अग्नि पुराण — पृष्ठ 1031–1040

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०२७ ' गुरुद्वयात्तु आपीडः ` प्रत्यापीडो रेगणादिकः । प्रथमस्य विपर्यासे मञ्जरी ' लवणी क्रमात् ॥६ ॥

भवेदमृतधाराख्या ' उद्धतेत्युच्यतेऽधुना । ' एकतः ससजसा नः स्युर्नसौ जो गोऽथ भौ न जौ ॥७ ॥

नो गोऽथ सजसा गोगस्तृतीयचरणस्य च । ' सौरभ ' केचन " भगा ललितं च नमौ जसौ ॥८ ॥

उपस्थितं प्रचुपितं प्रथमाद्यौ समौ जसौ " । गोगथो मलजा रो गः समौ च रजयाः पदे ॥९ ॥

वर्धमानं " मली " स्वोन सौ अथो तोजोर ईरिता । शुद्धिविराडार्षभाख्यं वक्ष्ये चार्धसमं ततः ॥ १० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये विषमकथनं नाम द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३२ ॥

किन्तु जहाँ पर दो गुरु चारों पादों के आदि में आते हैं वहाँ पर ' प्रत्यापीड ' नामक छन्द होता है । प्रथम पाद का दूसरे तथा तीसरे पादों के साथ क्रमशः विपर्यास होने पर ' मञ्जरी ', ' लवणी ' और ' अमृतधारा ' इत्यादि छन्द बनते हैं । अब ' उद्धता ' के सम्बन्ध में बताया जा रहा है । ' उद्धता ' छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण और लकार होते हैं; द्वितीय पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु होते हैं, तृतीय पाद में भगण, नगण, जगण, लघु और गुरु होते हैं और चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण, जगण और गुरु होते हैं ॥ ३-७ ॥ ' उद्धता ' के तृतीय पाद में रगण, नगण, भगण और गुरु रहने पर सौरभ नामक छन्द बनता है । उस ( उद्धता ) के तृतीय पाद में नगण, मगण, जगण और सगण रहने पर ललित नामक छन्द बनता है । ' उपस्थित प्रचुपित ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रथम पाद में मगण, सगण, जगण, भगण और दो गुरु होते हैं, द्वितीय पाद में सगण, नगण, जगण, रगण, गुरु होते हैं, तृतीय पाद में तगण, नगण और सगण होते हैं । चतुर्थ पाद में नगण, तगण, नगण, जगण और यगण होते हैं । इस ‘ उपस्थित प्रचुपित ’ छन्द के तृतीय पाद के स्थान पर नगण, नगण, सगण, नगण, नगण और सगण होते हैं । तब वह ‘ वर्द्धमान ' नामक छन्द कहलाता है । उसी ( उपस्थित प्रचुपित नामक छन्द ) के तृतीय पाद के स्थान पर तगण, जगण और रगण होने पर ‘ शुद्ध विराडार्षभ ' नामक छन्द होता है । अब मैं अर्धसमवृत्त के सम्बन्ध में बतलाऊँगा ॥८-१० ॥ श्री अग्निमहापुराण में विषम - कथन नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३२ ॥

१ ख. ग. रुत्वेऽस्य तु आ । २ क. ङ. ' पीडीगकादि । ३ ख. ग. ' णाधिकः । ४ क. ङ. च. नवली । ख. ग. लवनी । ५ ख. ग. उद्गतेत्यु ' । ६ क. ङ. ' तः शजसा नस्युर्नसौ जोग गो जोऽर्थ भोजमौ । नागो । ख. ग. ' तः सजसा नस्युर्नसौ ज्यौ गोऽ ° । ७ ख. ग. लो । ८ क. ङ. सौरभं । ९ ख. ग. ° भे रनभागाललडितौ च नलौ च सौ । १० क. ङ. केचन भयानलितं तत्वशौदशौ । उ ° । ११ ख. ग. जभौ । १२ क. ङ. ' मानौस्तौ च नसौ अथोभ्येयो नद्रीरितम् । शु । १३ ख. ग. तनौ । १४ छ, ' लौ स्वौ न अथो भो जोव ई । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1032

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१०२८ अग्निपुराणम् अथ त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः अर्धसमनिरूपणम् अग्निरुवाच

' उपवित्रकं ' ससमनामथभोज भगामथ । ' द्रुतमध्या ततभगा गथोननजयाः स्मृताः ॥ १ ॥

वेगवती " ससमगा भभभ गोगथो स्मृता । रुद्रविस्तारस्तो सभगासमजा गोगथा स्मृता ॥२ ॥

रजसा गोगथो द्रोणौ गोगौ वै केतुमत्यपि । आख्यानिकी ततजगा गथों जगतजगागथ ॥ ३ ॥

विपरीताख्यानकीर्तिर्जयागा ' तौ जगोगथ । सीमलौगथ " लभभारो भवेद्धरिण ' वल्लभा ॥४ ॥

लौ वनौ गाथ नजजा यः स्यादपराक्रमम् (? ) । पुष्पिताग्रा नलवया नजजा १३ रो गयो १४ जौ ॥ ५ ॥

अध्याय ३३३ अर्धसमनिरूपण अग्निदेव बोले - उपवित्रक ( अथवा उपचित्रक? ) नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रथम और तृतीय पादों में तीन सगण, लघु और गुरु होते हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में तीन भगण और दो गुरु होते हैं । ' द्रुतमध्या ' उसे कहते हैं जिसके प्रथम और तृतीय पादों में दो तगण, भगण और दो गुरु होते हैं । द्वितीय और चतुर्थ पादों में दो नगण, जगण और यगण होते हैं । जिसके प्रथम और तृतीय पादों में दो सगण, यगण और गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में तीन भगण और दो गुरु होते हैं उसे वेगवती कहा गया है । जिसके प्रथम और तृतीय पादों में तगण, सगण, भगण और गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, जगण और दो गुरु होते हैं उसे ' केतुमती ' नामक छन्द कहते हैं । ‘ आख्यानिकी ’ नामक छन्द वह है जिसके प्रथम और तृतीय पादों में दो तगण, जगण और दो गुरु तथा तृतीय और चतुर्थ पादों में जगण, गुरु, तगण, जगण और दो गुरु होते हैं ॥१ - ३ ॥ जिसके प्रथम और तृतीय पादों में जगण, तगण, जगण और दो गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में दो तगण, जगण और दो गुरु होते हैं उसे ' विपरीताख्यानकी ' कहते हैं । ‘ हरिणवल्लभा ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रथम और तृतीय पादों में तीन सगण, लघु और गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में लघु दो भगण और रगण होते हैं । अपराक्रम ( अथवा अपरवक्त्र ) नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रथम और तृतीय पादों में दो नगण, रगण, लघु और गुरु तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में नगण, जगण, जगण और रगण होते हैं । ' पुष्पिताग्रा ' उसे कहते हैं जिसके प्रथम और तृतीय पादों में दो नगण, रगण और भगण तथा द्वितीय और १ ख. ग. पचित्रं समसनागथभोऽभगागथो । छ. पचित्र ' । २ क. ङ. समसनाभासश्वमभौभद्रथ । ३ ख. ग. ' ध्या भभभ ' । ४ ख. ग. समसगाभ भोभगो । ५ क. ङ. ' ता । सजगागोगथोभौ वोगोगवेके । ६ ख. ग. ' थोत्रो नौ गोरौं । ७ ख. ग. थोथ जजगागथ । छ. ' थो तत ' । ८ छ. ' ख्यानिको तौ जया । ९ ख. ग. ' र्तिर्जमगोतौ । १० छ, ' भावौभ ' । ११ ख. ग. “ णप्लुता । नौषणौगथ । १२ क. ङ. ननरजारोजोगथौवसौ । रजथोरजगः जोरोमूलेजवयती । १३ छ. ननव ’ । छ. “ जावोग ” । १४ ख. ग. ' जौ । रोजथो जरजारो गोमूलयेवम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1033

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चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०२ ९

वोजथो जवजवागो मूले पनमती शिखा । ' अष्टाविंशतिनागाभा त्रिंशन्नागं ततो युजि ॥

खञ्जा तद्विपरीता स्यात्समवृत्तं प्रदर्श्यते ॥६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽर्धसमनिरूपणं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ ३३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः समवृत्तनिरूपणम् अग्निरुवाच यतिर्विच्छेद इत्युक्तस्तत्तन्मध्यान्तयौ गणौ । यौ सः कुमार ललिता तौ गौ चित्रपदा स्मृता ॥१ ॥

विद्युन्माला ' सभागस्य गणौ रतलगैर्भवेत् । माणवका क्रीडितकं ' वनौ हलमुखौ ' वसः ॥२ ॥

स्याद्भुजङ्गशिशुस्ता ' नौ मोहं सरुतं " ननौ । ' भवेच्छुद्ध विराड्वृत्तं प्रतिपादं समौ जगौ || ३ || चतुर्थ पादों में नगण, जगण, जगण, रगण और गुरु होते हैं । ' पनमती ' ( अथवा परावती या यवमती? ) नामक छन्द वहाँ पर होता है जहाँ पर प्रथम और तृतीय पादों में रगण, जगण, रगण, जगण तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में जगण, रगण, जगण, रगण और गुरु होते हैं । जिसके प्रथम तथा तृतीय पादों में अट्ठाईस तथा द्वितीय और चतुर्थ पादों में तीस - तीस अक्षर होते हैं तथा पदान्त में गुरु होता है उसे ' शिखा ' कहते हैं । इसके विपरीत यदि प्रथम और तृतीय पादों में तीस - तीस अक्षर और द्वितीय तथा चतुर्थ पादों में अट्ठाईस अक्षर होते हैं उसे ' खञ्जा ' कहते हैं । अब ‘ समवृत्त ’ के सम्बन्ध में बतलाया जा रहा है ॥४-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अर्धसम - निरूपण - कथन नामक तीन सौं तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३३ ॥

अध्याय ३३४ समवृत्तनिरूपण अग्निदेव बोले- ( पद पाठ के ) विच्छेद को यति कहते हैं । जिस ( छन्द ) के एक पाद में तगण और यगण होते हैं उसे ‘ तन्मध्या ' अथवा ( तनुमध्या ) कहते हैं । जिसमें दो यगण तथा सगण होता है उसे ' कुमारललिता ' कहते हैं । दो तगण और दो गुरु के मिलने से चित्रपदा नामक छन्द कहा गया है । दो भगण और दो गुरु से ' विद्युन्माला ’ छन्द बनता है । जिस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, तगण, लघु तथा गुरु होते हैं उसे ' माणवकाक्रीडितक ' कहते हैं । दो नगण तथा मगण से युक्त प्रत्येक पादवाला छन्द ' भुजङ्गशिशुसृता ' कहलाता है । दो नगण से बने हुए दो पादवाला छन्द ‘ हंसरुत ’ होता है । जिसके प्रत्येक पाद में सगण, भगण, जगण और गुरु होता है उसे ' शुद्ध विराड् ' कहते हैं ॥१-३ ॥ १ ख. ग. ‘ तिलागन्तात्रि ' । २ ख. ग. प्रदर्शये । ३ क. ङ. ' लाममगणाङ्गणैर्भत ' । छ. ' मममा गणैर्भूतगणैर्भ । ४ ख. रनौ । ५ ख. च. रसः । ६ च. ' शुभृता रौ मोहं मरु ' । छ. ' शुसुतानौमेहं नमरु । ७ च. ततौ । ८ ख. ' वेच्छब्दद्विरावृत्तं । ९ ख. ग. ‘ द्धचिराद्वृत्तं । १० छ. ' गौ । पणवो मलयो मः मन । ), Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1034

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१०३० अग्निपुराणम् ' प्रणवो नतयामः स्याज्जौ गौ मयूरसारिणी ' रुक्मवन्ती भससगाविन्द्रवज्रा ' तजौ " जगौ दोधकं भग ( भ ) भागौ स्याच्छालिनी मतभागगौ ' चतुःस्वरा स्याद्भ्रमरी विलसिता मभौ नलौ " स्वागता " धनभा गो गो वृत्ताननसमाश्च सः जगती वंशस्था वृत्तं जतौ जावथ तौ " जवौ भवेद्द्द्भुतविलम्बिता नभौ भरावथो नलौ । ' सत्तामभसगा वृत्तं भजताद्युपरि. स्थिता ॥४ ॥

। जतौ जगौ ' तूपपूर्वा वाद्यन्ताद्युपजातयः ॥५ ॥

। यतिः समुद्रा ऋषयो वातोर्मी ' मभागौ ॥ ६ ॥

। समुद्रा अथ ऋषयो वनौ लौ गौ रथोद्धता ॥ ७ ॥

। श्येनीव जवना गः स्याद्रम्या नपरगा गगः ॥ ८ ॥

। इन्द्रवंशा तोटकं सैश्चतुर्भिः प्रतिपादितम् ॥९ ॥

। स्यौ श्रीपरो ४ वसुवेदाञ्जलोद्धतगतिर्जलौजसौ ॥१० ॥

प्रणव ( अथवा पणव? ) नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में नगण, तगण, भगण तथा भगण रहा करते हैं । ' मयूरसारिणी ' वह छन्द है जिसके प्रत्येक पाद में मगण, भगण, सगण और गकार होता है वह ' सत्ता ' नामक छन्द कहलाता है । उपरिस्थिता ( अथवा उपस्थिता? ) नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में भगण, जगण और तगण रहते हैं । ' रुक्मवन्ती ' नामक छन्द उसे कहा गया है जिसके प्रत्येक पाद में भगण, दो सगण तथा गुरु रहा करते हैं । इन्द्रवज्रा के प्रत्येक पाद में तगण, जगण, जगण और गुरु रहते हैं । उपेन्द्रवज्रा उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण और गुरु होते हैं । ( इन्द्रवज्रा ) और अन्तिम ( उपेन्द्रवज्रा ) के ( पादों को ) मिलाने से उपजाति नामक छन्द बनता है ॥४-५ ॥ जिस छन्द के प्रत्येक पाद में तीन भगण और दो गुरु होते हैं उसे ' दोधक ' कहते हैं । ‘ शालिनी ' छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में मगण, तगण, भगण और दो गुरु होते हैं और उसमें चार तथा सात पर यति होती है । जिसके प्रत्येक पाद में मगण, भगण, तगण और दो गुरु होते हैं उसे ' वातोमीं ' कहा जाता है और इसमें चार और सात पर यति होती है । भ्रमरी विलसिता ( अथवा भ्रमर - विलसित ) उस छन्द को कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में मगण, भगण, नगण और लघु रहते हैं । इसमें चार सौ सात पर यति होती है । रगण, नगण, रगण, लघु और गुरु से बने हुए चार पादोंवाला छन्द ' रथोद्धता ' कहलाता है ॥६-७ ॥ ' स्वागता ' उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में रगण, नगण, भगण और दो गुरु होते हैं । जिसके प्रत्येक पाद में दो नगण, सगण और दो गुरु होते हैं उसे ' वृत्ता ' ( अथवा वृन्ता? ) नामक छन्द कहते हैं । श्येनी नामक छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में रगण, जगण, लघु और गुरु होते हैं । जिसके प्रत्येक पाद में नगण, मगण, रगण और तीन गुरु होते हैं वह रम्भा नामक छन्द कहलाता है । ( यहाँ से जिन छन्दों का वर्णन किया जायंगा वे वैदिक ) जगती ( के ही भेद ) हैं । जिसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण और रंगण होते हैं वह वंशस्थ कहलाता है । ' इन्द्रवंशा ' नामक छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में दो तगण, जगण और रगण होते हैं । जिसके प्रत्येक पाद में चार सगण होते हैं उसे ' तोटक ' कहा गया है ॥८ - ९ ॥ जिसके प्रत्येक पाद में नगण, भगण, भगण और रगण होते हैं वह ' द्रुतविलम्बित ' छन्द होता है । श्रीपरो ( अथवा श्रीपुरो? ) नामक छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में दो नगण, मगण और यगण होते हैं और जिसमें आठ और नव पर यति होती है । ' जलोद्धतगति ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में जगण, सगण, जगण और सगण होते हैं तथा जिसमें छह - छह पर यति होती है । ' तत ' नामक १ क. ङ. ' वोमनजागः स्यादष्टौगोम ' । २ ख. ग. ' णी । संतान भस ' । ३ क. ङ. सताभव समावृ ” ४ क. ङ. ननौ । ५ क. ङ. सगौ । ६ छ. भूतपूर्वा । ७ क. ङ. ' नी यतनाग ' । ८ ख. ' भाभगौ । ९ क. ' भभाग । १० छ. सामता । ११ । क. ङ. ' ता रणभा । १२ ख. घ. ' नीरजरदागः स्याद्रस्यानपरगागनः CC - 0. JK Sanskrit Academy । ज ।, १३ Jammmu ख. ग .. Digitized जरौ । १४ छ, श्रीमुदो बसुवेदा जलोद्गतिजलौ जमौ ज ’ ।

पृष्ठ 1035

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चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०३१ ' जसौ वसर्ववश्चाथ ततं ननमराः स्मृतम् । भुजङ्गप्रयातं यैः स्याच्चतुर्भिः स्त्रग्विणी तु रैः । वैश्वदेवी ममययाः पञ्चाङ्गा नवमालिनी । प्रहर्षिणी ' मवजवा गोपतिर्वह्निदिक्षु च । मत्तमयूरं मतया वेदग्रहैर्यतिः गो ग इन्द्रियनवकौ ननौ रसलगाः स्वराः । द्विः प्रहरणकलिता वसन्ततिलका नभौ चन्द्रावर्ता ननौ ९ सोमावर्तर्तुनवकः स्मृतः कुसुमविचित्रा द्यौनौ च नौ रम्याचलाक्षिका ॥११ ॥

प्रमिताक्षरा गजौ सौ ' कान्तोत्पीडा ' मतौ समौ ॥१२ ॥

नजौ भयौ प्रतिपादं गणा यदि जगत्यपि ॥१३ ॥

रुचिरा ' जभसजगा छिन्ना वेदैर्गृहैः स्मृता ॥१४ ॥

। गौरी नलनसा गः स्यादसंबाधा नतौ नगौ " ॥१५ ॥

स्वराश्चापराजिता स्यान्ननभा नलगाः स्वराः ॥ १६ ॥

। जौ गौ सिंहोन्नता सा स्यान्मुनेरुद्धर्षिणा च सा ॥१७ ॥

। मणिगुणनिकराऽसौ मालिनी नौ मयौ यसः ॥१८ ॥

छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में दो नगण, मगण और रगण होते हैं । इसमें भी छह - छह पर यति होती है । ' कुसुमविचित्रा ' नामक छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में नगण, यगण, नगण और यगण होते हैं । ' रम्याचलाक्षिका ' उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में दो नगण तथा दो रगण होते हैं । जिस छन्द के प्रत्येक पाद में चार यगण होते हैं उसे ' भुजङ्गप्रयात ' कहते हैं । ' स्रग्विणी ' उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में चार रगण होते हैं । ' प्रमिताक्षरा ' नामक छन्द वह है जिसके प्रत्येक पाद में सगण, जगण और दो सगण होते हैं । ' कान्तोत्पीडा ' उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में मगण, तगण, सगण और भगण रहते हैं ॥१०-१२ । ' वैश्वदेवी ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में दो भगण और दो यगण होते हैं । इसमें पाँच और सात पर यति होती है । जिस छन्द के प्रत्येक पाद में नगण, जगण, भगण और यगण होते हैं उसे ' नवमालिनी ' कहते हैं । अब ' अतिजगती ' नामक छन्दों के अन्तर्गत आनेवाले छन्दों के प्रत्येक पाद का वर्णन किया जायगा । ' प्रहर्षिणी ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में मगण, रगण और गुरु होते हैं तथा जिसमें तीन और दस पर यति होती है । ' रुचिरा ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसमें जगण, भगण, सगण, जगण और गुरु होते हैं तथा जिसमें चार और नव पर यति होती है । ' मत्तमयूर ' उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में मगण, तगण, यगण, सगण और गुरु रहते .हैं तथा जिसमें चार और नव पर यति होती है । ' गौरी ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में तीन नगण, सगण और गुरु रहते हैं । ‘ असंबाधा ' नामक छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, तगण, नगण, सगण और दो गुरु होते हैं और इसमें पाँच तथा नौ पर यति होती है ॥१३-१५ ॥ ' अपराजिता ' छन्द के प्रत्येक पाद में दो नगण, रगण, सगण, लघु और गुरु होते हैं और जिसमें सात - सात पर यति होती है । ' प्रहरणकलिता ' के प्रत्येक पाद में दो नगण, भगण, नगण, लघु और गुरु होते हैं । इसमें भी सात - सात की यति होती है । ' वसन्ततिलका ' के प्रत्येक पाद में तगण, भगण, दो जगण और दो गुरु होते हैं । इसी को एक आचार्य ने ' सिंहोन्नता ' और दूसरे ने ' उद्धर्षिणी ' कहा है । ' चन्द्रावर्त ' के प्रत्येक पाद में चार नगण और सगण होते हैं । यदि इस छन्द में छठें तथा नवें वर्णों पर यति होती है तो इसे ' माला ' कहते हैं, किन्तु यदि यति आठवें तथा सातवें वर्णों पर होती है तो इसे ' मणिगुणनिकरा ' कहते हैं । मालिनी के प्रत्येक पाद में दो नगण, मगण और दो यगण होते हैं । आठवें और सातवें पर यति होती है ॥१६-१८ ॥ १ ख. ग. " सौ सर्तव । २ क. ङ. म ' वास्मृ ' । ३ छ. ' त्रा न्यौ द्यौ नौ नौ रो स्याच्चलाम्बिका । ४ क. ङ. कालोत्पीनामभौस ' । ५ ख. ग. ' त्पीला म । ६ ख. ग. मरजरा गो । ७ क. ङ. रा ग भ । ८ ख. ग. जभजसगा । ९ सगौ । १० ख. ग. नननसा मः स्या । ११ ख. नसौ । १२ ख. ग. र्तन्नव । १३ छ. ययः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1036

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१०३२ अग्निपुराणम् यतिर्वसुस्वरा भौ वौ नतलमित्रसग्रहाः । रसभालभृगुरुद्राः ' पृथ्वीजसजसा ' जनौ ' वंशपत्रपतितं ‘ स्याद्भवना ' भौ नगौ सदिक् " मन्दाक्रान्ता समभतं नगौ राब्धिवसुः स्वराः । १३ रथाः स्वराः प्रतिरथससजाः सतताश्च गः कृतिः सुवदना मो रो भनया भनगाः सुराः स्स्रग्धरा १५ भरता नो मो यपौ त्रिः सप्तका यति: अश्वललितं नजभा " जभजा भनमीशतः ऋषभगजविलसितं ज्ञेया शिखरिणी ' जग ॥ १ ९ ॥ । गावसुग्रहविच्छिन्ना पिङ्गलेनेरिता पुरा ॥२० ॥

। हरिणी नसमा रः सो नगौ " रसचतुः स्वराः ॥ २१ ॥

कुसुमितलता वेल्लिता " मतना यययाः शराः ॥ २२ ॥

। शार्दूलविक्रीडितं स्यादादित्यमुनयो यतिः ॥ २३ ॥

। यतिर्मुनिरसाश्चाथ १४ इतिवृत्तं क्रमात्स्मृतम् ॥२४ ॥

। " समुद्रकं १७ भरजा नो वनगा दश भास्कराः ॥ २५ ॥

। मत्तक्रीडा " ममनना नौ नग्नौ गोष्टमातिथिः ॥२६ ॥

‘ ऋषभगजविलसित ' के प्रत्येक पाद में भगण, रगण, तीन नगण और गुरु होते हैं । और सातवें तथा नवें वर्णों पर यति होती है । ‘ शिखरिणी ' के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगंण, भगण, लघु और गुरु होते हैं । छठें और ग्यारहवें पर यदि होती है । पृथ्वी के प्रत्येक पाद में जगण, सगण, यगण, लघु और गुरु होते हैं तथा आठ और नौ पर यति होती है । ऐसा पिंगलाचार्य ने कहा है । ' वंशपत्रपतित ' नामक छन्द उसे कहते हैं जिसके प्रत्येक पाद में भगण, रगण, नगण, भगण, नगण, लघु और गुरु होते हैं तथा दस और सात पर यति होती है । हरिणी के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, लघु और गुरु होते हैं तथा छठें, चौथे और सातवें वर्ण पर यति होती है । ‘ मन्दाक्रान्ता ' के प्रत्येक पाद में सगण, मगण, मगण, तगण, नगण और दो गुरु होते हैं तथा इसमें चौथे, छठें और सातवें पर यति होती है । ' कुसुमलतावेल्लिता ' के प्रत्येक पाद में मगण, तगण, नगण और तीन यगण होते हैं तथा पाँचवें, छठें और सातवें पर यति होती है ॥१९ -२२ ॥ ' शार्दूलविक्रीडित ' के प्रथम पाद में दो सगण, जगण, सगण, दो तगण और गुरु रहते हैं । इसमें बारहवें तथा सातवें वर्णों पर यति होती है । ' सुवदना ' के प्रत्येक पाद में भगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, लघु और गुरु होते हैं तथा सात - सात और छह पर यति होती है । इस प्रकार क्रमशः वृत्तों के सम्बन्ध में बतलाया जा रहा है । ' स्रग्धरा ' के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, तगण, नगण, भगण और दो यगण होते हैं और प्रत्येक सातवें वर्ण पर यति होती है । ' समुद्रक ' के प्रत्येक पाद में भगण, रगण, जगण, नगण, रगण, नगण और गुरु होते हैं । इसमें दसवें और बारहवें वर्णों पर यति होती है । ‘ अश्वललित ' के प्रत्येक पाद में नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण और गुरु होते हैं । तथा इसमें आठवें और पन्द्रहवें पर यति होती है ॥२३-२६ ॥, भगण, लघु १ ख. ग. “ लमद्रिस ’ । २ ख. ग. ' भजगजवि सजयसापरौ । गा ’ । ६ ख. ग. ' नौ । गोव ’ । ७ क. ' १० ख. ग. लभौ । ११ ख. ग. ' न्ता नभननं न ' रसासुराप्रतिरथमशताः शतजास्वगः । १४ ख. ग. सद्रकण्ठवनीरोनोरामगा । १७ ख. ग. " रनागौतौनोन CC - 0. JK Sanskrit Academy, ' तन्वी ' के प्रत्येक पाद में भगण, तगण, । ३ ख. ग. यसौ । ४ क. ङ. ' गौ । नसभानगृहं तु रु ' । ५ क. ङ. ॰थ्वी पन्नप । ८ क. ङ. स्याद्रचनाद्वौ म । ९ ख. ग. दूभरतो भौ लगोस ॥ छ. ' न्ता मभमत । १२ ख. ग. मतोयमययाः पराः । १३ क. ङ. श्चाथाग्निभिर्वृत्तं । १५ क. ङ. ' रभारोयो ययौ त्रिः । १६ क. ग. । १८ ख. ग. ' भजलभमी । १ ९ ख. ग. " नवा नौ मग्नौ शोष्ट " । Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०३३

तन्वी भनतसा भो भो लयो बाणसुरार्ककाः । क्रौञ्चपदा भमतता नौ नौ ' बाणशराष्टतः ॥२७ ॥

भुजंगविजृम्भितं ममतना ' ननवासनौ । गष्टेशमुनिभिश्छेदो ह्युपहावाख्यमीदृशम् ॥२८ ॥

मनना ननता नः सो गणैर्ग्रहरसो रसात् । नौ सप्त रो दण्डदः स्याच्चण्डवृष्टिप्रघातकम् ॥२९ ॥

" रेफवृद्ध्या ननवाः स्युर्व्यालजीमूतमुख्यकाः । शेषे वै प्रतितो ज्ञेयो गाथा प्रस्तार उच्यते ॥३० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये समवृत्तनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः || ३३४ ॥ अथ पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः प्रस्तारनिरूपणम् ६ अग्निरुवाच छन्दोऽत्र सिद्धं गाथा स्यात्पादे सर्वगुरौ तथा । प्रस्तार " आद्यगाथो ' नगण, सगण, भगण, भगण, नगण और यगण होते हैं । इसमें पाँचवें, सातवें ‘ क्रौञ्चपदा ' के प्रत्येक पाद में भगण, भगण, दो तगण और चार नगण और और सात पर यति होती है । ' भुजङ्गविजृम्भित ' के प्रत्येक पाद में दो मगण, और गुरु होते हैं । इसमें आठवें, ग्यारहवें और सातवें वर्णों पर यति होती है । चार नगण, तगण, नगण, सगण और दो गुरु रहते हैं । इसमें नौ, छह, छह प्रत्येक पाद में दो नगण और सात रगण होते हैं उसे दण्डद ( अथवा ' दण्डक ' ) कहते हैं । उसी में एक - एक रगण की वृद्धि करते रहने से व्याल और जीमूत नः परतुल्योऽथ पूर्वगः ॥ १ ॥

और बारहवें वर्णों पर यति होती है । गुरु रहते हैं । इसमें पाँच, पाँच, आठ तगण, तीन नगण, रगण, सगण, लघु ' उपवाहक ' के प्रत्येक पाद में मगण, और पाँच पर यति होती है । जिसके कहते हैं । इसे ही ' चण्डवृत्ति प्रघातक ' इत्यादि छन्द बन जाते हैं । शेष प्रतित ( अथवा प्रचित ) हैं । अब गाथा और प्रस्तार का वर्णन किया जा रहा है ॥२७-३० ॥ श्री अग्निमहापुराण में समवृत्तनिरूपण नामक तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३४ ॥

अध्याय ३३५ प्रस्तार - निरूपण अग्निदेव बोले- यहाँ पर जिन छन्दों का वर्णन नहीं किया गया है; वे सब ' गाथा ' ( के अन्तर्गत आ जाते ) हैं । इसके प्रत्येक पाद में वर्णों की संख्या भिन्न - भिन्न होती है । इन छन्दों में पादों की मात्रा चार से अधिक हो सकती है । ये छन्द अर्धसमवृत्त तथा विषमवृत्त गणों के अन्तर्गत रखे जा सकते हैं । ( जिस वृत्त की संख्या की जिज्ञासा हो १ ख. ग. नौ यानश ' । २ क. ङ. सोसमतना नरसा लगौ । ग ' । ३ क. ङ. ' नौ । द्व्यष्टास्त्रमु । ख. ग. नौ । अष्टेशमुनिभिरश्छे ' । ४ ख. ग. " प्रपात ' । ५ क. ङ. ' फवत्याभ्रववर्णा वास्यु ' । ६ अयमध्यायो नास्ति ख. पुस्तके । ७क. ङ. आद्यो गो धो नः । ८ ग. ' द्यगाग्रो लः प ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1038

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१०३४ अग्निपुराणम् नष्टमध्ये समेऽङ्के नः समेऽर्धविषमे गुरुः । ' प्रतिलोमगुणं नाद्यं द्विरुद्दिष्टग एकनुत् ॥२ ॥

संख्याद्विरर्थे रूपे तु शून्यं शून्ये द्विरीरितम् । तावदर्थे तद्गुणितं द्विद्व्यूनं च तदन्ततः ॥ ३ ॥

परे पूर्णं परे पूर्णं मेरुप्रस्तारतो भवेत् । नगसंख्या वृत्तसंख्या चार्धाङ्गुलमधोर्धतः.२ १ || ४ ॥ संख्यैव द्विगुणैकोना छन्दः सारोऽयमीरितः 11411 इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रस्तारनिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३५ ॥

उसे भूमि पर अलग - अलग अक्षरों में लिख लेना चाहिए । तदनन्तर ) लकार को आदि में रखकर प्रतिलोम्य से उसकी दो बार आवृत्ति करनी चाहिए । ऐसा करने पर यदि वह संख्या गुरु हो जाय तो उसे द्विगुणित करके उससे एक कम कर देना चाहिए । छन्द के अक्षरों की संख्या ( को भूमि पर रखकर उस ) से आधा निकाल देना चाहिए । विषम संख्या से पूर्वोक्त रूप को निकाल देने पर शून्य प्राप्त होता है । शून्य स्थान की दो बार आवृत्ति करनी चाहिए । अर्ध स्थान की संख्या को द्विगुणित कर देना चाहिए । ( गायत्री आदि वृत्तों की संख्या को ) द्विगुणित करके उसमें से दो कम कर देना चाहिए । इस प्रकार से द्विगुणित संख्या को पूर्णरूप में ही रखना चाहिए, दो कम करके नहीं । एक चौखाना बनाकर उसके ऊपर नीचे से दो कोष्ठक बना देना चाहिए, उसके नीचे तीन या चार जितने भी कोष्ठक अभीष्ट हों, बना देना चाहिए । इसे ' मेरुप्रस्तार ' कहते हैं । गायत्री वृत्तों की संख्या को दुगुना करके उसमें से दो घटा देना चाहिए । इस प्रकार द्विगुणित की हुई वृत्त की संख्या एक से कम होने पर प्रस्तार - लेखन का अधिकरण होती है । गुरु और लघु अक्षरों का विस्तार अङ्गुलि परिमाण होता है । नीचे की ओर अङ्गुलि विस्तार स्थान को छोड़कर

वृत्त प्रस्तार भेदों को लिखना चाहिए । इस प्रकार छन्दः सार बताया गया है ॥१-५ ॥

श्री अग्निमहापुराण में प्रस्तार - निरूपण नामक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३५ ॥

१ क. ङ. ' गुणामाद्यं । २ क. ङ. ' लतदार्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1039

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षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०३५ षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शिक्षानिरूपणम् अग्निरुवाच वक्ष्ये शिक्षां त्रिषष्टिः स्युर्वर्णा वा चतुरा ( र ) धिकाः । स्वरा विंशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः ॥ १ ॥

यादयश्च स्मृता ह्यष्टौ चत्वारश्च यमाः स्मृताः । अनुस्वारो विसर्गश्चक पौ चापि पराश्रितौ ॥२ ॥

दुस्पृष्टश्चेति विज्ञेयो ' ऌकारः प्लुत एव च । रङ्गश्च खे अरं प्रोक्तं हकारः पञ्चमैर्युतः ॥३ ॥

अन्तस्थाभिः समायुक्त औरस्यः कण्ठ्य एव सः । आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान्मनो युङ्क्ते विवक्षया ॥४ ॥

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥५ ॥

प्रातः सवनयोगं तु च्छन्दो गायत्रमाश्रितम् ॥ कण्ठे माध्यंदिनयुतं मध्यमं त्रैष्टुभानुगम् || ॥६ ६ || ॥ तारं तार्तीयसवनं शीर्षण्यं जागतानुगम् । सोदीर्णो मूर्ध्यभिहतो वक्त्रमापद्य मारुतः ॥७ ॥

अध्याय ३३६ शिक्षानिरूपण अग्निदेव बोले- अब मैं शिक्षा का वर्णन करता हूँ । वर्णों की संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ भी मानी गयी है । इनमें इक्कीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि और चार यम माने गये हैं । अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रितवर्ण - जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ( ँक और ँ प ) और दुःस्पृष्ट लकार - ये तिरसठ वर्ण हैं । इनमें प्लुत ऌकार को और गिन लिया जाय तो वर्णों की संख्या चौंसठ हो जाती । रङ्ग ( अनुनासिक ) का उच्चारण ' खे अरां ' की तरह बताया गया है । हंकार ङ ' ' आदि पञ्चमाक्षरों और ' य र ल व - इन अन्तःस्थ वर्णों से संयुक्त होने पर ' उरस्य ' हो जाता है । इनमें संयुक्त न होने पर वह ‘ कण्ठस्थानीय ' ही रहता है । आत्मा ( अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ) संस्कार रूप से अपने भीतर विद्यमान घटपटादि पदार्थों को अपनी बुद्धिवृत्ति से संयुक्त करके अर्थात् उन्हें एक ही बुद्धि का विषय बनाकर बोलने या दूसरों पर प्रकट करने की इच्छा से मन को उनसे संयुक्त करता है ॥१-४ ॥ संयुक्त हुआ मन कायाग्नि- जठराग्नि को आहत करता है । फिर वह जठरानल प्राणवायु को प्रेरित करता है । वह प्राणवायु हृदयदेश में विचरता हुआ धीमी ध्वनि में उस प्रसिद्ध स्वर को उत्पन्न करता है, जो प्रातःसवन कर्म के साधनभूत मन्त्र के लिए उपयोगी है तथा जो ' गायत्री ' नामक छन्द के आश्रित है । तदनन्तर वह प्राणवायु कण्ठदेश में भ्रमण करता हुआ ' त्रिष्टुप् छन्द से युक्त माध्यंदिन-सवन - कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी मध्यम स्वंर को उत्पन्न करता है । इसके बाद उक्त प्राणवायु शिरोदेश में पहुँचकर उच्च ध्वनि से युक्त एवं ' जगती ' छन्द के आश्रित सायं - सवन - कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी स्वर को प्रकट करता है । इस प्रकार ऊपर की ओर प्रेरित वह प्राण, मूर्धा में टकराकर अभिघात नामक संयोग का आश्रय बनकर, मुखवर्ती कण्ठादि स्थानों १ ख. ग. एकारः । २ क. ङ. च । वक्ष्ये मुखेऽक्षरं प्रो । ३ ख. ग. प्रोक्तमका । ४ ख. ग. कण्ठ एकलः । आ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१०३६ अग्निपुराणम् वर्णाञ्जनयते तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः । अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा । अनुस्वारो विसर्गश्च शषसा रेफ एव च । यद्यो भावप्रसंधानमुकारादि परं पदम् । कुतीर्थादागतं दग्धमपवर्णं दग्धमपवर्णं च च भक्षितम् । सुतीर्थादागतं व्यक्तं स्वाम्नायं सुव्यवस्थितम् । न करालो न लम्बोष्णे नाव्यक्तो नानुनासिकः । ( ' यथा व्याघ्री हरेत्पुत्रान्दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् । सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ) । में पहुँचकर वर्णों को उत्पन्न करता है । उन वर्णों के स्वरतः कालतः स्थानात्प्रयत्नार्थप्रदानतः ॥८ ॥

जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥९ ॥

चिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ॥१० ॥

स्वरान्तं तादृशं विद्याद्यदन्यद्व्यक्तमूष्मणः ॥११ ॥

एवमुच्चारणं पापमेवमुच्चारणं शुभम् ॥१२ ॥

सुस्वरेण सुवक्त्रेण प्रयुक्तं ब्रह्म राजते ॥ १३ ॥

गद्गदो बद्धजिह्वश्च न वर्णान्वक्तुमर्हति ॥ १४ ॥

एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः ॥ १५ ॥

उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः ॥१६ ॥

पाँच प्रकार के विभाग माने गये हैं । स्वर से, काल से, स्थान से, आभ्यन्तर प्रयत्न से तथा बाह्य प्रयत्न से उन वर्णों में भेद होता है ॥५-८ ॥ वर्णों के उच्चारण स्थान आठ हैं-हृदय, कण्ठ, मूर्धा, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठद्वय तथा तालु । विसर्ग का अभाव, विवर्तन, सन्धि का अभाव, शकारादेश, षकारादेश, सकारादेश, रेफादेश, जिह्वामूलीयत्व और उपध्मानीयत्व - ये ऊष्मा वर्णों की आठ प्रकार की गतियाँ हैं । जिस उत्तरवर्ती पद में आदि अक्षर ' उकार ' हो, वहाँ गुण आदि के द्वारा यदि ' ओ ' - भाव का प्रसंधान ( परिज्ञान ) हो रहा हो, तो उस ' ओकार ' को स्वरान्त अर्थात् स्वरस्थानीय जानना चाहिए । जैसे ' गङ्गोदकम् ' । इस पद में जो ' ओ ' भाव का प्रसंधान है, वह स्वरस्थानीय है । इनसे भिन्न संधिस्थल में जो ' ओभाव ' का परिज्ञान होता है, वह ' ओ ' भाव ऊष्मा का ही गति - विशेष है, यह बात स्पष्ट रूप से जान लेनी चाहिए । जैसे ' शिवो वन्द्यः ' इसमें जो ‘ ओकार ' का श्रवण होता है, वह ऊष्मस्थानीय ही है । जो वेदाध्ययन कुतीर्थ से प्राप्त हुआ है, अर्थात् और स्वरित । इनके उच्चारण काल में भी तीन नियम हैं । ह्रस्व, दीर्घ तथा आचारहीन गुरु से ग्रहण किया गया है, वह दग्ध - नीरस-सा होता है । उसमें अक्षरों को खींच - तानकर हठात् किसी अर्थ तक पहुँचाया गया है । वह भक्षित - सा हो गया है, अर्थात् सम्प्रदाय - सिद्ध गुरु से अध्ययन न करने के कारण वह अभक्ष्य भक्षण के समान निस्तेज है । इस तरह का उच्चारण या पठन पाप माना गया है । इसके विपरीत जो सम्प्रदाय - सिद्ध गुरु से अध्ययन किया जाता है, तदनुसार पठन - पाठन शुभ होता है ॥९ -१२ ॥ जो उत्तम तीर्थ- सदाचारी गुरु से पढ़ा गया है, सुस्पष्ट उच्चारण से युक्त है, सम्प्रदाय शुद्ध है, सुव्यवस्थित है, उदात्त आदि शुद्ध स्वर से तथा कण्ठताल्वादि शुद्ध स्थान से प्रयुक्त हुआ है, वह वेदाध्ययन शोभित होता है । न तो विकराल आकृतिवाला, न लम्बे ओठोंवाला, न अव्यक्त उच्चारण करनेवाला नाक से बोलनेवाला एवं गद्गद कण्ठ या जिह्वाबन्ध से युक्त मनुष्य ही वर्णोच्चारण में समर्थ होता है । जैसे व्याघ्री , न अपने बच्चों को दाँतों से पकड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, किन्तु उन्हें पीड़ा नहीं देती, वर्णों का ठीक इसी तरह प्रयोग करे, जिससे वे वर्ण न तो अव्यक्त ( अस्पष्ट ) हों और न पीड़ित ही हों । वर्णों के सम्यक् प्रयोग से मानव ब्रह्मलोक में पूजित होता है । स्वर तीन प्रकार के माने गये हैं - उदात्त, अनुदात्त और स्वरित । इनके उच्चारण काल में भी तीन नियम हैं । ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत । अकार एवं हकार कण्ठस्थानीय हैं । इकार , चवर्ग, यकार १ ' यथा महीयते ' क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA