अग्नि पुराण — पृष्ठ 31–40
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 31–40
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२७ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० ३१ सर्वरोगनाशक अपामार्जन - स्तोत्र १५४ ४७ ३२ निर्वाण आदि की दीक्षा के अधिकार के लिए गर्भाधान आदि अड़तालीस संस्कारों का कर्त्तव्यत्वेन निरूपण । ३३ श्री आदि देवताओं के उद्देश्य से सुवर्ण आदि से निर्मित पवित्रक का धारण । एकादशी को बलिदानपूर्वक विष्णु की सपर्या । देहशुद्धिपूर्वक विष्णु की मानसोपचार पूजा । आवरण - देवता पूजन । ३४ पवित्रक के आरोपण में पूजाहोमादि की विधि मण्डल विलेखनपूर्वक द्वारपूजा । वासुदेव आदि मन्त्रों से गोमूत्र आदि द्रव्यों का ग्रहण । कलश पर देवता की प्रतिष्ठापूर्वक पूजा । होम - विधि का प्रकार । ३५ पवित्र अधिवासन - विधि ३६ विष्णु पवित्रारोपण - विधि पवित्र दानपूर्वक विष्णु - पूजा - विधान । ब्राह्मण को पवित्र दान । पवित्र - धारण प्रशंसा । ३७ संक्षेपतः सब देवों के लिए साधारण पवित्रारोपण - विधि ३८ देवालयनिर्माण - फल वर्णन देवालय आदि में अनुपयुक्त धन की व्यर्थता । मृत्तिका से, लकड़ी से, ईंटों से, पत्थरों और सुवर्ण से देवालय - निर्माण करने में उत्तरोत्तर फलविशेष - कथन । इनका माहात्म्य प्रकाशित करने के लिए यमदूतों के प्रति यमराज का भाषण । ३ ९ विष्णु आदि देवताओं की प्रतिष्ठा में भूमि परिग्रह - संस्कार ब्रह्मा के साथ यमदूत के संवाद में हयग्रीव का संवाद । कच्छदेश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण से तथा कावेरी प्रदेश एवं कोंकण देश में उत्पन्न ब्राह्मण से प्रतिष्ठा नहीं करानी चाहिए, यह कथन । तन्त्र के पारगामी विद्वान् के हाथ से देवता की प्रतिष्ठा कराना । पूर्वादि दिशाओं में ब्रह्मादि देवताओं की प्रतिष्ठा । हल से भूमि - शोधन - प्रकार । ४० वास्तुमण्डल देवता - स्थापन, पूजन, अर्घ्यदान, बलिदानादि का विधान ४१ शिला - विन्यास का विधान मण्डल न - -1 विधान एवं चार कुण्डों का निर्माण - कथन । इष्ट का न्यास ( ईंट का न्यास ) । इष्ट का परिमाण ( नाप ) । ' शं नो देवी ' इत्यादि मन्त्रों से शिलान्यास करना । देवालय-निर्माण प्रशंसा | १५८ १३ १५ ९ ६३ १६५ ४१ १६ ९ १८ १७१ २३ १७३ १४ १७४ ५१ १७ ९ २१ १८१ ३१ १८४ ३७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२८ विषय पृ ० अध्याय ४२ प्रासाद ( मन्दिर ) लक्षण का विधान ४३ प्रासाद में देवता - स्थापन और भूतशान्ति ४४ वासुदेव आदि की प्रतिमाओं के लक्षण । देवताओं के अंगों का सप्रमाण कथन । ४५ पिण्डिकादि का लक्षण ४६ शालग्राम मूर्तियों के लक्षण ४७ शालग्रामादि की पूजा का कथन ४८ चौबीस मूर्तियों का स्तोत्र ४ ९ मत्स्यादि दश अवतारों की प्रतिमा का लक्षण ५० चण्डी आदि देवताओं की प्रतिमा का लक्षण बीस भुजाओंवाली चण्डी का स्वरूप - कथन । दस भुजाओंवाली चण्डी का कथन । नवदुर्गा का ५१ ५२ ५३ ५४ ५५ ५६ ५७ ५८ ५ ९ हरिप्राप्ति उद्देश्य से ६० स्वरूप - वर्णन । प्रसंगतः अन्य देवताओं के स्वरूप का सूर्यादिग्रहदेवताओं की प्रतिमाओं के लक्षण चौंसठ योगिनियों की प्रतिमाओं के लक्षण लिङ्गादि के लक्षण लिंगमान और व्यक्ताव्यक्त - लक्षण योग - विधि । हवन - विधि । पिण्डिका - लक्षण दसदिक्पाल याग - कथन कलशादि वास- विधि स्नपन - विधि का वर्णन अधिवासन विधि न्यास - विधि कथन । लोकपालों की सपर्या । बलिदान का प्रकार । वर्णन । देवताओं के वासुदेव आदि देवताओं की सामान्य प्रतिष्ठा - विधि आठ दिशाओं में कलशस्थापनपूर्वक हवन । शिविका ( दोला ) में हरि को स्थापित करके नगर में घुमाना । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० १८७ २६ १ ९ ० २ ९ १ ९ ३ ४ ९ x १ ९ ७ १५ x १ ९९ १३ x २०० १४ 20 २०२ १५ to २०४ २८ 20 २०७ ४३ a २११ १८ 10 २१३ १७ 10 २१५ २३ 10 २१७ ४८ 2 २२२ ९ २२३ ३२ २२६ २६ २२८ ३४ २३१ ५८ २३६ ३६
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२ ९ अध्याय विषय ६१ अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा, ध्वजारोपण आदि की विधि ध्वजा के दण्ड का परिमाण । ध्वजमोचन । ध्वजदान फल - कथन । ६२ लक्ष्मी आदि देवताओं की प्रतिष्ठा श्रीसूक्तोक्त ऋचाओं से लक्ष्मी पूजन और आचार्य - पूजन । ६३ विष्णु आदि देवताओं की प्रतिष्ठा पुस्तक लेखन - विधि । पुस्तक - प्रतिष्ठापन - विधि । पुस्तकदान - माहात्म्य । ६४ कूप, वापी, तड़ाग की प्रतिष्ठा - विधि तड़ागादि में यूप ( खम्भा ) निवेशन । जलदान की प्रशंसा । ६५ सभादिस्थापन ६६ देवता सामान्य प्रतिष्ठा । उपवन ( उद्यान ) की प्रशंसा । मठ, पौशला के दान की महिमा | ६७ जीर्णोद्धार - विधि जीर्ण प्रतिमा का गाजे - बाजे के साथ जलादि में प्रक्षेपण । बावली, पोखरा आदि के जीर्णोद्धार का माहात्म्य । ६८ उत्सव - विधि का कथन अंकुर का आरोपण । देवता की तीर्थयात्रा करना । ६ ९ स्नपनोत्सव का विस्तार से कथन ७० वृक्षारोपण की विधि वृक्षोद्यान लगाने से पापनाश के फल का कथन । ७१ गणपति- -पूजा की विधि ७२ स्नान - विधि संध्या - विधि का निरूपण । संध्या - देवता के ध्यान का कथन । की चौथी संध्याओं का वर्णन । अघमर्षण, तर्पण - विधि का ७३ सूर्य - पूजा की विधि ग्रहों को नमस्कार तथा सूर्य की प्रार्थना । रात्रि आदि में ज्ञानियों वर्णन । पृ ० सं ० श्लोक सं ० २४० ५० २४४ १४ २४६ २६ २४८ ४४ २५२ २३ २५५ ३२ २५८ ६ २५ ९ १ ९ २६१ २३ २६३ २६४ ८ २६५ ५१ २७० १७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३० विषय अध्याय ७४ शिव की पूजा - विधि का कथन द्वारस्थ देवता का पूजन तथा नव देवता का पूजन । शिव के ध्यान पूजा के ७५ देवताओं ७६ पूजा के ७७ ७८ अंगभूत जप की विधि । शिव - पूजा के अंगभूत होम - विधि के लिए बलिदान - विधि का निरूपण । चण्ड - पूजा की विधि का वर्णन अंगभूत जप- -होम का विधान । कपिला - पूजन पवित्र अधिवासन - विधि का वर्णन पृ ० का कथन | शिव-सत्ययुगादि में क्रमश: सोने, चाँदी, ताँबे और कपास से निर्मित पवित्रकों का विधान । पवित्रक के मान का कथन । ७ ९ पवित्रारोहण की विधि शिव की अर्चना का विधान । वस्त्र और आभूषण के द्वारा गुरु की अभ्यर्चना । ८० दमनक वृक्ष के आरोहण का विधान शंकर के क्रोध से उत्पन्न भैरव को शंकर का शाप । दमन के रूप को प्राप्त करनेवाले भैरव का दमन - पूजन द्वारा उद्धार । दमनक के द्वारा शिव की पूजा - विधि का वर्णन । ८१ समयाचार दीक्षाविधि का वर्णन निराधार और साधार भेद से दीक्षा के दो प्रकारों का वर्णन । कोरदार एवं श्वेत वस्त्र से शिष्य के नेत्र - बन्धन आदि का वर्णन । ८२ संस्कार -दीक्षा का विधान गुरु के द्वारा शिष्य के प्रति किये गये उपदेश का वर्णन । ८३ निर्वाण - दीक्षा की विधि का वर्णन दीक्षा में सूत्र के द्वारा शिष्य के देह बन्धन की प्रक्रिया का वर्णन बन्धन आदि प्रयोग का कथन । चण्डेश, लोकपालों का पूजन यज्ञशाला में प्रवेशन ॥ कलाओं के ग्रहण-। स्नानपूर्वक गुरु का ८४ निर्वाण - दीक्षा में निवृत्तिकला का शोधन दीक्षा के अन्तर्गत स्वप्न में हाथी, घोड़ा आदि के आरोहण का शुभसूचक वर्णन । दुःस्वप्न देखने के निवारणार्थ होमादि विधि का कथन । ब्रह्मा का आह्वानपूर्वक पूजन । वागीश्वरी देवी के पूजन की विधि का वर्णन । ब्रह्मप्रार्थना आदि का कथन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० २७२ ८४ २८० ७१ २८६ १५ २८७ २४ २ ९ ० ६ ९ २ ९ ६ ४६ ३०० १५ ३०१ ९ ५ ३१० २५ ३१२ ६२ ३१७ ६७
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३१ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० ८५ प्रतिष्ठा- - कला के शोधन - विधि का वर्णन दीक्षा में २५ तत्त्वों का विभावनादि कथन । आवाहनपूर्वक ३२३ ४१ वागीश्वर विष्णु का पूजन । पूर्ववत् और वागीश्वरी देवी का पूजन । शिष्य में चैतन्य प्रवेशन आदि की विधि का वर्णन । शिष्योद्देश्यक विष्णु की प्रार्थना का वर्णन । ८६ विद्या- कला के शोधन - विधि का निरूपण रुद्रों के स्वरूप का वर्णन और भुवनों के स्वरूप का कथन । हृदयप्रवेश से कला को अपने में निरूपित करके कुण्ड में निवेशन आदि का वर्णन । ८७ शान्ति कला का शोधन शिष्य के सिर पर अमृत - विन्दु की स्थापना आदि का वर्णन । ८८ निर्वाण -दीक्षा की अवशेष- विधि का वर्णन आवाहनपूर्वक शिव का पूजन । सम्पुट आत्मबीज से शिष्य के हृदय में ताड़न आदि विधान का कथन । शिव के अस्त्र ( मन्त्र ) से शिष्य की शिखा - छेदन आदि का कथन । अस्त्र मन्त्र के द्वारा होम - विधि का निरूपण और शिष्य का स्नान - कथन । ८ ९ एकतत्त्व दीक्षा की विधि का वर्णन शिष्य के सूत्र - बन्धन आदि प्रकारों का वर्णन । ९ ० अभिषेक आदि विधि का वर्णन दिशाओं में घटादि स्थापन की विधि । स्नान - मण्डप में शिष्य को घड़े के जल से स्नान कराने की विधि का निरूपण । ९ १ अभिषिक्त के द्वारा देवताओं के पूजन की विधि पञ्चगव्य आदि के द्वारा देवपूजा करनेवाले को देवलोक की प्राप्ति का कथन । सूर्य, शंकर आदि देवताओं का मण्डलपरिमाण कथन । ९ २ संक्षेप में प्रतिष्ठा - विधि पाँच प्रतिष्ठाओं का वर्णन । प्रासाद बनाने की इच्छा से पृथ्वी का परीक्षण । मण्डप में द्वारपूजा आदि का कथन । भूमि - परिग्रहण । शिला संस्कार - वर्णन । शिलाओं पर ब्रह्मा आदि देवताओं का पूजन । न्यूनाधिक्य दोष की निवृत्ति के लिए होमादि कथन । ९ ३ वास्तुपूजा आदि की विधि कोणों में वंश ( बाँस ) विन्यास । द्रव्य से इन्द्रादि देवताओं का पूजन । वास्तुप्रमाण का लक्षण । ३२७ २२ ३२ ९ २७ ३३२ ६१ ३३७ ३३८ १८ ३४० १८ ३४२ ६५ ३४८ ४२ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३२ अध्याय विषय पृ ० ९ ४ शिलाविन्यास- विधि ईशानादि कोणों में चरकी आदि देवताओं का पूजन । शिला की प्रार्थनापूर्वक शिला का स्थापन । प्रायश्चित्त होम । ९ ५ प्रतिष्ठा - काल तथा सामग्री आदि की विधि चैत्र को छोड़कर माघ आदि पाँच मासों में प्रतिष्ठा आदि करने की विधि । ग्रहों का शुभाशुभ निरूपण । कुण्ड और मण्डप का लक्षण । वट और गूलर की ग्राह्यता का कथन आदि ( तोरण ) बन्दनवार का लक्षण । कषाय पञ्चक ( वटादि वृक्षों के रस ) स्नानोपयुक्त ओषधियों का कथन । कलशस्थापन आदि की विधि । गन्धक, अभ्रक आदि का कथन । ९ ६ प्रतिष्ठा में अधिवासन की विधि पूर्व आदि दिशाओं में नन्दी आदि देवताओं की स्थापना आदि का कथन और अन्तर्याग । विशेष अर्घ्य आदि का कथन । लोकपालादि का पूजा - प्रकार - वर्णन । ब्राह्मण द्वारा श्रीसूक्त आदि का पाठ । लिंग में जीव आदि के न्यास का वर्णन । तत्त्व और तत्त्वेश्वरादि का घृत आदि से पूजन | होम विधि | बिना अधिवासन के याग की निष्फलता का कथन । ९ ७ शिव - प्रतिष्ठा की विधि द्वारपाल आदि की पूजा का प्रकार । शिला - विन्यास आदि का कथन । वक्र आदि दोषयुक्त लिंग में सौ बार हवन और शिव - शान्ति - पाठ । शिवलिंग प्रतिष्ठा । कलश के जल से शिव को नहलाना । चल लिंग का संस्कार । मृत्तिकामय लिंगादि का पूजन । ९ ८ प्रतिष्ठापक मन्त्र ९९ १०० कषायादि से द्वार का विन्यास । १०१ गौरी - प्रतिष्ठा - विधि । सूर्य - प्रतिष्ठा - विधि द्वार - प्रतिष्ठा - विधि का अंग - संस्कार । मूल, मध्य और अन्य भाग में आत्मा और ईश्वर प्रासाद - प्रतिष्ठा - विधि शय्या पर कुम्भादि ( कलश ) का आरोपण । १०२ ध्वजारोपण बाँस आदि के दण्ड का सकलकामनादायकत्व कथन । ध्वजारोपण के समय CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ३५२ १७ ३५४ ६१ ३५ ९ १२८ ३७० ८ ९ ३७८ १७ ३८० ३८१ ३८२ १३ ३८३ ३०
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३३ अध्याय विषय ध्वजभंग होने पर राजा और यजमान का अनिष्ट - कथन, तदर्थ शान्ति - विधान । दण्ड में अर्थतत्त्व का विन्यास । प्रतिमा, लिंग और वेदी की प्रतिष्ठा का फल । १०३ जीर्णोद्धार - विधि चिह्नरहित, अंग - भंग शिवलिंग के पिण्डी आदि के परित्याग का कथन । द्वारपूजन आदि का विधान । मन्दिर के टूट जाने पर उतने ही परिमाण से जीर्णोद्धार कथन । घटाने - बढ़ाने पर मरण, धन - क्षयादि दोष की सम्भावना का वर्णन । १०४ प्रासाद - लक्षण शकुन - परीक्षा | १०५ गृह आदि का वास्तु - शोधन दिशाओं में ईश आदि देवताओं का पूजन । पूर्वादि दिशा द्वारों के १०६ नगर आदि का वास्तु - कथन योजन आदि परिमाण में स्थान - निरूपण । आग्नेय आदि दिशाओं आदि को पृथक् - पृथक् बसाने का कथन । १०७ स्वायंभुव सर्ग का कथन प्रियव्रत के पुत्रों का नाम - कथन । अग्नीध्र आदि को प्रियव्रत द्वारा फल का कथन । में सोनार, बढ़ई जम्बूद्वीप आदि का दान । प्रियव्रत का वैकुण्ठ - गमन । ऋषभ से मेरु देवी में भरत की उत्पत्ति । भरत से सुमति आदि की उत्पत्ति । १०८ भुवनकोश कथन जम्बू आदि सातों द्वीपों का वर्णन । मेरु पर्वत का परिमाण - कथन । भारत, किंपुरुष आदि वर्षों का वर्णन । मर्यादा पर्वतों का वर्णन । केसर आदि में लक्ष्मी आदि देवताओं का स्थान - कथन । कुल पर्वत आदि का वर्णन । १० ९ तीर्थ - माहात्म्य पुष्कर माहात्म्य - वर्णन । कण्वाश्रम आदि का कथन । कुरुक्षेत्र की महिमा का वर्णन । धर्म - तीर्थ आदि का वर्णन । ११० गङ्गा - माहात्म्य १११ प्रयाग - माहात्म्य प्रयाग में दान आदि की प्रशंसा । माघ - स्नान की महिमा । गंगाद्वार आदि में गंगा की दुर्लभता । ३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA पृ ० सं ० श्लोक सं ० ३८६ २२ ३८८ ३४ ३ ९ २ ३ ९ ३ ९ ६ २४ ३ ९ ८ १ ९ ४०० ३३ ४०३ २४ ४०५ ४०६ १४
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३४ विषय पृ ० अध्याय ११२ वाराणसी - माहात्म्य अविमुक्तेश्वर - वर्णन । वाराणसी में स्नान - दानादि की प्रशंसा । ११३ नर्मदा - माहात्म्य प्रसंगतः श्रीपर्वत का वर्णन । दान आदि की प्रशंसा । ११४ गया - माहात्म्य प्रसंगतः गयासुर का आख्यान । ब्रह्मयाग - वर्णन । याग में ब्राह्मणों को ब्रह्मा के द्वारा शाप - दान आदि का वर्णन । उनके शाप का विमोचन । ११५ गया- यात्रा - विधि गया - गमन की प्रशंसा । तीर्थ में मुण्डन आदि का विधान । गया में माता का पृथक् श्राद्ध - कथन । पिता आदि का नौ देवता निमित्त श्राद्ध - कथन । कनखल तीर्थ की प्रशंसा । फल्गु तीर्थ का वर्णन । फल्गु तीर्थ में श्राद्ध की अनिवार्यता का वर्णन । मतंग वापी में स्नानादि का कथन । ब्रह्म सरोवर में स्नानादि का विधान । दशाश्वमेध में पितामह दर्शनपूर्वक श्राद्ध करने का विधान । पिण्डदान की प्रशंसा । पिण्डदान से पितरों की मुक्ति । अन्नदान की प्रशंसा । ११६ गया- यात्रा की विधि प्रात: काल स्नानपूर्वक श्राद्ध कर्म करना । मध्याह्न - काल में सन्ध्योपासन करके श्राद्ध का कर्त्तव्य पूरा करना । काकशिला पर बलि प्रदान करना । सोमकुण्ड आदि तीर्थों में पिण्डदान । महालक्ष्मी आदि देवताओं का पूजन । गदाधर- स्तोत्र । श्राद्धादि में गया-माहात्म्य का पाठ करने में ब्रह्मलोक की प्राप्ति । ११७ श्राद्धकल्प श्राद्धकर्म में आचारसम्पन्न ब्राह्मणों को निमन्त्रित करना । सफेद कोढ़ से युक्त ब्राह्मण को न खिलाना । श्राद्ध में ब्राह्मणों के बैठाने की प्रक्रिया । श्राद्धकर्त्ता को ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करना । आवाहन आदि विधि का निरूपण । अग्नि में आहुतिकरण । पिण्डदान - विधि । प्रसंगतः एकोद्दिष्ट श्राद्ध की विधि का निरूपण । सपिण्डीकरण - विधि । आभ्युदयिक श्राद्ध - विधि । फलादि से पितरों की अधिक तृप्ति का वर्णन । प्रतिपदा आदि तिथियों में काम्य श्राद्ध आदि से धनादि की प्राप्ति । पिता के जीवित रहने पर पुत्रादि के द्वारा पितामह आदि का वृद्धि - श्राद्ध करना । तीर्थ आदि में श्राद्ध की अवश्यकर्त्तव्यता । ११८ भारतवर्ष का वर्णन भारतवर्ष का परिमाण महेन्द्र आदि कुलपर्वतों का कथन । नौ द्वीपों का कथन । नर्मदा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ४०८ ७ ४० ९ ७ ४१० ४१ ४१४ ७४ ४२० ४३ ४२४ ६६ ४३० ८
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३५ अध्याय विषय आदि नदियों का कथन । महाद्वीप आदि का वर्णन । जम्बू आदि द्वीपों का वर्णन । भूमि - परिमाण । ११ ९ महाद्वीप आदि का वर्णन जम्बू आदि द्वीपों का वर्णन । भूमि - परिमाण । १२० भुवनकोश वर्णन अतल आदि सात पातालों का वर्णन । भूमि, सूर्यमण्डल आदि का मध्य परिमाण– कथन । सूर्यरथ का परिमाण - कथन । ध्रुवस्थान- वर्णन । सोम आदि ग्रहों का रथ परिमाण - कथन । इस अध्याय के पाठ का फल । १२१ ज्योतिःशास्त्र - कथन वधू - वर का गुणागुण विचार - कथन । विवाहादि वर्णन । पुंसवनकाल । अन्नप्राशनकाल । शत्रुस्तम्भन आदि मन्त्र । कर्णवेध आदि का काल । वस्त्रधारण आदि का काल । ग्रहणकाल में दान की प्रशंसा । बालव आदि करण में सूर्य - संक्रान्ति होने पर लोकमंगल होना । चतुष्पद आदि में सूर्य - संक्रान्ति होने पर राजा आदि का अशुभ होना । सूर्य आदि का दशा काल । १२२ काल - गणना १२३ युद्धजयार्णवीय नाना योग स्वरोदय चक्र । शनि - चक्र । कूर्म - चक्र । राहु - चक्र । चण्डी आदि ओषधियों के धारण से जय की प्राप्ति । जय - प्राप्ति में तिलक आदि का विधान । १२४ युद्धजयार्णवीय ज्योतिःशास्त्र का सार जय - प्राप्ति में मन्त्रपूर्वक मृत्युञ्जय पूजा । १२५ युद्धजयार्णवीय नाना चक्र मारण, पातन, मोहन तथा उच्चाटन के मन्त्रों का कथन । शत्रुस्तम्भन आदि में मिट्टी के हाथी आदि का कथन और होमादि विधि का निरूपण । १२६ नक्षत्रों का निर्णय जय, पराजय आदि के विवेक में शकुन - परीक्षा । अश्विनी आदि विशेष नक्षत्रों में यात्रा । अनुराधा आदि विशेष नक्षत्रों की सभी कार्यों में प्रशस्ति । राज्याभिषेक आदि में शुभ नक्षत्रों आदि का कथन । १२७ अनेक प्रकार के बलों का निरूपण जय आदि की प्राप्ति में विष्कम्भ आदि योगों में घटिकात्याग का प्रकार । ग्रहों की अनुकूलता का कथन । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ४३१ २८ ४३४ ४२ ४३८ ७ ९ ४४५ २४ ४४८ ३४ ४५१ २३ ४५४ ५५ ४५ ९ ३६ ४६३ १ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३६ अध्याय विषय कोटचक्र १२८ १२ ९ अर्घकाण्ड १३० मण्डल आदि का कथन आग्नेयमण्डल का वर्णन । वायव्यमण्डल का कथन । वारुण मण्डल, सोमग्रास - कथन । १३१ घातचक्र आदि का वर्णन जयचक्र आदि का वर्णन । १३२ सेवाचक्र आदि का कथन ताराचक्र का कथन । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ४६५ १३ ४६६ ४६७ १ ९ - मण्डल, माहेन्द्र-४६ ९ २० ४७१ २५ १३३ नाना बलों का निरूपण भास्कर आदि ग्रहों की दशा का वर्णन । शत्रु - संहारक भैरव मन्त्र का कथन । भैरव ध्यान - वर्णन । शत्रु - सेना को भंग करने का प्रयोग । जय - प्राप्ति में तार्क्ष्य ( गरुड़ ) चक्र का वर्णन । महातार्क्ष्य का स्वरूप । शत्रु - सेना के क्षय के निमित्त पिच्छिका आदि विधि का निरूपण । शत्रु नाशार्थ भंग - विद्या आदि का कथन । १३४ त्रैलोक्यविजयविद्या जय - प्राप्ति के लिए होमादि का कथन । १३५ संग्रामविजयविद्या चामुण्डा देवी के ध्यान आदि का कथन । १३६ नक्षत्र - चक्र १३७ महामारी विद्या का कथन शत्रु - क्षय के लिए शव आदि के वस्त्र पर देवता का स्वरूप - निर्माण करना । बकरी के रक्त मिश्रित नीम की समिधाओं से हवन करना । शत्रुओं के उच्चाटन आदि की विधि । १३८ षट् कर्मों का निरूपण पल्लव लक्षण । वंश - विनाश आदि में योगाख्य आदि सम्प्रदायों का कथन । शत्रुनाश के लिए शुक्लपक्ष में यम की पूजा । यम देवता के उद्देश्य से होमादि का विधान । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ४७४ ४७ ४७ ९ ४८० ७ ४८२ ८ ४८३ २१ ४८५ १४