सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 511–520
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 511–520
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६८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ε ) कई वर्षों तक गर्भमें पड़े रहनेका वर्णन आया है, उसमें असम्भव का प्रश्न न रहा । २ बालिका भी मां । नई दिल्ली के उत्तर रेलवे सेंट्रल अस्पताल में ६ मासकी बालिका पेटका सफल आपरेशन किया गया, पेटसे अविक-सित बच्चा निकला । जब यह पैदा हुई थी, उसका पेट बढ़ा हुआ था । कई दिन बाद कालकामें इस बालिकाकी मांने उसे नहलाते समय उसके पेट पर सूजन अनुभव की । डाक्टरों को दिखलाने पर उन्होंने उसे देहली ले जानेकी सलाह दी । फलतः वहां उसका ऑपरेशन हुआ । ( नवभारत टाइम्स ४-५ - १६६६ ) । ३ यमराज यमदूतों की बातें एक ग्रार्यसमाजी ने भी मानीं । इमारे पास आर्य संन्यासी स्वा. सत्यानन्द तीर्थजी पधारे । उन्होंने हमें एक अंग्र ेज देम्सकी उसके मुखसे सुनी हुई घटना सुनाई कि एक बार मैं.. ( टेम्स ) सख्त बीमार हुआ कि मेरी नब्ज छूट गई । मेरे परिवार वालोंने ईसाई प्रथा के अनुसार मेरे दफनाने के लिए प्रबन्धः शुरू कर दिया । पर मुझे कई ' यमदूत ' पकड़ कर ले गये; और मुझे ' धर्मराज ' के सामने पेश किया । मैंने वहाँका दरबार लगा हुआ देखा । वहां चमकते हुए दिव्य सिंहासनपर एक दिव्य पुरुष बैठे हुए थे । उन्होंने मुझे देखते कहा- यह टेम्स वह नहीं है । इसे वहां वापिस ही यमदूतोंसे ले जाओ । दूसरे टेम्सको पकड़ लाओ । वे मुझे वहीं छोड़ आये, और मैं जीवित हो उठा । ठीक उसी समय मेरे पड़ोस में CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक घटनाएं समाचार - पत्रों में [ ess रहने वाले दूसरे टेम्सकी - जो पूर्ण स्वस्थ था- तुरन्त मृत्यु हो गई । मैंने उस यमपुरीमें कई प्रकारके नरक देखे, जिनमें किसी-को जलाया जा रहा था, किसीको आगमें भूना जा रहा था । यह सुनाकर वे श्रार्य - संन्यासी बोले, जबसे मैंने यह सुना, तबसे मैं स.घ.की इन बातोंको मानने लगा हूँ । पुराणोंका मनन करता हूँ । गीता - रामायणका अव मैं पाठ करता रहता हूँ । ४ परलोक में हनूमान् मन्दिरका देवी प्रादेश । ( नवभारत टाइम्स देहली ६-१-६० ) नैनीताल ८ जनवरी । गढ़वाल जिलेमें रानाघाटके पास कुण्डीग्रामका निवासी रुद्रदत्त मृतक घोषित किये जानेके कुछ देर बाद पुनः जीवित हो उठा । विलाप कर रहे सम्बन्धी स्तब्ध रह गये । उसने आंखें खोलीं, और सम्बन्धियोंको अपनी परलोक - यात्राके अनुभव सुनाये! ANAN रुद्रदत्तने कहा- मुझे परलोकमें श्रीहनुमान् मन्दिर बनवाने का दैवी आदेश मिला है । काफी अर्सा बीमार रद्द कर अब वह अच्छा हो गया है । और उसने हनुमान्जीका मन्दिर बनवाना शुरू कर दिया है । ५ चितापर रखी मृत वृद्धा जीवित हो गई । ( वीर अर्जुन १८-२-६६ ) कानपुर । धर्मप्रेम तथा पूजा-पाठकेलिए विख्यात वृद्धा तुलसाका १४ फवेरी रातके १० बजे देहान्त हो गया । दूसरे दिन जब उसे वह उठकर बैठ गई और बोली कि पास ले गये, तो वे बोले कि अभी इसका हमने तो तुलसा चमारिनको बुलाया है । वापिस भेज गये । लोग उसे बाजे - गाजेके की रहनेवाली तुलसा चमारिनका ठीक हो गया । चितापर रखा गया; यमदूत मुझे चमके समय नहीं हुआ । इसपर यमदूत मुझे साथ घर लाये । वहीं उसी समय देहान्त Gujarat. An eGangotri Initiative
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855 ]. श्रीसनातनधर्मालक ( ९ ) : ६ श्रीहनुमान्की प्रतिमासे आंसू गिरे । ( वीर अर्जुन ५-१०-६४ ) इन्दौर । महारानी रोड २ पर स्थित ' वर्षों पुरानी श्रीहनूमान्जीको मूर्तिकी बाई आंखसे पानी की " बूँदोंको निकलते देखा गया है । मन्दिरकेष्पुजारी पं ० द्वारका-प्रसाद मिश्र एवं गोविन्दनारायण झाले. बताया कि जब प्रतिमा पर चोला चढ़ाया जा रहा था तो उस समय एक आँख में मामूली गढ़ा - सा पड़ गया, और पानी की बूदें निकलने लगीं । २४ घण्टे हो चुके हैं ), अखण्ड रामायण - पाठ प्रारम्भ कर दिये गये हैं + १. श्रीहनुमानजीको बाहों और सिरसे लहूकी धारा -12 ( नवभारत टाइम्स १४: ३-६६ ) नागपुर । विद्रर्भुक्रे: सोंदिया-नगरके पासके डोंगर गांव के पौने सौ वर्ष प्राचीन श्री राधाकृष्ण... मन्दिरमें पांच फीट ऊँची श्री इतू मानूजी की प्रतिमा के बाहों और सिरसे लहूकी धासु पांच स्टे लगातार बह निकली । हजारों की ह भीड़ एकत्रित हो सई, अन्न व जङ्गली की आना प्रारम्भ की । तब जाकर रक्त रुका । बादमें } उस प्रतिमापरा सिन्दूर चढ़ाया गया । यह मन्दिर, श्री दाजी वा भाऊने, बनवाया था! - मूर्तिपूजा के विरोधियो ऐसे चमत्कारों को याद रखो । [ तुलना करो विशना दाई भुगवन्नाम - जप्रका लाभ, एक कार्यसमाजीकी जुबानी अगस्त १६६४ में पिलखुवा में हमारे पास, आर्यसमाजी विद्वान् श्रीविहारीलालजी शास्त्री काव्यतीर्थ पधारे नामजस के P विषय में उन्होंने सुनाया । एक समान मन्दिर में मेरी कथा करने के पूर्व - एक आर्यसमाजी विद्वातूने, खड़े होकर कहा कि सनातनी लोग जो जोर - जोर से हरे राम हरे राम आदि ति कीर्तन करते हैं, यह मूर्खता है । इससे ईश्वर प्रसन्न नहीं होता CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक घटनाए समाचार - पत्रो म [ eve इसके बाद हमने उनके वक्तव्यका विरोध किया और कहा- यदि इनकी बात मान ली जाय, तो जो हमारे वेदादि- , वृत्त शास्त्रोंमें ईश्वरका पवित्र नाम ' ॐ ' बार - बार जपने की आज्ञा है, और गायत्री - जपकी आज्ञा है; तो क्या यह मूर्खता होगी? पाठ स्वा.द. जीने कर्णवासमें यज्ञोंमें ब्राह्मणों द्वारा जप भी कराया था; क्या यह मूर्खता थी? जिस वक्त शब्दोच्चारण होता है; तो " सूत्रात्मा - वायुमें शब्दका चित्र: बनता है, उससे तदनुकूल वातावरण बनकर मनपर प्रभाव पड़ता है । -सन : यह कहकर उन्होंने नाम - जपकी एक घटना सुनाई- भ ६ समनाम जपनेसे एक कंजरने ठाकुरके घर जन्म लिया । • उझानी ( बदायं ) में एक बार कुछ प्रतिष्ठित ठाकुर जो पास के गांव के थे + गंगास्नान के लिए जा रहे थे । उनके साथ एक ५ वर्षका बच्चा था । वह बच्चा वहांके कंजरोंके पास चला गया; और ' एक कंजरकी स्त्रीका नाम लेकर उसे पुकारा । स्त्रीने कहा- उ तू कौन है? लड़के ने कहा- तू मुझे भूल गई, मैं तेरा पति हूँ; तू मेरी स्त्री है? वह बहुत हैरान हुई; कहने लगी. कि मेरा पति तो मर गया । बच्चेने कहा - तेरा पति मोहनसिंह मैं ही हूँ; अब मेरा ठाकुर फ्रे ग्रहां. जन्म हुआ है । उसने जो - जो बातें कहीं कि वह ठीक - ठीक मिलीं । जवायवहादुर भदावर आये; तो उन्हें भी उस ५ वर्षके बच्चेने पहचान लिया; तब वे भी १४ चकित रह गये; तब उन्हें याद हो आया कि - मोहनसिंह कंजर हमारे खस - खसके पर्छे बनाया करता था । यह कभी मांस नहीं खाता था, किसी क जीवको नहीं मारता था । जाङ्गाजी में बड़ी श्रद्धा रखता था । नित्य श्री रामनाम जपा करता था । उसी पुण्य के प्रतापसे इसका उच्च जोतिमें जन्म हुआ । उस लड़के को जो कि: पूर्व जन्मका Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) वृत्त सुनकर कंजर रखना चाहते थे, भदावरजीने उसे ठाकुरोंको दिलवा दिया । * यह एक आर्यसमाजी श्रीकाव्यतीर्थेजी द्वारा सुनाया वृत्त पाठकोंने पढ़ लिया । फिर उन्होंने अपनी माताका वृत्त सुनाया । १० श्रीरामनामके प्रतापस मेरी माताने भविष्यवाणी की 15.१२ : काव्यतीर्थजाने कहा मेरी पूज्यां दादीजी जहां कट्टर - सनातनधर्मी थीं; मेरी माताजी भी वैसी ही थीं । मेरी माताजी मालासे नित्य श्रीरामनामका जप किया करती थीं । ' उसीके प्रतापसे उन्होंने अपनी मृत्युसे = दिन पूर्व भविष्यवाणी कर दी थी कि मैं एकादशी के दिन व्रत पूरा कर चुकने के पश्चात् प्रारण छोगी । वैसा ही हुआ । नियत दिन उन्होंने गोदान किया; और कहा- मेरी अस्थियोंको हरद्वार ले जाया जाय । बाद मेरे निमित्त ब्राह्मणों को पद दिये जायें, फिर राम - राम कहते हुए उन्होंने अपना शरीर छोड़त 5 पाठक महोदय, यह बातें एक कट्टर आर्यसमाजी नेता के मुख सुनी हुई । लिखी गई हैं ।..... मन्त्रशक्तिका अद्भुत चमत्कार | TIRTH ( धर्मयुग बम्बई ३-११-६३ पृ. २३ ) - सतना स्टेशनसे कुछ दूर नागौद एक रियासत थी । वहां स्कूल से थोड़ा आगे एक जेल थी; आजकल है या नहीं; पर यह उस समय की घटता है । हमने सुना कि जेल में पक कैदी आया है, वह सांप भाड़ने-का मन्त्र जानता है । किसी को सांपने कांटा था, वह डाक्टरोंके कथनानुसार मर चुका था । उसका रंग नीला था । कैदी बाहर आया, उसने सांपके विषय में पूछा । मृतक के सम्बन्धियोंते बताया कि - धोखेसे इसका पांव पड़ा, नीचे काला और पुराना सांप पड़ा था; उसने इसे डंस लिया । कैदी ने काले उर्द निकाले, CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक घटनाएं समाचार - पत्रोंमें [ εe? मन्त्र पढ़कर लाश पर फेंकने शुरू किये, पर उसका कोई भी प्रभाव न हुआ । तब उसने एक कटोरा दूध मँगाया । तीन ' चक्कर ज़मीन पर खींच दिये । एक चक्करमें मृतकको बड़े दूसरेमें दूधको रखा । तीसरेमें उसने लोगोंको लिटाया । तीनों चक्करोंकी. परिक्रमा की; और मन्त्र ठहराया । उसने कौडियां निकालीं, उन्हें मन्त्र: - पढ़कर जोरसे पढ़ा । उसने दो शरीर कांप रहा था; वह मिन्त्र फेंका । कैदी का पढ़ता जाता था । लोगनि श्राश्वयसे देखा कि- एक काला पुराना सांप बड़े गुस्से से फनफनाता हुआ आया और अपना सिर पटकने लगा; उस पर वही दोनों कौडियां चिपकी हुई थीं । कैदी उसके पास जाकर बोला - कौडियोंसे तकलीफ हो रही है? सांपने सिर हिला दिया । कैदी ने कहा कि- तो फिर इसका जहर चूस लोन, ' अभी ' कौडियां अलग कर दूँगा? पर सांपको यह स्वीकार नहीं हुआ । कैदीने उसे बहुत समझाया कि इस कार वह छोड़ दे, और दूधे भी पी लें । पर सांप मानता ही न था; उसने अपनी पीठ दिखाकर सूचित किया कि इस आदमीने उसे कुचल दिया था । ( 20 । वि जब समझाने पर भी सांप नः माना; तव कैदीने एक गज्र नया कपड़ा मंगाया, उसे संपिकी शकल की एक रस्सी बनाई । उसपर उसने मन्त्र पढ़ा । उसने पूँछकी ओरका थोड़ासा हिस्सा चीर दिया, " उधर सांपकी पूँछसे खून निकलने लगा । सांप बड़े गुस्से में आकर फनफनाने लगा । कैदीने फिर मन्त्र पढ़ा, और -उस रस्सीकी पूँछको कुछ और चीर दिया । सांपकी पूँछ भी कुछ और चिर गई । " 12 T ANANT 1 ar -E अब सौंपने हारकर " उस मृतक के दो चक्कर लगाये; फिर पैर में जहां काटा था, वहां मुँह लगाकर जहर चूसने लगा । Gujarat An eGangotri Initiative
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६६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) कैदी मन्त्र पढ़ता जा रहा था । श्राघे घण्टेके बाद मृतकका i नीला रंग बदल चुका था । उसमें चेतना आ गई थी । ( श्रीकृष्ण देवघरे ) यह है मन्त्रशक्तिका चमत्कार । १२ प्रार्थनासे पुनः नेत्रज्योति मिली ( दैनिक हिन्दुस्तान १ सितम्बर '६४ ) ( कादर मैसूर ) कादर ग्राम पंचायतके भूतपूर्वं अध्यक्ष श्री वीरन्ना दो मास पूर्व अपनी आंखोंकी ज्योति खो चुके थे । कई अच्छे डाक्टरोंने दिखानेपर ज्योति लौटना असम्भव बताया । डाक्टरों से निराश हो श्री-वीरन्ना अपने परिवारकी देवी के मन्दिरमें जाते, और ज्योति फिर प्रदान करनेकी प्रार्थना करते । एक सप्ताह के बाद एक दिन प्रातः जब वे भावमग्न होकर गा रहे थे, उनकी आंखोंकी ज्योति लौट आई, उन्हें पहले की भांति दीखने लगा ' | ' यह है प्रार्थना एवं भजनका चमत्कार । इस पुष्पके बहुत विस्तीर्ण हो जानेसे हम इसे यहीं रोकते हैं । आगे दशम पुष्पकी आशा लेकर, पाठकोंसे विदा लेते हैं । वे अभीसे दशम पुष्प के लिए १०० ) के सहायक तथा ग्राहुक बनाना शुरू कर दें; जिससे दशमः पुष्पके प्रकाशन में देरी न हो । इति पूज्य श्रीपं ० शीतल लाल शर्म- श्रीगौरीदेवी तनुजनुषा, देहली-दरीबाकलांस्थ रामदल संस्कृत महाविद्यालयाध्यक्षेण: विद्यावागीश श्री दीनानाथ शर्मंशास्त्रिसारस्वतेन प्रणीतस्य: श्रीसनातनधर्मालोक ' स्य ग्रन्थमालायां तत्रम - सुमनोविकासः सम्पूर्णः * * पहलेके ८ पुष्प ( तृतीयको छोड़कर ) मंगाकर उक्त ग्रन्थमाला-का सेट पूरा कर लीजिये । आगेके दशम पुष्पकेलिए सहायताद्रव्य भेज-कर ग्रन्थमालाके शीघ्र पूर्ण करने में सहयोग दीजिये ।. CC - 0. Ankur Joshi Collection Ε ' श्रीसनातनधमोलोक ' ग्रन्थमालाका परिचय विद्यावागीश - श्री दीनानाथ शास्त्री सारस्वत ( प्रिंसिपल जा रामदल संस्कृत महाविद्यालय, दरीबा कलां, देहली ) द्वारा प्रणीत ‘ श्रीसनातनधर्मांलोक ' महाग्रन्थ संस्कृत में १० हजार पृष्ठों में श लिखित है । यह हिन्दुर्धर्मकै प्राचीन अवाचीन साहित्यार्णवको इ मथकर लिखा गया है,. अतः वह हिन्दुधर्मका विश्वकोष एवं स.ध.का महाभारत वा कल्पवृक्ष सिद्ध हो सकता है । इ ग्रन्थमाला हिन्दी में छप रही है । इसे १००० ) देकर इसके संरक्षक बनें, आपको चित्र छपेगा, आपका नाम प्रत्येक प्रकाशनमें छपेगा । अथवा ५०० ) देकर इसके तके ‘ सम्मान्य - सहायक ' वा २५० ) . देकर मान्य - सहायक बनिये, आपके पास प्रन्थमाला पहुँचती 115 रहेगी । अथवा न्यूनसे न्यून १०० ) देकर सहायक बनिये i । इस प्रकार आपके सहयोगसे ' आलोक ' प्रन्थ-माला शीघ्र प्रकाशित होकर भ्रान्त - जनों की धार्मिक शकाओं को प्रद दूर करनेवाली सिद्ध हो सकेगी । अ अब तक इसके पुष्प छप चुके हैं । विद्वानों एवं गुणज्ञोंने 1.0 इस ग्रन्थमालाकी ' भूरि - भूरि प्रशंसा की है । आप भी स्वयं इस ग्रन्थमालाको खरीदें, तथा दूसरोंको भी इसके मँगानेके लिए प्रेरित करें । सभी शङ्काएँ मिटेंगी । आप शीघ्रतासे इसकी सहायतार्थ उद्यत Thesie हो । इससे हिन्दु - जातिको धार्मिक नवजीवन भा प्राप्त होगा । आज ही प्रन्थकार के नाम से आप सहायता - द्रव्य गुरा कर दें । Grat. An eGangotri Initiative
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६६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जो महोदय स्थायि - ग्राहकताका शुल्क १० ) दस रुपये पूर्व जमा करायेंगे, उन्हें सब पुष्प पौने मूल्यमें दिये जाएँगे । १-२ पुष्प – ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) आजकल ' नमस्ते'-शब्दका प्रचार संस्कृतानभिज्ञ जनतामें बहुत हो गया है; और इसके प्रचारक इसका वैदिक होनेका दावा करते हैं । हमने इसमें नमस्ते ' ' विषय पर विस्तीर्ण विचार दिया है । ' नमस्ते ' विषयक -ट्रैक्ट हमें जितने मिल सके, उन पर आलोचना भी कर दी है । आरम्भमें उक्त महाग्रन्थकी सम्पूर्ण विषय - सूची तथा उसपर विद्वानोंके भाव भी दिये गये हैं । यह ३५० पृष्ठोंकी सजिल्द एवं सुन्दर पुस्तक मूल्य ४ ) ३८ पुष्प - इसमें स्त्री - शूद्रोंके वेदाधिकार पर विचार करते हुए ' यथेमां वाचं कल्याणी ' मन्त्रके प्रचलित अर्थकी आलोचना करके उसका वास्तविक अर्थ, हारीतकी ब्रह्मवादिनी, ‘ गोर्भिलसूत्र ’ का ‘ यज्ञोपवीतिनी ' पद ‘ दुहिता मे पण्डिता जायेत ', ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ’, ‘ ब्रह्मचर्येण कन्या, पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' आदि बहुतसे वचनोंके वास्तविक अर्थ बताकर ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीवान, सत्यकाम जाबाल, सूत, वाल्मीकि, शबरी आदि शुद्र थे वा अशुद्र- इस पर विचार किया गया है इसकी प्रथमावृत्ति समाप्त है । द्वितीयावृत्ति समयपर छपेगी । ४ र्थ पुष्प — इसमें हिन्दु - शब्दकी वैदिकता, वेद- विषयमें भारी भूल, महाभाष्यकारके मतमें वेदका स्वरूप, वर्ण - व्यवस्था - वा जन्मसे; डा ० भगवानदासजीके मतपर CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रन्थमालाका परिचय [ εex विचार, मृतकश्राद्ध तथा मृतक पितरोंका टाइमटेबल, उसमें ब्राह्मण - भोजन वैदिक है वा अवैदिक, मूर्तिपूजा एवं अवतारवाद-का रहस्य, क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं, नवग्रहोंके प्रचलित मन्त्रोंका ग्रहोंसे सम्बन्ध कैसे है, ग्रहण और उसका सूतक-इत्यादि अनेकों विषयों पर बड़े सुन्दर विचार दिये गये हैं । ५०० पृष्ठसे अधिक पृष्टकी सनिल्द सुन्दर पुस्तकका मूल्य६ ) ५ म पुष्प - इसमें हिन्दुधर्मके मुख्य विषय चोटी जनेऊ, गायत्री मन्त्र, १६ संस्कार, सन्ध्याके सभी अङ्गपर विचार, मालाके मणियोंकी १०८ संख्या क्यों? यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व आदि अनेकों विषयों पर विचार करके प्रातः से रात्रि - शयन FANANT तकके आचारोंकी वैज्ञानिकता बताई है । इसके बाद दीपमाला, होली आदि वर्षके प्रसिद्ध पर्वोके वैज्ञानिक रहस्य बताकर, Br श्रीगणेशका वैदिक देवत्व तथा श्रीमद्दीघरके ' गणानां त्वा ' मन्त्रके भाष्यपर - जिसपर प्रतिपक्षियोंकी ओरसे घोर - शोर मंचाया जाता है - विचार इत्यादि १२५ विषयोंपर सुन्दर विचार दिये हैं । आज ही मँगाइये । मूल्य ११ ) छठा पुष्प – यह सुन्दर पुस्तक ६५० से अधिक पृष्ठोंनें छपी है । इसमें स.ध. तथा वेदका स्वरूप दिखलाते हुए ब्राह्मणभागके ar अवेदत्व पर किये जानेवाले तर्कोंपर युक्ति - प्रमाण द्वारा विचार करके, वेदाधिकारि - विचार, देवमन्दिरोंमें अन्त्यज - प्रवेश पर ' वैदिक दृष्टि ' दिखलाकर ' ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ' ' मानसकी इस प्रसिद्ध चौपाईके विविध अर्थ तथा उनकी आलोचना की Gujarat. An eGangotri Initiative
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