अग्नि पुराण — पृष्ठ 61–70

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 61–70

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५७ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० २ ९ १ गजशान्ति ९ ० ९ २४ गज- -रोगनाशक शान्ति - प्रयोग । २ ९ २ गवायुर्वेद ९ १२ ४४ गौ का माहात्म्य - वर्णन । महासान्तपन व्रत - कथन । कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र और तप्तकृच्छ्र आदि व्रतों का कथन । गोमती विद्या के जप से गोलोक की प्राप्ति का वर्णन । गो-रोग नाशक तेल आदि का कथन । २ ९ ३ मन्त्र - परिभाषा स्त्री, पुरुष, नपुंसक के भेद से मन्त्र की जातियों के तीन प्रकार । स्त्री आदि मन्त्रों के लक्षण । गुरु - लक्षण । शिष्य - लक्षण । कपट से मन्त्र - ग्रहण करने की अनर्थकता । मन्त्र जप का विधान आदि । अंग सहित मन्त्रों का सिद्धिदायकत्व कथन । २ ९ ४ नाग - लक्षण शेष, वासुकि, तक्षक आदि का प्रधानत्वेन वर्णन । विविध नाग जातियों का वर्णन । प्रस्थान - काल में शुभ शकुन आदि का कथन । २ ९ ५ डँसे ' हुए की चिकित्सा विष के दो प्रकार । विषनाशक तार्क्ष्य आदि का कथन । २ ९ ६ पञ्चाङ्ग रुद्र - विधान विष व्याधिनाशक पञ्चांग मन्त्रों का कथन । विषहरण करनेवाले कुब्जिका आदि देवताओं का कथन । २ ९ ७ विषहारक मन्त्र और औषध विषनाशक औषध- -कथन । २ ९ ८ सर्पादि की चिकित्सा सर्पादि के विषनाशक औषध । मन्त्रपूर्वक औषध सेवन का विधान । २ ९९ बालादि ग्रहनाशक बालतन्त्र बलपीड़ा - निवर्तक धूप आदि का विधान । देवता के उद्देश्य से बलिदान आदि का विधान । बालग्रह नाशक मन्त्रों का कथन । ३०० ग्रहनाशक मन्त्रों का कथन गुरु और देवता आदि के कोप होने पर पाँच प्रकार के रोगों की उत्पत्ति । शून्य गृह आदि में ग्रहों की स्थिति आदि का वर्णन | ग्रहों से गर्भिणी आदि को होनेवाली पीड़ाओं का वर्णन । सूर्यादि ग्रहों की पूजन विधि । ग्रह - -दोष द - निवारक अञ्जन आदि का कथन । ९ १६ ५१ ९ २१ ४१ ९ २५ ३६ ९ २ ९ २१ ९ ३१ १२ ९ ३२ २४ ९ ३५ ५५ ९ ४१ ३५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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५८ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० ३०१ सूर्यार्चन गणपति - मन्त्र - कथन । विशेषतः चतुर्थी तिथि में गणेश - पूजन आदि का विधान । सूर्यादि ग्रहों का पूजन । सूर्य को अर्घ्य प्रदान | सूर्यादि के पूजन से युद्ध में जय प्राप्ति आदि का वर्णन । ३०२ नानामन्त्रौषध - कथन मन्त्र द्वारा अनुष्ठान करने से खोये हुए राज्य की पुन: प्राप्ति । वशीकरणादि औषध-कथन । लेप लगाने से प्रसव । गोरक्षकमन्त्र का कथन । ३०३. अङ्गाक्षरार्चन मन्त्र - कथन वासुदेवादि देवताओं का पूजन - विधान । ३०४ पञ्चाक्षर आदि पूजा - मन्त्र शिष्यों की दीक्षा का विधान । अनन्त योग पीठ पर तत्पुरुष और पूजन - विधान । दीक्षा में शिष्य के नामकरण आदि ३०५ पचपन विष्णु नाम ३०६ नारसिंह आदि मन्त्र मन्त्र - जप से क्षुद्र ग्रह, महामारी आदि रोगों का नाश । ३०७ त्रैलोक्यमोहन- मन्त्र विष्णु - पूजा, जप, होमादि का विधान । ३०८ त्रैलोक्यमोहनी लक्ष्मी आदि की उस देवता का मन्त्र - कथन । ३० ९ त्वरिता पूजा त्वरिता के ध्यान - पूजनादि का कथन । ३१० त्वरिता मन्त्रादि प्रणीता आदि मुद्रा का विधान । ३११ त्वरिता के मूल मन्त्रादि पूजा, जप, होम आदि का विधान । ३१२ त्वरिता विद्या विद्या प्रस्ताव का कथन । मुखस्तम्भन आदि के प्रयोग । का वर्णन । आदि मूर्तियों का स्थापन का विधान । पूजा त्वरिता विद्या की महिमा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ९ ४४ ३८ ९ ४८ ३१ ९ ५१ १७ ९ ५३ ४१ ९ ५७ १७ ९ ५८ २२ ९ ६१ ३८ ९ ६४ ३१ ९ ६७ २० ९ ६ ९ ४३ ९ ७३ ३७ ९ ७७ २५

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५ ९ अध्याय विषय ३१३ नाना मन्त्र विनायक अर्चनादि का प्रयोग । शत्रु का उच्चाटन । गौरी मन्त्र से अनुष्ठान आदि का विधान । ३१४ त्वरिता -ज्ञान - ३‍ त्वरिता पूजन - विधि । निग्रहानुग्रह चक्र लेखन आदि का विधान । ३१५ स्तम्भनादि मन्त्र ३१६ नाना मन्त्र काल के द्वारा डँसे हुए के जीवनादि मन्त्र का निरूपण । ३१७ सकलादिमन्त्रोद्धार ब्रह्म पंचक कथन । प्रासाद मंत्रादि कथन । पञ्चांग सदाशिव वर्णन | ३१८ शिव गायत्री कथन । द्वार और का पूजन । जप - होमादि का ३१ ९ मण्डल सहित वागीश्वरी का पूजन से कवित्व शक्ति की ३२० गणपूजा उपद्वार में बनाये गये विघ्नमर्द नामक विधान । वागीश्वरी पूजा पूजन । कपिला गाय के घी से होम प्राप्ति । मण्डल - कथन सर्वतोभद्रक आदि मण्डल का विधान । ३२१ अघोरास्त्रादि शान्ति कथन । विद्येश्वर मण्डल में गणपति करने का विधान । शिवादि अस्त्र पूजन । ग्रह पूजन से ग्यारह स्थानों में फल प्राप्ति का कथन । सर्वोत्पात विनाशक अस्त्र - शान्ति - विधान । ३२२ पाशुपत शान्ति ३२३ छह अंगोंवाले अघोरास्त्र का कथन वशीकरण आदि मन्त्रों का विधान । शतावरी आदि चूर्ण के सेवन कथन । महामृत्युंजय आदि मन्त्रों का कथन । रुद्रशान्ति - कथन ३२४ रुद्र शान्ति का फल कथन । से पुत्र - लाभ का पृ ० सं ० श्लोक सं ० ९ ७ ९ ३७ ९ ८२ २५ ९ ८५ १ ९ ९ ८७ ७ ९ ८८ ३४ ९९ २ २२ ९९ ४ ११ ९९ ५ ४८ १००० १६ १००२ ३ १००३ ३७ १००७ ३१ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६० अध्याय विषय पृ ० ३२५ अंशकादि - कथन रुद्राक्ष धारण विधान । मन्त्र सिद्धों द्वारा सिद्धादि अंश का कथन । ३२६ गौरी आदि की पूजा मन्त्र, ध्यान, मण्डल, मुद्रा, होम आदि का कथन । गौरी पूजा फल निरूपण । मृत्युंजयार्चन कथन । उनके ३२७ माला जप विधि का निरूपण देवालय बनाने का विधान । ३२८ ३२ ९ यजुओं की छह अक्षरोंवाली पूजन का फल निरूपण । देवालय - माहात्म्य । शिवलिंग पूजा की महिमा का छन्दःसार छन्दःसार गायत्री । ऋचाओं की अठारह भेद निरूपण । गायत्री का छन्द निरूपण । ३३० छन्दःसार वर्णन । वित्त के अनुसार अक्षरोंवाली गायत्री का पाद भेद से छन्दों का भेद कथन । छन्दों के देवता का कथन । ३३१ उत्कृति ३३२ ३३३ ३३४ ३३५ ३३६ छन्दजाति का निरूपण आदि छन्दों की जाति का कथन । विषमवृत्त कथन अर्धसमवृत्त निरूपण समवृत्त निरूपण प्रस्तार निरूपण शिक्षा निरूपण कण्ठस्थान आदि का निरूपण । ३३७ काव्य आदि का लक्षण काव्य लक्षण, गद्य - पद्य आदि भेद से काव्य का तीन प्रकार से वर्णन । आख्यायिका आदि भेद से गद्य काव्य का पाँच प्रकार । आख्यायिका आदि का लक्षण । पद्य-कुटुम्बादि का कथन । महाकाव्य लक्षणादि कथन । ३३८ नाटक - निरूपण नाटक प्रकरण आदि का भेद निरूपण । नाट्य - लक्षण । पूर्व रंग में नान्दी मुख लक्षण । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० १०१० २३ १०१२ २७ १०१५ १ ९ १०१७ ३ Mr १०१८ J १०१ ९ २३ १०२२ १ ९ १०२६ १० १०२८ ६ w १०२ ९ ३० १०३३ १०३५ २२ १०३८ ३ ९ १०४२ २७

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अध्याय नटी, विदूषक, सिद्धोत्प्रेक्षितादि ३३ ९ रति, हास आदि वर्णन । धीरोदात्त ३४० पाञ्चाली, गौड़ी ३४१ ६१ विषय पारिपार्श्वक आदि पात्रों का कथन । के भेदों का कथन । श्रृंगारादि रसों का निरूपण का लक्षण । विभाव का आलम्बन - उद्दीपन आदि नायकों का भेद । भाषण आदि का रीति निरूपण आदि भेद से रीति - निरूपण । कथोद्घात लक्षण । भेद से दो प्रकार का स्वरूप - कथन । नृत्य आदि में अंग कर्मों का निरूपण स्त्रियों के लीला - विलास आदि भेद से शरीर चेष्टा विशेष का कथन । शिरःकम्पन से आकम्पित आदि भेद के द्वारा तेरह प्रकार का वर्णन । सात प्रकार से भृकुटि-प्रदर्शन । तारक आदि का नवधा कर्मादि कथन । ३४२ अभिनय आदि का निरूपण अभिनय लक्षण । रस आदि के विनियोग का कथन । शृंगार के सम्भोग, विप्रलम्भ भेद से दो प्रकार का कथन । पुनः उन भेदों का निरूपण । हास आदि का लक्षण । करुण आदि रसों के भेद का निरूपण । शब्दालंकार लक्षण । ३४३ शब्दालंकार अनुप्रास आदि अलंकारों का कथन । चक्रबन्ध आदि का निरूपण । गोमूत्र आदि अनेक बन्धों का कथन । ३४४ अर्थालंकार सादृश्य आदि अलंकारों का निरूपण । उनके लक्षणों का निरूपण । ३४५ शब्दार्थालंकार प्रशस्ति इत्यादि से छह भेदों का कथन । उनके लक्षण का कथन । ३४६ काव्यगुण - विवेक शब्दगुण - कथन । गुण लक्षण । प्रसाद आदि गुणों का लक्षण । द्राक्षा एवं नारिकेल पाकों का कथन । ३४७ काव्यदोष - विवेक श्रव्य काव्यों के उद्वेगजनक दोष का सात प्रकार से वर्णन । असाधुत्व और अप्रयुक्तत्व दोषों का पदनिग्रहत्वेन प्रतिपादन और उन दोनों के शब्दशास्त्र विरुद्ध होने से पृ ० सं ० श्लोक सं ० १०४४ ५४ १०४ ९ ११ १०५० २१ १०५२ ३३ १०५५ ६५ १०६१ ३२ १०६४ १८ १०६६ २५ १०६ ९ ४० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 66

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६२ विषय पृ ० अध्याय असाधुत्वेन कथन । छान्द सत्त्व, अविस्पृष्टत्व आदि दोषों का कथन । उनका लक्षण-कथन । विसन्धि आदि दोषों का कथन । ३४८ एकाक्षराभिधान ( कोश ) एकाक्षर मन्त्र निरूपण । मातृका मन्त्र कथन । नवदुर्गा का पूजन विधान । गणपति मन्त्र कथन । स्वाहान्त मन्त्र से हवन - पूजन विधान । ३४ ९ व्याकरण - सार प्रत्याहार साधक सूत्रों का कथन । अण् आदि प्रत्याहारों का कथन । ३५० संधिसिद्ध रूप ' दण्डाग्र ' आदि उदाहरणों का निरूपण । ३५१ सुब्विभक्ति का सिद्धरूप विभक्ति पदवाच्य सुप् तिङ् का कथन । स्वादि विभक्ति का निरूपण । अजन्त, हलन्त के भेद से प्रातिपदिक का दो प्रकार से कथन । पुनः उनका पुंल्लिङ्गत्व आदि भेद से तीन प्रकार का वर्णन । वृक्षादि सिद्ध रूपों का कथन । ३५२ स्त्रीलिंग शब्दों का सिद्ध रूप रमा आदि रूपों का कथन । ३५३ नपुंसक शब्दों का सिद्ध रूप ३५४ कारक ‘ अभिहित ’ और ‘ अनभिहित ' के भेद से कर्त्ता के उत्तमत्व और अधमत्व का कथन । कर्मसंज्ञा आदि का निरूपण । ३५५ समास तत्पुरुष आदि समास का कथन । ३५६ तद्धित तद्धित का सिद्धरूप कथन । ३५७ उणादि के सिद्ध रूपों का कथन ३५८ तिङ् विभक्ति के सिद्धरूप ३५ ९ कृदन्त के सिद्धरूप सं ० श्लोक सं ० १०७३ २८ १०७६ ७ १०७७ १३ १०७ ९ ७३ १०८७ १३ १०८ ९ १० ९ १ २६ १० ९ ४ १ ९ १० ९ ७ ३० ११०१ १२ ११०२ ३० ११०५ ८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 67

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अध्याय ३६० ३६१ ३६२ ३६३ ३६४ ३६५ ३६६ ३६७ ३६८ ६३ विषय स्वर्ग - पातालादि वर्ग अव्यय वर्ग नानार्थ वर्ग भूमि, वनौषध आदि वर्ग मनुष्य, ब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्ग ब्रह्म वर्ग क्षत्रविट्शूद्र वर्ग सामान्य नामों के लिङ्ग प्रलय वर्णन पृ ० सं ० श्लोक सं ० ११०६ ९ ५ १११४ ३८ w १११८ ४१ x ११२२ ७८ 8 ११३० २ ९ x ११३३ ११ x ११३४ ४ ९ x ११३ ९ २८ x ११४२ २७ नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत, आत्यन्तिक आदि भेदों से चार प्रकार के प्रलयों का वर्णन । 2 ३६ ९ आत्यन्तिकलय और गर्भोत्पत्ति का निरूपण शारीरिक और मानसिक भेद से आध्यात्मिक सन्ताप का दो प्रकार से वर्णन । भोगदेह को त्यागकर कर्म से जीव का गर्भान्तर प्राप्त करने का कथन । शुभाशुभ कर्मफल निरूपण । गर्भ में स्थित जीव के प्रथम आदि मासों में तत्तत् अवयवों की उत्पत्ति का कथन । सात्त्विक आदि गुणों का लक्षण । देह में रुधिर आदि का गुण - कथन । ३७० शरीर के अवयव कर्मेन्द्रियों का निरूपण । देह में सात आशयों का कथन । पैर से लेकर सिर तक शरीर में सोलह जालों का निरूपण । ग्रीवा आदि अवयवों में नाड़ी का प्रमाण । ३७१ नरक - निरूपण ' शुभ कर्म करनेवाले पुरुषों के प्राण ऊर्ध्वगामी होते हैं ' यह कथन । याम्य मार्ग-कथन । तामिस्र आदि नरकों का निरूपण । पापियों के नाना प्रकार की यातनाओं का वर्णन । आध्यात्मिक आदि तापों का लक्षण । ३७२ यम - नियम अष्टांग योग निरूपण । बलपूर्वक दूसरे का धन हरण करने से पशु - पक्षी योनि की प्राप्ति होती है, यह कथन । मन पर विजय आदि का कथन । विष्णु - पूजन से उत्तम गति होती है, यह कथन । ३७३ आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ११४५ ४५ ११४ ९ ४३ ११५३ ४० ११५६ ३६ ११६० २१ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 68

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६४ विषय पृ ० अध्याय ३७४ ध्यान ध्यान - यज्ञ मुक्ति का साधन है, यह कथन । हृदय में विष्णु के ध्यानादि का कथन । ३७५ धारणा धारणा - लक्षण कथन । वारुणी धारणा । ऐशानी धारणा । धारणा आदि से साधक क्लेशरहित हो जाता है, यह कथन । ३७६ समाधि समाधि का लक्षण । योगी की प्रशंसा । योगी सूर्यमण्डल का भेदन तथा ब्रह्मलोक का अतिक्रमण करके श्रेष्ठ गति को प्राप्त करते हैं, यह निरूपण । की भी मुक्ति होती है, यह कथन । ३७७ ब्रह्मज्ञान देह आत्मा नहीं है, यह कथन । आत्मा का सर्वद्रष्टा होना, सर्वभोक्ता लिङ्ग शरीरादि की उत्पत्ति । ब्रह्मज्ञाता संसार से मुक्त हो जाता है, ३७८ ब्रह्मज्ञान ३७ ९ ब्रह्मज्ञान सदाचारी गृहस्थ होना, यह कथन । यह कथन । यज्ञों से देवताओं की प्राप्ति । तप से वैराग्य पद की प्राप्ति, कर्म - संन्यास से ब्रह्मपद की प्राप्ति, वैराग्य से कृति में लय, ज्ञान से कैवल्य ( मोक्ष ) की प्राप्ति, ये पाँच गतियाँ जीव की होती हैं, यह कथन । ब्रह्मज्ञान लक्षण आदि का कथन । ३८० अद्वैतब्रह्म - विज्ञान अन्तकाल में मृग का स्मरण करने से मृग की ही देह मिली, यह कथन । अद्वैतज्ञान के विषय में राजा और ब्राह्मण का संवाद । राजा और ब्राह्मण के संवाद में निदाघ ऋतु का संवाद कथन । ब्राह्मण के उपदेश से राजा की मुक्ति । ३८१ गीतासार ३८२ यमगीता गीता - पठन का फल । ३८३ आग्नेय महापुराण का माहात्म्य हेमन्त आदि में आग्नेय पुराण सुनने से अग्निष्टोमादि यज्ञों की फलप्राप्ति । आग्नेय पुराण के अन्तर्गत विषयक्रम का निरूपण । पुराणसंख्या - कथन । पुराणपाठक के पूजन आदि का निरूपण । पुस्तक - दान - प्रशंसा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA सं ० श्लोक सं ० ११६२ ३५ ११६५ २२ ११६७ ४४ ११७१ २४ ११७३ २३ ११७५ ३२ ११७८ ६८ ११८५ ५८ ११ ९ ० ३७ ११ ९ ३ ७२

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श्रीमद्द्द्वैपायनमुनिप्रणीतम् अग्निपुराणम् प्रथमोऽध्यायः प्रश्नाध्यायः ' श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम् । ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् नैमिषे हरिमीजाना वासुदेवं नमाम्यहम् ॥१ ॥

ऋषयः शौनकादयः । तीर्थयात्राप्रसङ्गेन स्वागतं सूतमब्रुवन् ॥२ ॥

ऋषय ऊचुः सूतं त्वं पूजितोऽस्माभिः सारात्सारं वदस्व नः । येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रजायते ॥३॥

सूत उवाच सारात्सारो हि भगवान् विष्णुः सर्गादिकृद्विभुः । ब्रह्माहमस्मि तं ज्ञात्वा सर्वज्ञत्वं प्रजायते ॥४ ॥

द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । द्वेविद्ये वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः ॥ ५ ॥

अहं शुकश्च पैलाद्या गत्वा वदरिकाश्रमम् । व्यासं नत्वा पृष्टवन्तः सोऽस्मान्सारमथाब्रवीत् ॥६ ॥

अध्याय १ प्रश्नाध्याय मैं ( व्यास ) लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, ईश्वर ( शिव ), ब्रह्मा, अग्नि और इन्द्र आदि देवताओं को तथा वासुदेव ( भगवान् कृष्ण ) को नमस्कार करता हूँ || १ || नैमिषारण्य में विष्णु का यज्ञ करते हुए शौनक आदि ऋषियों ने तीर्थयात्रा के सिलसिले में ( आये हुए ) सूत से स्वागत ( वचन ) कहा ॥२ ॥

ऋषियों ने कहा - हे सूत! हम सबने आपका पूजन किया । आप हमें सार से भी सार जो वस्तु है, उसका उपदेश करें जिसके जानते ही मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥३ ॥

सूत बोले - भगवान् विष्णु सार से भी सार, सृष्टि आदि करनेवाले तथा सर्वव्यापक हैं - उनको ' मैं ब्रह्म हूँ'-इस प्रकार जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥४ ॥ ब्रह्मद्वय को जानना चाहिए - शब्दब्रह्म और परब्रह्म को । दो विद्याओं

को जानना चाहिए - ऐसा अथर्ववेद में ( भी ) आया है ॥५ ॥ मैंने और शुक जी तथा पैल आदि ऋषियों ने बदरिकाश्रम

जाकर, ( वहाँ ) व्यास जी को प्रणाम करके ( उनसे पूछा । इसके बाद उन्होंने हमें सार वस्तु का उपदेश किया ॥६ ॥

१ लक्ष्मीमिति क्वचित्पुस्तके पाठः । २ विज्ञानमात्रेण इति ङ पुस्तके पाठः । ३ ' अपरं च परं च यत् ' इति कुत्रचित् पुस्तके पाठः । ४ क. ङ. ० त् । शु ° ५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६६ शुकाद्यैः शृणु सूत त्वं द्विविधं ब्रह्म वक्ष्यामि पुराणं परमाग्नेयं अग्निपुराणम् व्यास उवाच

वसिष्ठो मां यथाब्रवीत् ' । ब्रह्मसारं हि पृच्छन्तं मुनिभिश्च परात्परम् ॥७ ॥

वसिष्ठ उवाच

शृणु व्यासाखिलात्मगम् । यथाग्निम पुरा प्राह मुनिभिर्दैवतैः सह ॥ ८ ॥

ब्रह्मविद्याक्षरं परम् । ' ऋग्वेदाद्यपरं ब्रह्म ' सर्वदेवसुखं ' परम् ॥९ ॥

अग्निनोक्तं पुराणं यदाग्नेयं वेदसम्मितम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं पुण्यं पठतां शृण्वतां नृणाम् ॥१० ॥

कालाग्निरूपिणं विष्णुं ज्योतिर्ब्रह्म परात्परम् " । मुनिभिः पृष्टवान् देवं पूजितं ज्ञानकर्मभिः ॥ ११ ॥

वसिष्ठ उवाच संसारसागरोत्तारनावं २ ब्रह्मेश्वरं वद । विद्यासारं यद्विदित्वा सर्वज्ञो जायते नरः ॥ १२ ॥

अग्निरुवाच विष्णुः कालाग्निरुद्रोऽहं विद्यासारं वदामि ते । ब्रह्माग्नेयं पुराणं यत्सर्वं सर्वस्य कारणम् ॥१३ ॥

सर्गस्य प्रतिसर्गस्य वंशमन्वन्तरस्य च । वंशानुचरितादेश्च मत्स्यकूर्मादिरूपधृक् -१४ ॥१४ ॥

व्यास जी बोले- हे सूत! शुक आदि मुनियों के साथ तुम सुनो जैसा कि मुनियों के साथ मेरे द्वारा पूछे जाने पर - श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्व को वसिष्ठ जी ने कहा था ॥७ ॥

वसिष्ठ बोले- हे व्यास! सुनो! निखिल चराचर में व्याप्त रहनेवाले द्विविध ब्रह्म के विषय में प्राचीनकाल में अग्निदेव ने मुनियों और देवताओं के साथ मुझसे जैसा कहा था, उसे मैं कहूँगा || ८ || अग्निपुराण ब्रह्मविद्या, अक्षर, परमतत्त्व ऋग्वेदादि से अतिरिक्त परन्तु उनसे सम्मत और सब देवताओं को सुख देनेवाला परम ( उत्कृष्ट ) ब्रह्म ( अथवा ब्रह्मज्ञान ) है ॥ ९ ॥ इस वेदसम्मत पुराण को अग्निदेव ने कहा है इसीलिए इसका नाम अग्निपुराण

पड़ गया है, इसके पढ़ने और सुननेवालों को यह पुराण ( इस संसार में ) भोग और ( तदनन्तर ) मोक्ष प्राप्त कराता है ॥१० ॥ मैंने भगवान् कालाग्निदेव से पूछा था, जो ज्ञानकर्म में लगे हुए मुनियों से पूजित, परात्पर ब्रह्म, ज्योतिरूप

और विष्णुस्वरूप हैं । ११ ॥ वसिष्ठ बोले - हे देव! संसारसागर को पार करने के लिए नौकारूप, ज्ञानतत्त्व उस ब्रह्म - ईश्वर का उपदेश दें जिसे जान लेने से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥१२ ॥

अग्निदेव बोले - मैं कालाग्नि, विष्णु और रुद्र हूँ और मैं इस अग्निपुराण को तुम्हें सुना रहा हूँ, जो सम्पूर्ण विद्याओं का सार और सम्पूर्ण ज्ञान का कारण है॥१३ ॥ इस पुराण में सर्ग ( ईश्वरकृत सृष्टि ), प्रतिसर्ग ( कार्य सृष्टि और लय ),

वंश ( देवताओं और पितरों की वंशावली ), मन्वन्तर ( अर्थात् किस मनु का कब तक अधिकार रहता है ) तथा वंशानुचरित ( सूर्य - चन्द्र प्रभृति राजवंशों में उत्पन्न होनेवाले राजाओं के संक्षिप्त वर्णन ) और मत्स्य तथा कूर्म आदि रूपों को धारण करनेवाले भगवान् विष्णु का वर्णन है || १४ || हे द्विज! दो विद्याएँ भगवान् विष्णु हैं - एक परा विद्या है और दूसरी अपरा १ क. घ. यदब ' । २ ख. ङ. च. परापरम् । ३ इदमधिकम् । ४ ख. ग. द्वैविद्यं घ. द्वैविध्यम् । ५ क. ङ. ' लाध्वग ' । घ. ' लानुगम् । ६ क. ' दाघं प ' ङ. ' दादिप ' । ७ ख. ग. सर्ववेदमुखं । ८ घ. सुखावहम् । ९ घ. ङ. ' यं ब्रह्मसं । १० घ. ङ. दिव्यं । ११ क. ङ. ' रापरं । १२ क. ' त्तारं नादं ब्र ' । १३ क. ङ. विद्यासारं । १४ क. ङ. ' पकम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA