अग्नि पुराण — पृष्ठ 481–490
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 481–490
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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४७७
मातृणां चरकं दद्यात्कालरात्र्या विशेषतः । श्मशानभस्मसंयुक्तं मालती चामरी तथा ॥
कर्पास ' मूलमात्रं तु तेन दूरं तु बोधयेत् ॥ ३० ॥
ॐ, अहे हे महेन्द्र, अहे महेन्द्र भञ्ज हि । ॐ जहि मसानं हि खाहि खाहि किलि किलि, ॐ हुं फट् ॥३१ ॥
अरेर्नाशं दूरशब्दाज्जप्तया भङ्गविद्यया । अपराजिता च धत्तूरस्ताभ्यां तु तिलकेन हि ॥३२ ॥
ॐ किलि किलि विकिलि, इच्छाकिलि भूतहनि शङ्खिनि, उमे दण्डहस्ते रौद्र माहेश्वरि, उल्कामुखि ज्वालामुखि शङ्ककर्णे शुष्कजङ्घेऽलम्बुषे हर हर सर्वदुष्टान्खन खन, ॐ यन्मां निरीक्षयेद्देवि तांस्तान्मोहय, ॐ रुद्रस्य हृदये स्थिता रौद्रि सौम्येन भावेनाऽऽत्मरक्षां ततः कुरु स्वाहा ॥३३ ॥
बाह्यतो मातृः संलिख्य सकलाकृतिवेष्टिताः । नागपत्रे ' लिखेद्विद्यां सर्वकामार्थसाधिनीम् ॥३४ ॥
हस्ताद्यैर्धारिता पूर्वं ब्रह्मरुद्रेन्द्रविष्णुभिः । गुरुसंग्रामकाले तु विद्यया रक्षिताः सुराः ॥ ३५ ॥
रक्षया नारसिंह्या ' च भैरव्या शक्तिरूपया । सर्वे ( र्व ) त्रैलोक्यमोहिन्या गौर्या देवासुरे रणे ' ॥ ३६ ॥
बीजसम्पुटितं नाम कर्णिकायां दलेषु च । पूजाक्रमेण चाङ्गानि रक्षायन्त्रं स्मृतं शुभे ॥ ३७ ॥
मृत्युञ्जयं प्रवक्ष्यामि नामसंस्कारमध्यगम् । ' कलाभिवेष्टितं पश्चात्सकारेण निबोधितम् ॥ ३८ ॥
को और विशेषतया कालरात्रि देवी को श्मशान की भस्म, मालतीपुष्प, चामर तथा कपास की जड़ के साथ चरु देकर दूर से ही ' ओम् अहे हे महेन्द्रि ॐ हुं फट् ' इस मन्त्र का पाठ करना चाहिए । इस मन्त्र को भङ्गविद्या कहते हैं । अपराजिता पुष्प और धत्तूरे का तिलक लगाकर उच्चस्वर से इसका पाठ करने से शत्रु का नाश हो जाता है ॥ ३०-३२ ॥ ‘ ॐ किलि किलि ततः कुरु स्वाहा ' नागपत्र ( पान ) के ऊपर सब प्रकार की आकृतियों से युक्त मातृदेवियों के साथ इस विद्या ( मन्त्र ) को लिखकर पहनने से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३३-३४ ॥ प्राचीनकाल में ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा विष्णु ने इस मन्त्र को भुजा इत्यादि अङ्गों पर धारण किया था, जिससे उन्होंने देवताओं को घोर संग्राम से बचा लिया था । देवासुर संग्राम में ( इस मन्त्र के प्रभाव से ) रक्षा, नारसिंही, भैरवी, शक्तिरूपा, त्रैलोक्यमोहिनी तथा गौरी ने देवताओं की रक्षा की थी ॥ ३५-३६ ॥ अयि सुन्दरि! रक्षा यन्त्र धारण करने का विधान यह है कि कमल-पत्र और कर्णिका के ऊपर बीज - मन्त्र के साथ अपना नाम लिखकर गौण देवताओं के साथ देवी की पूजा करके उसे पहन लेना चाहिए ॥ ३७ ॥ अब मैं मृत्युञ्जय - यन्त्र का निरूपण करूँगा । ( कमलपत्र के ऊपर ) कला मन्त्र से
आवेष्टित नाम को संस्कारों के बीच ( अर्थात् संस्कारयुक्त ) करके उसके पश्चात् ' स ' अक्षर लिखना चाहिए । फिर १ क. ङ. ' सस्य मू ' । २ क. ङ. अनन्ता शब्द न शब्दाजप्तपा दञ्चवि । ३ ग. ङ. किणि किणि इच्छाकिणि भू । ४ ख. ङ. ' ष्टशन्खादय खादय, ॐ । ५ क. ङ. ' गयन्त्रे लि । ६ क. ङ. ' भिः । शुना संग्रामकाले तु विश्वधाराक्षि । ७ क. ङ. ' सिंहाश्चोद्धेरुच्या श । ८ क. ङ. ' णे । कार्णिका पुटिकां ना । ९ कलाभिवेष्टितं निबोधितम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४७८ जकारं विन्दुसंयुक्तमोंकारेण समन्वितम् । चन्द्रसम्पुटमध्यस्थं सर्वदुष्टविमर्दकम् । पूर्वे दले तथोंकारं स्वदक्षे ' चोत्तरे लिखेत् । चतुस्त्रिंशद्दले कद्यान्बाह्ये ' मन्त्रं च मृत्युजित् । ' कर्पूरचन्दनाभ्यां च श्वेतसूत्रेण वेष्टयेत् । यन्त्रस्य धारणाद्रोगाः शाम्यन्ति रिपवो मृतिः । आं ( ॐ ) वातले वितले विडालमुखि, इन्द्रपुत्रि, वाह, इत्यादि, ° दुःखनित्यकण्ठोच्चैर्मुहूर्तान्वया, नवदुर्गासप्तजप्तान्मुखस्तम्भो मुखस्थितात् । गृहीत्वा सप्तजप्तं तु खड्गयुद्धेऽपराजितः इत्यादिमहापुराण आग्नेये धकारोदरमध्यस्थं वकारेण निबोधितम् ' ॥३९ ॥
अथवा कर्णिकायां च लिखेन्नाम च कारणम् ॥४० ॥
आग्नेयादौ च हूंकारदले षोडशके स्वरान् ॥ ४१ ॥
लिखेद्वै भूर्जपत्रे तु रोचनाकुङ्कुमेन च ॥ ४२ ॥
" सिक्थकेन परिच्छाद्य कलशोपरि पूजयेत् ॥४३ ॥
विद्यां तु भेलखीं ' वक्ष्ये ' विप्रयोगमृतेर्हरी ( रा ) म् ॥ ४४ ॥
उद्भवो वायुदेवेन खीलि, आः, जी हाजा मयि अह मां यस्महमुपाडि, ॐ भेलखि, ॐ स्वाहा ॥ ४५ ॥
ॐ चण्डि, ॐ हूं फट् स्वाहा ॥४६ ॥
॥४७ ॥
युद्धजयार्णवे नानाबलवर्णनं नाम त्रयत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१३३ ॥
विन्दु संयुक्त जकार तथा ॐकार लिखकर बीच में धकार एवं चन्द्र विन्दु सम्पुटित वकार लिखना चाहिए । इस प्रकार बनाया हुआ मृत्युञ्जय यन्त्र समस्त दुष्टों का विनाश करनेवाला हुआ करता है । अथवा कमल की कर्णिका के ऊपर यन्त्र धारण करनेवाले का नाम तथा ( धारण करने का ) प्रयोजन लिख देना चाहिए ॥ ३८-४० ॥ फिर अपनी दाहिनी तथा बायीं तरफ पूर्व दिशा में कमल - पत्र बनाकर उसके ऊपर ओंकार, दक्षिण - पूर्व आदि कोणों में बनाये दलों के ऊपर हूंकार, सोलह दलों के ऊपर स्वर वर्ण, चौंतीस दलों के ऊपर ' क ' आदि व्यञ्जक वर्ण और बाह्यपत्र पर मृत्युञ्जय मन्त्र लिखना चाहिए । इस मन्त्र में गोरोचना, कुंकुम, कपूर तथा चन्दन से भोजपत्र पर लिखकर उसे सफेद तागे से लपेट देना चाहिए । तदनन्तर उसके ऊपर मोम चढ़ाकर उसे कलश के ऊपर रखकर उसकी पूजा करनी चाहिए । इस यन्त्र को पहनने से रोग शान्त होते हैं तथा शत्रुओं की मृत्यु होती है ॥४१-४३३ ॥ अब मैं भेलखी विद्या ( मन्त्र ) का निरूपण करूँगा, जो वियोग तथा असामयिक मृत्यु का नाश करनेवाली है - मन्त्र यह है ‘ ॐ वातले - वातले ॐ भेलखि, ॐ स्वाहा ' इस नव दुर्गा मन्त्र को सात बार अपने मुख में ही जपने से शत्रु का मुँह बन्द हो जाता है । ' ॐ चण्डि, ॐ हूं फट् स्वाहा ' इस मन्त्र को सात बार जपने से मनुष्य खड्गयुद्ध में पराजित नहीं हुआ करता है ॥४४-४७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णव में नानाबल - वर्णन नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ १३३ ॥
१ च. ‘ म् । मन्त्रसं ’ । २ क. ङ. “ दुखवि । ३ क. संदले । ख. संदक्षे । च. सदक्षे । ४ ख. ग. च. हरूं का । ५ च. द्याव म ' । ६ कर्पूरचन्दनाभ्यां वेष्टयेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ७ क. ङ. शिक्यकेन । घ. सिष्ठके । ८ क. ङ. भैरवी ' । ९ क. ' क्ष्ये रिपुरोग । १० घ. इहादि । ११ क. ङ. ' हा । वनमुक्तान्सप्त । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४७ ९ अथ चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः त्रैलोक्यविजयविद्या ईश्वर उवाच त्रैलोक्यविजयां वक्ष्ये सर्वयन्त्रविमर्दिनीम् ' ॥१ ॥
ॐ हूं क्षूं हूं, ॐ नमो भगवति दंष्ट्रिणि भीमवक्त्रे महोग्ररूपे हिलि हिलि रक्तनेत्रे किलि किलि महानिस्वने कुलु, ॐ निर्मांसे कट कट गोनसाभरणे चिलि चिलि शवमालाधारिणि द्रावय, ॐ महारौद्रि सार्द्रचर्मकृताच्छदे विजृम्भ, ॐ नित्यासिलताधारिणि भृकुटीकृतापाङ्गे विषमनेत्रकृतानने वसामेदो विलिप्तगात्रे कह कह, ॐ हस हस क्रुद्ध, क्रुद्ध, ॐ नीलजीमूतवर्णेऽभ्रभालाकृताभरणे विस्फुर, ॐ घण्टारवावकीर्णदेहे, ॐ सिंसिस्थेऽरुणवर्णे, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रं रौद्ररूपे हूं ह्रीं क्लीम्, ॐ, ह्रीं ह्रूमोमाकर्ष, ॐ धून धून, ॐ हे हः खः, वज्रिणि भिन्द, ॐ महाकाये छिन्द ॐ करालिनि किटि किटि महाभूतमातः सर्वदुष्टनिवारिणि जये, ॐ विजये ॐ त्रैलोक्यविजये हूं फट् स्वाहा ॥२ ॥
नीलवर्णां प्रेतसंस्थां विंशहस्तां यजेज्जये । न्यासं कृत्वा तु पञ्चाङ्गं रक्तपुष्पाणि होमयेत् ॥ सङ्ग्रामे सैन्यभङ्गः स्यात्त्रैलोक्यविजयापठात् ' ॥३ ॥
ॐ बहुरूपाय स्तम्भय स्तम्भय, ॐ मोहय, ॐ सर्वशत्रून्द्रावय, ॐ ब्रह्माणमाकर्षय विष्णुमाकर्षय, ॐ महेश्वरमाकर्षय, ओमिन्द्रं टालय, ॐ पर्वतांश्चालय, ॐ सप्तसागराञ्शोषय, ॐ छिन्द च्छिन्द बहरूपाय नमः ॥४ ॥
भुजंगं नाममृन्मूर्तिसंस्थं विद्यादरिं ततः 11411 इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवीयत्रैलोक्यविजयविद्यावर्णनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
अध्याय १३४ त्रैलोक्यविजयविद्या- वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं सम्पूर्ण यन्त्रों को नष्ट करनेवाली विद्या का वर्णन करूँगा । ' ॐ हूं क्षं हरूम् '..... ॐ त्रैलोक्यविजये हूं फट् स्वाहा ' जय - प्राप्ति के लिए इस मन्त्र से पञ्चाङ्ग न्यास करके नीलवर्णवाली, प्रेत पर आरूढ़ और बीस भुजाओंवाली देवी की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर लाल फूलों से हवन करना चाहिए । उपर्युक्त त्रैलोक्य विजय विद्या का पाठ करने से सङ्ग्राम में शत्रु सेना तितर - बितर हो जाती है ॥१-३ ॥ ' ॐ बहुरूपाय स्तम्भय छिन्द च्छिन्द बहुरूपाय नम: ' इस मन्त्र का जप करते हुए मिट्टी की बनी शत्रु की मूर्ति के ऊपर बैठे हुए साँप का ध्यान करना चाहिए ॥४-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णवीय त्रैलोक्यविजयविद्या - वर्णन नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३४ ॥
१ क. ङ. जयं व ' । २ क. ङ. ' मर्दनम् । ३ घ. णि हरूं क्षं क्षां क्षोभरूपिणि प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल, ॐ भीमभीषणे भि ° । ४ ख. ग. ' पदात् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४८० अग्निपुराणम् अथ पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः सङ्ग्रामविजयविद्या ईश्वर उवाच सङ्ग्रामविजयां विद्यां पदमालां ' वदाम्यहम् ॥१ ॥
ॐ ह्रीं चामुण्डे श्मशानवासिनि खट्वाङ्गकपालहस्ते महाप्रेतसमारूढे महाविमानसमाकुले कालरात्रि महागणपरिवृते महामुखे बहुभुजे घण्टाडमरुकिङ्किणि ( हस्ते ), अट्टाट्टहासे किलि किलि, ॐ हूं फट् दंष्ट्राघोरान्धकारिणि नादशब्दबहुले गजचर्मप्रावृतशरीरे मांसदिग्धे लेलिहानोग्रजिह्वे महाराक्षसि रौद्रदंष्ट्राकराले भीमाट्टाट्टहासे स्फुरद्विद्युत्प्रभे चल चल, ॐ चकोरनेत्रे चिलि चिलि, ॐ ललज्जिह्वे, ॐ भीं भृकुटिमुखि हुंकारभयत्रासनि कपालमालावेष्टितजटामुकुटशशाङ्कधारिणि, अट्टाट्टहासे किलि किलि, ॐ हुं दंष्ट्राघोरान्धकारिणि सर्वविघ्नविनाशिनि, इदं कर्म साधय साधय, ॐ शीघ्रं कुरु कुरु, ॐ फट्, ओमङ्कुशेन शमय, प्रवेशय, ॐ रङ्ग रङ्ग कम्पय कम्पय, ॐ चालय, ॐ रुधिरमांसमद्यप्रिये हन हन, ॐ कुट्ट, ॐ छिन्द, ॐ मारय, ओमनुक्रमय, ॐ वज्रशरीरं पातय, ॐ त्रैलोक्यगतं दुष्टमदुष्टं वा गृहीतमगृहीतं वाऽऽवेशय, ॐ नृत्य, ॐ वन्द, ॐ कोटराक्ष्यूर्ध्वकेश्युलूकवदने करङ्किणि दह, ॐ पच पच, ॐ गृह्ण, ॐ मण्डलमध्ये प्रवेशय, ॐ किं विलम्बसि ब्रह्मसत्येन विष्णुसत्येन रुद्रसत्येनर्षिसत्येनाऽऽवेशय, ॐ किलि किलि ॐ खिलि खिलि विलि विलि, ॐ विकृतरूपधारिणि कृष्णभुजङ्गवेष्टितशरीरे सर्वग्रहावेशनि प्रलम्बौष्ठिनि भ्रू भङ्गलग्ननासिके विकटमुखि कपिलजटे ब्राह्मि भञ्ज, ॐ ज्वालामुखि स्वन, ॐ पातय, ॐ रक्ताक्षि घूर्णय भूमिं पातय, ॐ शिरो गृह्ण चक्षुर्मीलय, हस्तपादौ गृह्न मुद्रां स्फोटय, ॐ फट्, ॐ विदारय, ॐ त्रिशूलेन च्छेदय, ॐ वज्रेण हन, ॐ दण्डेन ताडय ताडय, ॐ चक्रेण च्छेदय च्छेदय, ॐ शक्तया भेदय दंष्ट्रया कीलय, ॐ कर्णिकया पाटय, ओमङ्कुशेन गृह्ण, ॐ ' शिरोक्षिज्वरमैकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं डाकिनीस्कन्दग्रहान्मुञ्च मुञ्च, ॐ पच, ओमुत्सादय, ॐ भूमि पातय, ॐ गृह्ण, ॐ ब्रह्माण्येहि, ॐ माहेश्वर्येहि ( ॐ ) कौमार्येहि ॐ महेश्वर बोले - अब श्मशानवासिनि विच्चे हुं १ क. ङ. पट्टमा । २ ५ क. ख. ग. शिरर्तिज्व ' । ६ CC - 0. अध्याय १३५ संग्रामविजयविद्या - वर्णन मैं पदसमूह रूप संग्राम विजया नामक विद्या का वर्णन करता हूँ ॥१ ॥ ' ॐ ह्रीं चामुण्डे
फट् स्वाहा ' यह जया नाम की पदमाला सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करनेवाली है । ख. ध. णि, ॐ करङ्कमालाधारिणि द ' । ३ क. ख. ग. खल । ४ क. ख. ग. च. कर्तृक ' । क. ङ. ॐ सूतकब्र । JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४८१ वैष्णव्येहि, ॐ वाराह्येहि, ओमैन्द्रयेहि, ॐ चामुण्ड एहि, ॐ रेवत्येहि, ओमाकाशरेवत्येहि, ॐ हिमवच्चारिण्येहि ', ॐ रुरुमर्दिन्यसुर क्षयंकर्याकाशगामिनि पाशेन बन्ध बन्ध, अङ्कुशेन कट कट समयं तिष्ठ, ॐ मण्डलं प्रवेशय, ॐ गृह्ण मुखं बन्ध, ॐ चक्षुर्बन्ध हस्तपादौ च बन्ध दुष्टग्रहान्सर्वान्बन्ध, ॐ दिशो बन्ध, ॐ विदिशो बन्ध, अधास्ताद्बन्ध, ॐ सर्वं बन्ध, भस्मना पानीयेन वा मृत्तिकया सर्षपैर्वा सर्वानावेशय, ॐ पातय, ॐ चामुण्डे किलि किलि, ॐ विच्चे हुं फट् स्वाहा ॥२ ॥
पदमाला जयाख्येयं सर्वकर्मप्रसाधिका । सर्वदा होमजप्याद्यैः पाठाद्यैश्च रणे जयः ॥३ ॥
अष्टाविंशभुजा ध्येया असिखेटकषट्करौ ॥ गदादण्डयुतौ चान्यौ शरचापधरौ परौ ॥ ४ ॥
मुष्टिमुगदरयुक्तौ च शङ्खखड्गयुतौ परौ । ध्वजवज्रधरौ चान्यै सचक्रपरशू परौ ॥५ ॥
डमरुदर्पणाढ्यौ च शक्तिकुन्तधरौ परौ । हलेन मुसलेनाऽऽढ्यौ पाशतोमरसंयुतौ ॥ ६ ॥
ढक्कापणव संयुक्तावभयौ मुष्टिकान्वितौ । तर्जयन्ती च महिषं घातनी होमतोऽरिजित् ॥
त्रिमध्वाक्ततिलैर्होमो न देया यस्य कस्यचित् ॥७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवे सङ्ग्रामविजयाविद्यावर्णनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इसके सदैव हवन, जप तथा पाठ आदि करने से रण में विजय होती है || २-३ ॥ उपर्युक्त मन्त्र की अधिष्ठात्री देवी का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए कि उनके अट्ठाईस भुजाएँ हैं, जिनके दो - दो हाथों में क्रमशः तलवार तथा खेटक अस्त्र, गदा तथा दण्ड, बाण तथा धुनष, मुष्टिक अस्त्र तथा मुद्गर, शङ्ख तथा खड्ग, ध्वज तथा वज्र, चक्र तथा परशु, डमरू तथा दर्पण, शक्ति तथा माला, हल तथा मुशल, पाश तथा तोमर, ढक्वा तथा पणव और अभय अस्त्र तथा मुष्टिक अस्त्र विद्यमान हैं । वे महिषासुर का ताड़न कर रही हैं तथा ( उसका ) हनन करनेवाली हैं । उनके मन्त्र से हवन करने से मनुष्य शत्रु - विजयी हो जाता है । हवन त्रिमधु ( घी, चीनी और मधु ) से सने हुए तिल से करना चाहिए । यह मन्त्र जिस किसी को ही नहीं देना चाहिए ॥४-७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णवीय संग्रामविजयविद्या वर्णन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३५ ॥
१ क. छ. ॰वन्तधारि । २ क. ङ. च. विद्येहु । ३१ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४८२ अथ षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः नक्षत्रचक्रम् ईश्वर उवाच अथ चक्रं प्रवक्ष्यामि यात्रादौ च फलप्रदम् । अश्विन्यादौ लिखेच्चक्रं त्रिनाडीपरिभूषितम् ॥१ ॥
अश्विन्यार्द्रादिभिः पूर्वा ततश्चोत्तरफाल्गुनी । ' हस्ता ( स्तो ) ज्येष्ठा तथा मूलं वारुणं चाप्यजैकपात् ॥२ ॥
नाडीयं प्रथमा चान्या याम्यं मृगशिरस्तथा । पुष्पं भाग्यं तथा चित्रा मैत्रं चाऽऽप्यं च वासवम् ॥३ ॥
अहिर्बुध्नं ' तृतीयाऽथ कृत्तिका रोहिणी ह्यहिः । चित्रा ' स्वाती विशाखा च ' श्रवणा रेवती च भम् || ४ || नाडीत्रितयसंजुष्टग्रहाज्ज्ञेयं " शुभाशुभम् । चक्रं फणीश्वरं तत्तु त्रिनाडीपरिभूषितम् ॥५ ॥
" रविभौमार्क राहुस्थमशुभं " स्याच्छुभं परम् । देशग्रामयुता भ्रातृभार्याद्या " एकशः शुभाः || ६ || अ भ कृ रो मृ आ पु पु आम पू उह चि स्वा वि अनु ज्ये मू पू उ श्र ध श पू उ रे ॥७ ॥
अत्रसप्तविंशति नक्षत्राणि ज्ञेयानि ॥८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नक्षत्रचक्रवर्णनं नाम षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥
अध्याय १३६ नक्षत्रचक्र - वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं यात्रा आदि काल में फल प्रदान करनेवाले चक्र का वर्णन करूँगा । तीन नाड़ियों ( रेखाओं ) का एक चक्र बनाकर उसके भीतर अश्विनी आदि नक्षत्रों के प्रथम अक्षर लिखने चाहिए । पहली रेखा के अन्दर अश्विनी, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा मूल, शतभिषा तथा पूर्वभाद्रपद नक्षत्रों को लिखना चाहिए । दूसरी रेखा के अन्दर भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, शतभिषा, ज्येष्ठा तथा उत्तरभाद्रपद नक्षत्रों के नाम लिखने चाहिए । तीसरी रेखा के अन्दर कृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, चित्रा, स्वाती, विशाखा, श्रवण तथा रेवती नक्षत्रों का नाम लिखना चाहिए ॥१-४ ॥ तीन रेखाओं का एक फणीश्वर चक्र होता है, जिसके ग्रहों द्वारा शुभाशुभ का ज्ञान होता है । इस चक्र में सूर्य, मङ्गल, शनि तथा राहु द्वारा किया जानेवाला अशुभवाद में शुभ हो जाता है । इससे देश, ग्राम, भ्रातृ - स्नेह तथा पत्नी - प्रेम का लाभ हुआ करता है । फणीश्वर - चक्र के सत्ताईसों नक्षत्र इस प्रकार समझना चाहिए - अ भ कृ रो मृ आ पु पु आम पू उह चि स्वा वि अनु ज्ये मू पू उ श्रध श पू उ रे ॥५-८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नक्षत्रचक्र - वर्णन नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३६ ॥
१ क. ख. ग. ङ. हस्तज्ये ' । २ क. ख. ग. ङ. ' णं वाऽप्य । ३ क. ङ. चाग्यं सवा ' । ४ क.. र्बुध्नतृ ' । ५ ग. मित्रः ॥ ६ क. ङ. च. श्रवणं रेवती तु च । ना ° । ७ क. ङ. संदुष्टग्रहैर्ज्ञेयं । ८ क. ङ. रं तद्वत्रिना । ९ क. ङ. रिद्धि " ' १० रविभौमार्क परम् ग. पुस्तके नास्ति । ११ क. ङ. ' हुस्था अशुभस्था शुभावहा । दे ' । १२ क. ङ. ' मसुता । १३ क. ङ. एकगा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४८३ अथ सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः महामारीविद्याकथनम् ईश्वर उवाच महामारीं प्रवक्ष्यामि विद्यां शत्रुविमर्दिनीम् ॥१ ॥
ॐ ह्रीं ' महामारि ` रक्ताक्षि कृष्णवर्णे यमस्याऽऽज्ञाक ( का ) रिणि सर्वभूतसंहारकारिणि, अमुकं हन हन, ॐ दह दह, ॐ पच पच, ॐ छिन्द च्छिन्द, ॐ मारय मारय, ओमुत्सादयोत्सादय, ॐ सर्वसत्त्ववशंकरि सर्वकायिके हुं फट् स्वाहेति ॥२ ॥
ॐ मारि हृदयाय नमः ॐ महामारी शिरसे स्वाहा । ॐ कालरात्रि शिखायै वौषट् । ॐ कृष्णवर्णे खः कवचाय हुम् । ॐ तारकाक्षि विद्युज्जिह्वे सर्वसत्त्वभयङ्करि रक्ष रक्ष सर्वकार्येषु हं त्रिनेत्राय वषट् । ॐ महामारि सर्वभूतदमनि महाकालि, अस्त्राय हुं फट् ॥३ ॥
एष न्यासो महादेवि कर्त्तव्यः साधकेन तु । शवादि वस्त्रमादाय चतुरस्त्रं त्रिहस्तकम् ॥४ ॥
कृष्णवर्णां त्रिवक्त्रां ' च चतुर्बाहुं समालिखेत् । पटे विचित्रवर्णैश्च धनुः शूलश्च कर्तृकाम् ॥५ ॥
खट्वाङ्ं धारयन्ती च कृष्णाभं पूर्वमाननम् । तस्य दृष्टिनिपातेन भक्षयेदग्रतो नरम् ॥६ ॥
द्वितीयं याम्यभागे तु रक्तजिह्वं भयानकम् । " लेलिहानं करालं च दंष्ट्रोत्कटभयानकम् ॥७ ॥
अध्याय १३७ महामारी विद्या - वर्णन महेश्वर बोले- अब मैं शत्रु को कुचलनेवाली महामारी विद्या ( मन्त्र ) का वर्णन करूँगा ॥१ ॥ ' ॐ ह्रीं
महामारि ं ‘ “ हुं फट् स्वाहेति ' यह महामारी मन्त्र है । अयि महादेवि! साधक को ' ॐ मारि हृदयाय नमः अस्त्राय हुं फट् ' इन मन्त्रों को पढ़कर ( विभिन्न अङ्गों का ) स्पर्श करना चाहिए ॥२-३३ ॥ तदनन्तर शव आदि का वस्त्र लेकर उसे तीन हाथ लम्बा और चौकोर बनाकर उसके ऊपर ( देवी का ) एक चित्र बनाना चाहिए । उस चित्र का वर्ण काला हो, तीन मुख हों और चार भुजाएँ हों । उसे वस्त्र के ऊपर विभिन्न रङ्गों में धनुष, शूल, कर्तृका आदि अस्त्र तथा अस्थिपञ्जर को लिये हुए देवी का चित्रण करना चाहिए । उसका एक मुख काला तथा पूर्व दिशा की ओर झुका हुआ होना चाहिए! उस ( मुख ) में सामने के मनुष्य को देखते ही चट कर जाने का - सा भाव अङ्कित होना चाहिए ॥४-६ ॥ दूसरा मुख दक्षिण दिशा की ओर झुका, भयानक, लाल और लपलपाती जिह्वा से युक्त तथा उत्कट दंष्ट्राओं के कारण देखने में भयंकर होना चाहिए । उसमें इस प्रकार का भाव अंकित होना चाहिए कि वह घोड़े आदि १ ख. ग. क्लीं । २ ख. ग. हाविर । ३ क. ग. ॐ । ४ क. ग. ङ. तु । सर्वादि । ५ ख. ग. त्रिरक्तां च । ६ क. ग. ङ. कार्तिका । ७ लेलिहानं भयानकं च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४८४ अग्निपुराणम् ' तस्य दृष्टिनिपातेन भक्ष्यमाणं हयादिकम् गन्धपुष्पादिमध्वाज्यैः पश्चिमाभिमुखं यजेत् वश्याः स्युर्यक्षरक्षाश्च ( क्षांसि ) नाशमायान्ति शत्रवः " मारयेत्क्रोधसंयुक्तो होमादेव न संशयः व्याधिभिर्गृह्यते सैन्यं भङ्गो भवति वैरिणः अचिरान्प्रियते सोऽपि ब्रह्मणा यदि रक्षितः दिनत्रयं ससैन्यश्च नाशमायाति वै रिपुः खररक्तसमायुक्तहोमादुच्चाटयेद्रिपुम् । तृतीयं च मुखं देव्याः श्वेतवर्णं गजादिनुत् ॥८ ॥
। मन्त्रस्मृतेरक्षिरोगः शिरोरोगादि नश्यति ॥९ ॥
। समिधो निम्बवृक्षस्य ह्यजारक्तविमिश्रिताः ॥ १० ॥
। परसैन्यमुखो भूत्वा सप्ताहं जुहुयाद्यदि ॥११ ॥
। समिधोऽष्टसहस्त्रं तु यस्य नाम्ना तु होमयेत् ॥ १२ ॥
। उन्मत्तसमिधो रक्तविषयुक्तं सहस्रकम् ॥१३ । राजिकालवणैर्होमाद्भङ्गोऽरेः स्याद्दिनत्रयम् ॥१४ ॥
। काकरक्त समायोगाद्धोमादुस्सादनं ह्यरेः ॥ १५ ॥
वधाय कुरुते सर्वं यत्किंचिन्मनसेप्सितम् । अथ सङ्ग्रामसमये गजारूढस्तु साधकः ॥ १६ ॥
कुमारीद्वयसंयुक्तो मन्त्रसंनद्धविग्रहः ॥ दूरशङ्खादिवाद्यानि विद्यया ह्यभिमन्त्रयेत् ॥ १७ ॥
महामायापटं गृह्य उच्छेत्तव्यं रणाजिरे । परसैन्यमुखो भूत्वा दर्शयेत्तं महापटम् ॥१८ ॥
कुमारीर्भोजयेत्तत्र पश्चात्पिण्डी च भ्रामयेत् । " साधकश्चिन्तयेसैन्यं पाषाणमिव निश्चलम् ॥ १ ९ ॥ को देखते - देखते ही निगल जायगा । देवी का तीसरा मुख उज्ज्वल तथा ( शत्रु के ) हाथी को नष्ट कर देनेवाला होना चाहिए ॥७-८ ॥ साधक पश्चिमाभिमुख होकर गन्ध, पुष्प, मधु, घी आदि से देवी की पूजा करके उपर्युक्त मन्त्र का जप करे । ऐसा करने से नेत्र रोग और शिरोरोग आदि नष्ट हो जाते हैं । ( इसका जप करने से ) यक्ष तथा राक्षसगण वशीभूत हो जाते हैं और शत्रुओं का सर्वनाश हो जाता है । नीम की लकड़ियों में बकरे का रक्त मिलाकर उपर्युक्त मन्त्र से क्रोधपूर्वक हवन करने से निःसन्देह शत्रु की मृत्यु हो जाती है । शत्रु सेना के अभिमुख होकर एक सप्ताह तक इस प्रकार का हवन करने से शत्रु - सेना व्याधियों से ग्रस्त हो जाती है तथा शत्रु का विनाश हो जाता है ॥९-११३॥ नीम की ही आठ हजार समिधाओं से जिस किसी का नाम लेकर हवन किया जाता है वह शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, फिर चाहे उसकी रक्षा करनेवाले स्वयं ब्रह्मा ही क्यों न हों । धतूरे की समिधाओं में रक्त और विष मिलाकर तीन दिन तक एक - एक हजार आहुतियाँ डालने से सेना सहित शत्रु का नाश हो जाता है । राजसरसों तथा लवण से तीन दिन तक हवन करने से शत्रु का सर्वनाश हो जाता है ॥१२-१४ ॥ गधे का रक्त मिलाकर हवन करने से शत्रु का ( उच्छेद ) नाश होता है । उक्त मन्त्र से शत्रु वध के निमित्त जो कुछ भी किया जायगा, उसी में सफलता प्राप्त होगी ॥१५-१५ ॥ युद्ध - काल में साधक उक्त मन्त्र से अपने शरीर की रक्षा करके दो कुमारियों के साथ हाथी पर चढ़कर उसी मन्त्र को उच्च - स्वर से पढ़ता हुआ शङ्ख आदि वाद्यों का आमन्त्रण करे । फिर महामाया भगवती का वस्त्र लेकर उसे रणाङ्गण में छोड़ देना चाहिए । तदनन्तर उस महापट को शत्रु सेना की ओर मुख करके दिखाना चाहिए और वहीं कुमारियों को खिलाकर चक्र घुमाना चाहिए । उस समय साधक अपने मन में यह विचार करता रहे १ तस्य ” हयादिकम् ग. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. शुभदन्तं । ३ ख. ग. त्यजेत् । ४ ङ. “ रयन्क्रोध ” । ५ क. ङ. “ धिभिः पूर्यते । ६ काकरक्त ह्यरेः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ७ क. ङ. " पद " गृ । ८ अस्मिन् श्लोके गृह्येति पदमार्षम् । ९ क. ङ. ' त्पिच्छी च ' । १० साधकश्चिन्तयेत् " निश्चलम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४८५ निरुत्साहं विभग्नं च मुह्यमानं च ' भावयेत् । एष स्तम्भो मया प्रोक्तो न देयो यस्य कस्यचित् ॥२० ॥
त्रैलोक्यविजया माया दुर्गैवं भैरवी तथा । ' कुञ्जिका भैरवी रुद्रो नारसिंह (? ) पटादिना ॥२१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये महामारीविद्यावर्णनं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१३७ ॥
अथाष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः षट्कर्माणि ईश्वर उवाच षट्कर्माणि प्रवक्ष्यामि सर्वमन्त्रेषु तच्छृणु । आदौ साध्यं लिखेत्पूर्वं चान्ते मन्त्रसमन्वितम् ॥१ ॥
पल्लवः स तु विज्ञेयो महोच्चाटकरः परः । आदौ मन्त्रस्ततः साध्यो मध्ये साध्यः पुनर्मनुः ॥२ ॥
योगाख्यः सम्प्रदायोऽयं कुलोत्सादेषु योजयेत् । आदौ मन्त्रपदं दद्यान्मध्ये साध्यं नियोजयेत् ॥ ३ ॥
पुनश्चान्ते लिखेन्मन्त्रं साध्यं मन्त्रपदं पुनः । रोधकः सम्प्रदायस्तु स्तम्भनादिषु योजयेत् || ४ || अधोऽर्थं याम्यवामे तु मध्ये साध्यं तु योजयेत् । ( संपुटः स तु विज्ञेयो वश्याकर्षेषु योजयेत् ॥५ ॥
कि शत्रु सेना पाषाणवत् निश्चल, निरुत्साह, विमुग्ध और नष्ट हो चुकी है ॥१६- ६-१९ ३ ॥ मैंने जिस ( शत्रु ) स्तम्भन ( मन्त्र ) को बताया है, उसे हर किसी को नहीं बताना चाहिए । उपर्युक्त महापट के ऊपर त्रैलोक्य विजया, माया, दुर्गा, भैरवी, कुञ्जिका, रुद्र तथा नरसिंह - इन नामों को भी लिख देना चाहिए ॥२०-२१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में महामारीविद्या - वर्णन नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३७ ॥
अध्याय १३८ षट् कर्म वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं सब मन्त्रों से किये जानेवाले मारण, मोहन आदि षट्कर्मों का वर्णन करूँगा, उसे सुनो । पहले आदि में साध्य ( सिद्ध करने योग्य लक्ष्य ) को लिखकर अन्त में मन्त्र लिखना चाहिए || १ || इस ( विधि ) को पल्लव कहते हैं । इससे महान् उच्चाटन होता है । आदि में मन्त्र, उसके बाद साध्य, फिर मध्य में साध्य और पुनः अन्त में मन्त्र लिखना चाहिए || २ || इसे योग नामक सम्प्रदाय कहते हैं । इसका प्रयोग कुल का नाश करने में करना चाहिए । आदि में मन्त्र, मध्य में साध्य, अन्त में पुनः मन्त्र, फिर साध्य और पुनः मन्त्र लिखना चाहिए । इसको रोधक सम्प्रदाय कहते हैं । इसका प्रयोग स्तम्भन आदि कार्यों में करना चाहिए ॥३-४ ॥ साध्य को मध्य में रखकर उसके नीचे - ऊपर तथा दायें - बायें भाग में मन्त्र लिखना चाहिए । इसको सम्पुट विधि कहते हैं । इसका प्रयोग वशीकरण १ ख. भीषयेत् । २ क. ङ. कुम्भिका । ३ ख. ग. च. ' नः । बोध ' । ४ अधोऽर्थं योजयेत् ग. च. पुस्तकयोर्नास्ति । ५ संपुट ं प्रथमः ग. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४८६ मन्त्राक्षरं यदा साध्यं प्रथितं चाक्षराक्षरम् । मन्त्राक्षरद्वयं लिख्य एकं साध्याक्षरं पुनः ।
आकर्षणादि यत्कर्म वसन्ते चैव कारयेत् ।
नमस्कारपदं चैव शान्तिवृद्धी प्रयोजयेत् ॥
विद्वेषोच्चाटने मृत्यौ फट्स्यात्खण्डी कृतोऽशुभे । यमोऽसि यमराजोऽसि कालरूपोऽसि धर्मराट् । निपातयामि यत्नेन निवृत्तो भव साधक । पद्मे शुक्ले यमं प्रार्च्य होमादेतत्प्रसिध्यति रात्रौ वार्ता विजानाति आत्मनश्च परस्य च जप्त्वा हसक्षमलवरयुं भैरवीं घातयेदरिम् प्रथमः ) सम्प्रदायः स्यादाकृष्टिवशकारकः ' ॥६ ॥
विदर्भः सतु विज्ञेयो वश्याकर्षेषु योजयेत् ॥ ७ ॥
तापज्वरे तथा वश्ये स्वाहा चाऽऽकर्षणे शुभम् ॥८ ॥
पौष्टिकेषु वषट्कारमाकर्षे वशकर्मणि ॥९ ॥
लाभादौ मन्त्रदीक्षादौ वषट्कारस्तु सिद्धिदः ॥ १० ॥
मयादत्तमिमं शत्रुमचिरेण निपातय ॥११ ॥
संहृष्टमनसा ब्रूयाद्देशिको ' ऽरिप्रसूदनः ॥१२ ॥
। आत्मानं भैरवं ध्यात्वा ततो मध्ये कुलेश्वरीम् ॥१३ ॥
। दुर्गे दुर्गरक्षणीति दुर्गां प्रार्घ्यारिहा भवेत् ॥ ॥१४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये षट्कर्मकथनं नामाष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
तथा आकर्षण में करना चाहिए || ५ || जहाँ पर मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के साथ - साथ साध्य ( लक्ष्य ) का एक - एक अक्षर लिखा जाता है, उसे प्रथम सम्प्रदाय कहते हैं । यह प्रयोग आकर्षण और वशीकरण के लिए किया जाता है । इसी प्रकार जहाँ मन्त्र के दो - दो अक्षरों को लिखकर साध्य का एक - एक अक्षर लिखा जाता है, उसे विदर्भ कहते हैं हैं ॥ इसका भी प्रयोग वशीकरण और आकर्षण में किया जाता है ॥६-७ ॥ आकर्षण आदि कर्मों का प्रयोग वसन्त ऋतु में ही करना चाहिए चाहिए । शान्ति और वृद्धि का प्रयोग और आकर्षक चाहिए । लाभ तथा मन्त्र -कहना चाहिए —— तुम यम तदनन्तर शत्रुनाशक गुरु रहा हूँ ' ॥११-१२ ॥ इस । ताप - ज्वर की शान्ति, वशीकरण तथा आकर्षण कार्य में ' स्वाहा ' शब्द का प्रयोग करना के कार्य में ' नमस्कार ' शब्द का प्रयोग करना चाहिए । पौष्टिक ( श्रेयस्कर ) कार्यों में वषट्कार , वशीकरण, विद्वेष, उच्चाटन तथा मारण सम्बन्धी अशुभ कार्यों में ‘ फट् ' का प्रयोग करना दीक्षा आदि कार्यों में ' वषट्कार ' शब्द सिद्धिदायक हुआ करता है ॥८-१० ॥ साधक को हो, यमराज हो, कालरूप हो और धर्मराज हो । मेरे दिये हुए इस शत्रु को शीघ्र गिरा दो । ' को प्रसन्नचित्त से कहना चाहिए - ' अये! साधक! तुम आराम करो । मैं यत्नपूर्वक इसे गिरा प्रकार श्वेतकमल पर यम की पूजा करके हवन करने से इस कार्य की सिद्धि होती है । रात्रि में अपने को भैरव के रूप में तथा मध्य में कुलेश्वरी का ध्यान करने से इस अपना तथा दूसरों का समाचार ज्ञात हो जाता है । ‘ दुर्गे दुर्गरक्षिणि ' इस मन्त्र से दुर्गा की पूजा करने से मनुष्य शत्रु का संहार करनेवाला हो जाता है । ' ह सक्ष म ल व र यु ' इन अक्षरों से भैरवी मन्त्र का जप करने से मनुष्य अपने शत्रु को नष्ट कर डालता है ॥१३-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में षट्कर्मकथन नामक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३८ ॥
१ क. ङ. ष्टिरसका ' । २ च. ' यो रष्टावर्षे ' । ३ क. ङ. वक्ष्ये । ४ क. ङ. परं चै । ५ च. ' को रिपुसूदनम् । अग्निस्वर्णमयं प्रा ' । ६ क. ङ. ' नः । अग्नि स्वर्णमयं प्रा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA