सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 441–450

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 441–450

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| श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) | ८४३ ६४४ कामादयोऽनेन - इति भर्गः, भृजी भर्जने न्यङ्क्वादि-के! तुम | सृज्यन्ते ( ) ही थे; तब पर- स्त्रियोंमें कभी आसक्त न होने त्वया त्वात् कुत्वम् वाले महादेवको परस्त्री- लम्पट कहने वाली वादीकी अपराधी ( ३२ ) जीमको दण्डित करके यहाँ हमने काट डाला है - यह ' आलोक ' सुन्दर के पाठकोंने अनुभव किया होगा । अव वादी अपनी जीभ के फट जानेसे मूक हो जावेगा - आशा है ' आलोक ' पाठक इस उस कौतुकको स्वयं देख लेंगे । तब वादीका आक्षेप खण्डित हो गया । का रूप ने उसे दूसरे पुराणकी बातका अन्य पुराण के वचनमें वादीको सङ्कर तम नहीं करना चाहिये । ६ ( अवतार लोक - कल्याण, अधर्म के नाश व धर्मस्थापनार्थ आदाय होते हैं ( गीता ) यह वादीसे आक्षिप्त वचन ठीक है । जैसा कि अङ्ग खित के कहा है- ' मर्त्यावतारस्त्विह मत्ये शिक्षणम् ' ( श्रीमद्भा. ५/१६ ५ ), पर थको यह स्मरण रखना चाहिये कि - अवतार के दिव्यादिव्य होनेसे करने उसके लोकोत्तर चरित्र ग्राह्य नहीं होते । हां, लौकिक सुचरित्र डाला प्राह्य होते हैं, यह श्रीमद्भा. ( १० | ३३ | ३१-३२ ) में स्पष्ट कर दिया काशित गया है । श्रीकृष्ण के भगवान् होने में विष्णुपुराणका यह वचन उस मननीय है- ' तद्भर्तृषु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः । आत्मस्वरूप-यहाँ रूपोऽसौ व्यापी वायुरिव स्थितः ( ५/१३ ६१ ) तथा समस्तभूतेषु बेहा नमोऽग्निः पृथिवी जलम् । वायुश्चासौ तथैवासौ व्याप्य सर्वमव-च स्थित: ' ( ६२ ) यथावद् वीयेमालोक्य न त्वां मन्यामहे नरम् ' ( ५ । १३ । ५ ) ‘ बालत्वं क्वातिवीर्यत्वं ' ( ७ ) । जब पुराणसे वादी ।३३ ) दोष दिखलाता है, तब उसे पुराणके उन पद्योंको - जिनसे उन CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर प्रालीचना [ ८४५ दोषों का समाधान हो जाता है - छिपाना ( ८ ) ( गोपियोंकी नहीं चाहिये । का पेशा है ) यह योनिके काम कीटोंके मारनेका श्रीकृष्ण-वादीने ' आलोक ' ( ६ ) का कथन लिखा पर यह इस झूठे दयानन्दीका है । नहीं लिखा सफेद झूठ है । ऐसा वहां कहीं दृष्टान्तमें वाद ' से दृष्टान्तसे में लिखा । वहां तो एक संयमीका दृष्टान्त एकदेश ही लिया जाता दिया गया है । है । सो वहां तो अभ्युपगम- ' वादी पक्षको कुछ समय केलिए मानकर श्रीकृष्ण का संयम दिखलाया भी उक्त गया है । यही श्रीमद्भा है - ‘ यस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैर्न शेकुः ' ( भाग ‘ आत्मन्यवरुद्धसौरतः ' ( १० | ३३ | २६ ); पर वादी १।११।३६ ) असत्य व्यवहार करता हुआ आसुरभाव को प्राप्त हुआ ' हुआ है । देखो ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ५७६ । ६ ( कुब्जासे संयोग करके श्रीकृष्णजीने उसकी कमर सीधी की ( निष्कलङ्क कृष्ण ) वहाँ ( कुब्जा की कुब्जाका दूरीभाव बताया गया है । यही उसका संयोग बताया गया है । १० ( कृष्ण जन्मसे ही कामशास्त्र - विशारद थे, राधा परम-कामुकी थी । बालक कृष्ण जंवान वनकर युवती राधासे नित्य संभोग किया करते थे ( ब्रह्मवैवते ) । ब्रह्मवैवर्तमें राधाको भगवान् की शक्ति मूल प्रकृति बताया गया है । सो यह प्रकृति - पुरुषका रमण है, केवल उसे लौकिक रंग दे दिया गया है । इसपर देखो - ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ४१७-४२५ ) । ' सृष्टि करनेसे उन्हें ' कामुक ' कहा गया है- ' सोऽकामयत--Gujarat. An eGangotri Initiative IT ANA

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८४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) बहु स्यां प्रजायेय ' ( शत. ११५८१-६ ) ' प्रजापतिरकामयत - प्रजायेय; भूयान् स्यामिति ' ( ऐ. बा. २५/७ ) आत्मैव ' इदमग्र आसीद् एक एव, सोऽकामयत - जाया मे स्याद् अथ प्रजायेय ' ( बृह. १ | ४ | १७ ) यही राधा - कृष्णका कामुकत्व व्याख्यात किया गया है । इसी -लिए श्रीकृष्णने राधाको कहा था - ' यथा त्वं ( राधा ) च तथाऽहं ( कृष्णः ) च समौ प्रकृति - पुरुषो । नहि सृष्टिर्भवेद् देवि! द्वयो-रेकतरं विना ' ( ब्रह्मवैवर्त, ४।६७ / ८० ) । इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ४१८-४२५में वादी देखे । ११ ( दण्डकमें ऋषि द्वापरमें गोपियां बने । उनकी कामेच्छा जो रामावतार में पूरी नहीं की थी, द्वापर में उन्हें भवसागरसे तार दिया । यही गोपियों में कृष्ण के विषयभोगका रहस्य था ' ( पद्मपुराण ) । उत्तर- -मुनियोंमें जो भगवदुविषया रति थी, वह शृङ्गाररस नहीं था, किन्तु ' भाव ' था; क्योंकि पुरुषों की पुरुषविषया वा भगवद्विषया रति शृङ्गार नहीं होती; किन्तु ' भाव ' नामसे कहाती है - यह साहित्यदर्पणादि में प्रसिद्ध है । सो दूसरे जन्ममें भी उनको वही रति ' भाव ' रहा, शृङ्गाररस नहीं । यदि वादी साहित्यकलासे विद्दीन नहीं होगा, तो यह जानता होगा । वादी भी ‘ पुराणोंके कृष्ण ' ( पृ. १४ ) में मानता है - " जहां ‘ रमण’.योगी अथवा भक्त वा ईश्वरके सम्बन्धके अर्थ में आता है, वहां भक्त वा योगी-का ईश्वरके ध्यानमें मग्न होने के अर्थ में लाता है ' ' तब पुराण में भी श्रीकृष्ण ईश्वर ( श्रीमद्भा, १०/२१/४ ) बताये गये, हैं, मुनि योगी ( CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर आलोचना EXO बताये गये हैं, और गोपियां भक्त ( श्रीमद्भा . १०/२६/३१ गई हैं, तब वादीका आक्षेप स्वयं वादी के ) बताई हो गया । इस विषय में आलोक ' ' ( ६ ) वचन से ही खण्डित पृ. ६१६-६२१ देखो १२ ( ' गीता श्रीकृष्णको योगीश्वर बताती है, । भागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि उन्हें भोगीश्वर बताते पर धर्मसंहिता; इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' ( ६-७-६ ) में हैं ) है, गत ( ५ क. ) प्रश्नमें भी समाधान कई बार आ चुका दे दिया है, देखो पृ. ८३५-८४२ । ' यस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैन शेकुः ' श्रीकृष्णकी इन्द्रियको स्त्रियां अपने ( भा. १ | ११ | ३६ ) हावभावों से भी आकृष्ट नहीं कर सकी थीं, जब यह श्रीमद्भागवतपुराणका विषय में सिंहनाद है; तव स्पष्ट है कि - श्रीकृष्ण के भी भोगकामना श्रीकृष्णभगवान्‌की कुछ नहीं थी । वेदानुसार अपनी स्त्रियों में सन्तान करनेका नाम भोग नहीं होता, वह तो गार्हस्थ्यधर्मका पालन १३ ( गोपालसहस्रनामः कृष्णको I ' जार ( व्यभिचारि ) शिखा-मंणिः ' लिखता है ) इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ५२६-५३४ में देखो । स्तोत्र कभी निन्दक नहीं हो सकता । १४ ( गोपियोंको भागवतकार ' व्यभिचारदुष्टाः ? ( १० | ५७१५६ ) जंगली व्यभिचारिणी वा दुष्टा चताता है; तो ' आलोक ' में इन बदमाश गोपियोंको पवित्र वेद की ऋचा बताकर वेदोंको कलङ्कित किया है ) इसमें व्यभिचार - दुष्टाः को समाधान आलोक ' ' ( ७ ) हूं. ' Gujarat. An eGangotri Initiative 24

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। श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ६४५ २१०-२११ में देखो । शेष है चाश्रोंसे भगवान्का रमण, यह तथा भागवत आदिमें स्पष्ट है, इसे हम ' आलोक ' पद्मपुराण ( ६ ) पृ. ५७६ तथा ' आलोक ' ( ७ ) पू. २०६-२०७, ४६४-४६५ में बता चुके हैं । इसमें वेद की ऋचाओं पर कोई कलङ्क नहीं । यदि कोई दयानन्दी कहे कि - ' स्वा.द. जी हर समय वेदकी ऋचाओंसे रमण किया करते थे, तब क्या वादी स्वा.द.को कामी तथा ऋचाओं से सम्भोग करनेवाला मान लेगा । ऋचाओंको सचमुचकी स्त्री मान लेगा? स्वा. द. जीने ' आर्याभि-विनय ' के ' सोम! रारन्धि नो हृदि ' मन्त्रके द्वारा अपने अन्दर रमण करनेकी प्रार्थना की है; तब क्या बादी स्वामीजीकी परमात्मासे उनमें मैथुन करनेकी प्रार्थना मान लेगा? बलिहारी है - वादी की शुद्ध - बुद्धि की! १५ ( भागवत्तमें गोपियां श्रीकृष्णको ' सुरतनाथ ' ( सम्भोगके पति ) बताती हैं ) इसपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २११-२१२ देखो । १६ ( श्रीकृष्णजी महाभा में कहते हैं कि मैंने १२ वर्षे तक ब्रह्मचारी रहकर एक पुत्रको जन्म दिया था, पर पुराणकार के अनुसार १६००० औरतोंसे १,६०,००० लड़के ही पैदा करनेका उनका काम था; उन्हें और कोई काम - धन्धा नहीं था ) । जहां पूर्वोक्त बात महाभा में लिखी है, यह उनके सबसे पहलै रुक्मिणीविवाहकी बात है, उसके बाद ही वहीं उनकी १६१०० स्त्रियाँ भी महाभारतमें लिखी हैं - ' षोडशस्त्रीसहस्राणि’-प्रतिपेदे हृषीकेशः ' ( उद्योगपर्व १५८ ( 5 ), अनुशा. ( १५/७ ), CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रवतारवादपर आलोचना [ ८४ ९ स्वर्गारो, ( ५/२५ ), ' मौसल ( ७/३८ ), उद्यो. १३०/४४ शिवपु. में भी आया है - ' भार्यासहस्राणां ) में तथा ३।३६ ) उन्हें बताया वल्लभः ' ( शि. उमासं. वादीकी है । ' उन्हें और कोई काम नहीं था ' यह बात तो पुराणसे भी विरुद्ध है । भगवानने उन्हीं बड़े - बड़े युद्ध किये, अन्य संसारी व्यवहार दिनों अपनी स्त्रियोंसे ऋतुगमन भी पूरे किये । माना करनेवालेको भी मनुजीने ब्रह्मचारी है ( ३५० ) । १७ ( जाम्बवती के जब लड़का नहीं हुआ; तोः कृष्णजी ने वर्षों तक शङ्कस्की आराधना की ( देवीभा. ) : इससे वादीका क्या सिद्ध हुआ? कई स्त्रियोंको लड़का जल्दी नहीं होता; कइयोंको शीघ्र हो जाता है । सो बहुत स्त्रियों- NT ANA में प्रिय स्त्रीका लड़का न होनेसे यदि शङ्कर की आराधना · गई, इसमें कोई दोष नहीं; तब तक उनकी स्त्रियां भी की थोड़ी ही थीं । पहली रुक्मिणी, दूसरी थी जाम्बवती, और ३ री -सत्यभामा । तब इसमें असम्भव क्या? और फिर श्रीकृष्ण में योगविद्या बड़ी प्रबल होने से वे बहुतसे रूप बना लेते थे, एक से 70 • तपस्या करते हों, अन्योंसे शेष स्त्रियों के पास भी रहते हों, अन्य - रूप से समय पर अर्जुनके सारथी भी रहे हों, अन्य रूपोंसे - अन्य ( लोक - व्यवहार भी करते रहे हों; इसमें असम्भव कुछ - नहीं । वेदान्त ( १।३।२७ ) दर्शन में ' आत्मनो वै शरीराणि बहूनि a • भरतर्षभ! कुर्याद योगी बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् । प्राप्नुयाद् · विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्र तपश्चरेत् । संक्षिपेच पुनस्तानि सूर्यो स ० ध ० ५४ Gujarat: An eGangotri Initiative

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८५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) रश्मिगणानिव ' यह पद्य बहुत प्रसिद्ध है, योगीश्वर श्रीकृष्ण में भी यह घटा लीजिये । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ६३३-६४४ देखो । अणिमादि ऐश्वर्य ( भग ) युक्त होनेसे वे ' भगवान् ' थे; ( विष्णु पु. ६५ ७४,७ ९ ) अतः सभी कुछ कर सकते थे । - शेष रही श्रीकृष्ण की शङ्करकी आराधना, श्रीकृष्ण, भग-वान् होते हुए भी उस समय मनुष्यावतारमें थे; तब उन्होंने ‘ लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ' ( गी. ३।२० ) ' यद् - यदा-' चरति श्रेष्ठः ' ( ३ | २१ ) इस न्यायसे तपस्या भी की । शेष है पुत्रादिकेलिए श्रीकृष्णकी तपस्या, इसपर देवीभा. ( ५।१।५-११, १२-१५ ) में वादी देखे; पुराणने उसमें उसे मुंह तोड़ उत्तर दे रखा " है; क्योंकि दूरदर्शी पुराणको पता था कि - वादीने ' ऐसा प्रश्न ' करना है । भगवान् भी प्रजा प्राप्तिके लिए तपस्या किया करते हैं । देखो ब्राह्मणभागात्मक वेदमें- ' प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीद एक एव, सोऽकामयत - बहु स्यां प्रजायेय । सोऽश्राम्यत् ' ( श्रमुं तपसि खेदे च ' ( दिवादि. से. प. ) ' तपोऽतप्यत ' ( शत. ११/५/८/१ ) यह प्रजापतिकी प्रजाकेलिए तपस्या लोक - संग्रहार्थ ही है । १८ ( भागवत कृष्णको परमात्माका अवतार मानता है, पर शिवपुराण श्रीकृष्णका मुख्य पेशा शङ्करकी गायें चराना बताता हैं ) इसका उत्तर पहिले ( पृ. ६२६- ६२७ में तथा अन्यत्र ) दिया ' जा चुका है । वहाँ ' कृष्णनामा पुरुषः ' लिखा है, सो वहाँ भग-वान् श्रीकृष्ण इष्ट हों, यह श्रावश्यक नहीं । श्रीराम केवल कास-• गंज में नहीं, देहली में भी एक श्रीराम हमारा शिष्य है, जो VS SPOS CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर आलोचना [ हमसे पढ़ चुका है; अब भी कभी आ जाता है को कहीं शिवका अंश लिखा हो; इसमें । यदि श्रीकृष्ण-भी उनके महादेवत्वके प्रतिपादनार्थ कोई दोष नहीं । गीता में भी श्रीकृष्णके । • रूप में ' ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ' ( ११।१५ ) शिव विराट् । अंश बताये गये हैं, कभी बाहु अङ्गी होती है और भी उस रूपके अङ्ग । कभी वह भी शरीरका अङ्ग होती है, हाथ उसका । कभी हाथ होता है; अंगुलियाँ उसका अङ्ग । यह सब उपाधि में कहा है- ' स्तोता मे गोषखा स्यात् ( - भेद हैं । वेद ' . ८/१४/१ ) श्री सार तात्पर्य बताया है कि- ईश्वरस्य तव स्तोता कुतो देतोसहित . न भवेद्, अपितु भवेदेव ' तब ईश्वर महादेव के स्तोता व्यापक श्रीकृष्ण भी यदि पुराणमें गोसहित रहते हैं; तब इसमें कोई दोष नहीं । .... १६. महाभारतमें यदि श्रीकृष्ण पुत्रके & स्वास्थ्य आदिका शंकरसे वरदान मांगते हैं, और देवीभा में पुत्र जन्म के लिए शिवसे प्रार्थना करते हैं; 2 तो इसमें क्या हुआ?, किसी प्रन्थों पुत्रोत्पत्तिसे पूर्वकी स्थिति, और किसीमें उसके बादकी स्थिति हो । वृत्तोंके अनन्त होनेसे कभी कोई वृत्त आगया; तो, कभी कोई और, इसमें कुछ भी विरोध नहीं । २० ( क़ ) वादीका यह कहना कि - रामावतार में विष्णुने बालीका तत्र घोर अन्यायपूर्वक प्रक्रिया था यह ठीक नहीं । बालीसे श्रीरामका युद्ध नहीं था, किन्तु बाली को दण्ड देना था । वह जिस भी प्रकार से दिया जावे, हो सकता है । अन्यायेन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 445

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श्रीसनातनधर्मालोंक ( 2 ) ८५२ २ ] श्रीकृष्णक ( ४ | १८ | ४७ ) यह तो बाहरी नाट्यदृष्टि से कहा गया तो बाली - शक्तिकी महिमा बताने के लिए । ( ख ) यह कहना कि देवत्वके है केवल में वेदव्यासजीने वताया कि - " कृष्ण ने कुलधर्म से दूषित विराट् शिवपुराण पंतित स्त्रियोंके साथ सम्भोग किया, वा वेदमार्गको त्यागकर रूपके उनके साथ ' शादी की ” । " वादीका यह कथन बिल्कुल झूठ है । उसका यह उसके दैत्यों वा राक्षसोंके बन्धु होनेका पोषक है, क्योंकि हैं । वेद यह कथन गालीवक्ता दैत्य - तारकासुरका है, व्यासजीका नहीं, इसपर नायरने ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १८६-१८६ देखो । ( ग ) श्रीकृष्णका रुक्मिणी-सहितो हरण पापकर्म नहीं था, यह तो क्षत्रियकेलिए वैध - विवाह है " । व्यापक देखो इसपर मनुस्मृति - राक्षसं क्षत्रियस्यैक ' ( ३३२४ ), तब श्रीराम-को अन्यायी तथा श्रीकृष्णको व्यभिचारी वा पापी कहना कोई गाली वक्ता वादीका स्वयं वैसा होना बता रहा है । दिका BF ( तीनों देवता कामी क्रोधी, छली - कपटी, जन्म - मरणके केलिए चक्कर में गोते खाया करते है ' देवीभ. ) इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' जबसे ( ७ ) पृ. २२० - २२४, तथा पृ. ९ ३७ में देखी । स्थिति!! २ श ( देवताओंने मिलकर अनुसूयासे व्यभिचारकी चेष्टा की ' कभी ( भविष्य, प्रति ४ ( १७ ) इसपर अलोक ( ७ ) पृ. ६४-६७ पृ. २३०-२३५ देखो । २३ ( ' आलोक ' ( ६ ) में लिखा है- ' गोपियोंसे कृष्णका पवित्र नहीं । संम्बन्धाथी ' ' पर ब्रह्मवैवत में लिखा है उनके साथ ' धर्मसान था । व्यभिचार होता था ) पहि येव ब्रह्मवै. श्रीकृष्णका स्तुतिकर्ता पुराण है, वह भला श्रीकृष्णका CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर प्रालोचना [ ८५३ व्यभिचार कैसे कह सकता है? वस्तुत- पुरुष स्वयं जैसा होता है, वह दूसरेको भी वैसा समझता है । बादीको व्यभिचारके स्वप्नदोष खूब हुआ करते हैं, कारण स्पष्ट है । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में ‘ सुदर्शनचक्र ' में प्रत्युत्तर दे दिया है । २४ ( विष्णुने दैत्यनारियोंके साथ, सती वृन्दा वा तुलसी के साथ धोखा देकर उनके पतियोंका रूप धरकर व्यभिचार किया था, विष्णु परज़ारी लम्पट हैं ) 2 इसपर ‘ आलोक ' ( ६ ) पृ. ५७३-७६, ४६१-५०० ), ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १४३-१४६ में देखो । गत ५ ( क ) निबन्धमें भी देखो । २५ ( श्रीकृष्ण - बलराम नारायण ऋषिके काले और सुफेद चालके अवतार थे ( मुद्दा. ब्रह्मपुराण आदि ) इसपर बादी ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३०२-३०३ देखे । विष्णुपुराण में लिखा है-‘ एवं संस्तूयमानस्तु भगवान् परमेश्वरः । उज्जहारात्मनः केशौ सित - कृष्णौ महामुने! ( ५।१५ ) इसमें श्रीनारायण को परमेश्वर लिखा है । अउसी अङ्गी का होता है, पृथक नहीं माना जाता । नहीं तो वादी अपने माता - पिता के जिनसे पैदा हुआ है, 86 तो क्या वह अपने को उन्हीं अङ्गोंका अवतार मानता है? २६ ( अवतार स संदर्भ ( १ ) के प्रचारकेलिए होते हैं ( गीता ), परन्तु पद्मपुराण लिखता है -- अवतार वेदानुयायियों, परम धर्मात्माओंको कुमार्गगामी, वेदविरोधी धनानेको, शिव, विष्णु-स्वयं अपने षड्यन्त्रोंको पूरा करनेको लेते हैं ) यह बात वादी की गलत है, पुराणका कभी ऐसा सिद्धान्तपक्ष Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 446

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श्री सनातनधर्मा लोक ( 8 ) नहीं है । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १६३-२०१ देखो । २७ ( शिवजीने कच्छप, शूकर वा नृसिंहको मार डाला था । नृसिंहकी खाल तक उतरवा ली । जो सरयूमें डूबकर मरा हो, जिसका प्राणान्त बहेलियेके द्वारा बाण मार देनेसे हुआ हो, जिसकी दाढ उखाड़ ली गई हो, यह अवतारवादकी धज्जी उड़ाना है ) . इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में पृ. २५० - २५३, १६८-१७२, ४८०-४८९ में देखो । वादीके २७ प्रश्न जिसपर उसे गर्व था, वे थोथै निकले, सम्यक् समाहित हो गये । अब उक्त पुस्तककी अवशिष्ट अन्य बातोंपर भी विचार किया जाता है।-( २८ ) ' जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम् ' ( भा. १० ४७/८ ) जैसे भोग करनेके बाद जार ( व्यभिचारी ) पुरुष स्त्रीको त्याग देते हैं, वैसे ही श्रीकृष्णने हम ( गोपियों ) को त्याग दिया है ' इससे गोपियोंने श्रीकृष्णकी जारसे उपमा दी है ' । ' वादीने यह सबसे पहला प्रमाण अपनी समझमें श्री कृष्णको बदनाम करनेकेलिए दिया है, पर इस उपमासे उसने स्वयं अपने पक्षकी हानि की है । इससे उपमान और उपमेयमें ' साधर्म्यमुपमा भेदे ' ( काव्यप्र, १० म ) इस सिद्धान्तानुसार भेद हुआ करता है । जब कहा जावे कि - ' अयं प्रतिपक्षी पशुरिव निर्विवेकः " तब इससे क्या प्रतिपक्षी सचमुच अपनेको पशु ( सींग - पूछ आदि वाला ) मान लेगा? यदि नहीं, इससे केवल उसका साधारणधर्म ' निर्विवेक ' ही वहां इष्ट होगा, इसी प्रकार ' यथा जारो रतां CC - 0. Ankur Joshi Collection. अवतारवादपर आलोचना स्त्रियं भुक्त्वा त्यजति ' इस उपमामें उपसेयसे है कि- श्रीकृष्ण जार नहीं थे । यहां तो साधारण भेद स्वतः सिद्ध । ही केवल इष्ट है । धर्म ' त्याग ' पुराणोंका निन्दक यह प्रतिपक्षी अपने - आपको प्रकाशक ' बताता हुआ भी वेदसे अनभिज्ञ ' वैदिक वेदानुसारी हैं- -यह उस बेचारेको है । पुराण भी प्र प्रायः मालूम नहीं । अब र प्रकारकी उपमा हम वेदसे दिखलाते हैं । यह तो मानता ही है कि- ' जार ' का अर्थ ' पति ' नहीं होता व भिन्न ' होता है; वेदमें भी वह यही बात देख लें- , किन्तु ' पतिदे ' यस्त्वा भाव [ भूत्वा ] पतिर्भूत्वा. जारो भूत्वा निपद्यते ( अ. २०६६।१५ ) यहां एक पिशाचका पृथक् - पृथक् भ्रातारूपमें किसी स्त्रीके पास उसको हानि पहुँचाने के उद्देश्यसे आना, वा पतिरूपमें आना, वा जार. रूपमें आना कहा है; यहां ' जार ' स्पष्टतया पतिसे भिन्न सिद्ध होता है । अव देखिये वेदमें सोमका प्रजा ( स्त्रीलिङ्ग ) में आगमन ' जार ' से उपभित किया जाता है - ' जारं न कन्या - अनूपत ' ( शृ. ६/५६ ३ ) यहाँ बताया गया है कि जैसे कोई लड़की जारको चुलाती है;. वैसे तुम्हें भी ऐ सोम! प्रजा बुलाती है । अब क्या चादी सोम- अपने अनुसार परमात्मा को भी जार ( व्यभिचारी ) करार देगा ९ । इसी तरह वेदभाष्य पुराणने भी श्रीकृष्णको जारसे उपमित किया है, दोनों स्थान बराबर उत्तर होगा । अब और देखिये- ' योषा जारमिव प्रियम् ' ( ऋ. ( ३२ ), Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 447

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/ श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ६५६ स्वतः भी पूर्व जैसा वैदिक - वचन है । ' प्रियां न जार: ' ऋ (. ६६६२३ ) धर्म सिद यह भी वही बात है । इसी प्रकार ' जारः कनीन इव ' ( ऋ ' त्या ' यहां ) में भी वादी समझ ले; तत्र क्या इन उपमाओंसे. ११७१८ को ' वैदि बादी वैदिक - परमात्मा ( सोम ) को भी ' जार ' मान लेगा; तब रण भी अपने आपको ' सोम ' ( गीता १५/१३ ) कहने वाले श्रीकृष्ण भी प्रायः अब यदि ' जार ' कहे गये; तब दोनों स्थान उत्तर भी समान होगा । इसी वह ( २६ ) ' गोपियोंके कुच दबानेकी प्रार्थना - ' फरिणफणार्पितं ते तन्तु ' परिषे पदाम्बुजं कुरु कुचेषु नः कुंन्धि हृच्छयम् ' ( भा. १०/३१ ७ ) इसका स्त्वा भाव उत्तर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २०७ में देखो । यहां कुचोंको हाथसे २५ ) यहां दबाना नहीं कहा; तब वादीका इष्ट अर्थ कैसे हो? यहाँ तो उसको ' पैर ' कहे हैं; अतः ' कुच ' का यहाँ ' तात्स्थ्यात् ताच्छंव्यम् ' इस - वा जार • न्यायसे ' वक्षःस्थल ' अर्थ हैं । ( ख ) इसी प्रकार ' चरणपङ्कजं …..नः भिन्न सिद्ध स्तनेष्वर्पय ' ( १०/३१/१३ ) में भी ' स्तनेषु ' का अर्थ पूर्वोक्त न्यायसे ' वक्षःस्थल ' है । ( ग ) इसी प्रकार ' तदङ्घ्रिकमलं संतप्ता स्तनयोर-श्रागमन धात् ' ( १० | ३२ | ५ ) में भी वादी समझ ले | प ' (. ( घ ) ' ं ' हृच्छय ' ( १० | ३२ | ७ ) का अर्थ ' ' हृदय में रहनेवाली जाखो वासनारूप ज्वालाएँ ' हैं । इसी प्रथमें श्रीमद्भा.में अन्यत्र भी इसका प्रयोग आता है - ' मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान् मुञ्चति भिचारी ) हृच्छयान् ' ( १।६।२३ ) ( मुझमें की गई भक्ति सब हृदयस्थित कृष्णको वासनाओं को दूर कर दिया करती हैं ) वादीका आक्षेप कट । गया । ६।३२१५ ), ( ३० ) ' रेमे तया चात्मरत आत्मारामोप्यखण्डितः ' ( १० । ३० । CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर पालोचना [ ८५७ ३५ ) यहां ' रेमे ' का अर्थ बुरा नहीं, यहां ' आत्मरतः अखण्डितः ' ( १० | ३० | ३५ ) यह श्रीकृष्णके, आत्मारामः, विशेषण ' रेमे ' पदके वादी को बहुत पसन्द ' विषयभोग ' अर्थका खण्डन कर इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १८४ से २०१ रहे हैं । तक में ' ववार-रहस्य ' के २०६ से २१४ पृष्ठां तक के आक्षेपोंका प्रत्युत्तर दे दिया गया है । फिर यहां पृथक क्यों लिखा जावे? स्वा.द.जीने मुक्तों-का ' रमण ' ऋभाभू. तथा स. प्र. में बहुत लिखा है, तब क्या वादी मुक्तों का मैथुन मानेगा? यदि नहीं, तब यहां भी नित्यमुक्तका मैथुन अर्थ नहीं । ( ख ) राधा - कृष्ण के रमणका अर्थ प्रकृति - पुरुषका आधिदैविक वा आध्यात्मिक रमण लौकिक ढंगसे वर्णित किया गया है । इस विषय में हमने आलोक ' ' ( ६ ) में प्रत्युत्तर दे दिया था । वादी दोवारा फिर आक्षेप करनेपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ४१८ ४२५ ने हमने पुनः प्रत्युत्तर दे दिया था । इससे वादी के मुखपर ताला लग गया । १० म उत्तर में भी लिख दिया है । ( ग ) ' कृष्णका परनारीगमन ' शीषकसे वादीने ' कृष्णो भूत्वाऽन्यनायेश्व ' यह श्लोक ' पुराणकारके नाम ' से लिखा था; जो कि वस्तुतः दैत्यका वचन है; इसका प्रत्युत्तर आलोक ' ' ( ७ ) ST AN पृ. १८६ - १६६ में दे दिया गया था । इसपर वादी के मुखमें लगाम लग गई । ( घ ) ' परनारीणां लम्पटो नित्यमेव हि ' पर ( गत ५. ( क ) संख्या में लिखा जा चुका है । ( ङ ) ' माता - पिता के गुप्ताङ्गोंकी Gujarat. An eGangotri Initiative 1

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८५६ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) पूजा तो वादीको करनी चाहिये; क्योंकि जननी - जनककी पूजाको वादी मानता ही है, सो जिन श्रङ्गोंसे उनका उक्त नाम है, और जो उनके परिच्छेदक अङ्ग हैं, उनकी पूजा अस्पृश्यता न मानने-वाले वादीको करनी चाहिये, यह हमने ' आलोक ' ( ६ ) में लिखा था; और अस्पृश्यता माननेवालों में इसका निषेध किया था; और वादी पक्षानुसार देवोंका अङ्ग मानकर भी उसमें विशेषता बताई थी; पर वादीने अव.रह. ( पृ. ५० ) में हमारे वाक्योंकी पूर्वापरकी चोरी करके अपने किये आक्षेपोंको निर्मूल सिद्ध कर दिया है । ( च ) ' रेमे रमाभिनिजकामसंप्लुतो यथेतरो गाहिकमेधिकं चरन ' ( भा. १० । ५६।४३ ) वादी से आक्षेपार्थ दिये हुए इस पद्यकी ' यथा - इतर: ' इस उपमासे भगवान्की इतरता खण्डित हो जाती है । उपमाके विषयमें हम पहले ( २८ प्रश्न पृ. ८५५-५६ में ) स्पष्ट कर चुके हैं । श्रीमद्भा. १०/१४/२ के अनुसार भगवान्का शरीर अभौतिक होनेसे ( गीता ४/६ ) उसमें पाञ्चभौतिक स्त्री-पुरुषोंके मैथुनकी कल्पना नहीं हो सकती । वहाँ तो दिव्य लीला है, लौकिक काम - क्रीडा नहीं । .. ( ३१ ) ' त्रिदेव हिमालयपर रहते थे ' यह वादीका कहना गलत है । ' शैलराज ' यह यहाँका ' हिमालय ' नहीं, किन्तु द्यलोक में स्थित हेमालय ( सोनेका ) पर्वतराज सुमेरु इष्ट है । वहीं शक्रपुरी, विष्णुपुरी, शिवलोक आदि हैं । जब देवीभागवत विष्णुलोक को ' सर्वलोकोपरिस्थितम् ' ( ३ | १३ | १८ ) कहता है, ' पुराणोंके कृष्ण ' में CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर आलोचना [ ८५ ८६ वादीने स्वयं विष्णुलोकको आकाशमें १६ करोड़ योजन ऊपर और उसे ' विदेश ' बताया था, तब त्रिदेवोंकी पुरी इस लोकके हिमालयपर कैसे हो सकती है- इतना भी वह नहीं समझ पाती? निव ( ख ) ' त्रिविष्टप ' ' तिब्बतका नाम है ', यह वादीका कथ गलत है | देहलीमें जखीरेके पास ' इन्द्रलोक ' है; तब क्या बादी उसे ही इन्द्रदेवताकी पुरी ' अमरावती ' समझ लेगा? एक मा ' अमरावती ' शहर भी है; तब क्या वादी उसे वहीं इन्द्रकी २०६ नगरी मान लेगा? हमारे लाजपत नगर के पास ' कैलाश ' है, लोक और ‘ गान्धि - नगरमें भी ‘ कैलाश नगर ' है, तब क्या यह वही शिवजीवाला प्राचीन पर्वत है?: महाशय! ' न्निविष्टपं ' तो ' स्वर्ग ' का नाम है । देखो अमर-कोष - ' सुरलोको द्यो - दिवौ द्व े स्त्रियां क्लीवे त्रिविष्टपम् ' ( १ | १ श ६ ) वह द्युलोक में है, इस लोकमें नहीं । स्वर्गलोक में बड़ा सुख होता प्रथ है, पर तिब्बतमें दुःखदायक सर्दी खूब होती है, वहाँ स्वर्गीय F सुख कहाँ? वहां देवता अमर होते हैं, पर तिब्बत में मृत्यु हाय ' होती है । ' त्रिविष्टप ' ' तिब्बत है ' इसमें कोई प्रमाण नहीं, यह निर्मूल कल्पना है, जिसे स्वा. द. जीने किसी अधकचरेसे सुन-सुनकर लिखा है । ' तृतीयं विष्टपम् ' - लोक इति त्रिविष्टपम् । भूः भुवः स्वः ' इन लोकोंमें तीसरे लोकका नाम त्रिविष्टप होता है । पृथिवीलोक ( भू:), अन्तरिक्षलोक ( भुवः ), और द्युलोक ( स्वः ) यह तीन लोक - Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) SXE ८६० ] हैं तीसरा लोक द्युलोक है । यह वहां है, जहां ग्रहनचत्र । होते, कंके सकते हैं, जहां राकेट पहुँचनेका प्रयत्न करते हुए भी नहीं सके । वही त्रिविष्टप होता है । निरुक्तकारने उसका नमक पहुँच किया है- ' अथ गौराविष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिः निर्वाचन यह कथन ( २३१४/१५ ) ( पुण्यकर्म करनेवाले उस स्वर्गलोक में जाते हैं ) । बादी इसी त्रिविष्टपः ( स्वर्ग ) में नक्षत्रोंका रहना कहा है, उन्हें पुण्या-ऍक माओं का प्रकाश कहा है- ' देवगृहा है, नक्षत्राणि ' ( तैना, १.५ । न्द्रकी २६- ऋ. सायणभाष्य १२५०१२ में ) ' यो वा इह यजतेऽमुस है, लोकं लढते. ( मच्छवि ), तन्नक्षत्राणां नचत्रत्वम् ' ( तै. ब्रा, १ ५२ ५ ) वही ( वहांसे पुण्यकर्ताओं का स्वग़में नक्षत्ररूप में, होना कहा है ) । ' सुकृतां वा एतानि ज्योतीँ ूंष यन्नक्षत्राणि ' ( कृ.य.तै.सं. ५ | ४ | १ | ३ ) मर मो.यह सब स्वर्ग ( चुलोक ) में, तो ऐसा होना कहा है; यह १६ ) तिब्बत में सम्भव नहीं; श्रुतः, व्ह- ' त्रिविष्टप ' भी नहीं । तिब्वत होता प्रथम लोक - भूलोक है, उसमें तारे, नहीं वह द्युलोक नहीं । वर्गीय महाभारत में भी जब अर्जुन, स्वर्गलोक में मातलिके रथद्वारा गयत; वहाँ स्विर्येव प्रभ्रया तत्र द्योतन्ते पुण्यलन्ध्या । तारा - रूपाणि यह यानीद्द दृश्यन्ते - द्युतिमन्ति वै ( वन. ४२।३३ ) एते सुकृतिनः पार्थ । सुन- खेषु धिष्ण्येष्ववस्थिताः । यान् दृष्टवानसि विभो! तारारूपाणि भूतले ( ३६ ) एवं समाक्रमँस्तत्र स्वर्गलोके महायशाः । ततो ददर्श इन शक्रस्यः पुरीं तामसरावतीम ' ( ४२ ), नक्षत्रमार्ग विपुलं सुखीथीति लोक विश्रुतम् ' ( ४३।१२ ) अजु - नने तारे देखे । सो वे तिव्वतमें नहीं लोक हो सकते । तारोंको तो पुण्यात्माओं का प्रकाश कहा जाया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर श्रालोचना [ ८६१ तिब्बतमें पुण्य करने वालोंके जानेकी वा उनके प्रकाशकी कुछ भी गति नहीं हैं । चीनी तिब्बत में पहुँचे हैं; क्या वे पुण्यवाले हैं? क्या उनके प्रकाश वहां तारे - स्वरूप हैं । ' देवासुरात्मस्वर्ग ' ( पुंलिङ्गाधिकार ) इस पाणिनीयलिङ्गानु-शासनके सूत्र से स्वगंके सभी पर्यायवाचकों का पुलिङ्ग प्राप्त था । इसमें ' त्रिविष्टप ' शब्दको भी इस सूत्र से स्वर्गके पर्यायवाचक होने से पुलिङ्ग प्राप्त था; पर इसके अपवाद - त्रिविष्टप - त्रिभुवने नपुंसके ' ' इस सूत्र से नपुंसकलिंग होगया । इसलिए उक्त सूत्रकी वृत्तिमें लिखा है- ' तृतीयं विष्टपं त्रिविष्टपम् । स्वर्गाऽभिधानतया ' पु'स्त्वे प्राप्ते अयमारम्भ: ' ( पूर्वसूत्रसे स्वर्गके पर्यायवाचक होनेसे " त्रिविष्टप ' को भी पुलिङ्ग प्राप्त था; पर नपुंसक करने के लिए इस ' सूत्रको आरम्भ किया गया । " 1. इसी त्रिविष्टप ' को वेदादिमें संक्षेपसे ' विष्टप " " भी कहते हैं । जैसे कि विष्टप ( निघण्टु ११४ ) ( उणादिकोष ३ १४५ ) स्वा.द. जीने इसको अर्थे ' सुखविशेषमोगः ' ' लिखा है । स्वामीजी स्वर्गेको ' छिपाना चाहते थे, अतः जहां भी उन्हें ' ' स्वर्ग ' शब्द मिलता था; ' वहाँ वे उसका लोक - विशेष अर्थ ' न ' करके उसका अर्थ " सुख-' विशेषभोग कर दिया करते थे; तथापि ' सुखविशेषभोग ' से भी " स्वर्ग " छिप नहीं सकता । सुखविशेष का भोग स्वगलोक में प्रसिद्ध “ है । अन्यथा वे इसका ' अर्थ ' ' सुखभोग ' मात्र लिखते । ' स्वर्ग ' सुखका पर्यायवाचक ' नहीं होता; किन्तु स्वर्गलोक में सुखविशेष ' हुआ करता है । TANA ar Gujarat. An eGangotri Initiative

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८६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श्रथर्ववेदसंहिता भी ' विष्टप ' यह स्वर्गलोकका नाम बताती है । जैसे कि- ' ऊर्ध्वो नाकस्य अधि रोह विष्टपं स्वर्गो लोक इति यं वदन्ति ' ( ११ | १ | ७ ) तब ' त्रिविष्टप ' यह तिब्बतका नाम सिद्ध न हुआ । ( ३२ ) ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ' में ' गर्भ ' का अर्थ ' अन्तःकरण ' करना ठीक नहीं । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ४०६-४१७ देखो । ' एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः, स उ गर्भे अन्तः ' ( अ. १०/८/२८ ) इस वैदिक - मन्त्रमें उसे अन्तःकरणमें अलग कहा है, तथा गर्भमें पृथक्; अतः वादी कट गया । ( ख ) भारत संसारकी नाभि है; इसकी प्रकृति पूर्ण है; अतः अवतार भी भारतमें होते हैं, और वेद भी । गङ्गा आदि उत्तम नदियां भी भारतमें ही हुई हैं । इसी विशेषतासे संसारके केन्द्र • भारत में अवतार हो जानेसे अन्यत्र सर्वत्र ठीक - ठीक रहता है । ( ग ) रावण आदि राक्षसों की हृदय की गतिको अन्दर ही अवरुद्ध करके परमात्मा पल भरमें मार सकता था; तब अवतार क्यों? ' इत्यादि वादीकी निकम्मी बातें हैं । गायके भीतर ठहरा हुआ दूध न उसका अपना लाभ करता है; न दूसरोंका; श्रुतः गायसे अलग होने पर भी वह लाभप्रद सिद्ध होता है, दूसरोंको उसका पता भी लगता है, उससे लाभ शिक्षा आदिका पता भी लगता है । पुराण स्वयं बताता है- ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्य- शिक्षणं रक्षो-वधायव न केवलं विभोः ' ( श्रीमद्भा, ५/१६/५ ) ( अवतार केवल राक्षसोंके वधकेलिए नहीं होता, किन्तु मनुष्योंकी शिक्षार्थ भी CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर आलोचना | ०६३ हुआ करता है । इस विषय में आलोक ' ' ( ७ ) देखो । वादी के प्रत्येक आक्षेपपर हमने यहां पृ. ३६६-४०३ उसके आग्रहवश प्रत्युत्तर दे दिया है । ( १६ ) शिवलिङ्ग - पूजा क्यों? वादीका ' शिवलिङ्गपूजारहस्य ' निकला था उसकी बातों पर विचार हमने आलोक ' ' ( ६-७ ) में दिया , कई सरकारने वादीकी उस पुस्तकको ' जप्त ' कर लिया था, पर था; क्योंकि-` वह अत्यन्त असभ्य शब्दोंमें निकली थी । इससे वादी को कुछ दिन जेलमें भी रहना पड़ा था । पर वादीने उसे कानून की दृष्टिका विचार करके उसमें कुछ हेरफेर भी करके ' शिवलिङ्गपूजा क्यों? ' ' नामसे कुछ नम करके छपवा दिया । वादीकों अपनी इस पुस्तकपर बड़ा गर्वें है कि - इसका सनातनियोंकी श्रोरसे प्रत्युत्तर दिया ही नहीं जा सकता । हम स्थानाभाववश उसकी युक्तियोंको पृथक् न लिखकर उन्हें काटते हुए वादीकी उक्त पुस्तकको ' जप्त ' करने जा रहे हैं । जिन युक्तियोंका प्रत्युत्तर हमें अपनी पूर्वकी पुस्तकों में दे चुके हैं; उन्हें प्रायः यहां नहीं दिया जायगी । ( ३३ ) ' इलावृत ' देशमें पुरुषोंका स्त्री बन जाना ' वर - शापवी महत्ताके कारण है । वर- शांपकी महत्ता वाकू - सिद्धिके कारण ' होती है । वाक् - सिद्धि या तो तपोबलसे होती हैं, अथवा अणिमा ' यदि देवताओंकी स्वाभाविक सिद्धिवश होती है, जी श्री शङ्करमें ' जन्म - सिद्ध थी । वह’श्रीशङ्कर को अपनी स्त्री प्रकृतिरूपा ” ( जैसे Gujarat. An eGangotri Initiative