अग्नि पुराण — पृष्ठ 1091–1100
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1091–1100
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द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०८७ अथ द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूपम् स्कन्द उवाच
रमा रमे रमाः शुभा रमां रमे रमास्तथा । रमया च रमाभ्यां च रमाभिः कृतमव्ययम् ॥१ ॥
रमायै च रमाभ्यां रमायां ( या ) ( श्च ) रमयोः शुभम् । रमाणां च रमायां च रमास्वेवं कलादयः ॥ २ ॥
जरा जरसौ जर ( रे ) इति जरसश्च जरा जराम् । जरसं च जरास्वेवं सर्वा सर्वे च सर्वया ॥३ ॥
सर्वस्यै देहि सर्वस्याः सर्वस्याः सर्वयोस्तथा । शेषं रमावद्रूपं स्याद्वै द्वै तिस्रश्च तिसृणाम् || ४ ॥ बुद्धिर्बुद्धया बुद्धये च बुद्धयै बुद्धेश्च हे मते । ' कविवत्स्यान्मुनीनां च नदी नद्यौ नदीं नदीः || ५ ॥ नद्यानदीभिर्नयै च नद्यां चैव नदीषु च । कुमारी जृम्भणीत्येवं श्रीः श्रियौ च श्रियः श्रिया ॥६ ॥
अध्याय ३५२ स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूप स्कन्द बोले - रमा शब्द के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में रूप होते हैं - रमा, रमे, रमाः, द्वितीया के तीनों वचनों में रूप है - रमाम्, रमे, रमाः, तृतीया के तीनों वचनों में- रमया, रमाभ्याम् रमाभिः, चतुर्थी के एकवचन और द्विवचन में क्रमशः रमायै और रमाभ्याम्, षष्ठी के तीनों वचनों में रमायाः, रमयोः, रमाणाम् तथा सप्तमी के एकवचन और बहुवचन में रमायाम् और रमासु रूप होते हैं । इसी प्रकार कला इत्यादि के रूप भी होते हैं ॥१-२ ॥ जरा शब्द के प्रथमा के तीनों वचनों में जरा, जरसौ अथवा जरे और जरसः अथवा जराः रूप होते हैं । द्वितीया एकवचन में जराम् अथवा जरसम् और सप्तमी बहुवचन में जरासु रूप होते हैं । सर्व शब्द के स्त्रीलिंग में प्रथमा विभक्ति के एकवचन और द्विवचन में क्रमशः सर्वा और सर्वे, तृतीया एकवचन में सर्वया, चतुर्थी एकवचन में सर्वस्यै, पंचमी और षष्ठी एकवचन में सर्वस्याः तथा षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में सर्वयोः रूप बनते हैं । शेष रूप रमा के समान ही होते हैं । द्वि शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया में द्वे, द्वे, त्रि शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया में तिस्रः, षष्ठी में तिसृणाम् रूप बनते हैं ॥३-४ ॥ बुद्धि शब्द के प्रथमा एकवचन में बुद्धिः, तृतीया एकवचन में बुद्धया, चतुर्थी एकवचन में बुद्धये अथवा बुद्ध्यै, पंचमी और षष्ठी एकवचन में बुद्धे: रूप बनता है । मति शब्द का सम्बोधन हे मते! रूप बनता है । मति और मुनि के रूप कवि के सामन चलते हैं । नदी शब्द के प्रथमा के एकवचन और द्विवचन में क्रमश: नदी और नद्यौ, द्वितीया के एकवचन और बहुवचन में क्रमशः नदीम् और नदी:, तृतीया के एकवचन और बहुवचन में क्रमशः नद्या और नदीभिः, चतुर्थी के एकवचन में नद्यै, सप्तमी के एकवचन और बहुवचन में क्रमशः नद्याम् और नदीषु रूप बनते हैं । इसी प्रकार कुमारी और जृम्भणी शब्दों के रूप भी चलते हैं । श्री शब्द के प्रथमा के सभी वचनों १ ख. ग. ' त्स्यान्मतीनां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०८८ अग्निपुराणम् श्रियै श्रिये स्त्रीं स्त्रियं च स्त्रीश्च स्त्रियः स्त्रिया स्त्रियै । स्त्रियाः स्त्रीणां स्त्रियां च ग्रामण्यां धेन्वै च धेनवे ॥७ ॥
जम्बूर्जम्ब्वौ च जम्बूश्च जम्बूनां च फलं पिब । वर्षाभ्वौ च पुनर्वौ च मातृर्वाऽपि च गौश्च नौः ॥८ ॥
वाग्वाचा वाग्भिश्चवाक्षु स्रग्भ्यां स्रजि स्रजोस्तथा । विद्वद्भ्यां चैव विद्वत्सु ' भवती स्याद्भवन्त्यपि ॥९ ॥
दीव्यन्ती भाती भान्ती च तुदन्ती च तुदत्यपि । रुदती रुन्धती देवी गृहणती चोरयन्त्यपि ॥ १० ॥
दृषदृषद्भ्यां दृषदि ` विशेषविदुषी कृतिः । समित्समिद्भ्यां समिधि सीमा सीम्नि च सीमनि ॥। ११ ॥ । दामनीभ्यां ककुद्भ्यां च केयमाभ्यां तथाऽऽसु च । गीर्भ्यां चैव गिरा गीर्षु सुभूः सुपूः पुरा पुरि ॥ १२ ॥
में श्रीः, श्रियौ, श्रियः, तृतीया के एकवचन में श्रिया, चतुर्थी के एकवचन में श्रियै अथवा श्रिये रूप बनते हैं । स्त्री शब्द के द्वितीया एकवचन में स्त्रीम् अथवा स्त्रियम्, द्वितीया के बहुवचन में स्त्रीः अथवा स्त्रियः, तृतीया के एकवचन में स्त्रिया, चतुर्थी के एकवचन में स्त्रियै, पंचमी और षष्ठी के एकवचन में स्त्रियाः, षष्ठी के बहुवचन में स्त्रीणाम् और सप्तमी के एकवचन में स्त्रियाम् रूप होते हैं । ग्रामणी का सप्तमी एकवचन में ग्रामण्याम् रूप होता है । धेनु का चतुर्थी एकवचन में धेन्वै रूप बनता है ॥ ५ - ७ ॥ जम्बू का प्रथमा एकवचन में तथा द्विवचन में क्रमशः जम्बूः तथा जम्ब्वौ, द्वितीया बहुवचन में जम्बूः और षष्ठी बहुवचन में जम्बूनाम् रूप बनते हैं जैसे - जम्बूनां फलं पिब ( अर्थात् जामुन के फल का पान करो ) । इसी प्रकार वर्षाभू तथा पुनर्भू का प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन में रूप क्रमशः वर्षाभ्वौ और पुनर्ध्वो होते हैं । मातृ शब्द का द्वितीया बहुवचन में मातृः रूप बनता है । गौ तथा नौ शब्द का प्रथमा तथा सम्बोधन के एकवचन में क्रमशः गौः तथा नौ: रूप बनते हैं । वाक् शब्द का प्रथमा एकवचन में वाक्, तृतीया एकवचन में वाचा, तृतीया बहुवचन में वाग्भिः और सप्तमी बहुवचन में वाक्षु रूप बनते हैं । स्रक् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में स्रग्भ्याम्, सप्तमी एकवचन में स्रजि तथा षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में स्रजोः रूप बनते हैं, विद्वस् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में विद्वद्भ्याम् तथा सप्तमी के बहुवचन में विद्वत्सु रूप होते हैं । उकारानुबन्ध भवत् शब्द के स्त्रीलिंग के प्रथमा एकवचन में भवती तथा ऋकारानुबन्ध भवत् शब्द का भवन्ती रूप होता है ॥८ - ९ ॥ इसी प्रकार दीव्यत् शब्द के नपुंसकलिंग के प्रथमा और द्वितीया में दीव्यन्ती । इसी प्रकार भाती, भान्ती, तुदन्ती, तुदती, रुदती, रुन्धती, देवी, गृह्णती और चोरयन्ती रूप भी बनते हैं । दृषद् शब्द के प्रथमा एकवचन में दृषद्, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी में दृषद्भ्याम् और सप्तमी में दृषदि रूप बनते हैं । समित् शब्द के प्रथमा एकवचन में समित्, तृतीया, चतुर्थी और पंचमी के द्विवचन में समिद्भ्याम् और सप्तमी के एकवचन में समिधि रूप बनते हैं । सीमन् शब्द के प्रथमा एकवचन में सीमा और सप्तमी एकवचन में सीम्नि अथवा सीमनि रूप होते हैं ॥१०-११ ॥ दामनी शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में दामनीभ्याम् । ककुद् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में ककुद्भ्याम् । इदम् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में दामनीभ्याम् । ककुद् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में ककुद्भ्याम् । इदम् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में आभ्यां और सप्तमी के बहुवचन में आसु रूप होते हैं । गिर् शब्द के तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में गीर्भ्याम्, तृतीया के एकवचन में गिरा और सप्तमी के बहुवचन में गीर्षु रूप बनते हैं । सुभूः और सुपूः के प्रथमा एकवचन में क्रमशः सुभूः और सूपू: रूप होते हैं । पुर् शब्द के तृतीया एकवचन में पुरा तथा सप्तमी एकवचन में पुरि रूप होते हैं । द्यौस् १ ख. ग. ' तीभ्यां भवत्यपि । २ ख. ग. ' शेषावि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०८ ९ द्यौर्द्युभ्यां दिवि द्युषु ( च ) तादृश्या तादृशी दिशः । यादृश्यां यादृशी तद्वत्सुयचोभ्यां असौ ' चामुम ( मू अ ) मूं चामूरमूभिरमुयाऽमुयोः सुवचः स्वपि ॥ ॥१३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्त्रीलिंगशब्दसिद्धरूपकथनं नाम द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५२ ॥
अथ त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नपुंसकशब्दसिद्धरूपम् स्कन्द उवाच नपुंसके किं के कानि के कानि ततो ' जलम् । सर्वं सर्वे च पूर्वाद्याः सोमपं सोमपानि च ॥ १ ॥
ग्रामणि ग्रामणिनी च ग्रामणि ग्रामणीन्यपि 1 । वारि वारिणी वारीणि वारि ( री ) णां वारिणीदृशम् ॥२ ॥
शब्द के प्रथमा एकवचन में द्यौः, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में द्युभ्याम्, सप्तमी एकवचन में दिवि और सप्तमी बहुवचन में द्युषु रूप होते हैं । तादृक् के प्रथमा एकवचन में तादृशी और तृतीया के एकवचन में तादृश्या रूप होते हैं । दिक् शब्द के प्रथमा बहुवचन का दिशः रूप है । यादृश् शब्द के प्रथमा एकवचन में यादृशी और सप्तमी एकवचन में यादृश्याम् रूप होते हैं । इसी प्रकार सुवचस् शब्द का तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में सुवचोभ्याम् और सप्तमी में सुवचःसु रूप होता है । अदस् शब्द के प्रथमा एकवचन में असौ, द्विवचन में अमू और बहुवचन में अमूः, द्वितीया के एकवचन में अमूम्, तृतीया के एकवचन में अमुया, बहुवचन में अमूभिः और षष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में अमुयोः रूप बनते हैं ॥१२-१३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्त्रीलिंगशब्दसिद्धरूप - कथन नामक तीन सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५२ ॥
अध्याय ३५३ नपुंसकसिद्धरूप स्कन्द बोले - नपुंसक किम् शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया विभक्तियों के तीनों वचनों में रूप किम्, के, कानि होते हैं । इसी प्रकार जल शब्द के भी रूप होते हैं । सर्व शब्द के प्रथमा के एकवचन और द्विवचन के रूप बनते हैं सर्वम् और सर्वे । इसी प्रकार पूर्व इत्यादि शब्दों के भी रूप चलते हैं । सोमपा शब्द के प्रथमा एकवचन और बहुवचन में रूप सोमपम् और सोमपानि बनते हैं ॥१ ॥ ग्रामणी शब्द के प्रथमा और द्वितीया के एकवचन और द्विवचन के
रूप ग्रामणि और ग्रामणिनी तथा बहुवचन में ग्रामणीनि होते हैं । वारि शब्द के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के तीनों वचनों में रूप होते हैं - वारि, वारिणी, वारीणि, षष्ठी बहुवचन में इसके रूप हैं वारीणाम् और सप्तमी एकवचन में १ ख. ग. चामूरमुममूरमूभिरमुयाव ( मु ) योः । २ ख. ग. जगत् । ६ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१० ९ ० अग्निपुराणम् शुचये शुचिने देहि मृदुने मृदवे तथा । कर्त्रा च कर्तॄणे कर्त्रे अतिर्यतिरिणां तथा । यद्यत्विमे तत्कर्माणि इदं चेमे त्विमानि च । अहमावां वयं मां वै आवामस्मान्मया कृतम् । मदावाभ्यां मदस्मच्च पुत्रोऽयं मम चाऽऽवयोः । त्वां ( च ) युवां च युष्मांश्च त्वया युष्माभिरीरितम् । तव युवयोर्युष्माकं त्वयि युष्मासु भारती । इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्रपु त्रपुणि ( णी ) त्रपूणां च खलपूनि खलप्वि च ॥ ३ ॥
अभिन्यभिनिनी चैव सुवचांसि सुबाक्षु च ॥४ ॥
ईदृक्त्वदोऽमुनी अमूनि अमुना स्यादमीषु च ॥ ५ ॥
आवाभ्यां च तथाऽस्माभिर्मह्यमस्मभ्यमेव च ॥ ६ ॥
अस्माकमपि चास्मासु त्वं युवां यूयमीजिरे ॥ ७ ॥
तुभ्यं युवाभ्यां युष्मभ्यं त्वत्, युवाभ्यां च युष्मच्च ॥८ ॥
उपलक्षणमत्रैव अज्झलन्ताश्च ते स्मृताः ॥ ९ ॥
नपुंसकशब्दसिद्धरूपकथनं नाम त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५३ ॥
वारिणि रूप बनते हैं । शुचि शब्द के चतुर्थी एकवचन में शुचये - शुचिने और मृदु के मृदुने अथवा मृदवे रूप बनते हैं । त्रपु शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया के एकवचन में और द्विवचन में क्रमशः त्रपु और त्रगुणी रूप बनते हैं । खलपू शब्द के प्रथमा, बहुवचन में खलपूनि तथा सप्तमी एकवचन में खलप्वि रूप बनते हैं ॥२-३ ॥ कर्तृ शब्द के तृतीया एकवचन में कर्त्रा, चतुर्थी एकवचन में कर्त्रे रूप बनता है । अतिर् शब्द के सप्तमी एकवचन में अतिरि और षष्ठी बहुवचन में अतिरिणाम् रूप बनते हैं । अभिनि शब्द के प्रथमा और द्वितीया के एकवचन और द्विवचन में क्रमशः अभिनि और अभिनिनी रूप होते हैं । सुवच् शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया के बहुवचन में सुवचांसि और सप्तमी के बहुवचन में सुवाक्षु रूप होते हैं || ४ || यत् शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया एकवचन में यत्, यत्, तत् के प्रथमा तथा द्वितीया एकवचन में तत् कर्म के प्रथमा तथा द्वितीया के बहुवचन में कर्माणि, इदम् के प्रथमा और द्वितीया के तीनों वचनों में इदम्, इमे, इमानि, ईदृक् शब्द का प्रथमा तथा द्वितीया के एकवचन में ईदृक्, अदस् के प्रथमा तथा द्वितीया के तीनों वचनों में अदः, अमुनी, अमूनि, तृतीया एकवचन में अमुना और सप्तमी बहुवचन में अमीषु रूप होते हैं ॥५ ॥
अस्मद् शब्द के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में अहम्, आवाम्, वयम्, द्वितीया के तीनों वचनों में माम्, आवाम्, अस्मान्, तृतीया के तीनों वचनों में मया, आवाभ्याम्, अस्माभिः, षष्ठी के तीनों वचनों में मम, आवयोः, अस्माकम् और सप्तमी के बहुवचन में अस्मासु रूप होते हैं ॥ ६-७ ॥ युष्मद् शब्द के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में त्वम्, युवाम्, यूयम्, द्वितीया के तीनों वचनों में त्वाम्, युवाम्, युष्मान्, तृतीया के एकवचन और बहुवचन में क्रमशः त्वया और युष्माभिः, चतुर्थी के तीनों वचनों में तुभ्यम्, युवाभ्याम्, युष्मभ्यम्, पञ्चमी के तीनों वचनों में तव, युवयोः, युष्माकम्, सप्तमी के एकवचन और बहुवचन में क्रमशः त्वयि और युष्मासु रूप होते हैं । ये उदाहरण उपलक्षण मात्र हैं । इसी प्रकार ( अन्य ) अजन्त और हलन्त शब्दों के रूप कहे गये हैं ॥८ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नपुंसकशब्दसिद्धरूपकथन नामक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५३ ॥
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चतुष्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १० ९ १ अथ चतुष्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः कारकम् स्कन्द उवाच कारकं संप्रवक्ष्यामि विभक्त्यर्थसमन्वितम् । ग्रामोऽस्ति ' हेमहार्केह नौमि विष्णुं श्रिया सह ॥१ ॥
स्वतन्त्रः कर्ता विद्यां तां कृतिनः समुपासते । हेतुकर्ता लम्भयते ' हितं वै कर्मकर्तरि ॥२ ॥
स्वयं भिद्यते प्राकृतधीः स्वयं च च्छिद्यते तरुः । कर्ताऽभिहित उत्तमः कर्ताऽनभिहितोऽधमः ॥३ ॥
" कर्तानभिहितो धर्मः शिष्ये व्याख्यायते यथा । कर्ता पञ्चविधः प्रोक्तः कर्म सप्तविधं शृणु ॥४ ॥
ईप्सितं कर्मं च यथा श्रद्दधाति हरिं यतिः । अनीप्सितं कर्म यथा अहिं लङ्घयते भृशम् ॥५ ॥
नैवेप्सितं नानीप्सितं दुग्धं संभक्षयन्रजः । भक्षयेदप्यकथितं गोपालो दोग्धि गां पयः ॥६ ॥
कर्तृकर्माथ गमयेच्छिष्यं ग्रामं गुरुर्यथा । कर्म चाभिहितं पूजा क्रियते वै श्रिये हरेः ॥ ७ ॥
अध्याय ३५४ कारक स्कन्द बोले- अब मैं विभक्त्यर्थ से युक्त कारक के सम्बन्ध में बताऊँगा । इनका प्रयोग इस प्रकार किया जाता है । ‘ ग्रामोऽस्ति ' यहाँ प्रथमा विभक्ति हुई है । हे महार्क! यहाँ सम्बोधन में प्रथमा है । इह नौमि विष्णुं श्रिया सह यहाँ विष्णुं में द्वितीया हुई है || १ || स्वतन्त्र कर्त्ता उसे कहते हैं जो ( क्रिया में ) स्वतन्त्र रूप से विवक्षित रहता है, जैसे ' विद्यां तां कृतिनः समुपासते ' यहाँ कृतिनः कर्त्ता है । हेतुकर्त्ता का ' चैत्रो मैत्रं लम्भयते । ' कर्मकर्त्ता का उदाहरण – ‘ स्वयं भिद्यते प्राकृतधीः ' ( प्राकृत बुद्धि के व्यक्ति में स्वयं भेद उत्पन्न हो जाता है ) ' स्वयं च छिद्यते तरु: ' ( वृक्ष स्वयं काटा जाता है । ) जो कर्त्ता उक्त होता है, उसे उत्तम और जो अनुक्त होता है उसे अधम कहते हैं ॥२-३ ॥ अनुक्त कर्त्ता वहाँ पर होता है जैसे - ‘ धर्मः शिष्ये व्याख्यायते ' ( शिष्य के लिए धर्म की व्याख्या की जाती है ) । पाँच प्रकार का कर्त्ता कहा जा चुका है, अब सात प्रकार के कर्म के विषय में सुनो- ' ईप्सितम् कर्म ' ( अभीष्ट को कर्म कहते हैं ) जैसे - श्रद्दधाति हरिं यतिः ' ( यति विष्णु के प्रति श्रद्धा रखता है ) । अनीप्सित कर्म जैसे - ‘ अहिम् लङ्घयते भृशम् ' ( सर्प का अत्यन्त उल्लंघन करता है ) ईप्सित और अनीप्सित कर्म जैसे - ' दुग्धं सम्भक्षयन् रजः भक्षयेत् ' ( दुग्ध खाते हुए धूलि खाना चाहिए ) । अकथित कर्म जैसे - ' गोपालो दोग्धि गां पयः ' ( ग्वाला गाय से दूध दुहता है ) || ४-६ ॥ कर्तृकर्म – जहाँ प्रयोजक कर्त्ता का प्रयोग होता है, वहाँ प्रयोज्य कर्त्ता कर्म के रूप में परिणत हो जाता है । यथा-' गुरुः शिष्यं ग्रामं गमयेत् ' ( गुरु शिष्य को ग्राम भेजे ) । यहाँ गुरु प्रयोजक कर्त्ता है, और शिष्य प्रयोज्य कर्त्ता या ' कर्मभूत कर्त्ता ’ है । ‘ अभिहित कर्म ' ‘ श्रिये हरेः पूजा क्रियते ' ( लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए श्री हरि की पूजा की जाती है ) । यहाँ कर्म में प्रत्यय होने से पूजा ' उक्त कर्म ' है, इसी को ' अभिहित कर्म ' कहते हैं । अनभिहित कर्म - जहाँ कर्त्ता में प्रत्यय १ ख. ग. ' म् । समोऽस्ति महाकेह । २ क. ङ. हेमहावैहमासविष्णुः श्रिः । ३ ख. ग. र्ता न म्रियते । ४ क. ङ. लभते । ५ ख. ग. र्तानाभिहितो धर्मः शिष्यो व्याख्यायतेऽन्यथा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१० ९ २ अग्निपुराणम् ' कर्मानभिहितं स्तोत्रं हरेः कुर्यात्तु सर्वदम् । करणं द्विविधं प्रोक्तं बाह्यम ( मा ) भ्यन्तरं तथा ॥८ ॥
चक्षुषा रूपं गृह्णाति वा ( बा ) ह्यं दात्रेण तल्लुनेत् । संप्रदानं त्रिधा प्रोक्तं प्रेरकं ब्राह्मणाय गाम् ॥९ ॥
नरो ददाति नृपतये दासं तदनुमन्तृकम् । अनिराकर्तृकं भर्त्रे दद्यात्पुष्पाणि सज्जनः ॥ १० ॥
अपादानं द्विधा प्रोक्तं चलमश्वात्तु धावतः । पतितश्चाचलं ग्रामादागच्छति स वैष्णवः ॥ ११ ॥
चतुर्धा चाधिकरणं व्यापकं दध्नि वै घृतम् । तिलेषु तैलं देवार्थमौपश्लेषिकमुच्यते ॥ १२ ॥
गृहे तिष्ठेत्कपिर्वृक्षे स्मृतं वैषयिकं यथा । जले मत्स्यो वने सिंहः स्मृतं सामीप्यकं यथा ॥१३ ॥
होता है, वहाँ कर्म अनभिहित हो जाता है, अतएव उसमें द्वितीया विभक्ति होती है । जैसे- ' हरेः सर्वदं स्तोत्रं कुर्यात् ' ( श्री हरि की सर्वमनोरथदायिनी स्तुति करें ) । करण दो प्रकार का बतलाया गया है - बाह्य और आभ्यन्तर । ' तृतीया करणे भवेत् ' इस नियम के अनुसार करण में तृतीया होती है । आभ्यन्तर का उदाहरण देते हैं- ' चक्षुषा रूपं गृह्णाति ' । ( नेत्र से रूप को ग्रहण करता है । ) यहाँ नेत्र ' आभ्यन्तर करण ' है, अतः इसमें तृतीया विभक्ति हुई । ' बाह्यकरण ' का उदाहरण है - ‘ दात्रेण तल्लुनेत् । ' ( हसुआ से उसको काटे ) । यहाँ दात्र ' बाह्यकरण ' है । अतः उसमें तृतीया हुई है । सम्प्रदान तीन प्रकार का बताया गया है । प्रेरक, अनुमन्तृक और अनिराकर्तृक । जो दान के लिए प्रेरित करता हो, वह ‘ प्रेरक ’ है । जो प्राप्त हुई किसी वस्तु के लिए अनुमति या अनुमोदन मात्र करता है, वह ' अनुमन्तृक ' है । जो न प्रेरक है, न अनुमन्तृक है, अपितु किसी की दी हुई वस्तु को स्वीकार कर लेता है, उसका निराकरण नहीं करता, वह ‘ अनिराकर्तृक - सम्प्रदान ' है । ' सम्प्रदाने चतुर्थी ' इस नियम के अनुसार सम्प्रदान में चतुर्थी होती है । तीनों सम्प्रदानों के क्रमशः उदाहरण दिये जाते हैं- १. ' नरो ब्राह्मणाय गां ददाति ' ( मनुष्य ब्राह्मण को गाय देता है ) । २. ' नरो नृपतये दासं ददाति ' ( मनुष्य राजा को दास अर्पित करता है ) । ३. ' सज्जनः भर्त्रे पुष्पाणि दद्यात् ' ( सज्जन पुरुष स्वामी को पुष्प दे ) ॥७-१० ॥ अपादान दो प्रकार का होता है - ' चल और अचल ' । कोई भी अपादान क्यों न हो, ( ' अपदाने पञ्चमी स्यात् ' ) - इस नियम के अनुसार उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है । ' धावतः अश्वात् पतितः ' ( दौड़ते हुए घोड़े से गिरा ) यहाँ चल अपादान है । ' स वैष्णवः ग्रामादायाति ' ( वह वैष्णव गाँव से आता है ) यहाँ अचल अपादान है । अधिकरण चार प्रकार के होते हैं - अभिव्यापक, औपश्लेषिक, वैषयिक और सामीप्यक । जो तत्त्व किसी वस्तु में व्यापक हो, वह आधारभूत वस्तु ' अभिव्यापक अधिकरण ' है । यथा - दध्नि घृतम् ' ( दही में घी है ) । ' तिलेषु तैलं देवार्थम् ' । ( तिल में तेल है जो देवता के उपयोग में आता है ) । यहाँ घी दही में और तैल तिल में व्याप्त है । अतः इनके आधारभूत दही और तिल अभिव्यापक अधिकरण हैं । अब ' औपश्लेषिक अधिकरण ' बताया जाता है - ‘ कपिर्गृहे तिष्ठेत् ' ' वृक्षे च तिष्ठेत् ' ( बन्दर घर के ऊपर स्थित होता है और वृक्ष पर भी स्थित होता है ) । कपि के आधारभूत जो गृह और वृक्ष हैं, उन पर वह सटकर बैठता है । इसीलिए वह ' औपश्लेषिक अधिकरण ' माना गया है । अब वैषयिक अधिकरण बताते हैं - विषयभूत अधिकरण को ' वैषयिक ' कहते हैं । यथा - ' जले मत्स्यः ', ' वने सिंहः ' ( जल में मछली, वन में सिंह ) । अब सामीप्यक अधिकरण बतलाते हैं - ' गंगायां घोषो वसति ' ( गंगा में गोशाला बसती है ) । यहाँ गंगा १ क. ङ. ' मभिनिहि । २ क. ङ. ' तिर्थसूयेवासस्तदधिमन्तिकम् । अनिशकर्तं दात्रे दद्यात्प्राग्र्योऽपि CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सज्ज ' ।
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चतुष्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १० ९ ३ गंगायां घोषो वसति औपचारिकमीदृशम् । विष्णुः सम्पूज्यते लोकैर्गन्तव्यं तेन तस्य वा । हेतौ तृतीया चान्येन वसेदवृक्षाय वै जलम् । योगे वृष्टः परिग्रामाद्देवोऽयं बलवत्पुरा । पृथग्विनाद्यैस्तृतीया पञ्चमी च तथा भवेत् । कर्मप्रवचनीयाख्यैर्द्वितीया योगतो भवेत् । नमः स्वाहास्वधास्वस्तिवषडाद्यैश्चतुर्थ्यपि । पाकाय पक्तये याति तृतीया सहयोगके । का अर्थ है गंगा के समीप । ऐसे वाक्य औपचारिक तृतीया वाऽथ वा षष्ठी स्मृताऽनभिहिते तथा ॥१४ ॥
प्रथमाऽभिहितकर्तृकर्मणोः प्रणमेद्धरिम् ॥१५ ॥
चतुर्थी तादर्थ्येऽभिहिता पञ्चमी पर्युपाङ्मुखैः ॥१६ ॥
पूर्वो ग्रामादृते विष्णोर्न मुक्तिरितरो हरेः ॥ १७ ॥
पृथग्ग्रामाद्विहारेण विना श्रीश्च ( श्रियं ) श्रिया श्रियः ॥ १८ ॥,
अन्वर्जुनं च योद्धारो ह्यभितो ग्राममीरितम् ॥ १ ९ ॥ नमो देवाय ते स्वस्ति तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥ २० ॥
हेत्वर्थे कुत्सितेऽङ्गे सा तृतीया च विशेषणे ॥ २१ ॥
माने जाते हैं । जहाँ मुख्यार्थ बाधित होने से उसके सम्बन्ध से युक्त अर्थान्तर की प्रतीति होती है, वहाँ ' लक्षणा ' होती है । इस तरह के वाक्य प्रयोग को ' औपचारिक ' कहते हैं ॥ ११-१३३ ॥ अभिनिहित कर्त्ता में तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती है । यथा - ' विष्णुः सम्पूज्यते लोकैः ' ( लोगों द्वारा विष्णु पूजे जाते हैं ) यहाँ कर्म में प्रत्यय हुआ है । अतः कर्म उक्त है और कर्त्ता अनुक्त । इसलिए अनुक्त कर्त्ता ' लोक ' शब्द में तृतीया विभक्ति हुई है । ' तेन गन्तव्यम्, तस्य गन्तव्यम् ' ( उसको जाना चाहिए ) वहाँ उपर्युक्त नियम के अनुसार तृतीया और षष्ठी - दोनों का प्रयोग हुआ है । षष्ठी का प्रयोग कृदन्त के योग में ही होता है । अभिहित कर्त्ता और कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है । इसलिए ' विष्णुः ' में प्रथमा विभक्ति हुई है । ' भक्तः हरिं प्रणमेत् ' ( भक्त भगवान् को प्रणाम करे ) । यहाँ अभिहित कर्त्ता ' भक्त ' में प्रथमा विभक्ति हुई है और अनुक्त कर्म ' हरि ' में द्वितीया विभक्ति । ' हेतु ' में तृतीया विभक्ति होती है । यथा- ' अन्नेन वसेत् ' ( अन्न के हेतु कहीं भी निवास करे ) । यहाँ हेतुभूत अन्न में तृतीया विभक्ति हुई है । ‘ तादर्थ्य ' में चतुर्थी विभक्ति कही गयी है । यथा - ' वृक्षाय जलम् ', ( वृक्ष के लिए पानी ) । यहाँ वृक्ष शब्द में ' तादर्थ्य ' प्रयुक्त चतुर्थी विभक्ति हुई है । ' परि, उप, आङ् ' आदि के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा - ' परिग्रामात् पुरा बलवत् वृष्टोऽयं देवः । ' ( गाँव से कुछ दूर हटकर दैव ने पूर्वकाल में बड़े जोर की वर्षा की थी ) इस वाक्य में ' परि ' के साथ योग होने के कारण ' ग्राम ' शब्द में पञ्चमी विभक्ति हुई है । दिग्वाचक शब्द, अन्यार्थक शब्द तथा ' ऋते ' आदि शब्दों के योग में भी पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा - पूर्वो ग्रामात् । ऋते विष्णोः । न मुक्तिः इतरो हरेः । पृथक् और बिना आदि के योग में तृतीया एवं पञ्चमी विभक्ति होती है । जैसे - ' पृथग् ग्रामात् ' यहाँ ' पृथक् ' शब्द के योग में ग्राम शब्द से पञ्चमी विभक्ति हुई । और पृथग् ' विहारेण ' यहाँ ' पृथक् ' शब्द के योग में विहार शब्द से तृतीया विभक्ति हुई है । इसी प्रकार ' विना ' शब्द के योग में भी जानना चाहिए । ' विना श्रिया'-यहाँ बिना के योग में श्री शब्द से द्वितीया और ' विना श्रियः'- यहाँ विना के योग में श्री शब्द से तृतीया और ' विना श्रियः'- यहाँ ' विना ' के योग में ' श्री ' शब्द से पञ्चमी हुई है । कर्मप्रवचनीय संज्ञक शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है । जैसे- ' अन्वर्जुनं योद्धारः ' - योद्धा अर्जुन के सन्निकट प्रदेश में हैं । यहाँ ' अनु ' कर्मप्रवचनीय संज्ञक हैं । इसके योग में अर्जुन शब्द में द्वितीया विभक्ति हुई । इसी प्रकार अभितः, परितः आदि के योग में भी द्वितीया होती है । जैसे - ' अभितो ग्राममीरितम् ' गाँव के सब तरफ कह दिया है ॥१४-१९ ॥ नमः, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति और वषट् आदि के साथ - साथ चतुर्थी का प्रयोग होता है । जैसे - ' नमो देवाय ' ( देवता को नमस्कार ) और ' ते स्वस्ति ' ( तुम्हारा कल्याण हो ) तुमुन् के अर्थ में भाववाचक संज्ञाओं के साथ भी चतुर्थी का प्रयोग होता है । जैसे - ' पाकाय पक्तये याति ' ( पकाने के लिए जाता है ) । सहयोग, हेत्वर्थ, कुत्सित अंग और विशेषण के साथ भी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१० ९ ४ अग्निपुराणम् पिताऽगात्सह पुत्रेण काणोऽक्ष्णा गदया हरिः । अर्थेन निवसेद्भृत्यः काले भावे च सप्तमी ॥ २२ ॥
विष्णौ नते भवेन्मुक्तिर्वसन्ते स गतो हरिम् । नृणां स्वामी नृषु स्वामी नृणामीशः सतां पतिः ॥ २३ ॥
नृणां साक्षी नृषु साक्षी गोषु नाथो गवां पतिः । गोषु सूतो गवां सूतो राज्ञां दायादको स्त्विह ॥२४ ॥
अन्नस्य हेतोर्वसति षष्ठी स्मृत्यर्थकर्मणि । मातुः स्मरति गोप्तारो नित्यं स्यात्कर्तृकर्मणोः ॥ २५ ॥
अपां भेत्ता तव कृतिर्न निष्ठादिषु षष्ठ्यपि ॥२६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये कारकनिरूपणं नाम चतुष्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५४ ॥
अथ पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः समासः स्कन्द उवाच षोढा समासं वक्ष्यामि अष्टाविंशतिधा पुनः । नित्यानित्यविभागेन लुगलोपेन च द्विधा ॥ १ ॥
कुम्भकारश्च नित्यः स्याद्धेमकारादिकस्तथा ॥ राज्ञः पुमान्राजपुमाननित्योऽयं समासकः || २ || तृतीया का प्रयोग होता है । जैसे- ' पिताऽगात् सह पुत्रेण ' ( पुत्र के साथ पिता गया ) ' काणोऽक्ष्णा ' ( आँख से काना ) ‘ गदया हरि: ’ ( गदाधारी विष्णु ) और ' अर्थेन निवसेद्भृत्यः ' ( धन के लिए नौकर को रहना चाहिए ) । काल और भाव में सप्तमी का प्रयोग होता है । जैसे - ' वसन्ते स गतो हरिम् ' ( वह वसन्त में हरि के पास गया ) । ' विष्णौ नते भवेन्मुक्तिः ' ( विष्णु का नमस्कार करने पर मुक्ति होती है ) । कुछ अर्थों में षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियाँ होती हैं । जैसे-' नृणां स्वामी, नृषु स्वामी, नृणामीशः ' ( मनुष्यों का स्वामी ) सतां पतिः ( सज्जनों का स्वामी ), ' नृणां साक्षी, नृषु साक्षी ' ( मनुष्यों का साक्षी ) ‘ गोषु नाथो, गवाम् पतिः ' ( गायों का स्वामी ), ' गोषु सूतो, गवाम् सूतो ' ( गायों से उत्पन्न ), ‘ राज्ञां दायादकः ' ( राजाओं का साझीदार ) ॥२०- २४ ॥ ' अन्नस्य हेतोर्वसति ' ( अन्न के लिए रहता है ) । जिसका स्मरण किया जाता है उसमें कर्म के अर्थ में षष्ठी का प्रयोग होता है । जैसे - ' मातुः स्मरति ' ( माता का स्मरण करता है ) । इसी प्रकार कर्त्ता और कर्म के निष्ठा आदि में भी षष्ठी का प्रयोग होता है । जैसे - ' अपाम् भेत्ता ' ( जल का भेदन करनेवाला ) ‘ तव कृतिर्न ' ( तुम्हारी कृति नहीं है ) ॥२५-२६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कारक - निरूपण कथन नामक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५४ ॥
अध्याय ३५५ समास स्कन्द बोले - अब मैं समास के विषय में बताऊँगा । यह छह प्रकार के होते हैं और पुनः जिसके अट्ठाईस भेद होते हैं । कुछ समास नित्य और कुछ अनित्य होते हैं । उनके दो पैर और होते हैं - लुक् और समास नित्य होते हैं जैसे - कुम्भकार और हेमकार इत्यादि । ' राज्ञः पुमान् ' का ' राजपुमान् अलुक् ॥ १ ॥ कुछ
' हो जाना अनित्य समास १ ख. ग. ' जपुंसामनि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १० ९ ५ कष्टश्रितो लुक्समासः कण्ठेकालादिकस्त्वलुक् प्रथमातत्पुरुषोऽयं पूर्वं कायस्य विग्रहे काया अर्धकणा भिक्षातू ( तु ) र्यमथेदृशम् वर्षं भोग्यो वर्षभोग्यो धान्यार्थश्च तृतीयया राज्ञः पुमान्नाजपुमान्षष्ठी वृक्षफलं तथा कर्मधारयः सप्तधा नीलोत्पलमुखाः स्मृताः वैयाकरणखसूचिः शीतोष्णं द्विपदं शुभम् उपमानोत्तरपदः पुरुषव्याघ्र इत्यपि गुण इति वृत्तिर्वाच्या सुहृदेव सुबन्धुकः । स्यादष्टधा तत्पुरुषः प्रथमाद्याः सुपा सह ॥३ ॥
। पूर्वकायोऽपरकायो ह्यधरोत्तरकायकः ॥४ ॥
। आपन्नर्जीविकस्तद्वद्द्वितीया माधवाश्रितः ॥५ ॥
। चतुर्थी स्याद्विष्णु बलिर्वृकभीतिश्च पञ्चमी ॥ ६ ॥
। सप्तमी चाक्षशौण्डोऽयमहितो नञ्समासकः ॥७ ॥
। विशेषणपूर्वपदो विशेष्योत्तरतस्तथा ॥८ ॥
। उपमानपूर्वपदः शङ्खपाण्डुर इत्यपि ॥९ ॥
। संभावनापूर्वपदो गुणवृद्धिरितीदृशम् ॥१० ॥
। अवधारणापूर्वपदो बहुव्रीहिश्च सप्तधा ॥११ ॥
है ॥ लुक् समास का उदाहरण है- ' कष्टश्रितः ' और अलुक् समास का ' कण्ठे काल ' इत्यादि । प्रथमा इत्यादि विभक्तियों से युक्त रहने के कारण तत्पुरुष समास आठ प्रकार का होता है । प्रथमान्त आदि शब्द सुबन्त के साथ समस्त होते हैं ॥ २-३ ॥ ' पूर्वकाय: ' इस तत्पुरुष समास में जब ' पूर्व कायस्य ' ऐसा विग्रह किया जाता है, तब यह ' प्रथमा तत्पुरुष ' समास कहा जाता है । इसी प्रकार ' अपरकायः ' -कायस्य अपरम्. इस विग्रह में, ' अधरकाय: ' - कायस्य अधरम्, इस विग्रह में और ‘ उत्तरकायः ' -कायस्योत्तरम्, इस विग्रह में भी प्रथमा तत्पुरुष समास कहा जाता है । ऐसे ही ' अर्धकणा ’ इसमें अर्द्धम् कणायाः- ऐसा विग्रह होने से प्रथमा तत्पुरुष समास होता है एवं भिक्षातुर्यम् - इसमें ' तुर्यं भिक्षायाः ' ऐसा विग्रह होने से ' तुर्यभिक्षा ' और पक्षान्तर में ' भिक्षातुर्यम् ' - ऐसा षष्ठी तत्पुरुष होता है । ऐसे ही ' आपन्नजीविकः ’ यह द्वितीया तत्पुरुष समास है । इसका विग्रह इस प्रकार होता है- ' आपन्नो जीविकाम् ' । पक्षान्तर में ' जीविकापन्नः ’ ऐसा रूप होता है । इसी प्रकार ' माधवाश्रितः ' - यह द्वितीया समास है, इसका विग्रह ' माधवम् आश्रित: ' इस प्रकार है । ‘ वर्षभोग्यः ' यह द्वितीया तत्पुरुष समास है - इसका विग्रह है ' वर्ष भोग्य: ' । ' धान्यार्थः ' यह तृतीया समास है । इसका विग्रह ‘ धान्येन अर्थ: ' इस प्रकार है । ' विष्णुबलि: ' - यहाँ ' विष्णवे बलि: ' - इस विग्रह में चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है । ' वृकभीतिः ' यह पञ्चमी तत्पुरुष है । इसका विग्रह ' वृकाद् भीतिः'- इस प्रकार है । ' राजपुमान् ' यहाँ ' राज्ञः पुमान् ' - इस विग्रह में षष्ठी तत्पुरुष समास होता है । इसी प्रकार ' वृक्षस्य फलम् ' ' वृक्षफलम् ' यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास है । ' अक्षशौण्डः ' ( द्यूत क्रीड़ा में निपुण ) इसमें सप्तमी तत्पुरुष समास है । अहितः- जो हितकारी न हो, वह इसमें ' नञ्समास ' है ॥४-७ ॥ ‘ नीलोत्पल ’ आदि जिसके उदाहरण, वह ' कर्मधारय ' समास सात प्रकार का होता है - १. विशेषण पूर्वपद ( जिसमें विशेषण पूर्वपद हो और विशेष्य उत्तरपद अथवा ) । इसका उदाहरण - ' नीलोत्पल ' ( नीला कमल ) । २. विशेष्योत्तर विशेषणपद - इसका उदाहरण है - ‘ वैयाकरणखसूचिः ' ( कुछ पूछने पर आकाश की ओर देखनेवाला वैयाकरण ) । ३. विशेषणोभयपद ( अथवा विशेषणद्विपद ) जिसमें दोनों पद विशेषण रूप ही हों । जैसे शीतोष्ण ( ठण्डा - गरम ) । ४. उपमान पूर्वपद - इसका उदाहरण है - ' शङ्खपाण्डुरः ' ( शङ्ख के समान सफेद ) । ५. उपमानोत्तरपद - इसका उदाहरण है - ' पुरुष व्याघ्रः ' ( पुरुषो व्याघ्र इव ) । ६. सम्भावनापूर्वपद- ( जिसमें पूर्वपद सम्भावनात्मक हो ) उदाहरण - गुणवृद्धिः ( गुण इति वृद्धिः स्यात् ) अर्थात् ' गुण ' ( शब्द बोलने से वृद्धि की सम्भावना होती है ) । तात्पर्य यह है कि ' वृद्धि हो'– यह कहने की आवश्यकता हो तो ' गुण ' शब्द का ही उच्चारण करना चाहिए । ७. अवधारणपूर्वपद- ( जहाँ पूर्वपद में ' अवधारण ' ( निश्चय ) सूचक शब्द का प्रयोग हो, वह ) । जैसे - ' सुहृदेव सुबन्धुकः ' ( सुहृद् ही सुबन्धु है ) । बहुव्रीहि समास भी सात प्रकार का ही होता है ॥८-११ ॥ १ ख. ग. ' हृदामेकबन्धकः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१० ९ ६ अग्निपुराणम् द्विपदश्च बहुव्रीहिरारूढभवनो नरः । ' अर्चिताशेषपूर्वोऽयं बह्वङ्घ्रिः परिकीर्तितः ॥ १२ ॥
एते विप्राश्चोपदशाः संख्योत्तरपदस्त्वयम् । संख्योभयपदो यद्वद्द्वित्रा द्वयेकत्रयो नरः ॥ १३ ॥
सहपूर्वपदो ऽयं स्यात्समूलोद्धृतकस्तरुः । व्यतिहारलक्षणोऽर्थः केशाकेशि नखानखि ॥ १४ ॥
दिग्लक्ष्या स्याद्दक्षिणपूर्वा द्विगुराभाषितो द्विधा । एकवद्भावि ( वी ) द्विशृङ्गं पञ्चमूली त्वनेकधा ॥१५ ॥
द्वन्द्वः समासो द्विविधो हीतरेतरयोगकः । रुद्रविष्णू समाहारो भेरीपटहमीदृशम् ॥१६ ॥
द्विधाऽऽख्यातोऽव्ययीभावो नामपूर्वपदो यथा । शाकस्य मात्रा शाकप्रति यथाऽव्ययपूर्वकः ॥१७ ॥
उपकुम्भं चोपरथ्यं प्राधान्येन चतुर्विधः । उत्तरपदार्थमुख्योऽयं द्वन्द्वश्चोभयमुख्यकः || ॥१८ १८ || ॥ पूर्वार्थे सोऽव्ययीभावो बहुव्रीहिश्च बाह्यगः ॥१९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये समासविभागकथनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५५ ॥
१. द्विपद, २. बहुपद, ३. संख्योत्तरपद, ४. संख्योभयपद, ५ सहपूर्वपद, ६. व्यतिहारलक्षणार्थ तथा ७. दिग्लक्षणार्थ । ' द्विपद बहुव्रीहि ' में दो ही पदों का समास होता है । यथा- ' आरूढ़ भवनो नरः ' ( आरूढं भवनं येन सः ) इस विग्रह के अनुसार जो भवन पर आरूढ़ हो गया हो, उस मनुष्य का बोध कराता है । ' बहुपद बहुव्रीहि ' में दो से अधिक पद समास में आबद्ध होते हैं । इसका उदाहरण है - ' अयम् अर्चिताशेषपूर्वः ' ( अर्चिता अशेषाः पूर्वा यस्य सोऽयम् अर्चिताशेषपूर्वः ) अर्थात् जिसके सारे पूर्वज पूजित हुए हों, वह ' अर्चिताशेषपूर्व ' है । इसमें ' अचिंत ', अशेष ' तथा ' पूर्व'-ये तीनों पद समास में आबद्ध हैं । ऐसा समास ' बहुपद ' कहा गया है । ' संख्योत्तरपद ' का उदाहरण है - ' एते विप्रा उपदशाः ' – ये ब्राह्मण लगभग दस हैं । इसमें ' दस ' संख्या उत्तरपद के रूप में प्रयुक्त है । ' दित्राः द्वयेकत्रयः ' इत्यादि संख्योभयपद के उदाहरण हैं । ' सहपूर्वपद ' का उदाहरण- -‘समूलोद्धृतकः ' तरुः ' ( सह मूलेन उद्धृतं कं शिखा यस्य सः ) । अर्थात् जड़सहित उखड़ गयी है शिखा जिसकी, ( वह वृक्ष ) - यहाँ पूर्वपद के स्थान में ' सह ' ( स ) का प्रयोग हुआ है । व्यतिहारलक्षण का उदाहरण है - केशाकेशि, नखानखि युद्धम् ( आपस में झोंटा - झोंटौवल, परस्पर नखों से बकोटा - बकोटीपूर्वक कलह ) ॥१२-१४ ॥ दिग्लक्षणार्थ का उदाहरण - उत्तरपूर्वा ( उत्तर और पूर्व के अन्तराल की दिशा ) । ' द्विगु ' समास दो प्रकार का बतलाया गया है । ' एकवद्भाव ' तथा ' अनेकधा ' स्थिति को लेकर ये भेद किये गये हैं । संख्यापूर्वपदवाला समास ‘ द्विगु ' है । यह ' कर्मधारय ' का ही एक भेद - विशेष स्वीकार किया गया है । ' एकवद्भाव ' का उदाहरण है - द्विशृङ्गम् ( दो सींगों का समाहार ) । ' पञ्चमूली ' भी इसी का उदाहरण है । ' अनेकधा ' या ‘ अनेकवद्भाव ' का उदाहरण है - ' सप्तर्षयः ' इत्यादि । ' पञ्चब्राह्मणाः ' में समास नहीं होगा, क्योंकि यहाँ संज्ञा नहीं है । ' द्वन्द्व ' समास भी दो ही प्रकार का होता है - १.इतरेतरयोगी, २. समाहारवान् । प्रथम का उदाहरण है - रुद्रविष्णू । ( रुद्रश्च विष्णुश्च - रुद्र तथा विष्णु ) यहाँ इतरेतर – योग है । समाहार का उदाहरण है- भेरीपटहम् ( भेरी च पटहश्च, अनयोः समाहारः - अर्थात् भेरी और पटह का समाहार ) । यहाँ ' तुर्याङ्ग ' होने से इनका एकवद्भाव होता है । अव्ययीभाव समास भी दो तरह का होता है- १. नामपूर्वपद और २. ( ' यथा ' आदि ) अव्ययपूर्वपद । प्रथम का उदाहरण है - शाकस्य मात्रा - शाकप्रति । यहाँ ' शाक ' पूर्वपद है और मात्रार्थक ‘ प्रति ’ अव्यय उत्तरपद । दूसरे का उदाहरण - ' उपकुमारम् - उपरथ्यम् ' इत्यादि हैं । समास को प्रायः चार में विभक्त किया जाता है —१. उत्तरपदार्थ की प्रधानता से युक्त ( तत्पुरुष ), २. उभयार्थ - प्रधान द्वन्द्वसमास प्रकारों प्रधान ‘ अव्ययीभाव ' तथा ४. अन्य अथवा बाह्यपदार्थ - प्रधान ' बहुव्रीहि ' ॥१५-१९ ॥, ३. पूर्वपदार्थ-श्री अग्निमहापुराण में समास - विभाग - कथन नामक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५५ ॥
१ ख. ग. अर्जिता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA