सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 481–490
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 481–490
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६२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) साथ एक ही समय में अनेक पुरुषों के विवाहकी सनातनप्रथा थी ॥ जैसे कि- जटिला, वार्त्ती आदिकी । उ ० ६ तव उस समयकी वादीकी मां भी शायद ११ पति हों, तब हमारी बधाई स्वीका कसे, पर हमारे मतमें जटिला, वार्त्ती आदिका इतिहास अपवाद है, यह सर्वसाधारण प्रथा कभी नहीं रही । उन वार्त्ती आदिके भी विशेष कारण थे — यह ' आलोक ' ( ७ ) में हम दिखला चुके हैं । 5 सर्वसाधारण प्रथा न होनेसे ही तो द्रुपद दिने उसका विरोध व किया था । यथार्थ रहस्य समझनेपर ही वे चुप हो गये थे; पर बादी जैसे ज्ञानलवदुर्विदग्धोंको तो कौन प्रसन्न कर सकता है? I ( प्र ० १० ) पौराणिक व्यासको तो इतना कहकर अपना पीछा छुड़ा लेना चाहिये था कि सभी संसार के पुरुष विष्णुके रूपान्तर हैं; तथा स्त्रियां लक्ष्मी हैं, इसलिए सभी औरतोंसे भोग-I विलास कर सकते हैं, कोई भी पाप नहीं है । जैसे कुन्ती दिने .. ऐसे ही करवाया । ( उ ० १० ) हमारे यहां अपने - अपने विष्णुकी अपनी - अपनी लक्ष्मी है । कोई पापकी बात नहीं है । आपके यहां तो विवाहिता स्त्री सब पुरुषोंसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है । इस विषय में पम संख्या में ' वैदिक विवाहका रहस्य ' देखो । और नियोगवादमें तो जो सामने या जावे; अहं भैरवः, त्वं भैरवी, आवयोरस्तु सङ्गमः " हो जाता है । कुन्ती श्रादिमें देवताओंसे योग था, वहां मैथुन नहीं था, देखो ' आलोक ' ( ८ ) में नियोग और मैथुन ' ( १ ) अतः वहां ( मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयकसंवाद [ ९ २५ नहि दुष्यति ' ( महामा, श्राश्रम. ३०/२३ ) कोई दोष नहीं । ( प्र ० ११ ) ' यह वही स.ध. है, जहां पञ्चमकार हुआ करते थे ' । ( उ ० ११ ) पञ्चमकारादि वामाचारके पारिभाषिक शब्द हैं, सर्वसाधारण नहीं । इस विषय में ' आलोक ' ( ५ ) में ' महीधर-भाष्य ' पर निवन्ध देखों । ( प्र ० १२ ) श्रीपुरीधाम के देवमन्दिरकी पवित्र दीवारों पर अश्लील चित्रावलियाँ आज भी मौजूद हैं । ( उ ० ) वे काम-विज्ञान के रहस्य हैं कि कहीं लुप्त न हो जावें । उनसे यह भी सूचित किया गया है कि यदि इनमें लगे रहोगे, तो फिर श्रीजंगन्नाथजी का दर्शन नहीं मिल सकेगा । इनको विक्रान्त करके, इनको पीठ पीछे करके फिर जगन्नाथ भगवान् के दर्शनके अधिकारी बन सकोरो । पाठकोंने देख लिया होगा कि यह लोग कहांसे शुरू होकर कहाँ जा गिरते हैं । पर फिर भी हमने उनका प्रत्युत्तर दे दिया है । अब हम यह प्रालोचनाएँ समाप्त करके ' सैद्धान्तिक चर्चा ' शुरू करते हैं । सैद्धान्तिक चर्चा-( १६ ) साम्यवादविषयकसंवाद 1. ( होलीका विनोद ) होली के मनोरम दिन हैं, ऋतु सुहावनी बनी हुई है । ENT ANANT ' s S 1 an भांति - भांति के सनुष्य विविध प्रकारोंसे अपना मनो - विनोद कर Gujarat. An eGangotri Initiative Sand
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