सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 451–460

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 451–460

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| श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ८६४ कि- शिवपुराण, देवीभागवत तथा ब्रह्मवैवर्तादि में स्पष्ट है, यह - ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २३३ में संकेत दे चुके हैं ), पार्वती की हम ( जिसका लौकिक रूपमें वर्णेन किया गया है ). लज्जाको देखकर करना पड़ा था; ( भा. ५।१७ १५ ) क्योंकि - प्रकृतिका जब पुरुषसे संयोग हो; तब उसका निरावरण हो जानाः स्वाभाविक है; तब यदि उस स्त्रीरूपा प्रकृतिके जाननेवाले आ जाव: तब वे उसके रहस्यको देख लेते हैं, जान जाते हैं । उस प्रकृतिका अधिष्ठाता तो उसका रहस्य देख पावे, यह तो ठीक है; पर जब परपुरुष उस प्रकृतिका रहस्य देख ले; इससे वह प्रकृति सिमट जाती है, तब उसे लज्जारूप आवरण में आजाना पड़ता है । इससे उसकी निरावरणतामें अन्तरायःपड़ता है; तब वह स्थान परपुरुषों केलिए निरुद्ध कर दिया जाता है । इसीको लोकिकरूपमें वहां वर्णित किया गया है ॥ वहां जो अनेक दासियाँ लिखी हैं, वे तो पार्वती की सेवाके लिए थीं । राजाओंमें देखा जाता है कि- राजकुमारियोंके विवाह में उनकी सेवार्थ: कई सौ की संख्या में दासियाँ भी दी जाती हैं; उनसे राजकुमारीके पतिका स्त्री - सम्बन्ध नहीं हुआ करता । फिर शङ्कर तो अन्य स्त्रियोंमें कभी भी आसक्त नहीं रहे । यह एक प्रसिद्ध श्लोक है- ' वेधा दूधाश्रमं चक्र कान्तासु कनकेषु च । तासु ( कान्तासु ), तेष्वप्यनासक्तः साचाद् भर्गो ( महादेवो ) नराकृतिः ' ( कुवलयानन्द ), सो. पार्वती के विचारसे उस स्थान को शप्त ) करना पड़ा कि कोई पुरुष वहां पर न आजावे | आजकल CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? [ ८६५ इसे कहना पड़े, तो यह कहा जायगा रखा गया है कि - सर्वसाधारणं कि शयनकक्ष में पर्दा लगा दासियोंके बाहुल्य में व्यक्ति वहाँ न पहुँचें । अतः वहां नहीं है । इस रूप में प्रकृतिरूपा वादीका कुत्सित अभिप्राय पुराणमें इष्ट संकेतित की गई हैं स्त्रीकी सेविका कुसुममारियाँ । ( ३४ ) शिचा- शिवका रमण वहां मानुषी पुट दे दिया प्रकृति - पुरुषका विनोद है; केवल कुतूहलकास्क है, जिससे एक नीरस विषय सरस हो नाचे । यही तरीका वेदमें वा देखिये - वहां एक गम्भीर भी देखा जाता है; ( ऋ. १ । १६४।३३ ) ' मातुर्द्विधिषुमन्त्रवं रहस्यको ' पिता दुहितुर्गेर्ममाधात् ' ६५५१५ ) इस प्रकार कौतूहलंकारक स्वसुर्जारः शृणोतु नः ” ( ऋ. है । इसी प्रकार पुराण में अश्लील भाषा से भी दिया गया भी कभी वास्तविक बातको परोक्षरूपसे कह दिया जाता है, जिसे अभिघावृत्तिपर वादी जैसे नहीं पहुँच सकते गति रखने वाले दिगम्बर । नहीं तो तपस्या में लग्न रहने वाले, ( जिनको किसी भी परस्त्रीको देखकर उच्त: करता ) महादेव भला लौकिक विकार नहीं थोड़े ही थे! उनके विषयों में निमग्न रहने वाले लड़के कार्तिकेयके उत्पादनायें देवताओं को कामदेवद्वारा उनकी समाधि भङ्ग करानी पड़ीं । पार्वती, पुरुषरूप रुद्र की एक प्रकृति है । इस विषय में पुराणका प्रसारणं देखिये -..... उमाख्या साः महादेवी मूलप्रकृतिखख्याता ' ( शिक रुद्रसं युद्ध. २६ ( १६ ) “ श्रहमेव त्रिधा भिन्ना: गौरी लक्ष्मी ज्योतिः ' ( ३४ ) । वहां ' सहस्र वर्ष का ' बहुत समय में तात्पर्य सुवा है । स ० ध ० ५५ Gujarat. An eGangotri Initiative TANA ar m

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८६६ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( 2 ) तभी तो वहां कहा है- ' व्यतीयुर्बहुलाः समाः ' ( शिव. रुद्र. कुमार. ११५७ ) सो वादी के मत में अपनी खीसे रमण क्या व्यभिचार होता है? सभी गृहस्थियोंको क्या वादी ' व्यभिचारी ' का सर्टि-फिकेट दे देगा? फिर तो स्वा. द. जी के पिता तथा वादी के अपने पिता भी वादी के शब्दों में व्यभिचारी सिद्ध हो जाएँगे! ( ३५ ) ' विष्णु - ब्रह्मादिरूपाणामैक्यं जानन्ति ये नराः । ते यान्ति नरकं घोरं पुनरावृत्तिवर्जितम् ' ( गरु, ब्रह्म ४ | ६ ) यहां ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि रूपोंको एक मानने वालोंका निन्दार्थ-वाद है । शास्त्रोंमें दो वाद प्रमुख हैं - अद्वैतवाद और द्वैतवाद । ' एकत्वेन, पृथक्त्वेन ' बहुधा ' ( गीता ६।१५ ) । इनमें द्वैतवाद व्यावहारिक, केवल उपासनाकेलिए होता है । अद्वैतवाद पार-मार्थिक होता है । यह अन्तिम कोटिका होनेसे सर्वसाधारणका विषय नहीं होता । यदि यह किसी कुपात्रके हाथ जा लगे; तो उपासना छूट जाने से नास्तिकता तक छा जाती है । इसलिए व्यवहारवादमें उपासना आदिके स्थिर रखने के लिए, तथा अपने इष्टदेवर्मे अनन्य भक्ति रखने के लिए द्वैतभाव, भेदभाव रखना ही पड़ता है । नहीं तो सर्वसाधारण जनता अद्वैतवाद की अधिकारिणी न होनेसे वह न इधरकी रहे, और न उधरकी । ' इतो भ्रष्टा ततो नष्टा ' का उदाहरण बन सकती है । उस निन्दाका रहस्यवादी - जैसे अल्पश्रुत - व्यक्ति समझ नहीं पाते; अत: उसपर बिना सोचे - विचारे लेखनी उठाना शुरू कर देते हैं । -- -- 3 1 विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र त्रिगुणात्मक माने जाते हैं । सो त्रिगुणा = CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? त्मककी समतामें तो अभेद एवं प्रलय ८६७ भेद वा संसार होता है । सो भेदवादमें होता है, और विषमतायें काटनी पड़ती है, और अभेदवाद में इनकी अभिन्नता । वादी यह संदा के लिए समझ रखे भेदको काटना पड़ता । - फलतः; तब उसे कुतर्क नहीं है । शास्त्रोंमें दोनों तरहके फुरेंगे । समय - समय पर आया ही करते हैं बाद, द्वैतवाद - श्रद्ध तवाद २० ) यह द्व ैतवाद । ' द्वा सुपणों ' ( ॠसं माध्यं. व्यवहारवाद है । ' पुरुष एवेद सर्व. १ ९ १६४ । ११।२ ) ‘ आत्मैव इदमग्र ( यजुः ( बृहदा. १ | ४ | १७, शत. ११/८/१ आसीद् ऐ एक एव, सोऽकामयतः १५/७ ) इत्यादि,. बा. २५/७, गीता १३२२ बहुतसे वचनों में श्रद्वतवाद अथवा, हैं । सबं व्यक्ति एक ही वादके परमार्थवाद अद्वैतवादीको अधिकारी नहीं हो सकते * सोऽहम् तो उपासना भी छोड़नी पड़ जाती है । वहां से अहं ब्रह्म, तत्त्वमसि, सर्वं ब्रह्म ' यही है, पर जब तक पूरी चित्तशुद्धिं सममना पड़ता न हो जावे; तब तक इस बादकों ग्रहण करनेमें पाखण्डवादका बोलबाला व्यवहारवादमें हो सकती हैं । इसलिए इसकी बहुत कठोरता में निन्दा करनी पड़ जाती है । अतएव व्यवहारवादमें " द्वैतवादका पक्ष अधिक रहा करता है । इसी प्रकार सत्त्व, रज, तम यह प्रकृतिके तीनगुण होते हैं । इनकी साम्यावस्था में तो प्रलय रहा करता है, और वैषम्यमे संसार हुआ करता है, यह हम पहले संकेतित कर ही चुके हैं सो यह गुण व्यवहारकोटिंमें भिन्न - भिन्न हैं, इसलिए इन गुणों बाले विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र भी ' व्यवहारवाद में भिन्न - भिन्न है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) } ६६७ जैसेकि- ' सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै: -- ' इरिविरश्चिद्दरेति पमता संज्ञ ' ( भा, १ / २।२३ ) । अतः व्यवहारवादमें अपनी - अपनी नमिता प्रकृतिवश इनको भिन्न ही रखना पड़ता है । उस समय श्रभेद-ड़ता है, बाद हानिकारक होनेसे उसे निन्दित ही करना पड़ता है । देंगे । यह ठीक है कि - गुणातीतता - पक्षमें तीनों देवोंमें कोई भेद # तवाद नहीं । परमेश्वर एक तत्त्व है, यह पुराणोंमें भी समय - समय पर २।१६४५ सूचित होता है । इस प्रकार जीव एवं प्रकृति भी उस पुरुषके ( यजुः ही अंश वा विकास हैं, त्रैतवाद नहीं, किन्तु अद्वैतवाद ही वास्तविक है, यह गीता में भी स्पष्ट है; परन्तु सृष्टि त्रिगुणात्मक बल्कि त्रिगुणोंके वैषम्यसे निर्मित होनेसे स्वाभाविक है कि-थवाद वह एक ही उपास्यको चुन ले । त्रिगुणोंकी सङ्करतामें व्यवहार-वाद में हानि समझकर ही गरुड़ पुराणके उक्त वचनमें भयानक निन्दार्थवाद प्रयुक्त किया गया है । अतः विरोधकी कोई बात नहीं । अपने - अपने पक्षको सभी बड़ा बनाते हैं । यही त्रैतवादी वादी ही दयानन्दी - सम्प्रदायको अन्य सब सम्प्रदायोंसे अच्छा समझता है; और दूसरोंको गन्दी गन्दी, भटियारिनोंको भी मात कर देने वाली गालियां दिया करता है, इसी प्रकार यहाँ भी दृष्टिकोणकी भिन्नता में ही पर्यवसान समझना चाहिये; ' किसीकी निन्दामें तात्पर्य नहीं । ( ३६ ) ' महादेव बेटे थे, वा ब्रह्मा - विष्णु बेटे - इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में ' कौन पिता ' ( पृ. २८४ - २६४ ) तथा पू. ६११ क्री टिप्पणी में देखो । वादी अपनी पुस्तकों में ही एक ही बातकी CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? [ ८६६ पुनरुक्ति व्यभिचारकी बहुत किया करता है । ( ३७ ) अनसूयासे में चेष्टा पर आलोक ' ' ( ७ ) पृ. ६४-६७ त्रिदेवकी देखो । ( ख ) पञ्चमकारोंके, २३०-२३१ ८०५ में तथा इस पुष्प विषयमें ' आलोक ' ( ५ ) पृ. ७६८-( के पृ. ७८७-७६३ ) में देखे | ( ३८ ) ' प्रत्यक्षमिह देवेन्द्र! पश्य अनु. १४/२२७ ), गिरिजां लिङ्गं भगान्वितम् ' ( मद्दा. स्थाप्यं ' ( शिव. कोटिरु. योनिरूपणं च तत्र लिङ्गं च तत् संयुतम् १२/३७ ) ' भगेन सहित लिङ्गं गुगलिङ्गेन । इहामुत्र च भोगार्थं नित्यभोगार्थमेव महादेवं शिवलिङ्गं च । भगवन्तं प्रपूजयेत् । स्वचिह्नपूजनात् प्रीतः चिह्नकार्य जन्मादि जन्माद्यं विनिवर्तते ' ( शिव. विन्ध्ये १६।१०४-१०८ लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्ग साक्षान्महेश्वरः ) स च सा च समचितौ ' । तयोः सम्पूजनादेव इन पद्योंसे ( शिव. वायवीय. उत्तर. ३४।१३-१४ ), स्पष्ट है कि यह शिवके चिह्न ( ज्ञापक वा प्रतिनिधि ) हैं । यहां लिङ्गवेदी ( लिङ्गकी आधारस्थली ) को पावेंती तथा लिङ्गको महादेव बताया गया है । इससे वादी जो कि यहां INT ANA लिङ्ग - योनिको मानुषी उपस्थ मानता है; उसकी बात कट गई ।.। S शिवका लिङ्ग शिश्नाकार न होकर अण्डाकार है; अतः शिव-लिङ्ग अण्ड - ब्रह्माण्डकी प्रतीक है । इसपर स्वाद का वचन ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ६५३ में देखो । महादेव - पार्वती कोई मनुष्य ar स्त्री - पुरुष नहीं हैं, न उनके अङ्ग प्राकृत वा अस्पृश्य वा लज्जा-स्पद हैं; किन्तु वे जगत्के आदिकारण पवित्र देवाधिदेव हैं, हम लोगों की भांति अपवित्र लहू, हड्डी के प्राकृत अंग वाले नहीं Gujarat An eGangotri Initiative and

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5७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) हैं । अतः कोई भ्रमका उनमें अवकाश नहीं । इस विषयपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ११०-१२१ तथा २२५-२३६ में तथा नवम पुष्प पृ. ६५६-६६२ में देखो । वादी याद रखे कि -लिङ्ग शिवके निर्गुण - निराकार स्वरूपका प्रतीक होता है, और शिवकी सब भङ्गों वाली पूरी मूर्ति सगुण-साकार - रूपका प्रतीक होती है । इसलिए लिङ्गमूर्तिमें किसी अंगका चिह्न न होकर सफियाना मूर्ति हुआ करती है । इस विषयमें वह ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६१० की टिप्पणी अथवा नवम पुष्प देखे । यह मानुषी उपस्थ भी नहीं है; इसपर वह आर्य-समाजके शास्त्रार्थमहारथी नेता स्वा, समर्पणानन्दजी ( श्री बुद्धदेवजी विद्यालङ्कार ) का ' टकारा पत्रिका ( न्ये. २०२२/६/८ ) तथा परोपकारी ( ६८ ) में भी महत्त्वपूर्ण भाषणका कुछ अंश सुने । वे लिखते हैं- ' हमारा कहना है कि आर्यों ( हिन्दुओं ) ने उपस्थपूजा कभी की ही नहीं यह उपस्थपूजाका इशारा · कदाचित् शिवलिङ्गपूजाकी ओर है, सो इनसे पूछे कि -शिवलिङ्ग-की आकृति उपस्थेन्द्रियसे मिलाकर तो दिखलाइये । शिर्वालङ्गकी मूर्ति यदि योनिमें प्रविष्ट लिङ्गकी मूर्ति होती; तो इसका पतला श्रौर नोकीला भाग नीचेकी प्रोर होना चाहिये था ' न केवल आर्यसमाजके स्वा: समर्प ( श्रीबुद्धदेव ) जी ही शिवलिङ्गको उपस्थ नहीं मानते; किन्तु आर्यसमाजके ब्रह्मचारी उषर्बुधजी ने भी अपने ' रुद्र देवता ' में कुछ प्रकार भेदसे लिखा है-" ग्रह लिङ्गपूजा शिवपूजा न होकर दीपशिखा की प्राकृतिके CC - 0. Ankur Joshi Collection ४ शिवलिङ्गपूजा क्यों? ज्योतिर्लिङ्गकी [ 501 पूजा ही थी । शिवपुराणादिमें ही वर्णन आता है ' । भी ज्योतिलिङ्गोका पा । ( ३६ ) ' शिवनाभिमयं लिङ्ग प्रतिपूज्यं का महर्षिभिः लिङ्गेभ्यः तस्मात् पूज्यं विशेषतः ' ( शब्दकल्पद्रुम ' केन्द्र ' है । यहाँ भी ' लिङ्ग ' का अर्थ ' ) अर्थं सब मूर्तियोंका मूर्ति ' है ‘ चिन्ह ' है, यह स्पष्ट है, यहां गुप्त - इन्द्रिय अर्थ घट भी नहीं सकता । ( ४० ) [ तमोगुणेन मूढो मां न जानाति शङ्करः । नारी यस्मान्मामवमन्यते । योनिलिङ्गस्वरूपं वै रूपं । श्रेष्ठ च सर्व- । यहां ' नाभि ' का । सब ' लिंगों ' का | I ' सर्वलिङ्गेभ्यः स निर्विष्टस्तमेसा सङ्गममोस ( पद्म, उत्त, २५५।३२-३३ ) इसमें तस्य भविष्यति ' वैष्णव पुराण होने से रुद्र - निन्दा हो; यह सम्भव है । भृगुका यह कथन क्रोधवश क़ही बातका प्रामाण्य है । क्रोधवश I नहीं होता । इसका इतना ही अर्थ होगा कि - उसका रूप तमोगुण युक्त तथा योनि एवं सो यह वास्तविकता लिङ्ग- जैसा होगा । त तो. सिद्ध न हुई । लिङ्ग - जैसा स्वरूप तो ल देहलीके बसोंके सिनग़लों का भी होता है, योनि- जैसा स्वरूप जो पीपल वा पानके तथा तुलसी के पत्ते का भी तथा स. घ. के अ ( अर्धपात्र ) का भी वैसी दृष्टिवालेको प्रतीत हो श सकता है । ' ॐ ' का स्वरूप भी योनि - लिङ्ग जैसा दीखता है, वहीं ॐ की भ आकृति शिवलिङ्गकी भी होती है । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २२७ देखो, क्या वस्तुतः उनको वादी भी योनि आदि सम लैगा? हां, वादियों - जैसी दृष्टि हो, तो वैसोंको सर्वत्र यही भग- भ लिङ्ग ही दीखेगा । वादी अपनी संस्का, वि. में प्रोक्षणी, शृतावदानाः म Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) [ ८७२ ] 501 आकृतियां देखे, उसे भग - लिङ्ग मालूम होंगे । कई लिङ्गोका | पात्रकी कारखानों के इञ्जन ऐसे होते हैं, उनमें भी वादीको यही दीखेगा । लोका डण्डा छिद्र में आ - जा रहा होता है, वादी उसे च सर्व इनमें भी वहीं मानेगा? महाशय! यह अपनी - अपनी मानसिक का भावनाएँ होती हैं । गा अग्निहोत्र जिस वेदी में हो रहा होता है, उसमें अग्नि तुभ्यः से ज्वाला जल रही होती है, यह ठीक भग - लिङ्ग जैसी दीख सकती है । यह यज्ञकी वेदी भग मालूम हो सकती है । देखे वह अपना हवनकुण्ड; और अग्नि लिङ्ग मालूम हो सकता है । जिस - जिसका यति जैसा मन होगा, वह वैसे - वैसे उसे देखेगा । वस्तुतः शिवलिङ्ग निन्दा ब्रह्माण्डका प्रतीक है, ब्रह्माण्ड ही शिवका लिङ्ग है; इसलिए घवश शिवलिङ्गकी मूर्ति शिश्नाकार न होकर अण्डाकार ही होती है; होगा. तब क्या ' ब्रह्माण्ड ' शब्द में ' अण्ड ' ( अण्डकोष ) को भी वादी लज्जास्पद दृष्टि से देखेगा? सो शिवलिङ्गकी पूजा शिवके विकसित ' दूसरे रूप उसके ब्रह्माण्डकी पूजा है; सो वस्तुतः यह शिवकी - ही पूजा है । परन्तु वादीको सहस्रभग वा सहस्रलिङ्गका शाप मिला हुआ मालूम होता है । अतः उसे सारा जगत् ही भगलिङ्गमय दीखता है । इतना उसे ज्ञान नहीं कि- शिवा - शिव क़ी कीई मनुष्य स्त्री - पुरुष तो नहीं । अतः यहाँ ' अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमांश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् " " ( ११ ) मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसी-माधुरी चैव प्रकृति मोहनीं श्रिता: ( १२ ) वह गीता के श्लोकः CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? वादीमें पूरे घटते हैं । इन महाशयोंको इतना शिवने जब अपना लिङ्ग बढ़वाया मालूम नहीं, था, ऊपरको उसका ब्रह्मा पार नहीं पा सके; और नीचेसे विष्णु पार नहीं पा सके, तब यह जननेन्द्रिय मनुष्यकी मानी जावे, तो उसमें कैसे सङ्गति लग सकती है? जननेन्द्रियका नीचेकी गहराई से कोई सम्बन्ध नहीं लग सकता, क्योंकि जहां शिव बैठे होंगे; वहीँसे तो जननेन्द्रियका प्रारम्भ माना जावेगा; तब उसके ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा आर - पार न मिलनेकी तुक कैसी? यह मानुषी उपस्थ कैसे? क्या उसका आर - पार नहीं पाया जा सकता? क्या स्त्री - पुरुषका रमण हजारों वर्षों तक हुआ करता है? यदि पार्वती और महादेवको प्रकृति - पुरुष मान लिया जावे, ईश्वर-ईश्वरी, महेश्वर - महेश्वरी मान लिया जावे, और उनके लिङ्गको ऊपर - नीचेका ब्रह्माण्ड मान लिया जावे; तब उसका अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है कि उस पर ब्रह्मके लिङ्ग ( प्रज्ञापक ) ब्रह्माण्डका ऊपर - नीचे, दाएँ - बाएँ कहीं से भी किसीसे भी उसका पारावार नहीं पाया जा सकता । आकाशमें यह जो तारे दीख रहे हैं; यह सभी ब्रह्माण्ड ही हैं । इसका पार पाना क्या सुगम है? जब ऐसी दृष्टि हो; तो वादीके सभी आक्षेपोंमें दिया - सलाई लग जावे; पर यह लोग इस वास्तविक दृष्टिको अपनाना नहीं चाहते । यह तो साधारण जनताको अछेसे ओछे प्रकारों से ठगकर, उनको वरगलाकर अपने चंगुल में फँसाकर अपने सम्प्रदायवालोंकी संख्या बढ़ाना चाहते हैं । इस विषय में IT ANA Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 456

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८७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २२५-२३० पृष्ठ तथा नवमपुष्प में देखो । शिवलिङ्गोंके पैदायशका ‘ शब्दकल्पद्रुम कोष ' से जो उद्धरण दिया है; इसपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १११-१२०, पृ. २३३-२३४ में देखो । ( ४० ) जो कि पद्मपुराणसे वादी शिवकी निन्दाके पद्य उधृत करता है, वह वैष्णव - पुराण होनेसे जनता में विष्णु की पूजामें निष्ठा रहे, अन्यमें नहीं; यह तात्पर्य वहां स्पष्ट है । इसी प्रकार शैव - पुराणों में विष्णुकी निन्दा, अपनी एकमें अनन्य-निष्ठास्थापनार्थ है, क्योंकि अल्पज्ञ सब मार्गोंमें चले; तो ' इतो भ्रष्टस्वतो नष्टः ' का उदाहरण बन जावे । उस दुर्दशाको हटाने के -लिए कड़ी निन्दाका आश्रय करना पड़ जाता है । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३४५-३५८ में देखो । ( ४१ ) शिवजीके नाम । - शिवजीका नाम ' विरूपाक्ष ' त्रिनेत्रताके कारण है, ' ' कुटिल - भ्रकुटी ' दैत्योंपर है । जटाएं ! वानप्रस्थताको द्योतित करती हैं । ' विवासाः कौपीनवासाः, दिगम्बर " यह शिवकी शीतोष्ण - सहनशक्तिको तथा निर्विकारताको द्योतित करते हैं । ' नीलकण्ठता ' से वे स्वयं विष पीकर अन्योंको हलाहल से बचाना सूचित करते हैं । ' भ्रस्मोद्धूलितविग्रह ' से भस्मका लाभदायक होना सिद्ध करता है । भस्मके लाभ तथा चिताभस्मका रहस्य वादी ' आलोक ' ( ५ ) पृ. ३६७-३७० में देखे । ' श्मशानाचिपतित्व ' का कारण मृत्यु के देवता एवं प्रलयकारी होने से है । ' निशाचर ' से प्रलयकी निशा ( रात्रि ) में अकेले होकर विचरना इष्ट है । ' पिनाकी ' से शिवके दुष्टोंके लिए धनुषधारी होने से प्रशंसा है; CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? [ 50X उससे वे दैत्यों का शिकार करते हैं; पर वादी दैत्योंके प्रेमी होनेसे शिवसे बिगड़ता है; क्योंकि सिद्धान्तोंका - दैत्य और दैत्योंका स्त काम उसे खूब इष्ट है, कारण स्पष्ट है । ' राहु ' यह यौगिक है- ' यो रहति - परित्यजति रहयति शिवका नाम , परित्याजयति दुष्टान् स राहु: -ईश्वरः यह स. प्र. के १ म समुल्लास में वा ' शनि ' ' यह नाम भी विशेषण होनेसे यौगिक देखो । भी जो सबमें सहजसे प्राप्त है- ' शनैश्वरति ', धैर्यवान् हो, देखो अपना स.प्र. उसीका संक्षिप्त नाम ' शनि ' है । ' विशेषण वा गुणनाम पर यौगिक होते हैं, यह वादी याद रखे, हां विशेष- शब्द सदा सकते हैं । रूढि हो धा ' कामुकवर:, कामदेवः, कामातुरः, महालिङ्गः, ऊर्ध्वलिङ्गा ख धूर्तः, शिखण्डीश: ' इत्यादि नामोंका रहस्य- ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १३२-१३७: देखो । ' उन्मत्तवेष ' शिवका: दूसरोंके दोषोंके देखने में न I रहकर अपनेमें मस्त रहना, तथा उनकी अवधूतता बताता है । I ‘ भयदाता ' तथा ' उग्रः ' शब्द दैत्यों या कुकर्मियोंके लिए है । च ' मृगव्याध'का अर्थ ' हिरनों का वध ' नहीं है, किन्तु दक्षका यज्ञ-, प्र जिसने सती का अपमान करके उसे जलवा दिया था, शिव जब H उसे सीधा करने आये तो वह यज्ञ मृगरूप होकर भागकर स च अपनी जान बचाना चाहता था, शिवने उसको बींधा ( व्यधं ताडने - तु.अ.प. ), दूसरा सरस्वती के पीछे मृग होकर दौड़ते हुए 1 श ब्रह्माको बींधा था, इसलिए आकाशमें अब भी ' मृगशिर ' नक्षत्र a उसकी स्मृतिको बता रहा है । शिव के नाम जहां भी कहे हैं; वे ष्ट Gujarat. An eGangotri Initiative

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८७५ श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ८०६ नौका होनेसे निन्दाबोधक नहीं हो सकते, किन्तु स्तुतिवाचक होते हैं; योका स्तोत्र होने से वे नाम यौगिक हैं. पर इस दोषैकदर्शी वादीने नाम गुणवाचक उसमें निन्दा निकालने की दुश्चेष्टा की है । वा | बलात् कई शब्द द्वयर्थक होते हैं, जैसे कि - ' कृपण ' का अर्थ ' कंजूस ' खो । भी होता है, ' दीन ' भी । ' कदय ' का अर्थ ' कंजूस ' भी होता है, रति ', ' नीच ' भी । सो प्रकरणके अभियाग्रानुसार अर्थ करना पड़ता है, J पर यह निन्दक वादी स्तोत्रों में भी बलात् निन्दाका अर्थ करता है । सदा ( ४२ ) पार्वती को भी दैत्यों को मारने के लिए कई प्रकारके रूप हो धारण करने पड़ते हैं, उन नामोंसे उसकी निन्दा नहीं । ' योनि-स्वरूपिणी ' का अर्थं ' सबकी कारणस्वरूपा ' हैं । रक्तबीजको मारने के लिए ' दानवानां बहूनां च मांसं च रुधिरं तथा ' ( शिवपु. ) ३२- कहा जाता है; वहां अन्य कोई उपाय नहीं था । किसीका प्रलय न करना हो; तो वहां उसका रक्त - मांसभक्षण कहना पड़ता है । है । चण्ड - मुण्ड की सेना के प्रलय के लिए उस सेनाका ' खाना कहना ही पढ़ता था; तभी उसे ' मांसभक्षिणी ' कहा जाता है । प्रलय में भी भगवान्‌को ' अत्ता ' कहा जाता है कि भगवान सबका भक्षक है । ज्ञ-नव सबका मांस - रुधिर खाता है । देखो वेदान्तदर्शन - अत्ता कर चराचरग्रहणात् ' ( ११२।६ ) में कठोपनिषद् का वचन दिया गया है - ' यस्य च ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ' ( १२३२४ ) अतः शाङ्करभाष्यमें लिखा है- ' अत्ता अत्र परमात्मा भवितुमर्हति । त्र चराचरं हि स्थावरजङ्गमं मृत्यूपसेचनकं ( ओदनमिश्रघृतवत् ): इइ आद्य ( भोज्य ) त्वेन प्रतीयते, तोदृशस्य च प्राद्यस्य ( भोन्यस्यः ) CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गजा क्यों? । ८७७ न परमात्मनोऽन्यः कात्स्न्येन श्रता सम्भवति । परमात्मा ( कार्य ) जातं संहरन्- सर्वम् प्रत्ति ( मुङ्क्ते तु विकार-) इत्युपपद्यते ।... अनश्नन अन्यः इत्यत्र कर्मफलभोगस्य प्रतिषेधकमेतद् दर्शनम् संनिहितत्वात्, तस्य , न. विकार ( कार्य ) संहारस्य प्रतिषेधकम, सर्व-वेदान्तेषु सृष्टि - स्थिति- सहार- करणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्धत्वात् तस्मात् परमात्मैव इह प्रत्ता ( भक्षकः ) भवितुमर्हति ' । इसी प्रकार । यहां प्रलयाधिष्ठात्री देवी पार्वती को राक्षसों के मांसादिकी भक्षिका कहा है । इसलिए ऋग्वेदसं में ' इन्द्रको ' वृत्रखादम् ' ( १०/६५/१० ) वृत्रासुरकाः खानेवाला कहा है । जो समाधान वेदमें होगा, वही पुराण में भी । युद्धों में मस्वीकेलिए मधु श्रसवका प्रयोग अब भी सर्वसम्भव है, ऐसा करनेसे योद्धा शत्रुत्रोंसे अपने मरने का विचार हटाकर प्रबलतासे लड़ता है । इसी कारण उसे ' मधु - मांसासवप्रिया ' कहा जाता है । शुम्भ, निशुम्भ दैत्य थे, यदि देवी उनको मारती है, तब वादी उसकी निन्दा करके क्यों अपना दैत्य - सख्य, बताता है? ' स्वैरिणी ' का अर्थ जगदम्बिका होनेसे उसपर किसी अन्य-का अंकुश ( कंट्रोल ) नहीं है । उपासक मनुष्य उपासकके लोकोत्तर गुण नहीं लेता; किन्तु अपनी मर्यादा वाले ही । हनुमानका उपासक उसका समुद्रका उल्लङ्घन नहीं ले सकता । वादी अपनेको, परमेश्वरका उपासक मानता होगा, परमात्मा प्रलयः करता है, तब क्या वादी भी प्रजाको मारनेको सदा उद्यत रहता है? दुर्गार्गको समयपर सत्वगुण, तथा समयपर दैत्यों के TANA Gujarat. An eGangotri Initiative

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८७८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) दमनार्थं तमोगुण भी धारण करना पड़ता है । इसलिए ' वैकृतिक - रहस्य ' में भी कहा है- ' त्रिगुणा तामसी देवी सात्त्विकी या त्रिधोदिता । १ । महाकाली तमोगुणा । मधुकैटभनाशार्थं ' ( २ ) । ( ४३ ) दारुवनकी कथापर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २१५-२२० देखो । सभी पौराणिक ' दारुवनकी कथाओं में वहां शिवका ' परीक्षार्थं ' गमन कहा है, व्यभिचारार्थ नहीं । वादीने उसपर ७ प्रश्न किये हैं; वे भी वहीं उत्तरित हैं । ( ख ) बिल्वपत्रका वादी लाभ बताता है, इस प्रकार जल चढ़ानेका भी । इससे यही तो सिद्ध होता है कि - यह जहाँ मूर्तिपूजा है; वहाँ ' पुरुषोंके लाभप्रदं वैज्ञानिक रहस्योंसे भी पूर्ण है । पुराणों में तीन प्रकारकी ( समाधि, ' परकीया, लौकिकी ) भाषाएँ तथा एक भी कथामें तीन प्रकारके भाव ( आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ) भी सुरक्षित हैं । जब वादी भी पुराणके प्रमाणसे कहता है कि-जगत् भी इन शिवके चिन्हींकों हो घारणं करता है, तब से जनताको भी लाभ उठवा ले । केवल ' खंण्डन - मण्डर्न में रहनेसे यह रहस्य ज्ञात नहीं हो सकेंगे । शिवके दिव्य हो मानुषी प्राकृत अङ्ग नहीं हैं, अतः न कोई यह लज्जाकी बात है, और न उपहास की । यह वह सदा के लिए समझ रक्खे । ( ग ) शिववीर्यसे सोना - चाँदी बननेकी बात शिवकी तथा शिवके अंगोंकी दिव्यता है । मानुषी ' वीर्य होनेपर उसके गिरने से तो वह व्यय हो जाता है, ' अतः शिव मनुष्य न होकर देवता सिद्ध हुए; ' तब उनपर मानुषी दृष्टिकोण से उपस्थित किया हुआ CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? CUE वादीका दोष व्यर्थ सिद्ध हुआ । मोहिनी विष्णुमाया शिवका भी मोहमें के पीछे दौड़ना पड़ जाना सूचित किया सोना - चाँदी ' अपामग्नेश्च संयोगाद् हैमं रौप्यं है । च निर्बभौ ' ११३ ) अग्नि और जलके संयोगसे होता है ( मनु. स्वरूप, ' रुद्रो व एष यदग्निः ( कृ.य. तं सं; शिव हैं अग्नि-.. ५२४ | ३ | १ ) ' तस्मै नमो अस्तु श्रग्नये ' ( अथवे. ७६२/१ ) और जलस्वरूप रुद्राय उनकी ८ मूर्तियों में जल उन्हीं दो के संयोगवंश निक भी सिद्ध हुआ । हुआ करती हैं; उसका जब वादी श्रद्धांमूलक भी । तभी और अग्नि की मूर्ति भी मानी गई है । उनके वीर्यसे सोना - चाँदी होना वैज्ञा-यह वादीको जो बार - बार लघुशङ्काएँ कारण अबहुश्रुतता रूप निर्बलता है । यथार्थता तथा बहुश्रुततारूप शिलाजीतका सेवन करेगा; तब उसकी निर्बलता दूर होजानेसे बार - बारकी उसकी लघुशङ्काएँ भी दूर होंगी । .. ( ४४ ) शिवत्री से हनुमान् के जन्मपर हम अन्यत्र लिख चुके हैं । शिववीर्य से पास तथा गन्धक आदिकी उत्पत्ति में भी वही कारण दिव्यता तथा कई वैज्ञानिक रहस्य हैं । अनुसन्धान-से जाकर तो पता लग सकेगा कि जैसे भांग शिवकी बूटी मानी जाती है, वह बवासीर आदि में कल्याणकारिणी होती है; इस प्रकार पारा एवं गन्धक भी स्वास्थ्यकारी होने से कई व्रणों के दूर करने वाले होनेसे शिव वीयें कहे गये हैं । दोषदृष्टि वा उपहाससे एतदादिक रहस्य नहीं खुलते । ( ख ) इलावृत देशपर पहले लिखा जा चुका है । वेश्यानाथ तथा ऑडिवधकथा आदिने Gujarat. An eGangotri Initiative

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J श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) 55.0 पर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १३७-१३६, ४५३-४५६ तथा ८ ९ २ पृ. की टिप्पणी में तथा गत निबन्ध ( ५ ख ) पृ. ८४२ - ८४३ में लिखा जा चुका है । इस प्रकार वादीकी पुस्तकके शिवदूतीका अण्ड-कोषभक्षण. स्त्रीलम्पटदेव, ' धूर्तेः पुराणचतुरैः, पौराणिकानां व्यभिचारदोषो, भ्रष्टलोग भागवत पढ़ते हैं, पुराणपाठकका पूर्ण बहिष्कार, पुराणोंमें अंग्रेजी, पुराण शूद्रोंके लिए, इत्यादि सभी विषयों में ' आलोक ' ( ६-७ ) में तथा कई बातें इस पुष्पके गत-निबन्धों में भी प्रत्युत्तरित की जा चुकी हैं । वादी अपनी पुंस्तकोंमें वही बातें बार - बार लिखकर अपनी पुस्तकोंकी तोंद बढ़ाता है । ( ४५ ) शिवकी लिंग - मूर्ति तथा पञ्चमुख - मूर्तियोंका रहस्य हम. ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २२५- २३६ तथा इस निबन्ध ( ३८ ) में लिख चुके हैं । कई मन्दिरोंमें शिवलिंगमें शिवजी की मुखकी मूर्ति रखना ही सिद्ध कर रहा है कि वहाँ लौकिक स्त्री-पुरुषकी जननेन्द्रियोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं । ( ख ) मूर्तिपूजा कम - अक्लोंके लिएं है - इत्यादि विषयोंपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १४६-१६६ में लिखा जा चुका है ।.. : ( ४६ ) " भस्मधारी ब्राह्मणको छोड़ देवे, त्रिपुरधारी पतित होता है, शिवभक्त नरकगामी हैं, शिवलिंग पूजकों को घोर दुःख मिलेगा " इत्यादि बातें वैयक्तिक एक व्यक्ति भृगुके वचन तथा अपने - अपने इष्टदेवक्रे पुराण में एक निष्ठास्थापनार्थ भयानक निन्दार्थवाद वचन हैं । सो अर्थवादमें । सभी शब्दों का अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवलिङ्गपूजा क्यों? लेकर उनका तात्पर्यमात्र देखना पड़ता जानने वाले निन्दक है, इस शैलीको न लोगोंकी आंखें तथा मस्तिष्क निन्दाके मलसे कलुषित होने से कुछ देख वा समझ नहीं शिवलिंगपर जल चढ़ाना ज्वालामुखीका पाते । ( ख ) कि वादीने उपहास किया फिर छूटना नहीं, जैसे है, किन्तु पूजार्थ है । गणेश - ब्रह्मा-विष्णु आदि सभी देवोंकी मूर्तिपर जल चढ़ाया जाता वादि - प्रोक्त कारणकी कुछ है; क्या वहां भी संगति है? क्या वादी उनकी ज्वाला फूटने का डर कभी सिद्ध कर सकता है? यदि तब स्पष्ट है कि - वादि - प्रोक्त कारण यहां नहीं नहीं; के कहे प्रकारसे हैं, किन्तु ब्रह्माजी-यह पूजा है । ( ४७ ) श्रीरामकी महादेवकी पूजा ' अत्र पूर्व महादेवः ANA प्रसादमकरोद् विभुः ' ( वाल्मी. ६।१२५ / २० ) में स्पष्ट है; सो महादेवकी पूजा निर्गुण - निराकाररूपसे लिंगमूर्ति ( सफियांना मूर्ति ) में और सगुण - साकाररूपमें मुखादि अंगों वाली शिव-मूर्ति में की जाती है; इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २२६ तथा पृ. ६१० की पूर्वोक्त उस पृष्ठकी पूरक टिप्पणी देखो । ' रामेश्वर-लिग ' की प्रतिष्ठापना प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना है, इससे लिग महादेवकी निर्गुण मूर्ति - विशेष ही सिद्ध है । इसपर प्राचीन-टीका रामाभिराम ( तिलक ) में स्पष्ट लिखा है- ' अत्र सेतुमुले पूर्वसेतुबन्धनात् पूर्वं विभुमहादेवो मम रामस्य प्रसादमकरोत्-मत्स्थापितत्वेन अत्र स्थितोऽभूत् । सेतोनिविघ्नवासिद्ध्यै समुद्र-( प्रसादांनन्तरं शिवस्थापनं रामेण कृतम् इति गम्यते । सेतुं दृष्ट्रा स ० घ ० ५६ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 460

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८८२ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ह ) समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहतीति स्मृतेः । कूर्मपुराणे रामचरिते तु अत्र स्थाने स्पष्टमेव लिङ्ग स्थापन मुक्तम् । त्वत्स्थापित - लिंगदर्शनेन ब्रह्महत्यादिपापक्षयो भविष्यतीति महादेव - वरदानं च स्पष्टमेवो-..तम् । तत एवावधार्य पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोत् । ततः सेतु-बन्धनं जातमित्यक्षरार्थः । ( ६ १२५ / २०-२१ ) इससे हमारा पक्ष सिद्ध और वादीका पक्ष खण्डित होगया । पुराण वाल्मी - रामायण के उपजीव्य हैं; तभी तो वाल्मी. रा. में स्थान - स्थान पर : पुराणोंका नाम भी आता है - ' पुराणेषु मया श्रुतम् ' ( १ | १ ) तभी तो वाल्मी. में कथित रघुवंशचरित्र पुराणों में मिलता है-इस विषय में ' आलोक ' में अन्यत्र देखो । ( ख ) हमने पुराणोंकी प्राचीनताके विषय में यत्र तत्रः लिखा है । अब इस एक शोधकर्ता इतिहासलेखकका भी उद्धरण ; देते हैं-' परन्तु इस बातको भी न भूलना चाहिये कि -पुराणोंका - संकलन बहुत प्राचीन है । उनका प्रारम्भ वेदोंके समयसे पूर्व तक • जाता है, और उनका उल्लेख अथर्ववेद ( १५ | ६ | १२ ) तकमें मिलता है । उन पुराणोंका भी एक मूल पुराण था, जिसका - संवर्धन और सम्पादन समय - समय पर होता आया है; और ... ऐतिहासिक युग में जिसका बृहत् सम्पादन उस समर्थ इतिहास--कारने किया, जिसका नाम भारतीय संस्कृति में प्रतिनिधिस्वरूप जीवित रहेगा । वह है यशस्वी व्यास- कृष्णद्व पायन व्यासः । * ` • इतिहासके अनेक प्रशस्त युग तो कब के चीत चुके थे, और शिवलिङ्गपूजा क्यों? उनको घटनाएँ किसी न किसी रूप में लिखी जा चुकी थीं; क्योंकि व्यास तो सम्पादकमात्र थे ' अथवा कही भी उसक का इतिहास ' - श्रीभगवतशरण उपाध्याय ( ' प्राचीन भारत । पृ. १-२ ) -यद्यपि हम इस कथनसे पूर्णतया तो सहमत १ पु. का यह कथन हमारे विचारोंका अधिकांश पृष्ठपोषक नहीं हैं; त / १.५३ - वादिमान्य श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल है । वादिप्रति- नभा ( ग ) शेष रहा शिवद्वारा रामकी भी यही मत रखते हैं । गोष्ठार शिवकी पूजा यह दोनोंकी अभिन्नता पूजा, और रामद्वारा समय , बता रहा है । रामद्वारा । देखो शिवकी पूजा मानुष्यक में महान देवकी पूजा की मर्यादास्थापनार्थ । है । इस विषय में गत निबन्धों में भी लिखा जा चुका है । । पूजन ( घ ) पद्मपुराण में शिव - शिवाकी द्यूत - क्रीडा माना द्यूत - व्यसनकी हुआ हानिके प्रदर्शनार्थ है, जो उसमें बताई गई है, आश्चर्य है कि शुद्ध वादी इन रहस्योंको नहीं देखता; ऊपर - ऊपर ही देखता रहता होती है । वह कथा वेदके अक्षसूक्तमें कही हुई द्यूतके परिणामके भाष उदाहरण बताने के लिए है, इसीलिए तो पुराण- वेद के पुराकल्प पूजा अथवादरूप भाष्य हैं । रावणद्वारा शिवलिंगपूजा में कारण स्वाभ राक्षसत्व नहीं है, जब कि देवताओं द्वारा तथा श्रीराम एवं ही स हनुमान् आदिके द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा भी. वह पूजा दिखलाई बोक गई है । देखो - ततः प्रभृति शुक्राद्याः सर्व एव सुरासुराः । ऋषयश्च पूजा नरा, नागा: नार्यश्चापि विधानतः ।, लिंग - प्रतिष्ठां कुर्वन्ति लिंग तं मीम पूजयन्ति च । ( शिव, विद्ये. ३५/८५ ) यही महादेवकी महत्ता: है । पर वादी की उससे अनभिज्ञता- सिद्ध हो रही है, जो कि " चल 3 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative