सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 481–490

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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६२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) साथ एक ही समय में अनेक पुरुषों के विवाहकी सनातनप्रथा थी ॥ जैसे कि- जटिला, वार्त्ती आदिकी । उ ० ६ तव उस समयकी वादीकी मां भी शायद ११ पति हों, तब हमारी बधाई स्वीका कसे, पर हमारे मतमें जटिला, वार्त्ती आदिका इतिहास अपवाद है, यह सर्वसाधारण प्रथा कभी नहीं रही । उन वार्त्ती आदिके भी विशेष कारण थे — यह ' आलोक ' ( ७ ) में हम दिखला चुके हैं । 5 सर्वसाधारण प्रथा न होनेसे ही तो द्रुपद दिने उसका विरोध व किया था । यथार्थ रहस्य समझनेपर ही वे चुप हो गये थे; पर बादी जैसे ज्ञानलवदुर्विदग्धोंको तो कौन प्रसन्न कर सकता है? I ( प्र ० १० ) पौराणिक व्यासको तो इतना कहकर अपना पीछा छुड़ा लेना चाहिये था कि सभी संसार के पुरुष विष्णुके रूपान्तर हैं; तथा स्त्रियां लक्ष्मी हैं, इसलिए सभी औरतोंसे भोग-I विलास कर सकते हैं, कोई भी पाप नहीं है । जैसे कुन्ती दिने .. ऐसे ही करवाया । ( उ ० १० ) हमारे यहां अपने - अपने विष्णुकी अपनी - अपनी लक्ष्मी है । कोई पापकी बात नहीं है । आपके यहां तो विवाहिता स्त्री सब पुरुषोंसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है । इस विषय में पम संख्या में ' वैदिक विवाहका रहस्य ' देखो । और नियोगवादमें तो जो सामने या जावे; अहं भैरवः, त्वं भैरवी, आवयोरस्तु सङ्गमः " हो जाता है । कुन्ती श्रादिमें देवताओंसे योग था, वहां मैथुन नहीं था, देखो ' आलोक ' ( ८ ) में नियोग और मैथुन ' ( १ ) अतः वहां ( मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयकसंवाद [ ९ २५ नहि दुष्यति ' ( महामा, श्राश्रम. ३०/२३ ) कोई दोष नहीं । ( प्र ० ११ ) ' यह वही स.ध. है, जहां पञ्चमकार हुआ करते थे ' । ( उ ० ११ ) पञ्चमकारादि वामाचारके पारिभाषिक शब्द हैं, सर्वसाधारण नहीं । इस विषय में ' आलोक ' ( ५ ) में ' महीधर-भाष्य ' पर निवन्ध देखों । ( प्र ० १२ ) श्रीपुरीधाम के देवमन्दिरकी पवित्र दीवारों पर अश्लील चित्रावलियाँ आज भी मौजूद हैं । ( उ ० ) वे काम-विज्ञान के रहस्य हैं कि कहीं लुप्त न हो जावें । उनसे यह भी सूचित किया गया है कि यदि इनमें लगे रहोगे, तो फिर श्रीजंगन्नाथजी का दर्शन नहीं मिल सकेगा । इनको विक्रान्त करके, इनको पीठ पीछे करके फिर जगन्नाथ भगवान्‌ के दर्शनके अधिकारी बन सकोरो । पाठकोंने देख लिया होगा कि यह लोग कहांसे शुरू होकर कहाँ जा गिरते हैं । पर फिर भी हमने उनका प्रत्युत्तर दे दिया है । अब हम यह प्रालोचनाएँ समाप्त करके ' सैद्धान्तिक चर्चा ' शुरू करते हैं । सैद्धान्तिक चर्चा-( १६ ) साम्यवादविषयकसंवाद 1. ( होलीका विनोद ) होली के मनोरम दिन हैं, ऋतु सुहावनी बनी हुई है । ENT ANANT ' s S 1 an भांति - भांति के सनुष्य विविध प्रकारोंसे अपना मनो - विनोद कर Gujarat. An eGangotri Initiative Sand

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२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) रहे हैं । लड़के रास्तेमें आते हुए लोगोंके ऊपर चुपके से रंग ' डालकर फिर भाग जाते हुए देखे जा रहे हैं । युवा लोग उपहास तथा व्यङ्ग्य करके एक - दूसरेसे हँसी कर रहे हैं । कई अपने आपको सभ्य माननेवाले वैसे बालकोंको डांटनेमें लगे हुए उनके शोर मचानेसे लज्जित हुए कैंप से रहे हैं । कई लोग एक-दूसरेसे विलक्षण संवाद करते हुए ही होलीका आनन्द प्राप्त करते हुए दीख रहे हैं । पहलेके व्यक्तियोंको छोड़कर हमारी दृष्टि दूबपर बैठे हुए ' आपसमें संवादका आनन्द प्राप्त करते हुए दो पुरुषोंपर जा पड़ी । हम भी वहां पहुँच गये । उसमें एक खद्दरका कोट एवं पेंट आदि पाश्चात्य वेषवाले कपड़े धारण किये हुऐ, बीच - बीच में सिगरेटका हवन करता हुआ, बड़े संरम्भसे बोलता हुआ एक सुधारकम्मन्य है, और दूसरा धोती, कुर्ता, चादर ( दुपट्टा ) साफा आदि प्राचीन वेष धारण किये हुए माथेपर चन्दन केसरादिका तिलक लगाये विशालभालका एक धार्मिक पण्डित है । दोनोंकी इस प्रकार बातचीत शुरू हुई । १ सुधारक – पण्डित! तुम लोग नाममात्रके पण्डित हो । आजकल अस्पृश्योंका प्रश्न बहुत बढ़ता जा रहा है; तुम लोग उनको कुछ भी सुविधाएँ नहीं देना चाहते; इसमें क्या कारण है? । १ धार्मिक – महाशयजी! सम्भव है कि हममें यह त्रुटि हो; इस विषयमें आप हमारे शास्त्रोंसे पूछिये । हम शास्त्रानुसारी CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद | ६२७ ६२८ सिद्धान्तों को माननेवाले हैं । आप लोग जो कुछ करना चाहते उसपर प्रष्टव्य है कि आप लोग उसे हिन्दुशास्त्रोंका अतिक्रमण हैं, वाक्य करके करना चाहते हैं, अथवा उनकी अनुकूलता में करना चाहते ३ हैं? यदि पहली बात है; तो आप हिन्दुशास्त्रोंका अतिक्रमण भी करते हुए कैसे हिन्दु हैं? यदि दूसरी बात है; तो शास्त्र आपक अस्पृश्योंके साथ व्यवहारभेद बड़ा स्पष्ट बताता है- यह जान रखिये | अपने २ सुधारक — पण्डित! ऐसा नहीं है । इससे मालूम होता. ना स है कि - तुमने अपने शास्त्रोंको सूघा तक नहीं । देखो तुम लोगों-की भगवद्गीता - जिसपर तुम लोगोंको बड़ा नाज है- क्या कहती है । उसके शब्द जरा कानके पर्दे खोलकर सुनना । वह कहती है - ' विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ( ५१८ ) यहां बताया गया है कि-पण्डित लोग ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता एवं चाण्डाल में समान व्यवहार करते हैं । एक तुम पण्डित हो कि - चाण्डालों - अछूतोंको छूनेकी, ही मनाही करते हो । २ धार्मिक - महाशय जी! मालूम होता है कि आपने भी अपने शास्त्रोंको नहीं देखा । इधर - उधर से सुन - सुनाकर यही

श्लोकः रट लिया है । न तो सारी भगवद्गीता ही पढ़ी, और न

उसके तत्त्व वा रहस्य पर कभी विचार ही किया । बतलाइये

ब्राह्म कि क्या आप इस पद्यको प्रमाण मानते हैं?. व्यव -2 ३ सुधारक -- वाह जी वाह! क्या हम श्रीकृष्णभगवान् के -Gujarat. An eGangotri Initiative

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7 श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) २८ , वाक्योंको ही न मानेंगे? ३ धार्मिक अपना मतलब सिद्ध करने केलिए ही श्रीकृष्ण भी आपके लिए भगवान बन जाते हैं; और उनका वचन भी आपके मत में प्रमाण बन जाता है । वास्तवमें तो आपके लिए व वेद प्रभारण है; न स्मृति ही न गीता प्रमाण है, न आपके न व अपने सम्प्रदायको पुस्तक, यह सहस्रों प्रमाणोंसे सिद्ध किया जा सकता है, परन्तु उसे उपेक्षित करके हम आपसे उपक्षिप्त 7 रतौक पर ही ऊहापोह आपके आगे रखते हैं । आप साबुधानता से सुनें । ४ सु ० - मैं सावधान हूँ; सुनाना शुरू कर दो । · ४ धा ० - यह श्लोक आपके इष्ट पक्षको सिद्ध करने में सक्षम नहीं है । ५ सु ० पण्डित! जरा साफ़ - साफ़ कहो । इस प्रकारके गोल - मोल शब्दों से आपका काम चलनेका नहीं । तो साफ ही सुनिये । उक्त गीतोपद्य में ' समदर्शिनः? है ' समवर्तिनः ' नहीं । यदि ऐसा है; तो ब्राह्मण एवं अन्त्यजोंके साथ समान व्यवहार नहीं हो सकता ।:... ६ सु ० - तब तो यह श्लोक ही व्यर्थ हो जावेगान ६ धा ० = नहीं । इसका यह आशय है कि -सुख, दु: ख आदि ब्राह्मण - चाण्डाल " आदिका समान होता है; पर इसमें दोनोंकी व्यवहार - समता नहीं कहीं गई । यदि सबका व्यवहार भगवान्-को समान इष्ट होता; तब भगवान् ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणोऽ-CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद | ६२ ९ परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ' ( १८४७ ) इत्यादि वचन अपना थोड़े गुणोंवाला न कहते कि-भी धर्म दूसरोंके सुव्यवस्थित भी धर्मसे अच्छा है । सभीका साम्यवाद भगवान्‌को ' ब्राह्मण - क्षत्रिय - विशां शूद्राणां इष्ट नहीं । तभी तो ब्राह्मण च परंतप! ' ( १६४१ ) यहांपर , क्षत्रिय, वैश्य इन द्विजोंको समासके आसनपर बैठाकर भी भगवान्ने शूद्रको उनके इकट्ठा किन्तु द्विजोंसे साथ इकट्ठा नहीं बैठाया । आप मानते ७ ७ हाथी, साम्य एकज शुद्रको पृथक् कर दिया गया । अस्तु । क्या इस श्लोकसे इस पद्यमें कहे हुए सभीका व्यवहार हैं? - साम्य सु ० - अवश्य, इसमें किन्तु परन्तुको क्या अवकाश! धा ० - ऐसा नहीं । पहले तो इस श्लोकमें ब्राह्मण, गाय, कुत्ता, अन्त्यज आदिका आपस में सब व्यवहारोंका नहीं कहा गया । किसी प्रकार क्लिष्टकल्पनासे उक्त पद्यसे सबका साम्यवाद निकाला भी जाय, फिर भी वह जगतमें किसी भी प्रकार चालू नहीं हो सकता । ८ सु ० - तुम स्पष्ट शब्दोंमें कहो । इस प्रकार गोल - मटोल शब्दोंसे तो तुम्हारा अभिप्राय जानना भी कठिन हो रहा है । ८ घा ० - तब मैं आपके आदेशानुसार स्पष्ट शब्दोंमें कहता हूँ, उससे आप बुरा न मनाएंगे, ऐसी आपसे आशा है । कहिये - आपके नेता कौन हैं; उनका आप कभी जलूस भी निकालते हैं;. वा निकालते रहे हैं? अथवा उनका जलूस किस ढंगसे निकालते हैं-? Gujarat. An initiative PENT ANANT Cs I Dan Sande

पृष्ठ 484

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३० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ६ सु ० - इसमें बुरा मानने की बात ही क्या है? हमारे भूत- नेता तो एक महर्षि स्वामी थे, अब भी एक महात्मा थे; अन्य भी वर्तमानमें बहुत - से नेता हैं । उनके जलूस भी कई वार निकाले गये । जलूस कभी बहुत घोड़ों वाली फिटनके द्वारा, कभी मोटर द्वारा, कभी नेताको हाथी पर चढ़ाकर निकाला जाता है । ६ धा ० — यदि हाथीपर किसी नेताको चढ़ाकर उनका जलूस आप लोग निकालते हैं, तो श्वानपर चढ़ाकर भी आपने अपने नेताका जलूस कभी निकाला? १० सु ० – तुम भी विचित्र जीव हो । कुत्तेपर चढ़ाने के लिए कहकर तुम हमारे नेताओं का अपमान कर रहे हो । याद रखो कि तुम पर ' हतक - इज्जत'का दावा दायर किया जा सकता है । १० धा ० — यह तो पहले ही मैने निवेदन किया था कि - बुरा न मनाइयेगा; पर प्रतिज्ञा करके भी आपने प्रतिज्ञा भङ्ग की । इसके अतिरिक्त होली के दिन भी हैं; इसलिए आपका दावा शायद जज न भी सुन सके । आपका यह उलाहना देना ठीक भी नहीं; क्योंकि आपने अपने प्रमाणित गीतापद्यसे विरुद्धता भी की है । उस पद्यको फिर सुन लीजिये ' विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ' इस पद्यमें जैसे हाथीका नाम है, वैसे श्वानका भी । जब आप इस श्लोकके द्वारा इनमें समदृष्टि मानते हैं, तब हाथी और दोनोंके आपके अनुसार समान होनेसे हाथी की भांति श्वानपर CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवाद विषयक संवाद [ ९ ३१ ६३ भी अपने नेताकी शोभायात्रा क्यों नहीं निकालते? स्वागतयात्रा जब हाथीपर भी होती है; तो उसकी समतावश श्वानपर भी हो आप क्यों आप मोटरोंपर नेताओंका स्वागत करके जनताका व्यर्थ । जन गोड व्यय कराते हैं? श्वान तो बहुतायत से मिल ही जाते हैं; न उनसे गय । पेट्रोलका खर्च होता है, न ही मोटर - ड्राईवर श्रादिका खर्च है । वैसे समदर्शी आप लोगोंके मतानुसार वह श्वानपर आरोहण हाथी पर चढ़ना हो जावेगा । जनता भी तब आपकी समदृष्टिका उद्घोष भली - भांति जान लेगी । श्रापका यश भी बहुत जावेगा । इस प्रकार यदि कोई युद्धमें हाथीपर चढ़कर युद्ध गाय करता है; तब उसके स्थानपर वह क्या श्वानपर चढ़कर भी युद्ध साम कर सकता है? यदि नहीं, तो साम्यवाद फिर क्या हुआ? हैं । ११ सुधा०- ( अपने श्लोकसे स्वयं ही निगृहीत होकर तब कुपित होकर भी कुछ कह सकने में असमर्थ होनेसे चुप ही अथ रहा ) । श्वान ११ धा ० - महाशय! कृपया कोप हटाइये । इस बातको पक्च मैं छोड़ता हूँ । यह बोलिये कि अपने नेताको जब आप किसी स्थानपर ठहराते हैं, तो उसके खानपानकी आप कैसी सेवा देता करते हैं? १२ सुधा ० – हम स्वादिष्ट अन्नसे, मँहगे फलोंसे और गाय के अप दूधसे उस नेताकी सेवा किया करते हैं । होली १२ धा ० - यहां भी कोप हटाने के लिए आपका पहला वचन क्या याद दिलाता हूँ; और फिर आजकल होली के दिन भी हैं ही । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 485

