अग्नि पुराण — पृष्ठ 41–50
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 41–50
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३७ अध्याय विषय १३ ९ साठ संवत्सर प्रभव आदि संवत्सरों का फल -निरूपण । १४० वश्यादि योग १४१ छत्तीस पदकों का ज्ञान पृ ० सं ० श्लोक सं ० ४८७ १३ ४८८ १७ ४ ९ ० १६ हरीतकी आदि का फल - कथन । मृतसंजीवनी योग का कथन । सर्वरोग प्रशमनादि योग । १४२ प्रश्न चक्र १४३ १४४ १४५ शाक्त १४६ मन्त्रौषधादि के विषम आदि वर्णनों के द्वारा गर्भस्थ शिशु आदि का आदि का कथन । कुब्जिका- पूजा कुब्जिका मन्त्र आदि का कथन मालिनी - मन्त्र और शाम्भव आदि मन्त्रों का न्यास । अष्टाष्टक देवियाँ त्रिखण्डी आदि देवताओं का मन्त्र - कथन । १४७ त्वरिता- पूजा गुह्य कुब्जिका आदि देवताओं का मन्त्र - निरूपण । १४८ संग्राम - विजय के लिए पूजा दीप्ता, सूक्ष्मा आदि देवताओं का पूजन । १४ ९ लक्षकोटि होम लक्षण - कथन । शनि-होम से उत्पात का नाश । होम का फल - कथन । अयुतादि होमों का विशेष कथन । होम के अनुरूप से कुण्ड का परिमाण । १५० मन्वन्तर - वर्णन स्वायंभुव से लेकर आग्नीध्र आदि सुतों की उत्पत्ति । उन मन्वन्तरों में सप्तर्षि आदि की उत्पत्ति । वेदों का विभाग । १५१ वर्णेतर धर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों का आचार - निरूपण । चाण्डाल आदि की उत्पत्ति का कथन । उनकी उपजीविका का वर्णन । ४ ९ २ २१ ४ ९ ५ १७ 2 ४ ९ ७ ४१ % ५०० ३० ५०३ २८ 24 ५०६ १२ ५०८ ५० ९ १५ ५१० ३१ ५१३ १८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३८ अध्याय विषय १५२ गृहस्थ - वृत्ति का कथन १५३ ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों के गर्भाधान, पुंसवन का समय । सीमन्तोन्नयन का समय । ब्राह्मण आदि के उपनयन का समय । १५४ विवाह - कथन ब्राह्मण की ब्राह्मणी आदि चार पत्नियों के परिग्रहण में की क्षत्रिया आदि तीन भार्याएँ, वैश्य की वैश्या आदि दो पृ ० धर्म जातकर्म आदि का कथन । अधिकार का कथन । क्षत्रिय पत्नियाँ, शूद्र की शूद्र जातीय एक ही पत्नी का कथन । विवाह - भेद का कथन । विवाह में शची - पूजन का विधान । विवाह में निषिद्ध काल । विवाह - काल । विवाह में ग्रहों की अनुकूलता का कथन । १५५ आचार - वर्णन नित्य, नैमित्तिक आदि छह प्रकार के स्नान की विधि । मन्त्र - स्नान विधि । पुरुष-सामान्य का धर्म - निरूपण । १५६ द्रव्य - शुद्धि मृत्तिका आदि द्रव्यों की शुद्धि का कथन । मार्जन आदि यज्ञ - पात्रों की शुद्धि । गृह आदि की शुद्धि । १५७ प्रेतशुद्धि - वर्णन मृतकाशौचादि । जन्म और मरण में सपिण्डों की दस दिनों में शुद्धि । क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की क्रमशः बारह दिन, एक पक्ष और एक मास में शुद्धि । प्रेत को उद्देश्य करके श्राद्धादि का कथन । शूद्र का बुलाने का कर्म । पर्वत से गिरकर, अग्नि में जलकर, फाँसी लगाकर, आत्महत्या करनेवाले पतितों के, बिजली गिरने से मरनेवालों, शस्त्रों से विहत होनेवालों के मरने पर सपिण्डों का अशौचाभाव । ब्राह्मण द्वारा शूद्र के और शूद्र द्वारा ब्राह्मण के शव उठाने पर दोष - कथन । अनाथ ब्राह्मण के शव वहन करने से स्वर्ग आदि की प्राप्ति । शव वहन करने की विधि । अनुत्पन्न दाँतवाले शिशुओं के अग्नि संस्कार का अभाव - कथन । १५८ गर्भस्त्रावादि अशौच का कथन ब्राह्मण आदि के अस्थि संचय का समय । सपिण्ड आदि का मृतकाशौच कथन । आत्महत्या करनेवालों को नरक की प्राप्ति । मृतक के दशाह कर्म का निरूपण । पिता के मर जाने पर पुत्र आदि का धर्म - कथन । पुत्र के जन्म - दिन में कर्त्तव्य श्राद्ध का कथन । अशौच संपात का निर्णय । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ५१५ ५१६ १६ ५१७ १ ९ ५१ ९ ३१ ५२३ १६ ५२५ ४२ ५२ ९ ६ ९
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३ ९ अध्याय विषय १५ ९ असंस्कृत आदि का शौच गंगा में अस्थि प्रक्षेप करने से मृतक के अभ्युदय आदि का कथन । आत्महत्या करनेवाले पतितों की जल - क्रिया न होने का कथन । उनको उद्देश्य करके नारायण बलि देने का प्रतिपादन । १६० वानप्रस्थाश्रम वनवासियों के धर्म । १६१ संन्यासी के धर्म प्राजापत्य यज्ञ के द्वारा अपने को आरोपित करके गृह से प्रव्रजन करना । संन्यासी के ग्रहण करने योग्य पात्रों का कथन । पाँच प्रकार की भिक्षा । हिंसा - दोष निवृत्ति के लिए प्राणायाम आदि का कथन । भिक्षु के कुटीचक्र आदि चार भेद । प्रसंगत: यम, नियम का कथन । सगर्भ और अगर्भ भेद से प्राणायाम के दो प्रकार । पूरक, कुम्भक और रेचक भेद से पुनः उसके तीन प्रकार । संन्यासी के कर्त्तव्य ध्यान आदि का कथन । १६२ धर्मशास्त्र का कथन प्रवृत्त, निवृत्त भेद से दो प्रकार का कर्म । श्रावणी पूर्णिमा को स्वाध्यायों की उपाकर्म विधि । सैंतीस अनध्यायों का कथन । १६३ श्राद्धकल्प - कथन ब्राह्मणों के निमंत्रण आदि का कथन । देवकर्म और पितृकर्म के क्रमशः युग्म और अयुग्म संख्यावाले ब्राह्मणों को बैठाने का कथन । ' विश्वेदेवासह ' इत्यादि मन्त्र से ब्राह्मण - पूजन का विधान । पिण्डदान - निरूपण । वृद्धि श्राद्ध - कथन । एकोद्दिष्ट-श्राद्ध - विधि । सपिण्डीकरण विधान । एक वर्ष तक जल सहित घटदान आदि का विधान । मासिक आदि श्राद्धों का कर्त्तव्यत्वेन विधि - निरूपण । श्राद्धकर्त्ता को स्वर्गादि का विधान । १६४ नवग्रह होम ताँबे आदि से ग्रहों की प्रतिमा बनाने का विधान । ' आकृष्णेन ' इत्यादि मन्त्र से अर्क आदि की समिघा से हवन । दक्षिणा में धेनु आदि का प्रदान । १६५ नाना धर्म ध्यान करनेवाले को श्राद्धादि देने का निरूपण । गजच्छाया में श्राद्धादि दान से पितरों को अक्षय तृप्ति की प्राप्ति । योगविधि - निरूपण । विजातीय से प्राप्त गर्भवाली स्त्री का दोष - निरूपण । गर्भ के बाद रजोधर्म हो जाने पर स्त्री की शुद्धि का विधान । ध्यान पृ ० सं ० श्लोक सं ० ५३६ १४ ५३८ ५ ५३ ९ ३१ ५४२ १८ ५४४ ४२ ५४८ १४ ५४ ९ २८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४० विषय पृ ० अध्याय द्वारा पाप कर्मों का शोधन । नैष्ठिकधर्म में आरूढ़ व्यक्ति का व्रत से सम्बन्ध होने पर प्रायश्चित्ताभाव कथन । पत्नी का परित्याग कर संन्यास ग्रहण करके पुनः सन्तान उत्पन्न करने पर वह सन्तान ' विदुर ' नामक चाण्डाल कहलाती है, ऐसा कथन । योग की श्रेष्ठता । १६६ वर्णधर्मादि कथन अड़तालीस संस्कारों से संस्कृत व्यक्ति को ब्रह्मलोक की प्राप्ति । गर्भाधान आदि संस्कारों का निरूपण । दया आदि आठ गुणों का कथन । प्रचार आदि में मौन धारण । जल आदि से पंक्ति दोषाभाव । १६७ अयुतलक्षकोटि होम ग्रह प्रतिष्ठापन आदि का प्रकार । अभिषेक मन्त्र का कथन । विवाहोत्सव और यज्ञ आदि में ग्रह यज्ञ की आवश्यकता । कुण्ड के परिमाण का लक्षण । अभिचार कर्मों में त्रिकोण कुण्ड का विधान । अभिचार कर्म की विधि । पिष्टपिण्ड से शत्रु का रूप बनाकर छूरे से काटने का विधान । १६८ महापातक आदि का कथन पागल, क्रोधी आदि का अन्नभक्षण निषेध । गणिका आदि के अन्न का भी अभक्ष्य होने का निरूपण । अभिशप्त व्यक्ति का अन्न त्याग - कथन । निमन्त्रित होकर शूद्र ब्राह्मण का अन्न न खायें । उनके अन्नभक्षण से प्रायश्चित्त का वर्णन । चाण्डाल और मेहतर ( श्वपच ) का अन्न भक्षण करने पर चान्द्रायण - व्रत का विधान । शशक आदि पंचनखवाले जीवों के किसी कुएँ में मर जाने पर उस कुएँ का जल पी लेने पर उपवास करना । शूकर, गधा, ऊँट आदि के मूत्र, मल भक्षण करने पर चान्द्रायण-व्रत करना । गाय, मनुष्य और अश्व आदि का मांस भक्षण करने पर तप्तकृच्छ्र आदि का प्रायश्चित्त करना । ब्रह्महत्या आदि महापातकों का कथन । ब्रह्महत्या के समान पातकों का निरूपण । उपपातक का कथन । जातिभ्रष्ट करनेवाले का कथन । १६ ९ प्रायश्चित्त - वर्णन ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त कथन । गोहत्या आदि का प्रायश्चित्त कथन । ब्रह्मचर्य व्रत भंग करनेवाले का चान्द्रायणादि व्रत - विधान । मदिरापान का प्रायश्चित्त । सोना चुराने का प्रायश्चित्त । गुरुपत्नी गमन का प्रायश्चित्त । जातिभ्रंश का प्रायश्चित्त कथन । बिल्ली आदि के मारने का प्रायश्चित्त कथन । तुच्छ वस्तु के चुराने पर प्रायश्चित्त । भक्ष्य, भोज्य आदि चुराने का प्रायश्चित्त कथन । अगम्या स्त्री के साथ गमन करने का प्रायश्चित्त । १७० प्रायश्चित्त - वर्णन पातकी के साथ संसर्ग करनेवाले का प्रायश्चित्त कथन । पतित को जलदान देने का CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ५५२ २२ ५५४ ४४ ५५७ ४० ५६१ ४१ ५६५ ४६
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४१ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० कथन । असत्प्रतिग्रह होने पर प्रायश्चित्त का विधान । कुत्ते और श्रृंगाल के काट लेने पर प्रायश्चित्त । अज्ञान से चाण्डाल आदि के गृह में वास करने पर और पश्चात् गृहपति के चाण्डाल होने का ज्ञान हो जाने पर प्रायश्चित्त करना । म्लेच्छों का सम्पर्क होने पर प्रायश्चित्त करना । एक रजस्वला स्त्री के द्वारा दूसरी रजस्वला स्त्री का स्पर्श हो जाने पर प्रायश्चित्त करना । १७१ प्रायश्चित्त - वर्णन रहस्य ( गुप्त पाप ) आदि का प्रायश्चित्त । सभी प्रायश्चित्तों में मुण्डन आदि का विधान । वीरासन का लक्षण । संन्यासी के चान्द्रायण का लक्षण । शिशुओं के चान्द्रायण व्रत और देवताओं के चान्द्रायण व्रत का लक्षण । तप्तकृच्छ्रव्रत का लक्षण । कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत का लक्षण । कृच्छ्रसान्तपन व्रत का लक्षण । महासान्तपन का लक्षण । अतिसान्तपन का लक्षण । तप्तकृच्छ्रादिव्रत का कथन । ब्रह्मकूर्चव्रत का लक्षण । १७२ सभी पापों के प्रायश्चित्त विष्णु के पापप्रणाशन स्तोत्र का वर्णन । १७३ प्रायश्चित्त - वर्णन ब्रह्महत्या का स्वरूप कथन । ब्रह्महत्यादि के प्रायश्चित्त । लकड़ी आदि से गोहत्या करने पर सान्तपन व्रत का विधान । वीर्य, मूत्र और विष्ठा के पान का प्रायश्चित्त । मनुष्यहरण आदि दोषों का प्रायश्चित्त । १७४ प्रायश्चित्त देवाश्रम में अर्चन ( पूजन ) आदि के लोप होने पर प्रायश्चित्त । पापक्षय के लिए अन्नदान आदि का निरूपण । गंगा आदि तीर्थों का पापहारकत्वेन कथन । पाप मिटानेवाले काशी आदि तीर्थों का कथन । १७५ व्रत- परिभाषा व्रत में वर्जनीय द्रव्यों का कथन । बार - बार जलपान करने से उपवास का भंग होना । सब प्रकार के व्रतों में साधारण धर्म का प्रतिपालन । व्रत में ग्रहण करने योग्य द्रव्यों का निरूपण । व्रत में कूष्माण्ड ( कोंहड़ा ) का निषेध । प्रसंगतः प्राजापत्य, अतिकृच्छ्र, सान्तपन, महासान्तपन, पराक और चान्द्रायण का लक्षण । ब्रह्मकूर्च का लक्षण । मलमास में अग्न्याधेय आदि का निषेध । चान्द्रमास आदि का वर्णन । पितृपक्ष में श्राद्ध की कर्त्तव्यता । गर्भिणी, प्रसूतिका, रजस्वला आदि का अशुद्धिकाल में दूसरे के द्वारा व्रतादि का सम्पन्न कराना । क्रोध आदि से व्रतभंग होने पर प्रायश्चित्त । व्रत की परिपूर्ति के लिए भगवान् जगदीश की प्रार्थना । व्रत के अंगभूत ब्राह्मण - भोजन । ५६ ९ १७ ५७१ २१ ५७३ ५४ ५७८ २४ ५८० ६२ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४२ विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० अध्याय १७६ प्रतिपदा व्रत पंचदशी ( पूर्णिमा ) को निराहारपूर्वक प्रतिपदा में ब्रह्मार्चन विधान । सलक्षण सुवर्णब्रह्म - पूजन । शक्तिपूर्वक ब्रह्मा को दुग्धदान । व्रतफल का विधान । मार्गशीर्ष की प्रतिपदा में शिखिव्रत । १७७ द्वितीया व्रत द्वितीया में अश्विनीकुमार का पूजन । कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया में यम का पूजन । श्रावण कृष्णपक्ष की द्वितीया में अशून्यशयनव्रत करण । अशून्यशयनव्रत का विधिनिरूपण । कार्तिक शुक्लपक्ष में कान्तिव्रत । उस व्रत की विधि । पौष शुक्लपक्ष की द्वितीया में विष्णु का व्रत । उस व्रत के विधान का निरूपण । १७८ तृतीया व्रत चैत्र शुक्लपक्ष की तृतीया में मूलगौरीव्रत । उस व्रत की विधि का निरूपण । भाद्रपद, वैशाख और मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में भी इस व्रत का विधान । फाल्गुन आदि की तृतीया विधि में सौभाग्य व्रत का कथन । १७ ९ चतुर्थी व्रत मार्गशीर्ष की चतुर्थी में गणेश - व्रत । इनके मन्त्र भाद्रपद चतुर्थी व्रत । अंगारक चतुर्थी व्रत । १८० पंचमी व्रत भाद्रपद आदि मास के शुक्लपक्ष की पंचमी में १८१ षष्ठी व्रत का कथन, गणेश- - पूजन विधि । वासुकी आदि का पूजन । कार्तिक व्रत में षष्ठी आदि का विधान । भाद्रपद में स्कन्द षष्ठी । मार्गशीर्ष में कृष्ण षष्ठी व्रत । १८२ सप्तमी व्रत माघ आदि के शुक्लपक्ष में सूर्य की पूजा । १८३ अष्टमी व्रत जन्माष्टमी व्रत । रोहिणी सहित चन्द्रमा को अर्घ्यदान देने की विधि । व्रत - पूजा - विधि का कथन । व्रत की महिमा का वर्णन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ५८६ ७ ५८७ २० ५८ ९ २८ ५ ९ २ ६ ५ ९ ३ ५ ९ ३ ५ ९ ४ ५ ९ ५ १८
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४३ अध्याय विषय १८४ अष्टमी व्रत चैत्र कृष्ण अष्टमी में कृष्णाष्टमी व्रत । मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी में नक्तव्रत । पौष मास आदि में शिव - व्रत और उसका विधान - कथन । बुधाष्टमी व्रत - कथन । बुधाष्टमी कथा निरूपण । पुनर्वसु नक्षत्र में अशोक रसपान का विधान । १८५ नवमी व्रत आश्विन शुक्लपक्ष में नवमी व्रत । रुद्रचण्डा आदि देवताओं का पूजन । आयुध-पूजन । पशुहनन का विधान । इसके रुधिर से पूतना आदि देवताओं का संतर्पण । इसके आगे पिष्टमय शत्रु का हनन । उसके हवन का विधान । जयन्ती आदि को उद्देश्य करके बलिदान आदि का कथन । १८६ दशमी व्रत १८७ एकादशी व्रत एकादशी में पूजा आदि का विधान । १८८ द्वादशी व्रत चैत्र शुक्ल द्वादशी को मदनद्वादशी व्रत । माघ शुक्ल द्वादशी में भीमद्वादशी व्रत । फाल्गुन शुक्ल द्वादशी में गोविन्दद्वादशी व्रत । आश्विन शुक्ल द्वादशी में विशोक-द्वादशी व्रत । मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी में कृष्ण की अभ्यर्चना करके लवण - दान की विधि । भाद्रपद में गोवत्सद्वादशी व्रत । श्रवण युक्त द्वादशी में तिलद्वादशी व्रत । फाल्गुन शुक्लपक्ष में मनोरथद्वादशी व्रत । केशव आदि नामों से नामद्वादशी व्रत । भाद्र शुक्ल में आनन्दद्वादशी व्रत । पौष शुक्ल द्वादशी में सम्प्राप्तिद्वादशी व्रत । १८ ९ श्रवणद्वादशी व्रत भाद्रपद शुक्लपक्ष द्वादशी में श्रवणद्वादशी व्रत । वामनद्वादशी व्रत । इसकी पूजा - विधि । १ ९ ० अखण्डद्वादशी व्रत मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की द्वादशी में अखण्डद्वादशी व्रत । द्वादशी में यव, धान्य आदि से युक्त पात्र का दान । चैत्रादि मासों में सत्तू पात्र आदि दान करने का विधान | १ ९ १ त्रयोदशी व्रत मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष त्रयोदशी में अनंगत्रयोदशी व्रत । पौषादि मासों में योगेश्वर आदि का पूजन । आश्विन मास में त्रिदशाधिप - पूजन । कार्तिक में विश्वेश्वर- र - पूजन । वर्षान्त में शिव की स्वर्ण प्रतिमा का दान । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ५ ९ ७ २३ ५ ९९ १५ ६०१ १ ६०१ ९ ६०३ १४ ६०४ १५ ६०६ ६ ६०७ ११ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४४ अध्याय विषय १ ९ २ चतुर्दशी व्रत कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को शिव - पूजन । शुक्ल कृष्ण पक्षों अष्टमी को शिव का पूजन । अनंगचतुर्दशी व्रत । चावल बनाना । १ ९ ३ शिवरात्रि व्रत माघ कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि व्रत । १ ९ ४ अशोकपूर्णिमादि व्रत पृ ० की चतुर्दशी और के चूर्ण का पुआ फाल्गुनी पूर्णिमा को अशोकपूर्णिमा व्रत कार्तिक पूर्णिमा को वृषोत्सर्गपूर्वक वृषभ व्रत कथन । माघ की पंचदशी को छाग - पूजन । ज्येष्ठ मास की पंचदशी को सावित्री व्रत । इस व्रत का विधान । १ ९ ५ वार व्रत हस्त नक्षत्र में सूर्यवार का व्रत । रात्रि में आब्दिक व्रत । चित्रा नक्षत्र में सोमवार व्रत । स्वाती नक्षत्र में भौम व्रत । विशाखा नक्षत्र में बुध व्रत । अनुराधा नक्षत्र में गुरुवार व्रत । ज्येष्ठा नक्षत्र में शुक्रवार व्रत । मूल नक्षत्र में शनि व्रत । १ ९ ६ नक्षत्र व्रत मूलादि में विष्णु के चरण आदि का पूजन । कार्तिक में कृत्तिका नक्षत्र में केशव आदि नामों से अच्युत पूजन । कार्तिक आदि चार मासों में अन्नदान की कर्त्तव्यता । फाल्गुन आदि चार मासों में खिचड़ी दान | आषाढ़ आदि में खीर दान । नक्षत्र-व्रत में अनन्त व्रत कथन । अनन्त को उद्देश्य करके घृत से चार मास तक हवन करना । चैत्र आदि में चावल से हवन करना । १ ९ ७ दिवस व्रत धेनुव्रत का कथन । पयोव्रत । कल्पवृक्ष व्रत । त्रिरात्रव्रत की महिमा का वर्णन । कार्तिक शुक्ल दशमी में कार्तिक व्रत । चैत्र में त्रिरात्र आदि व्रत का वर्णन । १ ९ ८ मास व्रत आषाढ़ आदि में चतुर्मास व्रत । वैशाख मास व्रत । माघ और चैत्र में गुड़ की धेनु का दान । मार्गशीर्ष आदि मासों में नक्तव्रत । मांस आदि के त्याग से विप्रत्व आदि की प्राप्ति का कथन । आश्विन में कौमुदव्रत । कौमुदव्रत का फल निरूपण । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ६०८ १० ६१० ६११ ६१२ ६१३ २३ ६१५ १६ ६१७ १६
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४५ अध्याय विषय १ ९९ नाना व्रत वर्षाकाल में ईंधन दान - व्रत । संध्याकाल में मौनव्रत । तिल, घण्टा और वस्त्र दान आदि के व्रत । संक्रान्ति व्रत । उमा व्रत । २०० दीपदान व्रत दीपदान की प्रशंसा । दीपदान से विदर्भ राजकुमारी ललिता को राजपत्नीत्व की प्राप्ति । दीपहरण करनेवाले को नरक आदि की प्राप्ति । २०१ नवव्यूह का अर्चन कमल पर वासुदेव की अर्चना आदि का कथन । दिशाओं में प्रद्युम्न आदि देवताओं की स्थापना । गुरु द्वारा कर्त्तव्य न्यासादि का निरूपण । गुरु द्वारा कर्त्तव्य न्यास का ही शिष्य की देह में कर्त्तव्यत्व कथन । नेत्र में पट्टी बाँधे हुए शिष्य द्वारा जिस देवता की मूर्ति पर फूल चढ़ाया जाता है, उसी देवता का नामकरण । तिल - व्रीहि से होम करना । शिष्य को दीक्षा देना । २०२ पुष्पवर्ग कथन पुष्प, गन्ध, धूप आदि से विष्णु का तोषण । मालती आदि पुष्पों से विष्णु पूजा में तत्तत् फल की प्राप्ति । पुष्पमाला चढ़ाने में अधिक पुण्य का कथन । अपने वन और दूसरे के वन ( पुष्पवाटिका ) में उत्पन्न पुष्पों से जंगल में उत्पन्न पुष्पों का अधिक फल कथन । झड़कर गिरे हुए पुष्पों से विष्णु पूजा का निषेध । कचनार आदि से विष्णु की पूजा करने पर नरक आदि की प्राप्ति का कथन । सुगंधित ब्रह्मपद्म आदि से विष्णु की पूजा का विधान । अर्क और मदार आदि के पुष्पों से शिव का पूजन । अहिंसा रूप पुष्पादि से ईश पूजन करने पर भुक्ति - मुक्ति की प्राप्ति का कथन । वारुण आदि आठ पुष्पों से पूजन का विधान । २०३ नरक - स्वरूप - वर्णन पुष्पादि से विष्णु का पूजन करने पर नरक प्राप्ति के अभाव का कथन । आयु के अन्त में प्राणी की मृत्यु हो जाने पर अपने कर्म के द्वारा यातना शरीर की प्राप्ति । पापी को यमलोक की प्राप्ति । धर्माचरण से स्वर्ग की प्राप्ति । संयमनी पुरी में पापियों का विविध यातनाओं का भोग । २०४ मासोपवास - व्रत आश्विन शुक्ल एकादशी को मास व्रत का विधान । व्रत नियमादि का कथन । व्रत विधि का निरूपण । व्रताचरण फल कथन । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ६१ ९ ११ ६२० १ ९ ६२२ १६ ६२४ २३ ६२६ २३ ६२ ९ १८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४६ विषय पृ ० अध्याय भीष्म पंचक व्रत २०५ कार्तिक शुक्ल एकादशी को भीष्मपंचक व्रत का कथन । पंचगव्य आदि के द्वारा विष्णु पूजा की विधि का कथन । तिल और व्रीहि आदि से होम आदि का कथन । अगस्त्यार्घ्यदान - कथन २०६ मुनि की काश पुष्प रचित मूर्ति का पूजन । अर्घ्यदान विधि । लोपामुद्रा को अर्घ्यदान । ब्राह्मण भोजन आदि का कथन । अर्घ्यदान फल कथन । २०७ कौमुद - व्रत आश्विन शुक्लपक्ष में व्रत ग्रहण । मासपर्यन्त विष्णु का पूजन तथा व्रत विधान । २०८ व्रतदानादि- समुच्चय समस्त व्रतों के सामान्य विधि का निरूपण । २० ९ दानपरिभाषाकथन वापी, कूप आदि के निर्माण से मुक्ति प्राप्ति का वर्णन । अग्निहोत्र वेदादि का परिपालन करने से स्वर्ग की प्राप्ति । ग्रहण आदि में दान आदि का कर्त्तव्यत्व कथन । युगादि में दान की महिमा । युगों का उत्पत्ति काल । आश्विन शुक्ल नवमी आदि में दान का आवश्यकत्वेन कथन । दान - काल में ' दाता को पूर्वमुख होना चाहिए और प्रतिगृहीता को उत्तरमुख होना चाहिए ' यह कथन । सुवर्ण, अश्व, तिल आदि दान का महत्त्वदानत्व कथन । प्रतिज्ञा करके न देने पर वंश - नाश | गुरु आदि का पुण्य-दान कथन । दान में पात्र, अपात्र का विचार । कन्या आदि दान के प्राजापत्य आदि देवता हैं, यह कथन । यज्ञ के लिए शूद्र के धन का अग्राह्यत्व । अध्यापन करने और यज्ञ कराने तथा निन्दित प्रतिग्रह लेने से विप्रों का दोषाभाव कथन । २१० महादान तुला पुरुष आदि सोलह महादानों का निरूपण । मेरु दान का कथन । दस धेनुओं का दान । धेनु की प्रशंसा, गोदान आदि की विधि । २११ नाना दान गोदान कथन । गोदान प्रशंसा । महिषी आदि का दान । वृषोत्सर्ग विधि का वर्णन । शय्या आदि दान का कथन । काले तिल के बने पुरुष का दान और उसकी प्रशंसा । सुवर्ण आदि दान के फल की प्राप्ति । अन्नदान की प्रशंसा । अभयदान की प्रशंसा । विद्यादान की प्रशंसा । पुस्तक दान का फल निरूपण । विष्णु आदि देवता की प्रतिमा का दान । सं ० श्लोक सं ० ६३१ ६३२ २० ६३४ w ६३५ १२ ६३६ ६३ ६४२ ३४ ६४५ ७२