सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 501–510

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 501–510

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९ ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) करूँगा । मैं आपको प्रणाम करता हूँ, आशीर्वाद दीजिये, मैं इसमें सफल हो जाऊँ । ३४ धार्मिक- - आपका कल्याण हो; परमात्मा आपको शास्त्रीय व्यवहार करनेका बल दे " [ इसके बाद वहां ठहरी हुई और इस संवादको सावधानता-से सुन रही हुई जनताने भी हार्दिक सौहार्दसे उन दोनों पर लाल और पीला रंग डाला; और धार्मिक पण्डितके गलेको पुष्पमालाओं से भर दिया । सुधारकने भी धार्मिक पण्डितजीको फूलका गजरा पहराया । तब दोनों अपने - अपने गन्तव्य स्थान-केलिए प्रस्थान कर गये ] । ( २० ) पर्वतों के पंख तथा उनका विदारण वैदिक । वादियोंने जैसा पौराणिक- साहित्यपर दुराक्रमण किया है, वैसा अन्य साहित्यपर नहीं । पौराणिक साहित्यको उसका पूर्वापर छिपाकर इस प्रकार साधारण - जनदृष्टिमें घृणास्पद कर दिया है कि जैसे उसका अक्षर 13 - अक्षर वेदविरुद्ध हो । उन्हींकी कृपासें पितृपरम्परासे जिसने वेदका एक अक्षर भी नहीं देखा; वेदाङ्ग व्याकरण आदिको भी कभी नहीं सूघा; संस्कृतभाषाका भी परिनिष्ठित ज्ञान प्राप्त नहीं किया; ऐसा भी व्यक्ति पुराण-साहित्य में साधारणबुद्धिसे अतीत वृत्तान्तको पढ़कर, विना ही उसपर विशेष, विचार किये, और बिना ही उसपर अनुसन्धान-वृत्ति स्वीकार किये, केवल अपने लोगों की पोथियां पढ़कर CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ ६६५ वाणीमात्रसे उसे ' गप्प ' कह देनेकेलिए तैयार हो जाता है, यह कलिकी महिमा है । उन विषयों में ' पहाड़ोंके पंख ' विषय भी अन्तर्भू त होता है, हम उसे यहां वेदशास्त्रीय कसौटीसे परीक्षित करने के लिए ' आलोक ' पाठकोंको प्रेरित करते हैं । ( १ ) वेदमें लिखा है- ' त्वं तम् इन्द्र! पर्वतं महामुरु ' वज्रेण वज्रिन्! पर्वेशश्चकतििथ ' ( अथर्व २० १५५६, ऋ. ११५७७६ ) इसका अर्थ इतना स्पष्ट है कि इससे पुराण- पक्षकी स्पष्टता हो जाती है । कि- हे वञ्चधारी इन्द्र! तूने वड़े वेगवाले पहाड़को वज्र द्वारा उसके पंखों समेत काट डाला । श्रीसायणाचार्यने आधिभौतिक आधिदैविक, ऐतिहासिक आदि अर्थ भी समय - समय पर करते हुए ' पर्वत ' का ' वृत्रासुर ' वा मेघ तथा पहाड़ अर्थ भी दिखलाया है । यहां पर पहाड़ अर्थ करते हुए उसने लिखा है- ' हे इन्द्र! वज्रिन् - वज्रवन्! त्वं तं प्रसिद्धं महाम् - महान्तं महत्त्वोपेतम्, उरुम् - अतिविस्तीर्णं पर्वतं - पर्ववन्तं गिरिम् । जातौ एकवचनम्, गिरीन् । वज्रेण श्रायुधेन पर्वशः श्रवयवशः पचादिक्रमेण चकर्तिथ ' - शकलीकृतवान् असि ' ( अथर्व ) । तब यहां पुराणवर्णित पर्वतोंका पक्षच्छेदन वेदानुकूल सिद्ध हुआ । इसीको पुराणोंने ANANTA 1 स्पष्ट करके लिखा है । इन्द्र एक स्वर्गका स्वामी देवविशेष एवं देवताओंका राजा वेद - पुराणोंमें प्रसिद्ध है । ' प्राच्या दिश: त्वम् इन्द्र! असि राजा ' ( अ. ६६८३ ) यहां. वेद में भी पुराणकी तरह इन्द्रको पूर्वदिशाका स्वामी कहा है । इसलिए अपने आपको वैदिक माननेवाले स्वा.दु.जीने भी Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ' सानुगाय इन्द्राय नम: ' इस मन्त्रको पढ़कर इन्द्रदेवताको बलि पूर्व दिशामें रखाई है । ( वैश्वदेवबलिप्र. २१२ पृष्ठ ) । ' आयातु इन्द्रः स्वर्पतिः ' ( अ. २०६४/१ ) वेदने यहांपर इन्द्रको स्वर्गका पति कहा है । ' पतिर्दिवः ' ( सामवेद - ऐन्द्रपर्व. ४ । ५ । ३ ) यहां पर भी वही बोत हैं, दिव्, स्व: यह दोनों स्वर्गके पर्यायवाचक हैं । ' पुरन्दरो मघवान् वज्रबाहुः ' ( कृ.य. तैत्ति.ब्रा. २२६६३ ) यहांपर इन्द्रके नाम मघवान्, पुरन्दरः ' आदि कहकर वह अपने हाथ में वज्रं नामक आयुध रखा करता है - र कहा गया है । पूर्वमन्त्र भी इसी कारण इन्द्रका विशेषण ' वज्रिन् ' आया है । इसलिए पुरन्दरे ( इन्द्र ) को यजुर्वेदमाध्यस में ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( २८ | ३ ) ' हस्त ' कहा गया है । ' ' इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः ' ( ऋसं. २।४१।