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६३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वा आप जानते ही हैं कि आजकल कितनी मँहगाई हो रही है । जनताके पास धन अब प्रयत्नलभ्य हो गया है । आजकल गोदुग्ध के भी विक्रय शुरू हो जानेसे वह दूध भी धनप्राप्य हो गया है । आपसे उपस्थापित पूर्वपद्यमें, जैसे गायका नाम है, वैसे श्वान का भी, और आप इस पद्यमें साम्यवादके सपने भी देख रहे हैं; तब क्या गोदुग्धके स्थानपर शुनीका दूध भी नेताको का पिला सकते हैं, जिससे निर्धन जनताका धन व्यय न हो । पूर्वोक्त पद्यमें विद्याविनय - सम्पन्न ब्राह्मरणका नाम भी है और गायका भी । हम तो पूर्वोक्तपद्य में ' समवर्तिनः ' न होनेसे युद्ध साम्यवाद नहीं मानते, पर आप ' समदर्शिनः ' से साम्यवाद लेते हैं । आप अपने नेताको गुणकर्मसे ब्राह्मण भी मानते ही होंगे; कर तब क्या आप उसके आगे गायसे भोजनीय खली -भूसा आदि ho अथवा श्वपाक ( क्योंकि- पूर्वोक्तपद्य में यह नाम भी है ) से भोक्तव्य वानका मांस भी रख सकते हैं? इससे आपकी समदृष्टि भी पक्की हो जायगी । १३ सुधा ० - अरे पण्डितपाश! हमारे नेताओं को तू गाली वा देता है? १३ धा ० - धी - वरजी! आप क्षुब्ध न हूजिये । यदि आप अपने मनचाहे श्लोकपर आचरण नहीं करना चाहते; तब यह होलीका विनोद ही समझ लीजिये । अस्तु । यह कहिये कि -चनai क्या आप सन्ध्या - हुवन आदि भी किया करते हैं? यदि हां, कैसे स्थान में? CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद | ६३३ १४ सु ० - ( उत्साहित होकर ) हम सन्ध्या भोजनादि गोबरसे लिपे शुद्ध - हवन तथा स्वामी गोवरसे स्थानमें करते हैं । हमारे भूतनेता लिपे स्थानकी ( स.प्र. १० पृ. १६६ में ) बहुत प्रशंसा कर गये हैं । .... १४ धा ० - तब तो साम्यवादी महाशयजी! पूर्वके दिये गीतापद्य में जैसे गायका नाम है, वैसे विद्याविनयसम्पन्न आपसे ब्राह्मणका भी । यदि आप गाय के गोबरसे लिऐ स्थानमें सन्ध्या-हवन एवं भोजनादि करते हैं, तब उस विद्याविनयसम्पन्न ब्राह्मणके भी गोवरसे [ जैसे कि आपके नेताने प्रश्न कराया है-' जो गायके गावरसे चौका लगाते हो; तो अपने गोबरसे क्यों नहीं लगाते ' ( स.प्र. पू. १६६ ) ] लिपे स्थानपर भी क्या सन्ध्या-हवन भोजनादि किया करते हैं वा कर सकते हैं? आजकल गोहत्या जारी होजानेसे गौएँ कठिनता से मिलती हैं, इसी प्रकार गोवर के दूढ़ने में भी परिश्रम पड़ता है । इस प्रकार करनेसे आपका साम्यवाद यत्र - तत्र सर्वत्र प्रसिद्ध हो जावेगा । १५ सु०- ( लज्जित होकर भी ढिठाईसे ) ठीक है, पर ब्राह्मण के संलमें यदि दुर्गेन्ध न होती, तब हम ब्राह्मण क्या, बल्कि श्वपाक ( चाण्डाल ) के मलसे भी उस स्थानको लीपते । इम - सुधारकोंके नेता खांमीजी ( स.प्र. के उक्त स्थानमें ) दुर्गन्धकेकारण ही मनुष्य-मलके लेपका निषेध कर गये हैं ( जैसे कि गायके गोवरसे वैसा दुर्गन्ध नहीं होता, जैसा कि मनुष्यके मलसे [ दुर्गन्ध होता है ] १६६ ) 1 Gujarat. An eGangotri Initiative 3r s 1 an ande

पृष्ठ 486

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६३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) १५ घा ० — यदि दुर्गेन्धकेकारण आप ब्राह्मणके मलके से डरते हैं; तब आपका साम्यवाद कहां गया? इस प्रकार गायकी समदृष्टिसे क्या आप कुतियाके मलका ( शुनि चैव ) लेप भी कर सकते हैं? यदि नहीं तो हम भी यदि दुर्गन्धसे श्रोत - प्रोत चाण्डालोंसे ( जिसका अर्थ आपके भूतनेताने अपने स.प्र. तथा अपने वेदभाष्य आदिमें ' भंगी ' किया है ) स्पर्श नहीं करते; तब हमें ही वैषम्यवादी क्यों कहा जाता है? फिर आप ही साम्यवादी कैसे? १६ सु०- ( फिर भी ढिठाईसे ) चाण्डाल आदिका तो स्नान-के बाद दुर्गन्ध हट ही जाता है; इसलिए उनसे स्पर्श आदि तो करना चाहिये; पर ब्राह्मणके मलका दुर्गन्ध तो पानी से भी दूर नहीं होता; इसलिए ही हम उसका उपयोग नहीं करते, गायके पुरीष ( गोमय ) का ही उपयोग करते हैं । १६ धा ० यदि आप ब्राह्मणके मलका स्नानसे भी दुर्गन्ध दूर होना नहीं मानते; वंसे चाण्डाल आदिके स्नान करानेपर भी उसके भीतरी जन्मसिद्ध परमाणु दूर नहीं होते । इसलिए हम उनसे स्पर्श नहीं करते, परन्तु आप साम्यवादी - आश्चर्य है क़ि - ब्राह्मणुके मलके दुर्गन्धसे कैसे डरते हैं? आप दुर्गन्ध दूरं करनेकेलिए ही तो हवन करना मानते हैं । आपके भूतनेता भी ऐसा ही मान गये हैं, तभी तो वे मुर्देका भी हवन करना इसी उद्देश्यसे मान गये हैं । तब ' आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिताः ( मृत पितरोंका तर्पण किसी म्रादि वृक्षपर जलसे करनेसे आम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An साम्यवादविषयक संवाद [ १३५ भी सिंच जाते हैं, और पितरोंका तर्पण भी हो जाता है- ' एक मारण पन्थ दो काज ' ] यह महाभाष्यके पस्पशाह्निकमें कहा हुआ न्याय भी विद्वान् परिपुष्ट हो जावेगा । धर्म भी हवनसे हो जावेगा; दुर्गन्ध नियोग भी दूर हो जावेगी । गाय और ब्राह्मणका आपका मनचाहा वरणम साम्यवाद भी पुष्ट हो जायगा । इस प्रकार ' एका क्रिया द्वयथेकरी- व्याख्य नहीं नहीं - त्र्यर्थंकरी प्रसिद्धा ' यह न्याय चरितार्थ हो जायगा । १७ सु ० – ( अपने मनमें - पता नहीं, मैंने किस खराव मुहूर्त में समाज यह श्लोक प्रमाणरूपसे उपस्थित किया था, जिससे मैं स्थान- गाड़ी में स्थान पर निगृहीत हो रहा हूँ । आगेसे पोपोंके प्रमाणों पर मैं पूर्वोक भविष्यत्में विश्वास न किया करूँगा । ) ( स्पष्टरूपमें ) पण्डितजी । नाम है आपके शब्द कठोर हैं, कुछ कोमलता पकड़िये । प्रकार १७ घाट- - श्रीमान् जी! यह मैं आपके मतानुसार ही तो नह कह रहा हूँ, तब आप क्यों परेशान हो रहे हैं? यदि आप यहां सीख अव्यवस्था देख रहे हैं; तब साम्यवादका समूलोन्मूलन कीजिये, १६ क्योंकि - साम्यवाद जारी करनेपर इस प्रकारकी बहुत - सी अरे दुध अव्यवस्थाएँ आ पड़ेगी आप बतावें कि आपका वर्णै क्या है? तुम्हारे १८ सु ० - मैं गुणकमे से ब्राह्मण हूँ | और १८ धा ० - यद्यपि गुणकर्मणा वर्णव्यवस्था शास्त्रविरुद्ध है, इसी लि और इस विषयके चलानेपर प्रकृतविषयके छूट जानेकी सम्भावना घों है; और आप इस विषयको जानना चाहते हों; तो! ' आलोक ' ( ४–६–८ पुष्प ) मँगाकर देखिये, तथापि आपकी ही बातको उद्घ क eGangotri Initiative

पृष्ठ 487

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मानकर ब्राह्मणभूत आपसे प्रश्न है कि एक सुधारक आण विधवा स्त्रीकेलिए वा नपुंसक विद्वान् की स्त्री के लिए बाकी योग के लिए भंगीका प्रयोग किया जा सकता है? ब्राह्मणका भी प्रक्षालन आता है, भङ्गीका क्यों नहीं? आप किसी समाज में हा लाख्यान देने गये हों; उस समय कई सामाजिक लोग आपको री-रेरणा करें कि आप चाण्डालका मल उठानेवाला पात्र उठाकर समाज मन्दिरके पुरीषालयको स्वच्छ करके वह मल गधेपर वा वाही में रखकर उसे नगरसे बाहर डाल आइये, ( क्योंकि— वन-र में क आपके पद्यमें ब्राह्मण तथा श्वपाक ( चाण्डाल ) दोनोंका नाम है ); तब आपको इसमें कोई आपत्ति तो न होगी? इस कार साम्यवाद के प्रसारणार्थ व्याख्यान देनेसे आपका दिमाग भी नहीं थकेगा, आपके आचरणसे लोग स्वयं साम्यवाद भी सीख जायेंगे । १६. सु०- ( चारों ओर हँसते हुए लोगोंको देखकर गुस्से से ) घरे दुष्ट, धर्मध्वजी पण्डित! तू किस कुमार्ग में जा रहा है:? व्यर्थकी बातें मत कर । मेरी इच्छा तो यही होती है कि अभी तुम्हारे दान्त तोड़ दूँ; पर चारों ओर ठहरी हुई तुम्हारे पक्ष की और इधर होली के मदसे मस्त हुई जनताको देखकर डरता हूँ, झीलिए चुप हो रहा हूँ, परन्तु तू असभ्य शब्दों से मेरे मर्मोको ना काट रहा है? क ' -६ धा ० - प्राज्ञजी, शान्त हुजिये । इससे तो आप स्वयं यह कर रहे हैं कि - साम्यवाद - कुमार्ग तथा असभ्यताका मूल CC - 0. Ankur Joshi साम्यवादविषयकसंवाद | १३७ है, इससे आप साम्यवादको कोसिये, मुझे नहीं । यदि आप यह नहीं सह सकते, तव चाण्डालको ब्राह्मणके समान मान कैसे दिलाना चाहते हैं? अस्तु । आप उक्त गीतापद्यको पुनः याद करके कहिये कि आपके पास यदि हाथी हो; और कोई श्वान रखनेवाला चाण्डाल आपको श्वान देकर उसके बदले में हाथीको लेना चाहे तो आप वहां ' ननु - नच, किन्तु परन्तु ' तो नहीं करेंगे; क्योंकि उक्त पद्यमें दोनोंकी गणना है? २० सु ० - यह कैसे हो सकता है कि - थोड़े मूल्यवाली वस्तु लेकर बहुत मूल्यवान हाथी दे दिया जाय? २० धा०—- तब साम्यवादका डिण्डिम बजाकर आप लोग जनताको क्यों ठगते हैं? वास्तवमें आपसे दिये हुए श्लोकमें साम्यव्यवहारका उपदेश रत्तीभर भी नहीं है । उसमें स्वयं भगवान् कृष्ण भी व्यवहार के वैषम्यका अपने वचनसे स्वयं उपदेश दे रहे हैं । पहले वे ब्राह्मणका नाम लेते हैं, चाण्डालका नहीं! उसके बाद भी गायका नाम रखते हैं, चाण्डालका नहीं । उसके बाद हाथीका, पश्चात् श्वान एवं श्वपाकका नाम ले रहे हैं । यह कैसे? वे सत्त्व गुणवाले ब्राह्मण और गायको पहले रखते हैं, अन्तमें तमोगुणी श्वान और श्वपाकको इकट्ठा लेते हैं । दोनोंके मध्य में भेद रखनेकेलिए रजोगुणवाले, दीर्घकाय, व्यवधान करनेकेलिए दीवाररूप हाथी को रखते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण जब स्वयं इनमें भेदभाव रखते हैं; तब उन्हें भेदका उच्छेद वा साम्यवाद कैसे सम्भव हो सकता है? 1 ar Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 488

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३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) भगवान् ने इस पद्यमें कुत्ते और गायका नाम, एक पद्यमें कहा है । यदि भगवान् कृष्णको दोनोंका सम - व्यवहार चलाना इष्ट होता; तो इतिहासमें जैसे श्रीकृष्णका गौओंका चराना प्रसिद्ध है, वैसे ही क्या उनका कुत्तोंका चराना भी आपने कहीं सुना है? यदि नहीं; तब स्पष्ट है कि भगवान् इनमें सम - व्यवहार नहीं चाहते थे । जैसे शास्त्रोंमें गायका दान श्रेष्ठ माना जाता है; तब क्या गायके स्थान में कुत्ते- कुतियाका दान भी कहीं श्रेष्ठ माना गया है? आपके भूतनेता स्वामीजीकी सं.वि.के अनुसार विवाह - संस्कारमें वरको गाय दी जाती है; तब क्या साम्यवाद-वश उसे श्वान भी दिया जा सकता है? गाय बहुत मंहगी मिलती है, श्वान सस्ता मिल सकता है । यदि नहीं; तब स्पष्ट है कि - उक्त पद्यमें साम्यवादं विवक्षित नहीं । नहीं तो यदि आप लोग संस्कारविधिके प्रयोगकेलिए जैसे ब्राह्मणको बुलाते हैं; क्या उसके स्थानमें पढ़े - लिखे चाण्डालको भी ला सकते हैं, वा कभी लाये हैं? यदि सर्दीसे ठिठुरा हुआ कोई चाण्डाल श्रा - जावे; तो उसे तो कदाचित् सुधारक अन्दर बैठाकर कम्बल ओढाकर वा अग्निसे उसकी सर्दी हटा देते हो; वैसे वात, वृष्टि, शीत आदिसे आर्त कोई कुत्ता आपके घरके अन्दर आ रही हो, तब क्या आप लोग उस कुत्ते को भी अपने घरमें प्रविष्ट करके वैसा व्यवहार उसके साथ भी करते हैं? या डण्डे आदि द्वारा उसे घरसे बाहर निकाल देते हैं? यदि डंडा मारकर उसे बाईरें निकाल देते हैं, तब आपको साम्यवाद क्या हुआ? उस पद्यमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An साम्यवादविषयकसंवाद । ३तो श्वश्वपाक दोनोंका ही नाम है । आप अपनेको ब्राह्मण कहते हैं, इस श्लोक में ब्राह्मण तथा कुत्ता दोनोंका नाम है । जैसे कुत्तेको गलेमें रस्सी डालकर घुमाया जाता है; तब क्या ब्राह्मण होते हुए आप भी अपने साथ किये गये हुए इस व्यवहारको सह लेंगे? यदि नहीं; तब साम्यबाद क्या वस्तु है? वपाक यह वानको पकाकर खा जानेवाले चाण्डालका नाम है । यदि श्वान और पा सादृश्य है; तो जिस प्रकार श्वपाक श्वानको खा सकता है; ग्रन्थ क्या श्वपाकको श्वान भी भरवा सकता है? यदि नहीं, तब यह व्यवहारभेद क्यों? उद्यत गोहत्याके विरोधमें आप लोग भी आन्दोलन करते हैं- यह इषं है; तब म्युनिसिपलिटीसे प्रतिवर्ष श्रावण आदिमें किये इन जाते हुए कुत्तोंके वध के विरोधार्थ आन्दोलन क्यों नहीं करते? ध्रुव क्योंकि - उक्त गीतापद्यमें दोनोंका समतासे ही निर्देश है । उस समय क्यों चुप रहूंते हैं? यह व्यवहारभेद क्यों? क्या अपने-आपको ब्राह्मण कहनेवाले आप अपने आपको उक्त पद्यमें स्थित ' पाक ' शब्दसे बुलवाना पसन्द करते हैं? यदि नहीं; तब स्पष्ट हैं कि उक्त पद्यमें व्यवहार - साम्यका उपदेश नहीं है । यदि ऐसा है; तब यह जानते हुए भी आप लोग इन पद्योंको प्रसारित करके जनताको क्यों ठगते हैं - इसलिए कि - गीता माननेवाले सनातनधर्मी कलङ्कित हो जावें? बदल वास्तवमें आप लोग ही अन्त्यजोंकी हानि करनेवाले हैं । eGangotri Initiative

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tri ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) उन्हें स्पृश्यता दे देने से कुछ भी नहीं बनेगा? कोई भी भूखा देवमन्दिर प्रवेशसे अथवा व्याख्यानमात्र सुनने - सुनानेसे पुरुष पनी उदरज्वाला शान्त नहीं कर सकता । मुख्य प्रबन्ध उनकी वृतिका करना पड़ता है । आप लोग तो इन निम्न जातिवालोंकी इत्ति काटने में लगे हुए हैं । क्या यही आपका अछूतोद्धार हैं? सनातनधर्मी ही अन्त्यजोंकी वृत्ति करनेवाले होनेसे उनकी वृत्तिके व्यवस्थापक हैं । अस्तु । अन्य कोई किसी प्रामाणिक पन्थका श्लोक इस विषय में आपके मतका पोषक हो, उसे भी उपस्थित कर दीजिये, उसपर भी हमें विचार करनेकेलिए उद्यत हैं । २१ सु ० - तुम गलत कहते हो । अनाथोंके नाथ सुधारक ही इन अन्त्यजोंके शुभचिन्तक हैं; आप लोग नहीं । श्लोक मैं अन्य श्रव कोई भी नहीं दूँगा । पहले दिये हुए ही गीताके श्लोकन मेरी काफी दुर्दशा की है; न मालूम अन्य श्लोक मेरी क्या दुरवस्था करे | तुम पोपोंकी पुस्तकों के श्लोकोंपर अब मैं कभी विश्वास न करूँगा । वे बाहरसे हमें अच्छे और अनुकूल लगते हैं, और आप लोगों के हाथमें आकर यह हमें काटने के लिए भयानक अस्त्र बन जाते हैं । यद्यपि उक्त गीतापद्य में साम्यवादमें तुमसे कहे दोष आते हैं; तथापि तुम लोगों के मत में भी यह दोष चा सकते हैं, ‘ पण्डिताः समदर्शिनः का तुम लोग क्या अर्थ बदलोगे? * २१ घा ० यदि आप कोई अन्य श्लोक उपस्थित नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयकसंवाद | ६४१ करना चाहते; तो आपकी इच्छा । हमारे मतमें उक्त गीतापद्यकी शिक्षा समदर्शनमात्र में पर्यवसित हो जाती है, समव्यबहारका उपदेश यहां पर इष्ट नहीं । अतः हमारे पक्षमें कुछ दोष नहीं आता । वह समदर्शन भी तब व्यवहर्तव्य है, जब गीताके ही अनुसार पुरुष ' समलोष्टाश्मकाञ्चन ' ( ६८, १४/२४ ) हो, जब सोना, ढेला, ' और पत्थरमें समान व्यवहार करे । क्या लोग किसी अछूतको अपना संचित किया हुआ सोना आप यदि वह आपको उसके विनिमयमें दे देंगे, ढेला वा पत्थर दे दे? ' समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ' ( १२/१८ ) इस प्रकारकी अवस्थामें ही ‘ पण्डिताः समदर्शिनः ' होता है कि आप शत्रु और मित्रमें भी बराबर व्यवहार करें, मान - अपमानको भी बरावर समझें । ' साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ' ( ६६ ) जब श्राप सत्पुरुषों और पापियोंसे भी बरावर व्यवहार करें । बताइये कि क्या यह बातें सर्वसाधारणके व्यवहारकी हैं? फिर भगवान् कृष्णने सत्पुरुषों - पाण्डवोंकी ही क्यों रक्षा कराई? क्यों पापी दुर्योधनादि तथा उनके साथियोंको मरवाया? यह बातें तो तुरीयकोटिवाले अवधूत परमहंसकेलिए वो सम्भव हो सकती हैं; सर्वसाधारणकेलिए नहीं । अथवा ' समदर्शिनः ' का यह भाव भी हो सकता है कि- पण्डित ( सदसद्विवेकी ) लोग इन सबमें ब्रह्मकी दृष्टि रखते हैं । अपने आक्षिप्तपद्य के अग्रिम पद्यमें ही देखो ' निर्दोषं हि समं ब्रह्म ' ( ५/१६ ) इस गीताके श्लोक-से सम नाम ब्रह्मका होता है; पर इससे सबमें समान व्यवहार a Gujarat. An eGangotri Initiative

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६४२ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं हो जाता | ब्रह्म पेड़े - बर्फीमें भी है, मद्य एवं विष्ठा तथा कीचड़ में भी ब्रह्म है; पर इनमें व्यवहार - साम्य नहीं हो जाता । यह गीता श्लोक तो सर्वाङ्गीण समाहित हो चुका; अब अपनी युक्तियों का उत्तर भी सुनिये; और अपना अछूतोंके प्रति हितैषी बननेका आदर्श भी देखिये सुनिये | आप लोग अछूतोंकी हितैषिताका ब्याज बाहर से दिखलाकर जनताको • ठगकर उनसे धनकी ग्रन्थियाँ लेकर उनको अपने ही कामोंमें लगाते हैं, सनातनधर्मी वैसा नहीं करते । अब अपने आपको सुधारक माननेवाले आप लोगोंका तथा सनातनधर्मियोंका अस्पृश्यता की हितैषिता के विषय में तारतम्य भी सुनिये । २२ सु ० - हां, सुनाइये । देखें आप उसमें कितना असत्यका प्रयोग करते हैं? २२ धा ० — उसमें आपको असत्यका प्रयोग नहीं मिलेगा । सत्यता ही होगी । आप लोग अन्त्यजोंको स्पृश्यता देकर उनसे उनकी सुन्दर कन्याएँ खींचना चाहते हैं; और ऐसे विवाहोंका नाम आप लोग अपने पत्रों में ' आदर्शविवाह ' इन शीर्षकोंसे ' हिन्दी मिलाप ' आदि पत्रोंमें छपवा दिया करते थे, और करते हैं । फिर वह अछूत कन्यासे विवाहसंस्कारविधि भी अद्भुत होगी; उसका आदर्श भी देख लीजिये । वहां यह सङ्कल्प होगा । “ ॐ तत्सत् कुमारी मरियमपुत्रस्य हजरत ईसामसीहस्य CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद [ III ६४४ १६३६ सने, तथा महामहारिसी दयानन्दाब्दे १११, मासोत्तमे ऊच मासे ऐप्रिलफूले, पक्षपातरहिते सावकाशे सर्वेषां सर्वेण्ट मोद सडे वासरे, पुण्यधाम्नि कीन्सगाडेने, गुरुकुलगोत्रो- विव पन्नाय नियोगजाय खत्रीपुत्राय, गुणकमानुसारं ब्राह्मणाय ज्ञान अम्बेडकरपैरपूजकाय, इण्टरकास्टमैरिजविलानुसारेण लालवेग-, विव कुलोत्पन्नां, झाडूटोकड़ीत्यागिनीं, कोह्लापुरसंस्थापितगर्ल्सस्कूले- भएक प्राईमरीपासां, छटांकभरघृतके वैदिक - होमद्वारा शुद्धां, डासनबूट लज्ज गौनरिस्टवाचेत्यादिभूषितां, पाउडरपाण्डुमुखीं, लिस्टिकरक्तोन्त-राधरोष्ठीं, पर्सालंकृतप्रकोष्ठाम्, अर्द्धारकस्कदि - परिधानीयां, करन वक्रसीमन्तवाहिनीं नग्नशिरस्कां १४४ वारं रजस्वलीभूतां, मनोहारिकचकुच, अनुपमलावण्यां नवनवयुवकैः शेक हैण्डे इस कुवेतीम्, अस्मादेव दिवसाद् देवृकामाम्, अवरोधाव गुण्ठनादि- अव प्रथाविरोधिनीं चन्चलानाम्नीमिमां चतुर्विंशतिवर्षीयाम्, कन्याम् अछूतोद्धारयज्ञसिद्धयर्थं प्रजेस्टिड टू यू ( तुभ्यमहं सम्प्रददे ) । नाम एवं लालवेगजातीयेन कन्यापित्रा प्रोक्ते वर उवाच - ‘ कतिपय- मान दिवसानन्दकृते भविष्यत् तलाकप्रदानार्थं कौमार्य भ्रूणहत्यापापाद गार्हस्थ्ये च सन्ततिभाराद् आत्मानं त्रातुं ' वूमनफ्रेण्ड ' नामक-गर्भनिरोधकौषधिसेविनीम्, प्रदर पवित्रां श्रीमतीमिमां साम्यवाद- स्पृश पुष्टः चर्थ इमां लेडी महत्या. प्रसत्त्या स्वीकरोमि ' । ततो जेण्टिलमैना अप * यह हमारा निबन्ध ' संस्कृतम् ' अयोध्या ( १८-३-३६ ) में होलिकाङ्क्षमें प्रकाशित हुआ था; अतः यहां उसी कालका निर्देश है । वैसे यह संकल्प ऐप्रिलफूलके उपलक्ष्य में था । Gujarat. An eGangotri Initiative