अग्नि पुराण — पृष्ठ 71–80
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 71–80
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द्वितीयोऽध्यायः ६७ द्वे विद्ये भगवान् विष्णुः परा चैवापरा द्विज ' । ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्योतिषां वेदा ' अङ्गानि षड् द्विज ॥ १५ ॥
गतिः । छन्दोऽभिधानं मीमांसा धर्मशास्त्रं पुराणकम् न्यायो वैद्यकगान्धर्वं धनुर्वेदोऽर्थशास्त्रकम् ॥१६ ॥
यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रचरणं । अपरेयं परा विद्या यया ब्रह्मावगम्यते ' ॥१७ ॥
तथा ते कथयिष्यामि ध्रुवम् । विष्णुनोक्तं यथा मह्यं देवेभ्यो ब्रह्मणा पुरा ॥ १८ ॥
हेतुं मत्स्यादिरूपिणम् ॥१९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये व्यासप्रोक्ते प्रथमः प्रश्नाध्यायः ॥१ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः मत्स्यावतारकथावर्णनम् वसिष्ठ उवाच मत्स्यादिरूपिणं विष्णुं ब्रूहि सर्वादिकारणम् । पुराणं ब्रह्म चाग्नेयं यथा विष्णोःपुरा श्रुतम् ॥१ ॥
अग्निरुवाच मत्स्यावतारं वक्ष्येऽहं वशिष्ठ शृणुवै हरेः । अवतारक्रिया दुष्टनष्ट्यै सत्पालनाय हि ॥२
आसीदतीतकल्पान्ते ' ' ब्राह्मो नैमित्तिको लयः । समुद्रोपप्लुतास्तत्र लोका ॥
भूरादिका मुने ॥३ ॥
विद्या । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, छह वेदांग - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्दस् धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, वैद्यक, गान्धर्व वेद, धनुर्वेद, अर्थशास्त्र - ये सब अपरा विद्याएँ हैं । परा विद्या वह है जिससे , मीमांसा, ब्रह्म का ज्ञान होता है, जो अदृश्य, अग्राह्य, गोत्र और चरण शाखा से परे है । मैं मत्स्यादि रूप के हेतुभूत भगवान् विष्णु उस आपसे उसी प्रकार कहूँगा जिस प्रकार प्राचीनकाल में विष्णु ने मुझसे और ब्रह्मा ने देवताओं से कहा था ॥१५-१९ को ॥ श्री अग्निमहापुराण में व्यासकथित प्रश्नाध्याय नामक पहला अध्याय समाप्त ॥१ ॥
अध्याय २ मत्स्यावतार कथा का वर्णन वसिष्ठ बोले - सृष्टि के आदि कारण, मत्स्य आदि रूप धारण करनेवाले विष्णु और प्राचीनकाल में उनके मुख से सुने हुए ब्रह्म ( वेद ) रूप अग्निपुराण के विषय में बतलाइये ॥१ ॥
अग्नि ने कहा - वसिष्ठ! मैं विष्णु के मत्स्यावतार की कथा कह रहा हूँ, सुनो! विष्णु के अवतार लेने का काम दुष्टों का नाश और सज्जनों का पालन करने के लिए होता है ॥२ ॥ हे मुने! बीते हुए कल्प के अन्त में ब्राह्म
नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था जिसमें भूः आदि सब लोक समुद्र में डूब गये थे || ३ || कल्पान्त में वैवस्वत मनु १. घ. च. ह । २ क. ' दाङ्गानि च यद्विज । ३ घ. ङ. ह्याभिग ' । ४ घ. परम् ङ. ब्रुवन । ५. ख. ग. ' न्ते ब्रह्मन्त्रैमि । ६ क. ङ. ब्राह्मे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ६८ मनुर्वैवस्वतस्तेपे तपो वै भुक्तिमुक्तये ।
तस्याञ्जल्युदके मत्स्यः स्वल्प एकोऽभ्यपद्यत ।
ग्राहादिभ्यो भयं मेऽत्र ' तच्छ्रुत्वा कलशेऽक्षिपत् ' ॥
स्थानमेतद्वचः श्रुत्वा राजाथोदञ्चनेऽक्षिपत् । सरोवरे पुनः क्षिप्तो ववृधे तत्प्रमाणवान् । लक्षयोजनविस्तीर्णः क्षणमात्रेण सोऽभवत् । को भवान्ननु विष्णुस्त्वं नारायण नमोऽस्तु ते । मनुनोक्तोऽब्रवीन्मत्स्यो मनुं वै पालने रतः । ' सप्तमेऽथ दिने ' ह्यब्धि: प्लावयिष्यति वै जगत् । सप्तर्षिभिः परिवृतो निशां ब्राह्मीं चरिष्यसि । इत्युक्त्वान्तर्दधेर मत्स्यो मनुः कालप्रतीक्षकः । एकशृङ्गधरो मत्स्यो हैमो नियुतयोजनः । एकदा कृतमालायां क्षेप्तुकामं जले प्राह मनुं वृद्धः पुनर्मत्स्यः तत्र वृद्धोऽब्रवीद्भूपं ऊचे देहि बृहत्स्थानं मत्स्यं तमद्भुतं दृष्ट्वा मायया मोहयसि मां कुर्वतो जलतर्पणम् ॥४ ॥
न मां क्षिप नृपोत्तम ॥५ ॥
प्राह तं देहि मे बृहत् ॥६ ॥
पृथु देहि पदं मनो ॥७ ॥
प्राक्षिपच्चाम्बुधौ मनुः ॥ ८ ॥
विस्मितः प्राब्रवीन्मनुः ५ ॥ ९ ॥
किमर्थं त्वं जनार्दन ॥ १० ॥
अवतीर्णो भवायास्य जगतो दुष्टनष्टये ॥ ११ ॥
उपस्थितायां नावि त्वं बीजादीनि निधाय च ॥ १२ ॥
उपस्थितस्य मे शृङ्गे निवध्नीहि महाहिना ॥ १३ ॥
स्थितः समुद्र उद्वेले नावमारुरुहे तदा ॥ १४ ॥
नावं बद्ध्वा १३ तस्य शृङ्गे मत्स्याख्यं च पुराणकम् ॥१५ ॥
ने भोग और मोक्ष के लिए तपस्या की । एक बार जब वे कृतमाला नदी में तर्पण कर रहे थे तब उनके अञ्जलि के जल में एक छोटी - सी मछली आ गयी । जब उन्होंने उसे जल में फेंकना चाहा ( तब ) वह मछली बोल पड़ी-हे राजोत्तम! मुझे मत फेंको ॥४-५ ॥ क्योंकि वहाँ मुझे घड़ियाल आदि का डर है । यह सुनकर मनु ने उसे कलश-जल में डाल दिया । ( उस कलश में वह मछली बढ़ने लगी और अपने लिये पर्याप्त स्थान न पाकर ) बढ़ी हुई मछली ने मनु से फिर कहा- " मुझे बड़ा स्थान दो । " इस वचन को सुनकर राजा मनु ने उसे एक हौज में डाल दिया । वहाँ भी वह इसी प्रकार बढ़कर राजा से कहने लगी - हे मनु! मुझे ( और ) बड़ा स्थान दो ॥६-७ ॥ मनु ने ( वहाँ से निकालकर ) उसको एक सरोवर में डाल दिया । वहाँ भी बढ़ती - बढ़ती वह सरोवर के बराबर हो गयी । उसने फिर कहा- ( इससे भी ) बड़ा स्थान दो! ( तब मनु ने उसे समुद्र में डाल दिया ) । क्षण भर में वह मछली एक लाख योजन ( में ) फैल गयी । उस आश्चर्यजनक मछली को देखकर आश्चर्ययुक्त मनु बोले ॥८ - ९ ॥ ' प्रभो! आप कौन हैं? आप विष्णु हैं? हे नारायण! आपको नमस्कार है । हे जनार्दन! आप किसलिए मुझे माया से मोहित कर रहे हैं ' || १० || मनु के ( इस प्रकार ) कहने पर ( उस ) मत्स्य ने मनु से कहा - ' मैं सृष्टिपालक विष्णु हूँ, जो इस जगत् के दुष्टों का नाश करने के लिए अवतरित हुआ हूँ ॥११ ॥ आज से सातवें दिन समुद्र संसार को डुबो देगा । जब एक बड़ी
नाव आये तो संसार के सब प्रकार के बीजों को उसमें रख देना और स्वयं सप्तर्षियों के साथ, उस नाव पर चढ़कर उस ब्रह्मा के त्रिकाल तक विचरण करना और जब मैं वहाँ आ जाऊँ तो उस नाव को बड़े सर्प से, मेरी सींग में बाँध देना ॥१२-१३ ॥ यह कहकर यह मत्स्य अन्तर्धान हो गया । मनु उस समय की प्रतीक्षा करते रहे और समुद्र के बढ़ जाने पर वह नाव में बैठ गये || १४ || ( उसी समय ) एक लाख योजन लम्बा एक सुनहला मत्स्य आया जिसके एक ही सींग थी । मनु ने उसकी सींग में नाव को बाँधकर उस मत्स्य ( रूपधारी भगवान् विष्णु ) को अनेक १ घ, ङ. नरोत्तम । २ घ. मेऽद्य । ३ घ. ' त् । स तु वृ ० । ४ ग. क्रुद्धः । ५ घ. ङ. ततः । ६ घ. ङ. ' नु वै विष्णुर्नारा । ७ क. घ. ङ. रतम् । ८ ङ. ' मे दिवसे ह्य ' । ९ ग. घ. त्वब्धिः । १० घ. ङ. विधाय । ११ ख. ङ. चरिष्यति । १२ ग ' न्तर्हिते मत्स्य म ' | ' न्तर्हितो म ' । १३ घ ङाबबन्ध तच्छृङ्गे । Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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तृतीयोऽध्यायः ६ ९ शुश्राव मत्स्यात्पापघ्नं संस्तुवन् स्तुतिभिश्च तम् । ब्रह्मवेदप्रहर्तारं हयग्रीवं अवधीद्वेदमन्त्राद्यान्पालयामास च दानवम् ॥१६ ॥
केशवः । प्राप्ते कल्पेऽथ वाराहे कूर्मरूपोऽभवद्धरिः ॥१७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽग्निप्रोक्ते मत्स्यावतारवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः कूर्मावतारकथावर्णनम् अग्निरुवाच वक्ष्ये कूर्मावतारं च संश्रुतं पापनाशनम् । पुरा देवासुरे युद्धे दैत्यैर्देवाः पराजिताः ॥ १ ॥
दुर्वाससश्च शापेन निश्रीकाश्चाभवंस्तदा । सुराः क्षीराब्धिगं विष्णुमूचुः पालय वै सुरान् ॥२ ॥
ब्रह्मादिकान् हरिः प्राह सन्धिं कुर्वन्तु चासुरैः । क्षीराब्धिमथनार्थं च अमृतार्थं श्रिये सुराः ॥३ ॥
अरयोऽपि हि सन्धेयाः सति कार्यार्थगौरवे । युष्मानमृतभाजोऽथ ' करिष्यामि न दानवान् ॥४ ॥
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च ' वासुकिम् । क्षीराब्धि मत्सहायेन निर्मथत ह्यतन्द्रिताः ॥५ ॥
स्तुतियों से सन्तुष्ट करके उनके मुख से सम्पूर्ण पापों को नष्ट करनेवाले मत्स्यपुराण को सुना । ( उस कल्प में ) भगवान् ने ब्रह्मा और वेदों को नष्ट करनेवाले दानव हयग्रीव को मारकर वेदमन्त्रों और शास्त्र आदि की रक्षा की थी । तत्पश्चात् वाराह कल्प में भगवान् ने कूर्म अवतार धारण किया था ॥ १५-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अग्निदेव द्वारा कथित मत्स्यावतार वर्णन नामक दूसरा अध्याय समाप्त || २ || अध्याय ३ कूर्मावतार की कथा का वर्णन अग्नि बोले- अब मैं कूर्मावतार का वर्णन करूँगा, जो श्रवणमात्र से पापों को नष्ट करनेवाला है । प्राचीनकाल में देवासुर संग्राम में देवता लोग असुरों से हार गये थे ॥१ ॥ ( उस समय पराजित होने के साथ - साथ ) वे
दुर्वासा ऋषि के शाप से श्रीहीन भी हो गये थे । तब वे देवता क्षीरशायी विष्णु भगवान् से बोले - ' ( हे प्रभो! ) हम देवताओं की ( राक्षसों से ) रक्षा कीजिये ॥२ ॥ ( यह सुनकर ) भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा आदि देवताओं से
कहा- ( अये देवताओ! इस समय ) क्षीरसागर के मन्थन के लिए, अमृत के लिए तथा श्री - प्राप्ति के लिए असुरों के साथ सन्धि कर लो ॥३ ॥ ( क्योंकि ) किसी महान् कार्य की सिद्धि के लिए शत्रुओं के साथ भी सन्धि
कर लेनी चाहिए । मैं तुम लोगों को ही अमृत प्रदान करूँगा, दानवों को नहीं || ४ || मन्दराचल को मथानी और वासुकि ( नाग ) को रस्सी बनाकर मेरी सहायता से आलस्यरहित होकर क्षीरसागर को मथ डालो ॥५ ॥
१ क, ङ. पातुं रुद्रेऽथ । २ घ ङ. श्रुत्वा । ३ घ. ङ. ' पप्रणाश ' । ४ ग. घ. ङ. स्तुत्वा । ५ ख. घ. हि । ६ ख. ग. कार्यस्य गौ । ७ घ.. ङ जो हि कारयामि । ८ ग. घ. ङ. तु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७० विष्णूक्ताः संविदं कृत्वा दैत्यैः क्षीराब्धिमागताः फणिनिश्वाससङ्ग्लाना ' हरिणाऽऽप्यायिताः सुराः कूर्मरूपं समास्थाय दधे विष्णुश्च मन्दरम् हरेण धारितं कण्ठे नीलकण्ठस्ततोऽभवत् ' गावश्चाप्सरसो दिव्या लक्ष्मीर्देवी हरिं गता ततो धन्वन्तरिर्विष्णुरायुर्वेदप्रदर्शकः अमृतं तत्करादैत्याः सुरेभ्योऽर्धं प्रदाय च तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां दैत्याः प्रोचुर्विमोहिताः तथेत्युक्त्वा हरिस्तेभ्यो गृहीत्वाऽपाययत्सुरान् हरिणाप्यरिणा छिन्नं सबाहु ' तच्छिरः पृथक् अग्निपुराणम् 1 । ततो मथितुमारब्धा यतः पुच्छं ततः सुराः ॥६ ॥
। मथ्यमानेऽर्णवे सोऽद्रिरनाधारो ह्यपोऽविशत् ॥ ७ ॥
। क्षीराब्धेर्मथ्यमानाच्च विषं हालाहलं ह्यभूत् ॥८ ॥
। ततोऽभूद्वारुणी देवी पारिजातश्च कौस्तुभः ॥ ९ ॥
। पश्यन्तः सर्वदेवास्तां स्तुवन्तः सश्रियोऽभवन् ॥१० ॥
। बिभ्रत्कमण्डलुं पूर्णममृतेन समुत्थितः ॥ ११ ॥
। गृहीत्वा जग्मुर्जम्भाद्या विष्णुः स्त्रीरूपधृक्ततः ' ॥१२ ॥
। भव भार्याऽमृतं गृह्य पाययास्मान् वरानने ॥ १३ ॥
। चन्द्ररूपधरो राहुः पिबंश्चार्केन्दुनार्पितः ॥१४ ॥
॥ कृपयाऽमरतां नीतं वरदं हरिमब्रवीत् ॥ १५ ॥
भगवान् विष्णु के ऐसा कहने पर देवताओं ने असुरों के साथ सन्धि कर ली और दैत्यों के साथ क्षीरसागर के समीप पहुँच गये । वहाँ दोनों ने मिलकर समुद्र का मन्थन प्रारम्भ कर दिया । जिधर ( वासुकि ) की पूँछ थी उधर देवता लगे हुए थे ॥६ ॥ सर्प ( वासुकि ) के ( विषाक्त ) श्वास से जब देवता घबड़ाने लगते थे तब भगवान् ( इन्द्र )
उन पर जलवृष्टि कर देते थे । समुद्रमन्थन प्रारम्भ होने पर वह मन्थन - दण्ड ( मन्दराचल ) जल में डूबने लगा, क्योंकि उसका कुछ आधार तो था ही नहीं || ७ || ( यह देखकर ) भगवान् विष्णु ने कूर्मरूप धारण करके उस मन्दर को रोक लिया । मथे जानेवाले समुद्र से ( पहले ) हलाहल विष निकला ॥८ ॥ ( उस हलाहल विष को ) कण्ठ में
धारण करने से भगवान् शंकर नीलकण्ठ हो गये । तदनन्तर वारुणी ( मदिरा ), पारिजात ( कल्पवृक्ष ), कौस्तुभ ( मणि ), कामधेनु, दिव्य अप्सराएँ और लक्ष्मी उत्पन्न हुई और उत्पन्न होते ही वह ( लक्ष्मी ) देवताओं के देखते-देखते विष्णु के पास चली गयी । लक्ष्मी की स्तुति करके सभी देवता श्रीसम्पन्न हो गये ॥९ -१० ॥ तदनन्तर आयुर्वेद के आविष्कारक, विष्णु भगवान् के अवतार धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए कमण्डलु को धारण करते हुए निकल आये ॥११ ॥ जम्भ आदि दैत्य उनके हाथ से अमृत लेकर और आधा देवताओं को देकर चलते
बने । यह देखकर विष्णु ने स्त्रीवेश धारण कर लिया ॥१२ ॥ उस रूपवती स्त्री को देखकर दैत्य मुग्ध होकर
उससे कहने लगे - अयि सुन्दरि! तुम हम दैत्यों की स्त्री बन जाओ और यह अमृत हमें पिलाओ || १३ || ' ऐसा ही हो ' कहकर ( मोहिनी रूपधारी ) भगवान् विष्णु उनसे अमृत लेकर देवताओं को पिलाने लगे । चन्द्रमा का रूप बनाकर ( देवताओं के साथ अमृत पीता हुआ ) राहु सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा पहचान लिया गया ॥१४ ॥ ( दैत्यों के
शत्रु विष्णु ने ) अपनी भुजाओं से राहु का सिर काटकर पृथक् कर दिया । परन्तु अपनी कृपा से उन्होंने ( भगवान् विष्णु ने ) राहु के उस कटे हुए शरीर को भी अमर कर दिया । तत्पश्चात् राहु ने वरदायक भगवान् विष्णु से कहा ॥१५ ॥
१ घ. ङ. ' सन्तप्ताह ' । २ ख. ग. ' तो हरः । त ' । ३ ख. ग. ' प्रवर्तकः । ४ ङ. समन्वितम् । ५ ग. पमागतः । ६ ग. गुह्यम् । ७ क्वचित्पुस्तके- ' न्दुसूचितः इतिपाठो वर्तते । ८ घ. स राहुस्तच्छि । ९ ग. कण्ठतः - शिरः । • CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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राहुर्मत्तस्तु चन्द्रार्कौ प्राप्स्येते ग्रहणंग्रहः ' तथेत्याहाथ तं विष्णुस्ततः सर्वैः २ सहामरैः दर्शयामास रुद्राय स्त्रीरूपं भगवान् हरिः नग्न‘उन्मत्तरूपोऽभूत्स्त्रियः ( याः ) केशानधारयत् स्खलितं तस्य वीर्यं कौ यत्र यत्र हरस्य हि मायेयमिति तां ज्ञात्वा स्वरूपस्थोऽभवद्धरः न जेतुमेनां शक्तो मे त्वदृतेऽन्यः पुमान्भुवि त्रिदिवस्थाः सुराश्चासन्दैत्याः " पातालवासिनः तृतीयोऽध्यायः ७१ । तस्मिन् काले च यद्दानं दास्यन्ते स्यात्तदक्षयम् ॥१६ ॥
। स्त्रीरूपं सम्परित्यज्य ' हरेणोक्तं प्रदर्शय ॥१७ ॥
। मायया मोहितः शम्भुगौरीं त्यक्त्वा स्त्रियं गतः ॥ १८ ॥
। अगाद्विमुच्य केशान्स्त्री अन्वधावच्च तां गताम् ॥१९ ॥
। तत्र तत्राभवत्क्षेत्रं लिङ्गानां कनकस्य च ॥२० ॥
। शिवमाह हरी रुद्र जिता माया त्वया हि मे ॥ २१ ॥
। ' अप्राप्ताश्चामृतं दैत्या देवैर्युद्धे निपातिताः ॥ २२ ॥
। यो नरः पठते देवविजयं त्रिदिवं व्रजेत् ॥ २३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये विद्यासारे कूर्मावतारवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
मैं राहु ग्रह हूँ, मुझसे चन्द्रमा और सूर्य ग्रहण को प्राप्त करेंगे और उस वेला में जो भी दान दिया जायगा वह अक्षय हो जायगा ॥१६ ॥ भगवान् विष्णु ने कहा - ' ऐसा ही होगा ' तदनन्तर सभी देवताओं के साथ ( रहकर ) भगवान्
विष्णु ने स्त्रीरूप छोड़ दिया । स्त्रीरूप का त्याग करने के बाद भगवान् शंकर ने भगवान् विष्णु से कहा- - ( ( मुझे वह स्त्रीरूप पुनः ) दिखाइये । ( फिर ) भगवान् विष्णु ने भगवान् शिव को स्त्रीरूप दिखा दिया । माया से मोहित होकर भगवान् शंकर ( प्रियतमा ) गौरी को छोड़कर ( उस मोहिनी ) स्त्री के पास पहुँच गये ॥१७-१८ ॥ नंगे ( काम से ) पागल रूपवाले शिव ने ( मोहिनी ) स्त्री के बालों को पकड़ लिया । वह स्त्री अपने केश छुड़ाकर भागने लगी, किन्तु ( वह कामातुर शंकर भी ) उसका पीछा किये जा रहे थे ॥१ ९ ॥ जहाँ - जहाँ पृथ्वी पर ( कामातुर शंकर जी का ) वीर्य गिरा, वहाँ - वहाँ शिवलिंग और सोने के क्षेत्र बन गये ॥२० ॥ ( अन्त में ) यह माया है - ऐसा जानकर भगवान्
शिव अपने ( वास्तविक ) रूप में आ गये । यह देखकर भगवान् विष्णु ने रुद्र से कहा- हे शिव! तुमने मेरी माया को जीत लिया है ॥२१ ॥ तुमको छोड़कर इस पृथ्वी पर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है, जो मेरी इस ( माया को ) जीत
सके । ( इस प्रकार विष्णु की माया से मुग्ध होकर ) दैत्यगण अमृत से वञ्चित होकर युद्ध में ( भी ) देवताओं के द्वारा हरा दिये गये ॥२२ ॥ ( विजयी ) देवता स्वर्ग में रहने लगे ( और ) दैत्य लोग पाताल के निवासी हो गये ।
जो मनुष्य इस देवविजय ( आख्यान ) को पढ़ता है, वह स्वर्ग चला जाता है ॥२३ ॥
श्री अग्निमहापुराण के विद्यासार प्रकरण में कूर्मावतार वर्णन नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥३ ॥
१ क. ख. घ. च. ' हः । भवेयं ये तदा दानम्! २ ङ. च. सर्वैस्तदामरैः । ३ स्त्रीरूप हरिः ग. पुस्तके नास्ति । ४.क. ख. घ. हरेणोक्तः । ५ ख. ग. ' पोऽपि स्त्रियः । ६ क. तत्र च तत्क्षे । ७ ख. ' द्धरेः । शि ' । ८ क. मे त्वामृते । ९ ग. घ. अप्राप्याथाम् । १० क. ङ. च. ' सन्यः पठेत्स दिवं । घ. सन्यः पठेत् त्रिदिवं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७२ अग्निपुराणम् अथ चतुर्थोऽध्यायः वराहनरसिंहादीनामवताराणां वर्णनम् अग्निरुवाच अवतारं वराहस्य वक्ष्येऽहं पापनाशनम् । हिरण्याक्षोऽसुरेशोऽभूद्देवाञ्जित्वा दिवि स्थितः ॥१ ॥
देवैर्गत्वा स्तुतो विष्णुर्यज्ञरूपो वराहकः । अभूत्तं दानवं हत्वा दैत्यैः सार्धं तु कण्टकम् ॥२ ॥
धर्मदेवादिरक्षाकृत्ततः सोऽन्तर्दधे हरिः । हिरण्याक्षस्य वै भ्राता हिरण्यकशिपुस्तथा || ३ ||
जितदेवयज्ञभागः सर्वदेवाधिकारकृत् । नारसिंहं वपुः कृत्वा तं जघान सुरैः सह ॥ ४ ॥
स्वपदस्थान्सुरांश्चक्रे नारसिंहः सुरैः ' स्तुतः । देवासुरे पुरा युद्धे बलिप्रभृतिभिः सुराः ॥ ५ ॥
जिताः स्वर्गात्परिभ्रष्टा हरिं ते शरणं गताः । सुराणामभयं दत्त्वा अदित्या कश्यपेन च ॥ ६ ॥
स्तुतोऽसौ वामनो भूत्वा ह्यदित्यां स क्रतुं ययौ । बलेः श्रीयजमानस्य गङ्गाद्वारे गृणन् स्तुतिम् || ७ || वेदान्पठन्तं तं श्रुत्वा वामनं वरदोऽब्रवीत् । ( ' निवारितोऽपि शुक्रेण बलिब्रूहि यदिच्छसि || ८ || तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि, वामनो बलिमब्रवीत् ) । पदत्रयं मे गुर्वर्थं देहि दास्ये तमब्रवीत् ॥९ ॥
अध्याय ४ वराहनृसिंह आदि अवतारों का वर्णन अग्नि बोले- ( अब मैं ) पापनाशक वराहावतार का वर्णन करूँगा । हिरण्याक्ष नामक एक दैत्यराज था, जो देवताओं को जीतकर स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो गया ॥ १॥ देवताओं ने जाकर यज्ञरूप वराहरूपधारी भगवान् विष्णु की
स्तुति की और उन्होंने दैत्यों के साथ उस कण्टकभूत दैत्यराज हिरण्याक्ष का वध करके धर्म और देवता आदि की रक्षा की । तदनन्तर ( वराहरूपधारी ) भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये । हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु हुआ, जिसने यज्ञ में देवताओं के भाग को तो जीत ही लिया, सभी देवताओं को भी अपने अधिकार में कर लिया । भगवान् विष्णु ने नरसिंह का रूप धारण करके उसको मार डाला ॥२-४ ॥ भगवान् विष्णु ने देवताओं को उनके अपने स्थान स्वर्ग में प्रतिष्ठित कर दिया । ( इससे प्रसन्न होकर ) देवताओं ने भगवान् नृसिंह की स्तुति की । प्राचीनकाल में देवासुर-संग्राम में बलि आदि से हारकर देवता स्वर्गलोक से परिभ्रष्ट होकर भगवान् विष्णु की शरण में पहुँचे ॥ ५-५३ ॥ भगवान् ने देवताओं को अभय - दान दे दिया । अदिति और कश्यप की स्तुति से ( प्रसन्न होकर विष्णु ने ) अदिति के गर्भ से ( वामन के रूप में अवतार लिया ) । ( वामन ) यज्ञ में लगे हुए बलि के यज्ञ में गये । ( वामन ने ) गंगाद्वार में स्तुतिपाठ किया ॥६-७ ॥ इष्ट मनोरथ को पूर्ण करनेवाले बलि ने वेदपाठी वामन के वेदपाठ को सुनकर ( कुछ माँगने के लिए ) कहा । शुक्राचार्य के द्वारा मना किये जाने पर भी बलि ने कहा - आपकी जो इच्छा हो माँगिये, मैं आपको अवश्य दूँगा तब वामन ने बलि से कहा- मेरे गुरु के लिए तीन पग ( भूमि ) दे दो । बलि ने वामन से कहा - मैं दे दूँगा ॥८ - ९ ॥ १. क. ङ. च. दिवं । २ घ. ङ. साकं च । ३ ख. ग.. ङ धानासु । ४ च. रैः सह । दे । ५ घ. ङ. वै ' । दित्याश्च क्र । ६ क. ' दिव्याश्च क्र ' । ७ ख -CC च - 0. JK रे Sanskrit गुणञ्श्रुतिन् Academy ।, घ Jammu . रेऽगुणाच्छुतिम् . Digitized by SS । Foundation ८ निवारितोऽपि USA बलिमब्रवीत् ग. पुस्तके नास्ति ।
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तोये तु पतिते हस्ते वामनोऽभूदवामनः चक्रे बलिं च सुतले तच्छक्राय ददौ हरिः वक्ष्ये परशुरामस्य चावतारं शृणु द्विज अवतीर्णो हरिः शान्त्यै देवविप्रादिपालकः दत्तात्रेयप्रसादेन कार्तवीर्यो नृपस्त्वभूत् श्रान्तो ' निमन्त्रितोऽरण्ये मुनिना जमदग्निना अप्रार्थयत्कामधेनुं यदा स न ददौ तदा ( ' युद्धे परशुना राजा सधेनुः स्वाश्रमं ययौ रामे वनं गते वैरादथ रामः समागतः त्रिः सप्तकृत्वः पृथिवीं निःक्षत्रामकरोद्विभुः कश्यपाय महीं दत्त्वा महेन्द्रे पर्वते स्थितः अवतारं " च रामस्य श्रुत्वा याति दिवं नरः चतुर्थोऽध्यायः ७३ । भूर्लोकं स भुवर्लोकं स्वर्लोकं च पदत्रयम् ॥१० ॥
। शक्रो देवैर्हरिं स्तुत्वा भुवनेशः सुखी त्वभूत् ॥११ ॥
। उद्धतान्क्षत्रियान्मत्वा भूभारहरणाय सः ॥ १२ ॥
। जमदग्ने रेणुकायां भार्गवः शस्त्रपारगः ॥१३ ॥
। सहस्रबाहुः सर्वोर्वीपतिः स मृगयां गतः ॥ १४ ॥
। कामधेनुप्रभावेण भोजितः सबलो नृपः ॥ १५ ॥
। हृतवानथ रामेण शिरश्छित्वा निपातित: ॥१६ ॥
। कार्तवीर्यस्य पुत्रैस्तु जमदग्निर्निपातितः ) ॥१७ ॥
। पितरं निहतं दृष्ट्वा पितॄनाशाभिमर्षितः ॥१८ ॥
। कुरुक्षेत्रे पञ्च कुण्डान् कृत्वा सन्तर्प्य वै पितॄन् ॥१९ ॥
। कूर्मस्य च वराहस्य नृसिंहस्य च वामनम् ॥२० ॥
॥२१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वराहनृसिंहवामनपरशुरामावतारवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः || ४ || ( संकल्प ) जल हाथ पर पड़ते ही वामन ने अपना विराट् रूप धारण कर लिया । उन्होंने भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को अपना तीन पग बना लिया और ( राजा ) बलि को सुतल में भेज दिया । इन्द्र को स्वर्गलोक दे डाला । देवताओं के सहित इन्द्र ने भगवान् विष्णु की स्तुति की और स्वयं भुवनेश बनकर सुखी हो गये || १०-११ ॥ हे ब्राह्मण! अब मैं परशुराम का अवतार कहूँगा । सुनो! क्षत्रियों को उद्धत जानकर पृथ्वी का बोझ दूर करने के लिए देवता और ब्राह्मण आदि का पालन करनेवाले भगवान् विष्णु ने ( विश्व ) शान्ति के लिए जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम के रूप में अवतार लिया । भृगुवंशी परशुराम शस्त्रविद्या में पारंगत थे ॥१२-१३ ॥ ( उस समय ) भगवान् दत्तात्रेय की कृपा से सहस्रबाहु कार्तवीर्य राजा हुए । हजार भुजाओंवाले और सारी पृथ्वी के स्वामी वे राजा कार्तवीर्य ( एक बार ) शिकार खेलने गये ॥१४ ॥ उस जंगल में मृगया से थके हुए महाराज कार्तवीर्य को जमदग्नि ने ( अपने आश्रम में ) निमन्त्रण
दिया और कामधेनु के प्रभाव से सेना सहित राजा को भोजन कराया ॥ १५ ॥ ( यह देखकर लोभवश ) राजा ने उस कामधेनु
को ( जमदग्नि से ) माँगा, किन्तु जब उन्होंने नहीं दिया तब बलात् उसे छीन लिया । इसके बाद परशुराम ने ( राजा का ) सिर काटकर ( उसे ) मार गिराया ॥ १६ ॥ युद्ध में परशुराम ने राजा का वध कर दिया और गाय को छीनकर उसे वह
अपने आश्रम में ले आये । ( उधर ) कार्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि का वध कर डाला ॥१७ ॥ जब परशुराम वन से लौटकर
फिर अपने आश्रम में आये तब वैर से पिता को मरा हुआ देखकर पितृ वध से क्रुद्ध होकर व्यापक परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया ( और ) कुरुक्षेत्र में पाँच कुण्ड बनवाकर ( उनसे ) पितरों का तर्पण करके, समस्त पृथ्वी कश्यप को देकर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर चले गये ॥१८-१९ ३ ॥ कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुराम की अवतार कथा सुनकर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है ॥२०-२१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वराहनृसिंहवामनपरशुराम आदि का अवतार - वर्णन नामक चौथा अध्याय समाप्त ॥४ ॥
१ च. स्वर्गलोकं प ' । २ ङ. च ' स्तर ' । ३ ग. ' रिः साक्षाद्देव ' । ४ क. शान्तो । ५ ख.. ग ' यद्धोम । ६ युद्धे निपातितः पुस्तके नास्ति । ७ क. ङ. च. ते वीस ' । ८ ख. ग. ' रोत्प्रभुः । ९ य काश्यपाय । १० क. ङ. च. रं स रा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७४ 20 रामायणमहं वक्ष्ये अग्निपुराणम् अथ पञ्चमोऽध्यायः श्रीरामावतारकथावर्णनम् अग्निरुवाच नारदेनोदितं पुरा । वाल्मीकये ' यथा तद्वत्पठितं भुक्तिमुक्तिदम् ॥१ ॥
नारद उवाच ' विष्णुनाभ्यब्जजो ब्रह्मा मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः । मरीचेः कश्यपस्तस्मात्सूर्यो वैवस्वतो मनुः || २ || ततस्तस्मात्तथेक्ष्वाकुस्तस्य वंशे ककुत्स्थकः । ककुत्स्थस्य रघुस्तस्मादजो दशरथस्ततः ॥ ३ ॥
रावणादेर्वधार्थाय चतुर्धाभूत्स्वयं हरिः । राज्ञो दशरथाद्रामः कौसल्यायां बभूव ह ॥४ ॥
कैकेय्यां भरतः पुत्रः सुमित्रायां च लक्ष्मणः । शत्रुघ्नश्चर्ष्यशृङ्गेण तासु सन्दत्तपायसात् ॥५ ॥
प्राशिताद्यज्ञसंसिद्धाद्रामाद्याश्च समाः पितुः । यज्ञविघ्नविनाशाय विश्वामित्रार्थितो नृपः ॥ ६ ॥
रामं सम्प्रेषयामास लक्ष्मणं मुनिना सह । रामो गतोऽस्त्रशस्त्राणि शिक्षितस्ताडकान्तकृत् ॥७ ॥
मारीचं मानवास्त्रेण ' मोहितं दूरतोऽनयत् । सुबाहुं यज्ञहन्तारं सबलं चावधीद्बली ॥८ ॥
अध्याय ५ श्रीरामावतारकथा का वर्णन अग्नि बोले- अब मैं रामायण की कथा को जैसे प्राचीनकाल में नारद ने वाल्मीकि से कहा था उस प्रकार से कहूँगा । ( वह रामायण कथा ) पढ़ी जाने पर ( संसार में ) भोग और ( बाद में ) मोक्ष दोनों प्रदान करती है ॥१ ॥
नारद बोले - विष्णु से पद्मयोनि ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि से कश्यप उत्पन्न हुए । कश्यप से सूर्य और सूर्य से वैवस्वत मनु हुए || २ || फिर उसी प्रकार वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकु के वंश में ककुत्स्थ हुए । ककुत्स्थ के रघु, रघु के अज और अज से दशरथ ( उत्पन्न हुए ) || ३ || रावण आदि ( दुष्टों ) का वध करने के लिए स्वयं भगवान् विष्णु चार रूपों में अवतरित हुए । राजा दशरथ के पुत्र राम कौसल्या के गर्भ से हुए । कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न उत्पन्न हुए । ऋष्य - श्रृंग ऋषि द्वारा कराये गये पुत्रेष्टि यज्ञ में सम्यक् सिद्ध हविष् को खिलाने से राम आदि ( चारों पुत्र ) पिता दशरथ के समान हुए || ४-५ ३ ॥ विश्वामित्र ने यज्ञ के विघ्नों को नष्ट करने के लिए महाराज दशरथ से राम - लक्ष्मण को माँगा । महाराज दशरथ ने मुनि के साथ अपने दोनों पुत्रों- -राम और लक्ष्मण को भेज दिया । भगवान् राम गये, ( विश्वामित्र से ) अस्त्र और शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की तथा ताड़का राक्षसी का वध करनेवाले हुए ॥६-७ ॥ भगवान् राम ने मानवास्त्र से मूर्च्छित ( करके ) मारीच को दूर पहुँचा दिया । फिर बलवान् भगवान् राम ने यज्ञ - विध्वंसक सुबाहु को उसकी सेना के सहित मार डाला || ८ || सिद्धाश्रम १ ख. ग. वाल्मीकाय । २ ग. च - सृष्ट्यर्थं च हरेर्ब्रह्मा । ३ ख. ग. घ. ' घ्न ऋष्य । ४ ख. ग. ' स्ताटका ५ क. पावकास्त्रेण । ङ. च. पावनास्त्रेण । ६ ' धीवती । ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षष्ठोऽध्यायः ७५ सिद्धाश्रमनिवासी च विश्वामित्रादिभिः सह । गतः क्रतुं मैथिलस्य द्रष्टुं चापं सहानुजः ॥ ९ ॥
' शतानन्दनिमित्तेन विश्वामित्रप्रभावतः । रामश्च ' प्रथितो राज्ञा समुनिः पूजितः ऋतौ ॥१० ॥
धनुरापूरयामास लीलया स बभञ्ज तत् । वीर्यशुल्कां स जनकः सीतां कन्यां त्वयोनिजाम् ॥११ ॥
ददौ रामाय, रामोऽपि पित्रादौ हि समागते । उपयेमे जानकीं तामूर्मिलां लक्ष्मणस्तदा ॥१२ ॥
श्रुतकीर्तिर्माण्डवी च कुशध्वजसुते तथा । जनकस्यानुजस्यैते शत्रुघ्नभरतावुभौ ॥ १३ ॥
कन्ये द्वे तूपयेमाते, जनकेन सुपूजितः । रामोऽगात्स वसिष्ठाद्यैर्जामदग्न्यं विजित्य च॥१४ ॥
अयोध्यां भरतोऽप्यागात्सशत्रुघ्नो ' युधाजितः ' ॥१५ ॥
इत्यादिमहापुराणे श्रीरामायणे बालकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः रामायणेऽयोध्याकाण्डम् नारद उवाच
भरतेऽथ गते रामः पित्रादीनभ्यपूजयत् । राजा दशरथो राममुवाच शृणु राघव ॥१ ॥
में निवास करते हुए राम अपने अनुज लक्ष्मण और विश्वामित्र आदि ऋषियों के साथ मैथिल राजा जनक के यज्ञ में ( शिव जी का ) धनुष देखने गये || ९ || ( वह यज्ञ ) शतानन्द को ( पुरोहित रूप ) निमित्त बनाकर विश्वामित्र के प्रभाव से ( हुआ ) । भगवान् राम मुनि विश्वामित्र के साथ यज्ञ में राजा जनक के द्वारा पूजित और प्रशंसित हुए ॥१० ॥
भगवान् राम ने खेल - खेल ही में धनुष पर डोरी चढ़ा दी और वह धनुष टूट गया । तब राजा जनक ने वीरता ही जिसकी कीमत थी, उस अयोनिज ( भू - पुत्री ) अपनी कन्या सीता को राम को दे दिया । पिता दशरथ आदि के आने पर भगवान् राम ने सीता जी से विवाह किया । उसी समय लक्ष्मण ने उर्मिला से ( विवाह किया ) ॥११-१२ ॥ जनक के छोटे भाई कुशध्वज की दो कन्याओं - श्रुतकीर्ति और माण्डवी का विवाह ( क्रमशः ) शत्रुघ्न और भरत से हो गया ॥ १३ ॥ जनक के द्वारा सम्मानित होकर और परशुराम को जीतकर वसिष्ठ आदि ऋषियों के साथ राम तो अयोध्या
लौट गये और भरत शत्रुघ्न के साथ अपने मामा युधाजित् के पास - ननिहाल कैकयदेश चले गये ॥१४-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण के रामायणाख्यान में बालकाण्ड - वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥५ ॥
अध्याय ६ अयोध्याकाण्ड का वर्णन नारद बोले - भरत के चले जाने पर राम माता - पिता का आदर - सत्कार करने लगे । ( कुछ समय बीतने पर ) महाराज दशरथ ने राम से कहा- ' राघव, सुनो ॥१ ॥ तुम्हारे गुणों में अनुरक्त प्रजा ने मन से तुम्हारा अभिषेक कर
१ क. चायं । २ क. सदान । ३ ख. ग. ङ. च. वक.। रा । ४ ख. ग. घ. ङ. च. रामाय । ५ ख. ग. ङ. कथितो । ६ घ, ङ, “ स्तथा । श्रु ° । ७ ङ. च. सूपूजिताः । ८ क. ' घ्नोऽथ राजिताम् । ख. ग. ङ. घ्नो युधाजितम् । ९ पुरीमिति शेषः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ७६ गुणानुरागाद्राज्ये त्वं प्रजाभिरभिषेचितः रात्रौ त्वं सीतया सार्धं संयतः सुव्रतो भव दृष्टिर्जयन्तो विजयः सिद्धार्थो राज्यवर्धनः पित्रादिवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स राघवः राजोवाच वसिष्ठादीन् रामराज्याभिषेचने अयोध्यालङ्कृतिं दृष्ट्वा ज्ञात्वा रामाभिषेचनम् पादौ गृहीत्वा रामेण कर्षिता सापराधतः कैकेयि " त्वं समुत्तिष्ठ रामराज्याभिषेचनम् कुब्जयोक्तं च तच्छ्रुत्वा एकमाभरणं ददौ उपायं ३ तं न पश्यामि भरतो येन राज्यभाक् । मनसाहं प्रभाते ते यौवराज्यं ददामि ह ॥ २ २ ॥ ॥ । राज्ञश्च मन्त्रिणश्चाष्टौ सवसिष्ठस्तथाऽब्रुवन् ॥३ ॥
। अशोकों धर्मपालश्च सुमन्त्रः सवसिष्ठकः ॥ ४ ॥
। स्थितो देवार्चनं कृत्वा कौसल्यायै निवेद्य तत् ॥५ ॥
। सम्भारान् सम्भरन्तु ' स्म इत्युक्त्वा कैकेयीं गतः ॥६ ॥
॥ भविष्यतीत्याचचक्षे कैकेयीं मन्थरा सती ॥ ॥७ ७ ॥ ॥ । तेन वैरेण सा रामं वनवासं च काङ्क्षति ॥८ ॥
। मरणं तव पुत्रस्य मम ते नात्र संशयः ॥ ९ ॥
। उवाच मे यथा रामस्तथा " मे भरतः सुतः ॥ १० ॥
। कैकेयीमब्रवीत्कुद्धा १४ हारं त्यक्त्वाथ मन्थरा ॥ ११ ॥
मन्थरोवाच वालिशे रक्ष भरतमात्मानं मां च राघवात् । भविता राघवो राजा राघवस्य ततः सुताः १५ ॥१२ ॥
राजवंशस्तु कैकेयि, भरतात्परिहास्यते । देवासुरे पुरा युद्धे शम्बरेण हताः सुराः ॥ १३ ॥
( ही ) दिया है । प्रात: काल मैं ( भी ) तुम्हें युवराज का पद प्रदान कर दूँगा ॥२ ॥ रात्रि में तुम सीता के साथ संयमपूर्वक
व्रत का पालन करना । ' राजगुरु वसिष्ठ के साथ राजा के आठ मन्त्रिगण - दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक, धर्मपाल और सुमन्त्र ने भी इसका समर्थन किया ॥३-४ ॥ पिता, राजगुरु और मन्त्रियों का अभिमत सुनकर राम ने ' ऐसा हो ' कहकर तथा उस ( समाचार ) को कौशल्या को सुनाकर, देव - पूजन करके ( व्रतयुक्त ) हो गये || ५ || महाराज दशरथ वसिष्ठ आदि से ‘ राम के राज्याभिषेक की सामग्री जुटायी जाय ', ऐसा कहकर कैकेयी के पास चले गये || ६ || इधर राजधानी अयोध्या की शोभा देखकर और ( दूसरे दिन ) राम का अभिषेक होगा - यह जानकर दुष्टा मन्थरा ने कैकेयी से कहा ॥७ ॥
( बात यह थी कि एक बार ) किसी गलती पर भगवान् राम ने उसका पैर पकड़कर घसीटा था । उसी दुश्मनी से मन्थरा भगवान् राम का वनवास चाहती थी ॥८ ॥ ( मन्थरा कैकेयी के पास जाकर बोली ) - हे कैकेयी! तुम उठ जाओ । राम
के राज्याभिषेक ( का अर्थ ) तेरी, तेरे पुत्र की ( और ) मेरी मौत ( ही है ) इसमें कोई सन्देह नहीं || ९ || कुबड़ी ( मन्थरा ) की इस बात को सुनकर कैकेयी ने अपना एक आभूषण उतारकर उसे दे दिया और बोली- जैसे राम मेरे हैं वैसे ही भरत मेरे पुत्र हैं || १० || मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं सूझ रहा है जिससे भरत राज्य के अधिकारी ( भोक्ता ) हो सकें । इसके बाद कुपित होकर, हार का परित्याग करके मन्थरा कैकेयी से बोली ॥११ ॥
मन्थरा बोली - ‘ अयि मूर्खे! राम से भरत की, अपनी और मेरी रक्षा करो । ( अभी ) राम राजा होंगे तत्पश्चात् उनकी सन्तान राज्य की अधिकारी होगी ॥१२ ॥ कैकेयी! इस प्रकार तो राजवंश भरत के हाथ से निकल जायगा ।
( क्या तुम्हें स्मरण नहीं कि ) आज से वर्षों पहले देवासुर संग्राम में शम्बर ने देवताओं को पराजित कर दिया था ॥१३ ॥
६ क. ' १ को क. मन्त्रपा ङ. गुणान्धरागा ' । च. गुणान्धकाराद्रा । २ ङ. त्वां । ३ क. ' श्चाशु स ' । ४ ख. ' स्तदाऽनु ' । ५ ग. घ. राष्ट्रवर्धनः । गतिम् ' । ७ क. ख. ग. घ. ङ. कौशल्या ' । ८ क. ख. घ. ' भवन्तु । ९ घ. ' रा सखी । पा । १० क. च. च. कां । कै ' । ग. ङ. च. काङ्क्षती । कै । ११ क. ग. कैकेयी । ख. घ. ङ. कैकयि । १२ च. रामो भरतो मत्सुतस्तथा । ङ.। १३ ख. ग. घ. ङ. च. ' यं तु न । १४ क. ' वीत्कुब्जा हा ' । १५ ख. घ. सुतः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA