अग्नि पुराण — पृष्ठ 51–60
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४७ अध्याय विषय २१२ मेरुदान मार्गशीर्ष आदि में पिष्टमय ( आटे के बने ) अश्व आदि के दान का वर्णन । मेरुदान की विधि । मेरुदान का फल वर्णन । महामेरुदान । सुवर्ण मेरुदान आदि का कथन । २१३ पृथ्वी - दान पाँच भार सोने से सात द्वीपोंवाली समुद्र समेत पृथ्वी बनाकर दान का कथन । पृथ्वी दान का फल कथन । पाँच सौ पल सुवर्ण से कामधेनु बनाकर दान की विधि । धेनुदान । सालङ्कार ( आभूषणयुक्त ) स्त्री दान करने से अश्वमेध यज्ञ की प्राप्ति । भूमिदान आदि का कथन । २१४ नाड़ीचक्र कथन नाभि से नीचे मूलाधार से बहत्तर हजार नाड़ियों की उत्पत्ति का कथन । उनके बीच इड़ा आदि प्रधान नाड़ियों का कथन । प्राण - अपान आदि वायुओं का प्रतिपादन । नाग, कूर्म आदि उपवायुओं का कथन । प्राणादि वायुओं का लक्षण । जीव के दस स्थानों से प्रयाण करने का वर्णन । सुषुम्ना आदि नाड़ियों का स्थान कथन । प्राणायाम कथन । अजपा गायत्री का जप विधान । देह में ब्रह्मादि देवताओं का स्थान कथन । प्रासाद का लक्षण । जप, होम आदि की विधि । २१५ सन्ध्या - विधि ' ओं ' कार सभी मन्त्रों के लिए उपयोगी है, यह कथन । गायत्री - माहात्म्य - वर्णन । गायत्री मंत्र के ऋषि आदि का कथन । गायत्री के वर्ण, देवता आदि का कथन । मार्जन, अघमर्षण आदि का विधान । २१६ गायत्री - निर्वाण गायत्री जप की कर्त्तव्यता । हवन से वृष्टि आदि की उत्पत्ति का कथन । २१७ गायत्री - निर्वाण लिङ्गमूर्ति - शिव - स्तुति कथन । वशिष्ठ के प्रति शिव कृत वरदान आदि का कथन । २१८ राज्याभिषेक कथन राजलक्षण । संवत्सर पर्यन्त पुरोहित आदि का वरण । राज्याभिषेक के पहले ऐन्द्री शान्ति का विधान । अभिषेक दिन के कर्त्तव्य विधि का निरूपण । अभिषेक के लिए मृत्तिकाहरण आदि का कथन । सौ छिद्रवाले सुवर्ण पात्र से अभिषेक का कथन । विष्णु आदि देवताओं की पूजा - विधि । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ६५१ ३५ ६५५ १० ६५६ ४१ ६५ ९ ५० ६६४ १८ ६६६ १३ ६६७ ३५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ विषय पृ ० अध्याय अभिषेक मन्त्र २१ ९ २२० सहाय सम्पत्ति राजा द्वारा ब्राह्मण और क्षत्रिय में से किसी एक नीतिज्ञ को सेनापति बनाने का कथन । दूत आदि का संग्रह । उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषों को उन - उन कार्यों में नियुक्त करने का कथन । शरण चाहने की इच्छा से दूसरे राजा के गृह से आये हुए दुष्ट और अदुष्ट का विचार करके शरण देना । राजाओं को शत्रुओं के प्रति व्यवहार करने का क्रमिक निरूपण । २२१ अनुजीवियों का राजा के प्रति कर्त्तव्य का वर्णन २२२ दुर्ग सम्पत्ति राजा के लिए संग्रहणीय देश का कथन । दुर्ग संरचना वर्णन । विष आदि से राजा की रक्षा करने का वर्णन । प्रसंगतः विष से पीड़ित वृक्ष आदि का कथन । विषनाशक वृक्ष का ज्ञान करना । देवता सम्बन्धी द्रव्य आदि का हरण करने से राजा को नरक की प्राप्ति । देवालय आदि के निर्माण से स्वर्ग आदि की प्राप्ति । राजधर्म कथन । स्त्रीधर्म कथन । २२३ राजधर्म ग्रामाधिपति के स्थापन आदि का कथन । प्रजापालन आदि राज - नियम का निरूपण । नष्टस्वामिक द्रव्य की व्यवस्था । राजा द्वारा ग्राह्य राज - कर का निरूपण । राजाओं द्वारा अपने धर्म के पालन से आयुवृद्धि आदि फल - प्राप्ति का कथन । २२४ राजधर्म विरक्ता स्त्री का त्याग कथन । अनुरक्ता स्त्रियों का संग्रहण । स्नानोपयोगी द्रव्यों का कथन । मुखरोग विनाशक गुटिका का प्रयोग कथन । स्त्रियों की रक्षा का निरूपण । २२५ राजधर्म राजकुमारों को उपदेश । राजा के लिए दिन में सोने का निषेध । राजा के गुप्त मन्त्रणा करने का कथन । २२६ साम आदि उपायों का कथन राजपुरुषार्थ की श्रेष्ठता का वर्णन । साम आदि उपायों का अलग - अलग वर्णन । साम के तथ्यातथ्य रूप दो विधाओं का कथन । अदण्डनीय को दण्ड देने पर राजा को दोष की प्राप्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ६७० ७२ ६७५ २४ ६७८ १४ ६७ ९ २६ ६८२ ३४ ६८५ ४२ ६८ ९ ३३ ६ ९ २ २०
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४ ९ अध्याय विषय २२७ दण्ड प्रणयन ताँबा, चाँदी और सुवर्णों का मान । चौरादि के दण्ड का प्रकार । एक व्यक्ति देकर पुनः दूसरे व्यक्ति को वही कन्या देनेवाले व्यक्ति को कन्या को राजा द्वारा दण्ड देने का विधान । ब्राह्मणों को धर्म का उपदेश देनेवाले शूद्र को दण्ड देने का विधान । अनेक अपराध करनेवाले पुरुषों को दण्ड देने का प्रकार । २२८ युद्ध - यात्रा शत्रु जब संकट में फँसा रहे, तभी उसके ऊपर आक्रमण करने का कथन । २२ ९ स्वप्न में शुभाशुभ तथा दुःस्वप्न हरण का कथन प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ प्रहर में स्वप्न देखने पर अनुक्रम से १ वर्ष, ६ माह, ३ माह, अर्धमास में फल का विधान । स्वप्न के दर्शन का शुभ फल । २३० शकुन - वर्णन रणयात्रा में श्वेत वस्त्र आदि दर्शन का अशुभ फल । का नाश । श्वेत पुष्पादि दर्शन का शुभ फल । सबसे फलदात्री है, यह कथन । २३१ शकुन - वर्णन के अन्त में राजा, हाथी आदि हरि - पूजन आदि से अमंगल अधिक मन की प्रसन्नता ही छह प्रकार के शकुनों का वर्णन । गौ, अश्व, उष्ट्र आदि का ग्रामवासित्वेन कथन । गोकर्ण ( खच्चर ) आदि दिन में चलनेवाले होते हैं, यह कथन । वागुरी, उलूक आदि रात्रिचर हैं, यह कथन । हंस आदि का दिन - रात चलने सम्बन्धी कथन । ये सब झुण्ड में सामने दिखायी पड़ें, तो शुभ फल होता है, यह कथन । प्रयाण में नीलकण्ठ दर्शन का शुभ फल कथन । २३२ शकुन वर्णन संग्राम - यात्रा में अनेक प्रकार के शुभाशुभ शकुनों का फल कथन । २३३ यात्रा के मुहूर्त और द्वादश राजमण्डल का विचार शुक्रास्त आदि में प्रयाण न करने का कथन । सूर्य आदि छायामान का कथन । जन्म लग्न में इन्द्रधनुष सम्मुख दिखने पर यात्रा का निषेध । स्वामी, अमात्य आदि राज्य के सात अंगों का कथन । मण्डल- ल - चिन्तन - निरूपण । शत्रुओं के तीन भेद - कुल्य, अनन्तर और कृत्रिम । ४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA पृ ० सं ० श्लोक सं ० ६ ९ ४ ६७ ७०० ७०१ ३१ ७०४ १३ ७०५ ३६ ७०८ ३७ ७१२ २६
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५० अध्याय २३४ परदेश में दण्ड आदि छल, कपट आदि के स्वरूप वर्णन । २३५ राजव्यवहार का क्रम २३६ विषय छह गुण का कथन । प्रकाश और अप्रकाश रूप द्वारा शत्रु को उद्विग्न करने का निरूपण । राजा की नित्यचर्या कथन । रणदीक्षा पृ ० से दण्ड के दो भेद । छह गुणों का पृथक् युद्ध प्रयाण से पूर्व राजा के सात दिनों का कर्त्तव्य । मौदक आदि से विनायक आदि देवताओं का पूजन । राजा का विजयार्थ स्नान । सातवें दिन त्रिविक्रम पूजन । युद्ध गमन विधि का वर्णन । दस व्यूहों का प्रतिपादन । सैन्य रचनादि का वर्णन । युद्ध धर्म निरूपण । विजय - प्राप्ति के लिए देवों और ब्राह्मणों का आवश्यक पूजन । अपने अधीन हुए शत्रु का पुत्रवत् प्रतिपालन करना । २३७ श्रीस्तोत्र श्रीस्तोत्र के पाठ का श्रवण फल । २३८ रामोक्त नीति न्यायपूर्वक धनार्जन, वर्धन, रक्षण और सत्पात्र में वितरण, इन चार प्रकारों के राजधर्म का कथन । राजगुण कथन । कामादि का निषेध । आन्वीक्षिकी आदि के द्वारा अर्थ, विज्ञान आदि का चिन्तन - प्रकार । ब्रह्मचारियों और संन्यासियों के अहिंसा आदि सामान्य धर्मों का कथन । २३ ९ राजधर्म राज्य के सप्ताङ्ग का कथन । अच्छे राजा का गुण निरूपण । आत्म - सम्पदा रूप गुण का कथन । मंत्री के गुण का कथन । पुरोहित के गुण का वर्णन । मित्र - संग्रह आदि का कथन । अनुजीवियों का आचार कथनं । अष्टवर्ग के परिपालन आदि का कथन । २४० छह गुण बारह राजमण्डल आदि का निरूपण । संधि - विग्रह यान और आसन का कथन । संधि का सोलह प्रकार । बाल, वृद्ध आदि के साथ सन्धि न करने का विचार । सापत्न्य आदि भेद से वैर का पाँच प्रकार से वर्णन । विग्रह के अवसर का वर्णन । यान के पाँच प्रकार का कथन । आसन का भी पाँच प्रकार से कथन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ७१४ २५ ७१७ १७ ७१ ९ ६६ ७२५ १ ९ ७२७ २२ ७२ ९ ४८ ७३३ ३२
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१ अध्याय विषय २४१ सामदि कथन प्रभाव और उत्साह आदि के द्वारा मन्त्र - शक्ति की प्रशस्ति का वर्णन । विज्ञान भेद से मन्त्र के पञ्चांग का कथन । कर्मसिद्धि के लक्षण का कथन । राजदूत का लक्षण-निरूपण । शत्रु के छिद्र का पता लगाने का प्रकार । राज - व्यसन का कथन । सचिव व्यसन का कथन । राष्ट्र - व्यसन आदि का कथन । पंचविध दान का वर्णन । शत्रुओं को डराने के लिए इन्द्रजाल का निर्माण । २४२ राजनीति सेना - रचना का वर्णन । युद्ध धर्म का कथन । सेना के विभाग से व्यूह आदि की रचना का कथन । गोमूत्रिका आदि रूप में व्यूह का वर्णन । गोमूत्रिका आदि व्यूहों का लक्षण । २४३ पुरुष - लक्षण त्रिवलीयुक्त पुरुष का त्रिकालज्ञत्व आदि कथन । २४४ स्त्री - लक्षण २४५ चामरादि - लक्षण भद्रासन का लक्षण । लकड़ी के चाप आदि का निर्माण - कथन । वेदोक्त मोहनमन्त्रों द्वारा धनुष और खड्ग का पूजन - विधान । नन्दक नामक खड्ग की उत्पत्ति का कथानक । खड्ग - लक्षण । खड्ग का मुख नहीं देखना चाहिए इत्यादि धर्म- -कथन । २४६ रत्न- परीक्षा वज्र ( हीरा ), मरकत ( पन्ना ) आदि रत्नों का वर्णन । और मोती का गुण - वर्णन । २४७ वास्तु - लक्षण चौंसठ पदों में ब्रह्मादि देवताओं की स्थापना - विधि कथन । घर के समीप में वृक्ष रोपने का कथन । सभी समृद्धि के लिए उपयुक्त द्रव्यों का कथन । वृक्ष का २४८ पुष्पादि से पूजा करने का २४ ९ धनुर्वेद पाँच प्रकार के धनुर्वेद का लक्षण । यन्त्र से मुक्त आदि खड़े होने का लक्षण । धनुष - धारण आदि का प्रकार मोती की उत्पत्ति का कथन । मन्त्रों द्वारा शिलान्यास का वृक्षों में फल - फूल आदि की दोहद - वर्णन । फल का लक्षण । सीधे पैर रखकर । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ७३६ ६८ ७४२ ७३ ७४ ९ २६ ७५१ ६ ७५२ २७ ७५५ १५ ७५७ ३१ ७५ ९ II ७६० ३७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२ विषय पृ ० अध्याय २५० धनुर्वेद - कथन धनुर्विद्या के अभ्यास आदि का प्रकार । वेध्य के विविध भेदों का वर्णन । २५१ धनुर्वेद - कथन धनुर्विद्या की सिद्धि को लेकर वाहन आदि पर चढ़ाने का विधान । २५२ धनुर्वेद - कथन ढाल - तलवार आदि अनेक प्रकार के शस्त्र धारण कर लेने पर भ्रान्तोद्भ्रान्त ( पैतरे बदलने ) आदि भेद से नाना जातीय प्रकार का वर्णन । २५३ व्यवहार - कथन नीति, अनीति का विवेचन । दो प्रकार के अभियोग का कथन । धरोहर के लक्षण । मूल्य लेकर विक्रेय वस्तु बेचकर क्रेता को न देने सम्बन्धी विवाद का कथन । २५४ व्यवहार - कथन ऋण चुकाने आदि का व्यवहार - कथन । २५५ दिव्य प्रमाण - कथन साक्षी के लक्षण आदि का कथन । कूटसाक्षी ( मिथ्या साक्षी ) को पातक लगाने का कथन । उसको दण्ड देने का प्रकार । लिखा - पढ़ी के साथ दिये गये ऋण का देना इत्यादि कथन । सत्यपरीक्षण आदि में सात पीपल के पत्तों पर अग्निमय लौह पिण्ड को सूत्रों से वेष्ठित करके हाथों पर धारण करने का वर्णन । २५६ पैतृक धन का विभाग माता- ता - पिता के मर जाने के बाद सम्पत्ति को समरूप से बाँटने का कथन । विद्या से उपलब्ध धन का बँटवारा न होने का कथन । औरस आदि पुत्रों के भेद का कथन । धनाधिकारियों का निरूपण - स्त्री धन आदि का कथन । स्त्री धन के अधिकारी का कथन । दुर्भिक्ष आदि संकट - काल में स्वामी द्वारा गृहीत स्त्री धन को पुनः न लौटाने का कथन । २५७ सीमा विवाद का निर्णय मिथ्या सीमा - विवाद होने पर दण्ड का निरूपण । अनाज को क्षति पहुँचानेवाले भैंस आदि पशुओं को दण्ड देने का विधान । काम करनेवालों को वेतन आदि देने का कथन । २५८ वाणी की कठोरता आदि का प्रकरण मिथ्या बोलेनेवालों को अनेक प्रकार के दण्ड का कथन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ७६३ १ ९ ७६५ १२ ७६७ ३३ ७६ ९ ६६ ७७५ २७ ७७ ९ ५० ७८४ ३६ ७८७ ५३ III ७ ९ ३ ८३
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३ अध्याय विषय २५ ९ ऋग्विधान गायत्री - जप आदि की विधि का निरूपण ' अग्निमीले पुरोहितं ' इस ऋचा का एक वर्ष पर्यन्त जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति कथन । ' सदसस्पति ' आदि मन्त्रों से अनेक प्रकार के अनुष्ठान का कथन । २६० यजुर्विधान होम आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का निरूपण । उन अनुष्ठानों का फल कथन । २६१ साम - विधान ' यत इन्द्र भयामह ' इत्यादि मन्त्र के जप से हिंसाजनित दोष के ' सर्पसाम ' मन्त्र का प्रयोग करने से सर्पभय का नाश कथन । अनुष्ठानों का कथन । उनकी फल - प्राप्ति का वर्णन । २६२ अथर्व - विधान होमादि अनुष्ठान की विधि । २६३ उत्पात- - शान्ति विनाश का फल । अनेक प्रकार के भक्तिपूर्वक श्रीसूक्त का जप करने से लक्ष्मी की प्राप्ति आदि का कथन । ' अमृता ', ‘ अभया ' आदि शान्तियाँ सभी प्रकार के उत्पातों की नाशक हैं, यह कथन । उल्कापात आदि की शान्ति का निरूपण । अकाल प्रसव एवं विकृत प्रसव की शान्ति का कथन । आकाश में तुरही आदि के शब्द की शान्ति । २६४ देवपूजा और वैश्वदेव बलि मन्त्रपूर्वक विष्णु पूजा - विधि का कथन | विष्णु के उद्देश्य से होम - विधि का निरूपण । देवताओं को बलिदान - अर्पण का कथन । पिण्ड प्रदान का विधान । २६५ दिक्पाल आदि का स्नान देवालय आदि में स्नान से पृथक् फल प्राप्ति का वर्णन । गदहपुरना आदि से उबटन लगाकर स्नान करने का विधान । मण्डल में विष्णु आदि देवता का पूजनपूर्वक होम-विधि का निरूपण । कलश में ओषधि - प्रक्षेपण का विधान । २६६ विनायक - स्नान दुःस्वप्न - दर्शन के दोष - विनाशक विधि का प्रतिपादन । स्त्रियों की सन्तानहीनता दोष के विनाशक स्नान - विधि का निरूपण । होमादि विधि - कथन । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ८०१ १०० ८० ९ ८४ ८१७ २४ 28 ८१ ९ २५ ८२१ ३२ ८२४ २ ९ ८२७ १८ ८२ ९ २० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५४ विषय पृ ० अध्याय २६७ माहेश्वर - स्नान, लक्ष कोटि होम राजा आदि के जयवर्द्धक माहेश्वर- स्नान । मन्त्रपूर्वक होम - विधि का कथन । शूलपाणि का पूजन । घृतादि के स्नानादि से आयुवर्धन रूप फल का कथन । विष्णु के चरणोदक से स्नान की उत्तमता का कथन । ‘ अक्रन्दयति ' इस सूक्त से हाथ में मणिबन्धन आदि प्रकार का वर्णन । घृत आदि से विष्णु - स्नान । धूपदीप आदि से विष्णु - पूजन का विधान । लक्ष - होम, कोटि - होम का प्रतिपादन । २६८ नीराजन - विधि जन्म - नक्षत्र में राजपूजन और अगस्त्योदय में अगस्त - पूजन । चातुर्मास्य में विष्णु पूजन । विष्णु के शयन और जागरण के अवसर पर पाँच दिन उत्सव मनाने का कथन । भाद्रपद के शुक्लपक्ष में इन्द्रध्वज स्थापनपूर्वक शची और इन्द्र का पूजन । ब्रह्मा आदि की प्रार्थना । भद्रकाली पूजन । नीराजन आदि विधियों का कथन । २६ ९ छत्रादि प्रार्थना - मन्त्र २७० विष्णुपञ्जर विष्णु के आयुध - गदा आदि का पृथक्त्वेन वर्णन । वासुदेव - प्रार्थना । २७१ वेदशाखादि - कथन ऋग्वेद आदि मन्त्रों के प्रमाण - कथन । उनके शाखा- -भेद का की प्रशंसा । २७२ पुराणदानादि माहात्म्य महादान आदि का कथन । २७३ सूर्यवंश का कीर्त्तन ब्रह्मा से मरीचि की उत्पत्ति । मरीचि से कश्यप की तथा सूर्य आदि २७४ सोमवंश का वर्णन ब्रह्मा के पुत्र अत्रि और उनसे सोम आदि की उत्पत्ति । सोम के आदि देवता के द्वारा अपने पति का त्यागपूर्वक सोम के प्रति कथन । अग्निपुराण की उत्पत्ति का कथन । रूप से मोहित लक्ष्मी अभिलाषा का वर्णन । सोम द्वारा सात लोकों के स्वामित्व की प्राप्ति । सोम द्वारा तारा का अपहरण । तन्निमित्त देव - दानवों का युद्ध । तारा से बुध की उत्पत्ति । उससे पुरूरवा आदि की उत्पत्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ८३१ २६ ८३४ ३१ ८३७ ३ ९ ८४० १५ ८४१ २२ ८४३ २ ९ ८४६ ३ ९ ८४ ९ २३
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५५ अध्याय विषय २७५ यदुवंश का वर्णन यदु से सहस्रजित् आदि की उत्पत्ति । प्रसंगतः स्यमन्तकाख्यान का कथन । पाण्डव की उत्पत्ति का कथन । २७६ द्वादश संग्राम देवकी से कृष्ण की उत्पत्ति । संक्षेप से कृष्णचरित्र का वर्णन । नारसिंह आदि बारह संग्रामों का वर्णन । २७७ राजवंश का वर्णन तुर्वसु से वर्गादि की उत्पत्ति । २७८ पुरुवंश - वर्णन पुरु से जनमेजय आदि की उत्पत्ति । शान्तनु से गंगा में भीष्म की उत्पत्ति । २७ ९ सिद्धौषध - वर्णन अधोगामी ज्वर में वमन एवं ऊर्ध्वगामी ज्वर में विरेचन करने का कथन । ज्वर आदि की निवृत्ति के लिए सिद्ध औषध । वात रोग आदि में तक्रारिष्ट की हितकारिता । २८० सर्वरोगहारक औषध शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक तथा सहज व्याधियों का पृथक् - पृथक् वर्णन । इनके परिहार के लिए रविवार आदि में घृत - गुड़ आदि के दान का कथन । शिशिर आदि का धर्म - कथन । रोगोत्पत्ति के निदान का निरूपण । वात, प्रकृति आदि का लक्षण - कथन । २८१ रसादि लक्षण कषाय कल्पना आदि का कथन । कषाय में द्रव्य - परिमाण का कथन । लेह्य, चूर्ण के गुण का वर्णन । निदाघ आदि में मालिश कराने का विधान । ' अजीर्णता में परिश्रम नहीं करना चाहिए ', यह कथन । व्यायाम आदि के द्वारा कफ - नाश आदि कथन । २८२ वृक्षायुर्वेद - कथन उत्तर आदि दिशाओं में वटादिवृक्षों का शुभत्वेन कथन । ब्राह्मण और चन्द्रमा का पूजनपूर्वक वृक्षारोपण करने का विधान । अशोक आदि वृक्षों को ग्रीष्म ऋतु में सायं-प्रातः सींचने का वर्णन । शीतकाल में एक दिन का अन्तर करके सींचने का निरूपण । वृक्षों के फल - फूल की समृद्धि के लिए बायविंडग और घृत आदि से सींचने का विधान । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ८५१ ५१ ८५६ २५ ८५८ १७ ८६० ४१ ८६३ ६३ ८६ ९ ४८ ८७४ ३३ ८७७ १४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५६ विषय पृ ० अध्याय २८३ अनेक रोग नाशक औषध सर्वातिसार आदि रोगों में सिंही, शटी इत्यादि ओषधियों से निर्मित काढ़े का विधान । वात - रोगनाशक औषध । बवासीर में तक्रादि सेवन करने का विधान । मूत्रकृच्छ्र आदि रोगनाशक कषायादि का वर्णन । २८४ मन्त्ररूप औषध - कथन ओंकारादि मन्त्र आयु और आरोग्य के वर्धक हैं - - य यह कथन । २८५ मृतकों को जिलानेवाला सिद्ध योग वातजन्य ज्वर आदि में बेल आदि पञ्चमूल का काढ़ा । गण्डमाला रोग - नाशक तेल आदि का कथन । स्त्रियों के प्रदर रोग नाशक औषध । दिन और रात्रि में अन्धत्वनिवारक गुटिका, अंजन आदि का कथन । २८६ मृत्युञ्जय कल्प रोगमर्दक त्रिफला आदि चूर्ण का कथन । कुष्ठनाशक क्वाथ आदि का कथन । बालों को काला करनेवाले तेल आदि का कथन । २८७ गज - चिकित्सा हाथी का विशेष लक्षण कथन । गज - रोग नाशक औषध । मद से क्षीण हुए हाथी का पयःपान आदि । हाथी के नेत्रों में गौरैया आदि के मल का अंजन । २८८ अश्ववाहन - सार घोड़े आदि वाहनों के सम्बन्ध में अश्विन्यादि नक्षत्रों की प्रशस्ति । घोड़े के मुँह पर प्रहार करने का निषेध । अश्व के शरीर में ब्रह्मा आदि देवताओं को जोड़ने का प्रकार । अश्व की प्रार्थना । अश्वारोहण आदि का वर्णन । मक्खी आदि के काटने से श्रम-विनाशक अङ्ग - लेप आदि का कथन । गुण - विशेष के दर्शन से अश्वों में द्विज जातीयता का कथन । २८ ९ अश्व - चिकित्सा अश्व के लक्षण । अश्व के अतिसार रोग - नाशक क्वाथ ( काढ़ा ) अनार, त्रिफला, सोंठ, पीपर, मिर्च आदि को अश्वपोषक बताना । के नाशक लेपादि का कथन । २ ९ ० अश्वशान्ति अश्व - रोगनाशक शान्ति - प्रयोग । आदि का कथन । अश्व - शोथ आदि CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ८७ ९ ५१ ८८४ १४ ८८५ ७ ९ ८ ९ २ २४ ८ ९ ५ ३३ ८ ९ ८ ६६ ९ ०४ ५६ ९ ०८ I