अग्नि पुराण — पृष्ठ 101–110
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 101–110
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द्वादशोऽध्यायः ( ' कामस्त्वं शम्भुनाऽनङ्गः कृतोऽहं शम्बरेण च तच्छ्रुत्वा शम्बरं हत्वा प्रद्युम्नं सह भार्यया । ) प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽभूदुषापतिरुदारधीः तपसा शिवपुत्रोऽभून्मयूरध्वजपाततः शिवेन क्रीडती गौरीं दृष्ट्वोषा ' सस्पृहा पतौ वैशाखमासद्वादश्यां ॰ पुमान्भर्ता भविष्यति आत्मना सङ्गतं ज्ञात्वा तत्सख्या चित्रलेखया कृष्णपौत्रं द्वारकातो दुहित्रा बाणमन्त्रिणः वाणध्वजस्य सम्पातो रक्षिभिः स निवेदितः श्रुत्वा तु नारदात्कृष्णः प्रद्युम्नबलभद्रवान् । हरिशङ्करयोर्युद्धं बभूवाथ शराशरि । ९ ७ । हृता, न तस्य पत्नी, त्वं मायाज्ञः शम्बरं जहि ॥ ३ ९ ॥ । मायावत्या ययौ कृष्णं कृष्णो हृष्टोऽथ रुक्मिणी ॥४० ॥
। बाणो बलिसुतस्तस्य सुतोषा शोणितं पुरम् ॥४१ ॥
। युद्धं प्राप्स्यसि बाण त्वं बाणं तुष्टः शिवोऽभ्यधात् ' ॥४२ ॥
। तामाह गौरी भर्ता ते निशि स्वप्ने तु दर्शनात् ॥४३ ॥
। गौर्युक्ता हर्षिता चोषा गृहे सुप्ता ददर्श तत् ॥४४ ॥
। लिखिताद्वै चित्रपटादनिरुद्धं समानयत् ॥४५ ॥
। कुम्भाण्डस्यानिरुद्धोऽगाद्रराम ` ह्युषया सह ॥ ४६ ॥
। अनिरुद्धस्य बाणेन युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥४७ ॥
गरुडस्थोऽथ जित्वाऽग्नीज्वरं माहेश्वरं तथा ॥४८ ॥
' नन्दिविनायकस्कन्दमुख्यास्तार्क्ष्यादिभिर्जिताः ॥ ४ ९ ॥ तुम कामदेव हो, शंकर ने तुमको भस्म करके अनंग बना दिया था और शम्बर ने मेरा अपहरण कर लिया था । मैं उसकी पत्नी नहीं हूँ । तुम माया को जाननेवाले हो अतः शम्बर को मार डालो || ३ ९ ॥ यह सुनकर प्रद्युम्न शम्बर को मारकर अपनी पत्नी मायावती के साथ कृष्ण के समीप आये । कृष्ण और रुक्मिणी अपने पुत्र को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ४० ॥ प्रद्युम्न से अनिरुद्ध का जन्म हुआ जो उषा के पति और उदार बुद्धिवाले थे । बलि का पुत्र था बाण । उसकी पुत्री
थी उषा । बाण की राजधानी थी शोणितपुर । बाण तपस्या द्वारा शिव का पुत्र हो गया । बाण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने कहा - ' हे बाण! जब तुम्हारा मयूरध्वज टूटकर गिर जायगा, तब तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा ॥४१-४२ ॥ एक बार गौरी को शिव के साथ क्रीड़ा करते हुए देखकर उषा ने भी पति ( प्राप्त करने ) की इच्छा की । गौरी ने उषा से कहा कि रात्रि में स्वप्न देखने से तुम्हें पति मिलेगा || ४३ || “ वैशाख मास की द्वादशी की रात में स्वप्न के समय तुम अपने पति को प्राप्त करोगी । " गौरी के इस वरदान को सुनकर उषा प्रसन्न होकर घर चली गयी और उसी रात में स्वप्न में अपने पति का दर्शन किया ॥४४ ॥ स्वप्न में अपने पति के सहवास को प्राप्तकर उषा ने अपनी सखी चित्रलेखा द्वारा बनाये
गये चित्रलेख से स्वप्नगत अनिरुद्ध का परिचय प्राप्त किया । उषा ने अपने पिता बाण के मन्त्री कुम्भाण्ड की कन्या तथा अपनी सहेली चित्रलेखा से कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को द्वारका से मँगा लिया । अनिरुद्ध ने आकर उषा के साथ रमण किया ॥४५-४६ ॥ रक्षकों ने बाण को बाणध्वज के टूटकर गिरने का समाचार सुनाया । अनिरुद्ध का बाणासुर के साथ घोर युद्ध हुआ ॥४७ ॥ नारद के द्वारा युद्ध का समाचार सुनकर कृष्ण, प्रद्युम्न और बलदेव के साथ गरुड़ पर
सवार होकर युद्धभूमि में पहुँच गये । उन्होंने ( आते ही ) महेश्वर द्वारा भेजे गये माहेश्वर ज्वर और आग्नेयास्त्र को जीत लिया ॥४८ ॥ इसके बाद विष्णु और शंकर में बाणों से युद्ध होने लगा । नन्दी, विनायक, स्कन्द आदि प्रमुख शिवगणों
को गरुड़ आदि विष्णु के गणों ने जीत लिया ॥४ ९ ॥ कृष्ण ने जृम्भास्त्र के प्रयोग से शंकर को सुला दिया और बाण १ कामस्त्वं " सह भार्यया पुस्तके नास्ति । २ ग. घ. ङ. ' भून्मायूरध्वजपातितः । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' भ्ययात् । ४ ङ. क्रीडितां । ५ क. ङ. च. दृष्ट्वा सा स । ६ घ. सुप्तेति । ७ क. ङ. च. ' श्यां पुंसोभर्ता । ८ क. ङ. च. ' द्धं च साऽऽनय ' । ९ क. ङ. च. नन्दी विनायकः स्कन्दमुखास्ता ' । ७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ९ ८ जृम्भिते शङ्करे सुप्ते ' जृम्भणास्त्रेण विष्णुना ॥ छिन्नं सहस्त्रं बाहूनां रुद्रेणाभयमर्थितम् ॥५० ॥
विष्णुना जीवितो बाणो द्विबाहुः प्राब्रवीच्छिवम् ॥५१ ॥
कृष्ण उवाच त्वया यदभयं दत्तं बाणस्यास्य मयाऽपि तत् । शिवाद्यैः पूजितो विष्णुः सानिरुद्ध उषादियुक् । अनिरुद्धात्मजो वज्रो मार्कण्डेयात्तु सर्ववित् । द्विविदस्य कपेर्भेत्ता कौरवोन्मादनाशनः । पुत्रानुत्पादयामास त्वसङ्ख्यातान्स यादवान् । इत्यादिमहापुराण आग्नेये आवयोर्नास्ति भेदो वै भेदी नरकमाप्नुयात् ॥५२ ॥
द्वारकां तु गतो रेमे उग्रसेनादियादवैः ॥५३ ॥
बलभद्रः प्रलम्बघ्नो यमुनाकर्षणोऽभवत् ॥ ॥५४ ५४ ॥ ॥ हरी रेमेऽनेकमूर्ती रुक्मिण्यादिभिरीश्वरः ॥ ॥५५ ५५ ॥ ॥ हरिवंशं पठेद्यस्तु प्राप्तकामो हरिं व्रजेत् ॥ ५६ ॥
हरिवंशे द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥
की हजार भुजाओं को काट डाला । शिव ने बाण को अभय वरदान देने के लिए कृष्ण से प्रार्थना की ॥ ५० ॥ विष्णु ने
बाणासुर को द्विबाहु बनाकर जीवित कर दिया और शिव से कहा ॥ ५१ ॥
कृष्ण बोले- आपने जो इस बाणासुर को अभयदान दिया है, इसलिए मैंने भी उसे अभय कर दिया है । हम दोनों में कोई भेद नहीं है । हम दोनों में भेद बुद्धि रखनेवाला नरकगामी होता है ॥५२ ॥ शिव आदि से सम्मान पाकर कृष्ण
उषा और अनिरुद्ध के साथ द्वारका में आ गये जहाँ वे उग्रसेन आदि यादवों के साथ क्रीड़ा करने लगे ॥ ५३ ॥ अनिरुद्ध
का वज्र नामक एक पुत्र हुआ जो मार्कण्डेय ऋषि के प्रभाव से सर्वज्ञ हो गया । प्रलम्ब का वध करनेवाले बलभद्र यमुना को खींचने के कारण यमुनाकर्षण रूप में प्रसिद्ध हो गये || ५४ ॥ द्विविद नामक वानर का वध करनेवाले बलराम जी ने कौरवों के उन्माद को नष्ट कर दिया । सर्वसमर्थ ( कृष्णरूपधारी ) विष्णु ने ( अपनी माया से अनेक रूपों को धारण करके ) रुक्मिणी आदि के साथ रमण किया ॥५५ ॥ भगवान् कृष्ण ने असंख्य यादव- -पुत्रों को जन्म दिया । जो व्यक्ति
इस हरिवंश का पाठ करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं और विष्णु के पास चला जाता है ॥५६ ॥
श्री अग्निमहापुराण में हरिवंशवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२ ॥
१ क. ख. घ. च. नष्टे । २ क. ङ. च. ' यसन्निमम् । ३ स कृष्णो यादवान् पुत्रवत्पालयामासेत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रयोदशोऽध्यायः ९९ अथ त्रयोदशोऽध्यायः भारताख्यानम् अग्निरुवाच भारतं सम्प्रवक्ष्यामि कृष्णमाहात्म्यलक्षणम् । भूभारमहरद्विष्णुर्निमित्तीकृत्य पाण्डवान् ॥१ ॥
विष्णुनाभ्यब्जजो ब्रह्मा ब्रह्मपुत्रोऽत्रिरत्रितः । सोमः सोमाद् बुधस्तस्मादैल आसीत्पुरूरवाः ॥२ ॥
तस्मादायुस्ततो रांजा नहुषोऽतो ययातिकः । ततः पुरुस्तस्य वंशे भरतोऽथ नृपः कुरुः ॥३ ॥
तद्वंशे शन्तनुस्तस्माद् भीष्मो गङ्गासुतोऽनुजौ ' । चित्राङ्गदो विचित्रश्च सत्यवत्यां च शन्तनोः ॥४ ॥
स्वर्गं गते शन्तनौ च भीष्मो भार्याविवर्जितः । अपालयद् भ्रातृराज्यं बालश्चित्राङ्गदो हतः ॥५ ॥
` चित्राङ्गदेन, द्वे कन्ये काशिराजस्य चाम्बिका । अम्बालिका च भीष्मेण आनीते विजितारिणा ॥६ ॥
भार्ये विचित्रवीर्यस्य, यक्ष्मणा स दिवं गतः । सत्यवत्या ह्यनुमतादम्बिकायां नृपोऽभवत् ॥७ ॥
धृतराष्ट्रोऽम्बालिकायां पाण्डुश्च व्यासतः सुतः । गान्धार्यां धृतराष्ट्राच्च दुर्योधनमुखं शतम् ॥८ ॥
शतशृङ्गाश्रमपदे भार्यायोगादथो मृतः । ऋषिशापात्ततो धर्मात्कुन्त्यां पाण्डोर्युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
अध्याय १३ महाभारत का आख्यान अग्नि बोले- अब मैं कृष्ण के माहात्म्य को सूचित करनेवाली महाभारत की कथा को कहूँगा, जिसमें विष्णु ने पाण्डवों को निमित्त बनाकर पृथ्वी का भार दूर कर दिया था ॥ १ ॥ विष्णु की नाभि के कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए ।
ब्रह्मा के पुत्र अत्रि और अत्रि के पुत्र सोम हुए । सोम से बुध और बुध से ऐल पुरूरवा का जन्म हुआ । ऐल पुरूरवा के पुत्र आयु, आयु के नहुष और नहुष के पुत्र ययाति हुए । ययाति के पुरु और पुरु के वंश में भरत हुए । भरत के वंश में कुरु हुए ॥ २-३ ॥ कुरु के वंश में शन्तनु और शन्तनु के गङ्गापुत्र भीष्म हुए । सत्यवती के गर्भ से शन्तनु के द्वारा भीष्म के दो अनुज - चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य उत्पन्न हुए || ४ || शन्तनु के स्वर्गगामी हो जाने पर भीष्म ने ब्रह्मचारी रहकर भाई के राज्य का पालन किया । ( चित्राङ्गद नामक एक गन्धर्व ने ) बालक चित्राङ्गद को मार डाला ॥५ ॥
शत्रुओं को जीतनेवाले भीष्म काशिराज की दो कन्याओं - अम्बिका और अम्बालिका को अपहरण करके ले आये ॥६ ॥ उन दोनों कन्याओं का विचित्रवीर्य से विवाह कर दिया । विचित्रवीर्य यक्ष्मा रोग से मर गये । सत्यवती की
अनुमति से व्यास ने ( नियोग द्वारा ) अम्बिका से धृतराष्ट्र नामक राजा को उत्पन्न किया । उसी प्रकार अम्बालिका से पाण्डु की उत्पत्ति हुई । धृतराष्ट्र से गान्धारी के दुर्योधन आदि सौ पुत्र उत्पन्न हुए ॥७-८ ॥ ऋषि के शाप से पाण्डु शतशृङ्ग के आश्रम में स्त्री - सहवास के कारण स्वर्गगामी हो गये । कुन्ती ने धर्म से पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर को, वायु से भीम को १ क. ख. ग. ङ. च. ' तो ध्वजौ । २ चित्राङ्गदाख्येन गन्धर्वेण हत इत्यर्थः । ३ ख. ' त्याभ्यनु । ४ क. ' गाद्यतो मृ ' । ख. ग. ' गाच्च तन्मृतिः । ऋ । ५ पाण्डुमृत इत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १०० वाताद्भीमोऽर्जुनः शक्रान्माद्र्यामश्विकुमारतः । कर्णः कुन्त्यां हि कन्यायां जातो दुर्योधनाश्रितः । दुर्योधनो गृहे पाण्डवानदहत्कुधीः । ततस्त ' एकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने । ययुः पाञ्चालविषयं द्रौपद्यास्ते स्वयंवरे । अर्धराज्यं पुनः प्राप्ता ज्ञाता दुर्योधनादिभिः । सारथिं चार्जुनः सङ्ख्ये कृष्णमक्षय्यसायकान् । कृष्णेन सोऽर्जुनो वह्निं खाण्डवे समतर्पयत् जिता दिशः पाण्डवैस्तु राज्यं चक्रे युधिष्ठिरः भ्रात्रा दुःशासनेनोक्तः कर्णेन प्राप्तभूतिना अजयत्तस्य राज्यं च सभास्थो मायया हसन् वने द्वादश वर्षाणि प्रतिज्ञातानि सोऽनयत् नकुलः सहदेवश्च 1 पाण्डुर्माद्रीयुतो मृतः ॥ १० ॥
कुरुपाण्डवयोर्वैरं दैवयोगाद् बभूव ह ॥ ११ ॥
दग्धागाराद्विनिष्क्रान्ता मातृषष्ठास्तु पाण्डवाः ॥ १२ ॥
मुनिवेषाः स्थिताः सर्वेनिहत्य बकराक्षसम् ॥१३ ॥
सम्प्राप्ता बहुवेषेण द्रौपदी " पञ्चपाण्डवैः ५ ॥१४ ॥
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं पावकाद्रथमुत्तमम् ॥१५ ॥
। ब्रह्मास्त्रादींस्तथा द्रोणात्सर्वे सर्वविशारदाः " ॥ १६ ॥
। इन्द्रवृष्टिं वारयंश्च शरबन्धेन पाण्डवः ॥ १७ ॥
। बहुस्वर्णं राजसूयं, न सेहे तत्सुयोधनः ॥ १८ ॥
। द्यूतकार्ये शकुनिना द्यूतेन स युधिष्ठिरम् ॥ १ ९ ॥ । जितो युधिष्ठिरो भ्रातृयुक्तश्चारण्यकं ययौ ॥ २० ॥
। अष्टाशीतिसहस्राणि भोजयन् पूर्ववद् द्विजान् ॥ २१ ॥
और इन्द्र से अर्जुन को उत्पन्न किया । माद्री ने अश्विनीकुमार से नकुल और सहदेव को उत्पन्न किया । माद्री के साथ सहवास करते - करते पाण्डु की मृत्यु हो गयी । कौमार्यावस्था में ही कुन्ती के कर्ण नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ था जो कि दुर्योधन के आश्रम में रहता था । दैवयोग से कौरवों और पाण्डवों में वैर हो गया ॥९ -११ ॥ दुर्बुद्धि दुर्योधन ने लाक्षागृह में पाण्डवों को जला दिया किन्तु वे पाँचों पाण्डव अपनी माता के साथ जलते हुए घर से निकल आये ॥१२ ॥ तदनन्तर
एक चक्रपुरी में जाकर वे पाण्डव मुनियों के वेश में एक ब्राह्मण के घर में रहने लगे । वहाँ उन्होंने बक नामक राक्षस का वध किया ॥१३ ॥ वहाँ से वे पाँचों भाई पाञ्चाल नामक प्रान्त में द्रौपदी के स्वयंवर में सम्मिलित हुए । पाँचों पाण्डवों
ने अनेक वेश धारण करके द्रौपदी को प्राप्त कर लिया ॥१४ ॥ वनवास से लौट आने पर दुर्योधन आदि के द्वारा जान
लिये जाने पर पाण्डवों ने फिर से आधा राज्य प्राप्त कर लिया । अर्जुन ने अग्नि से गाण्डीव नामक दिव्य धनुष, उत्तम रथ, युद्ध में सारथि के रूप में कृष्ण को, अक्षय बाणों को और ब्रह्मास्त्र आदि को प्राप्त कर लिया । सभी पाण्डव गुरु द्रोणाचार्य से सब प्रकार की अस्त्र - शिक्षा प्राप्त करके शस्त्र - संचालन में निपुण हो गये ॥१५-१६ ॥ अर्जुन ने कृष्ण की सहायता से पाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया और अपने शस्त्र - कौशल से बाणों का जाल बिछाकर इन्द्र की वृष्टि को रोक दिया ॥१७ ॥ पाण्डवों ने दिग्विजय कर लिया । युधिष्ठिर राज्य करने लगे । उन्होंने राजसूय यज्ञ किया
जिसमें बहुत - सां सोना दान में दिया गया । सुयोधन ( पाण्डवों के ) इस ऐश्वर्य को बर्दाश्त नहीं कर सका ॥१८ ॥ अपने
भाई दुःशासन और ऐश्वर्यशाली कर्ण के कहने पर उसने शकुनी के द्वारा जुए में युधिष्ठिर को हरा दिया और सभा में ही व्यंग्यपूर्वक युधिष्ठिर की हँसी उड़ाते हुए उनके राज्य को भी जीत लिया । इसके बाद हारे हुए युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों ( और द्रौपदी ) के साथ जंगल में चले गये ॥१९ -२० ॥ प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने जंगल में बारह वर्ष बिताये । वन में युधिष्ठिर ने पहले की भाँति धौम्य आदि अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराया ॥२१ ॥ फिर वे लोग द्रौपदी
१ क. ङ. च. ‘ द्रीसुतो नृपः । क ' । २ ख. ग. घ. ' तस्तु ए । ३ ख. घ. ङ. बाहुवेधेन । ग. बाहुवेदेन । च. बहुबोधेन । ४ क. द्रौपदीं । ५ क. पाण्डवा । ६ ख. घ. ततः । ७ घ. शस्त्रविशारदाः । ८ ख. ग. घ. शरवर्षेण । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रयोदशोऽध्यायः १०१ सधौम्यो द्रौपदीषष्ठस्ततः प्रागाद्विराटकम् । कङ्को द्विजो ह्यविज्ञातो राजा भीमोऽथ सूपकृत् ॥२२ ॥
बृहन्नडाऽर्जुनो, भार्या सैरन्ध्री, यमजौ तथा । अन्यनाम्ना, भीमसेनः कीचकं चावधीन्निशि ॥२३ ॥
द्रौपदीं हर्तुकामं तमर्जुनश्चाजयत्कुरून् ' । कुर्वतो गोग्रहादीश्च तैर्ज्ञाता पाण्डवा अथ ॥२४ ॥
सुभद्रा कृष्णभगिनी अर्जुनात्समजीजनत् ॥ अभिमन्युं ददौ तस्मै विराटश्चोत्तरां सुताम् ॥२५ ॥ २५ ॥ ॥
सप्ताक्षौहिणीश आसीद्धर्मराजो रणाय सः ॥ कृष्णो दूतोऽब्रवीद्गत्वा दुर्योधनममर्षणम् ॥ २६ ॥
एकादशाक्षौहिणीशं नृपं दुर्योधनं तदा । युधिष्ठिरायार्धराज्यं देहि ग्रामांश्च पञ्च वा युध्यस्व वा वचः श्रुत्वा कृष्णमाह सुयोधनः ॥२७ ॥
सुयोधन उवाच भूसूच्यग्रं न दास्यामि योत्स्ये सङ्ग्रहणोद्यतः ॥२८ ॥
अग्निरुवाच विश्वरूपं दर्शयित्वा अधृष्यं विदुरार्चितः । प्रागाद्युधिष्ठिरं प्राह योधयैनं सुयोधनम् ॥२९ ॥
इत्यादिपुराण आग्नेये आदिपर्वादिभारताख्यानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥
के साथ घूमते हुए अज्ञात वास करने के लिए विराट की राजधानी में गये । अपने को गुप्त रखने के लिए युधिष्ठिर ने अपने को कङ्क नामक ब्राह्मण घोषित कर दिया । भीम रसोइया बना, अर्जुन बृहन्नला और उनकी स्त्री द्रौपदी सैरन्ध्री बन गयी । इसी प्रकार नकुल और सहदेव ने भी अपने - अपने नाम बदल दिये । भीमसेन ने रात में कीचक का वध कर दिया ॥२२-२३ ॥ क्योंकि वह ( कीचक ) द्रौपदी का अपहरण करना चाहता था । अर्जुन ने विराट की गायों को चुराने के लिए आये हुए कौरवों को पराजित कर दिया । इसके बाद कौरवों ने पाण्डवों को पहचान लिया ॥ २४ ॥ कृष्ण की
बहन सुभद्रा ने अर्जुन से अभिमन्यु नामक पुत्र को उत्पन्न किया जिसके साथ विराट ने अपनी कन्या उत्तरा का विवाह कर दिया ॥२५ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर के पास युद्ध के लिए सात अक्षौहिणी सेना थी । युधिष्ठिर का दूत बनकर भगवान्
कृष्ण ने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी, असहनशील राजा दुर्योधन से कहा ॥ २६॥ युधिष्ठिर को आधा राज्य या कम-से - कम पाँच गाँव दे दो अन्यथा उनके साथ युद्ध करो । कृष्ण की इन बातों को सुनकर सुयोधन ने कृष्ण से कहा ॥२७ ॥
सुयोधन बोला- मैं सुई की नोक के बराबर भी भूमि ( पाण्डवों को ) नहीं दूँगा, मैं भी उनके साथ युद्ध करने के लिए तैयार हूँ ॥२८ ॥
अग्नि बोले - जिसको अभिभूत न किया जा सके ऐसे अपने विश्वरूप को दिखलाकर भगवान् कृष्ण ( दुर्योधन की सभा से ) चले आये । विदुर जी ने भगवान् कृष्ण की पूजा की । भगवान् कृष्ण युधिष्ठिर के पास आकर बोले, ' इस सुयोधन से युद्ध करना ही पड़ेगा ' ॥२ ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में महाभारत आदिपर्व नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥१३ ॥
१ ङ. च. हन्तुकाम । २ क. ग. ङ. च. ' श्चावधीत्क । ३ क. ङ. च. विदुरान्वित । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १०२ अथ चतुर्दशोऽध्यायः भारताख्याने कुरुपाण्डवसङ्ग्रामवर्णनम् अग्निरुवाच यौधिष्ठिरी दौर्योधनी कुरुक्षेत्रं ययौ चमूः । पार्थं ह्युवाच भगवानशोच्या भीष्ममुख्यकाः । अयमात्मा परं ब्रह्म अहं ब्रह्मास्मि विद्धि तम् । कृष्णोऽक्तोऽथार्जुनोऽयुध्यद्रथस्थो वाद्यशब्दवान् । पाण्डवानां शिखण्डी च तयोर्युद्धं बभूव ह । धार्तराष्ट्राञ्शिखण्डाद्याः पाण्डवा जघ्नुराहवे । बभूव खस्थदेवानां पश्यतां प्रीतिवर्धनम् दशमे ह्यर्जुनो बाणैर्भीष्मं वीरं ववर्ष ह हस्त्यश्वरथपादातमन्योन्यास्त्रनिपातितम् भीष्मद्रोणादिकान्दृष्ट्वा नायुध्यत् गुरूनिति ॥१ ॥
शरीराणि विनाशीनि न शरीरी विनश्यति ॥ २ ॥
सिद्धसिद्ध्योः समो योगी राजधर्मं प्रपालय ॥ ३ ॥
भीष्मः सेनापतिरभूदादौ दौर्योधने बले ॥ ४ ॥
धार्तराष्ट्राः पाण्डवांश्च जघ्नुर्युद्धे सभीष्मकाः ॥ ५ ॥
देवासुरसमं युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ६ ॥
। भीष्मोऽस्त्रैः पाण्डवं सैन्यं दशाहोभिर्न्यपातयत् ॥७ ॥
। शिखण्डी द्रुपदोक्तोऽस्त्रैर्ववर्ष जलदो यथा ॥८ ॥
। भीष्मः स्वच्छन्दमृत्युश्च युद्धमार्गं प्रदर्श्य च ॥९ ॥
अध्याय १४ महाभारत में कौरव - पाण्डव - संग्राम वर्णन अग्नि बोले - कुरुक्षेत्र में कौरव और पाण्डव की सेनाएँ आ डटीं । भीष्म और द्रोण आदि को रणभूमि में देखकर अर्जुन ने यह कहते हुए लड़ने में असमर्थता प्रकट की कि ' ये हमारे गुरु हैं ' ॥१ ॥ भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा-हे अर्जुन, भीष्म आदि के विषय में शोक करना ठीक नहीं है । नश्वर तो ये शरीर हैं, जो शरीरी है उस आत्मा का तो
कभी नाश ही नहीं होता ॥२ ॥ आत्मा ही परब्रह्म है । ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस ज्ञान से ही तुम इसे समझो । देखो, योगी उसी को
कहते हैं जो सफलता और असफलता ( असिद्धि ) में समभाव रखता है । इसलिए ( तुम योगी बनो और ) राजधर्म का पालन करो ॥३ ॥ कृष्ण के समझाने से अर्जुन युद्ध के लिए तैयार होकर रथ पर सवार हो गये । रण के बाजे बजने लगे ।
सबसे पहले भीष्म दुर्योधन की सेना के सेनापति नियुक्त हुए ॥४ ॥ और शिखण्डी पाण्डवों की सेना के ( सेनापति हुए )
दोनों सेनाओं में युद्ध प्रारम्भ हो गया । भीष्म ( आदि ) के साथ धृतराष्ट्र के पुत्र भी युद्ध में पाण्डवों को मारने लगे ॥५ ॥
उधर शिखण्डी आदि पाण्डव ( पक्षीय ) युद्ध में कौरव को मारने लगे । कौरव - पाण्डव सेनाओं में देवासुर - संग्राम की भाँति युद्ध होने लगा ॥६ ॥ यह युद्ध आकाश में रहनेवाले देवताओं के लिए अत्यन्त प्रीतिकर था । भीष्म अपने तीक्ष्ण
बाणों से दस दिन तक पाण्डव सेना का संहार करते रहे ॥७ ॥ दसवें दिन अर्जुन पराक्रमी भीष्म के ऊपर बाणों की
वर्षा करने लगे । द्रुपद के कहने पर शिखण्डी ने भी मेघों की भाँति बाणों की झड़ी लगा दी ॥८ ॥ ( युद्ध में ) असंख्य
हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों ने एक - दूसरे को मार गिराया । भीष्म तो इच्छानुसार मुत्यु प्राप्त करनेवाले थे, अतएव १ क. ङ. च. रणे । २ क. ङ. च. ' निपीडित ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्दशोऽध्यायः १०३ वसूक्तो वसुलोकाय शरशय्यागतः स्थितः । दुर्योधने तु शोकार्ते द्रोणः सेनापतिस्त्वभूत् । तयोर्युद्धं बभूवोग्रं यमराष्ट्रविवर्धनम् दौर्योधनी महासेना हस्त्यश्वरथपत्तिनी हतोऽश्वत्थामा वेत्युक्ते द्रोणः शस्त्राणि चात्यजत् पञ्चमेऽहनि दुर्धर्षः सर्वक्षत्रं प्रमथ्य च । अर्जुनः पाण्डवानां च तयोर्युद्धं बभूव ह । कर्णार्जुनाख्ये सङ्ग्रामे कर्णोऽनवधीच्छरैः । शल्यो दिनार्थं युयुधे ह्यवधीत्तं युधिष्ठिरः । बहून् हत्वा नरादींश्च भीमसेनमथाऽद्रवत् गदयाऽन्यानुजांस्तस्य ' तस्मिन्नष्टादशेऽहनि
अक्षौहिणीप्रमाणं तु अश्वत्थामा महाबलः ।
उत्तरायण मीक्षश्च ध्यायन् विष्णुं स्तुवन् स्थितः ॥१० ॥
पाण्डवे हर्षिते ' सैन्ये धृष्टद्युम्नश्चभूपतिः ॥११ ॥
। विराटद्रुपदाद्याश्च निमग्ना द्रोणसागरे ॥१२ ॥
। धृष्टद्युम्नाद्धि पतिता द्रोणः काल इवाऽऽबभौ ॥१३ ॥
। धृष्टद्युम्नशराक्रान्तः पतितः स महीतले ॥ १४ ॥
दुर्योधने तु शोकार्ते कर्णः सेनापतिस्त्वभूत् ॥१५ ॥
शस्त्राशस्त्रि महारौद्रं देवासुररणोपमम् ॥ १६ ॥
द्वितीयेऽहनि कर्णस्तु अर्जुनेन निपातितः ॥ १७ ॥
युयुधे भीमसेनेन हतः सैन्यः सुयोधनः ॥ १८ ॥
। गदया प्रहरन्तं तु भीमस्त तु व्यपातयत् ॥१९ ॥
। रात्रौ सुषुप्तं च बलं पाण्डवानां न्यपातयत् ॥२० ॥
द्रौपदेयांश्च ' पाञ्चालान् धृष्टद्युम्नं च सोऽवधीत् ॥२१ ॥
वह अपना रण - कौशल दिखलाकर वसुओं के कहने से वसुलोक में जाने के लिए बाणों की शय्या पर लेट गये और अपने हृदय में विष्णु का ध्यान करते हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने लगे ॥९ -१० ॥ दुर्योधन को शोकार्त देखकर गुरु द्रोणाचार्य ने सेना की बागडोर सँभाली । इधर धृष्टद्युम्न विजयी पाण्डव सेना का सेनापति नियुक्त हो गया ॥११ ॥ दोनों
सेनाओं में ऐसा घमासान युद्ध हुआ कि यमराज को अपना उपनिवेश बढ़ाना पड़ा । विराट और द्रुपद आदि वीर द्रोणरूपी सागर में डूब गये ॥१२ ॥ धृष्टद्युम्न ने दुर्योधन की सेना के अनेक हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों को मार गिराया ।
उस समय द्रोणाचार्य काल के समान पाण्डव - सेना का नाश करने लगे || १३ || ' अश्वत्थामा ( नामक हाथी ) या ( मनुष्य ) मारा गया ' – यह सुनकर द्रोणाचार्य ने शस्त्रों को डाल दिया । पाँचवें दिन अत्यन्त पराक्रमी द्रोणाचार्य सभी क्षत्रियों को मारकर धृष्टद्युम्न के बाणों से जर्जर होकर पृथ्वी पर गिर पड़े ॥१४- १४३ ॥ ( इसे देखकर ) दुर्योधन के शोकाकुल होने पर कर्ण सेनापति बने । उधर अर्जुन पाण्डवों के सेनापति बने । अर्जुन और कर्ण में युद्ध होने लगा । देवासुर संग्राम के समान उस महाभयंकर युद्ध में शस्त्रों का जवाब शस्त्रों से दिया जाने लगा ॥ १५-१६ ॥ कर्णार्जुन - युद्ध में कर्ण ने अपने बाणों से शत्रुओं का संहार कर दिया । दूसरे दिन अर्जुन ने कर्ण को मार गिराया ॥ १७ ॥ शल्य ने आधे दिन तक युद्ध किया परन्तु ( अन्त में )
युधिष्ठिर ने उसे मार डाला । सेना के नष्ट हो जाने पर दुर्योधन ( बची हुई सेना के साथ ) भीमसेन के साथ युद्ध करने लगा ॥१८ ॥ वह युद्ध में अनेक सैनिकों को मारकर भीम के ऊपर झपट पड़ा । भीम ने गदा -प्रहार करते हुए दुर्योधन को मार
गिराया ॥१९ ॥ दुर्योधन के अन्य छोटे भाई भी भीमसेन के द्वारा ही मारे गये । महाभारत संग्राम के उस ( आखिरी ) अट्ठारहवें
दिन महाबली अश्वत्थामा ने रात में सोयी हुई पाण्डवों की एक अक्षौहिणी सेना को मार गिराया । उसने पाञ्चाल वीरों, द्रौपदी के पुत्रों तथा धृष्टद्युम्न का भी वध कर दिया ॥ २०-२१ ॥ पुत्रों के विनाश से द्रौपदी रोने - चिल्लाने लगी । ( फिर उसको १ चर्षित सै ० । २ क. ङ. च. ' म्नाभिष ' । घ. ' म्नाभिष । ३ क. ' वा चले । ह । ४ घ. चेत्युयते । ५ क. च. सत्त्वानि । ६ क. ख. घ. ङ. ° थाव्रवात् । ७ क. च. ' न्यात्मजां । ङ. ' न्यांस्तथा तस्य । ८ घ. ' देयान्सपा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४ अग्निपुराणम् पुत्रहीनां द्रौपदीं तां रुदतीमर्जुनस्ततः । शिरोमणि तु जग्राह ऐषीकास्त्रेण तस्य च ॥ २२ ॥
अश्वत्थामास्त्रनिर्दग्धं जीवयामास वै हरिः । उत्तरायास्ततो गर्भं स परीक्षिदभून्नृपः ॥२३ ॥
कृतवर्मा कृपो द्रौणिस्त्रयो मुक्तास्ततो रणात् । पाण्डवाः सात्यकिः कृष्णः सप्त मुक्ता न चापरे ॥ २४ ॥
स्त्रियश्चाऽऽर्ताः समाश्वास्य भीमाद्यैः स युधिष्ठिरः । संस्कृत्य प्रहतान् वीरान् दत्तौदकधनादिकः ॥ २५ ॥
भीष्माच्छन्तनवाच्छ्रुत्वा धर्मान्सर्वांश्च शान्तिदान् । राजधर्मान् मोक्षधर्मान् दानधर्मान् नृपोऽभवत् ॥२६ ॥
अश्वमेघे ददौ दानं ब्राह्मणेभ्योऽरिमर्दनः । श्रुत्वाऽर्जुनान्मौसलेयं यादवानां च संक्षयम् ॥ २७ ॥
राज्ये परीक्षितं स्वाप्य सानुजः ' स्वर्गमाप्तवान् ॥२८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये भारताख्यानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः पाण्डवस्वर्गारोहणवर्णनम् अग्निरुवाच युधिष्ठिरे तु राज्यस्थे आश्रमादाश्रमान्तरम् । धृतराष्ट्रो वनमगाद् गान्धारी च पृथा द्विज ॥१ ॥
सान्त्वना देने के लिए ) अर्जुन ने अश्वत्थामा के सिर की मणि को सींक के अस्त्र से निकाल लिया ॥ २२ ॥ कृष्ण ने अश्वत्थामा
के अस्त्र से दग्धप्राय उत्तरा के गर्भ में स्थित परीक्षित की रक्षा कर ली । वही ( आगे चलकर भारत का ) सम्राट् हुआ ॥२३ ॥
युद्ध के बाद कौरव पक्ष के कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा शेष रह गये । पाण्डव पक्ष में जो सात वीर शेष रह गये थे-पाँचों पाण्डव, सात्यकि और कृष्ण । और कोई ( वीरों में ) जिन्दा नहीं बचा || २४ || भीम आदि के साथ युधिष्ठिर ने दुःखी और रोती हुई स्त्रियों को समझा - बुझाकर युद्ध में मारे गये वीरों का ( दाह ) संस्कार कर दिया । उन्होंने जलतर्पण तथा धन आदि का दान किया ॥२५ ॥ युधिष्ठिर ने शन्तनु - पुत्र भीष्म से शान्ति देनेवाले सब प्रकार के धर्म- राजधर्म - मोक्षधर्म और
दानधर्म को सुना और विधिपूर्वक राज्यासन ग्रहण किया ॥२६ ॥ शत्रुओं का संहार करनेवाले युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करके
उसमें ब्राह्मणों को नाना प्रकार का दान दिया । तदनन्तर अर्जुन के मुख से मुसल - युद्ध द्वारा यादवों का विनाश सुनकर राज्यभार परीक्षित को सौंप दिया और अपने चारों छोटे भाइयों ( द्रौपदी तथा पालित कुत्ते ) के साथ स्वर्ग चले गये ॥२७-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में भारत आख्यान नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥१४ ॥
अध्याय १५ पाण्डव - स्वर्गारोहण वर्णन अग्नि बोले - हे ब्राह्मण! जब युधिष्ठिर राज्य करने लगे तब गृहस्थाश्रम छोड़कर वानप्रस्थाश्रम को स्वीकार करते हुए धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती जंगल में चले गये ॥१ ॥ महात्मा विदुर दावाग्नि में जलकर स्वर्ग को सिधार गये ।
१ च. तां सुद ' । २ दुर्योधनपक्षीयास्त्रयो । रणान्मुक्ताः । ३ पाण्डवपक्षीयाश्च सप्तेत्यर्थः । ४ क. ङ. च. ' ले स या ' । ५ ग. ङ. माप्नुयात् । इ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चदशोऽध्यायः १०५ विदुरस्त्वग्निना दग्धो वनजेन दिवं गतः । धर्मायाधर्मनाशाय निमित्तीकृत्य पाण्डवान् । यादवानां भारकरं, वज्रं राज्येऽभ्यषेचयत् । इन्द्रलोके ब्रह्मलोके पूज्यते स्वर्गवासिभिः ' । अविनाशी हरिर्देवो ध्यानिभिर्येय एव सः । संस्कृत्य यादवान् पार्थो दत्तोदकधनादिकः । पुनस्तच्छातो नीता ' गोपालैर्लगुडायुधैः । व्यासेनाश्वासितो मेने बलं मे कृष्णसन्निधौ । युधिष्ठिराय सभ्रात्रे पालकाय नृणां तदा । विना कृष्णेन तन्नष्टं ' दानमश्रोत्रिये यथा । प्रस्थानं ' प्रस्थितो धीमान् द्रौपद्या भ्रातृभिः सह । महापथे तु पतिता द्रौपदी सहदेवकः एवं विष्णुर्भुवो भारमहरद् दानवादिकम् ॥२ ॥
स विप्रशापव्याजेन मुसलेनाहरत् कुलम् ॥ ३ ॥
देवादेशात्प्रभासे स देहं त्यक्त्वा स्वयं हरिः ॥४ ॥
बलभद्रोऽनन्तमूर्तिः पातालस्वर्गमीयिवान् ॥५ ॥
विना ' तं द्वारकास्थानं प्लावयामास सागरः ॥६ ॥
स्त्रियोऽष्टावक्रशापेन भार्या विष्णोश्च याः स्थिताः ॥७ ॥
अर्जुनं हि तिरस्कृत्य, पार्थः शोकं चकार ह ॥८ ॥
। हस्तिनापुरमागत्य पार्थः सर्वं न्यवेदयत् ॥९ ॥
तद्धनुस्तानि चास्त्राणि स रथस्ते च वाजिनः ॥ १० ॥
तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु राज्ये स्थाप्य परीक्षितम् ॥११ ॥
संसारानित्यतां ज्ञात्वा जपन्नष्टशतं हरेः ॥ १२ ॥
। नकुलः फाल्गुनो भीमो राजा शोकपरायणः ॥१३ ॥
इस प्रकार विष्णु ने दानव और अन्यायियों का संहार करके पृथ्वी के भार को हल्का कर दिया ॥२ ॥ भगवान् कृष्ण
ने धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए पाण्डवों को निमित्त बनाकर यह संहार - कार्य किया । तत्पश्चात् ब्राह्मण-शाप के बहाने मुसल - युद्ध के द्वारा भारभूत यादव - कुल का संहार कर दिया || ३ || उन्होंने वज्र को यादवों का राजा बना दिया और स्वयं देवताओं के अनुरोध से प्रभास क्षेत्र में शरीर त्याग करके इन्द्रलोक में रहनेवाले देवताओं से सम्मानित हुए ॥४-४ ॥ अनन्तमूर्ति बलदेव जी पाताल - स्वर्ग को चले गये । ध्यानी जन अविनाशी भगवान् कृष्ण का ध्यान किया करते हैं । भगवान् हरि के बिना द्वारकापुरी को समुद्र ने जलमग्न कर दिया ॥५-७ ॥ अर्जुन ने मरे हुए यादवों का ( दाह- ) संस्कार किया और उनके निमित्त जल - तर्पण और धन आदि का दान दिया । अष्टावक्र के शाप से जो स्त्रियाँ विष्णु की पत्नियाँ हुई थीं उनको उन्हीं के शाप से गोपालों ने लाठी के जोर से अर्जुन को हराकर छीन लिया । यह देखकर अर्जुन को बड़ी चिन्ता हुई || ८ || व्यास के समझाने पर अर्जुन को ज्ञान हुआ कि उनकी जो कुछ शक्ति थी वह कृष्ण के सान्निध्य का ही परिणाम था । अर्जुन ने हस्तिनापुर आकर युधिष्ठिर से सब - कुछ कह सुनाया । उस समय युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ प्रजा का पालन कर रहे थे ॥९ - ९ ३ ॥ अर्जुन ने कहा- -'मेरा ' धनुष वही है, अस्त्र वही हैं, रथ वही है, घोड़े भी वही हैं, परन्तु कृष्ण के बिना ये सारी वस्तुएँ उसी प्रकार निष्फल हो रही हैं जिस प्रकार अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान निष्फल हो जाता है ' ॥१० -१०३ ॥ । यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने राज्यभार तो परीक्षित के हाथों सौंप दिया और स्वयं द्रौपदी और भाइयों के साथ संसार को अनित्य समझकर एक सौ आठ बार हरि का जप करते हुए महाप्रस्थान कर दिया ॥११-१२ । उस महापथ पर चलते हुए सर्वप्रथम द्रौपदी गिर पड़ी, फिर सहदेव तब नकुल और तदनन्तर अर्जुन और भीम भी पृथ्वी पर गिर पड़े । इससे राजा युधिष्ठिर शोकातुर हो गये ॥१३ ॥
१ क. ङ. च. ' प्रमायाव्य ' । २ क. ङ. च. ' हनत्कु ' । ३ ख. ग. स्वर्निवा । ४ क. ' तालात्स्वर्ग । ५ क. ' नातद्द्वार ' । ६ ङ. च ' र्लकुटायु ' । ७ घ. ' य स भ्रा । ङ. ' व्य सद्भ्रात्रे । ८ घ. दानं चाश्रो ' । ९ ग. प्रास्थानं । क. ' स्थान ' । १० क. ग. ' रानन्ततां ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १०६ इन्द्रानीतरथारूढः सानुजः स्वर्गमाप्तवान् ॥ दृष्ट्वा दुर्योधनादींश्च वासुदेवं च हर्षितः ॥ १४ ॥
एतत्ते भारतं प्रोक्तं यः पठेत्स दिवं व्रजेत् ॥१५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये पाण्डवप्रास्थानिकपर्ववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः बुद्धावतारवर्णनम् अग्निरुवाच वक्ष्ये बुद्धावतारं च पठतः शृण्वतोऽर्थदम् । पुरा दे ( दै ) वासुरे युद्धे दैत्यैर्देवाः पराजिताः ॥ १ ॥
रक्ष रक्षेति शरणं वदन्तो जग्मुरीश्वरम् । मायामोहस्वरूपोऽसौ शुद्धोदनसुतोऽभवत् ॥२ ॥
मोहयामास दैत्यांस्तांस्त्याजिता वेदधर्मकम् । ते च बौद्धा बभूवुर्हि तेभ्योऽन्ये वेदवर्जिताः ॥ ३ ॥
( ' आर्हतः सोऽभवत्पश्चादार्हतानकरोत्परान् । एवं पाषण्डिनो जाता वेदधर्मादिवर्जिताः || ४ | | ) नरकार्हं कर्म चक्रुर्ग्रहीष्यन्त्यधमादपि । सर्वे कलियुगान्ते तु भविष्यन्ति च सङ्कराः ॥५ ॥
इन्द्र के लाये हुए विमान से युधिष्ठिर भाइयों के साथ स्वर्ग चले गये । वहाँ पर दुर्योधन आदि तथा कृष्ण को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए । इस प्रकार मैंने तुमको महाभारत की कथा सुना दी है । जो व्यक्ति इस आख्यान का पाठ करता है, वह स्वर्ग को चला जाता है ॥१४-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पाण्डव प्रास्थानिक पर्व वर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१५ ॥
अध्याय १६ बुद्धावतार वर्णन अग्नि बोले - अब मैं बुद्धावतार का वर्णन करूँगा, जो पढ़ने और सुननेवालों का देवताओं का अभीष्टदाता है । प्राचीनकाल में देवासुर संग्राम में दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर दिया था ॥१ ॥ तब ' बचाइये! ' ' बचाइये! '
कहते हुए देवता लोग ईश्वर की शरण में गये । माया - मोह - स्वरूप भगवान् ( विष्णु ) शुद्धोदन - पुत्ररूप में अवतरित हुए ॥२ ॥ उन्होंने दैत्यों को मोहित करके वैदिक धर्म से विमुख कर दिया । वे दैत्य ही बौद्ध हो गये । फिर उन्होंने
दूसरे लोगों से भी वेदधर्म का त्याग करवाया ॥३ ॥ स्वयं अर्हत् ( बौद्ध - जैन साधु ) बनकर फिर उन अन्य लोगों
को भी अर्हत् बना लिया, जो वैदिक धर्म पर विश्वास नहीं रखते थे । इस प्रकार वैदिक धर्म से विमुख होकर वे लोग पाखण्डी ( विधर्मी ) बन गये || ४ || ये पाखण्डी सदा ऐसे कर्म किया करते हैं, जो नरक में ले जानेवाले होते हैं । ये लोग अधमों से भी प्रतिग्रह ले लेते हैं । कलियुग के अन्त में सभी वर्णसंकर हो जायँगे ॥५ ॥ सब दस्यु
१ आर्हतः''धर्मादिवर्जिताः ग. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. च. ' न्त्यवमा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA