अग्नि पुराण — पृष्ठ 91–100

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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नवमोऽध्यायः ८७ हनूमानुवाच रामदूतो राघवाय सीतां देहि मरिष्यसि ॥ रामबाणैर्हतः सार्धं लङ्कास्थै राक्षसैर्ध्रुवम् ॥२० ॥

रावणो हन्तुमुद्युक्तो विभीषणनिवारितः । दीपयामास लाङ्गूलं दीप्तपुच्छः स मारुतिः ॥२१ ॥

दग्ध्वा लङ्कां राक्षसानां ' अङ्गदादीन्, अङ्गदाद्यैः दृष्टा सीतेति रामोऽपि कथं दृष्टा त्वया सीता हनूमानब्रवीद्रामं

दृष्ट्वा सीतां प्रणम्य ताम् । समुद्रपारमागम्य दृष्टा सीतेति चाब्रवीत् ॥ २२ ॥

पीत्वा मधुवने मधु । जित्वा दधिमुखादींश्च दृष्ट्वा रामं च तेऽब्रुवन् ॥२३ ॥

हृष्टः पप्रच्छ मारुतिम् ॥२४ ॥

श्रीराम उवाच

किमुवाच च मां प्रति । सीताकथामृतेनेव सिञ्च मां कामवह्निवगम् ॥ २५ ॥

नारद उवाच लङ्घयित्वाब्धिमागतः । सीतां दृष्ट्वा पुरीं दग्ध्वा सीतामणिं गृहाण वै ॥२६ ॥

हत्वा तं रावणं सीतां प्राप्स्यसे राम मा शुचः । गृहीत्वा तं मणि रामो रुरोद विरहातुरः ॥ २७ ॥

मणिं दृष्ट्वा जानकी मे दृष्टा, सीतां नयस्व माम् । तया विना न जीवामि, सुग्रीवाद्यैः प्रबोधितः ॥ २८ ॥

समुद्रतीरं गतवांस्तत्र रामं विभीषणः । गतस्तिरस्कृतो भ्रात्रा रावणेन दुरात्मना ॥ २ ९ ॥ हनुमान् बोले - मैं राम का दूत हूँ । सीता को, राम को लौटा दो अन्यथा तुम निश्चय ही राम के बाणों से लङ्कानिवासी राक्षसों के साथ मार डाले जाओगे || २० || ( यह सुनकर ) रावण ( हनुमान् को ) मारने के लिए तैयार हो गया, परन्तु विभीषण ने उसे रोक दिया । फिर भी रावण ने हनुमान् की पूँछ में आग लगवा दी । अपनी पूँछ को जलती हुई देखकर हनुमान् ने ( उसी से ) राक्षसों की लङ्का को भस्म कर दिया । तत्पश्चात् उन्होंने सीता का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और फिर समुद्र के इस पार आकर अङ्गदादि साथियों को सीता का पता लग जाने का समाचार दिया ॥ २१-२२ ॥ ( इसके बाद ) अङ्गदादि वानरों के साथ मधुवन में आकर मधुपान किया । इन लोगों ने दधिमुख आदि ( वनपालों ) को जीतकर राम से मिलकर कहा - ‘ सीता का पता चल गया है । ' यह सुनकर राम प्रसन्न हो उठे और उन्होंने पवनसुत हनुमान् से पूछा- ॥२३-२४ ॥ श्रीराम बोले - तुमने सीता को कैसे देख लिया है? उसने मेरे लिये क्या कहा है? तुम सीता की अमृततुल्य कथा से ही कामाग्नि में जलते हुए मुझे शीतल करो ॥ २५ ॥

नारद बोले - हनुमान् ने राम से कहा कि सबसे पहले मैं समुद्र को पार करके लङ्का में गया । वहाँ सीता का दर्शन करके लङ्कापुरी को जलाकर भस्म कर दिया । आप सीता जी की दी हुई इस मणि को ले लीजिये ॥२६ ॥ हे राम! आप शोक

न करें क्योंकि आप शीघ्र ही उस रावण को मारकर सीता को प्राप्त कर लेंगे । विरही राम उस मणि को ( हाथ में ) लेकर रोने लगे ॥२७ ॥ आज इस मणि को देखकर मैंने सीता को ही देख लिया है । मुझको सीता के पास ले चलो! मैं उसके बिना

( एक क्षण भी ) जीवित नहीं रह सकता । सुग्रीव आदि ने राम को समझा - बुझा दिया ॥२८ ॥ तत्पश्चात् राम अपनी सेना के

साथ समुद्रतट पर पहुँच गये । वहाँ दुष्ट भाई रावण के द्वारा अपमानित होकर विभीषण राम की शरण में आ गया ॥२९ ॥

१ ख. ग. घ. राक्षसांश्च । २ क. ख. घ. ङ. च. शुच । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 92

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८८ अग्निपुराणम् देहि सीतां त्वमित्युक्तेनासहायवान् । रामो विभीषणं मित्रं लङ्गैश्वर्येऽभ्यषेचयत् ॥३० ॥

रामाय यदा नादात्तदा शरैः । भेदयामास, रामं च उवाचाब्धिः समागत: ॥ ३१ ॥

समुद्रं प्रार्थयन्मार्गं समुद्र उवाच नलेन सेतुं बद्ध्वाऽब्धौ लङ्कां व्रज गम्भीरकः । अहं त्वया कृतः पूर्वं रामोऽपि नलसेतुना || ३२ || कृतेन तरुशैलाद्यैर्गतः पारं महोदधेः । वानरैः स सुवेलस्थः सह लङ्कां ददर्श वै ॥३३ || इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामायणे सुन्दरकाण्डे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः रामायणे युद्धकाण्डम् नारद उवाच रामोक्तश्चाङ्गदो गत्वा रावणं प्राह जानकी । दीयतां राघवायाऽऽशु अन्यथा त्वं मरिष्यसि ॥ १ ॥

रावणो हन्तुमुद्युक्तः ' स आगाद्धतराक्षसः । रामायाऽऽह दशग्रीवो युद्धमेकं तु मन्यते || २ || रामो युद्धाय तच्छ्रुत्वा लङ्कां सकपिराययौ । वानरा हनुमान् मैन्दो द्विविदो जाम्ववान्नलः ॥३ ॥

नीलस्तारोऽङ्गदो धूम्रो सुषेणः केसरी ' गजः । पनसो विनतो रम्भः शरभः " कम्पन बली ॥४ ॥

असहाय विभीषण का अपराध यह था कि उसने रावण से सीता को लौटा देने के लिए कहा था । राम ने विभीषण से मित्रता करके उसका लङ्का के राजा के रूप में अभिषेक कर दिया || ३० || राम के प्रार्थना करने पर भी जब समुद्र ने उन्हें मार्ग नहीं दिया तब उन्होंने बाणों से सागर को बींध डाला । राम के पास आकर समुद्र बोला ॥ ३१ ॥

समुद्र बोला- आप नल के द्वारा सेतु बँधवाकर लङ्का को चले जाइये । हे राम! मुझको तो आपने ही गहरा बनाया है ( अतः मेरी मर्यादा बचाइये ) राम भी नल के द्वारा वृक्षों और शिलाखण्डों से बनाये हुए पुल से वानरों के साथ समुद्र को पार कर गये । सागर - तट पर खड़े होकर सभी ने लङ्कापुरी को देखा ॥३२-३३ ॥ श्री अग्निमहापुराण के रामायणाख्यानान्तर्गत सुन्दरकाण्ड वर्णन नामक नौवाँ अध्याय समाप्त ॥९ ॥

अध्याय १० युद्धकाण्ड - वर्णन नारद बोले - राम के कहने पर अंगद ने रावण के पास जाकर कहा, ' शीघ्र ही सीता राम को दे दो, नहीं तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है ॥१ ॥ यह सुनकर रावण अङ्गद को मारने के लिए तैयार हो गया । अङ्गद राक्षसों का वध करके राम

के निकट आकर कहने लगा - ' रावण तो युद्ध पर ही उतारू है ' ॥२ ॥ उस ( वचन ) को सुनकर राम ( भी ) वानरों के

साथ युद्ध के लिए लङ्का में पहुँच गये । हनुमान्, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, नल, नील, तार, अङ्गद, धूम्र, सुषेण, केसरी, १ घ. ' क्तः सङ्गग्रामोद्ध ' । २ घ. ङ. वानरो । ३ ख. घ. च. केशरी । ४ क. पिनसो । ५ क. सरभः । ६ ख. ग. घ. ङ. क्रथनो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 93

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दशमोऽध्यायः ८ ९ गवाक्षो दधिवक्त्रश्च गवयो ' गन्धमादनः । ३ ( रक्षसां वानराणां च युद्धं सङ्कुलमाबभौ । वानरा राक्षसाञ्जघ्नुर्नखदन्तशिलादिभिः । गिरिशृङ्गेण धूम्राक्षमवधीद्रिपुम् । इन्द्रजिच्छरबन्धाच्च विमुक्तौ रामलक्ष्मणौ । रामः शरैर्जर्जरितं रावणं चाकरोद्रणे ।

कुम्भकर्णः प्रबुद्धोऽथ पीत्वा घटसहस्त्रकम् ।

एते चान्ये च सुग्रीव एतैर्युक्तो ह्यसङ्ख्यकैः ॥५ ॥

राक्षसा वानराञ्जघ्नुः शरशक्तिगदादिभिः ) ॥६ ॥

हस्त्यश्वरथपादातं राक्षसानां बलं हतम् ॥७ ॥

अकम्पनं प्रहस्तं च युध्यन्तं नील आवधीत् ॥८ ॥

तार्क्ष्यसन्दर्शनाद्बाणैर्जघ्रतू राक्षसं बलम् ॥९ ॥

रावणः कुम्भकर्णं च बोधयामास दुःखितः ॥१० ॥

मद्यस्य महिषादीनां भक्षयित्वाऽऽह रावणम् ॥ ११ ॥

कुम्भकर्ण उवाच सीताया हरणं पापं कृतं त्वं हि गुरुर्यतः । अतो गच्छामि युद्धाय रामं हन्मि सवानरम् ॥१२ ॥

नारद उवाच इत्युक्त्वा वानरान् सर्वान् कुम्भकर्णो ममर्द ह । गृहीतस्तेन सुग्रीवः कर्णनासं चकर्त सः ॥१३ ॥

कर्णनासाविहीनोऽसौ भक्षयामास वानरान् । रामोऽथ कुम्भकर्णस्य बाहू चिच्छेद सायकैः ॥१४ ॥

ततः पादौ ततश्छित्वा शिरो भूमौ न्यपातयत् । अथ कुम्भो निकुम्भश्च मकराक्षश्च राक्षसः ॥१५ ॥

महोदरमहापार्श्वो मत्त उन्मत्तराक्षसः । प्रघसो भासकर्णश्च विरूपाक्षश्च सङ्गरें ॥१६ ॥

गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, कम्पन, बली, गवाक्ष, दधिवक्त्र, गवय, गन्धमादन तथा अन्य असंख्य वानरों के साथ सुग्रीव ( भी युद्धक्षेत्र में आ गये ) ॥ ३-५ ॥ राक्षसों और वानरों में घोर युद्ध हुआ । राक्षसों ने वानरों को बाण,, शक्ति और गदा आदि से मारना आरम्भ कर दिया || ६ || वानरों ने राक्षसों को नख, दाँत और पत्थर आदि से प्रहार किया । राक्षसों की सेना जिसमें हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल थे - मारी गयी || ७ || हनुमान् ने पर्वतशिखर के प्रहार से अपने शत्रु धूम्राक्ष को मार डाला । नील ने लड़नेवाले अकम्पन और प्रहस्त का वध कर दिया ॥८ ॥ गरुड़ के दर्शन से मेघनाद

के ( नागपाश रूप ) शरबन्ध से छूटे हुए राम और लक्ष्मण के बाणों ने राक्षसों की सेना का संहार किया ॥९ ॥ राम ने

युद्ध में बाणों से रावण को जर्जर कर डाला । इससे दुःखी होकर रावण ने कुम्भकर्ण को जगाया ॥१० ॥ कुम्भकर्ण ने

हजार घड़े मदिरा का पान करके और भैंसे आदि का मांस खाकर, तृप्त होकर रावण से कहा- ॥११ ॥

कुम्भकर्ण ने कहा - ‘ सीता का हरण करके किया तो तुमने पाप ही है । परन्तु तुम मुझसे बड़े हो इसलिए मैं जाता हूँ और वानरों के सहित राम को मार गिराता हूँ ' ॥१२ ॥

नारद बोले - यह कहकर कुम्भकर्ण सभी वानरों को कुचलने लगा । कुम्भकर्ण के द्वारा पकड़े जाने पर सुग्रीव ने उसका नाक - कान काट लिया ॥१३ ॥ कान और नाक को खोकर उसने बहुत से वानरों को खा डाला, किन्तु ( शीघ्र

ही ) राम ने बाणों से कुम्भकर्ण की दोनों भुजाओं को काट डाला ॥१४ ॥ तदनन्तर उसके दोनों पैरों और सिर को काटकर

भूमि पर गिरा दिया । इसके बाद राम, लक्ष्मण और विभीषण सहित वानरों के द्वारा लड़ाई करते हुए कुम्भ, निकुम्भ, मकराक्ष, महोदर, महापार्श्व, मत्त, उन्मत्त, प्रघस, भासकर्ण, विरूपाक्ष, देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा, अतिकाय और अन्य १ क. शरया । २ क. पप्ले । ३ राक्षसां “ गदादिभिः पुस्तके नास्ति । ४ ङ. अकल्पनं । ५ अर्थपूरणायात्र " सहस्रकं च ' 1 इत्यध्याहर्तव्यम् । ६ घ. संयुगे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 94

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अग्निपुराणम् ९ ० देवान्तको नरान्तश्च त्रिशिराश्चातिकायकः युध्यमानास्तथा त्वन्ये राक्षसा भुवि पातिताः वरदत्तैर्नागपाशैरोषध्या ' तौ विशल्यकौ हनूमान्धारयामास तत्रागं यत्र संस्थितः शरैरिन्द्रजितं वीरं युद्धे तं तु व्यपातयत् ' अविन्ध्यवारितो राजा रथस्थः सबलो ययौ रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव रामः शस्त्रैस्तमस्त्रैश्च ववर्ष जलदो यथा धनुर्बाहूशिरांस्येव उत्तिष्ठन्ति शिरांसि हि भूतले पातितः सर्वै राक्षसै रुरुदुः स्त्रियः हनूमताऽऽनयद्रामः सीतां शुद्धां गृहीतवान् ब्रह्मणा दशरथेन त्वं विष्णूर राक्षसमर्दनः । रामेण लक्ष्मणेनैते वानरैः सविभीषणैः ॥१७ ॥

। इन्द्रजिन्मायया युध्यन्रामादीन् स बबन्ध ह ॥१८ ॥

। विशल्ययाऽव्रणौ कृत्वा मारुत्यानीतपर्वते ॥ १ ९ ॥ । निकुम्भिलायां होमादि कुर्वन्तं तं हि लक्ष्मणः ॥ ॥२० २० ॥ ॥ । रावणः शोकसन्तप्तः सीतां हन्तुं समुद्यतः ॥ २१ ॥

। इन्द्रोक्तो मातली रामं रथस्थं प्रचकार तम् ॥२२ ॥

। रावणो वानरान्हन्ति मारुत्याद्याश्च रावणम् ॥२३ ॥

। तस्य ध्वजं स चिच्छेद रथमश्वांश्च सारथिम् ॥ २४ ॥

1 । पैतामहेन हृदयं भित्त्वा रामेण रावणः ॥ २५ ॥

। आश्वास्य तं च संस्कृत्य रामाज्ञप्तो विभीषणः ॥ २६ ॥

॥ रामो वह्नौ प्रविष्टां तां शुद्धामिन्द्रादिभिः " स्तुतः ॥ २७ ॥

। इन्द्रोऽर्थितोऽमृतवृष्ट्या जीवयामास वानरान् ॥ २८ ॥

राक्षस युद्ध में पृथ्वी पर गिरा दिये गये । मेघनाद ( इन्द्रजित् ) ने मायापूर्वक युद्ध करते हुए राम आदि को वरदान में प्राप्त नागपाश से बाँध लिया ॥१५-१८ ॥ वहाँ के वैद्य सुषेण ने विशल्या ( नामक अस्त्र - विशेष ) से दोनों के अंग में से टूटे हुए बाण को निकालकर हनुमान् द्वारा लाये हुए पर्वत की ओषधि से घावों को ठीक कर दिया ॥१९ ॥ तत्पश्चात् हनुमान्

ने उस पर्वत को, जहाँ पहले था, वहीं रख दिया । निकुम्भिला में होम आदि क्रिया करनेवाले वीर मेघनाद को लक्ष्मण ने लड़ाई में बाणों से मार गिराया । इससे शोकसन्तप्त होकर रावण सीता को मारने के लिए तैयार हो गया ॥२०-२१ ॥ अविन्ध्य ने उसको समझाकर शान्त कर दिया । तत्पश्चात् रावण स्वयं रथ पर चढ़कर सैनिकों के साथ रणक्षेत्र में गया । इन्द्र के कहने पर मातलि ने राम को अपने रथ पर बैठा लिया ॥२२ ॥ राम - रावण का युद्ध तो राम और रावण के युद्ध

के समान ही था । रावण वानरों को मारता था और हनुमान् आदि रावण को मारते थे || २३ || राम ने रावण के ऊपर उसी प्रकार शस्त्रास्त्रों की वर्षा की जैसे मेघ जलवृष्टि करता है । उन्होंने रावण की ध्वजा को काट गिराया तथा रथ, घोड़े और सारथि को मार गिराया ॥२४ ॥ जैसे - जैसे राम रावण की भुजाओं और सिरों को काटते जाते थे, वैसे - वैसे

उसके ( बाहु और ) सिर उत्पन्न होते जाते थे । अन्त में ब्रह्मास्त्र से उसके हृदय को बींधकर राम ने रावण को भूमितल पर गिरा दिया । यह देखकर राक्षस और राक्षसियाँ सभी विलाप करने लगे । राम की आज्ञा से विभीषण ने सबको समझा - बुझाकर शान्त किया और उस ( मृतक रावण ) का ( अग्नि ) संस्कार किया ॥२५-२६ ॥ राम ने हनुमान् के द्वारा सीता को बुलवाया और अग्नि में प्रविष्ट सीता को शुद्ध - चरित्र समझकर पुनः अपना लिया । इन्द्रादि देवताओं, ब्रह्मा और दशरथ ने राम की स्तुति की और प्रशंसा करते हुए कहने लगे कि तुम राक्षसों का सर्वनाश करनेवाले विष्णु हो ॥२७-२७ ॥ प्रार्थना किये जाने पर इन्द्र ने अमृतवर्षा की जिससे ( सब मरे हुए ) वानर फिर जीवित हो उठे ॥२८ ॥

१ ग. घ. च. ‘ गबाणैरो ’ । २ क. च. विशल्यया वर्णकृतौ मा । ख. ग. विशल्यया वर्णकृता मा । ङ. विशिल्यादाय वर्णतो मा ' । ३ क. ङ. च. तद्रागं यत्र संस्थितम् । ख. गं. तद्रामं यत्र संस्थितम् । ४ ङ. ' दि कर्तु हर्तुं समुद्य ' । ५ ग. वीर्यं । ६ च. “ द्धे युद्धे व्य ' । ७ ख. घ. व्यशातयत् । ८ क. च. ' तां तां हन्तुमु ' । ९ ग. अवन्ध्य ' । १० ङ. शुद्धिं । ११ च. ' भिस्ततः । १२ क. ङ. विष्णुना राक्षसार्दन । इ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 95

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एकादशोऽध्यायः ९ १ रामेण पूजिता जग्मुर्युद्धं दृष्ट्वा दिवं च ते । रामो विभीषणायादाल्लङ्कामभ्यर्च्य वानरान् ॥ २ ९ ॥ ससीतः पुष्पके स्थित्वा ' गतमार्गेण वै गतः । दर्शयन् वनदुर्गाणि सीतायै हृष्टमानसः॥३० ॥

भरद्वाजं नमस्कृत्य नन्दिग्रामं समागतः । भरतेन नतश्चागादयोध्यां तत्र संस्थितः ॥ ३१ ॥

वसिष्ठादीन्नमस्कृत्य कौशल्यां चैव कैकयीम् । सुमित्रां प्राप्तराज्योऽथ ( द्विजादीन् सोऽभ्यपूजयत् ॥३२ ॥

वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत् । सर्वदानानि स ददौ पालयामास पुत्रवद्धर्मकामादीन् ) दुष्टनिग्रहणे रतः । सर्वो धर्मपरो लोकः सर्वसस्या नाकालमरणं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामायणे युद्धकाण्डे दशमोऽध्यायः ॥ १० अथैकादशोऽध्यायः रामायण - उत्तरकाण्डम् नारद उवाच राज्यस्थं राघवं जग्मुरगस्त्याद्याः सुपूजिताः स प्रजाः ॥ ३३ ॥

च मेदिनी ॥ ३४ ॥

॥३५ ॥

॥ ॥१ ॥

तदनन्तर ( राम और रावण के युद्ध को देखकर और राम से सम्मानित होकर वे स्वर्ग चले गये । राम ने विभीषण को लंका ( का राज्य ) दे दिया । वानरों का सत्कार करके, सीता के सहित पुष्पक विमान पर बैठकर जिस मार्ग से गये थे, उसी मार्ग से लौट पड़े । राम अत्यन्त प्रसन्न थे और मार्ग में सीता को वन में दुर्गम पथों को दिखाते हुए चले जा रहे थे ॥२९ -३० ॥ भरद्वाज को प्रणाम करके राम नन्दिग्राम पहुँचे । यहाँ भरत ने नम्रतापूर्वक उनको प्रणाम किया । वहाँ से चलकर सभी लोग अयोध्या में आकर रुक गये । राज्य प्राप्त कर लेने पर राम ने वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा आदि को प्रणाम किया ( और ) ब्राह्मणों की पूजा की ॥ ३१-३२ ॥ भगवान् राम ने अश्वमेध यज्ञों के द्वारा आत्मस्वरूप भगवान् वासुदेव की पूजा की । उन्होंने सब तरह का दान दिया ( और ) प्रजाओं का पुत्रवत् पालन किया । भगवान् राम धर्म काम आदि पुरुषार्थों का पालन करते हुए दुष्टों का निग्रह करने में लग गये ॥३३-३३३ ॥ भगवान् राम जब राज्य पर शासन कर रहे थे, सभी लोग धर्मपरायण थे । पृथ्वी सब प्रकार के थी और किसी की अकाल - मृत्यु नहीं होती थी ॥३४-३५ ॥ श्री अग्निमहापुराण के रामायणाख्यानान्तर्गत युद्धकाण्डवर्णन नामक दसवाँ अध्याय अध्याय ११ उत्तरकाण्डवर्णन नारद बोले - राम के सिंहासनासीन होने पर सम्मानित अगस्त्य आदि ऋषि राम के १ घ. पुस्तकस्थटिप्पण्यां ' स्वर्गमार्गेण वै गतः ' इति पाठो वर्तते । २ क. ङ. च. न गत | नास्ति ङ. पुस्तके । ४ क. ' वं सुखात्मा ' । ' व ' युध्यमान । धन - धान्य से भरी - पूरी समाप्त ॥१० ॥

पास गये ॥१ ॥

३ द्विजादीन् “ कामादीन् CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 96

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अग्निपुराणम् ९ २ ऋषय ऊचुः धन्यस्त्वं विजयी यस्मादिन्द्रजिद्विनिपातितः । ब्रह्मात्मजः पुलस्त्योऽभूद्विश्रवास्तस्य कैकसी ॥२ ॥

तत्पुत्रोऽभूद्धनेश्वरः । कैकस्यां रावणो जज्ञे विंशद्बाहुर्दशाननः ॥३ ॥

' पुष्पोत्कटाऽभूत्प्रथमा ब्रह्मदत्तेन वरेण जितदैवतः । कुम्भकर्णः सनिद्रोऽभूद्धर्मिष्ठोऽभूद्विभीषणः || ४ || तपसा शूर्पणखा तेषां रावणान्मेघनादकः । इन्द्रं जित्वेन्द्रजिच्चाभूद्रावणादधिको बली । स्वसा हतस्त्वया ' लक्ष्मणेन देवादेः क्षेममिच्छता ॥५ ॥

नारद उवाच इत्युक्त्वा ते गता विप्रा अगस्त्याद्या नमस्कृताः । देवप्रार्थितरामोक्तः शत्रुघ्न लवणार्दनः ॥६ ॥

अभूत्पूर्मथुरा काचिद्रामोक्तो भरतोऽवधीत् । कोटित्रयं च शैलूषपुत्राणां निशितैः शरैः ॥७ ॥

शैलूषं दृप्तगन्धर्व ' सिन्धुतीरनिवासिनम् । तक्षं च पुष्करं पुत्रं स्थापयित्वाऽथ देशयोः || ८ ॥ भरतोऽगात्सशत्रुघ्नो राघवं पूजयन् स्थितः । रामो दुष्टान्निहत्याजौ शिष्टान्सम्पाल्य मानवः ५ ॥९ ॥

पुत्रौ कुशलवौ जातौ वाल्मीकेराश्रमे वरौ । लोकापवादात्त्यक्तायां ज्ञातौ सुचरितश्रवात् ॥१० ॥

राज्येऽभिषिच्य ब्रह्माऽहमस्मीति ध्यानतत्परः । दश वर्षसहस्त्राणि दश वर्षशतानि च ॥ ११ ॥

ऋषि बोले - हे राम! तुम धन्य हो, तुम सर्वश्रेष्ठ विजेता हो, क्योंकि तुमने मेघनाद - जैसे इन्द्र विजयी योद्धा का वध किया है । ब्रह्मा के पुत्र थे पुलस्त्य । उनका पुत्र था विश्रवा । विश्रवा की कैकसी और पुष्पोत्कटा दो पत्नियाँ थीं । पुष्पोत्कटा से उसको धनेश्वर ( कुबेर ) नामक पुत्र हुआ । कैकसी से रावण उत्पन्न हुआ, जिसके बीस भुजाएँ और दस सिर थे । रावण ने तपस्या के द्वारा ब्रह्मा से वर प्राप्त करके सब देवताओं को जीत लिया था ॥२-३ ॥ कैकसी का दूसरा पुत्र था कुम्भकर्ण जो बहुत सोनेवाला था । तीसरा पुत्र था विभीषण, जो धर्मनिष्ठ था । इसके एक बहन थी शूर्पणखा । रावण का पुत्र मेघनाद हुआ ॥४-४ ॥ मेघनाद ने इन्द्र को जीतकर इन्द्रजित् की उपाधि प्राप्त की थी । वह रावण से भी अधिक बलशाली था । देवता इत्यादि के कल्याण की कामना से आपने लक्ष्मण द्वारा उसका वध करा दिया ॥५ ॥

नारद बोले- -यह कहकर अगस्त्य इत्यादि ऋषि अभिवादन प्राप्त कर चले गये । देवताओं की प्रार्थना पर राम ने शत्रुघ्न को देखकर लवणासुर के वध के लिए भेजा । शत्रुघ्न ने उसका वध किया ॥६ ॥ उस समय मथुरा नाम की

एक नगरी थी । राम के आदेश से भरत ने वहाँ जाकर तीन करोड़ शैलूष पुत्रों को अपने तीक्ष्ण बाणों से मार डाला ॥७ ॥

सिन्धु - तटवासी उद्धत गन्धर्व और शैलूष को मारकर उनके देशों के राज्यसिंहासन पर उनके पुत्र तक्ष और पुष्कर को बैठाया । तदनन्तर शत्रुघ्न के सहित भरत अयोध्या को लौट गये, जहाँ वे राम की सेवा में रहने लगे । मानव शरीरधारी ` राम युद्ध में दुष्टों को मारते थे एवं सज्जनों का पालन करते थे ॥८ - ९ ॥ लोकापवाद के कारण निर्वासित जानकी के गर्भ से वाल्मीकि के श्रेष्ठ आश्रम में कुश, लव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । तत्पश्चात् सीता की सच्चरित्रता को सुनकर राम ने अपने दोनों पुत्रों को पहचाना और उन्हें राज्यसिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया । ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसे ध्यान में लगे १ पौलस्त्यस्य विश्रवसो द्वे भार्ये, एका कैकसी अन्या पुष्पोत्कटा, तयोः पुष्पोत्कटा प्रथमा, तस्यां कुबेरोऽजीजनदन्यस्यां रावणादय इत्ययमस्य श्लोकस्यार्थः । २ क. हतः स्वयं ल ' । च. हतस्त्वयं ल ' । ३ क. रा काशी रामो । ङ. च. ‘ राकारा रामो । ४ घ. च. दुष्टगन्धर्वं । ५ दानतः ( मू ० पा ० ) । ख. ग. घ. मानवः । च. दानदः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 97

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द्वादशोऽध्यायः ९ ३ राज्यं कृत्वा ' क्रतून् कृत्वा स्वर्गं देवार्थितो ययौ । सपौरः सानुजः, सीतापुत्रो ' जनपदान्वितः ॥१२ ॥

अग्निरुवाच वाल्मीकिर्नारदाच्छुत्वा रामायणमकारयत् ॥ सविस्तरं य एतच्च शृणुयात्स दिवं व्रजेत् ॥१३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामायण उत्तरकाण्ड एकादशोऽध्यायः ॥११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः कृष्णावतारकथावर्णनम् अग्निरुवाच हरिवंशं प्रवक्ष्यामि विष्णुनाभ्यम्बुजादजः । ब्रह्मणोऽत्रिस्ततः सोमः सोमाज्जातः पुरूरवाः ॥ १ ॥

तस्मादायुरभूत्तस्मान्नहुषोऽतो ययातिकः । यदुं च तुर्वसुं तस्माद्देवयानी व्यजायत ॥२ ॥

द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । यदोः कुले यादवाश्च वासुदेवस्तदुत्तमः ॥३ ॥

भुवो भारावतारार्थं देवक्यां वसुदेवतः । हिरण्यकशिपोः पुत्राः षड्गर्भा योगनिद्रया || ४ || हुए राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक शासन किया । उन्होंने बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया । देवताओं की प्रार्थना पर राम सभी पुरवासियों और भाइयों के साथ स्वर्ग चले गये । पुरवासियों, अनुजों एवं जनपदवासियों समेत सीता - पुत्र लव और कुश राज्य सँभालने लगे ॥१०-१२ ॥ अग्नि बोले- ( देवर्षि ) नारद के मुख से राम - कथा को सुनकर वाल्मीकि ने विस्तारपूर्वक रामायण की रचना की । जो इनको सुनता है वह अवश्य ही स्वर्ग चला जाता है ॥१३ ॥

श्री अग्निमहापुराण के रामायणान्तर्गत उत्तरकाण्डवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११ ॥

अध्याय १२ कृष्णावतार वर्णन अग्नि बोले - अब मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा । विष्णु की नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई । ब्रह्मा से अत्रि और अत्रि से चन्द्रमा उत्पन्न हुए तथा चन्द्रमा से पुरूरवा उत्पन्न हुए || १ || पुरूरवा के पुत्र आयु और आयु के नहुष हुए । नहुष के पुत्र ययाति हुए । ययाति से देवयानी ने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रों को जन्म दिया ॥२ ॥ वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने ययाति से द्रुह्य, अनु और पुरु नामक पुत्रों को जन्म दिया । यदु के वंशज

यादव कहलाये । उनमें वासुदेव सबसे उत्तम हुए || ३ || वे भगवान् वासुदेव पृथ्वी के ( पाप का ) बोझ उतारने के लिए पिता वसुदेव तथा माता देवकी के गर्भ से ( अवतरित हुए ) । कृष्णजन्म के पूर्व विष्णु की प्रेरणा से योगनिद्रा १ क. च. दत्त्वा । २ ङ. स्वर्गे । ३ घ ङ च. देवार्चितो । ४ क. ङ. च. ' दास्थितः । ५ राज्यं चकारेति शेषोऽर्थः । ६ अजीजनदिति शेषः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अग्निपुराणम् ९ ४ गर्भो देवक्या जठराद्बलः ॥ ५ ॥

विष्णुप्रयुक्तया नीता देवकीजठरं पुरा ॥ अभूच्च सप्तमो हरिः । कृष्णाष्टम्यां च ' नभसि अर्द्धरात्रे चतुर्भुजः ॥ ६ ॥

सङ्क्रामितोऽभूद्रोहिण्यां रौहिणेयस्ततो कंसभयाद्यशोदाशयनेऽनयत् ॥७ ॥

देवक्या वसुदेवेन स्तुतो बालो द्विबाहुकः । वसुदेवः तां चिक्षेप शिलातले ॥ ८ ॥

गृह्य देवकीशयनेऽनयत् । कंसो बालध्वनिं श्रुत्वा यशोदाबालिकां मम । श्रुत्वाऽशरीरिणीं वाचमतो गर्भांस्तु मारिताः ४ ॥ ९ ॥

वारितोऽपि स देवक्या ' मृत्युर्गर्भोऽष्टमो ॥१० ॥

साक्षिप्ता बालिका कंसमाकाशस्याऽब्रवीदिदम् बालिकोवाच मया क्षिप्तया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति । सर्वस्वभूतो देवानां देवानां भूभारहरणाय ' सः ॥११ ॥

किं अग्निरुवाच सा च शुम्भादीन्हत्वा इन्द्रेण च स्तुता । आर्या दुर्गा देवगर्भा अम्बिका भद्रकाल्यपि ॥ १२ ॥

इत्युक्त्वा क्षेम्या क्षेमकरी नैकबाहुर्नमामि ताम् । त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नाम सर्वकामान्स ' चाऽऽप्नुयात् ॥ १३ ॥

भद्रा पूतनादींश्च ' प्रेषयद्बालनाशने । यशोदापतिनन्दाय वसुदेवेन चार्पितौ ॥१४ ॥

कंसोऽपि

च कंसादेर्भीतेनैव हि गोकुले । रामकृष्णौ चेरतुस्तौ गोभिर्गोपालकैः सह ॥ १५ ॥

रक्षणाय हिरण्यकशिपु के छह पुत्रों को देवकी के गर्भ में लायी थी । सातवीं बार देवकी के गर्भ से बलराम उत्पन्न हुए जिसको माया ने रोहिणी के गर्भ में रख दिया । इसलिए वे रौहिणेय ( रोहिणीपुत्र ) कहलाये ॥४-५३ ॥ तदनन्तर भाद्रपद की कृष्णाष्टमी की अर्द्धरात्रि के समय चतुर्भुज रूप में भगवान् कृष्ण प्रकट हुए । देवकी और वसुदेव के द्वारा स्तुति किये जाने पर वे दो भुजावाले बालक बन गये । वसुदेव ने कंस के भय से कृष्ण को यशोदा की शय्या पर पहुँचा दिया ॥६-७ ॥ वसुदेव जी ने यशोदा की कन्या को लाकर देवकी की शय्या पर रख दिया । कंस ने शिशु का रोना सुनकर उसे शिलातल पर पटक दिया || ८ || देवकी कंस को बार - बार मना कर रही थी । कंस ने कहा कि ‘ आठवाँ गर्भ मेरा काल होगा'- इस आकाशवाणी को सुनकर ही मैंने तुम्हारे पुत्रों की हत्या की है । कंस के द्वारा फेंकी जाने पर वह बालिका आकाश में जाकर कंस से कहने लगी ॥ ९ -१० ॥ बालिका बोली - रे कंस, मुझे ( इस प्रकार ) फेंकने से क्या? तेरा वध करनेवाला तो ( पहले ही ) उत्पन्न हो चुका है । वह देवताओं का सर्वस्व है और पृथ्वी के भार को हटाने के लिए उत्पन्न हुआ है ॥११ ॥

अग्नि बोले - इस प्रकार कहकर और शुम्भ आदि राक्षसों का वध करके वह देवी इन्द्र के द्वारा इस प्रकार पूजित हुई – ‘ आर्या, दुर्गा, देवगर्भा ( वेदगर्भा ), अम्बिका, भद्रकाली, भद्रा, क्षेम्या, क्षेमकरी, नैकबाहु आदि नामोंवाली हे देवि! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ । जो व्यक्ति तीनों सन्ध्याओं में इन नामों का पाठ करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं ॥१२-१३ ॥ कंस ने भी उस शिशु का नाश करने के लिए पूतना इत्यादि को भेजा । कंस आदि से डरे हुए वसुदेव ने गोकुल में यशोदापति नन्द को अपने दोनों लड़के सौंप दिये । सम्पूर्ण जगत् का पालन करनेवाले बलराम और कृष्ण ग्वाल - बालों के साथ गायों को चराते हुए स्वयं गोपाल बन गये ॥१४-१५३ ॥ एक बार यशोदा ने खीझकर कृष्ण को १ ' कृष्णाष्टम्यां नभस्ते तु इति पाठः साधीयान् स्यात्? अत्र मूलपाठः चिन्त्यः? २ ग. ' क्या विवाहसमयेरितः । सा । ३ घ. वाचं मत्तो ग ° । ४ घ, ताः । ५ समर्पितास्तु देवक्या विवाहसमयेरिताः । सा । ६ ख. घ. वेदगर्भा । ७ ख. ग. घ. ' मानवाप्नुया ' । ८ घ. ' दींश्चाप्रे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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द्वादशोऽध्यायः ९ ५ सर्वस्य जगतः पालौ गोपालौ तौ बभूवतुः यमलार्जुनमध्येऽगाद् भग्नौ च यमलार्जुनौ । पूतना स्तनपानेन साहता हन्तुमुद्यता जित्वा निःसार्य चाब्धिस्थं चकार बलसंस्तुतः । अरिष्टवृषभं हत्वा केशिनं हयरूपिणम् । पर्वतं धारयित्वा च शक्राद् वृष्टिर्निवारिता । इन्द्रोत्सवस्तु तुष्टेन भूयः कृष्णेन कारितः । गोपीभिरनुरक्ताभिः क्रीडिताभिर्निरीक्षितः । सह रामेण मालाभृन्मालाकारे ' वरं ददौ ।

मत्तं कुवलयापीडं द्वारि रङ्गं प्रविश्य च ।

चक्रे चाणूरमल्लेन मुष्टिकेन बलोऽकरोत् ॥

। कृष्णश्चोलूखले बद्धो दाम्ना व्यग्रयशोदया ॥१६ ॥

परिवृत्तश्च शकट: पादक्षेपात्स्तनार्थिना ॥१७ ॥

। वृन्दावनगतः कृष्णः कालियं यमुनाह्रदात् ॥१८ ॥

क्षेमं तालवनं चक्रे हत्वा धेनुकगर्दभम् ॥१९ ॥

शक्रोत्सवं परित्यज्य कारितो गोत्रयज्ञकः ॥२० ॥

नमस्कृतो ' महेन्द्रेण गोविन्दोऽथार्जुनोऽर्पितः ॥ २१ ॥

रथस्थो मथुरां चागात्कंसोक्ताक्रूरसंस्तुतः ॥२२ ॥

रजकं चाप्रयच्छन्तं हत्वा वस्त्राणि सोऽग्रहीत् ॥ २३ ॥

दत्तानुलेपनां कुब्जामृजुं ' चक्रेऽहनद्गजम् ॥२४ ॥

कंसादीनां पश्यतां च मञ्चस्थाने ' नियुद्धकम् ॥२५ ॥

चाणूरमुष्टिको ताभ्यां हतौ मल्लौ तथाऽपरे ॥ २६ ॥

रस्सी से ओखली में बाँध दिया । कृष्ण ( धीरे - धीरे ) यमलार्जुन वृक्षों के बीच से निकले जिससे वे दोनों वृक्ष उखड़ गये । कृष्ण ने शकटासुर को चरणों के आघात से नष्ट कर दिया ॥१६-१७ ॥ पूतना ने स्तनपान के लिए उत्सुक कृष्ण को अपने विषाक्त स्तनों को पिलाकर मारना चाहा, किन्तु कृष्ण ने उसके स्तनों को पीते - पीते उसे ही मार डाला । वृन्दावन में जाकर कृष्ण ने कालिय नाग को यमुना के गर्त से निकालकर सागर में डाल दिया, जिससे बलदेव ने उनकी ( इस अद्भुत कार्य के लिए ) प्रशंसा की । धेनुकासुर को मारकर उन्होंने तालवन को बाधाओं से मुक्त कर दिया ॥१८-१९ ॥ बैल का रूप धारण करनेवाले अरिष्टासुर को ( और ) घोड़े का रूप धारण करनेवाले केशी को मारकर भगवान् कृष्ण ने इंन्द्रोत्सव को बन्द कराकर ( गोवर्धन ) पर्वत के पूजन की प्रथा चला दी || २० || गोवर्धन पर्वत को उठाकर उन्होंने ( कुपित ) इन्द्र के कोप से उत्पन्न वृष्टि से व्रजवासियों को बचा लिया । महेन्द्र ने गोविन्द को प्रणाम किया, अर्जुन ने भगवान् की शरण में आत्मसमर्पण किया ॥ २१ ॥ सन्तुष्ट होकर भगवान् कृष्ण ने पुनः इन्द्रोत्सव की परम्परा चला दी ।

कंस के भेजे हुए दूत अक्रूर के द्वारा निमन्त्रण पाकर कृष्ण रथ पर सवार होकर मथुरा को चल दिये ॥ २२ ॥ ( जाते

समय ) साथ - साथ क्रीड़ा करनेवाली, प्रेम करनेवाली गोपियों के द्वारा देखे गये भगवान् कृष्ण ( गोकुल से मथुरा चले गये ) । ( कृष्ण ने मथुरा में ) एक धोबी को मार डाला । क्योंकि उसने माँगने पर वस्त्रों को नहीं दिया था । तदनन्तर उन्होंने उससे वस्त्रों को ले लिया || २३ || बलराम के सहित स्वयं उन वस्त्रों को पहनकर आगे बढ़ गये । एक माली से माला माँगकर उन्होंने माला पहन ली और उसे इष्ट वरदान देकर सन्तुष्ट किया । ( चन्दनादि ) लेप ( सामग्री ) प्रदान करनेवाली कुबड़ी को सीधी कर दिया । राजद्वार पर जाकर मतवाले ( मार्गावरोधक ) कुवलयापीड हाथी को मार गिराया । फिर रंगभूमि में जाकर कंस आदि राक्षसों के सामने मञ्चस्थान पर चाणूर नामक असुर मल्ल से मल्लयुद्ध करने लगे । बलराम मुष्टिक से भिड़ गये । अन्त में बलराम और कृष्ण ने चाणूर, मुष्टिक तथा अन्य असुर मल्लों को मार गिराया ॥२४-२६ ॥ १ क. ख. ग. ङ. च. नमस्कृत्य । २ ख. ङ. च. ' गोविन्देऽथाऽ ' । ३ ' च प्रजल्पन्तं ' इति घ. पुस्तक - टिप्पणीस्थः पाठः । ४ ख. घ. ङ. च. ' णि चाग्र । ५ क. ख. ग. ङ. च. ' लाभून्मा ' । ६ ङ. धनं । ७ क. ङ. च. ' क्रे हरिः कुजम् । ८ घ. मञ्चस्थानां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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९ ६ अग्निपुराणम् मथुराधिपतिं कंसं हत्वा तत्पितरं हरिः जरासन्धस्य ते पुत्र्यौ जरासन्धस्तदीरितः रामकृष्णौ च मथुरां त्यक्त्वा गोमन्तमागतौ पुरीं तु द्वारकां कृत्वा न्यवसद्यादवैर्वृतः देवगन्धर्वयक्षाणां ता उवाह जनार्दनः सत्यभामासमायुक्तो गरुडे नरकार्दनः पारिजातं समानीय सत्यभामागृहेऽकरोत् जित्वा पञ्चजनं दैत्यं यमेन च सुपूजितः वसुदेवं देवकीं च भक्तविप्रांश्च सोऽर्चयत् कृष्णात्साम्बो ' जाम्बवत्यामन्यास्वन्येऽभवन्सुताः प्रद्युम्नोऽभूच्च रुक्मिण्यां षष्ठेऽह्नि स हृतो बलात् शम्बरेणाम्बुधौ क्षिप्तो मत्स्यो जग्राह, धीवरः । चक्रे यादवराजानमस्तिप्राप्ती च कंसगे ॥ २७ ॥

। चक्रे स मथुरारोधं यादवैर्युयुधे शरैः ॥ २८ ॥

। जरासन्धं विजित्याऽऽजौ पौण्ड्रकं वासुदेवकम् ॥२९ ॥

। भौमं तु नरकं हत्वा तेनाऽऽनीताश्च कन्यकाः ॥३० ॥

। षोडश स्त्रीसहस्त्राणि रुक्मिण्याद्यास्तथाऽष्ट च ॥३१ ॥

। मणिशैलं सरत्नं च इन्द्रं जित्वा हरिर्दिवि ॥ ३२ ॥

। सान्दीपनेश्च ' शस्त्रास्त्रं ज्ञात्वा तद्बालकं ददौ ॥ ३३ ॥

। अवधीत्कालयवनं मुचुकुन्देन पूजितः ॥ ३४ ॥

। रेवत्यां बलभद्राच्च जज्ञाते निषधोल्मुक ॥ ३५ ॥

॥।३६ ॥ । तं मत्स्यं शम्बरायादान्मायावत्यै च शम्बरः ॥ ३७ ॥

मायावती मत्स्यमध्ये दृष्ट्वा स्वं पतिमादरात् । पुपोष सा तं ' चोवाच रतिस्तेऽहं पतिर्मम ॥ ३८ ॥

मथुराधिपति कंस को मारकर कृष्ण ने उसके पिता उग्रसेन को यादवों का राजा बना दिया । जरासन्ध की अस्ति और प्राप्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं, जिनका विवाह कंस से हुआ था । उनके कहने पर जरासन्ध ने मथुरा को चारों ओर से घेरकर बाणों से यादवों के साथ युद्ध किया ॥ २७-२८ ॥ राम और कृष्ण मथुरा को छोड़कर गोमन्त पर्वत पर चले गये । बाद में भगवान् कृष्ण ने जरासन्ध को पराजित किया । वासुदेव ( बननेवाले ) पौण्ड्रक को ( भगवान् ने मारा । ) ॥२९ ॥

द्वारका नाम की एक नयी नगरी बसाकर कृष्ण यादवों के साथ वहाँ रहने लगे । उसके बाद ( कामरूप के राजा ) भौम-नरकासुर का वध करके वहाँ से देव, गन्धर्व और यक्षों की अनेक कन्याओं को ( छुड़ाकर ) ले आये और उनसे विवाह कर लिया । इस प्रकार उनकी सोलह हजार स्त्रियाँ हो गयीं । इनके अतिरिक्त रुक्मिणी आदि आठ पटरानियाँ और भी थीं ॥ ३०-३१ ॥ एक बार नरकान्तक श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर देवलोक में गये । वहाँ पर उन्होंने इन्द्र को पराजित करके मणिशैल और अनेक बहुमूल्य रत्नों के साथ पारिजात का अपहरण करके सत्यभामा के अन्तःपुर में रख दिया । कृष्ण ने सान्दीपनि गुरु से शस्त्रास्त्रों की शिक्षा लेकर गुरुदक्षिणा में उनके ( मृत ) बालक को लाकर दे दिया ॥३२-३३ ॥ उन्होंने पञ्चजन को जीता और फिर यम के द्वारा भगवान् की सम्यक् रूप से पूजा की गयी । भगवान् ने कालयवन का वध किया और मुचुकुन्द से सम्मान प्राप्त किया || ३४ || कृष्ण ने वसुदेव, देवकी, भक्तों और ब्राह्मणों का आदर - सत्कार किया । बलभद्र से रेवती ने निषध और उल्मुक नामक दो पुत्रों को जन्म दिया ॥३५ ॥

कृष्ण ने जाम्बवती से साम्ब को जन्म दिया । अन्य स्त्रियों से भी अनेक पुत्र हुए । रुक्मिणी से प्रद्युम्न का जन्म हुआ । जन्म के छठे दिन शम्बर ने बलात् उसका अपहरण करके समुद्र में फेंक दिया । वहाँ उसे एक मत्स्य निगल गया । उस मछली को एक कछुए ने पकड़ा । वह मछली शम्बर को उपहार में दी गयी । शम्बर ने उसे मायावती को दे दिया । मायावती ने मछली के पेट में ( बालक के रूप में आये हुए ) अपने पति को देखकर आदरपूर्वक उसका पालन - पोषण किया । ( बड़े होने पर ) मायावती ने उससे कहा - ' तुम मेरे पति हो और मैं तुम्हारी पत्नी रति हूँ ' ॥३६-३८ ॥ १ घ. च । २ ग. सान्दीपिने । ङ. सान्दीपनाच्च । ३ च सच्छास्त्रं । ४ ङ. भक्तं वि । ५ क. ख. घ. यज्ञाते । ग. ङ. यज्ञात्ते । च. यज्ञान्ते । ६ ख. ग. घ. निशठोन्मुकौ । ७ घ. ङ. च. ' ष्णाच्छाम्बो ' । ८ ङ. तं प्रोवा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA