सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 471–480
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 471–480
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१०३ ६०४ | श्रीमनातनधर्मालोक ( 8 ) समा सकेगा? जीव, ( ७ ) ' शिवजी मोहनीसे भोग करने लगे ' यह बूढ़े बाबाकी इस्थता बात असत्य है । इसमें कोई प्रमाण नहीं । नहीं ( ख ) वादी लिखता है - पद्मपुराण स्वर्गेखण्ड में लिखा है - ' ब्रह्म खलाती कामों जयते, शिवा कामों जयते, इन्द्र कामो जयतो ' ' ( कामने सृष्टि. ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, इन्द्रको भी जीत लिया ) यह स्वामीने | जब | कोनसी भाषा के शब्द लिखे, यह तो वही जाने, पर इसका मूल के । वेदमें भी लिखा मिलता है । देखो - ' कामे जज्ञे प्रथमो नैनं देवा पूजा आपुः पितरो न मर्त्याः ' ( अ. ६२/१६ ), ' काममयः पुरुषः । तस्य स- देवता स्त्रियः ' ( बृह. ३ ६ ११ ) इस विषय में विवेचना पृ. ७०१-७११ में देखो | तब क्या यह वेदकी ' बदमाशवाद ' है? और वह हर्मने इस पुष्पके पृ. ७०३ में स्वा. द. जीकी संस्का. वि. पृ. समा १३५ से उद्धृत ३ मन्त्रोंसे सिद्ध किया था कि - काम मदकारक परस्पर होता है, और कामका साधन होती है स्त्री । ' काम वेद ते नाम !, इ कैसा ईम ते उपस्थं, अग्नि क्रव्याद ' इन स्वाद से उद्धृत मन्त्रोंका हृदयमें अर्थ हमने रामगोपाल विद्यालंकारका दिया था । ' अब हम यहां नहीं! उक्त तीन मन्त्रोंका अर्थ आर्यसमाजियों की परममान्य ' संस्कार-भी उस चन्द्रिका ' ( श्री भीमसेन शर्मा आगरा, तथा श्री आत्माराम स्वामी अमृतसरी ' इनसे प्रणीत ) के द्वितीय - संस्करण ( पृ. ५६३-५६४ ) से लस्ट उधृत करते हैं-इतना ' ' काम ' वेद ते ' हे काम '! ' तेरे नामको सब जगत् जानता है । कैसे ' मदकारी तू प्रसिद्ध है । तेरे ( कामकै ) लिए यह कन्या ( स्त्री ) मद-CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमांसा [ [ e ६०५ - साधन हो चुकी है । अथवा सुरा - यह जल तेरे ( कामके ) शान्त्यर्थं उपस्थित है । [ स्त्री से ही काम शान्त होता है ] । इस कन्याको वा इस मदको वा इस पतिको मान सहित कर । हे कामाग्ने! इस स्त्री जातिसे ही तेरा ( कामाग्निका ) उत्कृष्ट जन्म है । गृहस्था-श्रमपालनरूप उत्कृष्टधर्मके लिए तू ( कामाग्नि ) ईश्वरसे बनाया है । इमं ते उपस्थं हे वधू, मैं इस तेरे ( उपस्थं ) श्रानन्दजनक इन्द्रियको प्रेमसे मंसृष्ट करता हूँ । यह [ तेरा उपस्थ ] गृहस्थी बनने का द्वितीय द्वार है । उस ( उपस्थ ) से ही [ तू स्त्री ], नहीं किसीके वशमें होनेवाले भी सब पुरुषोंको ( अभिभवासि ) वशीभूत कर • लेती है । और वंश करनेवाली तू घरकी स्वामिनी है ' । ANA ' अग्नि क्रव्यादं - तत्त्वदर्शी पुराने ऋषिलोगोंने ( स्त्रीणामुपस्थं ) स्त्रीजातिके आनन्ददायक इन्द्रियको मांस खानेवाला आग जैसा स्वीकार किया है । उसके साथ पुरुषभिदनसे उत्पन्न उत्पादक शक्तिवाले वीर्यको घी - जैसा स्वीकार किया है । हे वधू, तेरे में ' वह शुक्र पुष्ट हो ' । अव स्वामी जो पौराणिक देवोंपर दोष दे रहे थे; स्वा. द. जी-के वैदिक - वचनोंकेकारण अव वह उपालम्भके योग्य न रहा । ( ग ) सीता, जब आई, ' नमस्ते ' किया ' यहां स्वामीद्वारा ' ' दिया हुआ ' नमस्ते ' का प्रयोग गलत है; क्योंकि - न तो यह एक पद हैं, और न रामायण में ऐसा लिखा है । ' नमस्ते ' पर ' आलोक ' ( १-२ ) देखो ' । ' नमस्कारेण मुच्येध्वम् ' ( वृहदा. ३८१२ ) में ' नमस्कार ' शब्द है, एकपद नमस्ते नहीं । Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ( घ ) ' बालीको मारा, तारासे सुग्रीवका नियोग करा दिया ' । यह बात बाबाजी नहीं समझते । उसने २८ पृ. में लिखा है-' विष्णुने नारदको बन्दरका - सा मुख दे दिया । वह बन्दरका मुख लिये नारदजो स्वयंवरमें गये । विष्णुको शाप दिया - ' तुम्हारे सहायक वे बन्दर होंगे, जिनका मुख तुमने मुझे दिया है ' । इससे बाली सुग्रीव बन्दर सिद्ध हुए; जिसे वादी नहीं मानते; वस्तुतः देवताओंोंने ही वानररूप धारण किया था । जैसे कि आनन्दरामायण राज्यकाण्डमें लिखा है- ' न ज्ञेया वानराः तेपि सर्वे देवांशरूपिणः ' ( ३ | ५१ ) देवीभा में भी कहा है- रामावतार-योगेन देवा वानरतां गता: ' ( ४/२/३६ ) पुरा रामावतारेपि निर्जरा ' ( देवाः ) वानराः कृताः ' ( २०१६ ) इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) के द्वितीय निबन्ध में स्पष्टता देखो । उन वानरोंमें शूद्रोंवाला • व्यवहार माना गया है । सो शुद्रों में जीवितपतिका स्त्रीको वे भी .नहीं ले सकते, मृतपतिवाली स्त्रीको वे ले सकते हैं. यह रहस्य है । दूसरा वह त्रेतायुग था, नियोग कलिवर्जित है; तभी तो इस कलियुग में स्वा. द. द्वारा चलाये जानेपर भी नियोग नहीं चल सका । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में अन्यत्र देखो ( पृ. ३७४-३८४ ) । वृन्दाके सतीत्त्वके विषय में ' आलोक ' ( ६-७ ) देखो । ( ८ ) वादीने बुद्ध - द्वारा बौद्धमत तथा महावीरस्वामी द्वारा . जैनमतका प्रचार मानकर कहा है कि- ' कुछ काल बाद ( ६२० ई ० के निकट ) पौराणिक मत चालू होगया; तबसे मन्दिर में पत्थरक्की मूर्तियाँ रखी जाने लगीं ' । इस बाबाके मतका खण्डन स्वा.द.जी CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमांसा | ६०७ 8 स.प्र. में करते हैं । देखो स. प्र. की अनुभूमिका ( २ ) पृ. २५४ में स्वामी लिखते हैं- ' जब मत - मतान्तर खड़े हुए; हुआ । वाल्मीकीय और लिखा; और जैनियोंके ' राम - कृष्णादिकी गाथा सिद्ध होता है कि - जैन आर्यावर्तीय मनुष्यों में वेदविद्या छूटकर यही जैन आदिके मत प्रचारका निमित्त महाभारतादिमें जैनियोंका नाममात्र भी नहीं प्रन्थोंमें वाल्मीकीय और भारतमें कथित बड़े विस्तारपूर्वक लिखी है । इससे यह - बौद्धमत रामायण महाभारत के पीछे चला! ... इनसे पूछना चाहिये कि - यदि तुम्हारे ग्रन्थोंकी कथाओं को लेकर ता ' वाल्मीकीय आदि ग्रन्थ बने होंगे; तो वाल्मीकीय आदिमें ह तुम्हारे ग्रन्थोंका नाम - लेख भी क्यों नहीं? और तुम्हारे प्रन्थोंमें क्यों है? क्या पिताके जन्मका दर्शन पुत्र कर सकता है? कभी 3 नहीं । इससे यही सिद्ध होता है कि - जैन - बौद्धमतः शैव - शाक्तांदि मतोंके पीछे चला है ' । इ अब बाचा यथार्थानन्दजी बतायें कि दण्डी दयानन्दका द डंडा ' तुम्हारे सिरपर पड़ा वा नहीं? रामायण- महाभारत में पुराणों का वर्णन भी स्पष्ट है, तथा मूर्तिपूजा भी स्पष्ट है । यदि वादी चाहें; तो इसके प्रमाण भी दिये जा सकते हैं । कुछ इ ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ५३६-५३८ में देखें । महाभारतमें अर्जुनकी ल शिवमूर्तिकी पूजा भी स्पष्ट है, वहां कहीं शिवलिङ्गपूजा मूर्तिपूजा क ही तो है । शैवोंका सर्वस्व शिवपुराण तथा शिवलिङ्गपूजा है, उसमें मूर्तिपूजा स्पष्ट है । वस्तुतः पुराणका समयं वेदके साथका है; क्योंकि वेदमें भी ' पुराणका ग्रहण किया गया है, इस विषय में Gujarat. An eGangotri Initiative
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Co 805 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 8 में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३७७-३८८ ) तथा इस नवस पुष्पमें भी देखो । ( ६ ) जब वादी मानता और कहता है कि कृष्ण ८ साल के मन्त थे, ( वस्तुत: वह उस समय छः वर्षेके थे; देखो श्रीमद्भागवत ); नहीं और ८ सालके बच्चे में कामोद्दीपन नहीं होता और गोप-बालाएँ भी ६-७ वर्षकी थीं; तव कामोद्दीपनका प्रश्न ही नहीं यह उठता, तत्र श्रीकृष्णपर दोष लगाना ' अयथार्थानन्दकी बदमाशी ' .... निकली - यह उसीके शब्द हैं, क्योंकि वह फिर लिखता है- ]; कर तब ८ सालका बच्चा जजमेंट नहीं दे सकता कि तुम ऊपरको दिमें हाथ उठाओ; तब हम तुम्हें चीर देंगे । यह भी छायथार्थानन्दकी ' अपनी बदमाशी ' हैं, जो कि उसने यह लिख दिया कि हाथ कभी ऊपर करो । वहाँ तो लिखा है- ' बदुष्वाञ्जलिं मूर्ध्नि - अ धनुत्तये-तांदि अंहसः, कृत्वा नमोऽघो, वसनं प्रगृह्यताम् ' ( भाग. १०।२२।१६ ) इसका अर्थ है - ' अनुत्तये ( अपने नग्न स्नान के इस पापको दुका दूर करनेकेलिए ) ' अधः ( नीचे भूमि में ) मूर्ध्नि अञ्जलि वद्दुध्वा त ( माथे में अञ्जलि बांधकर ) नमः कृत्वा ( जलदेव वरुणको यदि नमस्कार करके फिर ) ' वसनं प्रगृह्यताम् ' ( अपने कपड़े ले लो ) । कुछ. इसमें कोई निन्दनीय बात नहीं । ऐसे ६-७ वर्षके लड़के-नकी लड़कियां नग्न रहा करते हैं । सो यह वाल्यावस्थाकी नग्नता पूजा कोई मायने नहीं रखती । इसमें कोई किसी पर दोष नहीं देता, है, यह तो केवल दयानन्दी ही दोष देते हैं । इसलिए भगवान्को थका गीता में कहना पड़ा - ' न च मां तानि कर्माणि निघ्नन्ति धनञ्जय! य उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु ( ६६ ) । जो श्रीकृष्णको CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमांसा [ ६०६ मानुषी दृष्टिकोण से देखकर उनपर दोष देते हैं, उसपर भी भगवान् कहते हैं - ' अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमज्ञानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ' ( ६।११ ) मोघाशा मोघ-कर्माणां मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरी चैव प्रकृतिं मोहिनीं थिताः ' ( १२ ) इस प्रकार श्रीकृष्णकी अवज्ञा करनेवाले आसुरी प्रकृति के सिद्ध हुए । यहां तो नग्नस्नानको छुड़ाने के लिए उन लड़कियोंको लब्जित करनेकी आवश्यकता थी, जिससे वे यह दोष छोड़ दें । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ५३२-५३३. ६५७-६५६ देखो । ( १० ) वादी उब्रट - महीधर- सायण आदिके भाष्योंको कहीं अश्लील तो बता नहीं सका, पर यह कहता है कि उन्होंने मूर्तिपूजाको कहीं मान्यता नहीं दी ' । यह बात वादीकी झूठी है । वादी यह मानता ही है कि अवतारवाद मूर्तिपूजाका प्राण है । अब देखिये- ' इदं विष्णुर्विचक्रमे ' (. ११३२ / १६-१७ ) मन्त्रके भाष्य में श्री सायरणने ' विष्णुका त्रिविक्रमावतार ' माना है । यजुः ३०. के भाष्य में लिखा है- ' इन्द्रः... कुचरः - को- पृथिव्यां चरति IT ANA 6 10 मत्स्य - कूर्मादिरूपेण ' ( उवट ). ' कुचर: - मत्स्यकूर्मादिरूपेण इन्द्रः पृथिव्यां चरति ' ( महीधर ), ' स विष्णुः कुचरः सर्वासु भूमिषु लोकत्रये संचारी ' ( सायण ऋ. १११५४/२ ) । सो, जब इन भाष्यों में a अवतारवाद सिद्ध हुआ; तो मूर्तिपूजा भी स्वतः सिद्ध हो गई । सूर्य आदिकी पूजा इन सभी भाष्यकारोंने लिखी है, यह मूर्ति-पूजा नहीं, तो अन्य क्या है? Gujarat. An eGangotri Initiative
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१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) वेद स्वयं भी प्रतिमोपासना बताता है । देखिये- ' संवत्सरस्य प्रतिमां यां त्वा रात्रि! उपास्महे ' ( अ. ३ | १० | ३ ) ' यां त्वां प्रतिमाम् उपास्महे, सा नः, प्रजां संसृज ' यहां पर प्रतिमाकी उपासना और उससे प्रार्थना वेदने बताई है । यहाँपर रूपकालङ्कारसे रात्रिको संवत्सरकी प्रतिमा ( मूर्ति, प्रतीक, प्रतिनिधि ) बताकर फिर उसकी उपासना बताई है । श्रीसायरणने भी लिखा है- ' प्रतिमां प्रतिकृति - स्वरूपाम्, प्रतिनिधित्वेन निर्मीयते इति प्रतिमा, त्वा-त्वाम् उपास्महे - सेवामहे ' यहां प्रतिमाकी उपासना, प्रतीककी उपासना बहुत स्पष्ट है । सूर्य आदिकी पूजा - उपासना घ्यादि तो वेदमें भरी ही पड़ी हैं, पर यह अयथार्थानन्दजी वेदादिमें मूर्तिपूजाको छिपाते हैं । हमने यही वेदमन्त्र ' वेदप्रकाश ' ( ५ । २ पृ. २२ ) में दिया था, पर अयथार्थानन्दजीने उसका प्रत्युत्तर न देकर- ' मौनं सम्मतिलक्षणम् ' न्यायको चरितार्थ किया है । दयानन्दी श्रीराजेन्द्रजीने भी इसका प्रत्युत्तर नहीं दिया था । वेद में स्थान - स्थानंपर ' नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै ' ( यजुः मा. ६।२२ ) ' शिला भूमिरश्मा पांसुः साः भूमिः... तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः ' ( अ. १२/१/२६ ) इस मन्त्रका देवता भूमि है, उसे नमस्कार किया गया है । ' उद्यते नम उदायते नम उदिताय नमः ' ( अ. १७/१/२२ ) ' अस्तं यते नमोऽस्तमेष्यते नमोऽस्तमिताय नमः ' ( २३ ) यहां आदित्य देवता है - इस प्रकार सूर्यको नमस्कार किया गया है । यह क्या वेदकी मूर्तिपूजा नहीं है? मूर्तिपूजाकी जड़ वेदने ही तो जमाई है । स्वा. द. जीने लिखा CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमां । ११ ६२ है- ' किसी जड पदार्थके सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा है ' ( स.प्र. पू. २३० ) वेदने पूर्वोक्त मन्त्रमें जड़ पृथिवीको नमस्कार कराई है; क्या यह मूर्तिपूजा न हुई? हम उस मूर्तिके द्वारा भगवान्की ही पूजा करते हैं । ला. त लाजपतराय की मूर्तिपर फूल चढ़ाये जाते हैं, राष्ट्रीय ध्वजा पर म फूल चढ़ाये जाते हैं, स्वा. ध्रुवानन्दके शवपर दयानन्दियों द्वारा पूर फूल चढ़ाये गये - यह सब मूर्तिपूजा है । दयानन्दी लोग जब तक शरीरधारी हैं, तब तक उनसे मूर्तिपूजा छूट नहीं सकती । यह हमारी घोषणा है । वे लोग हृदय में भगवान्को व्यापक मानकर ज उसका ध्यान या. पूजन करते हैं, यह पूरी मूर्तिपूजा है । हड्डी-रक्तसे सने हुए हृदयरूप मूर्ति में भगवान्को पधराकर उनकी पूजा करनी क्या यह दयानन्दियोंकी मूर्तिपूजा नहीं, यह वादी की स्वयं अपने हृदयपर हाथ रखकर बतावे? दि ( ११ ) त्रैतवाद करके वादी ब्रह्मका नानात्व बता रहा है, अतः आवागमन से नहीं छूटेगा, और फिर वादीके बड़े स्वामीने व्य मुक्तिमें भी आवागमन मान लिया है । अतः तब दयानन्दी ' ब मण्डल वादी के शब्दों में नरकमें जा रहा है । ( ख ) तुम स्वा. द. जी वा की मूर्ति उनपर श्रद्धा होनेसे बनाते हो; तब उस मूर्ति में तुम्हारी श्रद्धा स्वतः होजानेसे तुम द्वारा भी मूर्तिपूजा होगई । अपना चित्र भी वादीने इस पुस्तक में छपवाया है । वह निरवयव ' ई आत्माकी मूर्ति कैसे बनवा रहा है; इसी प्रकार निरवयव स परमात्माकी मूर्ति भी बन सकती है । यदि कहो कि यह हमार नह Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जा चित्र आत्माका नहीं, किन्तु शरीरका हैं, तो यह शरीर किसका है? यदि आत्माका; तब क्या तुम जडपूजक वा मुर्दा - पूजक नहीं हो? यदि शरीरके द्वारा आत्माका सम्मान तुम शरीरकी पूजा ज्ञा मानकर आत्मा की पूजा मानते हो, इसी प्रकार परमात्माकी पर मूर्तिद्वारा पूजा भी परमात्माकी पुजा मानी जावेगी; तब मूते-द्वारा पूजा सिद्ध हो ही गई । तक ( १२ ) द्वादश अवतारोंको अयथार्थानन्दजी ' बदमाश विष्णुके अवतार ' बताते हैं | विष्णु जगत्के रक्षक हैं; अतः जगतके त्राणार्थ तथा दुष्टांको दबानकेलिए उन्हीं के अवतार ही डी- तो होंगे? ' बदमाश ' तो श्रयथार्थानन्दजी हैं, जो कहते हैं-नकी गीता में लिखा है, जो ब्रह्मकी उपासना करे, वह ब्राह्मण; अन्य दी की करे तो वामन ' यदि यह शब्द स्वा यथार्थानन्द गीता में न दिखा सका, तो वह अयथार्थानन्द होनेसे स्वा. द. जीके अनुसार छातः ' असुर ' होगा । परमात्माको भी स्त्री - पुरुषोंके गुप्त अङ्गों में ने व्यापक होनेसे तथा उन्हें प्रवृत्तं कर रहा होनेसे वादी क्या न्दी बदमाश ' ' मानता है? यदि नहीं, तो फिर व्यापक विष्णुको वादी ' बदमाश ' कैसे कहता है? १ ( ख ) हृदि ' सर्वस्य धिष्ठितम् ' से वादी भी ईश्वरको सचके ई । हृदयमें ठहरा हुआ मानता है, गीता में अन्यत्र भी लिखा है-यव ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन! तिष्ठत्ति ' ( १८६१ ); तब हृदयरूप यव मूर्ति में जो तुम ईश्वरका ध्यान करोगे; यह भी मूर्तिपूजा हुई या F नहीं? तुम्हारे छोटे - से हृदयमें सूक्ष्म होनेसे जब वह महान् CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमांसा [ ९ १३ समा सकता है; तो मूर्ति में क्यों नहीं समा सकता? तत्र उसकी पूजाको निन्दित कसे करते हो? अथवा मूर्ति में अर्द्ध तवादानुसार करण - कण परमात्मा होने से मूर्तिका कण - कण भी परमात्मा हुआ; तब मूर्तिको परमात्मा समझकर भी उसे पूजा जा सकता है । इस प्रकार मूर्तिपूजा किसी भी ढंग से खण्डित नहीं हो सकती । ( ग ) तुलसी से विष्णुके व्यवहार- विषयमें ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४६१-५०० तथा ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १४३-१४५ में देखो! ( घ ) रुक्मिणी स्वयंवर सक्षस विवाह है; जो क्षत्रिय के लिए विहित्त है, ' राक्षसं क्षत्रियस्यैकं ' देखो मनुस्मृति ( ३ २४ ) । वह रुक्मिणी के पिता तथा रुक्मिणी की अपनी इच्छानुसार ही हुआ; इसमें दोष कुछ भी नहीं । हाँ, उसका भाई रुक्मी दैत्यप्रकृतिका होने-से वह उसे शिशुपाल दैत्यको देना चाहता था; पर तुम लोग भी रुक्मी वा शिशुपाल के भाईबन्द होनेसे इससे बिगड़ते हो; और श्रीकृष्णकी निन्दा करते हो । वस्तुतः यह बातें अययार्था-TANA नन्दजीजे दयानन्दी श्रीरामसे सीखी हैं । हम उनका खण्डन, पूर्व कर चुके हैं । ... ( ङ ) ' अस्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ' ( त्र.सू.श. १३ ) में वादी विज्ञानभिक्षुका अर्थ बताता है- ' जिस प्रकार पत्थर आदिका ब्रह्म नहीं बन सकता, इसी प्रकार जीव ब्रह्म नहीं बन सकता, क्योंकि पत्थर जड़ है, ब्रह्म नित्य ज्ञान वाला है, जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ है ' । स ० घ ० ५८ Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ' वादीने यह सूत्र अशुद्ध लिखा है, और उसकी संख्या भी । यह आश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ' ( २।१।२३ ) इस रूप में है । वादी वेदान्तपर विज्ञानभिक्षुका भाष्य बताता है, पर वह तो सांख्य-दर्शनपर है, वेदान्तदर्शनपर नहीं । वेदान्तदर्शनमें कई इस प्रकारके सूत्र आते हैं; वह जीव - ब्रह्ममें उपाधिभेद बताते हैं, वास्तविक भेद नहीं । उस उपाधिके विलय हो जानेपर वहीं जीव ब्रह्म हो जाता है, यह उसी दर्शनमें बिल्कुल स्पष्ट है । महाभारतमें कहा है - ' आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ' ( शान्ति, १८७१२४ ) विज्ञानभिक्षु अद्वैतवाद नहीं मानते थे; अत: उन्होंने बलात् द्वं तवादपरक व्याख्या कहीं की हो; यह सम्भव है; पर वेदान्त-का सिद्धान्तपक्ष अद्वैत ही हैं । इससे अवतारवादको वा अद्वैत-वादको क्या हानि पहुँची- यह वादीको बताना चाहिये था । भेदवाद पूर्वपक्ष होता है, अभेदवाद उत्तरपक्ष । उत्तरपक्षं ही सिद्धान्त होता है । अविद्या आदिमें भेदवाद कहा जाता है, अविद्याके दूर होनेपर फिर अद्वैत ही हो जाता है । यदि वादी विज्ञानभिक्षुके ही भाष्यको प्रमाणित करता है; तो उसे योग-दर्शनके १।३६ सूत्रके योगवार्तिक में देखे; वहाँ विज्ञानभिक्षुने लिखा है - ‘ किं बहुना, यदेव अभिमतं हरिहरमूर्त्यादिकं, तदेव आदौ ध्यायेत् ' । यहाँपर श्रीविज्ञानभिक्षुने हरिहरकी मूर्ति में ध्यान बताकर मूर्तिपूजाको सिद्ध किया है; अत: यदि वादी यह विज्ञानभिक्षुका भाष्य नहीं मानता; तब वह विज्ञानभिक्षुके CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजा - मीमांसा [ ९ १५ वचनको उद्धृत करनेका अधिकारी नहीं । ( १३ ) वादी पत्थरोंकी उपासना और जलोंकी उपासना हिन्दु समाजकी पूजा बताता है; और आर्यसमाजका - यह मूल वैद् और ब्रह्मकी उपासना बताता है । अब यदि वेद पत्थर वा जलकी पूजा बता दे; तब आर्यसमाज तथा वादी वेदविरुद्ध सिद्ध होंगे यह स्वयं उसके लेखानुसार सिद्ध हो जायगा ।; वह वेद कहता है - ‘ नमस्ते अस्तु अश्मने ' ( अ. १।१३ ३ ) ' नमोस्तु शरी दैवाय प्रस्तराय ' ( अ. १६/२/६ ) यहाँपर पत्थर, तथा देवताके पत्थरको नमस्कार किया गया है ॥ १० वें प्रघट्टकमें हमने अथर्व उपा मन्त्रसे शिला, अश्मा ( पत्थर ) तथा मट्टीको भी वैदुके द्वारा नमस्कार दिखलाया है । ' नमः सिकत्याय च प्रवाह्याय च नमः कि ँ शिलाय च ' ( यजुः १६ ४ ३ ) यहाँ भी शिवकी सिकता, चें शिला- प्रस्तररूपकी मूर्तियाँ सूचित की गई हैं, और उन्हें नमस्कार कराया गया है । तब अब बाबाजी; बताओ कि क्या वेदको भी अवेद मान लोगे? अथवा यदि अर्थ बदलोगे, तो यह बेहूदा बात होगी; धात क्योंकि - खा.द. जो कुछ सिद्धान्त बना लें, तब क्या वेदको भी | श्रव उनके ही पीछे लगा दिया जावे? तब तो यह दयानन्दीपन है । होगा | वस्तुतः जो वेद कहे, उसे ही मानो, उसमें तोड़ - मरोड़ देने करना, वेद्का अपमान करना है । वस्तुतः वेद पत्थर आदिके द्वारा पत्थर में व्यापक शक्तिको नमस्कार कराता है । .. ( ख ) हिन्दुसमाजको नास्तिक कहना यह प्रयथार्थानन्दजी-Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) को स्वयं नास्तिक सिद्ध कर रहा है । ब्रह्मकी उपासना वह मानता है, अपने इष्ट वेदसे तो उसने ब्रह्मकी उपासनां सिद्ध की नहीं देवताओंकी पूजाके माध्यम से भगवान्का; चिपेदमें पूजन है । क देवता अङ्ग हैं, भगवान् अङ्गी हैं । अङ्गीकी पूजा अङ्ग - द्वारा ही गे; हुआ करती है । वादी किसी मनुष्यकी पूजा करता है, तो उसे वहां उसके आत्माकी ही पूजा इष्ट होगी, पर वह पूजा विना शरीरके कैसे कर सकेगा? इसलिए वह समझ रखे कि - इन अङ्गों द्वारा ही भगवान् की पूजा सम्पन्न हो सकेगी । ब्रह्मकी उपासना अयथार्थानन्दजी मानते हैं; उपासनाका अर्थ है कि-समीप बैठना । ब्रह्म तो सर्वव्यापक है, तब एकदेशी यथार्था-मैन्दजी उस सर्वव्यापकके पास कैसे बैठ सकेंगे? जिस ढंगसे चा वें उस सर्वव्यापककी पूजा एकदेशमें करेंगे, वह मूर्तिपूजा ही होगी । उसी ढंगसे मूर्तिपूजक भी भगवान की पूजा करेमा । · ( ग ) ' देशमें व्यभिचार, बेहयाई, निर्लज्जता आदि बुराइयोंके न फलकका टीका ' वादी हिन्दुसमाजके माथैपर बताता है; यह धात कामात्मक नियोगके प्रचालक हिन्दुसमाजके ' एक भी अर्वाचीनतम सम्प्रदाय दयानन्दी - समाज में तो कुछ घटती दीखती है । क्योंकि नियोगके शास्त्रार्थ करनेसे वा नियोगको प्रोत्साहन देनेसे स्त्री - पुरुषोंमें ' बेहयाई ' शुरू होती है । हिन्दुसमाज के पतिव्रतधर्मके प्रचारसे तो व्यभिचार आदि दूर हो सकते हैं । ( १४ ) ली. लाजपतराय आदिको वादी महापुरुष मानकर ]: उनकी मूर्ति बनाने में पाप नहीं समझता । आर्यसमाजी उसी CC - 0. Ankur Joshi / C. मूर्तिपूजा - मीमांसा । २१७ मूर्तिपर पुष्पमाला चढ़ाते हैं । यह मूर्तिपूजा यदि वादीके मतमें पाप नहीं, तो भगवान् श्रीकृष्णकी मूर्तिपर फूल चढ़ाने में पाप कैसे है? अब वादी भी उनकी मूर्तिपर फूल चढ़ावे । ( ख ) ' द्वा सुपर्णा ' यह द्वैतवाद व्यावहारिक है, ' पुरुष एवेद “ सर्व ( यजुः ३१२ ) ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा. ३ | १४ | १ ) यह Collection Gujarat. An वादिसम्मत अद्वैतवाद पारमार्थिक है । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' यह द्व ैतवाद में, व्यावहारिकतामें है; पीछे पारमार्थिकतामें आ जानेपर ' तत्त्वमसि, सोऽहम्, अयमात्मा ब्रह्म ' वह वही हो जाता है । फिर कोई जिज्ञासा नहीं रहती । उस समय सभी उपासनाएँ भी समाप्त हो जाती हैं । उपासना तथा भक्ति चित्तशुद्धपर्य होनेसे व्यवहारवाद हैं; आगे के पारमार्थिकवाद के सहायक हैं । - ( १५ ) वादी कहता है - श्रीरामका ' गीता - विवेचन ' देखो उसमें गीताकी पोल खोली है ' । यदि वादीका ऐसा विश्वास है; तब वह उसका अग्रिम पुष्पमें खण्डन देख ले । इस प्रकार गालीगलौजानन्द स्वा: यथार्थानन्द वस्तुतः अयथार्थानन्दजी की ' मूर्तिपूजामीमांसा ' खण्डित कर दी गई । उसमें कभी कोई प्रकरण आ जाता है, कभी कोई । बच्चों की सी बातें हैं । उसके लेखककी वृद्धावस्थाका यह दोष हो; वा शास्त्रज्ञान में परिनिष्ठितता न होना; यह प्राठक स्वयं सोच सकते हैं । इसे दयानन्दी डा. श्रीरामने लिखवाया है । इसमें उत्तरणीय तो कुछ भी नहीं था; पर उसका खण्डन न किया जाता; तो वादीको मोह रहता कि - हमारी पुस्तकका प्रत्युत्तर नहीं दिया जा सकता । अस्तु । eGangotri Initiative ENT ANAN " S Dar San
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६१८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हमारे सामने अब तक प्रतिपक्षियोंकी जो पुस्तकें आई हैं; उनकी आलोचना पूर्ण हो जानेसे यह ' आलोचना ' स्तम्भ समाप्त किया जाता है । अब कुछ ' सैद्धान्तिक चर्चा ' दी जाती है; उसमें साम्यवादकी आलोचना ' प्रहसन ' के रूपमें दी जायगी । उससे पूर्व कुछ ' कुतर्क - कर्तन ' भी देखिये । ( १८ ) कुतर्क - कर्तन ( क ) दयानन्दि - समाजमें कई ऐसे व्यक्ति हैं, जिनका कार्य जिस किसी प्रकार स.ध. पक्षका खण्डन और स्वाद जी के पक्षका मण्डन करना ही रहता है । स्वा. द. जीने ' अन्धाहीन् स्थूलगुदया सर्पान् गुदाभिः ' ( यजुः २५/७ ) इस मन्त्रका विचित्र अर्थ किया कि - स्थूलगुदेन्द्रिय के साथ वर्तमान अन्धे सांपोंको और गुद्रेन्द्रियों-के साथ विशेष कुटिल सांपों को ' । इस विचित्र ' वैदिक अर्थ ' पर जब जनताने उपहास शुरू किया; तब एक दयानन्दीको उसमें ' शरीर - विज्ञान'की सूझ हो आई, और ' वैदिकधर्म ' ( जुला, ६६ ) में लिख डाला कि- ' स्थूलगुदा ' का अर्थ है ' अन्धी आन्त ' । वेदने इसको ' अन्धाहीन् ' कहा है । कितनी है: विद्वत्ता ( १ ) । ' स्थूलगुदया ' पृथक् है, ‘ अन्धाहीन् ' पृथक हैं । इनकी विभक्ति भी भिन्न है । दोनोंका अर्थं एक कर दिया गया । उक्त मन्त्रमें यन्त्रैः ' पृथक है, तृतीयावहुवचनान्त है । ' अन्तड़ियां ' उसी शब्दका अर्थ है, लेकिन दयानन्दी - पथिकने मोटी गुदा और अन्धे सांपोंका ' अन्तडियां ' अर्थ करके तुकसे तुक भिडानेकी असफल चेष्टा CC - 0. Ankur Joshi Collection कुतर्क - कर्तन [ ere की । हमने यह दिग्दर्शन इसलिए दिया है कि उन दयानन्दियों- गुदाव की असम्बद्ध अर्थ करनेकी प्रकृति लोगोंको पता है । सम्भवी अर्थको तोड़ - मोड़ करके ' मक्खी को मल चल जाय । - मलकर भैंसा चना दिया जावे '; यह स्वा.द.जीका आविष्कार रहा करता है । पुरार इसी कारण उनकी भाषा अथके अवसरपर दुर्बोध एवं रहत तथा अस्वाभाविक बन जाती थी | जबर्दस्तीके प्रथमें यह अस्पष्ट बात विस्त स्वाभाविक हो उठती है । इसलिए एक आर्यसमाजी अन्वेषक चेष्ठा प्रो. श्रीभवानीलाल भारतीय ' टङ्कारापत्रिका ' ( मार्च - अप्रैल ६५ ) करत में लिखा था कि - ' स्वामीजी के वेदभाष्यकी भाषा दुर्गम, दुर्बोध, उस अस्पष्ट, जटिल तथा अस्वाभाविक है । उससे न तो भावका उत्त स्पष्टीकरण होता है, और न उसका वाक्यविधान ही निर्दोष 1. मालूम होता है ' । ' 1 उ ० तव उनके असम्बद्ध अर्थोंकी बलात्, सङ्गति लगानी गलत गति बात है । स्वामीजीको मोटी गुदा तथा अन्धे सांपोंका ' अन्तडियां ' अर्थं कभी इष्ट था भी नहीं । इसलिए पूर्वके दयानन्दियोंने था ' अन्धे सांपोंका गुदाकी ओरसे पकड़ना ' अर्थ किया था । पर उसमें वेदका कुछ भी महत्त्व सिद्ध न होता था । तच वर्तमानं ( ३ एक दयानन्दीके इलहाम में एक वेजोड़ ' अन्तडियां ' ' अर्थ आ क गया; पर वह तो पृथक् ठहरे ‘ आन्त्रैः ' पदका अर्थ है, अन्धे सांपों वा स्थूलगुदाका नहीं । बलात् उसमें सङ्गतिकी दुश्चेष्टा करना इ एकमात्र ‘ वबावाक्यं प्रमाणम् ' का चरितार्थ करना है । स्थूल- स Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) अन्धी ' प्रांत ' अथ करना ' खरबूजे ' का ' गधा ' अर्थ करना | गुदाका यों है । ( ख ) अव दूसरे दयानन्दी की लीला सुनिये | उसका काम य । बनाने के लिए सा | पुराणोंको झूठा है । हमने ' आलोक ' ( है । रहता राष्ट विस्तीर्ण निवन्ध रखा था । ति खण्डनकी शक्ति तो वन नहीं एड़ीसे माथे तकका पसीना बहाना ७ ) में द्रौपदीके पश्चपतित्वमें एक इस दयानन्दीकी उसमेंके तर्कोंके सकी, मूलकथाको ही झुठलानेकी चेष्टा करने लगता है । यदि वह हमारे उस निबन्धका मनन क करता, तो उसे उसमें ही प्रत्युत्तर मिल जाता । अस्तु! अब हम 2 ) उसके आक्षेपों को प्रश्न रूप में उपस्थित करके साथ - साथ उनका F उत्तर भी लिखते हैं । प्र १३ नारदकी भांति व्यास भी हर जगह पहुँच जाते हैं । प उ ० १ व्यास जी योगी थे और अमर । योगविद्यासे पुरुषकी न गतिं प्रत्येक ससय तथा प्रत्येक स्थानपर हो जाती है । 3 ॥ प्र ० २. पर व्यासजी की अमलदारी केवल पाण्डवसंसार ही था । उ ० २ – इसका उत्तर श्रीव्यासजीने किरातार्जुनीय में दिया हैवीतरागाणामपि मुक्तिभाजां भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाता ' ( ३ सर्गे ) पाण्डव निस्सहाय थे, तथा निश्छल थे; अतः व्यासजी-को समय - समय पर उनकी सहायता करनी पड़ी । प्र ० ३ पांच इन्द्र कैसे समकालमें हो गये? उ ० ३ एक भी इन्द्र, देव होनेसे अणिमादि- सिद्धिवश कई रूप धारण कर सकता था । वादिप्रतिवादिमान्य श्रीमतञ्जलिने महाभाष्यमें CC - 0. Ankur Joshi Collection कुतर्क - कर्तन [ १२१ लिखा है - ' एक इन्द्रोऽनेकस्मिन् ऋतुशते श्राहूतो भवति ' ( १ | २ | ६४ ) ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप युगपत् सर्वत्र ' रूपं रूपं मघवा ईयते ' ( ऋ. ६।४७ / १८ ) ( इन्द्रः ) वोभवीति ' ( ऋ.३५३८ ) ' माहाभाग्याद् ( अणिमाद्यैश्वर्यवशात् ) देवताया: ' ( निरुक्त ७४८ ) प्र ० ४ पांचों इन्द्र तो महादेव बाबाकी उद्दण्डताके मनुष्ययोनिमें फलस्वरूप ढकेले गये । पर वेचारी स्वर्गलक्ष्मीने या छाया-सीताने क्या अपराध किया कि वे भी इस लोक में टपका दी गईं । उ ० ४ - ' यस्माद् यत्रैव पतिस्तत्रैव जाया ' इत्यादि ग्रन्थोंके वचन सुप्रसिद्ध हैं । ' सती च योषित् प्रकृतिश्च ब्राह्मण-पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि निश्चला ' ( शिशुपालवध १।७२ ) सो जहां पतिको जाना पड़ता है, वहां पतिव्रता स्त्रीको भी आकृष्ट होना पड़ता है । इससे विपरीत जब भगवान्की नित्यशक्ति राधाको भूलोक जानेका शाप मिला, उसके लिए श्रीविष्णुको भी भूलोक में जाना पड़ा । प्र ० ५ यदि पञ्चेन्द्रोपाख्यानं सत्य होगा, तो ऋषिकन्यो-पाख्यान गलत सिद्ध होगा । यदि ऋषिकन्योपाख्यानको सत्य मानोगे; तो पञ्चेन्द्रोपाख्यानको गलत मानना पड़ेगा । ( उ ० ५ ) पौराणिक उपाख्यानोंमें कल्पभेद बहुत प्रसिद्ध है । सो कल्प-भेदवश घटनाभेद भी कमी हो जाता है । कभी वे दोनों ही काण्ड दैवगत्तिवश एक साथ ही घटित हो जाते हैं । जैसे भूकम्प हो जाते हैं, वहाँ कई भिन्न देशकालोंसे आये हुए भी इकट्ठ NT ANANT 51 ar ही आकर फलभोगकेलिए प्राप्त हो जाते हैं, वैसे वहां भी घटा Gujarat. An eGangotri Initiative and
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ह २२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) लेना चाहिये । यह सब बातें अबहुश्रुतता तथा शास्त्रज्ञानकी अपूर्णता तथा खण्डनरसिकतामें ज्ञात नहीं होतीं । तब बाहरी तथा भीतरी आंखें कलुषित होती हैं; तब क्या सूझे? प्र ० ६ पौराणिकोंके शिवबाबा कितने अच्छे हैं कि ऋषि-कन्योपाख्यानमें ऋषिकन्याने मांगा एक पति; और बाबाने पांच पतिका वरदान दे दिया । उ ० ६ वर मांगने के समय ऋषि-कन्याने पतिकी उत्कण्ठामें पांच वार कहा था - पतिं देहि, पति देहि आदि । इसलिए उस एक पतिको भी पांचरूपमें विभक्त कर दिया । उसके पूर्व कर्मोंके कारण यहां पञ्चपतित्व होना था; अतः पांच वार मांगने में पञ्चपतित्वका वरदान हो गया, यह स्पष्ट बात है । यह खूबी तो दयानन्दसमान में है कि- विधवाको बिना पतिकी प्रार्थनाके भी संन्यासी - बाबा उसे जबर्दस्ती १० वा ११ पतियोंका वैदिक वरदान दे गये, और देवरको तो विवाहके दिनसे पतिका सहायक बनवा दिया । स्त्रियोंसे अलग - थलग रहने वाले संन्यासी बाबा स्त्रियोंके प्रति कितने दयालु रहे । वे भी तो उन्हीं भोले बाबाके पुजारी रहे । शायद अपनी अंग छाननेके उपरान्त ( क्योंकि वे भांग तथा हुक्का दोनों का प्रयोग किया करते थे ) ( देखो श्रीमद्दयानन्दप्रकाश ) गांजेका लम्बा दम भी लगा लेते रहे हों, ( यह वादी के शब्द हैं ); तभी तो उन्हें १० पति और देते हुए उन्हें अधर्म मालूम नहीं हुआ । इसलिए उन बाबाने विवाहित हो रही लड़की को भी सभ्य मनुष्योंसे सन्तान उत्पन्न कर लेना कहा है । देखो - ' मरुतः, इमां नारीं प्रजया CC - 0. Ankur Joshi Collection कुतर्क - कर्तन ६२ [ १२३ वर्धयन्तु ' ( संस्कारवि, विवाहप्र. ) । साथ प्र ० ७ यदि एक ही इन्द्र पांच पाण्डवों में विभक्त हो सकते थे, तो स्वर्गलक्ष्मी भी यदि पांच रूपों में विभक्त कर दी बाद उसमें क्या त्रुटि थी? उ ० ७ ऐतिहासिक घटनाओं में वादीकी जाती, इच्छाएँ लागू नहीं हो सकतीं । प्र ० ८ पुराणकारोंके लिए इस प्रकारकी कहानी गढ़नी उनके बाएँ हाथका खेल था । उ ० ८ यह बात गलत है । जो घटना सव होती थीं. उसे ही इतिहासमें दिया जाता था, इति ह आस- किय इति इतिहासः । तब यदि उसमें कहीं बनावट होती; तो कहीं पर गलती पड़ जाती । हां, दयानन्दजीवनचरित्रकार चित्र सक कहानियां गढ़ दिया करते थे । कहीं पिता अम्बाशङ्कर बने जाते हैं, कहीं कर्शनजी लालजी तिवारी । कहीं मूलशङ्कर लड़का वन जाते हैं, तो कहीं दयाराम वा दयाल । कहीं टङ्कांरा ग्राम बन जाता है, कहीं मोरवी नगर । कहीं पिता पुजारी बन जाते हैं, तो कहीं सर्कारी ओहदेदार | अपनी - अपनी मनमानी घटनाएँ भी गढ़ दी गई हैं । कहीं लेखरामलिखित दयानन्द- अप सम्बन्धी घटनाओंको देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्यायने झुठला दिया यह है । कहीं अन्तमें विष देना कहा है, तो कहीं पीसा हुआ कांच पिलाना कहा है । कहीं श्री विरजानन्द भट्टोजिदीक्षितकी मूर्तिको दयानन्दजी द्वारा जूते लगवा रहे हैं । कहीं उनकी पुस्तकोंका यमुनाप्रवाह कहा है । महाशय, केवल एक आंख न रखो । ( प्र ० ६ ) असली बात यह थी कि प्राचीनकालमें एक स्त्रीके Gujarat. An eGangotri Initiative