अग्नि पुराण — पृष्ठ 601–610

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 601–610

पृष्ठ 601

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चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ५ ९ ७ अथ चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः अष्टमीव्रतानि ' अग्निरुवाच ब्रह्मादिमातृयजनाज्जपेन्मातृगणाष्टमीम् कृष्णाष्टमीव्रतं वक्ष्ये मासे मार्गशिरे ( शीर्षे ) चरेत् भूमिशायी निशायां च शंकरं पूजयेद्व्रती 1 । महादेवं फाल्गुने च तिलाशी समुपोषितः । कुशोदाशी पशुपतिं ज्येष्ठे शृङ्गोदकाशनः । त्र्यम्बकं च भाद्रपदे बिल्वपत्राशनो निशि । दध्याशी होमकारी स्याद्वर्षान्ते मण्डले यजेत् । प्रार्थयित्वा द्विजान्भोज्य भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् पौरन्दरं पदं याति स्वर्गतिव्रतमुच्यते ) । कृष्णाष्टम्यां चैत्रमासे पूज्याब्दं कृष्णमर्थभाक् ॥१ ॥

। नक्तं कृत्वा शुचिर्भूत्वा गोमूत्रं प्राशयेन्निशि ॥ २ ॥

पौषे शम्भुं घृतं प्राश्य माघे क्षीरं महेश्वरम् ॥ ३ ॥

चैत्रे स्थाणुं यवाशी च वैशाखेऽथ ` शिवं यजेत् ॥४ ॥

आषाढे गोमयाश्युग्रं श्रावणे सर्वकर्मभुक् ॥५ ॥

तण्डुलाशी चाऽऽश्वयुजे ईशं रुद्रं तु कार्तिके ॥ ६ ॥

गोवस्त्रहेमं गुरवे दद्याद्विप्रेभ्य ईदृशम् ॥७ ॥

। ( ' नक्ताशी त्वष्टमीषु स्याद्वत्सरान्ते च धेनुदः ॥८ ॥

। अष्टमी बुधवारेण पक्षयोरुभयोर्यदा ॥९ ॥

अध्याय १८४ अष्टमीव्रत अग्निदेव बोले - चैत्र मास की कृष्णाष्टमी में आठ मातृकाओं का जप करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मा आदि ने भी मातृकाओं की पूजा की थी । कृष्ण की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है ॥१ ॥ अब मैं कृष्णाष्टमी व्रत का

वर्णन करूँगा । ( इसका विधान यह है कि ) मार्गशीर्ष की अष्टमी को दिनभर उपवास रखकर रात्रि में गोमूत्र पान करे, भूमि पर सोये और शंकर का पूजन करे । पौष मास की अष्टमी में घी पीना चाहिए और भगवान् शंकर का पूजन करना चाहिए । माघ में दुग्धपान तथा महेश्वर का पूजन करना चाहिए ॥२-३ ॥ फाल्गुन में तिलभोजन, शिवपूजन करना चाहिए । चैत्र में यवभक्षण तथा शंकर जी की पूजा करे । वैशाख में कुशोदक पान करके महेश्वर का पूजन करे ॥४ ॥ ज्येष्ठ में शृङ्गोदक पानकर पशुपति की अर्चना करे । आषाढ़ में गोबर खाकर त्रिशूली ( शंकर ) का यजन

करे । श्रावण में सभी कर्मों का भोग करते हुए त्र्यम्बक ( शिव जी ) की पूजा करे । भाद्रपद में बिल्वपत्र खाकर रात्रि में शंकर की पूजा करे । आश्विन में चावल खाकर शंकर जी की अर्चना करे । कार्तिक में दही खाकर रुद्र का पूजन करना चाहिए । वर्षान्त ( कार्तिक ) में मण्डल बनाकर हवन तथा गुरु और ब्राह्मणों को गाय, वस्त्र तथा सुवर्ण का दान करना चाहिए ॥५-७ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणों की प्रार्थना करके उन्हें भोजन कराना चाहिए । ऐसा करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । वर्ष की सभी अष्टमियों में रात्रि को भोजन करनेवाला और ब्राह्मणों को गायों का दान देनेवाला इन्द्रलोक को प्राप्त कर लेता है । इस व्रत को स्वर्गदायक व्रत भी कहते हैं । दोनों पक्षों की अष्टमी में १ ख. ‘ च - ब्राह्य्यादि । २ क. ङ. विधुं । ३ कुशोदाशी शृङ्गोदकाशन: क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ४ ख. ग. ग्रयं क्षौद्रं श्रा ' । ५ च. ' णे शर्कराज्य भु । ६ नक्ताशी व्रतमुच्यते ' नास्ति च. पुस्तके । ७ क. ङ. ति सुशान्ति व्र । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 602

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५ ९ ८ अग्निपुराणम् तदा व्रतं प्रकुर्वीत अथ वा सगुडाशिता । तण्डुलस्याष्टमुष्टीनां वर्जयित्वाऽङ्गुलीद्वयम् । सात्त्विकं पूजयित्वाङ्गं भुञ्जीत च कथाश्रवात् ।

धीरो द्विजोऽस्य भार्याऽस्ति रम्भा पुत्रस्तु कौशिकः ।

कौशिकस्तं गृहीत्वा तु गोपालैश्चारयन्वृषम् ॥

स्नात्वा वृषमपश्यन्स वृषं मार्गितुमागतः । दिव्यस्त्रीयोषितां वृन्दमब्रवीद्देहि भोजनम् । व्रतं कृत्वा स बुभुजे प्राप्तवान्वनपालकम् । धीरेण विजया दत्ता यमायान्तरितः पिता पित्रोऽस्तु नरके दृष्ट्वा विजयाऽऽर्ति यमे गता व्रतद्वयाश्रमः प्रोचे प्राप्य तत्कौशिको ददौ तस्यां नियमकर्तारो न स्युः खण्डितसम्पदः ॥१० ॥

भक्तं कृत्वा चाऽऽम्रपुटे सकुशे सकुलाम्बिकाम् ॥११ ॥

शक्तितो दक्षिणां दद्यात्कर्कटीतण्डुलान्विताम् ॥१२ ॥

दुहिता विजया तस्य धीरस्य धनदो वृषः ॥ १३ ॥

गङ्गायां स्नानकृत्येऽथ नीतश्चौरैर्वृषस्तदा ॥१४ ॥

विजयाभगिनीयुक्तो ददर्श स सरोवरे ॥ १५ ॥

स्त्रीवृन्दमूचे व्रतकृद्भुङ्क्ष्व त्वमतिथिर्यतः ॥१६ ॥

गतो धीरः स वृषभो विजया सहितस्तदा ॥ १७ ॥

। व्रतप्रभावात्कौशिकोऽपि ह्ययोध्यायां नृपोऽभवत् ॥१८ ॥

। मृगयामागतं प्रोचे मुच्यते नरकात्कथम् ॥१९ ॥

। बुधाष्टमीद्वयफलं स्वर्गतौ पितरौ ततः ॥ २० ॥

से कोई भी यदि बुधवार के दिन पड़े तो उस दिन या तो व्रत करना चाहिए या गुड़ खाना चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य की सम्पत्ति का नाश नहीं होता है ॥ ८ - १० ॥ आठ मुट्ठी चावल में से दो अंगुल प्रमाण छोड़कर भात पकाना चाहिए । उस भात को कुशयुक्त आम्रपात्र के दोने में रखकर सात्त्विक अंग देवता का पूजन करके कथाश्रवण के बाद खाना चाहिए । तदनन्तर कर्कटी ( छोटे आँवले ) तथा तण्डुल के साथ यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए ॥११-१२ ॥ प्राचीनकाल में घीर नामक एक ब्राह्मण था । उसकी पत्नी का नाम रम्भा, पुत्र का नाम कौशिक, पुत्री का नाम विजया और बैल का नाम धनद था ॥ १३ ॥ एक बार कौशिक ग्वालबालों के साथ अपने बैल

को गंगातट पर चराने ले गया । जब वह गंगा में स्नान कर रहा था उसी समय चोर उसके बैल को चुरा ले गये । स्नान करने के बाद जब उसने बैल को वहाँ नहीं देखा तब अपनी बहन विजया को साथ लेकर उसे ढूँढ़ने निकल पड़ा । मार्ग में उसने एक सरोवर में अनेक दिव्य रमणियों को देखा । उसने उनसे भोजन के लिए प्रार्थना की ॥१४-१५३ ॥ स्त्रियों ने उत्तर दिया - ' तुम हमारे अतिथि हो, इसलिए ( आज अष्टमी ) व्रत करके भोजन करो । ' कौशिक ने व्रत करके भोजन किया । उस व्रत के प्रभाव से उसे बैल मिल गया । तब वह बैल को लेकर विजया के साथ अपने पिता धीर के पास पहुँचा ॥१६-१७ ॥ धीर ने विजया का विवाह यम के साथ कर दिया और वह मर गया । व्रत के प्रभाव से कौशिक भी अयोध्या का राजा हुआ ॥१८ ॥ ( एक समय ) विजया अपने -पिता

को नरक में देखकर बड़ी दुःखी हुई । उस समय यम शिकार खेलने गये थे । लौटने पर उनसे विजया माता- ने पूछा कि नरक से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? यम ने कहा - नरक से मुक्ति दो व्रतों से होती है तथा कौशिक ने अपने बुध और अष्टमी दोनों व्रतों का फल अपने माता - पिता को दे दिया । इससे माता - पिता स्वर्ग में पहुँच गये ॥१९ -२० ॥ १ ख. च. भुक्त । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 603

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पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ५ ९९ विजया हर्षिता चक्रे व्रतं भुक्त्यादिसिद्धये । अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबन्ति पुनर्वसौ ॥ २१ ॥

चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः । त्वामशोकहराभीष्ट मधुमाससमुद्भव ॥२२ ॥

पिबामि शोकसन्तप्तो मामशोकं सदा कुरु । चैत्रादौ मातृपूजाकृदष्टम्यां जयते रिपून् ॥२३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽष्टमीव्रतकथावर्णनं नाम चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥

अथ पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः नवमीव्रतानि अग्निरुवाच नवमीव्रतकं वक्ष्ये भुक्तिमुक्त्यादिसिद्धिदम् । देवीं पूज्याऽऽश्विने शुक्ले गौर्याख्यानवमीव्रतम् ( ते ) ॥१ ॥

पिष्टकाख्या तु नवमी पिष्टाशी देविपूजनात् । अष्टम्यामाश्विने शुक्ले कन्यार्के मूलभे यदा ॥ २ ॥

अघार्दना सर्वदा वै महती नवमी स्मृता । दुर्गा तु नवगेहस्था एकागारस्थिताऽथवा ॥३ ॥

पूजिताऽष्टादशभुजा शेषाः षोडशसत्कराः । शेषाः षोडशहस्ताः स्युरञ्जनं डमरुं तथा ॥४ ॥

( उसी समय से ) प्रसन्न होकर विजया भी भोगादि की प्राप्ति के लिए व्रत करने लगी । जो व्यक्ति पुनर्वसु नक्षत्र में चैत्र - शुक्लपक्ष की अष्टमी के दिन आठ अशोक - कलियों के रस का पान करते हैं, वे कभी शोक को प्राप्त नहीं होते हैं । अशोक- कलिकाओं के रसपान के समय यह कहना चाहिए कि ' अये मधुमास में उत्पन्न होनेवाले तथा शंकर के प्रिय अशोक! मैं शोक सन्तप्त होकर तुम्हारा पान कर रहा हूँ । तुम मुझे सदा शोकरहित बनाये रखो । ' चैत्रमास की अष्टमी के दिन मातृकाओं की पूजा करनेवाला व्यक्ति शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ २१-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अष्टमी - व्रत - कथा वर्णन नामक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८४ ॥

अध्याय १८५ नवमी- -व्रत अग्निदेव बोले- अब मैं उस नवमी व्रत का वर्णन करूँगा जो भोग और मोक्ष दोनों को दिलानेवाला है । आश्विन-शुक्लपक्ष की नवमी का नाम गौरी है, उस दिन देवी का पूजन करना चाहिए ॥१ ॥ आश्विन शुक्लपक्ष की अष्टमी

को जब सूर्य कन्याराशि तथा मूल नक्षत्र में रहे तब पिष्टका नवमी व्रत करना चाहिए । इसे पिष्टका इसलिए कहते हैं कि उस दिन पिष्टी ( पिन्नी ) खाकर ही देवी का पूजन किया जाता है || २ || सभी नवमी - व्रतों में श्रेष्ठतम नवमी व्रत है जिसे अघार्दना कहते हैं । उस दिन नवगृहों में स्थित या एक गृह में स्थित देवी की पूजा करनी चाहिए || ३ || मध्य में अष्टादशभुजा महालक्ष्मी एवं दोनों पावों में शेष दुर्गाओं का पूजन करना चाहिए । अञ्जन एवं डमरू के साथ निम्नलिखित क्रम से नवदुर्गाओं की स्थापना करनी चाहिए- रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 604

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६०० अग्निपुराणम् रुद्रचण्डा प्रचण्डा च चण्डोग्रा चण्डनायिका क्रमान्मध्ये चोग्रचण्डा दुर्गा महिषमर्दिनी ' दीर्घाकारादिमन्त्रादिर्नवनेत्रो नमोऽन्तकः अड्गुष्ठादिकनिष्ठान्त न्यस्याङ्गानि जपेच्छिवाम् कपालं खेटकं घण्टां दर्पणं तर्जनीं धनुः शक्तिमुद्गरशूलानि वज्रं खड्गं च कुन्तकम् पशुं च काली कालीति जप्त्वा खड्गेन घातयेत् तदुत्थं रुधिरं मांसं पूतनायै च नैर्ऋते विदारिकायै चाऽऽग्नेय्यां महाकौशिकमग्नये दद्यात्स्कन्दविशाखाभ्यां ब्राह्माद्या निशि ता यजेत् दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ध्वजादिरथयात्रादिबलिदानं वरादिकृत् । चण्डा चण्डवती पूज्या चण्डरूपाऽतिचण्डिका ॥५ ॥

। ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा, दशाक्षरो मन्त्रः ॥ ६ ॥

। षड्भिः पदैर्नमः स्वधावषट्कारहृदादिकम् ॥७ ॥

। एवं जपति यो गुह्यं नासौ केनापि बाध्यते ॥ ८ ॥

। ध्वजं डमरुकं पाशं वामहस्तेषु विभ्रतीम् ॥९ ॥

। शंखं चक्रं शलाकां च आयुधानि च पूजयेत् ॥१० ॥

। कालि कालि व्रजेश्वरि लौहदण्डायै नमः ॥ ११ ॥

। वायव्यां पापराक्षस्यै चरक्यै नम ईश्वरे ॥ १२ ॥

। तस्याग्रतो नृपः स्नायाच्छत्रुं पिष्टमयं हरेत् ॥ १३ ॥

। जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ॥१४ ॥

। देवीं पञ्चामृतैः स्नाप्य पूजयेच्चार्हणादिना ॥ ॥१५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नवमीव्रत कथनं नाम पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥

चण्डवती, पूज्या, चण्डरूपा और अतिचण्डिका । इन सबके मध्य भाग में अष्टादशभुजा, उग्रचण्डा, महिषमर्दिनी दुर्गा का पूजन करना चाहिए । ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा, यह दशाक्षर - मन्त्र है ॥४-६ ॥ जो मनुष्य इस विधि से पूर्वोक्त दशाक्षर - मन्त्र का जप करता है, वह किसी से बाधा नहीं प्राप्त करता है । भगवती दुर्गा अपने वाम करों में कपाल, खेटक, घण्टा, दर्पण, तर्जनी मुद्रा, धनुष, ध्वजा, डमरू और पाश एवं दक्षिण करों में शक्ति, मुद्गर, त्रिशूल, वज्र, खड्ग, भाला, अंकुश, चक्र तथा शलाका लिये हुए हैं । उनके इन आयुधों की भी अर्चना करे ॥७-१० ॥ तत्पश्चात् ' कालि कालि वज्रेश्वरि लौहदण्डायै नमः ' कहकर और ' कालि कालि ' का जप करते हुए खड्ग से पशु को काटना चाहिए । पशु के रक्त और मांस को पश्चिम - दक्षिण दिशा में पूतना को, पश्चिमोत्तर दिशा में पापराक्षसी को, पूर्वोत्तर दिशा में चरकी को, दक्षिण - पूर्व दिशा में विदारिका को अर्पित करना चाहिए । महाकौशिक ( या मांस अग्निदेवता को अर्पित कर देना चाहिए । तदनन्तर राजा को ( देवी की प्रतिमा के महामांस ) नामक और शत्रु की पिष्टमयी प्रतिमा को लेकर उसे काटकर आगे स्नान करना चाहिए ब्राह्मी आदि का पूजन करना चाहिए स्कन्द और विशाखा को समर्पित कर देना चाहिए । रात्रि में करने के बाद पञ्चामृत ॥११-१३३ ॥ ' जयन्ती मङ्गला काली " स्वधा नमोऽस्तु ते ' इस मन्त्र से पूजा से देवी का स्नान कराकर योग्य सामग्रियों से उनका पूजन करना चाहिए । ध्वजारोपण तथा रथयात्रोत्सव आदि करना भी श्रेयस्कर हुआ करता है ॥१३-१५ ॥, बलिदान श्री अग्निमहापुराण में नवमी - व्रत कथन नामक एक सौ पचासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८५ ॥

१ ॐ दुर्गे मन्त्रः ग. पुस्तके नास्ति । २ दीर्घाकारादि " जपेच्छिवाम्'क ४ एवं कृत्वा विधानेन नवमीव्रतमाचरेत् । इत्यर्धमधिकं क. पुस्तके दृश्यते ।. ग. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ३ ख.ग. “ कमाश्रये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 605

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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ६०१ अथ षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः दशमीव्रतम् अग्निरुवाच

दशमीव्रतकं वक्ष्ये धर्मकामादिदायकम् । दशम्यामेकभक्ताशी समाप्ते दशधेनुदः ॥

दिशश्च काञ्चनीर्दद्याद्ब्राह्मणाधिपतिर्भवेत् ' ॥१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये दशमीव्रतकथनं नाम षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥

अथ सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः एकादशीव्रतम् अग्निरुवाच एकादशी व्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । दशम्यां नियताहारो मांसमैथुनवर्जितः ॥१ ॥

एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि । द्वादश्येकादशी यत्र तत्र संनिहितो हरिः ॥२ ॥

अध्याय १८६ दशमी - व्रत अग्निदेव बोले- मैं धर्म और काम आदि ( फलों ) को प्रदान करनेवाले दशमी व्रत को बतलाऊँगा । दशमी के दिन व्रती को एक बार भोजन करके व्रत समाप्ति पर दस गायों का दान करना चाहिए । ब्राह्मणों को दक्षिणा में सुवर्ण देना चाहिए । ऐसा करने से ( व्रत करनेवाला ) ब्राह्मणाधिपति हो जाता ॥१ ॥

श्री अग्निमहापुराण में दशमी - व्रत कथन नामक एक सौ छियासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८६ ॥

अध्याय १८७ एकादशी - व्रत अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं एकादशी व्रत का वर्णन करूँगा जो भोग और मोक्ष को देनेवाला है । दशमी के दिन व्रती को नियमित आहार - विहार करना चाहिए । इस दिन मांस और मैथुन का परित्याग कर देना चाहिए ॥१ ॥

दोनों पक्ष की एकादशी में भोजन नहीं करना चाहिए । एकादशी में द्वादशी का योग पड़ जाने से भगवान् विष्णु का सामीप्य प्राप्त हो जाता है ॥२ ॥ उसमें व्रत करके त्रयोदशी में पारण करने से सौ यज्ञों का फल ( पुण्य ) होता है ।

१ एवं कृत्वा तु विधिना दशमीव्रतमाचरेत् । इत्यर्धमधिकं क. पुस्तके वर्तते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 606

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अग्निपुराणम् ६०२ तत्र क्रतुशतं ' पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणे । एकादशीकला यत्र परतो द्वादशी गता ॥ ३ ॥

तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणे । दशम्येकादशीमिश्रा नोपोष्या नरकप्रदा ॥४ ॥

एकादश्यां निराहारो भुक्त्वा चैवापरेऽहनि । भोक्ष्येऽहं पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥५ ॥

एकादश्यां सिते पक्षे पुष्यर्थं तु यदा भवेत् । सोपोष्याऽक्षय्यफलदा प्रोक्ता सा पापनाशिनी ॥ ६ ॥

एकादशी द्वादशी या श्रवणेन च संयुता । विजया सा तिथिः प्रोक्ता भक्तानां विजयप्रदा ॥७ ॥

एषैव फाल्गुने मासि पुष्यर्क्षेण च संयुता । विजया प्रोच्यते सद्भिः कोटिकोटिगुणोत्तरा || ८ || एकादश्यां विष्णुपूजा कार्या सर्वोपकारिणी । धनवान्पुत्रवांल्लोके विष्णुलोके महीयते ॥ ९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये एकादशीव्रतकथनं नाम सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१८७ ॥

जिस दिन एक कला तक एकादशी रहने के बाद द्वादशी लग जाती है || ३ || उस दिन व्रत करके त्रयोदशी में पारण → करने से भी सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है । एकादशी यदि दशमी से मिश्रित हो तो उसमें उपवास नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह नरक को देनेवाली होती है || ४ || एकादशी में निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करते समय भगवान् से यह कहना चाहिए - ‘ हे पुण्डरीकाक्ष! अच्युत! मैं आपके शरणागत हूँ, अनुमति दीजिये कि मैं भोजन करूँ ॥५ ॥

शुक्लपक्ष की एकादशी में यदि पुष्यनक्षत्र हो तो उसमें अवश्य उपवास करना चाहिए, क्योंकि वह पापनाशिनी तथा अक्षयफलदायिनी हुआ करती है ॥६ ॥ जो एकादशी या द्वादशी श्रवण नक्षत्र से युक्त होती है, उसका नाम विजया

है । वह भक्तों को विजय देनेवाली हुआ करती है ॥७ ॥ वही तिथि यदि फाल्गुन मास में पुष्य नक्षत्र से युक्त हो

तो भी विजया कहलाती है । विद्वान् लोग उसे पूर्वोक्त तिथि की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक फल देनेवाली बतलाते हैं । एकादशी में विष्णु की पूजा करनी चाहिए क्योंकि वह सबके लिए उपकारक है । इससे मनुष्य को ( इस लोक में ) धन, पुत्र तथा वैकुण्ठ में महत्ता की प्राप्ति होती है ॥८ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में एकादशी व्रत कथन नामक एक सौ सतासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८७ ॥

१ क. ग. ङ. “ ण्यं द्वादश्यां पारणै कृते । ए । २ एकादशी गता ख. पुस्तके नास्ति । ३ क. ङ. ' टिफलप्रदा । ए । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 607

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ६०३ अथाष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः द्वादशीव्रतानि अग्निरुवाच द्वादशीव्रतकं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च ॥१ ॥

' उपवासेन भैक्ष्येण चैवं द्वादशिकव्रती । चैत्रे मासि सिते पक्षे द्वादश्यां मदनं हरिम् ॥२ ॥

( पूज्येद्भुक्तिमुक्त्यर्थी मदनद्वादशीव्रती । माघशुक्ले तु द्वादश्यां भीमद्वादशिकव्रती ॥३ ॥

नमो नारायणायेति यजेद्विष्णुं ससर्वभाक् । फाल्गुने च सिते पक्षे गोविन्दद्वादशीव्रती ॥४ ॥

विशोकद्वादशीकारी यजेदाश्वयुजे हरिम् ) । लवणं मार्गशीर्षे तु कृष्णमभ्यर्च्य यो नरः ॥५ ॥

ददाति शुक्लद्वादश्यां स सर्वरसदायकः । गोवत्सं पूजयेद्भाद्रे गोवत्सद्वादशीव्रती ॥६ ॥

माध्यां तु समतीतायां श्रवणेन तु संयुता । द्वादशी या भवेत् कृष्णा प्रोक्ता सा तिलद्वादशी ॥७ ॥

तिलैः स्नानं तिलैर्होमो नैवेद्यं तिलमोदकम् । दीपश्च तिलतैलेन तथा देयं तिलोदकम् ॥८ ॥

अध्याय १८८ द्वादशी व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भुक्तिमुक्तिदायक द्वादशी व्रत के सम्बन्ध में बता रहा हूँ । द्वादशी का व्रत इस प्रकार से करना चाहिए कि उस दिन या तो केवल रात में ही बिना माँगा हुआ भोजन करना चाहिए या उपवास करना चाहिए या भिक्षान्न ग्रहण करना चाहिए || १ || चैत्र मास में शुक्लपक्ष की द्वादशी के दिन मदन द्वादशी व्रत किया जाता है । उस दिन ( इस संसार में ) भोग और बाद में मोक्ष के इच्छुक को मदन गोपाल की पूजा करनी चाहिए ॥२-२३ ॥ माघशुक्ल द्वादशी में भीम द्वादशी व्रत करनेवाला व्यक्ति ' ॐ नमो नारायणाय ' मन्त्र से विष्णु का यजन करे । इससे सब - कुछ प्राप्त हो जाता है । फाल्गुन शुक्लपक्ष में गोविन्दद्वादशी व्रत करना चाहिए ॥३-४ ॥ आश्विन में विशोक द्वादशी व्रत करके भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए । मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की द्वादशी में कृष्ण की पूजा करके और उसी मास की शुक्ल द्वादशी में लवण दान करने से व्रत करनेवाले को सभी रसों के दान का फल मिलता है ॥५-५३ ॥ भाद्रपद में गोवत्सद्वादशी व्रत करनेवाले व्यक्ति को गाय के बछड़े का पूजन करना चाहिए । माघ - कृष्णपक्ष की द्वादशी यदि श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो वह तिल द्वादशी कहलाती है ॥६-७ ॥ उस दिन तिल से स्नान तथा होम करना चाहिए और तिल के बने हुए लड्डुओं का नैवेद्य चढ़ाना चाहिए, तिल के तेल से दीपक जलाना चाहिए, तिलोदक दान करना चाहिए और ब्राह्मणों को तिल तथा फल दान में देना चाहिए । १ उपवासेन " द्वादशिकव्रती च पुस्तके नास्ति । २ क. ख. ग. ण नैव द्वादशिको भवेत् । चै ' । ३ ' पूजयेद्भुक्ति हरिम् ' पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 608

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अग्निपुराणम् ६०४ नमो भगवतेऽथो वासुदेवाय वै यजेत् ॥९ ॥

तिलाश्च देया विप्रेभ्यः फलं होमोपवासतः । ॐ ॥१० ॥

षट्तिलद्वादशी व्रती । मनोरथद्वादशीकृत्फाल्गुने तु सितेऽर्चयेत्

सकुलः स्वर्गमाप्नोति नामभिः । वर्षं यजेद्धरिं स्वर्गी न भवेन्नारकी नरः ॥ ११ ॥

नामद्वादशीव्रतकृत्केशवाद्यैश्च व्रती । मासि भाद्रपदे शुक्ले अनन्तद्वादशीव्रती ॥१२ ॥

फाल्गुनस्य सितेऽभ्यर्च्य सुमतिद्वादशी जुहुयात्तिलद्वादशीकृन्नरः ॥१३ ॥

आश्लेषर्क्षे तु मूले वा माघे कृष्णाय वै नमः । यजेत्तिलांश्च

फाल्गुने तु सिते यजेत् । जय कृष्ण नमस्तुभ्यं वर्षं स्याद्भुक्तिमुक्तिगः ॥

सुमतिद्वादशीकारी ॥१४ ॥

पौषशुक्ले तु द्वादश्यां संप्राप्तिद्वादशीव्रती इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानाद्वादशीव्रतकथनं नामाष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥

अथैकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः श्रवणद्वादशीव्रतानि अग्निरुवाच श्रवणद्वादशीं वक्ष्ये मासि भाद्रपदे सिते । श्रवणेन युता श्रेष्ठा महती सा ह्युपोषिता ॥१ ॥

( उस दिन ) होम तथा उपवास भी करना चाहिए । तदनन्तर ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्र से भगवान् वासुदेव की पूजा करनी चाहिए ॥८ - ९ ॥ इस प्रकार छह ' तिल द्वादशी ' व्रत करनेवाला व्यक्ति अपने वंशजों के साथ स्वर्ग प्राप्त कर लेता है । फाल्गुन - शुक्लपक्ष की द्वादशी का नाम मनोरथद्वादशी, सुमतिद्वादशी तथा नामद्वादशी है । उस दिन केशव आदि नामों से भगवान् की पूजा करनेवाला व्यक्ति स्वर्ग चला जाता है, नरक में कभी भी नहीं जाता है ॥१०-११ ॥ फाल्गुन के शुक्लपक्ष में ' सुमतिद्वादशी ' का व्रत करके विष्णु का पूजन करे । भाद्र शुक्लपक्ष में ' अनन्तद्वादशी व्रत ' करना चाहिए । अश्लेषा तथा मूल नक्षत्र से युक्त माघ में तिलद्वादशी व्रत करनेवाला व्यक्ति तिल का हवन करे ॥१२-१३ ॥ फाल्गुन शुक्लपक्ष में ' सुमतिद्वादशी व्रत ' करनेवाले व्यक्ति को ' कहकर पूजा करनी चाहिए । इससे ( इस संसार में ) भोग और ( बाद में ) मोक्ष की प्राप्ति होती है । की द्वादशी को सम्प्राप्ति द्वादशी व्रत करना चाहिए ॥१४ ॥

श्री अग्निमहापुराण में अनेक द्वादशी व्रत कथन नामक एक सौ अठासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८८ ॥

अध्याय १८ ९ श्रवणद्वादशी - व्रत ' कृष्णाय नमः ' कहकर जय कृष्ण नमस्तुभ्यम् ' पौष मास के शुक्लपक्ष अग्निदेव बोले - अब मैं श्रवण द्वादशी व्रत बतलाऊँगा । भाद्र शुक्लपक्ष की द्वादशी यदि श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो वह अत्यन्त पुण्यदायिनी हुआ करती है । उसमें उपवास करना चाहिए || १ || नदियों के संगम में स्नान करने १ ग. ॰भ्यस्तिलहो ” । २ क. ङ. ' ट्कुलं द्वादशी व्रतम् । म ' । ३ क. ङ. आषाढर्क्षेषु मू । ४ क. ङ. च. “ न समायुक्ता म ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६०५ संगमे सरितां स्नानाच्छ्रवणद्वादशी फलम् ' निषिद्धमपि कर्त्तव्यं त्रयोदश्यां तु पारणम् उदकुम्भे स्वर्णमयं त्रयोदश्यां तु पारणम् सितवस्त्रयुगच्छन्ने घटे सच्छत्रपादुके छत्रदण्डधरं विष्णुं वामनाय नमो नमः भुक्तिमुक्तिप्रजाकीर्तिसर्वैश्वर्ययुतं कुरु ॐ नमो वासुदेवाय शिरः सम्पूजयेद्धरेः नमः श्रीपतये वक्षो भुजौ सर्वास्त्रधारिणे त्रैलोक्य ' जननायेति मेढ्रं जङ्घे यजेद्धरेः घृतपक्वं च नैवेद्यं दद्याद्दध्योदनैर्घटान् गन्धपुष्पादिभिः पूज्य वदेत्पुष्पाञ्जलिस्त्विदम् अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव से श्रवण द्वादशी व्रत करने का फल प्राप्त होता है । करने से महान् फल प्राप्त होता है || २ || त्रयोदशी । बुधश्रवणसंयुक्ता दानादौ सुमहाफला ॥२ ॥

। द्वादश्यां च निराहारो वामनं पूजयाम्यहम् ॥३ ॥

। आवाहयाम्यहं विष्णुं वामनं शङ्खचक्रिणम् ॥४ ॥

। स्नापयामि जलैः शुद्धैर्विष्णुं पञ्चामृतादिभिः ॥५ ॥

। अर्घ्यं ददानि देवेश अर्ध्यार्हाद्यैः सदाऽर्चितः ॥६ ॥

। वामनाय नमो गन्धं होमोऽनेनाष्टकं शतम् ॥७ ॥

। श्रीधराय मुखं तद्वत्कण्ठे कृष्णाय वै नमः ॥८ ॥

। व्यापकाय नमो नाभिं वामनाय नमः कटिम् ॥९ ॥

। सर्वाधिपतये पादौ विष्णोः सर्वात्मने नमः ॥१० ॥

। रात्रौ च जागरं कृत्वा प्रातः स्नात्वा च संगमे ॥ ११ ॥

। नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञितः ॥१२ ॥

। प्रीयतां देवदेवेश मम नित्यं जनार्दन ॥१३ ॥

बुध दिन तथा श्रवण नक्षत्र से युक्त उक्त द्वादशी में दान आदि में पारण निषिद्ध होने पर भी इस व्रत के लिए वही विहित है । द्वादशी में निराहार रहकर जल से भरे हुए घड़े के ऊपर यह कहते हुए स्वर्णमय भगवान् वामन की पूजा करनी चाहिए कि मैं भगवान् वामन की पूजा कर रहा हूँ, ( इसके लिए ) मैं शङ्ख - चक्र धारण करनेवाले वामन रूपधारी भगवान् विष्णु का आवाहन कर रहा हूँ । फिर त्रयोदशी में पारण करना चाहिए ॥ ३-४ ॥ यह भी कहना चाहिए कि ‘ मैं एक जोड़े शुक्ल वस्त्र से आच्छादित और छत्र तथा पादुका से युक्त ( इस ) घड़े के ऊपर शङ्ख - चक्रधारी ( भगवान् ) वामन का आवाहन कर पञ्चामृत आदि पवित्र जल से उनको स्नान करा रहा हूँ ॥५ ॥ छत्र तथा दण्ड धारण करनेवाले वामन

( भगवान् ) विष्णु को बार - बार नमस्कार है । देवाधिदेव! अर्घ्य आदि उपयुक्त सामग्री से आपकी पूजा की जा चुकी है ॥६ ॥ अब मुझे भुक्ति, मुक्ति, प्रजा, कीर्ति तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य से भरपूर कर दीजिये । फिर ' वामनाय नमः ' कहकर

एक सौ आठ बार सुगन्धित द्रव्य से हवन करे । ' ॐ नमो वासुदेवाय ' मन्त्र से विष्णु के सिर की, ' कृष्णाय नमः ' से कण्ठ की पूजा करनी चाहिए ॥७-८ ॥ ' श्रीपतये नमः ' से वक्षःस्थल की, ' सर्वास्त्रधारिणे नमः ' से भुजाओं की, ' व्यापकाय नम: ' से नाभि की, ' वामनाय नमः ' से कटि की, ' त्रैलोक्य - जननाय नम: ' से लिङ्ग की, ' सर्वाधिपतये नम: ' से जङ्घा की और ‘ सर्वात्मने नमः ' से चरणों की पूजा करनी चाहिए ॥ ९ -१० ॥ घी के पकवान तथा दही और भात के नैवेद्य चढ़ाना चाहिए तथा रात्रि में जागरण करके प्रातः काल संगम में स्नान करना चाहिए । तत्पश्चात् गन्ध, पुष्प आदि से भगवान् की पूजा करके यह कहते हुए पुष्पाञ्जलि देनी चाहिए कि हे गोविन्द! बुध और श्रवण कहलानेवाले आपको नमस्कार है ॥११-१२ ॥ आप मेरे पाप - पुञ्ज को भस्म करके मुझे सम्पूर्ण सुख प्रदान कीजिये । हे देवेश! हे जनार्दन! आप सदा मुझ पर प्रसन्न रहें । वामन बुद्धि देनेवाले हैं । वे स्वयं द्रव्यों में रहते १ ख. ग. " नाद्द्वादशद्वा । २ क. ङ. ' नकाये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अग्निपुराणम् ६०६ बुद्धिदो दाता द्रव्यस्थो वामनः स्वयम् । वामनः प्रतिगृह्णाति वामनो मे ददाति च ॥१४ ॥

वामनो वामनो नित्यं वामनाय नमो नमः । प्रदत्तदक्षिणो विप्रान्संभोज्यान्नं स्वयं चरेत् ॥ १५ ॥

द्रव्यस्थो आग्नेये श्रवणद्वादशीव्रतकथनं नामैकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८ ९ ॥ इत्यादिमहापुराण अथ नवत्यधिकशततमोऽध्यायः अखण्डद्वादशीव्रतम् ' अग्निरुवाच अखण्डद्वादशीं वक्ष्ये व्रतसम्पूर्णताकृतम् । मार्गशीर्षे सिते विष्णुं द्वादश्यां समुपोषितः || १ || पञ्चगव्यजले स्नातो यजेत्तत्प्राशनो व्रती । यवव्रीहियुतं पात्रं द्वादश्यां हि द्विजेऽर्पयेत् ॥२ ॥

सप्तजन्मनि यत्किंचिन्मया खण्डं व्रतं कृतम् । भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे ॥३ ॥

यथाऽखण्डं जगत्सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम । तथाऽखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै ॥४ ॥

एवमेवानुमासं च चातुर्मास्यो विधिः स्मृतः । अन्यच्चैत्रादिमासेषु सक्तुपात्राणि चार्पयेत् ॥ ५ ॥

हैं । वे ( पूजा इत्यादि ) ग्रहण करते हैं तथा ( सुख - सम्पत्ति ) देते हैं । ऐसे द्रव्य स्थित वामन को मेरा बार - बार नमस्कार है । उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए और स्वयं भी भोजन करना चाहिए ॥१३-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में श्रवण द्वादशी व्रत कथन नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८९ ॥

अध्याय १ ९ ० अखण्डद्वादशी - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं अखण्डद्वादशी व्रत बतलाऊँगा जो सभी व्रतों को पूर्ण करनेवाला हुआ करता है । मार्गशीर्ष - शुक्लपक्ष की द्वादशी में उपवास कर विष्णु का पूजन करना चाहिए || १ || व्रत करनेवाले को पञ्चगव्यमिश्रित जल में स्नान करके उस ( पञ्चगव्य ) का पान भी करना चाहिए और द्वादशी को ही यव तथा धान से भरा हुआ पात्र ब्राह्मण को देना चाहिए । तदनन्तर भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए - ' हे भगवन्! सात जन्मों में मैंने जिन खण्डित व्रतों का अनुष्ठान किया है, वे व्रत आपकी कृपा से परिपूर्ण हो जायँ ॥२-३ ॥ अये पुरुषोत्तम! अखण्ड जगत् आप ही हैं । इसलिए मेरे सब व्रत भी अखण्ड हो जायँ । इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करके चातुर्मास्य व्रत सम्पन्न करना चाहिए । चैत्र आदि मासों में सत्तू से भरे पात्र का दान करना चाहिए ॥४-५ ॥ १ अयमध्यायो नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA