सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 501–510
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 501–510
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९ ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) करूँगा । मैं आपको प्रणाम करता हूँ, आशीर्वाद दीजिये, मैं इसमें सफल हो जाऊँ । ३४ धार्मिक- - आपका कल्याण हो; परमात्मा आपको शास्त्रीय व्यवहार करनेका बल दे " [ इसके बाद वहां ठहरी हुई और इस संवादको सावधानता-से सुन रही हुई जनताने भी हार्दिक सौहार्दसे उन दोनों पर लाल और पीला रंग डाला; और धार्मिक पण्डितके गलेको पुष्पमालाओं से भर दिया । सुधारकने भी धार्मिक पण्डितजीको फूलका गजरा पहराया । तब दोनों अपने - अपने गन्तव्य स्थान-केलिए प्रस्थान कर गये ] । ( २० ) पर्वतों के पंख तथा उनका विदारण वैदिक । वादियोंने जैसा पौराणिक- साहित्यपर दुराक्रमण किया है, वैसा अन्य साहित्यपर नहीं । पौराणिक साहित्यको उसका पूर्वापर छिपाकर इस प्रकार साधारण - जनदृष्टिमें घृणास्पद कर दिया है कि जैसे उसका अक्षर 13 - अक्षर वेदविरुद्ध हो । उन्हींकी कृपासें पितृपरम्परासे जिसने वेदका एक अक्षर भी नहीं देखा; वेदाङ्ग व्याकरण आदिको भी कभी नहीं सूघा; संस्कृतभाषाका भी परिनिष्ठित ज्ञान प्राप्त नहीं किया; ऐसा भी व्यक्ति पुराण-साहित्य में साधारणबुद्धिसे अतीत वृत्तान्तको पढ़कर, विना ही उसपर विशेष, विचार किये, और बिना ही उसपर अनुसन्धान-वृत्ति स्वीकार किये, केवल अपने लोगों की पोथियां पढ़कर CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ ६६५ वाणीमात्रसे उसे ' गप्प ' कह देनेकेलिए तैयार हो जाता है, यह कलिकी महिमा है । उन विषयों में ' पहाड़ोंके पंख ' विषय भी अन्तर्भू त होता है, हम उसे यहां वेदशास्त्रीय कसौटीसे परीक्षित करने के लिए ' आलोक ' पाठकोंको प्रेरित करते हैं । ( १ ) वेदमें लिखा है- ' त्वं तम् इन्द्र! पर्वतं महामुरु ' वज्रेण वज्रिन्! पर्वेशश्चकतििथ ' ( अथर्व २० १५५६, ऋ. ११५७७६ ) इसका अर्थ इतना स्पष्ट है कि इससे पुराण- पक्षकी स्पष्टता हो जाती है । कि- हे वञ्चधारी इन्द्र! तूने वड़े वेगवाले पहाड़को वज्र द्वारा उसके पंखों समेत काट डाला । श्रीसायणाचार्यने आधिभौतिक आधिदैविक, ऐतिहासिक आदि अर्थ भी समय - समय पर करते हुए ' पर्वत ' का ' वृत्रासुर ' वा मेघ तथा पहाड़ अर्थ भी दिखलाया है । यहां पर पहाड़ अर्थ करते हुए उसने लिखा है- ' हे इन्द्र! वज्रिन् - वज्रवन्! त्वं तं प्रसिद्धं महाम् - महान्तं महत्त्वोपेतम्, उरुम् - अतिविस्तीर्णं पर्वतं - पर्ववन्तं गिरिम् । जातौ एकवचनम्, गिरीन् । वज्रेण श्रायुधेन पर्वशः श्रवयवशः पचादिक्रमेण चकर्तिथ ' - शकलीकृतवान् असि ' ( अथर्व ) । तब यहां पुराणवर्णित पर्वतोंका पक्षच्छेदन वेदानुकूल सिद्ध हुआ । इसीको पुराणोंने ANANTA 1 स्पष्ट करके लिखा है । इन्द्र एक स्वर्गका स्वामी देवविशेष एवं देवताओंका राजा वेद - पुराणोंमें प्रसिद्ध है । ' प्राच्या दिश: त्वम् इन्द्र! असि राजा ' ( अ. ६६८३ ) यहां. वेद में भी पुराणकी तरह इन्द्रको पूर्वदिशाका स्वामी कहा है । इसलिए अपने आपको वैदिक माननेवाले स्वा.दु.जीने भी Gujarat. An eGangotri Initiative
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