१५ ) यहांपर इन्द्रको देवताओंका बड़ा ( राजा ) कहा गया है । इत्यादि बहुतसे मन्त्र इस विषय में दिखलाये जा सकते हैं । तब जो वादी लोग समान प्रकरण में आये ' इन्द्र ' का कहीं राजा वा कहीं परमात्मा अर्थ करते हैं, वह केवल इसलिए कि कहीं पुराणका- अर्थ ' सिद्ध न हो जावे । सो इन्द्र साधारण राजा नहीं; किन्तु देवताओंका राजा है । जैसेकि कहा है- ' इन्द्रो राजा इत्याह, तस्य देवा विशः ( प्रजाः ) ' ( यजु. माध्यं शतपथ, १३ । ४ । ३ । १४ ) । ' वज्र'का अर्थ ' हथियारोंके झुण्ड ' करना भी गलत है, यहां ' व्रज ' नहीं है कि - संमूह अर्थ किया जाय; यहां ' वज्र ' है । ' वज्रं वाहौ यस्य सः ' यह ' वज्रबाहु ' का विग्रह है, ' प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ ' ( २।२ / ३७ ) इस वार्तिकसे ' वज्र ' प्रहरणार्थवाला CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोके पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ ६६७ ६६८ होनेसे सप्तम्यन्त ' बाहु ' का परनिपात हुआ । इसीकी स्पष्टता वेद कहीं ‘ वज्रहस्त: ’ से कर देता है । ( अ. २०/२४/१४ ) सो ऐसा ' छि परमैश्वर्ये ' से स्वर्गका बड़ा ऐश्वर्य रखनेवाला देवराज सिद्ध हुआ; उसीके द्वारा पर्वतोंके पंख काटनेका संकेत इन्द्र ही इसे न मिलता भला है । स्रो वेद - पुराणका इन्द्र एक ही है, वादी अपने पतके फटके है. त डरसे अर्थ बदलते हैं । ( २ ) अब अन्य मन्त्र देखिये –‘यः पर्वतान् प्रकुपितान् कहा अरम्णात् ( अथर्व.२० | ३४ | २ ) ' य: -इन्द्रः, प्रकुपितान्- प्रकोपं प्राप्तान् गिरय परस्परं युद्धाय इतस्ततश्चलतः पर्वतान् गिरीन् पक्षयुक्तान्, श्रृरम्णात् - पक्षच्छेदेन नियमितवान् । यथा उत्सुत्य - उत्सुत्य प्रादु प्राणिपीडां न कुर्वन्ति, तथा स्वस्थाने स्थापितवान् ' यह सायाणा- अ देख चार्यकी व्याख्या है । इससे पर्वतोंका पक्षच्छेद बतानेवाले हिरं पुराणोंकी वेदानुकूलता सिद्ध हो रही है । ' पर्वत ' का अर्थ ' मेघ ' भी करो; पर ' पहाड़ ' अर्थ भी है । यदि न होता; तो वादी लोग शत्र यदी गत मन्त्रमें ‘ पर्वत ' का ‘ पहाड़ ' अर्थ न करते । इम इस विषयमें तं ( आगे कहेंगे । पुराणोंकी बात काटने के लिए वेदमें पुराणसदृश उन वर्णनका वे जान - बूझकर अर्थ बदलते हैं । कुर ( ३ ) अन्य मन्त्र देखिये- ' शुष्मात् चिद् अस्य पर्वता भयन्ते ' कह ( अ. २० | ३४ | १४ ) अस्य - इन्द्रस्य शुष्मा - बलात् पर्वताश्चित् - पर्वता अपि भयन्ते - पक्षच्छेदाद् बिभ्यति ' यह यहां सायणका भाष्य है । वेद एवं पुराणका इन्द्र कोई भिन्न - भिन्न नहीं है । पुराणने भी का इन्द्रको वेदसे ही लिया है, पर वादी लोग पुराणद्व ेषके कारण कि Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६७ १६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) वेद कहीं कुछ अर्थ करते हैं; कहीं अन्य कुछ । यही उनकी असङ्गति इदि सिद्ध कर रही है कि वेद और पुराणकी एकवाक्यता है; पर वे ही इसे न सह सकने के कारण उसका अर्थ बदलते हैं । बादलोंको लता भला किसका डर है; पर्वतोंको तो पंख कट जानेका भय स्पष्ट निके है, तभी तो मैनाक - पर्वतका इस डरके मारे समुद्रमें छिप जाना कहा हैं । बादलोंका तो डरके मारे कहीं छिप जाना नहीं कहा । बान् ( ४ ) अन्य मन्त्रमें भी इसका संकेत देखिये- ' अस्येदु भिया बानू गिरयश्चं दृह्नाः ' ( अ. २०१३५/१४ ) ' अस्यैव- इन्द्रस्य जनुषः - जन्मतः नू, प्रादुर्भावत एव भिया - पक्षच्छेदभयेन गिरयंश्च पर्वता अपि दृढाः-त्य श्रप्रच्याविता अभूवन् ' यह यहीं ' सायणभाष्य है । अन्य मन्त्र चा- देखिये- ' यत् पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्नथिता ले हिरण्ययः ' ( अ. २०।१५।२ ) इसका अर्थ यह है- ' इन्द्रस्य अथिता-शत्रूणां हिंसनशीलः वज्रः, पर्वत - पर्ववति शिलोच्चये वृत्रे वा यदु-यदी ' न समशीत - संसुप्तो नाऽभवत् । किन्तु जागरितः सन्नवधीत् ' में ( तं व्यदारयत् ) इस प्रकार पुराण में वर्णित पर्वतोंके पंख तथा श उनका काना वेदद्वारा सिद्ध हो गया; जो कि इसमें ' पुराणोंने कुरान से अनूदित करके यह लिखा ' - ऐसा कई दयानन्दी पथिक ते ' कहते हैं, इसमें पुराण - द्व ेष ही कारण है, अथवा बेदका अज्ञान । at 1. ( ५ ) । पर्वतोंके पंख होने से सृष्टिकी आदिमें वे उडते थे, अतः पृथिवीं को हानि होती थी, भूकम्प हो जाते थे; पृथिवीके उलटने-का डर रहता था; ‘ इन्द्रने उनके पंखोंको काटकर पृथ्वीको स्थिर ॥ किया । यह वेद स्वयं कहता है- ' य: पृथ्वीं व्यथमानाम् ( इतस्तत: CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक चलन्तीम् ) अह हत् ( पर्वतादिभिर्ह ढीकृतवान ) ( ऋ. २/१२/२ ) । इसलिए इस पहाड़को गोत्र ( गां पृथिवीं त्रायते ) महीधर, कुध, आदि कहा करते हैं कि - पृथ्वीको स्थिर रखते हैं । जैसे ऊँटके दोनों ओर भूसा लदा हो, दोनोंके तोलमें कुछ अन्तर पड़े, तो बैलेन्स ठीक करनेकेलिए कुछ पत्थर साथ जड देते हैं; वैसे ही सृष्टिकी आदिमें इसी कारण पर्वतों के पंख काटकर उनसे पृथ्वीको स्थिर किया गया । तव जो कि नी.श्री.वि. में वादीने ' लोहं कीलं यथा काष्ठे तथा ते गिरयः कृताः । महीघरा महाराज! प्रोच्यन्ते जनै: ' इस दे. भा. के पद्यपर आक्षेप किया था; वह कट गया । इसी प्रकार बाणभट्टने भूभार इव अचल-फुलस्थितिः स्थिरः चतुरुदधिगम्भीरः अर्थपतिः ' ( हर्षचरित १ उ. ) में यही बात श्लेषसे बताई है कि- पृथ्वी पर्वतोंसे स्थिर है । इसे मुसलमानी मत बताना गलत है । बाणभट्टके समय मुसलमान कहाँ थे? मुसलमानोंने यह हमारे साहित्यसे सीखा । वादी लोग इसपर कुछ बोल तो सकते नहीं; केवल यही कहते हैं कि-जयदेव शर्मा, क्षेम करणंदास ' इन्द्र ' का अर्थ राजा वा परमात्मा करते हैं ' करते रहें; वे प्राचीन वातको जो वेदमें निकलती है-तोड़ - मरोड़ कर रखते हैं - यही तो उनका ' वैदिकधर्म ' है । जो कि वे कहते हैं कि - ' आज तक किसी वैज्ञानिकनें इस वातका ANANT 1 an र्समर्थन नहीं किया कि सृष्टिकी आदिमें पहाड़ उडते थे, इन्द्र द्वारा उनके पंख काटे गये ' तो वैज्ञानिक तो वेचारे अभी सीख रहे हैं, धीरे - धीरे इस मतपर आ ही जाएँगे; आप लोग भी Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) दात् पूर्वम् अन्तरिक्षे व्रजति स्म ' ( १ | १० | ११ ) ' पक्षच्छेदात् पूर्वं पर्वतश्च ' ( १।१०।१५ ) तेषामिन्द्रः पक्षान् श्रच्छिनत् ' ( १।१०।१ ) । इससे भी हमारे पक्ष की निघण्टु - निरुक्तानुकूलता भी सिद्ध हो गई । वाल्मीकिरामायणमें भी इसकी साक्षी सुनिये - ' पूर्वं कृतयुगे तात! पर्वताः पक्षिणो [ पक्षवन्तो ] ऽभवन् ' ( सुन्दर. १।११५ ) ततः क्रुद्धः सहस्राक्षः ( इन्द्रः ) पर्वतानां शतक्रतुः । पक्षान् चिच्छेद वज्रेण ( सु. १।११७ ) पक्षवन्तः पुरा तत्र बभूवुः पर्वतोत्तमाः ' ( ५ । ५८ । १४-१६ ) । तब पर्वतोंके पंख और उनके काटनेका केवल पौराणिक कहना वादियोंके पक्षकी निर्मूलता बता रहा है । सिद्धान्तशिरोमणि जिसे स्वा. द. जीने स. प्र. में प्रमाणित किया है— के गोलाध्यायमें ' स्याद् इन्द्र - वज्राऽऽहतपक्षतुल्यः ' ( ४४ ) यह कह कर इन्द्र के वज्र द्वारा: पर्वतोंके पंखों का काटना दिखलाया है । यहांपर श्री भास्क-राचार्यने ' इन्द्रवज्राहतपक्ष ' शब्दको पर्वतके पर्यायवाचकमें दिखलाया है । यहांपर बहुव्रीहि समास है - ' इन्द्रस्य वज्र आइताः पक्षा यस्य सः, पर्वत इत्यर्थः । इससे भी हमारे पक्षकी पुष्ट | ( ग ) वादी लोग जब इस प्रकार अपने मतका खण्डन देखते हैं; तब ' पर्वत ' शब्द का अर्थ बदलाने की चेष्टा करते हैं । उसमें कारण यह है कि पहले उन्होंने वेदके विना देखे ही पुराण में लिखे पर्वतोंके पंख काटनेमें असम्भव दिखलाया । जब सनातन-धर्मी वही बात वेदसे दिखलाते हैं, तब ' खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे ' के अनुसार वेदोंके पदोंमें तोड़ - मरोड़ करते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ ९ ७३ ६७४ पर्वत यदि वेद में ' पर्वत शब्दका अर्थ पहाड़ नहीं है; तो पहाड़ - वाचक निघ शब्द वेदमें कौन सा है? फिर क्यों श्री क्षेमकरणदास तथा श्रीजयदेवविद्यालङ्कार इन आर्यसमाजियोंने अथर्व २० १५५६ में माने ' पर्वत ' का अर्थ पहाड़ किया? निघण ( घ ) जो कि स्वा. द. जी अपने ' वैदिक निघण्टु कोष ' में ' पर्वत ' रख का अर्थं पुराणियों द्वारा ' पहाड़ ' और वैदिकों द्वारा ' मेघ ' अर्थ निघण बताते हैं; तथा उनके अनुयायी निघण्टु ( १/१० ) के ' अद्रि:, ग्रावा, गोत्रः, गिरिः, उपरः, उपलः ' आदि मेघके नाम मानते हैं, पहाड़के नहीं; इसपर वे आ ' उपर उपल इत्येताभ्यां साधारणानि पर्वत - नामभि: ' ( निरुक्त, २ २१ ४ ) इस श्रीयास्कके वचनको याद इस वि रखें । इसका यह तात्पर्य है कि- ' अद्रि ' दिसे शुरू करके उपर उपल ' शब्दसे पूर्व जो पर्वत, गिरि आदि नाम हैं; वे पर्वतों के नामके तुल्य हैं, अर्थात् - यह नाम पहाड़ के भी हैं, बादलके भी । केवल ये मेघके नाम नहीं हैं; इसकी प्रकरणानुसार क्रिया विशेषता जान लेनी चाहिये । उपर उपल से आगेके नाम तो भू केवल मेघके हैं, पहाड़के नहीं - यह श्रीयास्कका आशय है । यही श्र दुर्गाचायँने भी लिखा है । गमीक फलतः निरुक्त - निघण्टु आदि के अनुसार वेदमें ' पर्वत ' आदि वत का ' पहाड़ ' अर्थ होनेसे भी, पर्वतों के पंखोंके काटने के विषयमें केवल पुराण तथा इतिहास तथा कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहिता काठकादि संहिताओंकी साक्षीसे और प्राचीन अन्य ग्रन्थों तथा रणव देवराज सायणादिके भाष्योंकी साक्षीसे वेद में इस विषय में Gujarat. An eGangotri Initiative

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६७४ ] श्री सनातनधर्मालांक ( 8 ) ' पर्वत ' का ' पहाड़ ' ही अर्थ है, मेघ नहीं । यदि निरुक्तकार निघण्टु ' ' के कहे ' अद्रि, गिरि ' आादियों की पहाड़ -द्वारा और मेघ अर्थ की व्यवस्थापना वादी लोग अपना पक्ष कट जाने के डर से न मानें; इस विषय में वे निघण्टुको ही परम प्रमाण निघण्टुने ' यह बादल के नाम हैं ' यह लिखा है, उन्हें मानें यह कि-याद राहत लेना चाहिये कि - निघण्टु वेदके अधीन होता है, वेदु विघण्टुके अधीन नहीं होता ।, निघण्टु ( वैदिक कोष ) में उन - उन हदोंके जो अर्थ दिखलाए हैं; वे उपलक्षणमात्र ही हैं । ‘ निघण्टु से निर्दिष्ट अर्थसे भिन्न उन - उन शब्दोंके अर्थ वेद में नहीं होते-बहु यदि वादी मानें, तो अपने पक्षको भी उन्हें काटना पड़ेगा । इस विषय में हम पुष्पमें ' वेदार्थ - विधान के साधन ' देखिये । · ( ङ ) त्तव वेद निघण्टुके अनुसार नहीं चल सकता- यह सिद्ध हो गया । इसीलिए स्वा. द. जीने भी अपने यजुः- संहिता के भाष्य ( १७८६ ) में ‘ विश: ’ का निघण्टुसे न कहा हुआ भी ' प्रजाजन ' अर्थ या ही है । तब जो कि स्वामीने अपने ' निघण्टु वैदिक कोष ' | भूमिकारों ‘ पर्वत ' शब्दका ‘ पहाड़ ' अर्थ करनेमें निघण्टुमात्र-आधारसे जो कि पौराणिकोंको अविक्षिप्त किया है; इससे गम्रीका अपने द्वारा भी खण्डून हो गया । स्वामीने उसमें कारण इबताया है कि- ' यह सब पद वेदमें यौगिक और योगरूढ़ि आते केवल रूढ़ि नहीं । पर इससे हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता; चूंकि हम भी वेदमें केवल रूढ़ि शब्दोंको नहीं मानते, किन्तु प्रणवश उसमें योगरूढ़ि, यौगिक और रूढ़ि एवं यौगिकरूढ़ि CC - 0. Ankur Joshi Collection arat. An पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ II % इन सब प्रकारके शब्दोंको मानते हैं इस विषय में ' आलोक ' के अष्टमपुष्प ( पृ. १४२-१६६ ) में देखना चाहिये । तब पर्व ( पंख ) वाले होनेसे ' पर्वत ' यह नाम यौगिक वा योगरूढ़ हो गया; और जहाँपर पहाड़ोंके पंखोंका वर्णन न होनेपर भी ' पर्वत ' ( यजुः १७/१ ) का अर्थ ' पहाड़ ' है, वहां ' पर्वत ' शब्द रूढ़ि भी मान लिया जाता है । इस प्रकार स्वा. द. जीके मतके अनुसार भी हमारा पक्ष सिद्ध हो गया कि - ' पर्वत ' शब्द वेद में केवल रूढ़ि नहीं; किन्तु रूढ़ि भी है, और यौगिक एवं योगरुद्धि भी है । उसमें रूढ़िसे तो वर्तमान पहाड़ों ( जो पंखोंसे हीन हैं ) का वाचक है, योगरूढ़िसे सृष्टिकी आदिके पंखों वाले पहाड़ोंका नाम है, और यौगिक होनेपर बादलोंका नाम है । परन्तु स्वा. द. जो तो पंख श्रादिके वर्णन वाले स्थलमें भी ' पर्वत ' का पंखद्दीन ( मेघ ) अर्थ करके, पंख आदि के वर्णनसे हीन स्थलमें ' पर्वत'का पहाड़ अर्थ करके स्वयं ही उसे केवल रूढ़ि बना रहे हैं, तो ' उष्ट्रलगुड ' न्यायसे उन्हींकी युक्तिसे उन्हींका खण्डन हो रहा है । क्या यह ' परोप-देशे पाण्डित्यम् ' नहीं कि - सनातनधर्मी वेदमें ' पर्वत'का अर्थ ‘ पहाड़ ' करके उनके पंखोंका काटना बतावें; और आप उनके अर्थको ' निघण्टु ' से विरुद्धताका फतवा दें, और स्वयं ' त्रघ्न'का निघण्टु प्रोक्त ' अश्व ' अथ न करके ' परमात्मा ' अर्थ करें । तत्र यदि उक्त वेद मन्त्रोंमें ‘ पर्वत'का निघण्टुसे न कहा भी ' पद्दाड़ ’ ANANTA 1 अर्थं प्राचीन कृष्णयजुर्वेद एवं अन्य शास्त्रोंके अनुसार कर दिया जाता है; तब उसे माननेमें नकार क्यों? eGangotri Initiative

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९ ७६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ( च ) फिर भी हमने स्वा. द. जीकी भांति निघण्टुकी सर्वथा भी उपेक्षा नहीं कर डाली, बल्कि - ' आ उपर उपल इत्येताभ्यां साधारणानि पर्वतनामभि: ' ( निरु. २।२१।४ ) इस प्रकार श्रीयास्क की व्यवस्थासे तथा देवराज़यन्वा आदिके भाष्योंकी साक्षी से निघण्टुकी ' पर्वत ' अर्थ में साक्षी दिखला ही दी है । उक्त वेद-मन्त्रोंमें वैसा अर्थ करनेमें प्रकरण भी अनुग्राहक है; कृष्ण-यजुर्वेदकी भी उसमें अनुकूलता है ही । उपाङ्गोंकी भी उसमें साक्षी है ही । अन्य भी बहुत - सी साक्षियां दिखलाई ही जा सकती हैं । यदि वेदमें ‘ पर्वत ' शब्दका अर्थ ' पहाड़ ' नहीं है; ऐसा वादियोंका विचार हो, तो हमसे आदिमें दिये आदिम ( अ. २०।१५।६ ) मन्त्रमें आर्यसमाजी दो विद्वानोंने ' पहाड़ ' अर्थ कैसे कर दिया? और स्वा. द. जीने भी अपने यजुर्भाष्य में ' गिरयश्च मे पर्वताश्च मे ' ( १८१३ ) इस मन्त्रमें ' पवंत ' शब्दका ' बड़े - छोटे पर्वत ' अर्थ कैसे कर दिया? इस प्रकार ' पर्वते शिश्रियाणम् ' ( यजुःमाध्यं. १७/१ ) मन्त्रके भाष्य में स्वा.द.जीने ' पर्वत ' का ' पहाड़ के समान आकार वाले ' यह अर्थं कैसे कर दिया? यहाँ उनने निघण्टुकी शरण क्यों नहीं ली -? ( छ ) इस प्रकार उनके अनुयायिओं में श्रीपाददामोदर सातवलेकरजीने ‘ यत्ते पर्वतान् ' ( ऋ. १०/५८६ ) इस मन्त्रमें तथा ' गिरयश्च पर्वता: ' ( अ. १२/१/११ ) इस मन्त्र में स्थित ' पर्वत ' शब्दका आयँप्रतिनिधि सभासे ऋषितर्पण ( मृतक स्वा.द.के तर्पणार्थं दयानन्द - शताब्दी ) के अवसर पर प्रकाशित कराये CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक | १७७ ' वेदामृत ' ( प्र.सं. ) में ' पहाड़ ' अर्थ कैसे कर दिया? वहीं उनके शब्दों में ' महत्त्वपूर्ण ' संस्कारप्रकरण में ' पर्वतान् गिरीन ' ६/१७/३ ) इस मन्त्रमें ' पर्वत ' शब्दका ' पहाड़ोंको ' और ( अ. का ' पहाड़ियोंको ' यह अर्थ आयँसमाजके ' गिरीन् ' मान्य स्वा. स्वतन्त्रा-नन्दजीने कैसे कर दिया? तब यह नहीं कहा जा सकता कि-र वेदमें ' पर्वैत ' का अर्थ ' पहाड़ ' है ही नहीं । ( ज ) यदि पर्वतोंके पंखोंमें अनुपपन्नता दीखनेसे वहां ' मेघ ' अर्थ किया जाता है; तब बादलोंके पंख ही कहांसे आये? हमारे पक्षपोषक तो कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणीसंहिता तथा काठक-आदि संहिताएँ भी हैं । ‘ पर्वत ’ ' शब्द यौगिकरीतिसे भी पहाड़-का नाम है — ‘ पवेवान् - पर्वतो भवतीति ' ( निरु. ११२० | ५ ) । ‘ गिरीन् अज्ञान् रेजमानान् अधारयत् ' ( ऋ. १०/४४ ( ८ ) अश्रान्-गमनशीलान् पर्वतान् अधारयत् - पक्षच्छेदेन निश्चलीकृतवान् युद्दां पर भी चलनशील पर्वतोंके पंख काटने से उनका स्थिर कर देना वेदने बताया है । बादलोंके पंख नहीं होते कि उन्हें काटकर उन्हें स्थिर कर दिया जाय यदि बेदखेँ क ' पर्वत ' का अर्थ पछाड़ नहीं है; तब ' ' य यथेग्नं पृथिवी मद्दी दाधार पर्वतान् गिरीन ' ( अ. ६ | १७ | ३ ) ‘ पर्वत इव अविचाचलत ' ( अ. ६।६७२ ) ' गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरग्र्यं ते " पृथिवि! ' ( अ. १२ | १.११ ) इत्यादि तथा अन्य मन्त्रोंमें प्रतिपक्षी लोग ' पर्वत ' का अन्य क्या अर्थे करेंगे? क्या यहां वे निघण्टुकी शुरण - लेंगे? जिस मन्त्रमें स.ध.के मन्तव्यकी सिद्धि हो; वहां स ० ध ० ६२ Gujarat. An eGangotri Initiative

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७ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) तो वे ' पर्वत'का अर्थ बदल दें; जहां स.ध के सिद्धान्तसे तटस्थता हो, वहाँ वे ‘ पर्वत का ' पहाड़े अर्थं कर दें - यह कहांका न्याय हैं? .... ( झ ) वेदमें ' पर्वत ' का अर्थ ' बादल ' सर्वथा ही नहीं होता; यह हम भी नहीं कहते । निर्घण्टु - निरुक्तको व्यवस्थानुसार जब ' पर्वत ' शब्दके बादल और पहाड़ यह दो अर्थ हैं, तब प्रकरणा-नुसार दोनों ' अर्थ ही ले सकते हैं, पर जहाँ पर्वतों के पंखों तथा उनके कॉटनेकी ' स्पष्टता हो, तब वहां ' पर्वत ' ' का ' ' पहाई ' अथ ही है — यह ’ । हैं ॥ ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुप बृहयेत् । विभत्यल्पश्रुताद वेदो मामयं प्रहरेदिति ' ( महाभारत ११११६४ ) V - DIA -का ( ७ ) ' पर्वत इवार्डविचाचलत् " यह मन्त्र हमारे पक्षक विघातक हैं ' यह भी नहीं समझ लेना चाहिये । भूतभवद् भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ( मनु. १२६७ ) वेदमें " भूत-भविष्यत् दोनों कार्ल सम्भव होनसे इस मन्त्र में ' पर्वत ' के पंखोंके काटनेके बादकी द्वितीयावस्था सूचित की गई हैं; और पहली ' अवस्था ' पूर्व कहे मन्त्रोंमें हम दिखला भी चुके हैं । इस प्रकार वैदमै पर्वतोंके पंख और उनका काट दिया जाना ' यह दोनों ही अवस्थाएँ दिखलाई गई हैं यह हमारा अभिप्राय है, " इससे पुराणोक्त पद्दे सिद्धान्त ' वेदानुकूल सिद्ध हुआ । बल्कि पर्वतको ' अविचाली वर्तनिवाला मन्त्र वादियोंके पक्षको ही काटनेवाली सिद्ध होगा; क्योंकि ' पक्त ' शब्दका ' मेघ ' अर्थ करनेवाले मेघक Refer CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतों पंख तथा उनका विदारण वैदिक [ ९ ७६ निश्चल कैसे सिद्ध कर सकेंगे? क्या यहां करते हुए उन्हें निघुष्ट ' पर्वत'का ' पहाड़ ' अयूँ - भूल जाता है? 1. ८. ( 5 ) यदि बेदमें ‘ पर्वृतः यह ' पहाड़ ' का नहीं; तब केनाभि केवल मेघृका नाम होता; इस प्रकार पर्वत ( पहाड़ महा पर्वतान ', ( अ. १०/२/१८ ) पर्जन्यमन्वेति ) का प्रश्न होनेपर फिर साथ, ही ' केन ’ ( अ. १० | २ | १६ ) यह बादल विषयक कर दिया जाता. १. वहां तो वादियोंके प्रश्न क्यों मेघ हो ही जाता । इससे सिद्ध अनुसार ' पर्वत ' का अर्थ ‘ पहाड़ है कि वेद में ' पर्वत ' शब्दसे प्रायः ' अर्थ लिया जाता है, कहीं मेत्रका भी वृत्रासुरका भी । जैसे कि उणाद्विकोषमें, और कहीं ‘ प्रर्वतः - गिरिः ’ ( ३ | ११० ), सो स्वाद जीने, लिखा है-संहिता पुराण- इतिहास तथा अन्य वेद , आदिके वचनोंकी साक्षी में इन्द्रसे किये हुए पंख काटने प्रसङ्ग या जावे तो बां, ' पर्वत ' का ' पहाड़ ' अर्थ ही होता का ( ६ ) शेष बुद्दी, पर्वतोंके उडनेपर असम्भवदृष्टि है । मण्डूकोंकी, इसमें तो कूप-दृष्टिका ही अपराध है । अघटित घटनाघटनपटीयसी भगवान की लीला से सृष्टिकी आदिमें यह असम्भव नहीं जिसकी लीलासे, बड़े भार वाले प्रह - नक्षत्र आदि भी, तथा सूर्य- । चन्द्रमा आदि भी. बहे वेगसे आकाशसें उड़ रहे हैं; वर्तमान पाश्चात्य वैज्ञानिकों तथा उनके अनुयायी पौरस्त्यों तथा ANANTA 1 in आर्यसमाजियोंकी दृष्टिमें जहां बहुत भार वाली पृथिवी भी बड़े वेगसे आकाशमें लड़ रही है; कभी पूर्वदिशामें जाती है; कभी वहांसे लौट लाती है; कभी सूर्यके नीचे आ जाती है, Gujarat. An eGangotri Initiative

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१८० | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) कभी सूर्यके ऊपर आकर रात्रि कर दिया करती है, इस प्रकार बड़े - बड़े उडनकिले ( अमेरिकन बड़े - बड़े हवाई जहाज ) भी कई सौ पुरुषोंको उठाकर आकाशकी छाती चीरते हुए श्राकाशमें उड रहे हैं । किसी मकानपर यदि गिरते हैं; तो उसे गिरा देते हैं, अमेरिकाके कई मंजिल ऊँचे मकानसे हवाई जहाज की टक्कर होगई; तो उसकी ऊपरकी दो - तीन मनज़िलें भी गिर पड़ी थी । पुष्पक विमानमें तो सारी वानर सेना को ही चढ़ाकर उसे इच्छानुसार उडा दिया जाता था, आजकल तो गत युद्ध में जर्मनीके वायुयान बिना ही ड्राइवरके जमेनीसे उडकर लण्डन पेर बम गिराकर फिर स्वयं जर्मनी लौट जाते थे; जहां आजकल · मारवाड़में बड़े - बड़े रेतीले पहाड़ वायुके वेगसे उखड़कर उडते हुए जिन ग्रामों पर जा पढ़ते हैं, वे गांव मिट्टी में दब जाते हैं; फिर उनकी सत्ता भी नहीं दीखती; वहां पुराणकालमें सृष्टिकी आदिके समय पंखयुक्त पहाड़ उडकर जहां जाते हों; वह बड़ी हानि कर देते हों; जिनका उल्लेख सृष्टिके आदिसे ही जारी पुराणोंमें स्पष्ट किया गया; और वेदसंहिताओं में जिसका सङ्केत कर दिया गया; उसे वहां छिपा देना और अर्थ बदलनेकी चेष्टा करना यह प्रतिपक्षियोंकी या तो बुद्धिमन्दता बता रहा है, अथवा पक्षपातयुक्तता वा आग्रहग्रहिलता बता रहा है । ( ख ) तथापि यह जानना चाहिये कि जितनी मट्टी आजकल पहाड़ों में दीखती है, उतनी पहले उनपर नहीं रही होगी । यह मट्टी तो उनके पंख कटनेपर और उनके पृथिवी पर गिर जाने पर CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनको विदारण वैदिक [ ९ ६६: कालक्रम से उनपर बढ़ी; और वह पत्थररूपमें होकर क्योंकि पत्थर भी पृथिवीका योग बढ़ती गई; " समा पाकर बढ़ते रहते हैं । जैसे उनक म्युनिसिपलिटीकी सड़कें पहले ' काफी नीची " होती थीं, फि संकेत उनपर ' मट्टी बढ़ते - बढ़ते ' वे काफी ऊंची हो जाती है, गढ़े मसा क्रम जाते हैं, t हमारे मकानोंके दरवाजे भी फिर उनसे नीचे है । " मान जाते हैं, वैसे यहाँपर भी जान लेना चाहिये । ( ग ) जैसे प्राचीन मुनि च्यवन तथा मारीच आदि तपस्या करते हुए‘एकस्थानमें स्थित होनेसे " ' वल्मीकाग्रनिमग्नमूर्ति' हो गये; और ' रामायणके कर्ताका नाम ही वाल्मीकि बन गया, इस प्रकार मट्टी पड़ते - पड़ते कुँएँ भी दब जाया करते हैं, भूमिका तब बराबर हो जाते हैं; ' पुत्र खोचः पुलिर्नमधुना तंत्र सरितीय ' ( २।२७ ) । ( जहां परूपहलै नदिया मेरने थे; " वहाँ अब स्वालटोल ह हैं ) -इन उत्तररामचरित के शब्दों में ' पृथिवीमें इतने परिवर्तन _ " एक हो जाते हैं; इस प्रकार सृष्टि के आरम्भस ही उत्तरोत्तर बढ़त ध्य बढ़ते।पहाड़ाअब ' इस ' विशालरूप में और बहुते मारा रूप में हो R गये; इनका उडना असम्भव समभाकर पहले के छोटे आकारवाल पहाड़ों के उड़ने के उल्लेख में असम्भव समभाना यह प्रतिपक्षियोंकी अदूरदर्शिता बता रहा है । पहले पहाड़ों की इतनी विशालता F नहीं रही, इस कारण उसमें असम्भव दृष्टि डालने वाला का MFR अल्पज्ञानंवत्ता ही इसमें अपराधिनी है, इसमें पुराणों का SPITF कुछ भी नहीं ( १० ) कई लोग आक्षेप करते हैं कि पदार्थोंकि धर्म सदा Gujarat. An eGangotri Initiative

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ६८२ ही रहा करते हैं; यदि वे पहाड़ पहले उडते थे; तब समान " उनका उडना अब क्यों नहीं होता?. इसपर यद्यपि हम पहले कुछ संकेत दे चुके हैं; फिर भी पृथक् भी कुछ लिख देते हैं । काल-क्रमसे वस्तुओंके धर्मोंमें परिवर्तन भी होते रहते हैं । वैज्ञानिक मानते हैं कि सृष्टिकी आदिमें पृथ्वी बड़ी गर्म थी, उसमें जीवोंकी स्थिति नहीं हो सकती थी । कालक्रमसे वह ठंडी हुई; जिससे उसमें सृष्टि हुई; और वह जीवोंकी आवासभूमि बन गई । इस प्रकार वैज्ञानिक मानते हैं कि कई ग्रह अभी भी गर्मे हैं । कालक्रमसे कई सहस्राब्दियों के बाद वे भी ठण्डे हो जाएँगे; तब वे भी प्राणियों के निवासयोग्य हो जाएँगे । . ( ख ) पहले सृष्टिकी आदिमें पुरुषोंकी कितनी बड़ी - बड़ी हजारों वर्षकी अवस्था थी; अब कितनी छोटी रह गई. यह भी एक युगृधर्मवशु परिवर्तन है । चरकसंहिता ( विमानस्थान तृतीया-ध्याय ) में स्वीकार किया गया है कि- सत्ययुग की आदिमें पृथिवी आदि सब गुणोंसे मिले हुए थे ( ३।२५ ) पर वह अवस्था अब्र-रही । पहले योगी, तारदादि आकाशमें उडा करते थे; नहीं नहीं उडतेः । आगे वैज्ञानिकोंकी कृपासे: -आजकल लोग आकाशसें भी पंख लगाये जाएँगे; C और वे आकाशमें उड़ेंगे । इस उन्हें है कि - वस्तुओं के धर्म युगक्रम से वा किसी महापुरुषकें प्रकार स्पष्ट वर - शापसे परिवर्तित भी होते रहते हैं । ( ११ ) ' जैमिनीय - ब्राह्मण ' ( २।१४ ) में कहा है- ' इमे श्रारण्याः.. मृगा एवमेते अग्र े एकशफाः पशव आसुः । इसका अर्थ पशव्रो CC - 0. Ankur Joshi Collection पर्वतोंके पंख तथा उनका विदारण वैदिक | II आर्यसमाजी रिसर्चस्कालर श्रीभगवद्दत्त जी ने ( भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( प्रथमभाग २७६ पृष्ठ ) में यह किया है - ' जैसे ये जंगलके पशु मृग आदि थे, इसी प्रकार पहले दिनोंमें पशु एक-शंफ थे । गो आदि पहले फटे खुर वाले न थे । घोड़ेके समान एकशफ थे । उसीकी टिप्पणी में लिखा है - ' पहले पृथिवी कृष्णा थी । ( मैत्रायणी सं. १ । ६ । ε ), ' पहले वीरुघ सूखते न थे ' ( मैत्रा. १ | ६ | ३ ), पहले पृथिवी शिथिल अर्थात् पिघली अवस्थामें थी; और उसमें पर्वत तैरते थे ' ' ( मैत्रा. १।१०।१३ ) ये अवस्थाएं प्रजा-पति ' ब्रह्माजी के कालकी हैं । ' दरिद्रा श्रासन् पशवः कृशाः सन्तो · व्यस्थकाः । सौमायनस्य दीक्षायां समसृज्यन्त मेदसा ' ( ताण्ड्य ब्रा. २४/१६/७ ) - पशु पहले कृश, छोटे और अस्थि - विना थे । सोम - पुत्र बुधकी दीक्षामें उनपर मांस श्राया । पहले पशु एक-रूप रोहित ही थे ' ( जै. ब्रा. ११११६० ) पश्चात् श्वेत, रोहित और कृष्ण हो गये । ( ख ) इससे पूर्वोक्त शङ्काका संमाधान स्वयं हो गया कि-सृष्टिकी आदि पर्वत उड़ते थे, अब उनकी. वह अवस्था क्यों नहीं? वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले मारवाड़में कभी समुद्र थे; पर केवल वालू है । जहाँ आजकल सख्त सर्दी है, वहां पहले संख्त गर्मी होती थी । इस प्रकार पदार्थोंमें कई परिवर्तन सर्मयानुसार हो जाया करते हैं । पहले सृष्टिकी आदिमें स्त्रियाँ रजस्वला नहीं हुआ करती थीं; विश्वरूपकी हत्याके बाद उनमें रजोधर्म शुरू हुआ । ( कृष्णयजुः तै. सं. २/५/१ ( ५ ) इस प्रकार TANANTA Bro in Gujarat. An eGangotri Initiative

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९ ६४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) पदार्थों के धर्म भी युग्रक्रमानुसार बदलते रहते हैं, सदा एकसे नहीं रहा करते । ( १२ ) पहले सरस्वती नदी होती शोरसे वर्णन है; पर अब वह लुप्त है । जिसका वर्णन वेदमें प्रचुर मात्रा में अबू उसका गन्ध भी नहीं । ( ख ) इस प्रकार प्रकृत - विषय में कि यह पहाड़ सृष्टिके आरम्भकालमें पंख काटे जानेपर वे अचल हो गये श्री; जिसका बेदमें जोर-पहले सोमवल्ली होती थी, मिलता है; पर इस युगमें भी समझ लेना चाहिये उड़ते थे, पीछे इन्द्र - द्वारा , पीछे इनका नाम ' नग, अग, अचल ' आदि हो गये इस प्रकार की अन्य शङ्कालका भी समाधान यहाँ सम्मलेना चाहिये । तब ' मार्तण्ड ' में इस विषयमें आक्षेप करता हुआ कि अकारात सिद्ध हुआ । vs shri टिपाठ [ पृ. १५८, पं ० १७, २२४-२१ अब ठंडे देशकी बालाओं की शीघ्रयौवन प्राप्ति भी देखें । दैनिक वीर - अर्जुन ( २६-१०-६५ ) ' ' ब्रिटिश त्रि बालिकाएं शोध यवता युवती त्याम क्यों बनती हैं? ( एडिनबरा २८ अक्टूबर ) एक ब्रिटिश ' महिला - डाक्टर के कथनानुसार ब्रिटेनके ' स्कूलोंकी छात्राएं श्रल्प आयु में ही किशोरीसे युवती इसलिए बन जाती हैं कि वे मांस खाती हैं । इससे उनके योनविकास शीघ्र होने कामोत्तेजक तत्व है जिनसे बालिका शीघ्र है । अब बालिकाओंोंकी पूर्ण युवति बतनेकी १ शों वर्ष तक जा पहुंची है । जब ठंडे देश गर्म देश ' भारत में तो बालिकामके १२ वे शान रही । 3. लगता है मांस में ऐसे विकसित -युवति, वन, जाती आयु १७ वर्षसे गिरकर यूरोपका यह हाल है, तब वर्ष में युवति होने में कोई CC - 0. Ankur Joshi Collection परिशिष्ट ६६ ( ४ ) पौराणिक घटनाएं समाचारपत्रों में । क [ पुराणोंमें आई अद्भुत घटनाओंको मन्द - मस्तिष्क कई क व्यक्ति शङ्कित दृष्टिसे देखते हैं; पर वैसी घटनाएं अव तो । समाचारपत्र - संसारमैं ' प्रत्यक्ष दीख रही हैं । स्थानाभाववश संक्षेपसे थोड़ी घटनाएं दी जा रही हैं 1 । उनका संग्रह भक्त राम-शरणदासजी ( पिलखुआ ) ने किया है । सम्पा, ] १ पुरुषके पेंटसे बच्चेकी जन्मे । ॥ 2 [ दक्षिण अमेरिकाके सण्डेय'फिक ' ( १६,४, '६४ पृ. ६ ) पत्रसे ] स { { “ एक १७ वर्षेके लड़के के पेंटसे ऑपरेशन करके एक ३ उ पौण्ड १५ औन्सको ' बच्चा निकाला गया । जीनली क्वसला रेंट नामक यह लड़की अपनी मां के साथ ऊगुटेनवर्ग ( पैरिस ) में रहता थी, उसका गर्भ १७ वर्षसे उसके अपने फेफड़ेके पास अन्दर ही विकसित हो रहा था जानली क्यसने अपनी छाती में दर्दकी शिकायत की माउसका एक्सरे लिया गया । वादमै आप-रेशन किया गया । पौने दो घण्टे लगे । उक्त बच्चा पैदा हुआ । उसकी मे को कहा गया । कि १७ वर्ष पूर्व तुमने अपने को जन्म दिया था और उसका दूसरा जुड़वां भाग उसी लड़के में रहकर विकसित होने लगा । उसके द्वान्ता और बाल भी थे । यह लड़का लड़का पैदा करने से बड़ा विख्यात हो गया । ' ( इसोपुष्पमें पृ २७ देख ) F BF PES SE वाजवत्र्यह प्रत्यक्षन्घिदना है ता मान्धाताका जो कि युव नाँश्व के पेट से पैदा होने का पुराणों में वर्णन आयी है; कइयोंका. Gujarat: An eGangotri Initiative