अग्नि पुराण — पृष्ठ 281–290

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः २७७ ब्रह्मादिकारणत्यागमन्त्रं नीत्वा शिवास्पदम् । ततौ ललाटमध्यस्थं स्फुरत्ताराप्रतिप्रभम्

षडङ्गेन ' समाकीर्णं बिन्दुरूपं पर शिवम् । पुष्पाञ्जलिगतं ध्यात्वा ॥५३ ॥

लक्ष्य ' मूर्तौ निवेशयेत् ॥५४ ॥

ॐ हां हौं शिवाय नम आवाहन्या हृदा ततः ।

आवाह्य ( ह्या ) स्थाप्य स्थापन्या संनिधायान्तिकं शिवम् ॥५५ ॥

निरोधयेन्निष्ठुरया " कालकान्त्या फडन्ततः ' हृदाऽवगुण्ठयेत्पश्चादावाहः संमुखो ततः आकर्मकाण्डपर्यन्तं " संनिधेर्योऽपरिक्षयः १३ । सकलीकरणं कृत्वा मन्त्रैः षड्भिरथैकताम् चिच्छक्तिहृदयं शंभो: शिव ऐश्वर्यमष्टधा प्रताप दुःसहश्चास्त्रमन्तरायापहारकम् । हृत्पुरः सरमुच्चार्य पाद्यादीनि निवेदयेत् अर्घ्यं शिरसि देवस्य दूर्वापुष्पाक्षतानि च । यजेत्पञ्चोपचारेण विधिना कुसुमादिभिः । ' विघ्नानुत्सार्य ' मुष्ट्याऽथ लिङ्गमुद्रां नमस्कृतिम् ॥५६ ॥

। १ " निवेशनं " स्थापनं स्यात्संनिधानं तवास्मि भोः ॥५७ ॥

स्वभक्तेश्च प्रकाशो यस्तद्भवेदवगुण्ठनम् ॥५८ ॥

। अङ्गानामङ्गिना सार्धं विदध्यादमृतीकृतम् ॥५९ ॥

। शिखा वशित्वं चाभेद्यं तेजः कवचमैश्वरम् ॥६० ॥

नमः स्वधा च स्वाहा च वौषट्चेति यथाक्रमम् ॥ ६१ ॥

। पाद्यं पादाम्बुजद्वन्द्वे वक्त्रे ४ स्वाचमनीयकम् ॥६२ ॥

एवं संस्कृत्य संस्कारैर्दशभिः परमेश्वरम् ॥६३ ॥

। १५ अभ्युक्ष्योद्वर्त्य ११ निर्मृज्य राजिकालवणादिभिः ॥६४ ॥

ब्रह्म आदि कारण छोड़कर शिव के स्थान में मन्त्र का पाठ करते हुए अपने मस्तक के बीच में स्फुरणशील चन्द्रमा का ध्यान करके षडङ्गन्यास से विन्दुरूप और पुष्पाञ्जलि में स्थित शिव का ध्यान करते हुए उसे लक्ष्मी की मूर्ति में रख देना चाहिए ॥५३-५४ ॥ ‘ ॐ हां हौं शिवाय नम: ' इस मन्त्र से शिव का आवाहनी मुद्रा से आवाहन करके शिव को अपने निकट स्थापनी मुद्रा से स्थापित करना चाहिए और कालकान्ति निष्ठुरा मुद्रा से निरोधन कर फट् से अन्त होनेवाले मन्त्रों के द्वारा विघ्नों को दूर करके लिङ्ग मुद्रा के द्वारा मूर्ति का अवगुण्ठन करके उसका आवाहन, सम्मुखीकरण, निवेशन, स्थापन और संनिधान करते हुए इस प्रकार सोचना चाहिए कि ' हे देव!! मैं आपका हूँ ॥५५-५७ ॥ कर्मकाण्ड पर्यन्त सन्निधि का जो अपरिक्षय और इष्टदेव की भक्ति का जो प्रकाश होता है, उसी को अवगुण्ठन कहते हैं ॥ ५८ ॥ छह मन्त्रों के द्वारा सकलीकरण

करके अङ्गी के साथ अङ्गों का अमृतीकरण करना चाहिए । चिच्छक्ति शिव का हृदय है, अष्टविध ऐश्वर्य सिर है, वशित्व शिखा है, तेज अभेद्य कवच है । ईश्वर का दुःसह प्रताप, अन्तराय को दूर करनेवाला कवच है । हृदय आदि के साथ नमः, स्वधा, स्वाहा और वौषट् आदि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५ ९ -६१ ॥ हृद्मन्त्रों का उच्चारण करके पाद्यादि का निवेदन करना चाहिए । इस पाद्य को मूर्ति के चरणों के ऊपर तथा आचमनीय जल को उसके मुख के ऊपर तथा आचमनीय जल को उसके मुख के ऊपर डालना चाहिए ॥६२ ॥ देवता के सिर के ऊपर अर्घ्य, दूर्वा, अक्षत और पुष्पों को डालना चाहिए । इस प्रकार

दस संस्कारों से परमेश्वर का संस्कार करके पञ्चोपचार विधि से पुष्प इत्यादि से देवता का यजन करना चाहिए ॥६३-६३३ ॥ तदनन्तर मूर्ति को नमक और राई इत्यादि से मलकर उसे दूध, दही, मक्खन, शहद तथा मधुर - सुगन्धवाले पुष्पों १ क. ङ. च. पतङ्गेन । २ ग. घ. लक्ष्मी मू । ३ क. ङ. च. ' मूर्ति नि ' । ४ क. ख. ग. ङ. च. ' धानान्ति ' । ५ क. ङ. च. कालकर्ण्या । ६ क. ङ. च. ' तः बिम्बा नु । ७ ख. ध्नायुत्सा । ८ क. ङ. च ' र्य षष्ट्याऽ । घ ' र्य विष्ट्या ' । ९ क. ङ. च. ' खीकृतः । १० क. ङ. च वेशः स्था । ११ क. ङ. च. ' नं तत्स्यात्सं । १२ क. घ. ङ. च. ' धेयोऽप । १३ क. ङ. ' यः । अवकाश प्र । ख. ग. ' यः । अ भ । १४ क. ङ. च. ' को ' वाऽऽच ' । घ. ' कोष्वाच । १५ अभ्युक्ष्योद्वर्त्य लवणादिभिः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । १६ घ निर्मज्ज्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 282

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२७८ अग्निपुराणम् ' अर्योदविन्दुपुष्पाद्यैर्गड्डूकैः १ स्नापयेच्छनैः । ईशादिमन्त्रितैर्भुक्त्यै मुक्त्यै तेषां विपर्ययः । विरूक्ष्य यवचूर्णेन यथेष्टं शीतलैर्जलैः । निर्मार्ज्यार्घ्यं प्रदद्याच्च नोपरि भ्रामयेत्करम् । चन्दनाद्यैः समालभ्य पुष्पैः प्रार्च्य शिवाणुना । अस्त्रेण पूजितां घण्टां चाऽऽदाय गुग्गुलं ' दहेत् । आरात्रिकं समुत्तार्य तथैवाऽऽचमयेत्पुनः ।

हृदग्नौ चन्द्रभं चैशे शिवं चामीकरप्रभम् ।

चतुर्वक्त्रं चतुर्बाहुं दलस्थान्पूजयेदिमान् " ॥

मूले हाँ " शिवाय नमः ॐ १२ हां हूं हीं हों शिरश्च । शिवाय दद्यात्पाद्यं च आचामं चार्घ ( र्घ्य ) मेव च करोद्वर्तनताम्बूलं मुखवासं च दर्पणम् पयोदधिघृतक्षौद्रशर्कराद्यैरनुक्रमात् ॥६५ ॥

तोयधूपान्तरैः सर्वैर्मूलेन स्नापयेच्छिवम् ॥६६ ॥

स्वशक्त्या गन्धतोयेन संस्नाप्य शुचिवाससा ॥ ६७ ॥

न शून्यमस्तकं लिङ्गं पुष्पैः कुर्यात्ततो ददेत् ॥ ६८ ॥

धूपभाजनमस्त्रेण प्रोक्ष्याभ्यर्च्य शिवाणुना ॥ ६ ९ ॥ दद्यादाचमनं पश्चात्सुधाभं हृदयाणुना ॥७० ॥

प्रणम्याऽऽदाय देवाज्ञां भोगाङ्गानि प्रपूजयेत् ॥ ७१ ॥

शिखं रक्तां च नैर्ऋत्ये ( ते ) कृष्णं चर्म च वायवे ॥ ७२ ॥

दंष्ट्राकरालमप्यस्त्रं पूर्वादौ वज्रसंनिभम् ॥७३ ॥

हूं शिखायै हैं वर्म हश्चास्त्रं परिवारयुताय च ॥ ७४ ॥

। गन्धं पुष्पं धूपदीपं नैवेद्याचमनीयकम् ॥७५ ॥

। शिरस्यारोप्य देवस्य दूर्वाक्षतपवित्रकम् ॥७६ ॥

के द्वारा स्नान कराना चाहिए । ईशादि मन्त्रों के द्वारा भुक्ति और मुक्ति की प्राप्ति होती है । शिव की मूर्ति को जल और धूप इत्यादि के द्वारा स्नान कराना चाहिए तथा उसके ऊपर जौ का आटा तथा यथेष्ट रूप से शीतल जल डालना चाहिए ॥६४-६६३ ॥ तदनन्तर अपनी शक्ति के अनुसार सुगन्धित जल से स्नान कराकर, उसे पवित्र वस्त्र से पोंछकर अर्घ्य प्रदान करना चाहिए, किन्तु मूर्ति के ऊपर हाथ नहीं घुमाना चाहिए और न तो मूर्ति का मस्तक पुष्पों से शून्य होना चाहिए ॥६७-६८ ॥ इसके बाद शिव मन्त्रों से चन्दन और पुष्प इत्यादि चढ़ाकर उसी मन्त्र से उसकी अर्चना करनी चाहिए । धूप के पात्र के अस्त्र और शिवमन्त्रों से अर्चित घण्टे को लाकर गुग्गुल को जलाना चाहिए । इसके बाद हृद्मन्त्रों से अमृतुल्य आचमन करना चाहिए । उसके बाद आरती करके पुनः आचमन करना चाहिए । देवता को प्रणाम करके तथा उसकी आज्ञा लेकर भोग इत्यादि लगाना चाहिए ॥६९ -७१ ॥ अग्निकोण में चन्द्रप्रभा हृदय का और ईशानकोण में सुवर्ण के समान कान्तिवाले सिर का, नैर्ऋतकोण में लाल रंग की शिखा का, वायव्यकोण में कृष्ण वर्ण के कवच का पूजन करे ॥७२ ॥ चतुर्मुख

ब्रह्मा और चतुर्बाहु विष्णु की पूजा दलों के ऊपर तथा वज्रतुल्य करालदंष्ट्रा अस्त्र का पूजन पूर्व इत्यादि की ओर होना चाहिए ॥७३ ॥ मूल में ' हौं शिवाय नमः ', ' ॐ हां हृदयाय नमः ', ' ह्रीं शिरसे स्वाहा ' कहकर हृदय और सिर की पूजा करे ।

' हूं शिखायै वषट् ' बोलकर शिखा की, ' हैं कवचाय ' बोलकर कवच की तथा ' हः अस्त्राय फट् ' बोलकर अस्त्र की पूजा करे । इसके बाद शिव के लिए पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप - दीप, नैवेद्य, आचमनीय, करोद्वर्तन, ताम्बूल, मुखवास, दर्पण इत्यादि प्रदान करना चाहिए । देवता के सिर के ऊपर पवित्र दूर्वा और अक्षत को रखना चाहिए ॥७४-७६ ॥ हृद्मन्त्र से युक्त मूल मन्त्र से एक सौ आठ बार जप करके कवच से वेष्टित और अस्त्र से सुरक्षित, कुश, पुष्पों और अक्षतों १ ख. अर्धोद । २ ग. ' गज्जकै । ३ ख. ग. ' तैर्भक्ष्यैर्मुख्यैस्तेषां । घ. ' तैर्द्रव्यैरर्च्य ते । ४ क. ङ. च. ' तां मध्ये वादयेद्गुग्गु । ५ ख. ग. घ. ददेत् । ६ क. ङ. च. ' श्चाद्देवान्तं हृ ' । घ. ' श्चात्स्वधान्तं हृ ' । ख. ' धातं हृ । ७ क. च. ' रातिकं । ग रार्तिकं । ८ क. ख. ग. ङ. च. शिरश्चामी । ९ घ. वर्म । १० क. ङ. च. दर्भस्था । ११ क. ङ. च. हां । १२ ख. ग. ॐ ह्रां ह्रूं ह्रीं शि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 283

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः २७ ९ मूलमष्टतं जप्त्वा हृदयेनाभिमन्त्रितम् । चर्मणा वेष्टितं खङ्गरक्षितं ' कुशपुष्पकैः

. अक्षतैर्मुद्रया युक्तं शिवमुद्भवसंज्ञया । गुह्यातिगुह्यगुप्त्यर्थं ॥७७ ॥

सिद्धिर्भवति ' मे येन त्वत्प्रसादात्त्वयि स्थिते गृहाणास्मत्कृतं जपम् ॥७८ ॥

। भोगी श्लोकं पठित्वा तु दक्षहस्तेन शंभवे ॥ ७ ९ ॥

मूलाणुनाऽर्घ्यतोयेन वरहस्ते निवेदयेत् ' । यत्किंचित्कुर्महे देव सदा सुकृतदुष्कृतम् ॥८० ॥

तन्मे शिवपदस्थस्य हूं क्षः क्षेपय शंकर । शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत् ॥८१ ॥

शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च । श्लोकद्वयमधीत्यैवं जपं देवाय चार्पयेत् ॥८२ ॥

शिवाङ्गानां दशांशं च दत्त्वाऽर्घ्यं ' स्तुतिमाचरेत् । प्रदक्षिणीकृत्य नमेच्चाष्टाङ्गं चाष्टमूर्तये ॥८३ ॥

नत्वा ध्यानादिभिश्चैव यजेच्चित्रेऽनलादिषु ॥८४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये शिवपूजाविधिकथनं नाम चतुःसप्ततिमोऽध्यायः ॥७४ ॥

से युक्त उद्भव नाम की मुद्रा से समन्वित कर शिव के लिए यह श्लोक पढ़ना चाहिए - गुह्यातिगुह्यगुप्त्यर्थं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे येन त्वत्प्रसादात्त्वयि स्थिते । अर्थात् हे गोपनीयों में गोपनीय अपनी रक्षा के लिए किये गये मेरे जप को ग्रहण कीजिये जिससे आपकी कृपा से और आपके रहते हुए मुझे सिद्धि - भोग की कामनावाला व्यक्ति प्राप्त हो सके ॥७७-७८ ॥ इस श्लोक को पढ़ते हुए मूलमन्त्र से दाहिने हाथ में शम्भु के लिए अर्घ्य - जल का निवेदन करना चाहिए । उस समय याजक को यह ध्यान करना चाहिए कि ' हे देव, मैं जो कुछ भी पाप - पुण्य करता हूँ वह सब शिवाधार ही है, इसलिए आप मेरे पापों का नाश करें ॥७९ -८०३३ ॥ शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं, शिव ही सम्पूर्ण जगत् हैं । शिव की सर्वत्र विजय होती है, जो शिव है वही मैं हूँ । इस प्रकार दो श्लोकों को पढ़ते हुए देवता के लिए जप समर्पित करना चाहिए ॥८१-८२ ॥ शिव के अङ्गों को दशांश अर्घ्य प्रदान करके स्तुति करनी चाहिए । तदनन्तर देवता की प्रदक्षिणा करके अष्टमूर्ति शंकर के लिए साष्टाङ्ग प्रणाम करना चाहिए और ध्यान इत्यादि करते हुए अग्नि आदि में यजन करना चाहिए ॥८३-८४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शिवपूजाविधान - वर्णन नामक चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त || ७४ || १ ग. घ. ङ. खड्ग र । २ घ. ङ ' वतु मे । ३ क. ग. ङ. च. ' ठित्वाऽऽर्थ द । घ. ' ठित्वाऽऽद्यं द ' । ४ च निवेशयेत् । ५ ख. च ' चित्कर्म है । ६ क. ङ. ( च. ०. याजति कख, Im Sin च Biggy . ' त्त्वाऽस्तु Soundation । USA

पृष्ठ 284

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२८० अग्निपुराणम् अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः शिवपूजाङ्गहोमविधिः ईश्वर उवाच अर्घपात्रकरो यायादग्न्यागारं सुसंवृतः । यागोपकरणं सर्व दिव्यं ( व्य ) दृष्ट्वा ( ष्ट्या ) च कल्पयेत् ॥१ ॥

उदङ्मुखः कुण्डमीक्षेत्प्रोक्षणं ताडनं कुशैः । विदध्यादस्त्रमन्त्रेण ' वर्मणाऽभ्युक्षणं मतम् ॥२ ॥

खड्गेन खातमुद्धारं पूरणं समतामपि । कुर्वीत वर्मणा सेकं कुट्टनं तु शराणुना ॥ ३ ॥

संमार्जनं समालेपं कलारूपप्रकल्पनम् । त्रिसूत्रीपरिधानं च वर्मणाऽभ्यर्चनं सदा || ४ || रेखात्रयमुदक्कुर्यादेकां पूर्वाननामधः । कुशेन च शिवास्त्रेण यद्वा तासां विपर्ययः ॥ ५ ॥

वज्रीकरमणमंत्रेण हृदा दर्भैश्चतुष्पथम् । अक्षपात्रं तनुत्रेण विन्यसेद्विष्टरं हृदा ॥६ ॥

हृदा वागीश्वरीं तत्र ईशमावाह्य ' पूजयेत् । वह्निं सदाश्रयानीतं शुद्धपात्रोपरि स्थितम् ॥७ ॥

क्रव्यादांशं परित्यज्य वीक्षणादिविशोधितम् ॥ औदार्यं चैन्दवं मौनमेकीकृत्यानलत्रयम् ॥८ ॥

ॐ हूं वह्निचैतन्याय वह्निबीजेन विन्यसेत् । संहितामन्त्रितं वह्निं धेनुमुद्रामृतीकृतम् ॥९ ॥

अध्याय ७५ शिवपूजांगहोम - विधि ईश्वर बोले- यजमान को हाथ में अर्घ्यपात्र लेकर समाहित चित्त होकर अग्नि- गृह में जाना चाहिए । समस्त यज्ञ-सामग्री को भलीभाँति देखकर दिव्य बना ले ॥१ ॥ उत्तराभिमुख होकर कुण्ड का अवलोकन करके अस्त्र - मन्त्र से कुशों

से ताड़न और प्रेक्षण करे । कवच - मन्त्र से अभ्युक्षण ( सेचन ) करना युक्तियुक्त है ॥२ ॥ खड्ग से गड्ढा खोदकर उसको

बराबर भी कर दे । वर्म ( मन्त्र ) से जल छिड़ककर शरमन्त्र से भूमि को कूटने का कार्य करे । सम्मार्जन, समालेपन, कलात्मक - चित्रण, त्रिसूत्रीधारण और पूजन सर्वदा वर्म -मन्त्र - I से करना चाहिए । कुश या त्रिशूल से ऊपर की ओर तीन रेखाएँ खींचे । एक रेखा उन तीनों के नीचे पश्चिम से पूर्व की ओर खींचे अथवा इसके विपरीत ही रेखाएँ खींचे ॥३-५ ॥ अस्त्र - मन्त्र से वज्रीकरण करे और हृन्मन्त्र से बिस्तर बिछाये । हृन्मन्त्र से उस चतुष्पथ पर वागीश्वरी और ईश का आवाहन करके शुद्ध पात्र के ऊपर रखकर सद्ब्राह्मण द्वारा लायी अग्नि की पूजा करे ॥६-७ ॥ असुरों का भाग छोड़कर ( यज्ञ - सामग्री का ) भलीभाँति निरीक्षण करके शुद्ध कर ले । औदार्य ( जठराग्नि ), ऐन्दव ( वडवाग्नि ) और ( सामान्य ) अग्नि को ‘ ॐ हूं वह्निचैतन्याय ' इत्यादि वह्नि - बीज से स्थापित करे । संहिता के द्वारा आमन्त्रित अग्नि का धेनुमुद्रा से अमृतीकरण करके अस्त्र - मन्त्र से रक्षित करे तथा कवच से उसको अवगुण्ठित करके पूजन करे और १ ख. ग. ' ण धर्मेणाभ्यु ' । २ घ. ' रात्मना । ३ ख. ' ण हृदा ता ' । ४ क. ङ. च. ' मस्त्रेण । ५ क. ङ. च. ' माराध्य पू " । ६ ख. ग. चैन्धनं भौ । ७ ख. ग. हं । ८ ख. मृतं हृतं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 285

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः २८१ रक्षितं हेतिमन्त्रेण कवचेनावगुण्ठितम् शवबीजमिति ध्यात्वा वागीशागर्भगोचरे भूमिष्ठजानुको मन्त्री हृदाऽऽत्मसंमुखं क्षिपेत् संभृतिं परिधानस्य शौचमाचमनं हृदा बध्नीयाद्गर्भजं देव्याः कङ्कणं पाणिपल्लवे हृदयमन्त्रेण जुहुयादाहुतित्रयम् आहुतित्रित्रयं दद्याच्छिरसाऽम्बुकणान्वितम् जुहुयादाहुतीस्तिस्त्रः शिखया शिखयैव तु जातकर्मनृकर्मभ्यां दशमे मासि पूर्ववत् सुवर्णबन्धनं देव्या कृतं ध्यात्वा हृदाऽर्चयेत् कुण्डं ' तु बहिरस्त्रेण ' ताडयेद्वर्मणोत्क्षिपेत् ' आस्थाप्य ' स्थापयेत्तेषु हृदा परिधिविस्तरम् ' समिधः पञ्च होतव्याः प्रान्ते मूसे घृतप्लुता तीन बार कुण्ड के ऊपर हाथ को घुमाकर प्रदक्षिणा । पूजितं त्रिः परिभ्राम्य कुण्डस्योर्ध्वं प्रदक्षिणम् ॥१० ॥

। वागीश्वरेण देवेन क्षिप्यमाणं विभावयेत् ॥११ ॥

। ततोऽन्तः स्थितबीजस्य नाभिदेशे समूहनम् ॥१२ ॥

। गर्भाग्नेः पूजनं कृत्वा तद्रक्षार्थं शराणुना ॥१३ ॥

। गर्भाधानाय संपूज्य सद्योजातेन पावकम् ॥१४ ॥

। पुंसवनाय वामेन तृतीये मासि पूजयेत् ॥ १५ ॥

। सीमन्तोन्नयनं षष्ठे मासि संपूज्य रूपिणा ॥१६ ॥

। वक्त्राङ्गकल्पनां कुर्याद्वक्त्रोद्घाटननिष्कृती ॥१७ ॥

। वह्निं संधुक्ष्य दर्भाद्यः स्नानं गर्भमलापहम् ॥ १८ ॥

। सद्यः सूतकनाशाय प्रोक्षयेदस्त्रवारिणा ॥ १ ९ ॥ । अस्त्रेणोत्तरपूर्वाग्रान्मेखलासु बहिः कुशान् ॥२० ॥

। वक्त्राणामस्त्रमन्त्रेण नालापनुत्तये ॥ २१ ॥

। ब्रह्माणं शंकरं विष्णुमनन्तं च हृदार्चयेत् ॥२२ ॥

करे ॥८-१० ॥ वागीश के मध्य में दिखायी पड़नेवाले वागीश्वर से फेंके गये ( छवि ) का शिव - बीज मन्त्र से ध्यान करके उसकी विभावना करे || ११ || मन्त्री ( यजमान ) भूमि पर घुटने टेककर हृन्मन्त्र से अपनी ओर पात्र का मुख कर अग्नि को कुण्ड में छोड़े । तदनन्तर कुण्डनाभि में मध्यस्थित बीज का समूहन करे, वस्त्र को भलीभाँति पहनकर हृन्मन्त्र से अपने को पवित्रकर आचमन करे । अग्निकुण्ड के गर्भ में स्थित अग्नि की पूजा करके उसकी रक्षा के लिए शराणु मन्त्र से कंकण को देवी के पल्लव के समान कोमल कर में बाँध दे ॥१२-१३ ॥ गर्भाधान के लिए अग्नि की ' सद्योजात ' मन्त्र से पूजा करके हृदयमन्त्र से तीन आहुतियाँ दे । पुंसवन के लिए तीसरे महीने में वाममन्त्र से अग्नि का पूजन करके शिर ( मन्त्र ) से जलकण से मिश्रित तीन आहुतियाँ दे । छठे मास में सीमन्तोन्नयन की पूजा करनी चाहिए ॥१४-१६ ॥ तदनन्तर शिखा मन्त्र से तीन आहुतियाँ दे तथा शिखामन्त्र मुख और अङ्ग आदि की कल्पना करे । दसवें महीने में जातकर्म और नृकर्म करे । पूर्व की ही भाँति अग्नि को से कुश ही आदि से प्रज्वलित कर गर्भ - दोष को दूर करनेवाला स्नान करे । देवी के द्वारा किये गये सुवर्ण बन्धन का हन्मन्त्र से ध्यान कर पूजन करे । तत्काल - सूतक - दोष की निवृत्ति के लिए अस्त्रजल से सिंचन करे ॥१७-१९ ॥ अस्त्र - मन्त्र उच्चारण करके उसके कुण्ड को बाहर की ओर से ताड़न करे, कवच से ऊपर की ओर जल फेंके, अस्त्र से कुण्ड का पर बाहर की ओर उत्तर और पूर्व की ओर अभिमुख करके कुशों को रखे ॥२० ॥ उन पर परिधि के विस्तार

की मेखला अस्त्रमन्त्र से नाल काटने के लिए घी में डुबोकर पाँच समिधाओं की आहुतियाँ दे । के बराबर मुख बनावे । तदनन्तर पूजन करे ॥२१-२२ ॥ दूब और अक्षत से क्रमशः परिधि -मण्डल - म ब्रह्मा, शङ्कर, अनन्त और विष्णु का हृदय ( मन्त्र ) से १ क. ङ. च. दारुणा । २ क. ङ. संवीक्ष्य । च. संमीक्ष्य । ३ क. ख. ग. ङ. च. देव्याः । ४ ख. ग. घ. कुम्भ । ५ ख. ग. ° येद्धर्म ” । ६ घ. ‘ णोक्षयेत् । ७ क. ङ. च. आस्तीर्य । ८ ख. ' विष्ठिर । ९ क. ङ. च. ' त् । पूर्वाभ्यन्तरप ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 286

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२८२ अग्निपुराणम् दूर्वाक्षतैश्च पर्यन्तं परिधिस्थाननुक्रमात् । अग्नेरभिमुखीभूतान् ' निजदिक्षु हृदार्चयेत् । शैवीमाज्ञामिमां तेषां श्रावयेत्तदनन्तरम् । प्रताप्याग्नौ त्रिधा दर्भमूलमध्याग्रकैः स्पृशेत् । क्रमात्तत्त्वत्रयं न्यस्य हां हीं हूं संरवैः क्रमात् । त्रिसूत्रीवेष्टितग्रीवौ पूजितौ कुसुमादिभिः । गव्यमाज्यं समादाय वीक्षणादिविशोधितम् । कुण्डस्योर्ध्वं हृदावर्त्य भ्रामयित्वाऽग्निगोचरे । धृत्वाऽऽदाय कुशाग्रेण स्वाहान्तं शिरसाऽणुना । भावयन्निजमात्मानं नाभौ धृत्वा प्लवेत्ततः । घृताभ्यां सम्मुखं " वह्नेरस्त्रेणाऽऽप्लवमाचरेत् । हृदालब्धदग्धदर्भ शस्त्रक्षेपात्पवित्रयेत् ।

अस्त्रमन्त्रेणनिर्दग्धं वह्नौ दर्भ पुनः क्षिपेत् ।

इन्द्रादीशानपर्यन्तान्विष्टरस्थाननुक्रमात् ॥२३ ॥

निवार्य विघ्नसंघातबालकं पालयिष्पथ ॥ २४ ॥

गृहीत्वा सुक्नुवावूर्ध्ववदनाधोमुखौ क्रमात् ॥ २५ ॥

कुशस्पृष्टप्रदेशेषु आयुर्विद्याशिवात्मकम् ॥२६ ॥

स्रुचि शक्तिं स्रुवे शंभुं विन्यस्य हृदयाणुना ॥२७ ॥

कुशानामुपरिष्टात्तौ स्थापयित्वा स्वदक्षिणे ॥ २८ ॥

स्वकं ब्रह्ममयीं मूर्ति संचिन्त्याऽऽदाय तद्घृतम् ॥२९ ॥

पुनर्विष्णुमयीं ध्यात्वा घृतमीशानगोचरे ॥ ३० ॥

जुहुयाद्विष्णवे विन्दुं रुद्ररूपमनन्तरम् ॥३१ ॥

प्रादेशमात्रदर्भाभ्यामङ्गष्ठानामिकाग्रकैः ॥३२ ॥

हृदाऽऽत्मसंमुखं तद्वत्कुर्यात्संप्लवनं ततः ॥३३ ॥

दीप्तेनापरदर्भेण ' नीराज्यान्येन ' दीपयेत् ॥ ॥३४

३४ || ॥

क्षिप्त्वा घृते कृतग्रन्थिकुशं प्रादेशसंमितम् ॥ ३५ ॥

पर स्थापित आसन पर इन्द्र ( पूर्व ) दिशा से लेकर ईशानपर्यन्त बैठकर देवों की पूजा करे || २३ || हृद् मन्त्र से अग्नि की ओर अभिमुख देवों की उनकी दिशाओं में पूजा करके ' सब विघ्नों को दूर कर बालक का पालन करों ' - शिव की इस आज्ञा को देवताओं से निवेदित करे । तत्पश्चात् स्रुक् और स्रुवा को क्रमशः ऊर्ध्वमुख और अधोमुख करके अग्नि पर तीन बार तपावे, कुश के मूल से उनके मूल को, मध्य से मध्य को और शिखा से शिखा को स्पर्श कराये ॥ २४-२५३ ॥ कुश से स्पर्श किये हुए भागों पर आत्मा, विद्या और शिव तत्त्वों का क्रमशः हां हीं हूं का उच्चारण करके न्यास करे । स्रुक् पर शक्ति को और स्रुव पर शम्भु को हृदय मन्त्र से न्यस्त करे ॥ २६-२७ ॥ त्रिसूत्री उनके गले में लपेटकर पुष्प, अक्षत और चन्दन आदि से पूजन करके दक्षिण की ओर कुश पर रखे ॥ २८॥ गाय के घी को लेकर भलीभाँति निरीक्षण करके शुद्ध कर ले । अपनी

ब्रह्ममयी मूर्ति का चिन्तन करके घी को हाथ में ले ले और हृद्मन्त्र से कुण्ड के ऊपर अग्नि के चारों ओर घुमाये, फिर अपनी विष्णुमयी मूर्ति का ध्यान करके उस घृत को ईशानकोण में रखकर कुशाग्र से उस घृत का स्वाहान्त मन्त्र से, शिर ( मन्त्र ) से या अणु मन्त्र से विष्णु के निमित्त हवन करे । तदनन्तर अपने - आप में रुद्र की भावना करके घी को अपनी नाभि में लगाये ॥२९ -३१ ॥ प्रादेश परिमाण के दो कुशों को अँगूठा और अनामिका के अग्रभाग के बीच पकड़कर अग्नि में सम्मुख होकर उन कुशाओं से घृत लेकर छिड़के, फिर हृद् - मन्त्र से आत्माभिमुख होकर घृत छिड़के ॥३२-३३ ॥ हृद् मन्त्र से हाथ में लिये हुए कुश के जल जाने पर शस्त्र - क्षेप के द्वारा पवित्र करे । एक जलते हुए कुश से उसकी आरती करके फिर दूसरे कुश से उसे जलावे । उस जले हुए कुश को अस्त्र - मन्त्र से पुनः अग्नि ही में डाल दे ॥३४-३४३ ॥ घी में प्रादेश परिमाण १ क. ङ. च. ' तान्नयदि । २ क. ङ. च. ' थ । गौरीमा ' । ३ घ. ' मुखैः क्र ' । ४ ख. ग. घ. ' शे तु आत्मविद्या ' । ५ क. च. ' र्त्य तापयि । ६ क. ङ. च. ' म् तावन्निजयमात्मानं नाभौ वृद्धायवेत्ततः । ७ क. ङ. च. ' ख बाहुच्छत्रणोत्पप्लं ८ घ. ' ण निवाह्यानेन । ९ ख. नीवाह्यानेन । ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः २८३ पक्षद्वयमिडादीनां त्रयं बाह्ये विभावयेत् । क्रमाद्भागत्रयादाज्यं स्रुवेणाऽऽदाय होमयेत् ॥ ३६ ॥

स्वेत्यग्नौ हां घृते भागं शेषमाज्यं क्षिपेत्क्रमात् । ॐ हामग्नये स्वाहा । ॐ हां सोमाय स्वाहा । ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ॥३७ ॥

उद्घाटनाय नेत्राणामग्नेर्नेत्रत्रये मुखे । स्रुवेण घृतपूर्णेन चतुर्थीमाहुतिं यजेत् ॥ ३८ ॥

ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥३९ ॥

अभिमन्त्र्य षडङ्गेन बोधयेद्धेनुमुद्रया । अवगुण्ठ्य तनुत्रेण रक्षेदाज्यं शराणुना ॥ ४० ॥

हृदाज्यविन्दुविक्षेपात्कुर्यादभ्युक्ष्य शोधनम् । वक्त्राभिघारसंघानं वक्त्रैकीकरणं तथा ॥ ४१ ॥

ॐ हां सद्योजाताय स्वाहा । ॐ हां वामदेवाय स्वाहा । ॐ हामघोराय स्वाहा ।

ॐ तत्पुरुषाय स्वाहा । ॐ हामीशानाय स्वाहा ' ॥४२ ॥

इत्येकैकघृताहुत्या कुर्याद्वक्त्राभिघारकम् ॥४३ ॥

ॐ हां सद्योजातवामदेवाभ्यां स्वाहा । ॐ हां वामदेवाघोराभ्यां स्वाहा ।

ॐ हामघोरतत्पुरुषाभ्यां स्वाहा । ॐ हां तत्पुरुषेशानाभ्यां स्वाहा ॥४४ ॥

इतिवक्त्रानुसन्धानं मन्त्रैरेभिः क्रमाच्चरेत् । अग्नितो गतया वायुं निर्ऋतादिशिवान्तया । वक्त्राणामेकतां कुर्यात्स्रुवेण घृतधारया ॥४५ ॥

ॐ हां सद्योजातवामदेवाघोरतत्पुरुषेशानेभ्यः स्वाहा ॥४६ ॥

इतीष्टवक् वक्त्राणामन्तर्भावस्तदाकृतिः । ईशेन वह्निमभ्यर्च्य दत्त्वाऽस्त्रेणाऽऽहुतित्रयम् ॥४७ ॥

लम्बा और गाँठ लगा हुआ कुश रखकर बाह्य भाग में इड़ा आदि तीन नाड़ियों और दो पक्षों की सम्भावना करे । क्रम से स्रुवा से उन तीनों भागों में से घी लेकर स्वाहा का उच्चारण करने पर अग्नि में, हां का उच्चारण करने पर घी के पात्र में इस प्रकार शेष घी को भिन्न - भिन्न पात्र में छोड़े । मन्त्र यह है- “ ॐ हामग्नये स्वाहा, ॐ हां सोमाय स्वाहा ', ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ' इत्यादि ॥ ३६-३७ ॥ नेत्र खोलने के लिए अग्निदेव के तीन नेत्रों को लक्षित कर घृतपूर्ण स्रुवा से उपर्युक्त मन्त्रों से हवन करे । घी से स्रुवा को भरकर ' ॐ हां अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ' का उच्चारण करके अग्निमुख में चौथी आहुति दे ॥३८-३९ ॥ षडङ्ग से अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा से उद्बोधन करे, कवच से अवगुण्ठन कर शर - मन्त्र से घी का रक्षण करे ॥४० ॥ हृद् से घृत विन्दु का विक्षेप करके सिञ्चन, शोधन, वक्त्राभिघार - संधान और मुखों का एकीकरण

करे ॥४१ ॥ ‘ ॐ हां सद्योजाताय स्वाहा ', ' ॐ हां वामदेवाय स्वाहा ', ' ॐ हामघोराय स्वाहा ', ' ॐ तत्पुरुषाय स्वाहा ',

‘ ॐ हामीशानाय स्वाहा ’ - इन मन्त्रों से एक - एक घृताहुति देकर वक्त्राभिघार करना चाहिए ॥४२-४३ ॥ ' ॐ हां सद्योजात-देवाभ्यां स्वाहा ` ` ॐ हां तत्पुरुषेशानाभ्यां स्वाहा ' इत्यादि मन्त्रों से मुखानुसन्धान करे ॥४४ ॥ अग्निकोण से प्रारम्भ करके

वायु दिशा तक, नैर्ऋतकोण से ईशान दिशा पर्यन्त खुवा को घी से भरकर उसकी धार से ' ॐ हां सद्योजातवामदेवाघोर-तत्पुरुषेशानेभ्यः स्वाहा ' इत्यादि मन्त्र से मुखों को एक में मिलाये ॥४५-४६ ॥ इस प्रकार इष्ट मुख से अन्य मुखों को मिलाने पर सब एक ही आकार के हो जाते हैं । ईश मन्त्र से अग्नि की पूजा करके अस्त्र मन्त्र से तीन आहुतियाँ दे ॥४७ ॥ तत्पश्चात् ' हे हुताशन!

१ घ ' यं चाऽऽज्ये वि ' । २ क. ङ. च. ' हा । एकैककया घृ । ३ क. ख. ग. ङ. च. वामाघो । ४ क. ङ. च. वामाघो । ५ क. ङ. च. इत्यष्ट । ६ क. ऐशेन । ङ. च. ईशाने । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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२८४ अग्निपुराणम् कुयात्सर्वात्मना नाम शिवाग्निस्त्वं हुताशन । मूलेन वौषडन्तेन दद्यात्पूर्णां यथाविधि । यजेत्पूर्ववदावाह्य प्रार्थ्याऽऽज्ञां तर्पयेच्छिवम् । शक्त्या मूलाणुना होमं कुयादङ्कैर्दशांशतः ' । शुक्तिमात्राऽऽहुतिर्दघ्नः प्रसृतिः पायसस्य तु । खण्डत्रयं तु मूलानां फलानां तु प्रमाणतः । इक्षोरापर्विकं मानं लतानामङ्गुलद्वयम् । चन्द्रचन्दनकाश्मीरकस्तूरीयक्षकर्दमान् कन्दानामष्टमं भागं जुहुयाद्विधिवत्परम् । घृतेन स्रुचि पूर्णायां निधायाधोमुखं स्रुवम् । पुनः सव्येन तौ धृत्वा शङ्ङ्खसंनिभमुद्रया नाभौ तन्मूलमाधाय स्स्रुगग्रव्यग्रलोचनः वामस्तनान्तमानीय १२ तयोर्मूलमतन्द्रितः हृदार्चितौ ' विसृज्याग्नौ पितरौ विधिपूरणीम् ॥४८ ॥

ततो हृदम्बुजेर साङ्गं सासनं भासुरं परम् ॥४९ ॥

यागाग्निशिवयोः कृत्वा नाडीसंधानमात्मना ॥ ५० ॥

घृतस्य कार्शिको होमः क्षीरस्य मधुनस्तथा ॥ ५१ ॥

यथावत्सर्वभक्षाणां लाजानां मुष्टिसंमितम् ॥५२ ॥

ग्रामार्धमात्रमन्नानां सूक्ष्माणि पञ्च होमयेत् ॥५३ ॥

पुष्पं पत्रं स्वमानेन समिधा तु दशाङ्गुलम् ॥५४ ॥

। ' कलायसंमितानेतान्गुग्गुल ' बदरास्थिवत् ॥ ५५ ॥

होमं निर्वर्तयेदेवं ब्रह्मबीजपदैस्ततः ॥५६ ॥

स्स्रुगग्रे पुष्पमारोप्य पश्चाद्वामेन पाणिना ॥ ५७ ॥

। समुद्गतोर्ध्वकायश्च समपादः समुत्थितः ॥ ५८ ॥

। ब्रह्मादिकारणत्यागाद्विनिःसृत्य 0 सुषुम्नया " ॥ ५ ९ ॥ । मूलमन्त्रमविस्पष्टं वौषडन्तं समुच्चरेत् ॥६० ॥

तुम सब प्रकार से निश्चय ही शिवाग्नि हो - इस प्रकार प्रार्थना करके अग्नि में विधिपूर्वक आहुति दे । यह पूर्णाहुति विधिपूर्वक वौषडन्त मूलमन्त्र से देनी चाहिए । इसके अनन्तर हृदय कमल पर अङ्ग और आसन सहित तेजस्वी शिव का पूजन करे । पहले आवाहन कर प्रार्थना करे । तत्पश्चात् उनकी आज्ञा प्राप्त करके तर्पण करे ॥४८-१ -४ ९ ३ ॥ आत्मा द्वारा यागाग्नि और शिव के बीच नाड़ी संविधान कर शक्ति के अनुसार मूलाग्र से और अङ्गों से दशांश हवन करे । घी का हवन एक पैसे के चौथाई परिमाण में करना चाहिए और दूध, मधु, दही का एक सीप के परिमाण में, अन्य खाद्य पदार्थों और धान के लावे को मुट्ठी भर के परिमाण में हवन करना चाहिए ॥५०-५२ ॥ जड़वाले फल को तीन खण्ड करके और फलों का उनके परिमाण के अनुसार आघे ग्रास के परिमाण में हवन करे । अन्य अन्नों की सूक्ष्म मात्रा को लेकर पाँच आहुतियाँ देनी चाहिए ॥५३ ॥ गन्ने की एक-एक गाँठ का और लताओं के दो - दो अङ्गुल के खण्ड काटकर हवन करे, फूल पत्तियों का तो परिमाण उनके मान के अनुसार

ही है, समिधा का मान दस अङ्गुल का है ॥५४ ॥ कर्पूर, चन्दन, केसर और कस्तूरी को मिलाकर बने सुगन्धित पदार्थों का

मसूर के बराबर और गुग्गुल को बेर की गुठली के परिमाण में आहुति देनी चाहिए ॥ ५५ ॥ कन्दों के आठवें भाग को एक

आहुति के रूप में दे । इस प्रकार हवन करने के पश्चात् ब्रह्मबीज पद से घी से स्रुक् को परिपूर्ण करके स्रुवा को अधोमुख करके रखे । स्रुक् के अग्र भाग पर एक फूल रखकर बायें हाथ से पकड़े, फिर दाहिने हाथ से उनको पकड़कर शङ्ख के समान मुद्रा बनाये और सिर को ऊँचा किये उठकर खड़ा हो जाय और पैरों को सीधा कर ले ॥५६-५८ ॥ नाभि पर उनके मूल को रखकर स्रुक् के अग्र भाग से नेत्रों को चञ्चल कर ब्रह्मा आदि कारणों के त्याग से सुषुम्ना की ओर से बायें स्तन के अन्त तक उनके मूल को लाकर अनलस भाव से वौषडन्त मूल - मन्त्र का मन्द मन्द अस्फुट अक्षरों में उच्चारण करे ॥५९ -६० ॥ उस १ घ. सृष्टाग्नौ । २ क. ङ. च. ' ज्याग्नेः पि ' । ३ ख. ग. हृदाम्बु । ४ ख. ग. ' र्दशाङ्गतः । ५ ख. ग. वार्षिको । ६ क. ङ. च. प्रसूतिः । ७ ख. ग. " लत्रयं । ८ ख. कपालस । ९ घ. ' ग्गुलं ब ' । १० घ. ' रणात्या ' । ११ क. ङ. च. मुमुक्षया । घ. सुषुम्णया । १२ ख. महस्तान्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः २८५ तदग्नौ जुहुयादाज्यं यवसंमितधारया भक्त्या तद्भूतिमावन्द्य विदध्यात्प्रणतिं पराम् । संहारमुद्रयाऽऽहृत्य क्षमस्वेत्यभिधाय च श्रद्धया परमाऽऽत्मीये स्थापयेद्धृदयाम्बुजे ' । अन्तर्बहिर्बलिं दद्यादाग्नेय्यां कुण्डसंनिधौ । वरुणे हां गणेभ्यश्चं स्वाहा तेभ्यस्त्वयं बलिः । अग्नौ हामसुरेभ्यश्च रक्षोभ्यो नैर्ऋते बलिः हां राशिभ्यः स्वाहा वह्नौ विश्वेभ्यो नैर्ऋते तथा । द्वितीये मण्डले बाह्य इन्द्राग्नेर्यमाय ' च ईशानाय च पूर्वादावीशाने ' ब्रह्मणे नमः । बलिद्वयगतान्मन्त्रान्संहरेन्मुद्रयाऽऽत्मनि । आचमं चन्दनं दत्त्वा ताम्बूलप्रभृतीनपि ॥६१ ॥

ततो वह्निसमभ्यर्च्य फडन्तास्त्रेण संवरान् ' ॥६२ ॥

। भासुरान्परिधोस्तांश्च पूरकेण हृदाऽणुना ॥ ६३ ॥

सर्वप्राकाग्रमादाय कृत्वा मण्डलकद्वयम् ॥ ६४ ॥

ॐ हां रुद्रेभ्यः स्वाहा पूर्वे मातृभ्यो दक्षिणे तथा ॥६५ ॥

उत्तरे हां च यक्षेभ्यः ईशाने हां ग्रहैः सह ॥ ६६ ॥

। वायव्ये हां च नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यश्च मध्यतः ॥६७ ॥

वारुण्यां क्षेत्रपालाय अन्तर्बलिरुदाहृतः ॥६८ ॥

। नैर्ऋताय जलेशाय वायवे धनरक्षिणे ॥ ६ ९ ॥ नैर्ऋते विष्णवे स्वाहा वायसादेर्बलिर्वहिः ॥७० ॥

॥७१ ॥

इत्याग्नेये महापुराणे शिवपूजाङ्गहोमविधिनिरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५ ॥

घी को यव के परिमाण में एक धारा के रूप में अग्नि में आहुति दे । पुनः आचमन, चन्दन, पान आदि लेकर भक्तिपूर्वक उसकी विभूति की वन्दना कर अत्यन्त विनीत भाव से वन्दना करे । तदनन्तर फडन्त अस्त्र मन्त्र से अग्नि की पूजा करके संहारमुद्रा में लाकर ' क्षमा करो ' का उच्चारण करके तेजस्वी देवताओं और उन परिधियों को पूरक के साथ हृद् और अणु मन्त्रों से अत्यन्त श्रद्धा से अपने हृदय - कमल में स्थापित करे । सब प्रकार के बने हुए पाक में से थोड़ा - सा लेकर दो मण्डल बनाये ॥ ६१-६४ ॥ कुण्ड के समीप ही अग्निकोण में अन्तः और बहिः बलि दे । बलि मन्त्र ये हैं - ' ॐ हां रुद्रेभ्यः स्वाहा ' मन्त्र से पूर्व में, ' मातृभ्यः स्वाहा ' से दक्षिण में, ' हां गणेभ्यः स्वाहा ' से पश्चिम में, ‘ तेभ्यः अयं बलिः ', ' हां च यक्षेभ्यः ' मन्त्र से उत्तर में, ' हां ग्रहेभ्यः ' मन्त्र से ईशानकोण में, ' हामसुरेभ्यः ' मन्त्र से अग्निकोण में, ' हां रक्षोभ्यो ' मन्त्र से नैर्ऋत में, ' हां नागेभ्यः ' मन्त्र से वायव्यकोण में, ' हां नक्षत्रेभ्यः ' मन्त्र से मध्य में, ‘ हां राशिभ्यः स्वाहा ' मन्त्र से अग्नि में, ' विश्वेभ्यो ० ' मन्त्र से नैर्ऋत में, ' क्षेत्रपालाय स्वाहा ' मन्त्र से पश्चिम में बलि दे । यह बलि अन्तर्बलि कही गयी है ॥६५-६८ ॥ दूसरे मण्डल के बाह्य भाग में इन्द्राय, अग्नये, यमाय, नैर्ऋताय, जलेशाय, वायवे, धनरक्षिणे और ईशानाय के साथ स्वाहा जोड़कर क्रमशः पूर्वादि दिशाओं में बलि दे । ईशानकोण में ' ब्रह्मणे नमः ' से और नैर्ऋतकोण में ' विष्णवे स्वाहा ' मन्त्र से वायस आदि को बहिर्बलि दे । उपर्युक्त दो प्रकार की बलियों में प्रयुक्त मन्त्रों को अपनी आत्मा में संहारमुद्रा द्वारा संहार करे ॥६९ -७१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शिवपूजांगहोम - विधि वर्णन नामक पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७५ ॥

१ ख. ग. संबरा ' । २ क. ङ. च. ' येच्च हृदम्बु ' । घ. येत हृदम्बु । ३ ख. ग. हां गुहेभ्यश्च । अ ' । ४ घ. ग्रहेभ्य उ । अ ' । ५ क. ख. ग. ङ. च. ' ग्नौ होम ' । ६ ख. ग. वायव्यां । ७ घ. ' याग्नियमा । ८ क. ङ. च. ' शान ' । ९ क. घ. ङ. च. " " संहारमुद्र ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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२८६ ततः शिवान्तकं गत्वा अर्थ्योदकेन ' देवाय ततः पूर्ववदभ्यर्च्य स्तुत्वा अग्निपुराणम् अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः चण्डपूजा ईश्वर उवाच

पूजाहोमादिकं मम । गृहाण भगवन्पुण्यफलमित्यभिधाय च ॥१ ॥

मुद्रयोद्भवसंज्ञया । हृद्द्द्बीजपूर्वमूलेन स्थिरचित्तो निवेदयेत् ॥२ ॥

स्तोत्रैः प्रणम्य च 1 । अर्घ्यं पराङ्मुखं दत्त्वा क्षमस्वेत्यभिधाय च ॥ ३ ॥

नाराचमुद्रयाऽस्त्रेण फडन्तेनाऽऽत्मसंचयम् । संहृत्य दिव्यया लिङ्गं मूर्तिमन्त्रेण योजयेत् || ४ ॥ स्थण्डिले त्वर्चिते देवे मन्त्रसंहारमात्मनि । नियोज्य विधिनोक्तेन विदध्याच्चण्डपूजनम् ॥५ ॥

ॐ चण्डेशानाय नमो मध्यतश्चण्डमूर्तये । ॐ धू लिचण्डेश्वराय हूं फट् स्वाहा तमाह्वयेत् || ६ ||

चण्डहृदयाय ' हूं फडो चण्डशिरसे तथा । ॐ चण्डशिखायै हूं फट् चण्डायुष्कवचाय च ॥७ ॥

चण्डास्त्राय तथा हूं ' फट् चण्डं रुद्राग्निजं स्मरेत् । शूलटङ्कधरं कृष्णं साक्षसूत्रकमण्डलुम् ॥८ ॥

टङ्काकारेऽर्धचन्द्रे वा चतुर्वक्त्रं प्रपूजयेत् । यथाशक्ति जपं कुर्यादङ्गानां तु दशांशत: ॥९ ॥

अध्याय ७६ चण्ड - पूजा ईश्वर बोले- इसके पश्चात् शिव के समीप जाकर ' भगवन्! मेरे पूजा, होम आदि और पुण्य फल को ग्रहण कीजिये ', ऐसा कहकर स्थिरचित्त होकर देवता को उद्भवमुद्रा के द्वारा हृद्बीज युक्त मूल मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करे ॥१-२ ॥ पुनः पूर्व की भाँति पूजन करके स्तोत्रों से स्तुति और प्रणाम करे । देवता के सम्मुख होकर अर्घ्य देकर ' आप मुझे क्षमा करें, ऐसा कहकर नाराच मुद्रा से फडन्त अस्त्र मन्त्र से आत्मा का संचय करे । दिव्य मुद्रा के द्वारा संहार कर लिङ्ग को मूर्ति मन्त्र से युक्त कर दे ॥३-४ ॥ वेदी पर देव की अर्चना हो जाने पर अपने अन्तःकरण में मन्त्र - समूह का विनियोजन करके विधिपूर्वक चण्ड - पूजन करे ॥५ ॥ उस समय, ' ॐ चण्डेशाय नमः ' से चण्ड देवता को नमस्कार करे । फिर मण्डप के

मध्य में ' चण्डमूर्तये ' से चण्ड की पूजा करे । ' ॐ धूलिचण्डेश्वराय हुं फट् स्वाहा ' इस मन्त्र से आवाहन करे । ' चण्डहृदयाय हुं फट् ’, ‘ ॐ चण्डशिरसे ' तथा ' ॐ चण्डशिखायै हुं फट् ', ' चण्डायुष्कवचाय ', ' चण्डास्त्राय ' तथा ' हुं फट् ' मन्त्रों में रुद्राग्नि से उत्पन्न चण्ड का स्मरण करे ॥ ६-७ ३ ॥ टङ्काकार या अर्धचन्द्र पर शूलटङ्कधारी, अक्षसूत्र और कमण्डलु से युक्त कृष्णवर्ण और चार मुखवाले चण्ड का पूजन करे । यथाशक्ति अङ्गों का दशमांश जप करे ॥८ - ९ ॥ गाय, भूमि, सोना, १ क. ख. ग. छ. च. अर्धोद ' । २ क. ' संहार ' । घ. ' संघातमा । ङ. ' सहतिमा । च. संहतमा । ३ क. ङ. च. ॐ ध्वनि च ' । ४ ख.ग. हरूं । ५ ख. ग. हरूं । ६ ख. ग. हूं च हुं । ७ क. ङ. च. म् । ढक्काका । ८ क. ङ. च. ' नां तद्दशां " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA