सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 361–370
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 361–370
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) [ ६ ९ ३ ६८४ ] विष्यद्- खड़ी कर दी हैं; न वह पुराण दयानन्दियोंसे पीछेका वर्णनमें कल्पनाएँ है । वेद सृष्टिकी आदिमें हुआ माना जाता है; तथापि हो जाता वेद की उत्पत्ति, वेद में ' अग्निः पूर्वेभि षिभिरीड्यो नूतन -सममता... वेद उसका त ' ( ऋ. १/१/२ ) प्राचीन तथा अर्वाचीन ऋषियों ( आर्यसमाजा-ए ( वेदमन्त्रार्थ- द्रष्टा - अग्निवायु आदि ) का संकेत, तथा पृथ नुसार खी हैं । सूर्य - चन्द्र आदियोंका वर्णन भूतकालिक लङ्लकार द्वारा ( ऋ. होगा;.१ / १६ ०/३ ) वणित है; इससे क्या वादी पुराणकी भांति वेदको यहां मी भी उनके पीछे बना हुआ मान लेगा? | तब तो वैदिकप्रकाशन के धीराणां सर्वे सर्वाकी बुद्धि स्तुत्य (? ) है । दोनों स्थान समान उत्तर द. जीने होगा । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. २०४-२०६ ) तथा ( पृ. इते.. ३८५-३८८ ) देखो । म लोग पुराणॊके सम्पादक श्रीव्यासजी ईश्वरके अवतार थे, यह मज्ञानी स्वा. दु.जीने स.प्र. १४ समु. पू. ३४५ में लिखा है - ' पुराणी देगा पुराणोंको खुदाके अवतार व्यासजीका वचन समझते हैं? ( ३० ); तब ईश्वर की सर्वज्ञता तथा भविष्यज्ञातृत्व के विषय में भी स्वा. दु. का कहा है वचन १३ समु. पू. ३०३ ( १२ ) में देखो - ' वह ईश्वर ही नहीं, जो स्पष्ट है सर्वज्ञ न हो, न भविष्यत् की बात जाने, वह जीव है ' । संस्कारवि. वहाँपर की ईश्वरस्तुति ( पृ. ७ ) में ' धामानि वेद भुवनानि विश्वा ' ( यजुः 1. कहीं | ३२ | १० ) मन्त्रका ( अर्थ स्वा. द. जीने यह लिखा है- ' वह परमात्मा नण:!:: सम्पूर्ण लोकमात्र और नाम, स्थान, जन्मोंको जानता है ' । जब ऐसा है, तब पुराण में भी परमात्मा के अवतार श्रीव्यासजीने निर्मूतभविष्यदृष्टि से क्योंकि महाभारतमें व्यासजीको ' अतीन्द्रिय॒ज्ञान ’ CC - 0. Ankur Joshi मत - मतान्तर अनादिकालसे [ ६८५ ( १ | १०६ ८ ) वाला कहा है - इन सम्प्रदायका नाम तथा जन्म आदि लिख दिया; तब आशङ्काका क्या अवकाश रहा? स्वा.द. आदिका नाम इसलिए नहीं लिखा कि - वे वेद माननेपर भी वेदके अर्थं अशुद्ध एवं परमात्माकी इच्छासे विरुद्ध स्वेच्छा-नुसार करते थे । ( च ) इसके अतिरिक्त मत - मतान्तर तो अनादिकालसे चले आते हैं, उनमें परिवर्तन - परिवर्धन वा रूपान्तरीकरण, नामान्तर आदि जाया करते हैं । जैसे कि दयानन्दी - समाजको जो अपनेको वैदिकधर्मी कहता है - जिसका आरम्भ सं ० १६३२ से वा १६४० के वादसे हुआ— इसमें उदाहरण समझ लेना चाहिये । यह बेदके समय थोड़े ही हुआ है? इसने आजकलकी सामयिक - विचारधारा अपनाकर भी अपना नाम वही प्राचीन ' वैदिकधर्म ' रख लिया । इस प्रकार यहां भी समझ लेना चाहिये । शिव पुराणमें उसी ' अरिहन ' को जो विष्णुके श्रद्धोंसे उत्पन्न हुआ था ( रुद्र. युद्ध. ४७ ) विष्णुने कहा था ' मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम् ' ( ४।२२ ) इसमें भविष्यतकाल दिया है, और कहा है कि-कलियुग आनेपर अपने धर्मको प्रकाशित करना ( ४ | २०-२१ ) फिर यह फैल जायगा । इससे पुराणकी अनादिता तथा वर्तमान जैन - बौद्धोंसे सुबहुप्राचीनता सिद्ध हो रही है । उसी प्राचीन-धर्मको कुछ उसमें रूपान्तर करके ( जैसे कि - प्राचीन वैदिकधर्मं-में रूपान्तर करके दयानन्दियोंने इसे १६४१ संवत्से जारी किया ) गृहीत किया, क्या यह सम्प्रदाय वैदिककालका है? Collection - Gujarat. An eGangotri Initiative
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६८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं । इसे उन्होंने वैदिककालसे रूपान्तर करके सं ० १६४१ से प्रचलित कर दिया । वैसे ही श्राजकलके जैनी भी हुए । यह वे श्रारम्भिक जैनी नहीं । इससे पुराण अर्वाचीन सिद्ध न होकर प्राचीन सिद्ध हुए । सो उसी प्राचीन - मतको अर्वाचीन लोग रूपान्तर करके ले लिया करते हैं, नाम भी वही रख लिया करते हैं । इससे वादा जैसे खण्डन - व्यसनियों वा अल्पश्रुतोंको भ्रम हो जाया करता है । वेदमें नास्तिकमतका संकेत भी है, जिसे इन्द्रने काटा हैं, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि - वेद उस मतके प्रचारक चार्वाकसे पीछे बने हों । ( छ ) ' यवन ' एक प्राचीन जाति थी, पर स्वा. द. आदि, आज-कलके मुसलमानोंका नाम यवन कह देते हैं; पर यह शब्द स्वा. द. के अनुसार सृष्टिकी आदिमें बनी ' मनुस्मृति ' तथा महाभारतसे कुछ पीछे की बनी अष्टाध्यायी में भी आता है; तब बादी जैसे अल्पश्रुतोंको भ्रम पड़ जाता है । अब वादी बतावे . कि- मनुस्मृति तथा अष्टाध्यायी क्या मुसलमानी ज़मानेके बाद बनीं? दोनों स्थान समान उत्तर होगा । एतदर्थं ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. ६४४-६४७ ) देखना चाहिये । ( ज ) यह भी याद रखना चाहिये कि - प्रत्येक शब्द एक ... विशेष - संज्ञा होने से पहले भी अपनी सत्ता रखा करता है । यदि ऐसा न हो; तो विशेष - संज्ञा बन ही नहीं सकती । हाँ, यह हैं कि- विशेष - संज्ञा हो जानेके बाद जनता सामान्यरूपसे फिर CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में इतिहासका समाधान [ 19 उस पूर्व शब्दका प्रयोग करनेमें सकुचाने लगती संज्ञा होनेसे पूर्व उसका प्रयोग निस्संकोचता है; पर विशेष • से होता है । देखिये- ' आर्य ' और ' समाज ' शब्द प्राचीनकालमें समय पाकर ‘ आर्यसमाज ' शब्दने एक वतमान विद्यमान थे, दयानन्द सम्प्रदायविशेषकी संज्ञाका रूप ले लिया; तब सर्वसाधारण अपने लिए इस शब्द के प्रयोग में संकोच करने लगे लाग । नाटकों में तथा रामायण, भविष्यपुराणादिमें । इससे पूर्व आयें ' शब्दका प्रयोग निस्संकोच किया गया है । आजकलके दयानन्दी ६ नाम के साथ ' आये ' लिखने लग पड़े हैं जैसे ' श्रीराम अपने व तब क्या रामायण वा भविष्यपुराणादिमें, श्रार्य क श्रीराम आदिकेलिए भरत आदि द्वारा ' आर्य ' शब्द प्रयुक्त करनेपर रामायण म श्रीरामको भी दयानन्दी श्रीराम ' मान लिया जायगा? अथवा रामायण दयानन्दी - समाजसे पीछे की मान ली जावेगी? मा ( झ ) इस प्रकार ' हरिजन ' शब्द के विषय में भी जान लेना चाहिये । यह शब्द पहले हरिभक्तोंके लिए प्रयुक्त किया जाना रा था - यह वैष्णव पुस्तकों ' निम्बाक - प्रतनिणंय ' आदिमें प्रत्यक्ष नम है; गांधिजीने गो. गणेशदत्तजीकी सनातनधर्म - प्रतिनिधिसभा का पंजाब के पं ० रघुनाथदत्त बन्धुजीकी प्रेरणा से अन्त्यका वर्तमानमें ' हरिजन ' रख दिया, और गांधिजी के प्रभावसे यह लि नाम तूल पकड़ गया; तब कालान्तर में कोई ' निम्बार्कव्रतनिर्णय ' लि आदिमें ' हरिजन ' का प्रयोग देखकर वादी- जैसा समझदार जैस रिसर्चस्कालर (? ) यह फतवा दे दे कि यह पुस्तक गांधिजीके Gujarat An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( t ) 655 ] में बनाई गई है; ऐसे अनुसन्धाताकी बुद्धिका बाद सं. २००५ भी वृद्धि उससे पर विशेष जो मूल्य है, इस वादीकी कुछ कम नहीं । ( ब ) जैसे रामायण में प्रयुक्त हुआ ' बुद्ध ' शब्द ' यथा हि द्यमान थे चोरः स तथाहि बुद्ध " ( २/१०६/३४ ) सामान्य नास्तिकको वता दयानन्दी- हा है, बुद्धसम्प्रदाय वाले वर्तमान व्यक्तिको नहीं; वैसे ' जिन ' रण लोग श्रादि भी पुराण में सामान्य - नास्तिक समझकर उससे वर्तमान के इससे पूर्व जैनों का ग्रहण करना नासमझी है । इसलिए स्वा. द जीने . अपने शब्दला ' उणादिकोष ' ( ३२ ) में ' जिन'का अर्थ ' नास्तिक ' माना है, न्दी अपने वर्तमानके ' जैन, बौद्ध ' नहीं; क्योंकि वे नास्तिक नहीं । नास्तिक म श्रार्यः केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं, चार भूतोंके मिश्रण से चेतनता दिकेलिए मानते हैं, दान- तपस्या आदिको पाखण्ड मानते हैं, लण्डन के मा के हाईटपार्क ' को वे बुरा नहीं समझते, वे मुक्ति - स्वर्ग आदिको नहीं 1 श्रथवा मानते; पर जैन - बौद्धों का मत इनसे मेल नहीं खाता । ? ' ( न ) आजकल ' चैत्य ' बौद्ध - मन्दिरोंको माना जाता है, पर न लेना रामायण में श्रीरामने भरतको पूछा था कि- ' कञ्चित् ‘ चैत्यॉँश्च ना जाता नमस्यसि ' ( २।१०० / ६१ ) तब क्या राम बौद्ध थे कि - जो भरत-- प्रत्यक्षको चैत्यों ( बौद्ध - मन्दिरों ) को नमस्कार करने को कहा? यदि वे धिसमा बौद्ध थे, तो वे बुद्धको चोरकी भांति दण्डनीय कैसे कहते हैं का नाम ( २ / १०६।३४ )? इससे स्पष्ट है कि - पहले ' चैत्य ' देव मन्दिरोंके लिए श्राता था; फिर बौद्धोंके द्वारा अपने मन्दिरोंकेलिए अपना नि लिये जाने के कारण हम लोगोंने उसका प्रयोग छोड़ दिया । सवार जैसे गुरुकुल ' शब्द प्राचीन है, पर दयानन्दी - समाज द्वारा उसे घजी के CC - 0. Ankur Joshi श्रमणो शवरी ' बोद्ध नहीं [ ६८६ अपना लिये जानेके कारण सनातनधर्मी ' ऋषि - कुल, वा आचार्यकुल उसका प्रयोग न करके मनुस्मृति आदिमें वा ब्रह्मचर्याश्रम नाम रखते हैं; तब ' गुरुकुल ' नाम देखकर क्या उन दयानन्दी - समाजके पीछेका पुस्तकोंको मान लिया जायगा? ( ट ) ' श्रमण ' सामान्य संन्यासी इसका प्रयोग शतपथ वा तपस्वी का नाम है, रामायण में आता ( १४/७/११२२ ) तथा तैं. आ. ( २ राज १ ) एवं है । रामायण में शबरी नाम वाली ' श्रमणी ' ( तपस्विनी, संन्यासिन स्त्रीको बौद्ध थी? नहीं । वृहदा ) बताया गया है । तब क्या वह . ( ४/३/२२ ) में भी ' श्रमण ' शब्द ' ताप ' के साथ आया है । स्वा. शङ्कराचायेंने उसकी की, और ' ताप ' की नामवाली स्त्री [ न कि किन्तु ब्राह्मणी थी । ( वाल्मी. ३।७३ / २६ ) शुद्र वा भीलको नहीं व्याख्या ' परित्राजक ' ' वानप्रस्थी ' की की हैं । सो जसे वह शवरी भीलनी ] संन्यासिनी थी; बौद्ध नहीं थी; ' शबरी ' उसका नाम था ' शबरी नाम ' संन्यासका अधिकार ब्राह्मणको होता है, । इसपर ' आलोक ' ( ३ ) पुष्प देखो । फलतः पीछे वर्तमानके बौद्ध - संन्यासियोंने इस ( श्रमरण ) शब्दको लिया; और यह उन्हीं में संकुचित ( रूढ ) भी होगया; तव प्राचीन- अपना पुस्तकों में जहां श्रमण ' ' शब्द मिले; वह क्या बौद्धोंके बाद हुआ माना जावेगा? निष्कर्ष यह है कि- जब एक बना अर्वाचीन सम्प्रदायकी विशेष शब्द एक - संज्ञा हो जावे; तव सामान्यरूपसे प्रचलित उस पइलेके प्रयोगमें लोग संकोच करने लग जाते हैं । पर विशेष - संज्ञासे पूर्व उसका प्रयोग निस्संकोच हुआ करताहै । Collecton Gujarat स . An ० ध eGangotri ० ४४ Initiative
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६६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इस प्रकार ' जिन, बुद्ध ' आदि शब्दोंके पौराणिक प्रयोगमें रहस्य समझकर वादीको अपनी अल्पश्रुतता हटा देनी चाहिये । ( ठ ) वस्तुतः विष्णुका बुद्धावतार भी अनादि है, और वेद-निन्दाके बहाने वेदकी रक्षार्थं हुआ था, इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. १६३-२०६ ) देखो । ' अवताररहस्य ' में वादीने ' बुद्ध ' वा ' बौद्ध'को ' वैदिकधर्मी ' बताया था, और यहाँ उसे वेदविरोधी बताया है; अतः परस्पर- विरुद्धतासे या तो दो दयानन्दी श्रीराम मानने पड़ेंगे; या फिर विरोधवश उसका अपने - आपसे ही खण्डन हो गया । उसी अनादि - विष्णुके ' बुद्ध ' अवतारका नाम ' जिन ' भी है । देखो अमरकोष ( १ । १ । १३ ) । पीछे जैन बौद्धोंसे पृथक हो गये । वादीने पद्मपुराणका वचन ' एतत्ते समभिख्यातं जिनधर्मस्य लक्षणम् ' इस रूपमें लिखा है; पर वहां तो पाठ है-' निजधर्मस्य लक्षणम् ' ( देखो मोरका संस्करण भूमिखण्ड पृ. ११४ ), तब अनादि पुराणोंमें भी यदि विष्णु के अवतार बुद्ध - जिनका वर्णेन श्रा जावे; तो यह नहीं कहा जा सकता कि-पुराण आजकलके बौद्ध - जैनोंके बाद बने? इसी वस्तुस्थितिको वृतानेकेलिए हमने यह स्पष्टता की है । ' ब्रह्मसूत्र ' में जैन और बौद्धों का खण्डन भी आता है, पर इससे ब्रह्मसूत्र वर्तमान जैन-वौद्धोंके पीछे बना हुआ नहीं माना जाता । ऐसे वाद परम्परासे चलते आये हैं, पीछेके सम्प्रदायोंने कुछ अन्तर करके उनको अपना सिद्धान्तः बना लिया । इससे अल्पश्रुत लोगोंको भ्रम पड़ जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंमें जैन - बौद्धका समाधान ( ड ) इसी तरह ' तीर्थङ्कर ' शब्दके प्रयोगके समझ लेना चाहिये । स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें विषयमें पाठ है, ‘ तीर्थङ्करं ’ नहीं । छन्दोमङ्ग भी नहीं ' तीर्थकर तब भी वहां स्त्रियोंके लक्षण कहे गये हैं । अथवा हो भी स कि ऐसे लक्षणों स्त्री हो; तो ऐसी होगी, वा ऐसे लड़केको पैदा वाली शब्द वहां सामान्य हैं, जैनियोंके तीर्थङ्करकेलिए करेगी । सो वह सा नहीं । जैनियो फिर उन शब्दोंको अपना लिया; इससे वैसे शब्दोंको देखकर अल्पश्श्रुत - वादियोंको ऐसी शङ्का हो जाती है । पुराणाने । ( ढ ) पहले हम कह चुके हैं कि- रामायणमें ' शब्द भी आते हैं; तब क्या वादी उसे बौद्धकालके बुद्ध ' वा ' चैल मानेगा? फिर तो " वाल्मीकीय और चादर्श | स महाभारतादियोंमें जैनियोंद्र नाममात्र भी नहीं लिखा, और जैनियोंके ग्रन्थोंमें ' वाल्मीकी बेव और भारत में कथित राम - कृष्णादिकी गाथा बड़े विस्तारपूर्व | बद लिखी हैं, इससे यह सिद्ध होता है, यह [ जिन ] मत एस न [ रामायण - महाभारत ] के पीछे चला... जैन बौद्ध मत - कँद · शाक्तादि मतोंके पीछे चला " ( स.प्र.पू. २५५ ) अपने स्वा. द. जीवी इस उक्तिका भी खण्डन करे । यदि नहीं करता; तो रामावण्य बत महाभारत आदिसे पूर्व स्थित [ यह इन पुस्तकोंमें स्पष्ट है । पुराणोंको बौद्ध - जैनोंके पीछे के बने हुए मानने की अपनी उत्रि वादी खण्डित हुआ समझ लें । फलतः जैन आदितें ही कई बा हमारी ले ली हैं, जैसे मूर्तिपूजा । तथा २४ अवतार । हमारे बां ' अवतारा ह्यसंख्येयाः ' ( भांग. ११३ २६ ) अवतार असंख्य आते गये Gujarat: An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) ( ER 1 २४ संख्या प्रसिद्ध अवतारोंकी बता दी - तो जैनोंने विषय में हैं, पर हमने कर लिया । इससे जैनी हमसे प्राचीन सिद्ध नहीं श्री उनका अनुकरण ' तीर्थकर । अल्पश्रुतों को ही इसमें भ्रम पड़ता है । यहां पर हमने हो जाते भी सही पक्षकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है; अब वह उठ नहीं क्षणों वाली वादी सकेगा ॥ सो यह ( १६ ) पू- भविष्यपुराण में ' ईसामसीह ' ( प्रति.खं. ३।२२६ ), | लैनियन: मुसलमान ( खं. ३ अ. ३।२५-२७ ), सिकन्दर ( खं. ४ | ३ | ४६ ), पुराणो वैमूरलिङ्ग ( ४ | २ ), बाबर ( २२/४ ), हुमायूं ( ५ ), अकबर ( १४ ), तानसेन ( गानसेन २१ ), बीरवल ( २२ ), · तुलसीदास ( २८ ), वा चैल सुरदास. ( ३० ), रैदास ( ३६ ), मीरा ( ४१ ), सलीम ( ५१ ), वादी शिवाजी ( ५१-५२ ), · · नादिरशाह ( ५८ ), अंग्रेज ( ७२ ), लाडे जैनियोंका बेकेली ( ८५ ), का नाम आया है । यदि इनको भविष्यका वर्णन. ल्मीकीनं बताया जावें; तो फिर स्वाद, श्रीगान्धि आदिका नाम क्यों तारपूर्वक नहीं आया? मत इन उ ० - इस प्रश्नका उत्तर स्वयं वादीने दे दिया है कि ÷ संद भविष्यपुराण में वर्णित होनेसे ग्रह भविष्यका वर्णन है । भविष्य दजीकी बतानेवाली पुस्तक में भविष्यके भी सब नाम कैसे आ सकते हैं? सावरह फिर तो वादीका प्रश्न हो सकता कि इसमें शिवशंकर काव्यतीर्थ-स्पष्ट है । का वा श्रीरामका, वा कुशवाहाका नाम क्यों नहीं आया? उत्तिको वस्तुतः यह ' वेदविरुद्ध मत नगण्य होनेसे तथा एकदेशी होनेसे कई बा क्योंकिं - भिन्न देशोंमें इसको कोई जानता तक नहीं - इसकी नागये गिनती ही नहीं की गई । इस विषय में पूरा प्रत्युत्तर ' आलोक ' CC - 0. Ankur Joshi Collection: Gujarat. पुराणोंमें पशुबलि वा नरबलि (? ) [ ६६३ ( ६ ) पृ. ६४४-६४७ और ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २४६-२४८ आदि में वादीको देखना चाहिये । ( १७ ) पू. - पुराण में शिवप्रशंसा ( शिवपु. ) शिवनिन्दा ( मत्स्यपु. देवीभाग. ) । ब्रह्माजी की प्रशंसा ( मत्स्य ), ब्रह्माजीकी निन्दा ( ' सोपि विक्लवतां प्राप्तो दृष्ट्वा पुत्रीं सरस्वतीम् ' ( देवी. ४ २० । ३३ ) । विष्णु - प्रशंसा ( विष्णुपु. ), विष्णुनिन्दा ( देवीभा. ) । गणेशप्रशंसा ( शिवपु. ), गणेशनिन्दा ( देवीभा. ) । देवता वा ऋषियों एवं ब्राह्मणोंकी निन्दा ( देवीभा. ४ | १३ ) आदि परस्पर-विरोध बहुत है; अतः पुराण माननीय नहीं । श्रथवा एककी कृति नहीं । उ०- इस विषय में आलोक ' ' ( ७ ) पृ. २६१-२६६, तथा ३४५-३५८ देखने चाहियें । ब्राह्मणोंकी निन्दा विषय में प्र. १७५-२१५, तथा इसी नवमपुष्प ( पृ. ४७८-४८० ) में देखना चाहिये । ( १८ ) पू - पुराणों में पशुबलिका प्रदेश ( महाभाग: ४६।१६ ), मनुष्य - बलिका आदेश ( ब्रह्मवै २२६४/१०४ ), श्राद्धमें मांस ( विष्णु पु ० ३।१६: १-३ ) लिखा है । उ०- पशुबलि रजोगुणी एवं तमोगुणी आदि विशेष लोभियों केलिए वा विशेष प्रयोजन पूर्विके इच्छुकों के लिए है । इसमें ' आलोक ' ( ६ ) ( पू. ) ४१३, ४४५-४५४ ) तथा ( ३६७ पृ. ) देखो । श्राद्धमें मांस तमोगुणियोंकेलिए तथा अत्यन्त शीतल-देश रूस- यूरोप आदिके निवासियोंके लिए जानना चाहिये । वादी डाक्टर है, रोगियोंको ऐसी कई गोलियां देता होगा, An eGangotri Initiative
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६१४ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) जिनमें मद्य, मांसके रसका मिश्रण होता है । इस संसारमें सभी सात्विक नहीं होते, रजोगुणी, तमागुणी भी होते हैं । वे लोग यदि मांसादिका प्रयोग करेंगे, तब हम लोगोंके लिए कुछ अन्न बच जाया करेगा । जो कि मनुष्यबलिमें ' वर्षान्ते च समुत्सृज्य दुर्गायै तं निवेदयेत् ' ( ब्र. २।६४ । १०४ ) यह वचन दिया जाता हैं, इसका तात्पर्य उस मनुष्य के मारने में नहीं है; किन्तु उसे दुर्गाको निवेदन करके छोड़ देने में हैं, जैसे कि वृषोत्सर्ग में वृषको रुद्रको निवेदन करके उसे छोड़ देना पड़ता है; इस प्रकार ब्रह्मचारीको देवताओंको दिया जाता है, जैसे कि पारस्क.गृ.में ब्रब्रचारी-को ' प्रजापतये वा परिददामि, देवाय त्वा सवित्रे परिददामि ' ( २ ९ / २० ) इन देवताओंको केवल नाममात्र वलि दी जाती है, काटकर बलि नहीं दी जाती । इसी प्रकार यजुर्वेदसं. ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं ' ( ३० | ५-२२ ) आदि मन्त्रोंमें महीधरभाष्यमें भी ब्राह्मणादिकी बलि कही गई है । अन्तमें वहां लिखा गया है-' पूर्वै: सह एते षड्विशतिः, ते सर्वे द्वितीय यूपे नियोज्याः [ इनको दूसरे यूप - पशुबन्धनके खम्भे में वान्धो ] । सर्वेषां नियोगानन्तरं तान् नियुक्तान् पुरुषान् अभिष्टौति [ बलिवाले पशुकी भांति उन पुरुषोंकी स्तुति करो ] । तत आलम्भनक्रमेण यथादैवतं प्रोक्षणादि । ( तब क्रमसे सबका श्रालम्भन ( स्पर्श ) करके उनके देवताओंके अनुसार उनका प्रोक्षण करों ) । ब्राह्मणादीनां पर्यग्निकरणानन्तरम् इद ब्रह्मणे, इदं क्षत्राय ' इत्येवं सर्वेषां यथास्ववदेवतोद्देशेन त्यागः CC - 0. Ankur Joshi Collection नरमें नरका मारना नहीं ६६ ( इन सबको अग्निकी परिक्रमा कराके अपने नामसे ' इदं ब्रह्मणे ' आदि रूपसे इनका - अपने देवठाई । त्याग करो १० शाब्दिक त्याग है ) ततः सर्वान् यूपेभ्यो विमुच्य उत्सृजति, सब ब्राह्मणादियों को जो पशुकी भान्ति यूपोंमें ( तत्र से राम उसस बांधे गये खोलकर उन्हें छोड़ दो ) इस प्रकार नरमेधयज्ञमें. उन मनुष्योध मारना न कहकर उनका शुनःशेपकी तरह उस - उस देवता वस्म नामसे त्याग करके फिर छोड़ देना कहा जाता है ( २० नहीं । जैसे कि शुनःशेपको पहले यूपमें बान्धकर, । मारना गभ फिर छोर दिया गया था; पर उसे यह विधि मालूम न छान रोया था; और पशुओं वाली विधि अपनेसे देखकर पशुबलिएं वह बहुत था । भान्ति अपना भी काटना अनुमित कर रहा था; और एक उस विश्वामित्रकी शरण गया था । सो नरमेधयज्ञमें मनुष्यांच गभव मारना आदिष्ट नहीं है । इन बातोंका अध्ययन न करनेक वह ही फल है कि - वादी खण्डन करने को उतारू हो जाता है । बलि सरक यजुःसं. २४ अध्यायमें बहुतसे ( ६०६ ) आरण्यपशु भी बहिं पुरा प्रदानार्थ लाये जाते हैं, उनकेलिए श्रीमहीधराचार्यने कहा है. ' तेषु आरण्याः सर्वे उत्स्रष्टव्या न तु हिस्याः ' कि इनका उनन्त्र प्राकृत -देवताओं के नामसे त्याग करके इन्हें छोड़ देना चाहिये । इस ( लोक संकिता हिंसा नहीं करनी चाहिये । इस प्रकार यहां भी सममो । इ विषय में आलोक ' ' ( ६ ) पू. ४१४ - ४१५ ) देखो ।. महान कास ( १६ ) मर्दोको औरत बनानेके शापकी कथा- इस और ' आलोक ' ( ६ पृ. ७१३-७३४ देखो ) । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) FEE / ( २० ) पू - हनूमान् जी की विचित्र पैदायश ( शिव. शतरुद्र. देवठाई ) ( ख ) निष्णुका मोहिनीरूप देखकर ' स्ववीर्य पातयामास करो, | २० / ३-७: ' ( ४ ) रामकार्यार्थ शिवने अपना तेज गिराया रामकार्यादेमीश्वर । ( सब दूर सप्तर्षियोंने रामकार्य के लिए अञ्जनी के कानके द्वारा डाला । घे गये है । उसे तथाञ्जन्यां रामकार्यार्थमाहितम् ' ( ६ ) । च ' कर्णद्वारा मनुष्योध तस्माद्धनुमानिति नामभक्कू । शम्भु जैज्ञे कपितनुर्महाबलपराक्रमः ' स देवताओ । ) उससे हनुमान पैदा हुए । कान में होकर वह बीर्य है, ( गर्भाशय २०१७ में कैसे पहुँचा -? यदि कान में ही भरा रहा होगा तो ; फिर छोर कानमें कीड़े पड़ गये होंगे । शिवजीका वीर्य भी बड़ा चमत्कारी वह बहु था । भागवत ( ८।१२ ) में तो उससे खाने वनीं, पर यहां हनुमान् । पशुबलिक उसे निगल गया, उसने ऋषिपत्नियोंको बांटा, तो वे और एक गर्भवती हो गईं । उसकी गर्मीसे हिमालय जलने लगा था । मनुष्यों बहू.गंगाकी धारामें बहा देनेपर गुङ्गाकी धारा ही बन्द होगई । न करनेश सरकण्डों में फेंकनेसे षडानन पैदा हो गया । इस बेतुकी कथा से है । बलि पुराणके बनाने वाले बप्पी सिद्ध होते हैं । भी पति-- उ ० - शिव कोई प्राकृत मनुष्य नहीं थे, कहा है-का उनम प्राकृत था । वे महान देव थे तब उनमें थे । ( लोकोत्तरता, दिव्यता ) तथा अमोघता होनेसे न उनका वीर्ये अप्राकृतिकता यह सम्भव हो को । इस सकता है । " जबकि " वादिप्रतिवादिमान्य- मनुस्मृत्तिके अनुसार महान् सनातन देवने अपना वीर्य जल में डाला; और वह सोने-का सूर्यके समान चमकीला बड़ा अण्डा ( ब्रह्माण्ड ) बन गया. था- इसम श्रौर उसमें ब्रह्माजी पैदा हो गये; और ब्रह्माजीने उस अण्डेके CC - 0. Ankur Joshi पुराणों में इतिहासका समाधान [ III दो टुकड़े करके उन टुकड़ोंसे द्युलोक और भूमिलोक पैदा कर दिया ( १८-१३ ); तव पुराणके इस वचनमें क्या असम्भव ? कानकी नसका गुप्तेन्द्रियसे सम्बन्ध होता है, इसमें ' आलोक ' ( ५ ) प्र. १४१-१५० देखो । इससे, बिना मैथुनके वैज्ञानिक, वस्तुतः दिव्य, गर्भाधान बताया जा रहा है । आजकल यह काम इन्जेक्शन द्वारा लिया जाता है । वही दवाई एक स्थान में इ जैक्शन द्वारा डाली हुई अथवा सूचिवेध द्वारा डाला हुआ शुक्र जिस प्रकार इष्ट - स्थान गर्भाशय आदिमें पहुँच जाता है, वैसे यहां भी समझ लेना चाहिये । जैसे कि नाकमें पुष्पस्थित शुक्र के संघने से एक स्त्रीको गभ होकर उससे नासिकेत पैदा हो गया था, वैसे यहाँ भी समझना चाहिये । यदि वादी यह बात अश्रद्धावश न समझ सके; तो दयानन्दी - संस्कारविधि उठाकर पुंसवन सं. पृ. ४६ को देखे; वहाँपर बड़की कोंपल और गिलोय को महीन. करके तथा छानकर गर्भिणी - स्त्रीके दक्षिणं नासापुटमें सुंघानसे स्त्रीके गर्भाशयमें पुंसवनका अर्थात् वयका लाभ प्राप्त होता है, इससे लड़का पैदा होता है, उसी शैली से यहाँ भी दिव्यतावश विशेषता समझ लेनी चाहिये । तेजकी अमोघतावश वही तेज कानकी नसेसे प्रवाहित होकर गर्भाशय में पहुँचकर अथवा न पहुँचनेपर भी अमोघतावश गर्भकारक हो जाता है; क्योंकि अमोघ शुक्र गर्भाशयकी अपेक्षा भी नहीं करता । फलतः दिव्यताका मनन करनेसे सव समाधान हो जाता है । इससे हनुमान् वानस्तथा शिव का अंश होना भी सिद्ध हो रहा Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) है । विलक्षण - गर्भाधानवश अप्राकृतता के कारण प्रसवमें नौ मास-की प्रतीक्षा की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है । देवशक्तिपर तथा उनकी श्रणिमा - महिमा आदि सिद्धियों पर विश्वास न होने से ही बेतुकापन प्रतीत होता है, परन्तु देवताओंकी अलौकिक शक्ति वेदमें प्रसिद्ध है । देखिये- ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अथवे १४ | १ | ५४ ) यह देवता जो स्वा.द. जीके अनुसार विविध तिथि तथा नक्षत्रोंके हैं - दयानन्दिन स्त्रियोंके लड़का पैदा करनेकी सामर्थ्य वाले सूचित किये गये हैं; अब वे वादियों-की स्त्री में किस रास्तेसे अपना अमोघवीर्य पहुँचाते हैं, यह वादी ही स्वयं विचार कर ले । ( २१ ) ब्रह्माजी के पुत्रीगमन ( मत्स्य. ३।३०-४४ ) पर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ७२-७३, २२३-२४, तथा ६३६ पृष्ठमें देखना चाहिये । इसका संकेत ' स्वायां देवो दुहितरि त्विषिं ( तेजः ) धात् ' ( ऋ. १ । ७१/५ ) इस मन्त्रमें है । वस्तुतः उक्त कथा उषा - सूर्यका रूपक है, यह हम ७ म पुष्पमें उक्त पृष्ठों में लिख चुके हैं । मत्स्य के अग्रिम अध्याय ( ४।३-१० ) में जो समाधान पुराणने किया था, वादीने उसे छिपा दिया है; इससे उसे ' चुल्लू भर पानी की तलाश ' करनी चाहिये । उसका तात्पर्य यह भी वहां बताया गया है-“ अन्यच्च सर्वेदेवानामधिष्ठाता चतुर्मुखः । गायत्री ब्रह्मणस्तद्वद् अङ्गभूता निगद्यते ' ( ४ | ७ ) अमूर्त मूर्तिमद् वापि मिथुनं तत् प्रचक्षते । विरिनिर्यत्र भगवान् तत्रः देवी सरस्वती । भारती ब्रह्मा - मरस्वतीको कथा यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः ( ८ ) यथाऽऽतपो न रहितः दृश्यते कचित् । गायत्री ब्रह्मणः पार्श्व तथैव न विमुञ्चति छायया । वेदराशिः स्मृतो ब्रह्मा सावित्री तदधिष्ठिता । तस्मान्न ( १ ) । स्यात् सावित्रीगमने विभोः ( १० ) यहां बताया कश्चिद् दोषः । गया है कि- । ब्रह्मा एवं सावित्रीका यह नित्यका जोड़ा है, उसी को यहां के रूपकसे वर्णित किया गया है । जब कि यहाँ यह मैथुन- द उत्तम समा. धान कर दिया गया है; तब उसे यदि वादी लोक - दृष्टिसे छिपाना वा है; तो यह जनवञ्चकता है । उसमें लौकिक दृष्टिसे एक अन्य भी रहस्य है कि - मानसी वे सृष्टिकी अपेक्षा मैथुनी - सृष्टिमें मर्यादा कुछ रह सकती है. नि मानप्सीमें उतनी नहीं । मैथुनी सृष्टिमें कन्या धीरे - धीरे बढ़ है, जन्मसे ही उसमें स्त्रीभाव नहीं प्राप्त हो जाता । वही भाग श्रप पककर फिर युवति -पुत्री में भी पुरुषका स्त्रीभाव नहीं आने देता । कर परन्तु मानसिक - सृष्टि में सद्यः युवावस्था में ही उत्पत्ति होती है होत इसलिए उसमें पुत्रीभाव रहना सम्भव नहीं रहता । इस वाक्ये रा दिखलाने के लिए ब्रह्माजीने वह नाट्य किया, और वे स्वयं उसके नि उदाहरण बने । तभी सृष्टिकी आदिमें अमैथुनोत्पन्न एक पितृक आत युवा लड़के - लड़कियोंका भाई - बहिन, सम्बन्ध होनेपर भी खा, उत जीके अनुसार भी भाई - बहिनों वाला सम्बन्ध न होकर सृष्टि विप प्रवर्धनार्थं परस्पर वैत्राद्दिक़ - सम्बन्ध हुआ, इससे अमैथुनी सृष्टी यज्ञ निर्याता सूचित होती है । करव 1. ( ख ) सूर्यकी जो चरित्रहीनता वादीने भविष्य - पुरायको निर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) में छपी भाषासे बताई है, इसपर वह ' आलोक ' ( ७ ) व्यति छाया लखनऊ चरित्रपर्यालोचन ' ( पृ. २-५६ ) देखे । सूर्य देवता ( 1 ) पौराणिक भानु ' ( महा. ३।३०७ / २८ ) ' मनुष्यधर्मो वद् दोष: नचैवैनां दूषयामास धर्म- हि न दुष्यति ' ( महा. आश्रम. ३०/२३ ) विना योनि हां मैथुन किये गर्भ कर देते हैं, इसपर ' नियोग और मैथुन ' दषित म समा ( आलोक ८ पृ. ४६ ) में वादी देखे । तब कुन्ती वा निक्षुभा संबंधी दिपाठा बादीसे दिखलाया हुआ दोष हट गया । सूर्य - देवत्ता वादीके अनुसार अवश्य ' चरित्रहीन ' हैं; अब भी अपना हाथ ( किरण ) - मानसी वे सूर्व कियों के अङ्गों में डालते रहते हैं, अब बादी उस सूर्यका नकती है निकलना बन्द करवाके सदाकेलिए ' ब्लैक आउट ' करवा दे । तेरे ही आश्चय ता यह है कि दयानन्दी - वादी के महर्षि भी सूर्यके द्वारा भाव अपने सम्प्रदाय के पुरुषों की लड़कियोंसे लड़के पैदा कराया देवा करते हैं । उस समय सूर्य अग्नि में प्रविष्ट होता हैं ( अर्थात् रात्रि होती है होती है ), और स्वामीजी उस लड़कीसे उस अग्निको- जिसमें न बाक्लो रात्रवश सूर्य प्रविष्ट होता है ( और प्रातःकाल वही सूर्य अग्नि यं उसके निकल होकर उदित हो जाता है -- ' नक्तमग्निः ततः सूर्यो जायते कपि प्रातरुद्यन् ( ऋ. १० || ६ ) ' प्रदक्षिणा ' कराया करते है; देखो नी खा. उनकी संस्कार - विधि । वादीने पुराणकी भाषा दी है, भी इस रसृष्ट विषय में स्वा. द. की भाषा देते हैं । विवाह प्रकरणमें हम स्वामीजीने सृष्टिकज्ञकुण्डकी अग्नि की स्त्री - पुरुषों द्वारा ' प्रदक्षिणा ' ( पृ. १५६ ) करबाई है । इससे स्पष्ट है कि - दयानन्दी पति भी सूर्यैके उस पुरानियोगमें मिला हुआ है; और वह कहता है- ' इन्द्राग्नी द्यावा-CC - 0. Ankur Joshi देवता भी कामसे नहीं I सके [ ७०१ पृथिवी ' ' इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( ऋ. १४/१/५४ ) इस मन्त्र में अग्निके वाद ' द्यावा ' पड़ा है; इस ' द्यावा'का ( १५५.प्र. में ) स्वा. द. जीने ' सूर्य ' अर्थ करके अन्त में लिखा है कि- ' जैसे बिजली ( इन्द्र ) और प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य इस मेरी ( दयानन्दी वर की ) स्त्रीको प्रजासे बढ़ाया करते हैं ' श्रच वादी समझ ले कि सूर्य ब भी दयानन्दी लड़कियोंसे नियोगी सन्तान पैदा करते हैं तथा कर चुके हैं, जिनकी सन्तानें वतमान वादी हैं । अववादी ही जाने कि वे स्त्रीके अङ्गको दूषित करते हैं वा नहीं । स्वामीजीने तो उस सूर्यको ' चरित्रहीनता ' का सर्टिफिकेट नहीं दिया, पर ' गुरु तो गुड़, ' चेला चीनी हो गये ' ' ऊँट तो चले वीस कोस, और ऊँटका बच्चा चले तीस कोस ' चेला जीने तो सूर्यको वह सर्टि-फिकेट दे दिया । महाशय! याद रखो कि कामका देवता भी पार नहीं पा सके; देखो स्वयं वेद कहता है- ' कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा श्रापुः पितरो न मर्त्याः । ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान्, तस्मै ते काम! नम इत् कृणोमि ' ( अ. ६२/१६ ) यहाँ कामका देवता तथा पितर भी अन्त नहीं पा सके, अर्थात् उसे जीत नहीं सके, और उसे विश्वहा- सब जगत्को हराने वाला कहा है, इसलिए वेद भी उससे हार कर उसे नमस्कार करना कहता है, ' तस्मै ते काम! नम इत् कृणोमि ' । यहां ' काम'से सब प्रकार का काम आ जाता है । ( ख ) पूर्वपक्षी - इस मन्त्रके ' काम ' का अर्थ तो ' परमात्मा ' Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) है, देखिये - ( कामः ) - कान्तिमान् सबका अभिलषणीय यह महान् संकल्पमय जगदीश्वर सबसे प्रथम ( जज्ञे ) प्रकट होता है, और ( एनं ) उसके समान पदको ( देवाः ) देवगरण - विद्वान् पुरुष या सूर्य चन्द्रादि पदार्थ, पालक मां - बाप या ऋतुएं, और मनुष्यादि प्रारणी भी नहीं प्राप्त होते । उसी कारण हे ( काम! ) संकल्पमय ब्रह्मन्! तू सबसे श्रेष्ठ ( विश्वहा ) सर्व व्यापक और बड़ा है, तुझे मैं नमस्कार करता हूँ ' । इस वेद - मन्त्र में तो परमात्माकी महानताका उल्लेख है, इसमें देवताओंके कामी होनेका समर्थन कहाँ है? इसी पांडित्य पर क्या आप विद्यावागीश हैं? ( एक पत्रमें ) उत्तर- - वादीने यहां एक आर्यसमाजी - भाष्यकारका अर्थं देखकर ' काम ' का अर्थ बदल दिया, कामकी सत्ता हटाने की चेष्टा की; पर उल्टा उस कामको तो वादीने सबसे बड़ा परमात्मा बना दिया । उक्त अर्थसे कामकी सत्ता हटी कहां? ' सबका अभिलषरणीय संकल्पमय जगदीश्वर ' यही तो काम है, उसका जगत्पर आधिपत्य है, उस संकल्पमें सभी प्रकारके ' काम ' आ जाते हैं । ' संकल्प ' कामका ही पर्यायवाचक है- ' संकल्पोध्यवसायश्च क्रियानिवृत्तिरेव च । एतन्मैथुनमष्टाङ्गम् '! इस मन्त्रका देवता ' काम ' हैं, देखो स्वामीजीकी परोपकारिणी सभासे प्रकाशित ऋष्यादिसंवलित ‘ अथर्ववेदसंहिता ' ( पृ. १६६ ) । अनुक्रमणिकाके ' देवता ' का वेदमें अर्थ होता है ' प्रतिपाद्यः ' वर्णनीय, जैसे कि + वादीने भी अपने ' मुनिमुखमर्दन ' ( पृ. ५६ ) में ' देवता ' का अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection ' काम ' मन्त्रका अर्थ [ 01 ' प्रतिपाद्यविषय ' किया है । इस मन्त्रका देवता कहीं नहीं लिखा है; तब वादीने ' परमात्मा ' जब ' परमात्मा ' ' दिया? यदि वेद में ' देवता ' जो भी लिखा हो सर्वत्र अर्थ कैसे य है तब अनुक्रमणीकारोंको, ' परमात्मा ' । , पृथक् - पृथक् देवता लिखनेका परिश्रम क्यों करना पड़ा? एक बार ही कह देते । परमात्मा देवता है । और उक्त आर्यसमाजकी अथर्ववेदसंहिताने कि सर्वत्र ही यहां ' परमात्मा देवता ' क्यों नहीं लिखा? इससे वादीका पक्ष गिर गया । यदि वादी अद्वैतवादी होकर कहे कि - परमात्मासे मिन म इस संसार में कुछ भी नहीं है, इसलिए यहां परमात्माकोभी वा हमने काम ( संकल्प ) रूपमें वर्णित किया है, यह हम भी बादी की बात मानते हैं; तब बात वही हमारी निकली कि कामकी स इस मन्त्रमें प्रबलता दिखलाई गई है । तभी तो कामकी महिमा दिखलाते हुए वेदने कहा है- ' कोऽदात् कस्मै अदात्, कामोदा [ कामायाऽदात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता, कामैतत् ' क ( यजुः माध्य. ७ | ४८ ) कि - सभी कुछ ' काम ' है । यह विवाह-पद्धतियोंमें कन्यादान लेने के समय वर कहता है । इस मन्त्रका देवता ( वर्णनीय विषय ) भी ' काम ' है । देखो महीधरभाष्य वा क अनुक्रमणिका । ... स्वा. द. जी ने भी कामको मदकारक और उसका साधन स स्त्रीको माना है । संस्कारविधिमें उनने ( पृ. १३५ में ) मन्त्र दिया है - ' काम! वेद ते नाम मदो नामासि समानय अभू व Gujarat. An eGangotri Initiative