अग्नि पुराण — पृष्ठ 471–480

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४६७ लक्षयेन्मासि मास्येवं यद्येते स्युश्च चैत्रके । अलंकारादि संगृह्य षड्भिर्मासैश्चतुर्गुणम् ॥२ ॥

वैशाखे चाष्टमे मासि षड्गुणम् सर्वसङ्ग्रहम् । ज्येष्ठे मासि तथाऽऽषाढ़े यवगोधूमधान्यकैः ॥३ ॥

श्रावणे घृततैलाद्यैराश्विने वस्त्रधान्यकैः । कार्तिके धान्यकैः क्रीतैर्मासे स्यान्मार्गशीर्षके ॥४ ॥

पुष्ये ( पौषे ) कुङ्कुमगन्धाद्यैर्लाभो धान्यैश्च माघके । गन्धाद्यैः फाल्गुने क्रीतैरर्घकाण्डमुदाहृतम् ॥५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽर्घकाण्डप्रतिपादनं नामैकोनत्रिंशतधिकशततमोऽध्यायः ॥१२९ ॥

अथ त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः मण्डलादिकथनम् ईश्वर उवाच मण्डलानि ' प्रवक्ष्यामि चतुर्धा विजयाय हि । कृत्तिका च मघा पुष्यं पूर्वा चैव तु फल्गुनी ॥१ ॥

विशाखा भरणी चैव पूर्वभाद्रपदा तथा । आग्नेयं मण्डलं भद्रे तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥२ ॥

यद्यत्र चलते वायुर्वेष्टनं शशिसूर्ययोः । भूमिकम्पोऽथ निर्घातो ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ॥३ ॥

चाहिए । चैत्र के महीने में इन उत्पातों के होने पर चैत्र से लेकर छह मासों तक आभूषण आदि के भाव में चतुर्गुण वृद्धि होती है । वैशाख में इन उत्पातों के होने पर आठ महीनों तक सब वस्तुओं का भाव छह गुना बड़ जाता है । ज्येष्ठ तथा आषाढ़ में इन उपद्रवों के होने पर यव, गेहूँ तथा धान्य के भाव में वृद्धि होती है । श्रावण में घी, तेल का भाव और आश्विन में वस्त्र -धान्य का भाव उपरिवर्णित उपद्रवों से बढ़ जाता है । कार्तिक और अग्रहायण में इन उपद्रवों के होने पर धान्यों का भाव बढ़ता है । पौष में इन उपद्रवों के होने पर कुङ्कुम और गन्ध आदि का तथा माघ में अन्न मात्र का भाव बढ़ जाता है । फाल्गुन में इन उपद्रवों के होने पर गन्ध आदि के भाव में वृद्धि होती है । यही अर्घ ( मूल्य ) काण्ड का निरूपण है ॥१-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अर्घकाण्डप्रतिपादन नामक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२९ ॥

अध्याय १३० मण्डलादि - वर्णन महेश्वर बोले- - अब मैं विजय प्राप्त करानेवाले चार प्रकार के मण्डलों का वर्णन करूँगा । कृत्तिका, मघा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, भरणी तथा पूर्वभाद्रपदा - इतने नक्षत्रों को मिलाकर आग्नेय - मण्डल बनता है । अयि भद्रे! मैं उस मण्डल का लक्षण बता रहा हूँ ॥ १-२ ॥ इस मण्डल में प्रचण्ड वायु चलने पर, सूर्य - चन्द्र के ऊपर मण्डल १ च. नक्षत्राणि । २ भूमिकम्पोऽथ चन्द्रसूर्ययोः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 472

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४६८ अग्निपुराणम् धूमज्वाला दिशां दाहः केतोश्चैव प्रदर्शनम् । नेत्रोरोगोऽतिसारश्च अग्निश्च प्रबलो भवेत् । विनाशश्चैव शस्यानां स्वल्पवृष्टि विनिर्दिशेत् । सैन्धवा यामुनाश्चैव गुर्जरा भोजबालिकाः । देशाश्चैते विनश्यन्ति तस्मन्नुत्पातदर्शने । उत्तराफल्गुनी चैव अश्विनी च तथैव च ग्नष्टभूताः प्रजाः सर्वा हाहाभूता विचेतसः रक्तवृष्टिश्चोपतापः पाषाणपतनं तथा ॥४ ॥

स्वल्पक्षीरास्तथा गावः स्वल्पपुष्यफला द्रुमाः ॥५ ॥

' चतुर्विधाः प्रपीड्यन्ते क्षुधार्ता अखिला नराः ॥ ६ ॥

जालंधरं च काश्मीरं सप्मं चोत्तरापथम् ॥७ ॥

हस्तचित्रामघास्वाती मृगो वाऽथ पुनर्वसुः ॥ ८ ॥

। यदाऽत्र भवते किंचिद्वायव्यं तं वि ( तद्वि ) निर्दिशेत् ॥९ ॥

। ( ' डाहलः कामरूपंच ( पश्च ) कलिङ्गः कोशलस्तथा ॥१० ॥

अयोध्या च अवन्ती च नश्यन्ते ( न्ति ) कोङ्कणान्ध्रकाः । अश्लेषा चैव मूलं तु पूर्वाषाढा तथैव च ॥११ ॥

रेवती वारुणं ह्यक्षं तथा भाद्रपदोत्तरा । यदाऽत्र चलते किंचिद्वारुणं ' तं वि ( तद्वि ) निर्दिशेत् ॥१२ ॥

बहुक्षीरघृता गावो बहुपुष्पफला द्रुमाः । आरोग्यं तत्र जायेत बहुशस्या च मेदिनी ॥ १३ ॥

धान्यानि च समर्घाणि सुभिक्षं पार्थिवं भवेत् । परस्परं नरेन्द्राणां सङ्ग्रामो दारुणो भवेत् ॥१४ ॥

ज्येष्ठा च रोहिणी चैव अनुराधा च वैष्णवम् । धनिष्ठा चोत्तराषाढ़ा अभिजित् सप्तमं तथा ॥ १५ ॥

बन जाने पर, भूकम्प आने पर, तूफान आने पर, चन्द्र - सूर्य ग्रहण होने पर, तारा टूटने पर व दिग्दाह होने पर, तु ग्रह दिखायी पड़ने पर यह समझना चाहिए कि रक्त की वृष्टि होगी, सूखा पड़ेगा, पत्थर गिरेगा, नेत्र - रोग तथा आँव की बीमारी बढ़ेगी, अग्नि का उत्पात होगा, गायें थोड़ा दूध देंगी, वृक्षों में थोड़े फल लगेंगे । अनाज का विनाश होगा, वृष्टि कम होगी और चारों वर्णों के लोग भुखमरी से पीड़ित होंगे ॥ ३-६ ॥ उस प्रकार के उत्पात दिखायी देने पर सिन्ध, यामुन, गुर्जर ( गुजरात ), भोज, बाह्लिक ( आधुनिक बल्ख ), जलंधर, काश्मीर और उत्तरापथ - इन देशों को क्षति पहुँचेगी ॥७-७३ । हस्त, चित्रा, मघा, स्वाती, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरफाल्गुनी और अश्विनी नक्षत्र को मिलाकर वायव्य मण्डल बनता है । इस मण्डल में भी यदि उपर्युक्त घटनाएँ घटित होती हैं तो प्रजाओं में हाहाकार मच जाता है और डाहल, कामरूप, कलिङ्ग, कोशल, अयोध्या, अवन्ती, कोङ्कण तथा आन्ध्र देशों और नगरों को भारी क्षति पहुँचती है ॥८- १०३ ॥ अश्लेषा, मूल, पूर्वाषाढ़, रेवती, शतभिषा और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रों को मिलाकर वारुण - मण्डल बनता है । इस मण्डल में उपर्युक्त घटनाएँ घटित होने पर गौएँ बहुत अधिक दूध देती हैं, वृक्ष खूब फलते - फूलते हैं, मनुष्य नीरोग रहते हैं, पृथ्वी धन - धान्य से सम्पन्न होती है, देश में सुभिक्ष रहता है किन्तु राजाओं में परस्पर महासङ्ग्राम होता है ॥११-१४ ॥ ज्येष्ठा, रोहिणी, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ तथा अभिजित् नक्षत्र मिलाकर माहेन्द्र - मण्डल बनता है । इस मण्डल में उपर्युक्त घटनाएँ घटित होने पर १ ख. ग. घ. छ. चातुर्वर्णाः । २ क. ङ. यद्यत्र । ३ ख. ग. घ. छ. नष्टधर्माः । ४ डाहल: " कोङ्कणान्धकाः नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ५ ख. इहालं । ग. डाहालं । ६ च. कोकणं तथा । ७ क. ङ. ' णं स्कन्द त ' । ८ क. ङ. ' चिच्चारू ( रु ) शत ( तं ) वि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 473

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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४६ ९ यदात्र चलते किंचिन्माहेन्द्रं तं वि ( तद्वि ) निर्दिशेत् । प्रजाः समुदितास्तस्मिन्सर्वरोगविवर्जिताः ॥ १६ ॥

सन्धिं कुर्वन्ति राजानः सुभिक्षं पार्थिवं शुभम् । ग्रासस्तु विविधो ' ज्ञेयो मुखपुच्छकरो महान् ॥१७ ॥

चन्द्रो राहुस्तथाऽऽदित्य एकाराशौ यदि स्थितः । मुखग्रासस्तु विज्ञेयो जामित्रे पुच्छ उच्यते ॥१८ ॥

भानोः पञ्चदशे ह्यक्षे यदा चरति चन्द्रमाः । तिथिच्छेदे तु सम्प्राप्ते सोमग्रासं ' विनिर्दिशेत् ॥१९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये मण्डलादिकथनं नाम त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥

अथैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः घातचक्रादि ईश्वर उवाच प्रदक्षिणमकारादीन्स्वरान्पूर्वादितो लिखेत् । चैत्राद्यं भ्रमणाच्चक्रं प्रतिपत्पूर्णिमातिथिः ॥१ ॥

त्रयोदशी चतुर्दशी अष्टम्येका च सप्तमी । प्रतिपत्त्रयोदश्यन्तास्तिथयो द्वादश स्मृताः ॥२ ॥

चैत्रचक्रे तु संस्पर्शाज्जयलाभादिकं विदुः । विषमे तु शुभं ज्ञेयं समे चाशुभमीरितम् ॥३ ॥

सम्पूर्ण प्रजाएँ रोगों से मुक्त होती हैं, राजा लोग आपस में सन्धि करते हैं और देश में सुभिक्ष होता है ॥१५-१६३ ॥ ग्रास ( ग्रहण ) विविध प्रकार के होते हैं जिनमें मुखग्रास और पुच्छग्रास महान् होते हैं । जब चन्द्रमा, राहु तथा सूर्य एक राशि पर स्थित होते हैं तब मुखग्रास होता है किन्तु जब वे राहु से सातवें होते हैं तब पुच्छग्रास होता है । जब चन्द्रमा सूर्य आक्रान्त नक्षत्र से पन्द्रहवें नक्षत्र पर सञ्चरण करता है और तिथि पूर्णिमा प्राप्त रहती है, तब सोमग्रास ( चन्द्रग्रहण ) होता है ॥ १७-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मण्डलादि - कथन नामक एक सौ तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३० ॥

अध्याय १३१ घातचक्र - वर्णन महेश्वर बोले - इस ( घात ) चक्र के ऊपर चारों ओर पूर्व आदि दिशा से प्रारम्भ करके अकार इत्यादि स्वरों को लिखना चाहिए । इसमें चैत्र प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी तिथियों तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी, अष्टमी का चक्र में उल्लेख करना चाहिए । कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ करके त्रयोदशी तक अष्टमीरहित तिथियाँ लिखनी चाहिए ॥१-२ ॥ चैत्रचक्र का स्पर्श करके ( रण में ) जय, लाभ इत्यादि जाना जा सकता है । युद्धकाल में जिसका नाम पुकारा जाता है, उसमें यदि विषम दिशा होती है तो शुभ और यदि सम दिशा होती है तो अशुभ माना जाता है ॥३ ॥ जिस व्यक्ति का नाम दीर्घ अक्षर से प्रारम्भ होता है, वह विजय को प्राप्त करता है किन्तु जिसके नाम के

१ घ. छ. द्विविधो । २ घ. छ. ग्रामस्तु । ३ क. ङ. ' थिभेदे । ४ घ. छ. ' ग्रामं वि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 474

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अग्निपुराणम् ४७० युद्धकाले ' समुत्पन्ने यस्य नाम ह्युदाहृतम् । जयस्तस्य ' सदाकालं सङ्ग्रामे चैव भीषणे । प्रथमो दीर्घ आदिस्थो द्वितीयो मध्ये अन्तकः । पुनश्चान्ते यदा चाऽऽदौ स्वरारूढं तु दृश्यते । नरचक्रं प्रवक्ष्यामि ह्यक्षपिण्डात्मकं यथा । शीर्षे त्रीणि मुखे चैकं द्वे ऋक्षे नेत्रयोर्न्यसेत् । हृदये भूतसंख्यानि षड्ऋक्षाणि तु पादयोः । नेत्रे शिरोदक्षकर्णे याम्यहस्ते च पादयोः यस्मिन्नृक्षे स्थितः सूर्यः सौरिभौमस्तु सैंहिकः जयचक्रं " प्रवक्ष्यामि आदिहान्तांश्च वै लिखेत् दिग्ग्रहा मुनयः सूर्या ऋत्विग्रुद्रस्तिथिः १२ क्रमात् आदित्याद्याःसप्तकृते ४ नामान्ते बलिनो ग्रहाः रेखा द्वादश चोद्धृत्य षट् च याम्यास्तथोत्तराः मात्रारूढं तु यन्नाम आदित्यो गुरुरेव च ॥४ ॥

ह्रस्वनाम ' ( मा ) यदा योधो म्रियते ह्यनिवारितः ॥५ ॥

(? ) द्वौ मध्ये न प्रथमान्तौ जायेते (? ) नात्र संशयः ॥६ ॥

ह्रस्वस्य मरणं विद्याद्दीर्घस्यैव जयो भवेत् ॥७ ॥

प्रतिमामालिखेत्पूर्वं पश्चादृक्षाणि विन्यसेत् ॥ ॥८ ८ ॥ ॥ वेदसंख्यानि हस्ताभ्यां कर्णऋक्षद्वयं पुनः ॥ ९ ॥

नामऋक्षं ' स्फुटं कृत्वा चक्रमध्ये तु विन्यसेत् ॥ १० ॥

। हृद्ग्रीवावामहस्ते तु पुनर्गुह्ये तु पादयोः ॥ ११ ॥

। तस्मिन्स्थाने स्थिते विद्याद्घातमेव न संशयः ॥ १२ ॥

। रेखास्त्रयोदशाऽऽलिख्य " षखास्तिर्यगालिखेत् ॥ १३ ॥

। मूर्छनास्मृतिवेदर्क्षजिना अकऽमा १३ ह्यधः ॥१४ ॥

। आदित्यसौरिभौमाख्या जये सौम्याश्च संधये ॥ १५ ॥

। मनुश्चैव " तु ऋक्षाणि नेत्रे च रविमण्डलम् ॥१६ ॥

पूर्व में ह्रस्व अक्षर होता है, उसकी पराजय होती है । जिस नाम के आदि में दीर्घ स्वर होता है वह उत्तम, जिसके बीच में मध्यम स्वर रहता है वह मध्यम और जिसके अन्त में दीर्घ रहता है वह भाग्य की दृष्टि से अधम माना जाता है । जिस योद्धा का नाम दीर्घ स्वर से प्रारम्भ होकर दीर्घ स्वर से ही समाप्त होता है, वह विजय को तथा जिसके नाम के आदि और अन्त में ह्रस्व स्वर होते हैं वह निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त करता है ॥४-७ ॥ अब मैं नरचक्र के विषय में बतलाऊँगा । यह नक्षत्रों से युक्त होता है । पहले मनुष्य की प्रतिमा का चित्रण करके तदनन्तर उसमें नक्षत्रों का न्यास करना चाहिए || ८ || नरचक्र के शीर्ष में तीन, मुख में एक, नेत्रों में दो, हाथों में चार, कानों में दो, हृदय में पाँच और पैरों में छह नक्षत्रों का न्यास करना चाहिए । नक्षत्रों की स्फुट गणना करके उन्हें नरचक्र के ऊपर इस प्रकार से रखना चाहिए जिससे वह नेत्रों, सिर, दाहिने कान, दाहिने हाथ, चरण, ग्रीवा, बाँहें, हाथ, भुजाओं और पैरों को आच्छादित कर ले । घात उन स्थानों पर होता है, जहाँ पर सूर्य, शनि, मङ्गल अथवा राहु नक्षत्र चित्रित रहते हैं ॥९ -१२ । अब मैं जयचक्र के सम्बन्ध में बतलाऊँगा, जो किसी कार्य की सफलता को सूचित करनेवाला हुआ करता है । पहले धरातल पर तेरह रेखाओं को खींचकर उनको काटती हुई छह तिरछी रेखाओं को खींचना चाहिए ॥१३ ॥ इस प्रकार की बनी रेखाओं के कोष्ठकों में दस, नव, सात, बारह, चार, ग्यारह, पन्द्रह, चौबीस,

अठारह, चार, सत्ताईस, नव, चौबीस इन अङ्कों को लिखे । इसके बाद अ, क, ट, प आदि अक्षरों को लिखे । शत्रु के नामाक्षर व्यंजन और अङ्क को जोड़कर सात से भाग देने पर सूर्य आदि सात वार बन जाते हैं । यदि सूर्य, शनि, मङ्गल ग्रह १ क. ङ. गन्धर्वाणि । २ क. ङ. ' स्य तदा । ३ क. ङ. भाषणे । ४ क. ङ. क्रुध्यमानो । ५ क. ङ. ह्यविचारतः । ६ क. ख. ग. ङ. च. मध्य अ ° । ७ क. ग. ङ. जायते । ख. जयते । ८ घ. छ. ' म ह्यक्षं । ९ क. ङ. हृतं । १० क. ङ. उपचक्रं । ११ छ. षड्लेखा । १२ क. ङ. ' स्तिथिक्र ' । १३ क. ङ. “ कहमाज्यवः । आ ° । १४ घ. छ. " प्तहृते । १५ क. ङ. मन्त्रश्च वसतुर्ग्राणि । ख. ग. मरुतश्चैव ॠ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 475

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४७१ तिथयश्च रस वेदा अग्निः सप्तदशाथ वा । वसुरन्ध्राः समाख्याता अकटपानधो ' न्यसेत् ॥१७ ॥

एकैकमक्षरं न्यस्त्वा ( स्य ) शेषाण्येवं क्रमान्न्यसेत् । नामाक्षरकृतं पिण्डं वसुभिर्भाजयेत्ततः ॥१८ ॥

वायसान्मण्डलेऽत्युग्रो मण्डलाद्रासभो वरः । रासभीद्वृषभः श्रेष्ठो वृषभात्कुञ्जरो वरः ॥१९ ॥

कुञ्जराच्च पुनः सिंहा ` सिंहाच्चैव खरुर्वरः । खरोश्चैव बली धूम्र एवमादि बलाबलम् ॥२० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये घातचक्रादि वर्णनं नामैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१३१ ॥

अथ द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः सेवाचक्रादि ईश्वर उवाच सेवाचक्रं प्रवक्ष्यामि लाभालाभार्थसूचकम् । पिता माता तथा भ्राता दम्पती च विशेषतः ' ॥१ ॥

तस्मिंश्चक्रे तु विज्ञेयं यो यस्माल्लभते फलम् । षडूर्ध्वाः स्थापयेद्रेखा भिन्नाश्चाष्टौ तु तिर्यगाः ( ग्गाः ) ॥२ ॥

कोष्ठकाः पञ्चत्रिंशच्च तेषु वर्णान्समालिखेत् । स्वरान्पञ्च समुद्धृत्य स्पर्शान्पश्चात्समालिखेत् ॥३ ॥

ककारादिहकारान्तान्हीनाङ्गांस्त्रीन्विवर्जयेत् ' । सिद्धः साध्यः सुसिद्धश्च अरिर्मृत्युश्च नामतः ॥४ ॥

में पड़े तो विजय, बुध, गुरु, शुक्र और सोम में पड़े तो सन्धि होगी । पूर्व से पश्चिम तक बारह रेखाएँ खींचकर छह रेखाएँ दक्षिणोत्तर लिखें, उसमें प्रथम ऊपरवाले कोष्ठ में १४, २७, २, १२, १५, ६, ४, ३, १७, ८ और ८ अङ्कों को लिखें । अ से ह तक के अक्षरों को नीचे के कोष्ठ में लिखे, नाम से बने हुए अक्षरों के द्वारा बने हुए पिण्ड में आठ से भाग देकर एक आदि शेष के अनुसार वायस, रासभ, वृषभ, कुञ्जर, सिंह, रवर, धूम्र आठ मण्डल होते हैं, इसमें वायस - मण्डल से प्रबल रासभ होता है । इसमें उत्तरोत्तर मण्डल बलवान् होते हैं ॥१४-२० ॥ श्री अग्निमहापुराण में घातचक्रादि - वर्णन नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३१ ॥

अध्याय १३२ सेवाचक्रादि- वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं लाभालाभ सूचक सेवा - चक्र के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । इस चक्र के द्वारा पिता, माता, भाई और दम्पती को एक - दूसरे से प्राप्त होनेवाली सेवा का ज्ञान हो सकता है । पहले छह ऊर्ध्व रेखाओं को खींचकर उसके बाद उन्हें काटनेवाली आठ तिर्यक् रेखाओं को खींचना चाहिए ॥१-२ ॥ इस प्रकार पैंतीस कोष्ठक बन जाते हैं । इन कोष्ठकों में पाँच स्वरों, स्पर्शवर्णों को लिख देना चाहिए । यह स्पर्शवर्ण क से लेकर ह तक होते हैं । किन्तु इनमें तीन अङ्कों को वर्जित कर देना चाहिए । इन अक्षरों को सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध, शत्रु और मृत्युवर्णों में निबद्ध १ क. ङ. “ करयान ' । २ क. ख. ग. ङ. ' वतरु ' । च. ' व रुरु ' । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' रः । तरो । ४ क. ङ. ' तः । यस्मिं । ५ क. ङ. तेष्वव । ६ क. ख. ग. ङ. च. ' स्त्रीणि व ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 476

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४७२ अग्निपुराणम् अरिर्मृत्युश्च द्वावेतौ वर्जयेत्सर्वकर्मसु आत्मपक्षे स्थिताः सत्त्वाः सर्वे ते शुभदायकाः आत्मनाशश्चतुर्थस्तु पञ्चमो मृत्युदायकः सिद्धः साध्यः सुसिद्धश्च सर्वे ते फलदायकाः । अकारान्तं यथा प्रोक्तम् इ उ ए विदुस्तथा । देवाः अकारवर्गे तु दैत्याः कवर्गमाश्रिताः । तवर्ग ऋषयः प्रोक्ता पवर्गे राक्षसाः स्मृताः । देवेभ्यो बलिनो दैत्या दैत्येभ्यः पन्नगास्तथा ऋषिभ्यो राक्षसाः शूरा राक्षसेभ्यः पिशाचकाः । पुनर्मैत्रविभागं तु ताराचक्रं क्रमाच्छृणु ऋक्षे तु संस्थितास्तारा नवत्रिका यथाक्रमात् प्रत्यरा धनदा ' षष्ठी नैधनामैत्रके परे । ( एषां मध्ये यदा नाम लक्षयेत्तु प्रयत्नतः ॥ ५ ॥

। द्वितीयः पोषकश्चैव तृतीयश्चार्थदायकः ॥ ६ ॥

। स्थानमेवार्थलाभाय मित्रभृत्यादिबान्धवाः ॥७ ॥

अरिर्मृत्युश्च द्वावेतौ द्वावेतौ वर्जयेत्सर्वकर्मसु ) ॥८ ॥ ८ ॥ ॥

पुनश्चैवांशकान्वक्ष्ये ' वर्गाष्टकसुसंस्कृतान् ॥९ ॥

नागाश्चैव चवर्गा: ( र्गे ) स्युर्गन्धर्वाश्च टवर्गजाः ॥१० ॥

पिशाचाश्च यवर्गे च शवर्गे मानुषाः स्मृताः ॥ ११ ॥

। पन्नगेभ्यश्च गन्धर्वा गन्धर्वादृषयो वराः ॥ १२ ॥

पिशाचेभ्यो मानुषाः स्युर्दुर्बलं वर्जयेद्बली ॥१३ ॥

। नामाद्यक्षरमृक्षं तु स्फुटं कृत्वा तु पूर्वतः ॥१४ ॥

। जन्मसम्पद्विपत्क्षेमं नामात्तारका इमाः ॥ १५ ॥

। परमै ( त्रि ) त्राऽन्तिमा तारा जन्मतारा ' तु शोभना ॥१६ ॥

कर लेना चाहिए । अरि और मृत्यु इन दोनों वर्णों को सभी कर्मों में वर्जित कर देना चाहिए ॥ ३-४ ॥ इनके बीच में यत्नपूर्वक नाम का लक्षण करना चाहिए । अपने पक्ष में रहनेवाले सभी सत्त्व शुभ फल प्रदान करनेवाले होते हैं । उससे दूसरे और तीसरे सत्त्व पोषक और अर्थदायक होते हैं ॥५-६ ॥ चौथा सत्त्व आत्म - नाशक और पाँचवाँ मृत्युदायक होता है । मित्र, भृत्य और बान्धव अक्षरों से युक्त कोष्ठक धन प्रदान करनेवाले होते हैं ॥७ ॥ सिद्ध, साध्य

और सुसिद्ध कोष्ठकों में रहनेवाले अक्षर फलदायक होते हैं । सभी कर्मों में अरि और मृत्यु कोष्ठकों को वर्जित करना चाहिए ॥८ ॥ इस सन्दर्भ में अकारान्त अक्षरों के अर्न्तगत इ, उ और ए को भी समझना चाहिए । अब मैं उन विभिन्न

अंशों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा जिनके लिए अक्षरों के विभिन्न वर्गों का प्रयोग होता है ॥९ ॥ अकार वर्ण से देवता,

कवर्ग से दैत्य, चवर्ग से नाग, टवर्ग से गन्धर्व, तवर्ग से ऋषि, पवर्ग से राक्षस, यवर्ग से पिशाच और शवर्ग मनुष्य समझे जाते हैं ॥१०-११ ॥ देवताओं से बलवान् दैत्य हैं, दैत्यों से बलवान् सर्प, सर्पों से गन्धर्व और गन्धर्वों से से श्रेष्ठ ऋषि होते हैं । इसी प्रकार ऋषियों से राक्षस, राक्षसों से पिशाच और पिशाचों बलवान् के द्वारा दुर्बल को वर्जित होना चाहिए ॥१२-१३ से बलवान् मनुष्य होते हैं ॥। अब मुझसे क्रमशः मित्र - विभाग और ताराचक्र के विषय में सुनिये । नक्षत्र के नाम के आदि अक्षर को पूर्ववत् स्पष्ट करके इन नक्षत्रों को तारा कहते हैं जो नौ, नौ, नौ करके तीन बार त्रिकों में रहा करते हैं । इन त्रिकों के नाम हैं - जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यर, धनद, नैधन, परमित्र । मनुष्यों को सभी कार्यों में जन्म तारा शुभ, सम्पत् तारा महाश्रेष्ठ और मित्र और १ एषां वर्जयेत्सर्वकर्मसु विपत् तारा निष्फल माना गया है । पु ' । ५ क. ख. ग. घ. छ. ‘ नर्मित्र ' नास्ति । ६ क ख.. ङ पुस्तके . ' । २ क. ङ. ए. ओ ० वि । ३ ख. ग. ए ऐ वि ' वि ' । ४ ख. ग. ' दुत्तमाः । तः । स्वर्गेषु सं ' । ७ क. ङ. बलदा । ८ घ. छ. रा त्वशो ” । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 477

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४७३ सम्पत्तारा महाश्रेष्ठा विपत्तारा तु निष्फला । क्षेमतारा सर्वकार्ये प्रत्यरा अर्थनाशिनी ॥१७ ॥

धनदा राज्यलाभादि ( य ) नैधना ' कार्यनाशिनी 1 । मैत्रतारा च मित्राय परमित्रा हितावहा ॥१८ ॥

ताराचक्रम् ` मात्रा ' वै ' स्वरसंज्ञा स्यान्नाममध्ये क्षिपेत्प्रिये । उभयोर्नाममध्ये तु लक्षयेच्च धनं ह्यणम् । धनेन मित्रता नृणामृणेनैव ह्युदास ( सि ) ता । मेषमिथुनयोः प्रीतिमैत्री मिथुनसिंहयोः । ' मित्रसेवां न कुर्वीत मित्रौ ( त्रे ) मीनवृषौ मतौ कन्यावृश्चिकयोरेवं तथा मकरकीटयोः । तुलामेषौ महामैत्री विद्विष्टो वृषवृश्चिकौ । मृगकुम्भकयोः प्रीतिः ) कन्यामीनौ तंथैव च विंशत्या च हरेद्भागं हीनमात्रा ह्यणं ज्ञेयं सेवाचक्रमिदं प्रोक्तं तुलासिंहाँ महामैत्री । वृषकर्कटयोर्मैत्री मीनमकरयोर्मैत्री मिथुनधनुषोः प्रीतिः यच्छेषं तत्फलं भवेत् ॥१९ ॥

धनं मात्रादिकं पुनः ॥२० ॥

लाभालाभादिदर्शकम् ॥२१ ॥

एवं धनुर्घटे पुनः ॥ २२ ॥

कुलीरघटयोस्तथा ॥२३ ॥

तृतीयैकादशे स्थिता ॥२४ ॥

( कर्कटमकरयोस्तथा ॥ ॥२५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सेवाचक्रादिवर्णनं नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥

क्षेम तारा सभी कार्यों में शुभ और प्रत्यर अर्थनाशक कहा गया है ॥१४-१७ ॥ इसी प्रकार धनद तारा राज्य लाभ करानेवाला, नैधन तारा कार्यनाशक, मैत्र तारा मित्रों के लिए शुभ और परमित्र तारा हितकारी कहा गया है || १८ || अयि प्रिये! किसी प्रकार से सम्बद्ध दो व्यक्तियों के नामों में रहनेवाले स्वरों की संख्या के बराबर मात्राओं की संख्या की गणना करके उसे बीस की संख्या से भाग देना चाहिए । इस प्रकार से प्राप्त होनेवाले भजनफल से ऋण अथवा धन की गणना करनी चाहिए । कम मात्राओं से ऋण और अधिक मात्राओं से धन समझना चाहिए ॥१९ -२० ॥ धन से मनुष्यों में मित्रता और ऋण से उदासीनता होती है । इसी को लाभालाभ सूचक सेवाचक्र कहा गया है । मेष, मिथुन राशिवाले पुरुषों में प्रीति होती है, मिथुन और सिंह राशिवालों में मैत्री तथा तुला और सिंह राशिवालों में धन तथा कुम्भ राशिवाले पुरुषों में महामैत्री होती है ॥२१-२२ ॥ ( इन सब बातों के ज्ञान के बिना ) मित्रता नहीं करनी चाहिए । मीन और वृष राशिवालों में भी मित्रता मानी गयी है । इसी प्रकार वृष और कर्क राशिवालों, कन्या और वृश्चिक राशिवालों, मकर और कर्क राशिवालों तथा मीन और मकर राशिवाले पुरुषों में मैत्री रहती है । तुला और मेष राशिवालों में महामैत्री होती है, किन्तु वृष और वृश्चिक राशिवालों में द्वेष रहा करता है । इसी प्रकार मिथुन और धनु राशिवालों, कर्क और मकर राशिवालों, मृग और कुम्भ राशिवालों तथा कन्या और मीन राशिवालों में प्रीति रहा करती है ॥२३-२५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सेवाचक्रादि - वर्णन नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३२ ॥

१ ख. ग. निधना । २ एतदध्यायसमाप्तिपर्यन्तं नास्ति च. पुस्तके । ३ क. ङ. ' त्रा चेश्वर ' । ४ ख. ग. वै सुर । ५ क. ङ. लभेत् । ६ क. ङ. मित्राशिवां । ७ कर्कटमकरयोः प्रीतिः नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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४७४ अग्निपुराणम् अथ त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः नाना बलानि ईश्वर उवाच गर्भजातस्य वक्ष्यामि क्षेत्राधिपस्वरूपकम् । नातिदीर्घः कृशः स्थूलः समाङ्गी गौरपैत्तिकः || १ || रक्ताक्षो गुणवाञ्शूरो गृहे सूर्यस्य जायते । सौभाग्यो ( सुभगो ) मृदुसारश्च जातश्चन्द्रगृहोदये ॥२ ॥

' वाताधिकोऽतिलुब्धादिर्जातो भूमिभुवो गृहे । बुद्धिमान्सुभगो मानी जातः सौम्यगृहोदये || ३ || बृहत्क्रोधश्च सुभगो जातो गुरुगृहे नरः । त्यागी भोगी च सुभगो जातो भृगुगृहोदये || ४ || बुद्धिमान्सुभगो मानी जातश्चाऽऽर्किगृहे नरः । सौम्यलग्ने तु सौम्यः स्यात्क्रूरः स्यात्क्रूरलग्नके || ५ || दशाफलं गौरि वक्ष्ये नामराशौ तु संस्थितम् । गजाश्वधनधान्यानि राज्य श्रीर्विपुला भवेत् || ६ || पुनर्धनागमश्चापि दशायां भास्करस्य तु । द्रव्यस्त्रीदा चन्द्रदशा भूमिलाभः सुखं कुजे || ७ || अध्याय १३३ नाना - बल - वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं गर्भ से सद्यः प्रसूत शिशु के क्षेत्राधिप - ग्रहों के स्वामियों के ( कुण्डली में स्थित राशि के अनुकूल ग्रहों के स्वामी ) के स्वरूप को बतलाऊँगा । जिसके घर में ( अर्थात् कुण्डली स्थित लग्न में ) सूर्य का क्षेत्र सिंह लग्न हो तो वह बालक न तो बहुत लम्बा, न बहुत पतला और न बहुत मोटा होता है बल्कि उसके सब अङ्ग समान ( सुडौल ) होते हैं । उसका वर्ण कुछ - कुछ पीतिमा लिये हुए गौर होता है । उसकी आँखें लाल होती हैं । वह गुणी तथा शूरवीर हुआ करता है । जिसकी कुण्डली में ग्रहपति चन्द्रमा होता है वह सौभाग्यशाली तथा कोमल ( हृदय ) हुआ करता है ॥१-२ ॥ जिसकी ( कुण्डली ) में गृह स्वामी मङ्गल होता है, वह अत्यन्त लोभी तथा अधिक वायु ( प्रकृति ) वाला होता है । जिस व्यक्ति की कुण्डली का गृहपति बुध होता है, वह बुद्धिमान्, सुन्दर तथा मानी हुआ करता है । जिसका गृहपति बृहस्पति होता है वह महाक्रोधी और सुन्दर होता है, जिसके गृहपति शुक्र होते हैं, वह त्यागी, भोगी व भाग्यवान् होता है । जिसके घर का स्वामी शनि होता है, वह बुद्धिमान्, सुन्दर तथा मानी हुआ करता है । जिस मनुष्य के लग्न में ( सोम, बुध, बृहस्पति और शुक्र ) ये सौम्यग्रह पड़ते हैं वह सौम्य स्वभाव का होता है और जिसके लग्न में ( मङ्गल, शनि, राहु और केतु आदि ) क्रूरग्रह पड़ते हैं, वह क्रूर स्वभाववाला हुआ करता है ॥३-५ ॥ अयि गौरि! अब मैं मनुष्यों की नाम राशियों के अनुसार ग्रह दशाओं का फल बतलाऊँगा । सूर्य ग्रह की दशा आने पर मनुष्य को हाथी, घोड़े, धन-धान्य, विपुल राज्यश्री तथा बार - बार धन की प्राप्ति होती रहती है ॥६ ॥ चन्द्रमा की दशा में ( नाना प्रकार के ) द्रव्य तथा

स्त्री की प्राप्ति होती है । मङ्गल की दशा सुख और भूमिलाभ करानेवाली हुआ करती है ॥७ ॥ बुध की दशा में धन-१ एतदाद्यध्यायसमाप्तिपर्यन्तं नास्ति च. पुस्तके । २ घ. छ. तु । दिव्य ' ।

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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४७५ भूमिर्धान्यं धनं बौधे गजास्वादिधनं गुरौ ' । खाद्यपानधनं शुक्रे शनौ व्याध्यादि संयुतः ॥८ ॥

स्थानसेवा दिवाध्यानं वाणिज्यं राहुदर्शने । वामनाडीप्रवाहे स्यान्नाम चेद्विषमाक्षरम् ॥९ ॥

तदा जयति संग्रामे शनिभौमस ( सु? ) सैंहिकाः । दक्षनाडीप्रवाहेऽर्के वाणिज्ये ( ज्यं ) चैव निष्फलम् ॥१० ॥

संग्रामे जयमाप्नोति समनामा नरो ध्रुवम् । अधश्चारे जयं विद्यादूर्ध्वचारे रणे मृतिम् ॥११ ॥

ॐ हूम् ', ॐ ह्रम्, ॐ स्फेम्, अस्त्रं मोटय ॐ चूर्णय चूर्णय, ॐ सर्वशत्रुं मर्दय मर्दय, ' ॐ हरूम्, ॐ हर फट् सप्तवारं न्यसेन्मन्त्रं ध्यात्वाऽऽत्मानं तु भैरवम् । शूलखट्वाङ्गहस्तं तु खड्गकट्टारिकोद्यतम् । सम्मुखं शत्रुसैन्यस्य शतमष्टोत्तरं जपेत् । परसैन्यं ( न्ये ) शृणु भङ्गं प्रयोगेण पुनर्वदे ।

कर्पटे प्रतिमां लिख्य " साध्यस्यैवाक्षरं यथा ।

मूर्ध्नि वक्त्रे ललाटे च हृदये गुह्यपादयोः ॥।१२ ॥

चतुर्भुजं दशभुजं विंशद्बाह्वात्मकं ' शुभम् ॥१३ ॥

भक्षणं ( कं ) परसैन्यानामात्मसैन्यपराङ्मुखम् ॥१४ ॥

“ जपाड्डमरुकाच्छब्दाच्छस्त्रं त्यक्त्वा पलायते ॥१५ ॥

श्मशानाङ्गारमादाय विष्ठां चोलूककाकयोः ॥१६ ॥

नामाथ नवधाऽऽलिख्य रिपोश्चैव यथाक्रमम् ॥१७ ॥

पृष्ठे तु बाहुमध्ये तु नाम वै नवधा लिखेत् ॥१८ ॥

धान्य और बृहस्पति की दशा में हाथी, घोड़े आदि धन की प्राप्ति होती है । शुक्र की दशा में खाने - पीने की वस्तुओं और धन का लाभ होता है । शनि की दशा रोग आदि के साथ आती है || ८ || राहु की दशा आने पर स्थान - सेवा ( नौकरी आदि ), दिवा - ध्यान ( धर्म - कर्म ) तथा वाणिज्य का लाभ होता है । जिस व्यक्ति के नाम में अक्षरों की संख्या विषम होती है और वाम नाड़ी ( स्वर ) में यात्रा हो वह संग्राम में विजयी होता है और वह समय शनि, मङ्गल तथा राहु ग्रह का है ॥९ - ९ ३ ॥ जिस व्यक्ति की दाहिनी नाड़ी दाहिना स्वर चले वह समय सूर्य का है, इस समय व्यापारादि निष्फल होता है । किन्तु जिस व्यक्ति के नाम में यदि अक्षरों की संख्या सम होती है तो वह व्यक्ति संग्राम में निश्चय ही विजयी हुआ करता है । पैदल यात्री की मृत्यु एवं सवारीवाले रणयात्री की मृत्यु होती है ॥ १०-११ ॥ ' ॐ हूम्, ॐ ह्रम्, ॐ स्फेम्, अस्त्रं मोटय, ॐ चूर्णय चूर्णय, ॐ सर्वशत्रुं मर्दय मर्दय, ॐ ह्रम्, ॐ ह्रः फट् ' इस मन्त्र का पाठ करके सात बार हृदय का स्पर्श करना चाहिए । तदनन्तर भैरव रूप में अपनी कल्पना करते हुए यह सोचना चाहिए कि ‘ मेरे चार भुजाएँ, दस भुजाएँ या बीस भुजाएँ हैं, मेरे हाथों में त्रिशूल, खट्वाङ्ग ( अस्थि - पञ्जर ), तलवार तथा कटार विद्यमान है । मैं शत्रु की सेना का भक्षण करनेवाला तथा अपनी सेना की रक्षा करनेवाला हूँ । ' तदनन्तर त्रु - सेना के सामने इस मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करके डमरू बजाना चाहिए, ऐसा करने से शत्रु शस्त्र छोड़कर शत्रु- भाग जाता है ॥१२-१५ ॥ अब मैं शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने के लिए एक प्रयोग बतला रहा हूँ, उसे सुनो! श्मशान के कोयले और उल्लू तथा कौए की बीट को लाकर उनसे एक चिथड़े के ऊपर शत्रु का चित्र बनाये । चित्र के सिर, मुख, ललाट, हृदय, गुप्ताङ्ग, पैर, पीठ तथा बाहुमध्य में नौ बार शत्रु का नाम लिखे ॥१६-१८ ॥ तदनन्तर युद्ध-१ ख. ग. ° रौ । स्थानयानं ध ' । २ घ. छ. ' तः । स्नानसेवादिनाध्या ' । ३ क. घ. ङ. छ. ' ष्फला । स । ४ ख. ग. II II ह्रूम्, ॐ स्फे ' । ५ क. ङ. च. ' म्, स्फे ' । ६ क. ङ. च. ' स्त्रं कोटय चू । ७ क. ङ. च. ' य स ' । ८ क हरूम् . ङ. ॐ, ह्रूः फ । ख. ग. च. ॐ हः फ । ९ क. ख. ग. ङ. च. ' बाहूथवा शतम् । १० क. ङ जप्त्वा डमरुकास्नातशस्त्रं । ११ क. ङ. ' ख्य रि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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४७६ अग्निपुराणम् ' मोटयेद्युद्धकालेतुउच्चरित्वा ( समुच्चार्य ) तुविद्यया क्षिप ॐ स्वाहा तार्यात्मा शत्रुरोगविषादिनुत् ' करोति यादृशं कर्म तादृशं सिध्यते खगात् तत्सर्वं नाशमायाति साधकस्यावलोकनात् द्विभुजं वक्रचञ्चु च गजकूर्मधरं प्रभुम् ग्रसन्तं चैव खादन्तं तुदन्तं चाऽऽहवे रिपून् पक्षपातैश्चूर्णिताश्च केचिन्नष्टा दिशो दश पिच्छिकां तु प्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधनजां क्रियाम् ॐ ह्रुं पक्षिन्क्षिप, ॐ हूं सः, महाबलपराक्रम ॐ चूर्णय चूर्णय, ॐ विद्रावय विद्रावय, ॐ अमुं ( स्य ) चन्द्रग्रहणे तु जपं कृत्वा तु पिच्छिकाम् ध्यानाद्रवान्मर्दयेच्च सिंहारूढो मृगाविकान् । तार्क्ष्यचक्रं प्रवक्ष्यामि जयर्थं त्रिमुखाक्षरम् ॥१९ ॥

। दुष्टभूतग्रहार्तस्य व्याधितस्याऽऽतुरस्य च ॥ ॥२० २० ॥ || । स्थावरं जङ्गमं चैव लूताश्च कृत्रिमं विषम् ॥ २१ ॥

। पुनर्ध्यायेन्महातार्क्ष्यं द्विपक्षं मानुषाकृतिम् ॥२२ ॥

। असंख्योरगपादस्थमागच्छन्तं खमध्यतः ॥२३ ॥

। चञ्च्वा हताश्च द्रष्टव्याः केचित्पादैश्च चूर्णिताः ॥२४ ॥

। तार्क्ष्यध्यानान्वितो यश्च त्रैलोक्ये ह्यजयो भवेत् ॥ २५ ॥

॥२६ ॥

सर्वसैन्यं भक्षय भक्षय, ॐ मर्दय मर्दय, हूं खः, ॐ भैरवो ज्ञापयति स्वाहा ॥२७ ॥

। मन्त्रयेद्भ्रामयेत्सैन्यं सम्मुखं गजसिंहयोः ॥२८ ॥

। शब्दाद्भङ्गं प्रवक्ष्यामि दूरं मन्त्रेण बोधयेत् ॥ २ ९ ॥ काल में उपर्युक्त मन्त्र पढ़कर मोड़कर रख ले । अब मैं युद्ध में विजय के लिए गरुड़ - चक्र का वर्णन करूँगा । ' क्षिप ॐ स्वहा तार्क्ष्यात्मा शत्रुरोगविषादिनुत् ' यह त्रिमुखाक्षर मन्त्र है । यह गरुड़ का आत्मस्वरूप और शत्रु, रोग और विषाद का विनाश करनेवाला है । इस मन्त्र का जप करने से दुष्ट भूतों और ग्रहों से पीड़ित, व्याधिग्रस्त या रोगी व्यक्ति की पीड़ा दूर हो जाती है । साधक जैसा कर्म करता है, उसे गरुड़ से वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है । सब प्रकार का विष, चाहे वह स्थावर हो चाहे जङ्गम से उत्पन्न हो या कृत्रिम हो, गरुड़ - मन्त्र के साधक को देखते ही नष्ट हो जाता है । तदनन्तर महागरुड़ का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए कि उनके दो पंख हैं, उनकी आकृति मनुष्य जैसी है, उनके दो भुजाएँ हैं, उनकी चोंच टेढ़ी है, उन्होंने हाथी और कछुए को धारण कर रखा है । वे शक्तिमान् हैं । वे असंख्य सर्पों को अपने चरणों में दबाये हुए आकाश के बीच से आ रहे हैं । संग्राम में शत्रुओं को क्षत - विक्षत करते हुए निगल रहे हैं, उन्हें खा रहे हैं तथा उन्हें नाना प्रकार के कष्ट दे रहे हैं । कुछ शत्रु उनकी चोंच से हताहत दिखायी पड़ रहे हैं, तो कोई उनके चरणों में चूर्ण - चूर्ण किये जा चुके हैं । कुछ उनके पक्षों के आघात से चूर - चूर और नष्टभ्रष्ट होकर दशों दिशाओं में भाग रहे हैं । जो व्यक्ति इस प्रकार गरुड़ का ध्यान करता है, वह त्रैलोक्य - विजयी होता है ॥१९-२५ ॥ अब मैं मन्त्र की साधना से उत्पन्न पिच्छिका - क्रिया ( मोर की पूँछ से की जानेवाली क्रिया ) का वर्णन करूँगा । चन्द्र - ग्रहण के समय ‘ ॐ हूं पक्षिन्क्षिप भैरवो ज्ञापयति स्वाहा ' इस मन्त्र से मोर की पूँछ को अभिमन्त्रित करके हाथी - घोड़े के सम्मुख सेना के ऊपर घुमा देना चाहिए । फिर मन्त्र का ध्यान करते हुए वह शीघ्र ही सेना का संहार उसी प्रकार से कर डालता है, जिस प्रकार सिंह हिरनों और भेंड़ों का ( सर्वनाश ) कर देता है । अब मैं इस मन्त्र का प्रयोग बतलाऊँगा जिसके शब्दों को दूर ही से सुनने पर शत्रु तितर - बितर हो जाते हैं ॥ २६-२९ ॥ मातृकादेवियों १ क. ख. ङ. च. मोचये । २ क. ङ. ' दिकृत् । ३ क. ङ. वज्रचक्रं । ४ क. ङ. वज्रचर्मवहं । ५ ख. ' गादिका ' । ६ ङ. नूनं । ख. ग. हर । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA