सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 351–360
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 351–360
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[ श्रीसनातनधर्मालोक ( e ): · · ६६ ॥ कामाचा ' देता है- ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पतिं मत् ' तब से । मम । ' वैदिक - आज्ञा होगा- ' शृङ्गारं देहि सुभगे! तथा: | इसका यही तो अनुवाद परस्मै पुंसे त्वं मदादेशात् पतिव्रते! ' स्वकम् । प्रेम्णा महाकांन वालिङ्गनं इसका यह अर्थ करेगा कि - ऐ मेरी प्यारी -- परा - बादी कदाचित् निवेदनको सुन । मेरे कहने से इस पर - पुरुषको गायक- श्री! तू मेरे इस कर दे । उसे आलिंगन दे दे ( उससे कुकर्म विष्णुको | तू झाले अपना शृङ्गारदान । अव वादी अपने महर्षि के नियोगको अपनी कलम ' कर्म ' लिख दे, तव दयानन्दी - समाज में उसकी पूरी प्रतिष्ठान पार्वतीने होगी यह हमारा विश्वास है । है क्या वह इसके लिए तैयार? दया- ( १० ) पू – भागवतसें मन्दराचलके मध्य में ८८००० मील: पंजा दूंचा श्रामका वृक्ष लिखा है, जिसके पर्वत के शिखर के समान = - पावले फलं गिरते हैं- ( ५: १६।१६ ) हिमालय पर्वतकी चोटी केवल ५ || -दुगृहे । मीलं ऊँची है, उसी पर इतना ऊँचा पेड़ लिख मारना पुराणकी घा पूरी, गप्प है । पार्व ' उ – अतिशयोक्ति एक अलंकार होता है, दोष नहीं । वैदिक: क्या बाब एवं प्रौराणिक परिभाषामें इसे ' अर्थवाद ' कहा जाता है; उसमें.. नकी पली शब्दोंका अर्थ न देखकर केवल तात्पर्य देखना पड़ता है । कविकी: माता बा भाषा आंखोंको ‘ कमलका पत्ता ' कहती है; क्या आँख उस पत्ते को कुक इतनी बड़ी होती है? ' अपि लोकयुगं दृशावपि श्रुतिगामित्या दमखसुव्येतिभाते ' ( २।२२ ) इस श्रीहर्षकविके पद्यमें दमयन्तीकी यानन्दिव श्रांतोंको उसके कानों तक पहुँचा हुआ कहा गया है । क्या उसे की कमी वांदीने इसे दोष बताया? कई कविलोग ' स्तनावद्रि - र अतिशयोक्तिका भाव देखो । ६६५ समानौ ते? कहते हैं; कुचोंको हाथी के माथेके समान तो प्रायः समीः कवि कहते ही हैं । 1 एक अट्टालिकाका वर्णन एक कविने लिखा है- ' चन्द्रचुम्बि-न्याम् अट्टालिकायाम् ' ' अभ्रंलिहः प्रासादः ' यहाँ महलको अन्तरिक्ष तथा अटारीको चन्द्रका चुम्बन करने वाला बताया गया है । तब क्या वादी उस अटारीको २,३८,००० मील ऊँची मान लेगा? वस्तुतः ऐसे स्थानोंमें अत्यन्त उच्चता में तात्पयं होता है; उतने परिमाण में नहीं । वहाँ निर्दिष्ट - संख्या अविवक्षित होती है । सन्देह होता है कि यह वादी कहीं ' साहित्यशास्त्रीय-कलाविहीन; साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ' का तो उदाहरण नहीं? ॐ वाग्भटालङ्कार में प्रतिशयोक्ति अलङ्कारका ' त्वद्दारिता-रितरुणी ' इत्यादि उदाहरण मिलता है; उसका अर्थ है - हे राजा,: तुमने जव असंख्य शत्रुओंकी मारा; तो विधवा हो गई हुई उनकी स्त्रियों की दुःखकी सांसें चलने लगीं । वे मिलकर एक भारी तूफान बन गया । उससे पहाड़ भी टकराने लगे । उस शब्दको सुनंकर क्षीर - समुद्र में सोये हुए विष्णु भगवान्की नींद भी उचट ' गई ' । क्या वादीने कभी इस उदाहरणकी सदोषता पर भी लेखनी चलाई है । वस्तुतः अतिशयोक्ति एक अलङ्कार होता है दोष नहीं ' । उसका तात्पर्य देखा जाता है, जिसे बच्चों जैसे वादी, नहीं समझ पाते । उत्तररामचरित्र में श्रीराम के सीता वियोगरूप शोक केलिए कहा है- ' अप्रि ग्रावासेदित्यपि दुलति ब्रज्ञस्य: CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) हृदयम् ' ( १।२८ ) यहां पत्थरका रोना तथा वज्रके हृदयका दो टूक होना कहा है । वादीने कभी इस पर तो वायवेला नहीं मचाया कि भला पत्थर कैसे रो सकता है? वज्रका हृदय भला कहाँसे श्राया? यदि वह यहाँ कविकी अतिशयोक्ति समझ सकता है; तब पुराणके कवि ' नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय क्रविवेधसे ' ( हर्षचरित ) — श्री व्यासकी अतिशयोक्ति समझने का भी अभ्यास करे । 1. पूछा जाता है कि- स्वा. द. जीके लैकचरोंमें होते थे? उत्तर मिलता है- ' श्रमख्य '!!! क्या होगा कि उनकी कुछ भी संख्या थी ही नहीं? अज्ञेयता वा अकथनीयताको बताने के लिए ऐसे जाते हैं । इसी प्रकार पुराणों में भी कोटि, लक्ष शब्द स्वरूपपरक न होकर ' बहु ' ' वाचक हुआ अतिशयोक्ति सर्वत्र चलती है । पुसणके मूलभूत कितने आदमी इसका यह अर्थ महाशय! यहाँ शब्द कह दिये , सहस्र दि करते हैं । यह वेदमें भी प्रयुक्त होती है । दिमात्र वैदिक - अतिशयोक्तिको वादी देखे । वहाँ लिखा है-' पर्जन्य इव ततनद्धि वृष्टया सहस्रम् प्रयुताः ददत ' ( ऋसं. ८ | २१ | १८ ) यहाँ चित्र नामक राजाका बादलोंकी बूंदों इतनी करोड़ों मुद्रानोंका देना बताया है । क्या वादी बादलकी बूंदें सकेगा? ' सावर्ण्यस्य दक्षिणा कि सिन्धुरिवे पप्रथे ' ( ऋ. १०। ६२६ ) यहाँ सावर्णि मनुकी दक्षिणा सिन्धु! ( समुद्र ) की तरह अपरिमित, अन्य सभी राजाओंसे बढ़कर कही गई है CC - 0. Ankur Joshi Collection ( वैद्रिक अतिशयोक्ति [ ६ वादी समुद्रकी बूंदों वा लहरों वा पानीका परिमाण 15 सकेगा? ‘ सूर्येण अस्य यतमाना एतु दक्षिणा ' ( ११ ) कर ४ ॠ.सं. के मन्त्रमें मनुकी दक्षिणाका परिमाण लिखा वह इतनी ऊँची थी कि उसे पृथ्वी पर रखा है कि देवता वह सूर्य के पास जाकर पहुँचे । ' रथं... मनोजुवं जावे, तो बाही ... सहस्रकेत् ' ( ऋ. १ | ११६/१ ) ' मनसो जवीयान्... वातरंहाः ' ( स्थान १/११७/२ ) इन मन्त्रोंमें रथकी गति मन तथा वायुसे भी ११११५१ तेज ) बड़े की बाही गई है, उसपर हज़ारों झण्डे दिखाये गये हैं, क्या यह सम्भवत: हो सकता है? यह वेदकी अतिशयोक्तिका एक छोटा - सा नमूना उसस हैक है, ग सो जैसे इन वैदिक अतिशयोक्तियोंका पर्यवसान बहुलतायें चिकन रहता है, वैसे वेद भाष्य पुराणों में भी समझ लेना चाहिये । उसम ' वादी दोषदृष्टि हटा दे, तभी तात्पर्य प्रतिभ्धुत होंगे । वह ऊपर करन ऊपर न रहे, गहरे में घुसे, तभी रत्न मिलेंगे । उसका ज्ञान तथा ' बिह्नणो वृषणायते ' की भांति बाहर बाहर रहेगा; तो रहस्यमय | एवं श्रानन्दकी प्राप्ति उसे नहीं मिलेगी, रत्न नहीं मिलेंगे । मान और फिर यह देवताओंका वर्णन है । देवता स्वयं बड़े - बड़े पहा होते हैं । सूर्यदेवताको ही देख लो, वह १३ लाख पृथिवियों इतना इस बड़ा है । यदि आजकी सायन्स यह न कहती; तो वादी इसे भी २३ ) गप्प बताता । उसे थाली इतना मानता । कई अगस्त्य आदि चान तारे द्युलोकमें ऐसे हैं क्रि - वे सूर्यसे भी बड़े हैं, यहां उनका लोक प्रकाश भी अभी तक नहीं पहुँच पाया । सो स्वयं बड़े देवाः श्रा एक Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ ६६७. श्रीसनातनधर्मालोक ( C ) तो उसमें ' गप्पवाज़ी ' क्या बतानी? १ ) इस भी यदि बड़ा हो, पहाड़ोंको इस लोकके पहाड़ मान लेना है कि | / वृक्ष देवताय कि पुराणवर्णित वे द्युलोकमें हैं । वहां जो तारे हैं, वे देव-नादानी है । G वादीकी वै नक्षत्राणि ' ( तैत्ति. प्रा. १५२६ ) वहां इसके / स्थान हैं । ' देवग्रहा और ऊँचे वृक्ष हों, उनके बड़े फल हो, यह - ११५१, बड़े ऊँचे पहाड़ आगे बतावेगी । वादीकी वृद्धि संकुचित है, ज की बाढीका साइन्स. विषय प्रविष्ट नहीं हो सकता । जब सम्भवतः उसमें पौराणिक स्थूल वह चीखता - चिल्लाता नमूना उसमें उसे घुसाया जाता है, तब इससे है, गालियाँ देता है, हाय - हाय करता है, यदि वह उस बुद्धिको बहुलेटी चिकना एवं विशाल करा ले; तब फिर पौराणिक -स्थूलविषय बाहिये । उसमें पूरा, बिना कष्टके समा जायगा । और उसे आलोडित ऊपर करनेपर उसकी बुद्धिमें बहुत आनन्द प्रस्तुत होगा । मन्दरपर्वत -ज्ञान तथा कलशसमुद्रको द्युलोकमें समझना चाहिये; जिसमें देवता स्यमव । एवं दैत्योंके द्वारा मन्थन हुआ । मन्दराचलको हिमालय पहाड़ मानना वादीका अज्ञान है । द्युलोकस्थित महों आदिमें बड़े - बड़े बड़े - बड़े पहाड़ और समुद्र वा वृक्षादि हैं । यहां उक्त समुद्र एवं पर्वत. - इतना इस लोकके इष्ट नहीं; क्योंकि - ' दिवि देवाः ' ( अथर्व. ११/७ ( ६ ) इसे भी २३ ) / देवता: धुलोक में रहते हैं; और द्युलोक ' दिवं च पृथिवीं आदि चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ. १०/१६०1३ ) इस वेदवचनसे पृथिवी-उनका लोकसे भिन्न है 1 । बादी इतना भी नहीं सोचता कि मथनमें सूर्य.; देवोंका आदि देवता भी शामिल थे; तव इतना बड़ा सूर्य पृथिवीलोकके.. एक भाग समुद्र पर कैसे आ सके, जबकि पृथ्वी भी उससे बहुत. CC - 0. Ankur Joshi नाप तौलका - भेद छोटी और उसीका एक छोटा - सा अंश है । अतः यह मथन द्युलोक में समझना चाहिये, मन्दराचल आदि पर्वत तथा कलश-समुद्र भी उसी लोकके समझने चाहिये, इस लोकके नहीं । ( ११-१२ ) पू- भागवत ( ५ १५२७ ) में मेरु पर्वतको ८ लाख मील बताया है । हिमालय पर्वतको ही मेरु कहते हैं । जमीन से - चन्द्रमा २,३८,००० मील ऊँचा है, और हिमालयको एक लाख योजन वताना महाग है । इसी तरह विष्णुपु. ( १/१६ ११ ) में - ८०० मील ऊँचा किला लिखा है । उ०- स्वर्गका मेरुपर्वत भी देवताओंका निवास होनेसे और गत लेखमें देवताओंका द्युलोकमें निवास सिद्ध होनेसे उसे लोक में समझना चाहिये, मनुष्यलोक में नहीं । अव भी मङ्गल आदि ग्रहोंमें वहुत ऊँचे पर्वतोंका संकेत मिलता है । हिमालय पर्वत हिंसका है, हेम ( सुवर्ण ) का नहीं, अतः वादीका हेम-( सुवर्ण ) पर्वत सुमेरुको हिमालय बताना उसका महान् अज्ञान है । भला सूर्य जैसे बड़े - बड़े देवताओंका - भूलोकके छोटे पहाड़ पर निवास कैसे हो सकता है, यह भी वादीको नहीं सूमता । विष्णुपुराणका किला हिरण्यकशिपु दैत्यका है, वे तो देवताओंके .! बड़े आई माने गये हैं, तब उनके उतने स्थानमें भी आश्चर्य कुछ नहीं । वल्कि वादी तो इसमें दोष दे कि यह परिमाण छोटा है । महल ( प्रसाद ) को किला बताना वादीका संस्कृतपाण्डित्य बिता रहा है । अन्य ग्रह.भी. बात है. क्कि - नाप - तौलके पैमाने समय - समय Collection gujarat n eGangotri Initiative
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६७० ] श्रीसनातनधर्मलोक ( 1 ) पर बदलते रहते हैं । ' पहले ६४ पैसांका १ रुपया होता था; पर - १०० पैसोंका एक रुपया है । पहले योजनका हिसाब होता था, फिर कोसोंका होने लगा, कुछ पहले मीलोंका होता था, # पर अब किलोमीटरोंका होने लगा है । कभी कपड़ेके नापमें गजों का हिसाब होता था, कभी फुट - इन्चोंका, और मीटरों का यह हो रहा है । पहले मन सेर होते थे, अव किलो-माम आ गये, लीटर आ गये । अतः यह परिमाण समय पाकर बदलते रहते हैं । पुराने परिमाणोंको आजकलकी तराजू से - चोलना बुद्धिमत्ता नहीं । यह कानूनविरुद्ध है । पुराने वाटोंको आजकलके वांटोंके समान मानना नासमझी है । सम्भव है, - उस समय आजकल के फुटों को ही योजनरूपसे वर्णित किया • जाता हो । - ' वस्तुतः देवताओंका परिमाण सोचकर तो यही कहना पड़ेगा कि यह परिमाण बहुत छोटे हैं; अतः यह परिमाण भी उनके अपने परिमाणके अनुसार समझने चाहियें । हमारे परिमाणों के अनुसार नहीं ' वर्ष ' का अर्थ जब मीमांसा धनुसार “ दिन ' हो सकता है; तब कोई कारण नहीं कि उस समय के परिमाणको आजकलका ही योजन ( चार कोसा ) माना जावे । उनको फुट वा इंन्च समझ लो; यदि छोटी बुद्धि होनेसे न समझ उसको तो । पर वस्तुतः ऐसा नहीं है । जब सूर्य - चन्द्रदि देवताओंके भी परिमाण बड़े - बड़े हैं; विष्णु तो जगत् भर में ही व्यापक माने जाते हैं, तब उनके निवासस्थान इस लोक में CC - 0. Ankur Joshi Collection ' कोट'पादिका तात्पर्य [ 501 नहीं समझने चाहियें । पादोस्य विश्वा भूतानि दिवि ' ( यजुः ३१/३ ) यह लोक तो उस वामन, त्रिपादस्यान हो गये हुए विष्णुका एक पांच है; उसकी, शेष परन्तु पीछे विशाल । त्रिपाद - विशाल महिमा तो द्युलोकमें मिलेंगी इस - श्रत्यन्न । , लोक में नहीं इन बातों पर वादी विचार कर लेगा, तब उसकी । उन सब लघु दीर्घ शङ्काएँ सूख जायेंगी । इसी प्रकारकी ( १३ ) पू — भाग. ( १० / ६० / ४१-४२ ) में यदुवंशके शिक्षक ३,८८,००,००० बताये गये हैं । स्वयं उग्रसेनके बालकोंडे . १: नील सैनिक रहते थे । उनके भाई - बहन मां साथ । • अन्य रिश्तेदार भी होंगे । जब वे लेटनेको - बाप आदि । खाट विधाते होगे तो जमीन - समुद्र वा पहाड़ सभी थोड़े रहते होंगे । पेशाब करते; होंगे; तो ज़मीनपर समुद्र बन जाते होंगे । उन्हें खाना सोसने-वाले नौकर भी अखर्वों होंगे, उनके मकानादिसब सध सभाओं के दफ्तरों वा भागवत बनानेवाले की गंजी खोपड़ीपर वनते होंगे ।.. उ०- यहां वादी की सभ्यता दीख रही है । श्रीमद्भा ' तिस्रः कोट्यः सहस्राणां ' इस: आक्षेप्य - पद्यमें यह आवश्यक - नहीं कि - ' कोटि ' का ' करोड़ ' ही अर्थ हो । ' कोषकोटि मापन्नायाः ' यह पञ्चतन्त्रमें संकरकी अत्यन्त क्रुद्ध स्त्रीकेलिए कहा गया है । यहां ‘ कोटि'का अर्थ ‘ करोड़ ' नहीं, किन्तु ' चरमसीमा ' अर्थ है । ' त्रयस्त्रिंशत्कोटि देवता ' के ' कोदि ' शब्दको डा. सम्पूर्णानन्द ' वर्ष ' अर्थ करते हैं । पुराणोंमें ' कोटि ' आदि शब्द्रा वहुः अर्धमें श्री Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) [ १ ER 1 । देखो ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ८५-८६ | पदस्याभूत आते हैं अतिरिक्त यादव उस समय सारी पृथ्वीपर छाये के विशाल इसके हुए द- थे । आजकल जैसे स्थानकी न्यूनतासे धनिक लोग आकाशकी अत्यन हीं ओर दौड़ रहे हैं, जैसे कि अमेरिकामें ५०–५० मंजिलोंके । उन भी सुने जाते हैं, वैसे प्राचीनकाल में भी कुछ असम्भव प्रकारकी मकान नहीं । उस समय तो आकाशसे ऊपर बुलोक में भी स्थिति को चालकोंके जाती थी । आजकल भी चन्द्रमा वा मंगलमें जमीनें रिज़र्व नके साथ की जा रही हैं । बल्कि श्रीकृष्णभगवानने तो समुद्रपर भी द्वारकापुरीको विश्वकर्मा ( देवशिल्पी ) द्वारा बसा दिया था; आदि आते होंगे; अन्तःसमुद्रेळे ' नगरं कृत्स्नाद्भुतमंची करत् ' ( १०/५०/५० ); तब करते देवकल्प यादवोंके लिए ' असम्भव ' शब्दका प्रयोग ठीक नहीं । बोस - एक नील सेना के विषय में यह जानना चाहिये कि आजकल स.घ..कहा जाता है कि हमारे भारतकी ४० करोड़ सेना है । सो सभी पड़ी पर ' भारतरक्षा प्रेमी भारतीयोंको भारतीय सैनिकरूपसे कह दिया जाता है; इसी प्रकार सभी भूमण्डलभरके यदुवंशी एवं भिन्न मना के लोग देशरक्षार्थ उग्रसेन के साथ थे, सैनिकों के सभी सम्बन्धी वश्यक - वा. नौकर भी सभी देशरक्षाव्रती होनेसे सैनिकोंमें ही माने न्त्रायाः ' जाते थे, पृथक नहीं । अतः विचारदृष्टि होनेपर यह सभी सन्देह या है । निराकृत हो सकते हैं । अथवा वादी तंग खोपड़ीवाला होने से र्थ है । ' यह न समझ सकें; तब हम उसके आगे एक सुगम दृष्टिकोण वर्ष ' रखते हैं । वह यह है कि - सिखोंके गुरु गोविन्दसिंह अपने एक सें. श्री भी सिखको सवा लाख की संख्यावाला कहा करते थे । ' चिड़ियासे CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराण एवं चेदकी प्रतिशयोक्ति समान [ ६७३ मैं बाज लड़ाऊँ । सवा लाखसे एक लड़ाऊँ ' इत्यादि श्रीमद्भा. में ' तन्निग्रहाय हरिणा । सो जब ४४ ) दैत्योंके प्रोक्ता देवा यदोः फुले ' ( १०/६०१ निग्रहकेलिए यदुवंशमें देवताओं की उत्पत्ति बताई है, तब वे थोड़े होते हुए भी इतनी संख्याकी इतनी असीमित संख्यावाले शक्तिवाले होनेसे करना कहे जाएँ; तब उसपर भी शङ्का वादीके दिमागकी अत्यन्त निर्वलता सिद्ध बेदमें इन्द्रके द्वारा वर्ची नामक करता है । पुत्रोंका दैत्यके सौ हजार ( एक लाख ) मारना कहा है - ' यो वचिनः शतम् इन्द्रः सहस्रम् ( ऋ. २/१४१६ ) जब एकके एक लाख पुत्र वेदानुसार अपावपत् ' तब एक - एक यादवके भी इसी हो सकते हैं; प्रकार बहुतसे पुत्र हों, तब ५६ करोड़ यादवोंकी पुत्रसंख्या, शिक्षकोंकी संख्या तथा सैनिकोंकी संख्या में वेदविरोध क्या पड़ेगा यह वादी श्रच स्वयं बतावे उन एक लाखको फिर इन्द्रने अकेले मारा - यह वेदकी । शयोक्ति यदि वादीके समझ आ सकती श्रुति-है; तो पौराणिक-अतिशयोक्ति भी उसे समझ श्रा जानी चाहिये । ( १४ ) पू- शिवलिङ्गपर चढ़ी हुई वस्तुको छू लेनेपर स्नान करनेका विधान है । शिवनिर्माल्यको कुएँ में फेंक दे ( पद्म.पा.खं. : ११४/२०४ ) शिवका प्रसाद मद्य - मांस वा विष्ठाके समान है । ( पद्म.उ.खं.. २५५.७१,१०४-१०७ ) । ( ख ) ' मधुकुम्भसह स्तु मांसभारशतैरपि । न तुष्यामि वरारोहे! भगलिङ्गामृतं विना ' ( कुलार्णवतन्त्र ८ उल्ला. ) शिवं कहते हैं - मैं ' भगलिङ्गामृत ' ( रज-वीर्य ) से सन्तुष्ट होता हूँ । शिवालय में इवनादि नहीं करना Gujarat • स . An ०० eGangotri ४३ Initiative
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६७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) चाहिये ( भविष्य.ब्रा. २१०।५५ ) । ( ग ) जो भस्म आदि धारण करेंगे; वे नरकमें पड़ेगे ' ( पद्म.उ. खं. २६३ वा २३५ अध्याय ) । शिव लिङ्गपूजकों को घोर दुःख मिलेगा ( देवी ) । उ०- - शिवनिर्माल्यकी निन्दा वैष्णवोंकेलिए इष्ट है । वह एक देवमें निष्ठास्थापनार्थ है । इसे अर्थवाद कहा जाता है । स्वा.द.से भी मान्य चाणक्यनीतिमें कहा गया है- ' पादशेषं पीत-शेषं सन्ध्याशेषं तथैव च । श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ' ( १७ | ११ ) इसमें सन्ध्याके बच गये हुए जलको श्वानके मूत्रके समान अपेय एवं अग्राह्य बताया हैं; तब क्या सन्ध्याका बचा हुआ जल सचमुच कुत्तेके पेशाबके समान अस्पृश्य हो जाता है? नहीं । ‘ उसका पीनेके कायेमें सर्वथा प्रयोग नहीं करना चाहिये ' केवल इस बातका कड़ाईसे पालन कराने के लिए ऐसे भयानक अर्थवाद प्रयुक्त किये जाते हैं । इसके अतिरिक्त शिव हैं तमोगुण एवं प्रलय के देवता; तब सत्त्वगुण के अधिष्ठाता विष्णुके भक्त उधर जाकर कहीं हानि न उठा बैठें; इसलिए शिवसम्बन्धी वस्तुओं के उपयोगके निषेधार्थं ऐसे कड़े अर्थवाद लिखे जाते हैं । विषके कीड़ेको अमृतके सेवन करानेसे और अमृतके कीटको विष सेवन करानेसे उन कीटोंका अनिष्ट ही हुआ करता है । इसलिए वैद्य लोग भी रोगीकी प्रकृति देखकर उसकेलिए तदनुकूल ओषधि तथा पथ्यकी व्यवस्था करते हैं । कड़े निषेधके विना निषेध्यसे प्रवृत्ति छूटती ही नहीं । जब तक वैद्य रोगीको किसी अनिष्ट वस्तुके सेवनसे CC - 0. Ankur Joshi Collection घर्थवाद तात्पर्य देखो, ( छ) मृत्यु आदिका डर नहीं दिखलाता; तब तक रोगी नहीं छोड़ता । पुराणोंके भयानक निन्दार्थवादोंका उसका प्रयोग तात्पर्य समझना चाहिये । उनके शब्दोंके कार्थ इसी प्रकार बद्र चाहिये । वैसा अर्थ तो बच्चे समझते हैं विद्वान नहीं देखते रहना मान प्रकृत - प्रकरण में यह परिहासार्थ कहा गया, है देखो नहीं । वस्तुद शिवभक्तोंके लिए तो शिवपुराण में शिवका; ( १ ९ ४ | २०२ ) || चल ( विद्येश्व. २२ / ३-४-८ ) । पद्मपुराण में भी ' अमुक्त प्रसाद ग्राह्य कहा? निव त्वचो भुक्तं चापि कृपा तव ' ( ५।११४ । २०५ ) उसका खाना भी कहा है । । वे खेच पद्म. ( उत्त, २५५/१०४ - १०७ ) में शिवनिर्माल्यकी अपमानित भृगुद्वारा क्रोधवश की गई है 1 । सो वह निन्दा । अप होनेसे शिवभक्तोंकेलिए कथन वैयक्ति ग्राह्य नहीं है । क्रोधमें किसी व्यक्ति गाव द्वारा कही हुई बात वैयक्तिक होती है, उसका सार्वत्रिक महत्त नहीं होता । वहां विष्णु की महिमा इष्ट होनेसे विष्णुमें निष्ठा स्थापनार्थ भृगुने शिवनिर्माल्यकी ह निन्दा की है । उसमें ताप श्र लेना चाहिये कि वह वैष्णवोंसे अग्राह्य है, शैवोंसे नहीं । उपव स्वा.द.ने ही क्रोधवश व्यासजी आदिको कसाई; गवरगंड, पोष दिन आदि सैकड़ों गालियाँ दी हैं, कई व्रतोंकी उन्होंने निन्दा की है, सम ' रुद्राक्ष की माला पहनना उनने जंगली व्यवहार माना है, यद्यपि मान यह सब वे पहले स्वयं करते ही थे [ तब शायद वे जंगली होंगे! ग्रह पर यह नहीं कि उनकी बात सभीकेलिए ग्राह्य ही हो; श्रौर नही सभी शैव रुद्राक्ष आदि पहनना बन्द कर दें । बल्कि, स्वा, जी भी किसी जमाने में शैवों की भस्म लगाते थे; रुद्राक्षकी मात भया Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकं ( E ) ७६ ] सका वयं भी पट्टरते थे, और दूसरोंको भी पइराते थे । आज तो इसी प्रयोग पहरनेसे रक्तचापकी बीमारी दूर हो जाना प्रकार है । सो दयानन्दी - साम्प्रदायिकोंके अतिरिक्त शेष खते रहना माना जाता भिन्न अपना वैयक्तिक स्वेच्छाचारी सम्प्रदाय वस्तु शैव आदि सम्प्रदाय, २४/२०२ वाले स्वा. द. का महत्त्व नहीं मानते । श्रतः स्वा. दु. से ॥ चलाने बातें शैव आदियोंमें निन्दित नहीं मानी जातीं । कहा है निन्दित की हुई वचने स्वा.द.से की हुई उस निन्दाको केवल एक क्रोधी एवं कहा है । । स्वेच्छाधर्मी व्यक्तिकी बड़बड़ाहटमात्र मानते हैं । वादीसे की जि अपमानित होकर कोई व्यक्ति वादीको क्रोधवश गालियोंकी - वैयक्ति बौछार कर दे; तब क्या वादी अपने पर दी जाती हुई उन व्यक्तिगालियों को सच मान लेगा? इस प्रकार क्रोधवश भृगुकेद्वारा महत शिवनिर्माल्यकी की हुई निन्दा भी वैयक्तिक होनेसे सबके लिए में निप्राा नहीं । मंगलवार भक्त लोग श्रीहनुमान्का प्रसाद नुग्रदी में तार्थ श्रादि खाते हैं; पर उस मंगलके दिन एकादशी श्र पड़े; तो नहीं । उपवासव्रती हनुमान के भक्त होते हुए भी उस ( नुग़दी ) को उस गंड, पोष दिन नहीं खाते । इससे वह श्रीहनुमानका अपमान भी नहीं हाकी है, सममते । इसी प्रकार - ' नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नान्ति , यद्यपि मानवः । स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ' ( मनु. ५२३५ ) होंगे ग्रह मांसभक्षी के लिए कहा हुआ पद्यं श्रमांसशीपर कभी लागू 7 श्री नहीं होता है । बा.६. जी. ' शिव निर्माल्यको मद्य, मांस, विष्ठाके समान ' कहना यह जे मात्र भयानकं निन्दार्थवाद है । इसमें वैष्णवों के लिए अग्राह्यताका CC - 0. Ankur Joshi Collection, Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार [ ६७७ तात्पर्य है, इसका यथाश्रुत अर्थं नहीं । श्री देवेन्द्रनाथमुखोपाध्याय-के लिखे स्वा. द. जीके चरित्रमें स्वा. द. जीका एक व्याख्यान लिखा है कि - पञ्चमहायज्ञोंके बिना किये जो भोजन करना है, वह ' गोमांसभोजन ' है I । सो स्वा.द. जिनके यहां भोजन करते थे; वे . सभी पञ्चमहायज्ञ करनेवाले नहीं थे; तब क्या स्वा.द. उनके यहां ' गोमांसभोजन ' करते थे? वादी भी पूरे पञ्चमहायज्ञनहीं फरता, तब क्या वह भी ' गोमांसभोजी ' है? वस्तुतः एतदादि-स्थलोंमें निन्दार्थंचाद हुआ करता है, शब्दोंका यथाश्रुत अर्थ नहीं हुआ करता । व्रतोंकी पुस्तकों में लिखा है कि - ' एकादशी के दिन जो चावल खाता है, वह कीड़े खाता है, जो उस दिन अन्न खाता है, वह पाप, खाता है '? वादी एकादशी का व्रत नहीं करता; तब वह उस दिन चावल खाता हुआ कीड़े खाता है? यदि वह कहे कि -यह भयानक निन्दार्थवाद उन व्रतोंको माननेवालेकेलिए है, हम दयानन्दियोंके लिए वह प्राह्म नहीं; इस प्रकार वादी यहां भी समझे कि - वैष्णव पद्म - पुराणके शिवनिर्माल्यके निन्दार्थवाद चैष्णचोंकेलिए हैं कि - वे उसका प्रयोग न करें, शैवोंकेलिए उसका निषेध नहीं । इस प्रकार शिवपुराणके निन्दावचन भी समाहित समझ लो । ( ख ) ' भगलिङ्गामृतं विना न तुष्यामि ' यह तन्त्रका पद्य है । तन्त्र - शास्त्रमें मद्य, " मांस, मीन, मैथुन, मुद्रा आदि शब्द पारिभाषिक होते हैं । इस विषय में ' आलोक ' ( ५ ) ( पृ. ७६८-८०५ ). An eGangotri Initiative
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६७८ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( ९ ). देखें । वहां ‘ वालरण्डाबलात्कार, गोमांसभक्षण, वारुणीपान, मैथुन ' आदि शब्दों की परिभाषा भी बताई गई है । भग तथा परिभाषा तो शिवपुराण में भी लिखी है । इसके लिए लिङ्गकी ' आलोक ' ( ७ ) देखो । अथवा - ' लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं । शिवशक्तयोश्च चिन्हस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते ' ( शिव. गमयतीत्यदः विद्ये. १६।१०७ ) इत्यादि परिभाषा देखो । इस प्रकार ' भगलिङ्गा-मृत ' भी तन्त्रशास्त्रका परिभाषिक शब्द है । इन सबकी परिभाषाएँ निर्वाणतन्त्र, मेरुतन्त्र आदिमें बताई गई हैं । आशा है - वादी उनका स्वयं ज्ञान बढ़ावेगा, दूसरोंको व्यर्थं भ्रममें नहीं डालेगा । इस विषय में आगे भी लिखा जावेगा । ( ग ) जो कि भस्म आदिके धारणसे निरय - पात दिखलाया है, वह ' निरय ' शब्द भी पारिभाषिक है । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६३३, ६६७ पृष्ठोंकी टिप्पणी देखो । भिन्न देवके पुराण में उससे भिन्न देवकी निन्दा चाहे उसी देव - द्वारा भी की गई हो, उसका भाव ' नहि निन्दा निन्द्य ं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु निन्दिताद् इतरं स्तोतुम् ' ' इस न्यायसे अपने विधेयकी स्तुत्यर्थ हुआ करता है । इस शास्त्रीय शैलीका ज्ञान वादीको रखना चाहिये, नहीं तो वह अपनी ही लघुशङ्काओं में डूबता - उतराता रहेगा; और अपनी दीर्घशङ्काओं से तो बेचारा दव जाता रहेगा । ( १५ ) पू- ऐतिहासिक शोधकर्ता तथा भाषा - विज्ञान के विद्वानोंने पुराणोंका ‘ रचनाकाल गुप्तकाल के लगभग माना है । ( ख ) पुराणोंमें जैन व बौद्ध धर्मको वर्णेन मिलता है, जैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में जैन धर्म (? ) कि = नमस्ते ' गूढ देहाय वेदनिन्दाकराय च । योगाचार्याय बौद्धरूपाय मापते! ' ( शिव रुद्र. युद्ध. १६/११ जैनार । ) ( ग ) ( जिनवर समास्थाय वेदवाहा ' स वेदवित् ( बृहस्पतिः ) ( मत्स्य । ' नाभेः पुत्रश्च ऋषभः, ऋषभादू भरतोऽभवत् । तस्य. २४४७ ) । वर्ष भारतं चेति कीर्त्यते ' ( स्कन्द महेश्वर कौमारखं नाम्ना लि नाभिराजाकी पत्नी मेरुदेवी से ऋषभदेव,. ३७५४ ) । - हुआ ( लिङ्गः.पू. १५ १६-२० ) । ( घ ) रेखाः ' प्रसादवखाभा व युस्ताथवर ( स्कन्द. फाशी. ३७/७७ ) यहां ' तीर्थङ्कर ' शब्द जैनधर्म सुतम् । air वाची है । ( ङ ) न वदेद् यावनी भाषां । ( उर्दू )... | न गच्छेद् जैनमन्दिरम् ' ( भविष्य. प्रति ३२८ ) । जैनमवनिन्दा-( पद्म.भूमि. २ | ३८ | २६-२७ ) । जैनधर्मकी व्याख्या- " प्रर्हन्तो देखा ' यत्र निर्मन्थो दृश्यते गुरुः । दया चैव परो धर्मः... क्षपणस्य वा पूजा अर्हते ध्यानमुत्तमम् । अयं धर्मसमाचारो जैनमार्गे प्रहरवते । ह • एतत्ते सर्वमाख्यातं जैनधर्मस्य लक्षणम् ' ( पद्म. भूमि. ३७ / १७-२६ ) । ( च ) ( बौद्धागमविनिर्दिष्टान् धर्मान् वेदपराँस्तथा । ' ( शिव.द. । उ युद्ध, शं ३५ ) ' दशकोट्यः स्मृता आर्या बभूवुः बौद्धमार्गिएर ि ( भविष्य, प्रत्ति, ४ । २० । ३०-३३ ) । ( छ ) ' ततः कलौ सम्प्रवृत्ते संमोहन ह सुरद्विषाम् । बुद्धो नाम्ना जिनसुतः की कटेषु भविष्यति ' ( भाग - ११३/२४ ) इस निन्दा - स्तुतिसे स्पष्ट है कि पुराणोंका रचनाका व जैन वा बौद्धधर्मकी स्थापना के बादका है । आश्चर्य यह है ि न वेदविरोधी बुद्धको भी पौराणिकों द्वारा विष्णु के अवतारोंमें सम्मिलित कर लिया गया है । सर Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ६८० ] यि जैनाव उ०- ( क ) शोधकर्ता भाषा - विज्ञानके आजकलके विद्वान् तो ' जिनदथे के प्रथम और दशम मण्डलको तथा अथर्ववेदको भाषा-। सिद्ध करके अर्वाचीन मानते हैं; तब क्या वादी उनकी २४१४० भेद म्ना बात मानता है? यदि नहीं, तब हम पुराणविषयक उन- शोध-लिए । कर्ताका अशुद्ध मत क्यों मानें? ' ऋषभ आदि हमारे ही थे । ३७५० ) मन्त्रोंका ऋषि भी ' ऋषभ ' है; तब क्या उसे वादी जैनों क्र. पू. ४५ कई बाला मान लेगा? वहांपर ' ऋषभ ' के लड़के ' भरत ' से ' भारतवर्ष ' जैनधर्म बनाना कहा है; यह वादीके दिये स्कन्द तथा लिङ्ग पुराणके ( ख ) वचन में ही स्पष्ट है; तब क्या वादी भारतवर्षेके ' भारत ' नामको निन्दा- जैनियोंके - गुरु से दिया मानता है? यदि यह नहीं; तो वह भी न्टो देवता नहीं । ' ऋषभ ' का लिङ्ग पुराण में परमात्मा में ध्यान कहा है, ' जिन ' में यस्य या नहीं । अतः यह ' ऋषभ जैन नहीं । ऋषभ आदि हमारे ही प्रहरखते हैं, जैनोंने उन्हें अपना लिया । जैसे हमारी रामायण है, उसमें १७२६ हनुमान् आदिको उनने अपने पात्रोंमें शामिल कर दिया, शिव, ट. उनकी उत्पत्ति में भी कुछ भेद कर दिया । तब क्या वादी अपने मार्गिय विद्वान् माने जाते हुए हनुमान् तथा रामादिको जैनोंसे आया संमोहाव हुआ मान लेगा? ' ( भाग ( खं ) बृहस्पतिका जो जिन- धर्मका अवलम्बन कहा गया है, चनाका वहां ' जिन ' से ' नास्तिक'का भेद इष्ट है, वर्तमानका बुद्धधर्म यह है नहीं । स्वा. दु. जीने भी अपने ' उणादिकोष ' में ' जिन ' का अर्थं बातें ' नास्तिकभेद ' ( ३२ पृ. ३१ ) किया है; बौद्ध नहीं । स.प्र. के १२ समु.के आरम्भमें भी स्वाद जीने । वेद - बाह्य बृहस्पतिको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पुराणों में जैनधर्मका समाधान [ ६८१ ' नास्तिकमत ' ही कहा है, ' बौद्ध ' नहीं । स.प्र. ( १२ पृ. २५६ ) में वृहस्पतिको ' चारवाकमतप्रचारक ' कहा है; ' बुद्धधर्मप्रचारक ' नहीं । पृ. २५६ में स्वा.द.जीने ' चार्वाक और जैन - बौद्धों का परस्पर भेद दिखलाया है । तब वादीका पक्ष गलत हुआ । नास्तिक मत भी अनादि चला आता है, सृष्टिकी आदि में स्वा.द.से मानी हुई मनुस्मृतिमें भी ' नास्तिक'का उल्लेख है । .. ( ग ) ' अन् ' शब्द वेदाङ्ग पाणिनि - अष्टाध्यायी ( ३ | २ | १३३ ) में भी सिद्ध किया है । सं. ( २/३/१, ३ | ३३ | १०, ७ | १८२२, १०/२/२; ६६/७ ) में भी ' ईन् ' आया है; तब क्या वादी वेदोंको भी बौद्धों बाद वनाया गया मानेगा? ' जिन ' का अर्थ है ' जयति ' । उसकी सिद्धि ' इण् - सिन् - जि ' ( ३।२ ) इस उणादिसूत्रसे नक् प्रत्यय करनेपर होती है । सो यह जयशीलका नाम है । सो भगवान्ने अन्यायी दैत्योंको माया - मोह में डालकर मोहित करके जीत लिया- इसलिए उनका नाम ' जिन ' पड़ा; उसीको पुराणोंने अनूदित किया है । पीछे फिर उस मतको अन्य लोगों-' ने ले लिया; नाम भी वही ले लिया; पीछे उनका सम्प्रदाय - चल निकला । फलतः पुराण उस साम्प्रदायिक- जिनमतसे पूर्वके सिद्ध हुए । मतमतान्तर तो पीछे चलते रहते हैं । बृहदारण्यक ( २ | ४ | १० ) तथा ' शतप्रथना. ( १४ | ५ | ४ | १० ) में ऋग्वेदादिकी भांति -इतिहास - पुराणोंको भी परमात्माका निश्वास माना है । इतिहास-पुराणसे ब्राह्मणभाग जो पुराणेतिहासका मूल है, का भी ग्रहण • होता है, पुराणों का भी । इसीलिए गोपथ ( पू. २/१० ) में ' पुराण ' An eGangotri Initiative
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६८२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) को ब्राह्मणसे भिन्न भी बताया है । सो जैसे परमात्माने ' ये च पूर्व ऋषयो ये च नूला इन्द्र! ब्रह्माणि जनयन्त विप्रा: ' ( ऋ. ७।२२।६ ) ' उतो घा ते पुरुषा इदासन् येषां पूर्वेषामशृणोऋषीणाम् ' ( ऋ. ७ । २६।४ ) आदि मन्त्रोंमें पीछेके ऋषियों के प्राचीन अर्वाचीन दो भेद भविष्यद्दृष्टि से बना दिये; वैसे परमात्माके अवतार व्यासजीने भी पीछेके कई सम्प्रदायोंका भी भविष्यद्दृष्टिसे पहले ही वर्णन कर दिया । यह जब वादी ठीक - ठीक समझले, तब उसका भ्रम हट जायगा । वह और देखे -' स्वा. द. जीने ' तरुतारं रथानाम् में तारयन्त्रका वेदमें निरूपण किया है, ' द्वादश प्रधयः चक्रमेकं ' स्वा.द. जीने ' हवाई जहाज ' का निरूपण वेदमें बताया है । अब अंग्रेजी जमाने में यह दो यन्त्र बन गये; अब इसमें क्या वादी यह मानेगा कि वेद इन यन्त्रोंसे पीछे का बना? इसी प्रकार सृष्टिके आदिमसाहित्य पुराणके जिन - बुद्धधर्म आदिके विषय में भी जानकर वादीको अपने - भ्रम दूर कर लेने चाहियें । ( घ ) अथवा पुराणोंमें इन्हीं वर्तमान जिन बुद्धके नाम मानने का ही आग्रह हो; तो यह स्मरण रखना चाहिये कि -श्रीमद्भागवत पुराण सब पुराणोंके बाद प्रकट हुआ माना जाता ' है; उसमें ' बुद्धो’'भविष्यति ' ( १ | ३ | २४ ) इसमें ' बुद्ध का वर्णन -भविष्यत् कालमें है; इस प्रकार उससे पूर्वके पुराणों में जहां बुद्ध-जिन आदि मिलें; उनमें भी भविष्यत्काल समझना चाहिये । ' जैसे किं ( पूर्व कहे वेद - ( ' ये च पूर्वे ऋषयो, ये व नूतनाः '. पुराण में भविष्यका निरूपण [ ६६३ ७२२६ ) वचनमें प्राचीन तथा अर्वाचीन ऋषियों का भविष्यद् दृष्टिसे निरूपण कर दिया गया है । यदि कहीं उनके पुराण भूतकाल दीखे, वहां ' कल्किपुराण ' की भांति वर्णनमें समझना चाहिये | कल्की अवतार अभी नहीं हुआ, फिर भी पुराण में वर्णन मिलता है । बल्कि कल्किपुराण इसके लिए उसका भी बना हुआ है, उसमें कल्की की लीलाएँ भूतकालमें पृथक् । लिखी हैं । कल्की अवतार अभी नहीं हुआ । कलियुग के अन्त में होगा; तब भी उस भविष्य में होनेवालेमें भी भूतकाल है । यहां भी वैसे समझें । अन्य भी वेदवचन वादी देखे- ' इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ' ( यजुः ४० | १३ ) मन्त्रका अर्थ स्वा.द.जीने किया है- ' जो विद्वान् लोग हमारेलिए व्याख्यापूर्वक कहते थे …… इस प्रकार उन आत्मज्ञानी विद्वानोंसे उन वचनों को हम लोग तेथे यह भूतकाल है; तब क्या यजुर्वेद उन श्रात्मज्ञानी विद्वानोंसे पीछे का बना हुआ है? इसका जो उत्तर वादी देगा; वही उत्तर पुराणके भूतकालका भी हो जायगा । ( ङ ) शिवपुराण में भगवान् विष्णुका बौद्धरूपधारण कहा है, सो वहां विष्णुका कल्की रूप भी बताया है । इससे स्पष्ट है ' कि यह वर्तमान जैन - बौद्ध वहां इष्ट नहीं हैं; इसलिए बहुपर ' मा - पते! ' ( लक्ष्मीपते! ) ( रुद्रसं. युद्ध. १६ ११ ) आया है । कही भविष्य आदि पुराण में ' वैदिकधर्मी ' शब्द वा आर्यधर्माण '! ' शब्द आ जावे; तो वहां आजकल के दयानन्दी इष्ट नहीं हो: अपने पीछे चलाकर अपनी निर्मूल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative