अग्नि पुराण — पृष्ठ 491–500

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४८७ अथैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः षष्ठिः संवत्सराः ईश्वर उवाच षष्ट्यब्दानां प्रवक्ष्यामि शुभाशुभमतः शृणु शुक्ले तु सर्वसस्यानि प्रमोदेन प्रमोदिताः श्रीमुखे वर्धते लोको भावे भावः प्रवर्धते । ईश्वरे क्षेममारोग्यं बहुधान्यः सुभिक्षदः वृषो वृष्यति सर्वाश्च चित्रभानुश्च चित्रताम् पार्थिवे सस्यसम्पत्तिरतिवृष्टिस्तथा व्यये विरोधी जलदान्हन्ति विकृतिश्च भयङ्करः ' विजयः शत्रुहन्ता च शत्रु ( ज्यो ) रोगादि मर्दयेत् । प्रभवे यज्ञकर्माणि विभवे सुखिनो जनाः ॥ १ ॥

। प्रजापतौ प्रवृद्धिः स्यादङ्गिरा भोगवर्धनः ॥ २ ॥

युना च प्लवते शक्रो धाता सर्वौषधीकरः ॥३ ॥

। प्रमाथी मध्यवर्षस्तु विक्रमे सस्यसम्पदः ॥४ ॥

। सुभानुः ( नौ ) क्षेममारोग्यं तारणे जलदाः शुभाः ॥५ ॥

। सर्वजित्युत्तमा वृष्टिः सर्वधारी सुभिक्षदः ॥६ ॥

। खरे भवेत्पुमान्वीरो नन्दने नन्दते ( ति ) प्रजा ॥७ ॥

। ज्वरार्त्तो मन्मथे लोको दुष्करे दुष्कराः प्रजा (? ) ॥८ ॥

अध्याय १३ ९ साठ संवत्सर - वर्णन महेश्वर बोले- अब मैं साठ वर्षों का शुभाशुभ फल बताऊँगा, उसे सुनो । प्रभव नामक संवत्सर में यज्ञकर्म अधिक होते हैं । विभव नामक संवत्सर में प्रजा सुखी रहती है ॥ १ ॥ शुक्ल नामक संवत्सर में सस्यों की वृद्धि होती

है । प्रमोद नाम वर्ष में प्रजाएँ आनन्दित रहती हैं । प्रजापति नामक संवत्सर में प्रजा की वृद्धि होती है । अङ्गिरा नामक वर्ष में भोगों की वृद्धि होती है । श्रीमुख वर्ष में प्रजाओं की वृद्धि होती है । भाव - संवत्सर में भावुकता बढ़ती है । युवा नामक संवत्सर में इन्द्र प्रसन्न होते हैं तथा ' धाता ' संवत्सर में सभी ओषधियाँ फलती - फूलती हैं ॥ २-३ ॥ ईश्वर-संवत्सर में क्षेम तथा आरोग्य की वृद्धि होती है । बहुधान्य - संवत्सर सुभिक्ष उत्पन्न करता है । मध्यवर्ष पीठाकार होता है । विक्रम - संवत्सर सस्यसम्पत्तिवर्धक होता है । वृष - संवत्सर सब वस्तुओं की वर्षा करता है । चित्रभानु संवत्सर विचित्रता उत्पन्न करता है । सुभानु - संवत्सर क्षेम तथा आरोग्य बढ़ाता है । तारण संवत्सर में बादल अच्छे होते हैं । पार्थिव संवत्सर में सस्यसम्पत्ति बढ़ती है । व्यय संवत्सर में अतिवृष्टि होती है । सर्वजित् संवत्सर में उत्तम वृष्टि होती है । सर्वधारी संवत्सर में सुभिक्ष उत्पन्न होता है ॥४-६ ॥ । विरोधी - संवत्सर बादलों को नष्ट करता है । विकृति संवत्सर भयानक होता है । खर - संवत्सर में पुरुष वीर हुआ करते हैं । नन्दन वर्ष में प्रजा आनन्दित होती है ॥७ ॥ विजय - वर्ष शत्रु और रोग

आदि का नाश किया करता है । मन्मथ वर्ष में लोग ज्वर पीड़ित होते हैं । दुष्कर वर्ष में प्रजा को कठिनाइयाँ होती हैं ॥८ ॥

१ घ. ' ते । पूरणो पूरणो श ' । २ क. ख. ङ. ' वर्ष तु वि ' । ३ ख. ग. विषयः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 492

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४८८ अग्निपुराणम् दुर्मुखे दुर्मुखो लोको हेमलम्बेन सम्पदः । ' संवत्सरो महादेवि विलम्बस्तु सुभिक्षदः ॥९ ॥

विकारी शत्रुकोपाय विजये ( शार्वरी ) सर्वदा क्वचित् । प्लवे प्लवन्ति तोयानि शोभने शुभकृत्प्र ( शुभकृच्छोभनेप्र ) जा ॥१० ॥

` राक्षसे निष्ठुरो लोको विविधं धान्यमानने ( ले ) । सुवृष्टिः पिङ्गले क्वापि काले ह्युक्तो ( लयुक्ते ) धनक्षयः ॥११ ॥

सिद्धार्थे सिध्यते ( ति ) सर्वं रौद्रे रौद्रं प्रवर्तते । दुर्मतौ मध्यमा वृष्टिर्दुन्दुभिः क्षेमधान्यकृत् ॥१२ ॥

स्रवन्ते ( ति ) रुधिरोद्गारी रक्ताक्षः ( क्षे ) क्रोधनो ( ने ) जयः । क्षये क्षीणधनो लोकः षष्टिसंवत्सराणि तु ॥१३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवे षष्टिसंवत्सरवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः वश्यादियोगाः ईश्वर उवाच वश्यादियोगान्वक्ष्यामि लिखेद्द्द्व्यष्टपदे त्विमान । भृङ्गराजः सहदेवी मयूरस्य शिखा तथा ॥ १ ॥

दुर्मुख वर्ष में प्रजाएँ कटुवादिनी होती हैं । हेमलम्ब वर्ष में सम्पत्तियाँ बढ़ती हैं । अयि महादेवि! विलम्ब नामक संवत्सर सुभिक्ष उत्पन्न करता है । विकारी वर्ष शत्रु को कुपित करता है । शार्वरी वर्ष कभी - कभी ही विजय दिलाता है । प्लव संवत्सर में वृष्टि अधिक होती है । शोभन वर्ष में प्रजा शुभ कर्म करनेवाली हुआ करती है ॥९ -१० ॥ राक्षस वर्ष में लोग निष्ठुर होते हैं । आनन वर्ष में विविध प्रकार का धान्य होता है । पिङ्गल वर्ष में सुवृष्टि और कालवर्ष में धनक्षय होता है । सिद्धार्थ वर्ष में सभी कार्य सिद्ध होते हैं । रौद्र वर्ष में क्रोध बढ़ता है । दुर्मति वर्ष में वृष्टि मध्यम होती है और दुन्दुभि वर्ष में धान्य और कल्याण की वृष्टि होती है ॥११-१२ ॥ स्रवन्त वर्ष में रक्तपात तथा क्रोधन वर्ष में विजय होती है । क्षय वर्ष में प्रजाओं के धन का क्षय होता है । यही साठ संवत्सर और उनके फल हैं || १३ || श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णवीय षष्टिसंवत्सर - वर्णन नामक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१३९ ॥

अध्याय १४० वश्यादियोग - वर्णन ईश्वर बोले - अब मैं वशीकरण आदि के प्रयोगों का वर्णन करूँगा । इन योगों को सोलह कोष्ठों ( खानों ) में १ क. ख. ङ. ' त्सरे म । २ क्रोध्याद्यानन्दान्तैकादशसंवत्सरफलप्रतिपादकाः श्लोकास्त्रुटिताः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 493

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४८ ९ पुत्रं जीवकृतं ' जाली ह्यधः पुष्पा रुदन्तिका लज्जालुका मोहलता कृष्णधत्तूरसंज्ञिता ऋत्विजो वह्नयो नागाः पक्षौ मुनिमनू शिवः तिथयश्च क्रमाद्भागा ओषधीनां प्रदक्षिणम् तृतीयेनाञ्जनं कुर्यात्स्नानं कुर्याच्चतुष्कतः मुनयो दक्षिणे पार्श्वे युगाद्याश्चोत्तराः स्मृताः मध्येन सार्कशशिभिर्धूपः स्यात् सर्वकार्यके ' धूपस्तु षोडशाद्यस्तु ' गृहाद्युद्वर्तने स्मृतः रुद्राद्या भक्षणे प्रोक्ताः पक्षाद्याः पानके स्मृताः सूर्यत्रिदशपक्षैश्च शैलैः स्त्री लेपतो वशा तिथिदिग्युगबाणैश्च गुटिका तु वशंकरी । कुमारी रुद्रजटा स्याद्विष्णुक्रान्ता शि ( सि ) तोऽर्ककः ॥२ ॥

। गोरक्षः कर्कटी चैव मेषशृङ्गी स्नुही तथा ॥३ ॥

। वसवो दिग्रसा वेदा ग्रहर्तुरविचन्द्रमाः ॥४ ॥

। प्रथमेन चतुष्केण धूपश्चोद्वर्तनं परम् ॥५ ॥

। भृङ्गराजानुलोमाच्च चतुर्धा लेपनं स्मृतम् ॥६ ॥

। भुजगाः पादसंस्थाश्च ईश्वरा मूर्ध्नि संस्थिताः ॥७ ॥

। एतैर्विलिप्तदेहस्तु त्रिदशैरपि पूज्यते ॥ ८ ॥

। युगाद्याश्चाञ्जने प्रोक्ता वाणाद्याः स्नानकर्मणि ॥९ ॥

। ऋत्विग्वेदर्तुनयनैस्तिलकं लोकमोहनम् ॥१० ॥

। चन्द्रेन्द्रफणिरुद्रैश्च योनिलेपाद्वशाः स्त्रियः ॥११ ॥

। भक्ष्ये भोज्ये तथा पाने दातव्या गुटिका वशे ॥१२ ॥

लिखना चाहिए । फिर भृङ्गराज, सहदेवी, मयूरशिखा, पुत्रक, जीवकृत जाली, अधः पुष्पा, रुदन्तिका, कुमारी, रुद्रजटा, विष्णुक्रान्ता, श्वेतअर्क, लाजवन्ती, मोहलता, काला धतूरा, गोरक्ष, कर्कटी, मेषशृङ्गी तथा स्नुही नामक ओषधियों के नाम लिखकर उनके चारों ओर ४, ३, ८, २, ७, १४, ११, ८, ४, ६, ४, ९, ६, ११, १५ - इतनी संख्या लिखनी चाहिए । तदनन्तर तिथियों और ओषधियों के भागों को लिखकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए । पहले की चार ओषधियों का धूप तथा उबटन बनाकर सेवन करना चाहिए ॥१-५ ॥ तीसरी ओषधि ( मयूरशिखा ) का अञ्जन बनाना चाहिए और चौथी ओषधि पुत्रक से स्नान करना चाहिए । भृङ्गराज से लेकर चार ओषधियों ( भृङ्गराज, सहदेवी, मयूरशिखा, पुत्रक ) का लेप करना चाहिए । सातवीं संख्यावाली ओषधि ( अधः पुष्पा ) को दाहिनी ओर, चौथी आदि संख्यावाली ( पुत्रक आदि ) ओषधियों को बायीं ओर तथा पहली संख्यावाली ( भृङ्गराज ) ओषधियों को भुजा, पैर और सिर पर धारण करना चाहिए ॥६-७ ॥ मध्य - स्थित एक - एक संख्यावाली ओषधियों के धूप का सेवन सभी कार्यों में करना चाहिए । शरीर में उपर्युक्त ओषधियों का लेप लगानेवाला व्यक्ति देवताओं से भी सम्मानित हुआ करता है || ८ || सोलहवीं संख्यावाली ओषधि का धूप तथा उबटन बनाना चाहिए । चौथी आदि संख्यावाली ओषधियों का अञ्जन बनाना चाहिए । पाँचवीं आदि संख्यावाली ओषधियों का प्रयोग स्नान कर्म में करना चाहिए ॥९ ॥ ग्यारहवीं आदि संख्यावाली ओषधियों का उपयोग भोजन में और दूसरी आदि संख्यावाली ओषधियों

का उपयोग पीने में करना चाहिए । चौथी, छठी तथा दूसरी संख्यावाली ओषधियों का तिलक लोगों को मोहित कर लिया करता है ॥१० ॥ बारहवीं, तीसरी, दसवीं, दूसरी तथा सातवीं संख्यावाली ओषधियों का प्रयोग करने से स्त्री वशीभूत होती

है । योनि के ऊपर पहली, आठवीं तथा ग्यारहवीं संख्यावाली ओषधि का लेप करने से स्त्रियाँ वशीभूत होती हैं । ११ ॥ पन्द्रहवीं, चौथी, दूसरी तथा पाँचवीं संख्यावाली ओषधियों की गोली ( सभी को वश में करनेवाली हुआ करती हैं । खाने - पीने की सामग्री के साथ इस गोली को देने से वशीकरण होता है ॥१२ ॥ चौथी, नौवीं, दूसरी तथा सातवीं संख्यावाली ओषधियों

१ ग. “ कृता जा । २ ग. घ. ङ. ' ष्णघूस्तुर ' । ३ क. ङ. ' ण वृषश्चो । ४ धूपस्तु स्मृतः च. पुस्तके नास्ति । ५ ख. ग. ' शापास्तु । ६ क. ख. ग. ' क्त रणाद्याः स्थान । ७ क. ङ. पारके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 494

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४ ९ ० अग्निपुराणम् ऋत्विग्ग्रहाक्षिशैलैश्च शस्त्रस्तम्भे मुखे धृता ' । शैलेन्द्रवेदरन्द्रैश्च अङ्गलेपाज्जले वसेत् ॥१३ ॥

बाणाक्षिमनुरुद्रैश्च गुटिका क्षुत्तुषादिनुत् । त्रिषोडशदिशाबाणैर्लेपात्स्त्री दुर्भगा शुभा । | १४ || त्रिदशाक्षि दिशानेत्रैर्लेपाक्क्रीडेच्च पन्नगैः ॥ त्रिदशाक्षेशधुजगैर्लेपात्स्त्री सूयते सुखम् ॥१५ ॥

( ' सप्तदिङ्मुनिरन्धैश्च द्यूतजिद्वस्त्रलेपतः । त्रिदशाक्ष्यब्धिमुनिभिर्ध्वजलेपाद्रतौ सुतः ) ॥१६ ॥

' ग्रहाब्धिसर्प्यत्रिदशैर्गुटिका स्याद्वशंकरी । ऋत्विग्पदस्थितौलष ( तौष ) ध्याः प्रभावः प्रतिपादितः ॥१७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये वश्यादियोगवर्णनं नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥

अथैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः षट्त्रिंशत्पदज्ञानम् ईश्वर उवाच षट्त्रिंशत्यसंस्थानामोषधीनां वदे फलम् । अमरीकरणं नृणां ब्रह्मरुद्रेन्द्रसेवितम् ॥१ ॥

हरीतक्यक्ष्य ( क्ष ) धात्र्यश्च मरीचं पिप्पली शिफा । वह्निः शुण्ठी पिप्पली च गुडूची ' वचनिम्बकाः ॥२ ॥

की गोली मुँह में रखने से शत्रुओं के शस्त्रों का स्तम्भन होता है । सातवीं, पहली, चौथी तथा नवीं संख्यावाली ओषधियों का लेप लगाकर कोई जल में निवास कर सकता है ॥१३ ॥ पाँचवीं, दूसरी, चौदहवीं तथा ग्यारहवीं संख्यावाली ओषधियों

की गुटिका भूख, प्यास आदि को नष्ट कर देती है । तीसरी, सोलहवीं, चौथी तथा पाँचवीं संख्यावाली ओषधियों का लेप लगाने से असुन्दरी स्त्री भी सुन्दर हो जाती है ॥१४ ॥ तीसरी, दसवीं, दूसरी तथा चौथी संख्यावाली ओषधियों का लेप लगाने

से मनुष्य साँपों के साथ खेल सकता है । तीसरी, दसवीं, दूसरी, ग्यारहवीं तथा आठवीं संख्यावाली ओषधियों का लेप लगाने से स्त्री सुख से प्रसव करती है ॥१५ ॥ सातवीं, चौथी, नवीं संख्यावाली ओषधियों का लेप लगाकर सम्भोग करने से पुत्रोत्पत्ति

होती है । नवीं, चौथी, आठवीं, तीसरी तथा दसवीं संख्यावाली ओषधियों की गोली से वशीकरण होता है । चौथी तथा दूसरी संख्यावाली ओषधियों का प्रभाव तो ( पहले ) ही बताया जा चुका है ॥१६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वश्यादियोग - वर्णन नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१४० ॥

अध्याय १४१ षट्त्रिंशत्पदज्ञान - वर्णन ईश्वर बोले - अब मैं छत्तीस कोष्ठों में स्थित ओषधियों का फल बतला रहा हूँ । अमर बनानेवाली हैं, इसीलिए ब्रह्मा, रुद्र तथा इन्द्र ने ( भी ) इनका सेवन किया है ॥१ ॥

आँवला, मरीच, पिप्पली, शिफा ( बरगद आदि का लटकनेवाला मूल ), वहि ( चित्रक वृक्ष ) १ क. ङ. च. धृतम् । २ क. ङ. ' शाहिदशनेत्रैस्तेयात्पीडावप ' । ३ सप्तदिड् सुतः ४ ग. ' श्चद्युतजिद्धस्तलेपनः । त्रि । ५ ख ' ग, हान्नि त्रि । ६ क. ङ. शफाः । ७ क. ख. ङ. CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ये ओषधियाँ मनुष्यों को हरीतकी ( हर्रे ), बहेड़ा, , सोंठ, गुरुच, बच, नीम, क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ' ची चव्यनि ' ।

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४ ९ १ वासकः शतमूली च सैन्धवं सिन्धुवारकम् । कण्टकारी मो ( गो ) क्षुरका ' बिल्वं पौनर्नवं बला ॥३ ॥

एरण्डमुण्डीरुचको भृङ्गः क्षारोऽथ पर्पटः I । धन्याको जीरकश्चैव शतपुष्पी ज ' ( य ) वाणि ( नि ) का ॥४ ॥

विडङ्गः खदिरश्चैव कृतमालो हरिद्रया । वचा सिद्धार्थ एतानि षट्त्रिंशत्पदगानि हि ॥५ ॥

क्रमादेकादिसंज्ञानि ह्योषधानि महान्ति हि 1 । सर्वरोगहराणि स्युरमरीकरणानि च ॥६ ॥

वलीपलित तृण सर्वकोष्ठगतानि तु । एषां चूर्णं च वटिका रसेन परिभाविता ॥७ ॥

अवलेहः कषायो वा मोदको गुडखण्डकः । मधुतो " घृततो वाऽपि घृतं तैलमथापि वा ॥८ ॥

सर्वात्मनोपयुक्तं हि मृतसंजीवनं भवेत् । कर्षार्थं कर्षमेकं वा पलार्धं पलमेककम् ॥९ ॥

यथेष्टाचारनिरतो जीवेद्वर्षशतत्रयम् । मृतसंजीवनीकल्पे ' योगो नास्मात्परोऽस्ति हि ॥१० ॥

प्रथमान्नवकाद्योगात्सर्वरोगैः प्रमुच्यते । द्वितीयाच्च तृतीयाच्च चतुर्थान्मुच्यते रुजः ॥ ११ ॥

एवं षट्काच्च प्रथमाद्वितीयाच्च तृतीयतः । चतुर्थात्पञ्चमात्षष्ठास्तथा नव चतुष्कतः ॥ १२ ॥

एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्सप्ताष्टमतोऽनिलात् । अग्निभास्करषड्विंशसप्तविंशैश्च पित्ततः ॥१३ ॥

बाणर्तुशैलव ' सुभिस्तिथिभिर्मुच्यते कफात् । वेदाग्निभिर्बाणगुणैः षड्गुणैः स्याद्वशे धृते ॥१४ ॥

वासक ( रुसा ), शतमूली, सैन्धव, सिन्धुतारक ( म्योड़ी ), कण्टकारि ( भटकैया ), गोक्षुरका ( गोखरू ), बिल्व, पुनर्नवा, बला ( बरिआरा ), रेंड़ी, मुण्डी, रुचक ( विजौरा नींबू ), भृङ्गराज, क्षार, पर्पट, धनिया, जीरा, सौंफ, अजवायन, बायविडङ्ग, खदिर ( खैर ), कृतमाल ( अमलतास ), हल्दी, सफेद सरसों - ये छत्तीस कोष्ठोंवाली ओषधियाँ हैं ॥२-५ ॥ इनकी संख्या क्रमशः एक - दो आदि हैं । ये महती ओषधियाँ समस्त रोगों का हरण करनेवाली तथा ( मनुष्य को ) अमर बनानेवाली हैं । इनमें से प्रत्येक कोष्ठ की ओषधि बालों की सफेदी तथा अङ्गों की झुर्रियाँ दूर करने में समर्थ हैं । इनका चूर्ण, रस में भिगोयी हुई इनकी वटी, अवलेह ( चटनी ), काढ़ा, लड्डू, गुड़, शक्कर, मधु-घी या घी - तेल के साथ सेवन करने से मुर्दे में भी जान आ जाती है । इन ओषधियों का आधे, एक - दो या चार तोले की नाप से नित्य सेवन करनेवाला मनुष्य यथेच्छ आहार - विहार करने पर भी तीन सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है । मृतसंजीवनी ओषधियों की कोटि में इनसे बढ़कर कोई ओषधि ही नहीं है ॥६-१० ॥ प्रथम तथा नवम संख्या की ओषधियाँ रोगों को दूर करनेवाली हैं । इसी प्रकार दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं तथा छठीं संख्या की ओषधियों से भी रोगों का निवारण होता है ॥११ ॥ पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं तथा आठवीं

संख्या की ओषधियाँ वायु रोग को दूर करती हैं । तीसरी, बारहवीं, छब्बीसवीं और सत्ताईसवीं संख्यावाली ओषधियाँ पित्त - विकार को दूर करती हैं ॥१२-१३ ॥ पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं तथा पन्द्रहवीं संख्या की ओषधियाँ कफ के विकार को दूर करती हैं । चौथी, तीसरी, पाँचवीं तथा छठी संख्या की ओषधियों का सेवन करने से वशीकरण १ क. ङ. ' काविडङ्गो नर्तकं ब । २ क. ङ. समानिका । ३ सर्वरोग करणानि च क. ङ पुस्तकयोर्नास्ति । ४ क. सयुतो । ५ क. ' तोयाम्भोघृ । ६ क. ङ. ' नोययुक्तं । ७ क. ङ. ' ष्टा वाचिनि । ८ क. ङ. ' नी कोन्यो यो । ९ क. ङ. ' शैववसुतिस्ति ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 496

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४ ९ २ अग्निपुराणम् ग्रहादिग्रहणान्तैश्च ' सर्वैरेव विमुच्यते ॥ एकद्वित्रिरसैः शैलेर्वसुग्रहशिवैः क्रमात् ॥ १५ ॥

द्वात्रिंशत्तिथिसूर्यैश्च नात्र कार्या विचारणा । षट्त्रिंशत्पदकज्ञानं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ १६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये षट्त्रिंशत्पदकज्ञानाख्यानं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥

अथ द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः मन्त्रौषधादि ईश्वर उवाच मन्त्रौषधानि चक्राणि वक्ष्ये सर्वप्रदानि च । चौरनाम्नो वर्णगुणो विघ्नो मात्राश्चतुर्गुणाः || १ || ' नाम्ना ' हृते भवेच्छेषश्चौरोऽथ जातकं वदे । प्रश्ने ये विषमा वर्णास्ते गर्भे पुत्रजन्मदाः || २ || नामवर्णैः समैः काणो वामेऽक्ष्णि विषमैः पुनः । दक्षिणाक्षि भवेत्काणं स्त्रीपुंनामाक्षरस्य च ॥ ३ ॥

मात्रावर्णाश्चतुर्निघ्ना ' वर्णपिण्डे गुणे कृते । समे स्त्री विषमे ना ' स्याद्विशेषे च मृतिः स्त्रियाः १० ॥४ ॥

की सिद्धि होती है । एक, दो, तीन, छह, सात, आठ, नौ, ग्यारह, बत्तीस, पन्द्रह तथा बारह संख्यावाली ओषधियों का सेवन करने से ग्रह से लेकर ग्रहण तक सभी दोषों से छुटकारा मिल जाता है, इसमें कुछ संशय नहीं है । इन छत्तीस ओषधियों का ज्ञान हर किसी को ही नहीं कराना चाहिए ॥१४-१६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में षट्त्रिंशत्पदज्ञान - वर्णन नामक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१४१ ॥

अध्याय १ ९ ४२ मन्त्रौषध - वर्णन ईश्वर बोले - अब मैं मन्त्र और औषध आदि चक्रों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा, जो सभी फलों को देनेवाले होते हैं । चोर के नाम के वर्णों का द्विगुणित करके उन्हें उसमें रहनेवाली चौगुनी मात्राओं के साथ जोड़ देना चाहिए । इस प्रकार जो योग प्राप्त होता है उसे सम्भावित चोर के नाम के अक्षरों से विभक्त कर देना चाहिए । इस प्रकार जो शेष बचता है, उससे चोर का पता लगाना चाहिए ॥१-२ ॥ अब मैं जातकर्म के सम्बन्ध में बतला रहा हूँ । सन्तानोत्पत्ति के सम्बन्ध में पूछे गये प्रश्न में अदि अक्षरों की संख्या विषम होती हैं, तो पुत्र की प्राप्ति होती है । नाम के अक्षरों में समान अक्षर होने पर जो सन्तान उत्पन्न होती है, वह बायीं आँख से कानी होती है । विषम संख्या होने से कणत्व दोष दाहिनी आँख में रहता है । स्त्री और पुरुष के नामों के अक्षरों को उसमें रहनेवाली मात्राओं से गुणा करके गुणनफल को चार से विभाजित कर देना चाहिए । यदि भजनफल सम होगा तो पुत्र अन्यथा पुत्री उत्पन्न होगी । उपर्युक्त रीति से भाग करने पर जहाँ भजनफल तो विषम ही होता है, किन्तु कुछ शेष भी बच रहता है, वहाँ १ क. ङ. ' श्च कुष्ठै रे ' । ग. ' श्च कुष्ठं रे । २ क. ङ. ' रथैः शैलेर्धनुग्रहशिरैः क्र ' । ३ ग. " श प्रकटज्ञा ' । ४ क. ङ. ' गुणाद्विद्यामा ' । ५ नाम्ना वदे क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ६ ख. कृते । ७ क. ग. ' वेत्कोणः स्त्री ' । ८ क. ख. ङ. तुर्विग्नावर्णपिण्डैर्गुणैर्हते । ९ क. ख. ङ. ' शेषै ( षेऽ ) थ मृ ° । १० क. ख. ङ. स्त्रियाम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 497

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द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४ ९ ३ प्रथमं रूपशून्येऽथ प्रथमं भ्रियते पुमान् शनिचक्रं प्रवक्ष्यामि तस्य दृष्टिं परित्यजेत् एकद्व्यष्टद्वादशमः पाददृष्टिश्च ' तत्त्यजेत् शनिभागं त्यजेद्युद्धे दिनराहुं वदामि ते । अग्नौ कुजे भवेत्सौम्ये स्थिते राहुर्बुधे सदा । " वायौ संवेष्टयित्वा च शत्रुं हन्तीशसम्मुखम् अमावास्यां वायवे च राहुः सम्मुखशत्रुहा ' “ शुक्ले त्यजेत्कुज " गुणान्धाद्या मान्ताश्च पूर्वतः ॥ ' प्रश्नं सूक्ष्माक्षरैर्गृह्य द्रव्यैर्भोगेऽखिले मतम् ॥५ ॥

। राशिस्थः सप्तमे दृष्टिश्चतुर्दशशतेऽर्धिका ॥ ६ ॥

। दिनाधिपः प्रहरभाक्शेषा यामार्धभागिनः ॥७ ॥

रवौ पूर्वेऽनिले मन्दे गुरौ याम्येऽनले भृगौ ॥ ८ ॥

फणिराहुस्तु प्रहरमैशे वह्नौ च राक्षसे ॥९ ॥

। तिथिराहुं प्रवक्ष्यामि पूर्णिमाऽऽग्नेयगोचरे ॥१० ॥

। काद्या जान्ताः सम्मुखे ' स्युर्झाद्या दान्ताश्च दक्षिणे ॥११ ॥

याद्या हान्ता उत्तरे स्युस्तिथिदृष्टं विवर्जयेत् ॥१२ ॥

स्त्री की मृत्यु पति के पूर्व हो जाती है । किन्तु जहाँ इस प्रकार से किये गये भाग में भजनफल सम होता है और कुछ शेष भी बचा रहता है, वहाँ पति की मृत्यु पहले होती है । सूक्ष्म अक्षरों से प्रश्न करने पर अखिल भोग की प्राप्ति होती है ॥३-५ ॥ अब मैं शनि - चक्र का वर्णन करूँगा । उसकी दृष्टि का सर्वत्र त्याग करना है । किसी मास में किसी राशि में रहनेवाला शनि दिन के दूसरे, सातवें, आठवें और दसवें भाग के ऊपर अपनी दृष्टि डालता है तथा उसके चौथे और ग्यारहवें भागों के ऊपर आधी दृष्टि डालता है । शनि की वक्र - दृष्टि को यत्नपूर्वक बचाते रहना चाहिए । दिनाधिप नक्षत्र उस दिन के तीन घण्टों को प्रभावित करता है और शेष नक्षत्र दिन के आधे - आधे याम में अपना प्रभाव डालते हैं । युद्ध में शनि से प्रभावित दिनांश को बचा देना चाहिए । अब मैं आपसे सप्ताह के विभिन्न दिनों में परिवर्तित होनेवाली राहु की दशा का भी वर्णन करूँगा । रविवार को राहु की दृष्टि पूर्व की ओर, शनिवार को वायव्य की ओर, बृहस्पतिवार को दक्षिण की ओर, शुक्र और मङ्गल को अग्निकोण की ओर तथा बुधवार को उत्तर की ओर रहती है । जबकि फणि राहु की दृष्टि ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य एवं वायव्यकोण में एक - एक प्रहर रहती है और अपने सामने खड़े हुए शत्रु को आवेष्टित करके मार डालते हैं ॥ ६ - ९ ३ ॥ अब मैं भिन्न - भिन्न तिथियों में राहु की स्थिति का वर्णन करूँगा । पूर्णिमा और अमावस्या के दिन राहु की दृष्टि क्रमशः दक्षिण - पूर्व और पश्चिमोत्तर रहती है । उस समय अपनी ओर यात्रा करनेवाले शत्रु का राहु निश्चय ही नाश कर देता है । पश्चिम से पूर्व की ओर तीन खड़ी रेखाएँ खींचे और फिर इन मूलभूत रेखाओं का भेदन करते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर तीन पड़ी रेखाएँ खींचे । इस तरह प्रत्येक दिशा में तीन - तीन रेखाग्र होंगे । सूर्य जिस राशि पर स्थित हों, उसे सामनेवाली दिशा में लिखकर क्रमशः बारहों राशियों को प्रदक्षिण - क्रम से उन रेखाग्रों पर लिखे । तत्पश्चात् ' क ' से लेकर ' ज ' तक के अक्षरों को सामने की दिशा में लिखे । ' झू ' से लेकर ' द ' तक के अक्षर दक्षिण - दिशा मे स्थित रहें, ' ध ' से लेकर ' म ' तक के अक्षर पूर्व दिशा में लिखे जायँ । ' य ' से लेकर ' ह ' तक के अक्षर उत्तर दिशा में अङ्कित हों । ये राहु के गुण या चिह्न हैं । शुक्लपक्ष इनका त्याग करे तथा तिथि - राहु की सम्मुख दृष्टि का भी त्याग करे ॥ १०-१२ । अब मैं विष्टि १ प्रश्नं " मतम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ क. ख. ङ. ' श्च तं त्यजे । ३ क. ङ. भाङ्मेषाया । ४ ख. ग. कुण्डे क. ङ. ध्वजे । ५ क. ङ. श्रिये । ६ ख. ग. ' दा । यातिरा । ७ ख. ग. वायो स वेष्टयित्वाङ्ग शत्रुं हस्ती सं । ८ च. ' हा । व्याघाताद्याः पञ्चमेस्युः सीधादा ' । ९ क. ङ. पश्चिमे । १० शुक्ले पूर्वतः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ११ ख. ग. ' जेद्ध्वज ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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४ ९ ४ अग्निपुराणम् पूर्वाश्च दक्षिणास्तिस्त्रो रेखा वै मूलभेदके ' विष्टिराहुं प्रवक्ष्यामि अष्टौ रेखास्तु पातयेत् नैर्ऋताच्च नयेच्चन्द्रं चन्द्रादग्निं ततो जले ऐशान्यां च तृतीयादौ सप्तम्यादौ च श्याम्यके इन्द्रादीन्भैरवादींश्च ब्रह्माण्यादीन्ग्रहादिकान् यां दिशं वहते वायुस्तत्रस्थो घातयेदरीन् पुष्पोद्धता काण्डलक्ष्यं वारयेच्छरपुङ्खिका । सूर्यराश्यादि संलिख्य दृष्टी हानिर्जयोऽन्यथा ॥ १३ ॥

। शिवाद्यमं यमाद्वायुं वायोरिन्द्रं ततोऽम्बुपम् ॥१४ ॥

। जलादीशे चरेद्राहुर्विष्ट्या सह महाबलः ॥ १५ ॥

। एवं कृष्णे सिते पक्षे वायौ राहुश्च हन्त्यरीन् ॥१६ ॥

। अष्टाष्टकं च पूर्वादौ याम्यादौ वातयोगिनीम् ॥ १७ ॥

। दृढीकरणमाख्यास्ये " कण्ठे बाह्वादिधारिता ॥ १८ ॥

। तथाऽपराजितापाठाद्द्वाभ्यां खड्गं निवारयेत् ॥१९ ॥

ॐ नमो भगवति वज्रशृङ्खले हन हन, ॐ भक्ष भक्ष, ॐ खाद, ओम् " अरे रक्तं पिब कपालेन रक्ताक्षि रक्तपटे भस्माङ्गि भस्मलिप्तशरीरे वज्रायुधे वज्रप्राकारनिचिते पूर्वां दिशं बन्ध बन्ध, दक्षिणां दिशि बन्ध बन्ध ओमुत्तरां दिशि बन्ध बन्ध, पश्चिमां दिशि बन्ध बन्ध ‘ ( नागान्बन्ध बन्ध नागपत्नीर्बन्ध बन्ध, ओमसुरान्बन्ध बन्ध ॐ ) यक्ष-राक्षसपिशाचान्बन्ध बन्ध, ॐ प्रेतभूतगन्धर्वादयो ये केचिदुपद्रवास्तेभ्यो रक्ष रक्ष, ओमूर्ध्वं रक्ष रक्ष, अधो रक्ष रक्ष, ॐ क्षुरिकं बन्ध बन्ध, ॐ ज्वल महाबले घटि घटि, ॐ मोटि मोटि सटावलिवज्राग्निवज्रप्राकारे हुं फट्, ह्रीं हूं श्रीं फट्, ह्रीं हः, फूं फें फः सर्वग्रहेभ्यः सर्वव्याधिभ्यः सर्वदुष्टोपद्रवेभ्यो ह्रीमशेषेभ्यो रक्ष रक्ष ॥२० ॥

ग्रहज्वरादिभूतेषु सर्वकर्मसु योजयेत् ॥२१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये मन्त्रौषधादिवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥

राहु का वर्णन करूँगा । आठ रेखाओं को खींचकर राहु की स्थिति का ज्ञान इस प्रकार करना चाहिए । विष्टि राहु पूर्वोत्तर से दक्षिण की ओर, दक्षिण से पश्चिमोत्तर की ओर, पश्चिमोत्तर से पूर्व की ओर, पूर्व से दक्षिण - पश्चिम होता हुआ उत्तर की ओर जाता है । उत्तर से दक्षिण - पूर्व की ओर और वहाँ से पश्चिम की ओर होता हुआ पूर्वोत्तर की ओर जाता है । महाबली राहु विष्टि के साथ उपर्युक्त रीति से तृतीया के दिन पूर्वोत्तर दिशा में स्थित हो जाता है । सप्तमी को दक्षिण दिशा में चला जाता है । इस प्रकार शुक्ल और कृष्ण पक्षों में राहु वायव्यकोण में अपने शत्रुओं का वध करता है । इन्द्रादि, भैरवादि, ब्रह्म आदि और ग्रहादि को पूर्व इत्यादि दिशाओं में तथा वातयोगिनी को दक्षिण आदि दिशाओं में और जिस दिशा में वायु चलती है, उधर यह शत्रुओं का वध करता है ॥ १३-१७३ ॥ अब मैं दृढ़ीकरण का वर्णन करूँगा । इस यन्त्र को कण्ठ अथवा बाहु के ऊपर धारण करना चाहिए । पुष्य नक्षत्र में कण्डूलाक्ष्य कुचलकर अपराजिता मन्त्र पढ़ने से खड्ग की शक्ति क्षीण हो जाती है । अपराजिता मन्त्र यह है - ' ॐ नमो भगवति वज्रशृंखले‘ह्रीमशेषेभ्यो रक्ष रक्ष ' इस मन्त्र का विनियोग ग्रहज्वरादि सभी कर्मों में करना चाहिए ॥१८-२१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मन्त्रौषध - वर्णन नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१४२ ॥

१ क. ख. ङ. दृष्टिराहुं । २ क. ङ. ' विध्या स ° । ३ क. ङ. ' यामके । ४ क. ङ. कृष्णशते ज्याप्ये वा । ५ क. ङ. कण्ठबाह्वादिवारिवा । पु ' । ६ क. ङ. लक्षधारयेच्छरपुंषिका त ' । ७ ग. च. अहे । ८ ' नागान्बन्ध ” “ ओमसुरान्बन्ध बन्ध ॐ ' क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ४ ९ ५ अथ त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कुब्जिकापूजा ईश्वर उवाच कुब्जिकाक्रमपूजां च वक्ष्ये सर्वार्थसाधनीम् । ययाऽसुरा जिता देवैः शस्त्राद्यै राज्यसंयुतैः ॥ १ ॥

मायाबीजं च गुह्याङ्गे षट्कमस्त्रं करे न्यसेत् । काली कालीति हृदयं दुष्टचाण्डालिका शिरः ॥२ ॥

ह्रीं स्फें ह स ख क छ ड ओंकारो भैरवः शिखा । भेलखी कवचं दूतीनेत्राख्या रक्तचण्डिका ॥ ३ ॥

ततो गुह्यकुञ्जिकास्त्रं मण्डले स्थानके यजेत् । अग्नौ कूर्चशिरो रुद्रे नैर्ऋत्येऽथ शिखाऽनिले ॥४ ॥

कवचं मध्यतो नेत्रमस्त्रं दिक्षु च मण्डले । ' द्वात्रिंशता कर्णिकायां स्त्रों हसक्षमलनववषट्सचात्ममन्त्रबीजकम् ॥५ ॥

ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डिकेन्द्रकात् ॥६ ॥

' यजेद्रवलकसहाञ्शिवेन्द्राग्नियमेऽग्निपे । जले तु कुसुममालामद्रिकाणां च पञ्चकम् ॥७ ॥

जालंधरं पूर्णगिरिं कामरूपं क्रमाद्यजेत् । ( मरुदीशाग्निनैर्ऋत्ये मध्ये वै वज्रकुब्जिकाम् ॥८ ॥

अध्याय १४३ कुब्जिका- पूजा ईश्वर बोले- अब मैं सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करनेवाली कन्या की क्रम - पूजा का वर्णन करूँगा, जिसके प्रभाव से देवताओं ने आज्य लगे हुए शास्त्रास्त्रों द्वारा असुरों को जीत लिया था ॥ १ ॥ साधक को मायाबीज मन्त्र से गुप्ताङ्गों

का न्यास, छह अस्त्रमन्त्रों से करन्यास, ' काली - काली ' शब्दोच्चारण से हृदयन्यास, ' दुष्टचाण्डालिका ' शब्दोच्चारण से मस्तकन्यास करना चाहिए । ' ही स्फें ह स ख क छ ड ओंकारो भैरव: ' - इस मन्त्र से शिखा का न्यास करना चाहिए । भेलखी देवी को कवच समझना चाहिए । रक्तचण्डिका तथा दूती देवी का ध्यान आँख की पुतली के ऊपर करना चाहिए । तदनन्तर गुह्यकुञ्जिकास्त्र नामक मन्त्र से मण्डल स्थल में पूजा करनी चाहिए । फिर दक्षिण - पूर्व, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण-पश्चिम कोण में कूर्चशिर मन्त्र का और पश्चिमोत्तर कोण में शिखा मन्त्र का पूजन करना चाहिए । मण्डल के बीच में कवच मन्त्र और दिशाओं में नेत्रास्त्र मन्त्र से पूजन करना चाहिए । बत्तीस पत्तों से युक्त कमल के ऊपर ह सक्षम ल न व वषट् स च अक्षरों से युक्त आत्मबीज मन्त्र की पूजा करनी चाहिए ॥ २-५ ॥ तत्पश्चात् पूर्व दिशा में ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा और चण्डिका की पूजा करके पूर्वोत्तरकोण, पूर्व दिशा, दक्षिण - पूर्व कोण तथा दक्षिण दिशा में कुसुममाला देवी तथा जालंधर, पूर्णगिरि और कामरूप आदि पाँच पर्वतों की पूजा करनी चाहिए ॥६-७३ ॥ तदनन्तर पश्चिमोत्तर कोण, पूर्वोत्तर कोण, दक्षिण - पूर्व कोण, दक्षिण - पश्चिम कोण तथा मध्य में १ ख. ग. ' ति क्रुद्भूतीदु ' । २ क. ङ. ' ग्नौ कृत्वा शि ' । ३ क. ख. ग. ङ. ' त्रिंशार्णाक ' । ४ यजेद्रवल " पञ्चकम् नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ५ मरुदीशान " गणपं यजेत् ङ. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 500

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अग्निपुराणम् ४ ९ ६ अनादि विमलः पूज्यः सर्वज्ञविमलस्ततः । समयाख्योऽथ विमल एतद्विमलपञ्चकम् । कुब्जार्थं खिङ्खिनी षष्ठी ' सोपन्ना सुस्थिरा तथा । मित्र ' औडीशषष्ठ्याख्यौ वर्षा अग्न्यम्बुपेऽनिले " बुं मर्त्यः पञ्चनामाख्यो मरुदीशानवह्निगः तिस्रो ह्यासां महावृद्धाः पञ्चप्रणवतोऽखिलाः ॐ एं गूं " क्रमगणपतिं प्रणवं बटुकं यजेत् वामे च बटुकं कोणे गुरून् षोडशनाथकान् ब्रह्माद्याश्चाष्ट परितस्तन्मध्ये न नवात्मकः इत्यादिमहापुराण प्रसिद्धविमलश्चाथ संयोगविमलस्ततः ॥९ ॥

मरुदीशाननैर्ऋत्ये वह्रौ चोत्तरशृङ्गके ॥१० ॥

रत्नसुन्दरी चैशाने शृङ्गे चाऽऽष्टादिनाथकाः ॥११ ॥

। भवेद्गगनरलं स्याच्चाऽऽप्ये कवचरत्नकम् ॥१२ ॥

। याम्याग्नेये पञ्चरत्नं ज्येष्ठा रौद्री तथाऽन्तिका ॥१३ ॥

। सप्तविंशत्यष्टाविंशभेदात्संपूजनं द्विधा ॥१४ ॥

। चतुरस्रे मण्डले च दक्षिणे गणपं यजेत् ) ॥ १५ ॥

। वायव्यादौ चाष्ट ( ष्टा ) दश ' प्रतिषट्कोणके ततः ॥१६ ॥

। कुब्जिका कुलटा ' चैव क्रमपूजा तु सर्वदा ॥१७ ॥

आग्नेये कुब्जिकापूजाकथनं नाम त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥

वज्रकुब्जिका की पूजा करके अनादिविमल, सर्वज्ञविमल, प्रसिद्धविमल, संयोगविमल और समयविमल इन पाँच विमलों की पूजा करनी चाहिए ॥८ - ९ ३ ॥ तत्पश्चात् पश्चिमोत्तर कोण, पूर्वोत्तर कोण, दक्षिण - पश्चिम कोण, दक्षिण - पूर्व कोण तथा मण्डल के उत्तरीय भाग में कुब्जा, खिङ्खिनी, षष्ठी, सोपन्ना, सुस्थिरा, रत्नसुन्दरी की पूजा करके पूर्वोत्तर कोण में आठ आदिनाथों की पूजा करनी चाहिए || १०-११ ॥ तदनन्तर दक्षिण - पूर्व कोण, पश्चिमोत्तर कोण और पश्चिम दिशा में मित्र, औडीश, षष्ठी तथा वर्षा की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर पश्चिम दिशा में गगनरत्न तथा कवचरत्न की पूजा करनी चाहिए । उसके बाद मनुष्य को पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिण - पूर्व कोणों में ' बुं ' अक्षर तथा पञ्चजन की पूजा करके दक्षिण - दिशा और दक्षिण - पूर्व कोण में पञ्चरत्न, ज्येष्ठा, रौद्री तथा अन्तिका की पूजा करनी चाहिए । इन देवियों के साथ प्रणवसहित पाँच महावृद्धों की भी पूजा करनी चाहिए । सत्ताईस और अट्ठाईस के भेद से पूजन दो प्रकार का होता है । ‘ ॐ एं गूं ' इस मन्त्र से गणपति, प्रणव तथा बटुक की पूजा करनी चाहिए । फ़िर दक्षिण दिशा में चौकोर मण्डल के ऊपर गणेश की पूजा करनी चाहिए ॥१२-१५ ॥ वाम भाग में बटुक और कोण में गुरु तथा सोलह नाथों की पूजा करनी चाहिए । तत्पश्चात् पश्चिमोत्तर आदि दिशाओं में प्रत्येक छठे कोण में अठारह गुरुओं की पूजा करके मण्डल के बाहरी आठ कोष्ठों में ब्रह्मा आदि देवताओं की पूजा करनी चाहिए । कुब्जिका तथा कुलटा देवी की पूजा सदैव कर लेनी चाहिए ॥१६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कुब्जिका पूजा वर्णन नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१४३ ॥

१ ख. ग. पृष्टः । २ प्रसिद्ध “ ततः क. च. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ ख. ग. घ. पृष्ठा । ४ ग. ' ऋतुद्रीश ' । ५ ख. ग. त्रूं । ६ ख. ग. ह्निगम् " । या । ७ च हूं । ८ क. ङ. ' तिपक्षोंऽशके । ९ क. ङ. कुटिलास्फोकं क ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA