुगतनेकेलिए अवतार लेने पड़े थे ( शिवपुराण ); तब लोककल्याणकेलिए विष्णु के स्वेच्छा से अवतार लेने की बात स्वयं गलत हो जाती है । क्या सनातनी विष्णु उपरोक्त घटनाओं से परनारी- लम्पट सिद्ध नहीं होता है? उ ० १४ - इस विषय में उत्तर ' आलोक ' ( ६ ) ( प्र. ४६१-५०० ) में तथा ७ म पुष्प ( पृष्ठ १४३-१४६ ) में आ चुका है । वह ' देवकार्या-थंमीश्वरः ' ( शिवपु. रुद्रसं, युद्धखण्ड ४०।२१ ) देवों तथा हितकैलिए ऐसा किया गया था; उसमें अपना लाम्पस्य कुछ नहीं थो । यहाँ अपनी इच्छा कुछ भी नहीं थी । 7 प्र ० १५ – धर्मसंहिता ( अ. १० ) में लिखा है कि- " बस्तु गोपकन्याभिर्वने क्रीडां चकार सः । दक्ष लक्षारिणं पुत्राणां गोपाः लानां ससर्ज सः ' । विष्णुकें अवतार लेने का उद्देश्य व्यभिचारकी अतृप्त वासनाओं की पूर्ति करनामात्र था । अपने शास्त्र की इस बीतकी आप गलत क्यों मानते हैं?. CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शङ्खाश्रोंका समाधान [ ।:. उ ० १५ धमसंहिताका उत्तर आलोक ' ' ( ६ ) पृ ५७०-१७ में आ चुका है कि यह अर्थवाद है । वहां वालोपि '. गोपकन्या भिवेने क्रीडां क्रीडा बताई जो छः - सात क्या होगी? ( चिक्रीड, रमु बिम्बविभ्रमः ' चकार सः ' बच्चे श्रीकृष्ण की गोपबालाओं. गई है । वादा ही बतावे कि बच्चे - बच्चियों वर्षके थे जैसे कि - पुराणमें स्पष्ट है - अन्य यह वह क्रीडा है, जिसे श्रीमद्भागवत फीड । में से | क्रीडायाम् ) रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथा भंक: स्वप्रति ( १० । ३३ । १७ ) बताई गई है । सो बच्चेकी अपने प्रतिबिम्बसे अन्य क्रीडा क्या हो सकती है? बच्चा और ि भोगकी बात करनी विप्रतिषिद्ध बात है । यहां व्यभिचार गन्ध भी बादी कैसे सूघ सका; यह उसके चरित्र पर श्रा आता है; आगे धर्मसंहिता में ' दशलक्षाणि पुत्राणां गोपालानं ससर्ज़ ह ' दस लाख गोपालवालोंका ' ससजे ' से सर्जन ' कहा है, यहां भी कोई बुरी बात नहीं है । किसी भी पुराणमें, बालङ्ग श्रीकृष्णका गोप - बालाओंसे बच्चे पैदा करनेका हाल नहीं आवः स सो यहां ‘ ससर्ज’का अर्थ ' सृष्टि की ' यह है । जब ब्रह्माजीरे स गोप - बच्चोंको गुफाओंमें छिपा दिया था; तब श्रीकृष्णले सेतो खाल वालोंकी अपनी सामथ्यसे सृष्टि कर दी और उनसे की - यह देखकर ब्रह्माजी हैरान हो गये - यह वहां आशय है । अ सो यहां भी व्यभिचारकी कुछ भी बात नहीं । ' लहू ' शर ' अनेक ' वाची है! प्र. १६ – भागवत ( ८ | २ | ४ ) में लिखा है कि - मत्स्यावृताते Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( T ) - शरीरकी लम्बाई १ लाख योजन अर्थात् आठ लाख मील थी । पकन्या सो हिसाब लगाकर बतावें कि हमारी केवल २४००० मील . बालाओं की परिधिवाली पृथ्वी पर वह किस प्रकारसे और कहां रहता च्चियो होगा? न्य क्रीडा उ ० १६ – वेदकी भांति पुराणोंमें भी सहस्र, लक्ष आदि शब्द तमें ऐसे वाचक ये हैं । यहाँ भी वही जान लेना चाहिये । समुद्र कः स्वत- अथाह होता है, पृथ्वी तो थोड़ासा स्थान है, वह तो टापू हैं, शेष की आप सब समुद्र ही समुद्र है, फिर प्रलयमें तो जल ही जल होता है, और फि शेष पृथिवी भी उसमें डूब जाती है । उस समय में बड़े परिमाण-भिचारका मत्स्यावतारका जो अणिमादि- सिद्धियुक्त सूक्ष्मरूपमें थ -होना कोई आश्चयजनक नहीं । समुद्र में ' तिमि ' तथा ' तिमिङ्गिल गोपाला एवं तिमिङ्गिलगिल ' मत्स्योंका वर्णन भी आता है । ' अस्ति मत्स्य-कहा स्तिमिर्नाम शतयोजनविस्तरः ' । उसका सौ योजन विस्तार श्राया है, उस मत्स्यको खा जानेवाला तिमिङ्गिल, उसको भी डी. खा जानेवाला तिमिङ्गिलगिल नामक मत्स्य होता है । एक ब्रह्माजऔर समुद्री ह्वेल मछली ही कई मन दूध देती है । एक जहाज ज्याने वैसे तो उसके मुंह में आ जावे । तब दिव्य - मत्स्यका क्या कहना? नसे प्र ० १७ – स.र्ध के मान्य २४ अवतारोंकी सूची पेश करें; शय है । और बतावें कि भागवत १ वा ३ स्क में जो अधूरीसूचियां श्रवतारोंकी हैं, उनमें परस्पर विरोध क्यों है? क्या व्यास अवतारको २४ अवतारोंके नाम भी ठीक - ठीक याद नहीं थे? या वृतारके उ ० १७ – इसमें ' विरोध ' कुछ भी नहीं है । ' प्रधानेन हि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. प्रवतार - सम्बन्धी शाओंका समाधान [ ६१७ व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रधानोंका नाम गिन लिया जाता है । शेष नामोंकी उपेक्षा कर दी जाती है । यह नहीं कि-सब अवतारोंके नाम याद नहीं थे । १।३।२५ में २२ अवतार कहे गये हैं, शेष इंस और हयग्रीव दो हैं । वे उतने उल्लेखनीय नहीं समझे गये । २४ संख्या पूरी हो गई । अवतार १० भी कहे जाते हैं । असंख्य भी कहे जाते हैं । इसमें कुछ परस्पर - विरोध नहीं हो जाता । दृष्टिकोणकी भिन्नतावश मुख्यता वा अमुख्यता-वश अथवा अवतारके कार्यकालकी न्यूनाधिकतावश, जिसने अधिक समय लगाया; उस अवतारको गिन लिया गया । न्यून समय वालेको नहीं गिना जाता, एतदादि कारण स्वयं समझे जा सकते हैं; पर तब, जब समाधान - बुद्धि हो । दोषदृष्टि में बुद्धि गदली हो जाती है । १० प्र ० १८ — जब अवतारका उद्देश्य अत्याचारों व पापोंका विनाश एवं धर्मकी स्थापना होता है; तो जब जिन युगों में धर्म अधिक होता है; तव अधिक अवतार क्यों होते हैं; तथा कलियुगमें तीन चरण अधमंके होते हैं; तब केवल एक अवतार क्यों होता है, जबकि सबसे अधिक अवतार कलियुगमें होने चाहियें? उ ० १८ अवतारका उद्देश्य अत्याचार वा प्रापोंके विनाश एवं धर्मस्थापना जब वादी मानता है; तो सत्ययुग श्रादिमें भी तो पाप हो सकता है, क्योंकि श्रारम्भमें पिछले युगकी छाया होती है, और कलियुगमें पहले द्वापर युगकी छाया होती है । An eGangotri Initiative
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६१८ | श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) हां, यह अवश्य है कि - ' ईश्वरा भूरिदानेन यल्लभन्ते फलं किल । दरिद्रस्तच्च काकिण्या प्राप्नुयादिति नः श्रुतिः ' ( धार्मिक लोग लाखोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त करते हैं, गरीब लोग वही फल कौड़ीके दानसे भी पा लिया करते हैं । ) तात्पर्य यह है कि - सत्ययुग पापका गरीब होता है और पुण्यका धनी । उस समय थोड़ा भी पाप वा अत्याचार बढ़ा माना जाता है । बड़ा भी पुण्य उसमें थोड़ा ही माना जाता है: । कलियुग पुण्यका गरीब और पापका धनी होता है । वहां बड़ा पाप भी थोड़ा ही माना जाता है, थोड़ा पुण्य भी वहां बड़ा माना जाता है । इसीलिए कलियुगकेलिए सत्यनारायण व्रत कथाको भी ' लघूपायोस्ति भूतले ' कहकर बड़ा धर्मजनक माना जाता है । हिरण्यकशिपु आदि सत्ययुगमें ही तो थे, जिन्होंने धर्मपर अत्याचार किया था । हम पहले कह चुके हैं कि- युगमें पिछले युगकी छाया आरम्भमें रहती ही है । अब कलियुगका आरम्भ है, इसमें अभी तक द्वापरकी छाया ही है, असली कलियुग तो आगे शुरू होगा । और फिरु पापका धनी होनेसे कलियुगमें यह वर्तमानके पाप वा अत्याचार नगण्य ही होते हैं । ऐसे समय में तो परमात्माकी विभूतियां तथा श्रीशङ्कराचार्य आदि अंशावतार । युगकी व्यवस्था समय - समय पर ठीक - ठीक स्थिर रखते हैं । घोर कलियुग तो अपनी चरमावस्था में होगा, तभी कल्की अवतार भी होगा; और फिर एक युगमें भी चारों युग भ्रमण CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रवतार सम्बन्धी शंका समाधान [ ६१ ९ ६ किया करते हैं - इत्यादि बातें स्वयं भी वादीको अपनी बढ़ाकर जान लेनी चाहियें । बुद्धि । प्र ० १६ - इधर - उधरकी लड़ाई - भिड़ाई करानेवाले ईश्वरावतार कैसे थे? विष्णुजी ने उनकी अपने सुन्दर नारद । स प्रार्थनापर बन्दरकी शक्ल बना दी और विष्णुजी बनानेकी | पर सुन्दर युवक अ बनकर कन्याको स्वयं वर लाये । विष्णुजीने नारदसे वह दंगाबाजी वा मजाक क्यों की; और शादी क्यों न होने दो! हो अपने ही अवतार के साथ यह हरकत क्या कानून जुर्म नहीं है! सि उ ० १६ – अवतार कई प्रकारके होते हैं । मनुष्य मी में हु कलाका कहा जाता हैं । इससे भी ऊपर में कलाके व्यक्ि विभूतियाँ माने जाते हैं । इनसे ऊपर अवतार होते हैं; मौ कृत नारद जी भी उसी में हैं । पापको हटवानेकेलिए पापियोंको रे देव पापका देते हैं, जिससे पाप निकल ही जाय; क्योंकि ' पतनान्तः समुच्छ्रयः ' उन्नतिका अन्तमें पतन ही होता है । मह कहते हैं कि- गुड कफको बढ़ानेवाला होता है । जव पुर हो, तो उसे समय कफवालेको गुड खिलाना पड़ता है, जिससे ' गुडेन वर्धितः श्लेष्मा सुखं वृद्धया निपात्यते ' इस न्याय से ह जावे । यहीं बात यहाँ भी समझ लेनी चाहिये । शेष जो नारदो कर विवाहमें उसे बन्दरकी आकृति आदि देनी पौराणिक इतिहास जो है इसमें यह जानना चाहिये कि इसमें जगत्का भविष्य हुन लाभ था । यह इतिहास । श्ववाद होते हैं । " न्यायदर्शन ' में लिख हैं- " स्तुतिनिन्दाः परकृतिको पुराकल्पइत्यर्थवादः ' ( २/१/६४ ) से बल Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ vc २०. 7 भेद में पुराकल्प भी होता है, उसका लक्षण यह है-वादोंके विधि: पुराकल्प: ' अर्थात् इतिहासके ऐतिह्यसमाचरितो जो विधि होती है - यह भूतार्थवाद होता है । इनको तथा नारद समान बनाने अर्थवाद इसलिए कहते हैं कि - ' स्तुतिनिन्दा वाक्येन कृतिको दर युवक अभिसम्बन्धाद् विध्याश्रयस्य कस्यचिद् अर्थस्य द्योतनाद् इसे अर्थवादः ' अर्थात् स्तुतिवाक्यसे या निन्दावाक्यसे सम्बन्ध नेदी! होनेसे विधिप्रतिपाद्य अथवा निषेधशास्त्रसे निषिद्ध किसी नहीं है । सिद्धान्तका प्रकाशन करना ही पुराकल्प तथा परकृतिका प्रयोजन भी हुआ करता है । व्यक्ति मीमांसा में भी कहा है- ' परेण महता पुरुषेण इदं कर्म कृतमिति प्रतिपादको ऽर्थंवादः परकृतिः ' ( अमुक महान पुरुष वा को देवने यह कर्म किया- इस बातको बतानेवाला अर्थवाद परकृति क्योंकि कहा जाता है ) ' परप्रवकतृकार्थादि प्रतिपादकः पुराकल्प: ' ( अमुक महान् व्यक्तिने यह बात बतलाई है - इसे बतानेवाले अथैवादको जन पुराकल्प कहते हैं ) । सो अर्थवाद में सभी अक्षरों वा शब्दोंका जिससे अर्थ नहीं लिया जाता, वहाँ उसका तात्पर्यमात्र लिया जाता है । यसै हट: यदि नारद विवाह कर लेते; तो लोक - कल्याण उतना न. नारद कर सकते, इधर - उधर आ जा न सकते; और उनके खीझनेसे - इतिहास जो श्रीविष्णुने शाप साया; उससे भी लोकका कल्याण ही विध्यतु हुआ । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २५६-२५७ आदिमें तथा में लिख ' बदुबंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरतुलतेजसः । भृगुशापप्रतापेन महामाया-– ६४ ) २ बलेन च । क्षितिभारसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः ' ( ४ | २०।२-३ ) CC - 0. Ankur Joshi प्रवतार - सम्बन्धी शङ्काग्रोंका समाधान [ ६२१ इस श्रीदेवीभागवत पुराणके वचनानुसार जान लेना चाहिये । प्र ० २० - श्रीकृष्णजीने नारदको नारदी बनाकर उसके साथ रमण किया; ( पद्म. पाताल. अ. ७५ ) तो क्या अवतारका Collection Gujarat. अवतार के साथ ऐसा कुकर्म करना ठेठ सनातनधर्म एवं अवतारपनका सबूत है? उ ० २० – इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३०६-३०६ में देखना चाहिये । प्र ० २१ – जैनमतानुसार ऋषभदेव जैनी तीर्थंकर व इतिहासानुसार बुद्धजी बौद्धधर्मके प्रचारक थे । दोनों ही नास्तिक-सम्प्रदायोंके वेद वा ईश्वरके विरोधी लोगोंको ( भाग १।३ ) ईश्वरावतार कैसे माना गया है? क्या वेदधमँविनाशक नास्तिक मी अवतार हो सकते हैं? उ ० २१ – इसका प्रत्युत्तर आलोक ' ' ( ७ ) ग्रन्थमालामें पृष्ठ १ ९३-२०६, ३७६ में देखना चाहिये । यह ऋषभ ' ' अन्य थे । बुद्ध भी अन्य थे । प्र ० २२ – नर - नारायण दो ऋषि अवतार लेकर युद्ध किया करते हैं, अर्जुन और कृष्ण इन्हींके अवतार थे । इससे श्रीकृष्णजी ईश्वरावतार न होकर ऋषिके अवतार थे । व्यासजीने ईश्वरके कृष्णावतार लेनेका खण्डन क्यों किया है? उ ० २२ – नारायण परमात्मा थे; उन्हें भी ' ऋषि ' कहा जाता है । इसमें स्पष्टताकेलिए ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३०२-३०३ में देखिये An eGangotri Initiative
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६२२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) प्र ० २३ - राम वा परशुराम दोनों अवतार एक ही समय हुए; दोनों आपस में लड़ पड़े । एक - दूसरेको पहिचान भी न सके । उ ० २३ – जैसे व्यापक अग्नि एक होती हुई भी भिन्न - भिन्न स्थान में प्रकट होनेपर एकसे अधिक भी मालूम होती है, वैसे ही एक समय में दो अवतार भी माने जा सकते हैं । शेष है एक-दूसरेको न पहचान सकना और लड़ पड़ना- इसपर याद रखना चाहिये कि - वेद भगवान्का श्रव्यकाव्य है; उनके सिद्धान्तोंका प्रभाव उतना नहीं पड़ता, जितना कि दृश्यकाव्य नाटकका -1 अवतार भगवान्के वैदिक - सिद्धान्तोंके दृश्यकाव्य रूप में होता है । दृश्यकाव्यका श्रव्यकाव्यकी अपेक्षा अधिक प्रभाव पड़ता है । सो नाटकमें दो पात्र एक - दूसरेको पहिचानते हुए भी और मित्र होते हुए भी एक - दूसरेका न पहचानना ही दिखलाते हैं । आपसमें वनावटीरूपमें लड़ भी पड़ते हैं । एक जान - बूझकर कमज़ोर भी पड़ जाता है, वैसे ही नाटकरूप अवतारमें भी ज्ञान लेना चाहिये । प्र ० २४ – महाभारतकालमें व्यासजी, कृष्णजी वाः बलराम-जी तीन अवतार क्यों एकसाथ पैदा हो गये । एक ही अवतारसे सारा काम क्यों नहीं पूरा कराया गया? क्या अववार भी घटिया - बढ़िया किस्म के होते हैं? एक विष्णुके एक ही साथ तीन अवतार कैसे बन गये!.. उ ० २४– पहले हम अग्निके दृष्टान्तसे कह चुके 13 हैं कि CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शङ्काओं का समाधान | ६२३ आवश्यकता होनेपर एक युगमें एक ही समय में कई अवतार में हो सकते हैं । घटिया - बढियापन भी उपाधिभेद ही होता वास्तविक नहीं । एक ही बिजली नम्बर के भेदसे है । १००० की 1. शक्तिवाली, १०० की शक्तिवाली, २५ की शक्तिवाली तथा जीरो भी होती है । एक ही आकाश मन्दिर में होता है, घरमें । होता । है, टट्टी में भी होता है; वह किसी में भी उत्तम, मध्यम , अधम नहीं बन जाता, किन्तु माध्यमके भेदसे वैसा मान लिया जाता है । जैसे वेदमन्त्र सभी उत्तम होते हैं, पर किन्हींको चहुत : अच्छा माना जाता है, किन्हींको मध्यम, किन्हीं को साधारण वैसे यहांपर भी उपाधिभेद ही समझना चाहिये । एक ही ( अग्नि कहीं सूर्यरूपसे, कहीं विद्युदरूपसे, कहीं साधारण अजिं-रूपसे, कहीं चन्द्ररूपसे होती है, कहीं वह मारती है, कहीं बह जीवन देती है, कहीं वह जलाती है, कहीं वह पकाती है, कहीं तपाती है, कहीं वायु पैदा करती है, शीतलता पैदा करती है । -लोक - व्यवहारार्थ उस अग्निको कई प्रकार के रूपों में होना पड़ता है, वैसे ही ' अग्निर्ययैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । --तथा ह्ययं सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपों बहिश्च ( कठोपनि, २ | ५ | ६ ) इस न्यायसे कभी भगवान् कई प्रकारके रूपों में हो -जाते हैं । एक ही विद्युत् हीटर में अग्निंरूप हो जाती है, पंखे ) वायुरूपमें शीतल हो जाती है, लकवा: ठीक करते में, पुरुष -अन्दर बल पैदा करनेमें घोषधिरूपमें हो जाती है । एक ही क्षगेहूँ मैदारूपमें, अथवा आटेके रूपमें, अथवा सूजी ( रवा ) रूपं Gujarat An eGangotri Initiative