अग्नि पुराण — पृष्ठ 81–90

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

अग्नि पुराण, पृष्ठ 81 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ठोऽध्यायः ७७ रात्रौ भर्ता गतस्तत्र रक्षितो विद्यया त्वया । रामस्य च वने वासं नव वर्षाणि पञ्च च । प्रोत्साहिता कुब्जया सा अनर्थे चार्थदर्शिनी । क्रोधागारं प्रविश्याथ पतिता भुवि मूच्छिता । ददर्श कैकेयीं रुष्टामुवाच कथमीदृशी । येन रामेण हि विना न जीवामि मुहूर्तकम् । सत्यं ब्रूहीति सोवाच नृप मह्यं ददासि चेत् । चतुर्दश समा रामो वने वसतु संयतः " । विषं पीत्वा मरिष्यामि दास्यसि त्वं न चेन्नृप 1 । मुहूर्ताच्चेतनां प्राप्य कैकेयीमिदमब्रवीत् वरद्वयं तदा प्रादाद्याचेदानीं नृपं च यत् ॥१४ ॥

यौवराज्यं च भरते तदिदानीं प्रदास्यति ॥१५ ॥

उवाच सदुपायो ' मे कथितः स करिष्यति ॥१६ ॥

द्विजादीनर्चयित्वाथ दशरथस्तदा ॥१७ ॥

रोगार्ता किं भयोद्विग्ना किमिच्छसि करोमि तत् ॥१८ ॥

शपामि तेन कुर्यां ते वाञ्छितं तव सुन्दरि ॥१९ ॥

वरद्वयं पूर्वदत्तं सत्यार्थ देहि मे नृप ॥ २० ॥

सम्भारैरेभिरद्यैव भरतोऽत्राभिषेच्यताम् ॥२१ ॥

तच्छ्रुत्वा मूच्छितो भूमौ वज्राहत इवापतत् ॥२२ ॥

दशरथ उवाच किं कृतं तव रामेण मया वा पापनिश्चये । यन्मामेवं ब्रवीषि त्वं सर्वलोकाप्रियङ्करि ॥ २३ ॥

उस युद्ध में रात्रि के समय तुम्हारे स्वामी ( देवताओं की सहायता के लिए ) गये हुए थे । उस समय तुमने अपनी विद्या से राजा के प्राणों की रक्षा की थी । तब प्रसन्न होकर उन्होंने तुम्हें दो वर दिये थे । इस समय उन्हीं को माँग लो ॥१४ ॥ उनमें से एक वर हो राम का चौदह वर्ष के लिए वनवास और दूसरा हो भरत को यौवराज्य प्रदान करना ।

( माँगकर तो देखो ) राजा इस समय दे देंगे ॥ १५ ॥ कुबड़ी की कूटनीति से प्रोत्साहित होकर, अनर्थ में भी स्वार्थ-सिद्धि देखनेवाली कैकेयी बोली- तुमने मुझे अच्छा उपाय बतलाया । वह राजा इसे अवश्य करेगा ॥१६ ॥ इसके बाद

कोप - भवन में जाकर कैकेयी भूमि पर गिरकर मूर्च्छित हो गयी । तदनन्तर राजा दशरथ ने द्विज और देवताओं की पूजा से निवृत्त होकर देखा कि कैकेयी रुष्ट ( पड़ी हुई ) है । उन्होंने पूछा- तुम्हारी ऐसी अवस्था क्यों हो गयी है? क्या तुम किसी रोग से पीड़ित हो? अथवा किसी भय से उद्विग्न हो? कहो क्या चाहती हो? मैं अवश्य उसको पूरा करूँगा ॥१७-१८ ॥ अयि सुन्दरि! जिन राम के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता हूँ, उनकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे मनोरथ को अवश्य पूर्ण करूँगा ॥ १ ९ ॥ उसने कहा- हे महाराज! सच - सच कहना । यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो, तो उन दो वरों को दो जिन्हें तुम मुझे पहले ही दे चुके हो - आज अपनी बात को सत्य कर दो ॥२० ॥ पहला वर है कि राम संयमपूर्वक चौदह वर्ष वन में रहें और इन सामग्रियों से जिनसे राम

का राज्याभिषेक होनेवाला था, आज ही यहीं उनसे भरत का अभिषेक कर दो ॥२१ ॥ हे महाराज! यदि तुम ऐसा

नहीं करोगे तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी । कैकेयी की इन बातों को सुनकर राजा दशरथ मूर्च्छित हो गये और वज्राहत के समान पृथ्वी पर गिर पड़े । थोड़ी देर बाद चेतना लौटने पर वे कैकेयी से कहने लगे ॥२२ ॥

दशरथ बोले - अयि! तुम तो पाप करने पर तुल गयी हो । अरे राम ने अथवा मैंने ही तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुम ऐसा कह रही हो? हे सम्पूर्ण संसार का अप्रिय करनेवाली! केवल तुम्हारा ही प्रिय मनोरथ पूर्ण करके मैं संसार १ क. ङ. च. स त्वया यन्मे कथितं कारयिष्यति । ख. घ. सदुपायं मे कच्चित्तं कारयिष्यति । २ स दशरथः । ख. घ. च. प्रविष्टाऽथ । ४ घ. सत्यात्त्वं । ५ क. ग. संगतः । ६ ख. ग. ङ. च. ' भिषिच्य । ७ ग. न मे नृप । ३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 82

अग्नि पुराण, पृष्ठ 82 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८ अग्निपुराणम् केवलं त्वत्प्रियं कृत्वा भविष्यामि सुनिन्दितः प्रशाधि विधवा राज्यं मृते मयि गते सुते । कैकेय्या वञ्चितो राम राज्यं कुरु निगृह्य माम् । " पितरं चैव कैकेयीं नमस्कृत्य प्रदक्षिणम् । सीतया भार्यया सार्धं सरथः ससुमन्त्रकः ।

मातृभिश्चैव पित्राद्यैः शोकार्तैर्निर्गतः पुरात् ।

प्रभाते तमपश्यन्तोऽयोध्यां ते पुनरागतः ॥

पौरा जनाः स्त्रियः सर्वा रुरुदू राजयोषितः । गुहेन पूजितस्तत्र इङ्गुदीमूलमाश्रितः । सुमन्त्रं सरथं त्यक्त्वा " प्रातर्नावाऽथ २ जाह्नवीम् । भरद्वाजं नमस्कृत्य चित्रकूटगिरिं ययुः ॥ न ' त्वं भार्या कालरात्रिर्भरतो नेदृशः सुतः ॥२४ ॥

सत्यपाशनिबद्धस्तु राममाहूय चाब्रवीत् ॥ २५ ॥

त्वया वने तु वस्तव्यं कैकेयी भरतो नृपः ५ ॥ २६ ॥

कृत्वा नत्वा च कौसल्यां समाश्वास्य सलक्ष्मणः ॥ २७ ॥

दत्त्वा दानानि विप्रेभ्यो दीनानाथेभ्य एव सः ॥ २८ ॥

उषित्वा तमसातीरे रात्रौ पौरान् विहाय च ॥ २ ९ ॥ रुदन् राजापि कौसल्यागृहमागात्सुदुःखितः ॥ ३० ॥

रामो रथस्थश्चीराढ्यः शृङ्गवेरपुरं ययौ ॥ ३१ ॥

लक्ष्मणः सगुहो रात्रौ चक्रतुर्जागरं हि तौ ॥ ३२ ॥

रामलक्ष्मणसीताश्चः तीर्त्वा तेऽगुः प्रयागकम् ॥३३ ॥

वास्तुपूजां तत्र ४ कृत्वा स्थिता मन्दाकिनीतटे ॥ ३४ ॥

में निन्दित हो जाऊँगा । तुम मेरी भार्या नहीं, तुम तो मेरी कालरात्रि हो । भरत ऐसा ( अर्थात् तुम्हारी तरह ) पुत्र नहीं है ॥२३-२४ ॥ ( ' अच्छा तो अब ) मेरे मर जाने और पुत्र राम के वन चले जाने पर तुम विधवा होकर शासन करो । ' ( कैकेयी से ऐसा कहकर ) सत्य के फंदे से बँधे हुए महाराज दशरथ ने राम को बुलाकर कहा- ॥२५ ॥ हे राम! कैकेयी

ने मुझे ठग लिया । तुम मुझे गिरफ्तार करके राज्य करो । ( कैकेयी ने वर माँगा है कि ) तुम वन में निवास करो और कैकेयी ( -सहित उस ) का पुत्र भरत राजा बने || २६ || ( पिता की इस बात को सुनकर ) राम ने पिता ( दशरथ ) और कैकेयी को नमस्कार किया । उन्होंने दोनों की प्रदक्षिणा की । तत्पश्चात् माता कौशल्या को प्रणाम करके तथा उनको सान्त्वना देकर लक्ष्मण तथा भार्या सीता सहित और सुमन्त्र के साथ रथ पर सवार होकर ( राम वन को चल पड़े । ) चलते समय उन्होंने ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान दिया और शोकविह्वल माताओं और पिता तथा अन्य हितचिन्तकों के साथ अयोध्या नगर से बाहर निकल गये । सरयू ( तमसा? ) नदी के तट पर रात बिताकर अयोध्यावासियों को छोड़कर ( राम आगे वन को चल पड़े । ) प्रात: काल राम को न देखकर सब पुरवासी पुनः अयोध्या लौट आये । अत्यन्त दुःखित राजा भी रोते हुए कौशल्या के भवन में आ गये ॥२७-३० ॥ सब पुरवासी, स्त्रियाँ और रानियाँ धाड़ मार - मारकर रोने लगीं । ( उधर ) राम चीर धारण करके रथ पर बैठकर शृङ्गवेरपुर चले गये || ३१ || वहाँ निषादराज गुह ने भगवान् की पूजा की । राम ने एक इङ्गुदीवृक्ष के नीचे आश्रय लिया और गुह के साथ लक्ष्मण रात भर जागते रह गये ॥३२ ॥ प्रात: काल राम

ने मन्त्री सुमन्त्र को रथ के सहित लौटा दिया । राम, लक्ष्मण और सीता नाव से गङ्गापार करके प्रयाग गये ॥३३ ॥ वहाँ भरद्वाज

ऋषि को नमस्कार करके चित्रकूट पर्वत पर गये । वहाँ पर वास्तु - पूजा करके मन्दाकिनी नदी के किनारे रहने लगे ॥३४ ॥

१ घ. या त्वं भार्या कालरात्रिर्भर । २ क. ङ. च. “ पाशेन ब ' । ३ अर्थपूरणायात्र अथवा इति ग्राह्यम् । ४ भवत्विति शेषः कौशल्या । ५ ‘ इति दशरथवाक्यं श्रुत्वा रामः ' इत्यर्थपूरणायात्र ग्राह्यम् । ६ ख. ग. न । ७ रामो गत इति शेषः । ८ रुदन् मातापि १२ क. ङ गृहमागात्सुदुःखिता . च ' वा च. जा ' ॥ १३ ९ ग ग.. तः ' श्च । सस्त्रीकः ययुस्तीर्णाः सानुजी रामः शृ । १० क. ङ. च. ' त्रौ ददतु ' । ११ प्रातःकालेऽथ । प्र ० । घ. ' श्च तीर्णा आपुः प्र । १४ घ. ग. ततः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 83

अग्नि पुराण, पृष्ठ 83 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ठोऽध्यायः सीतायै दर्शयामास चित्रकूटं च राघवः ऐषिकास्त्रेण (? ) शरणं ' प्राप्तो देवान् विहाय सः कौशल्यायै कथां पूर्वां यदज्ञानाद्धतः पुरा ' शब्दभेदाच्च कुम्भेन शब्दं कुर्वंश्च तत्पिता पुत्रं विना मरिष्यावस्त्वं ' च शोकान्मरिष्यसि कथामुक्त्वाथ ' हा राममुक्त्वा राजा दिवं गतः । सुप्रभाते शयानं तं सूतमागधवन्दिनः । कौशल्या तं मृतं ज्ञात्वा हा हतास्मीति चापतत् " वसिष्ठेन च तत्कालमानीतो भरतः किल । दृष्ट्वा सशोकां कैकेयीं निन्दयामास दुःखितः । पितरं तैलद्रोणीस्थं संस्कृत्य सरयूतटे । ७ ९ । नखैर्विदारयन्तं तं काकं तच्चक्षुराक्षिपत् ॥ ३५ ॥

। रामे वनं गते राजा षष्ठेऽह्निनिशि चाब्रवीत् ॥ ३६ ॥

। कौमारे सरयूतीरे यज्ञदत्तकुमारकः ॥३७ ॥

। शशाप विलपन्मात्रा ' शोकं कृत्वा रुदन्मुहुः ॥३८ ॥

। पुत्रं विना स्मरशोकात्कौशल्ये मरणं मम ॥३९ ॥

सुप्तं मत्वाऽथ कौशल्या सुप्ता शोकार्तमेव सा ॥४० ॥

( ' प्रबोधका बोधयन्ति न च बुध्यत्सयौ नृपः ॰ ) ॥४१ ॥

। नरा नार्योऽथ रुरुदुस्तैलद्रोण्यां निधाय तम् ॥४२ ॥

सुमन्त्राद्यैः सशत्रुघ्नः शीघ्रं राजगृहात्पुरीम् ॥४३ ॥

अकीर्तिः पातिता मूर्ध्नि कौशल्यां स प्रशस्य च ॥४४ ॥

वसिष्ठाद्यैर्जनैरुक्तो राज्यं कुर्विति सोऽब्रवीत् ॥ ४५ ॥

वहाँ उन्होंने सीता को चित्रकूट का दर्शन कराया । सीता जी पर नखों से चोट करनेवाले उस कौए ( जयन्त ) को राम ने सींक के बाण से मारकर उसके एक नेत्र को फोड़ डाला । वह कौआ ( रूपधारी इन्द्रपुत्र ) जयन्त देवताओं को छोड़कर भगवान् की शरण में आ गया ॥३५-३५३ ॥ राम के चले जाने के छठे दिन, रात में दशरथ ने कौशल्या से पहले का वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया कि किस प्रकार उन्होंने ( अपनी ) कुमारावस्था में अज्ञानवश सरयू - तट पर घड़ा भरने के शब्द को सुनकर शब्दवेधी बाण से यज्ञदत्त के पुत्र श्रवणकुमार का वध कर दिया था ॥ ३६-३७३ ॥ श्रवणकुमार की माता जब रो - रोकर विलाप कर रही थी, उस समय उसके पिता ने शोक करते हुए बार - बार रोते हुए राजा दशरथ को शाप दिया था - ' हम दोनों तो पुत्र के बिना मर ही रहे हैं, तू भी पुत्र - शोक से मरेगा । ' अतः अयि कौशल्ये! पुत्र ( राम ) के बिना उसका स्मरण करते हुए शोक से मेरी मृत्यु हो जायगी । इस कथा को कहकर ' हा राम ' ऐसा कहकर राजा स्वर्ग चले गये । कौशल्या महाराज दशरथ को शोक से कातर ( अतः ) सोया हुआ समझकर सो गयीं ॥ ३८-४० ॥ दूसरे दिन सवेरे ( राजा को ) जगानेवाले सूत, मागध और बन्दिजन महाराज दशरथ को जगाने लगे परन्तु वह जागे ही नहीं ॥४१ ॥ अब

कौशल्या उनको मृत समझकर ' हाय, मैं मर गयी ' ऐसा कहकर गिर पड़ीं । राज्य के सब नर और नारी रोने लगे । राजा ( के शरीर ) को तेल की कुण्डी में रखकर वसिष्ठ ने तत्काल ही सुमन्त्र आदि को भेजकर शत्रुघ्न सहित भरत को राजगृह ( ननिहाल ) से अयोध्या नगर में बुलवा लिया || ४२-४३ ॥ दुःखी भरत ने शोकार्त कैकेयी को देखकर उसकी निन्दा की । और सारा कलंक कैकेयी के सिर मढ़ दिया और माता कौशल्या की प्रशंसा करके तेल की कुण्डी में रखे हुए पिता के शव का सरयू नदी के किनारे संस्कार किया । वसिष्ठ आदि ऋषियों के द्वारा राज्य सँभालने के लिए कहे जाने पर भरत ने कहा – मैं राम को बुलाने के लिए जा रहा हूँ । मेरे मत से बलवान् राम ही राजा हैं ॥४४-४५ ॥ ( यह कहकर १ क. ङ. च. वः । एकास्त्रेणैव श ' । २ क. घ. कौशल्यां स कथां पौर्वां । ३ क. सरयूतीरे । ४ क. ङ. च. " दत्तः कुमा ' । ५ ‘ शब्दभेदात् मुहुः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ६ यज्ञदत्तमात्रा सहेत्यर्थः । ७ क. ङ. च. ' ष्यामि त्वं च । ८ क. ङ. च. ' थ वा राममुक्तो रा ' । ९ प्रबोधका नृपः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । १० ख. घ. मृतः । ११ ख. घ. चाब्रवीत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 84

अग्नि पुराण, पृष्ठ 84 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ८० राजा मतो बली ॥ शृङ्गवेरं प्रयागं च भरद्वाजेन भोजितः ॥ ४६ ॥

व्रजामि राममानेतुं रामो गतो राम अयोध्यायां नृपो भव ॥ ४७ ॥

नमस्कृत्य भरद्वाजं रामं लक्ष्मणमागतः । पिता स्वर्गं प्रयास्यामि त्वदादेशप्रतीक्षकः । रामः श्रुत्वा जलं दत्त्वा गृहीत्वा पादुके व्रज ॥४८ ॥

अहं वनं भरतश्चागान्नन्दिग्रामे स्थितो बली ॥ ४ ९ ॥ राज्यायाहं न यास्यामि सत्याच्चीरजटाधरः । रामोक्तो ॥५० ॥

त्यक्त्वाऽयोध्यां पादुके ते पूज्य राज्यं प्रपालयत् इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामाख्यानेऽयोध्याकाण्डे षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः रामायणेऽरण्यकाण्डवर्णनम् नारद उवाच रामो वसिष्ठं मातृश्च नत्वात्रिं च प्रणम्य सः । अनसूयां च तत्पत्नीं शरभङ्गं सुतीक्ष्णकम् ॥१ ॥

अगस्त्यभ्रातरं नत्वा अगस्त्यं तत्प्रसादतः । धनुः खड्गं च सम्प्राप्य दण्डकारण्यमागतः ॥२ ॥

राम को बुलाने के लिए भरत जी चल पड़े ) भरत जी शृङ्गवेरपुर के बाद प्रयाग में आये जहाँ भरद्वाज ने उन्हें भोजन कराया ॥४६ ॥ भरत ने भरद्वाज को प्रणाम करके राम और लक्ष्मण के समीप जाकर कहा - ' हे भाई राम! पिता जी स्वर्ग

सिधार गये हैं । अब आप अयोध्या में चलकर राजा होइये ॥४७ ॥ आपका आज्ञाकारी मैं वन को चला जाऊँगा । ' राम

ने यह सुनकर पिता को जलाञ्जलि दी और भरत से कहा- तुम मेरी खड़ाऊँ लेकर लौट जाओ ॥४८ ॥ मैंने तो सत्य

की रक्षा के लिए चीर और जटा धारण कर लिया है, अतः राज्य के लिए अयोध्या नहीं जाऊँगा । राम के ऐसा कहने पर बलशाली भरत लौट गये और अयोध्या को छोड़कर नन्दिग्राम में रहने लगे । वे वहाँ पादुकाओं की पूजा करते हुए वहीं से राज्य का सञ्चालन भी करते थे ॥४ ९ -५० ॥ श्री अग्निमहापुराण के रामाख्यानान्तर्गत अयोध्याकाण्ड वर्णन नामक छठवाँ अध्याय समाप्त ॥६ ॥

अध्याय ७ अरण्यकाण्ड वर्णन नारद बोले - राम ने पहले चित्रकूट में आये हुए गुरु वसिष्ठ और माताओं को नमस्कार करके विदा किया । तत्पश्चात् अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया, शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य के भ्राता ( अग्निजिह्व ) और अगस्त्य मुनि को नमस्कार करके उनकी कृपा से तलवार और धनुष प्राप्त करके राम दण्डकारण्य पहुँचे ॥१-२ ॥ दण्डकारण्य १ क. ङ. च. ' वेरप्र ' । २ अहं प्रतीक्षकः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ३ ग. ' प्ररक्ष ' । ४ ग. सत्यं चीर ' । ५ ख. ग. घ. राज्यमपा ' । ६ क. ग. तत्प्रमाणतः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 85

अग्नि पुराण, पृष्ठ 85 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तमोऽध्यायः ८१ जनस्थाने पञ्चवट्यां स्थितो गोदावरीतटे । तत्र शूर्पणखाऽऽयाता भक्षितुं रामं सुरूपं दृष्ट्वा सा कामिनी वाक्यमब्रवीत् तान्भयङ्करी ॥३ ॥

॥४ ॥

शूर्पणखा उवाच कस्त्वं कस्मात्समायातो भर्ता मे भव चार्थितः । एतौ च भक्षयिष्यामि इत्युक्त्वात्तं

तस्य नासां च कर्णौ च रामोक्तो लक्ष्मणोऽच्छिनत् । रक्तं क्षरन्ती समुद्यता ॥५ ॥

प्रययौ खरं भ्रातरमब्रवीत् ॥६ ॥

मरिष्यामि विनासाऽहं खर जीवामि वै तदा । रामस्य जाया ' सीताऽस्ति तस्यासील्लक्ष्मणोऽनुजः ॥७ ॥

तेषां यद्रुधिरं कोष्णं पाययिष्यसि मां यदि । खरस्तथेति तामुक्त्वा चतुर्दशसहस्रकैः ॥८ ॥

रक्षसां दूषणेनागादथ त्रिशिरसा सह । रामं, रामोऽपि युयुधे शरैर्विव्याध राक्षसान् ॥९ ॥

हस्त्यश्वरथपादातं बलं निन्ये यमक्षयम् । त्रिशीर्षाणं खरं रौद्रं युध्यन्तं चैव दूषणम् ॥१० ॥

ययौ शूर्पणखा लङ्कां रावणाग्रेऽपतद्भुवि । अब्रवीद् रावणं क्रुद्धा न त्वं राजा च े रक्षकः ॥११ ॥

खरादिहन्तू रामस्य सीतां भार्यां हरस्व च । रामलक्ष्मणरक्तस्य पानांज्जीवामि नान्यथा ॥ १२ ॥

तथेत्याह च तच्छ्रुत्वा मारीचं प्राह वै व्रज । स्वर्णचित्रमृगो भूत्वा रामलक्ष्मणकर्षकः ॥१३ ॥

सीताग्रे, तां हरिष्यामि अन्यथा मरणं तव । मारीचो रावणं प्राह रामो मृत्युर्धनुर्धरः ५ ॥१४ ॥

में भगवान् राम गोदावरी नदी के किनारे पञ्चवटी में रहने लगे । उन वन में शूर्पणखा नाम की एक भयङ्कर राक्षसी उनको खा जाने के अभिप्राय से आयी || ३ || परन्तु राम के मनोहर रूप को देखकर वह काम के वशीभूत होकर राम से कहने लगी ॥४ ॥

शूर्पणखा बोली- तुम कौन हो? किस देश से यहाँ आये हो? मैं तुमसे प्रार्थना करती हूँ कि तुम मेरे पति बन जाओ । किन्तु इन दोनों को तो मैं खा ही जाऊँगी, ऐसा कहकर आगे बढ़ी || ५ || राम के कहने पर लक्ष्मण ने उसके नाक और कान काट दिये । खून बहाती हुई शूर्पणखा अपने भाई खर के पास जाकर बोली- खर! मैं नककटी बनकर जीवित नहीं रह सकती हूँ । मैं तो तभी जीवित रहूँगी जब तुम राम, राम की स्त्री सीता और राम के छोटे भाई लक्ष्मण का गुनगुना रक्त मुझे पिलाओगे । खर ने कहा - ‘ ऐसा ही होगा । ' वह अपने चौदह हजार सैनिकों तथा त्रिशिर और दूषण के साथ राम से जा भिड़ा । राम भी उससे युद्ध करने लगे और बाणों से राक्षसों को मारने लगे ॥६ - ९ ॥ भगवान् राम ने युद्ध करनेवाले भयंकर खर, दूषण को और त्रिशिर को ( तथा उनके ) हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना को मारकर यमलोक भेज दिया ॥१० ॥ ( निराश

होकर ) शूर्पणखा लंका में जाकर रावण के आगे पछाड़ खाकर गिर पड़ी और क्रुद्ध होकर रावण से कहने लगी - न तो तुम राजा हो और न प्रजा - रक्षक || ११ || तुम खर आदि का वध करनेवाले राम की पत्नी सीता का हरण कर लो । मैं राम और लक्ष्मण के रक्त को पीकर ही जीवित रह सकती हूँ अन्यथा नहीं ॥ १२ ॥ उसकी बातों को सुनकर रावण ने

कहा- ' ऐसा ही होगा । ' तदनन्तर उसने मारीच से कहा- - ' " तुम सोने का विचित्र मृग बनकर राम और लक्ष्मण के समीप जाओ और सीता के सामने उनको ( छल से ) दूर हटा ले जाओ || १३ || तब मैं सीता का हरण कर लूँगा, अन्यथा ( यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो ) तुम्हारी मृत्यु निश्चित है । " यह सुनकर मारीच ने रावण से कहा - ' धनुर्धर राम साक्षात् मृत्यु हैं ' ॥१४ ॥

१ क. ग. घ. ' क्त्वा तं स ' । च. ' क्त्वाऽन्तं स । २ ख. ग. घ. भार्या सीताऽसौ । ३ च. ' जा न राक्षसः । ४ क. ख. ग. घ. ङ. च. ' चित्रो मृ । ५ ङ. मृत्युः कृतो मम । च. मृत्युर्न तद्वरम् । ६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 86

अग्नि पुराण, पृष्ठ 86 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ८२ रावणादपि मर्तव्यं मर्तव्यं राघवादपि इति मत्वा मृगो भूत्वा सीताग्रे व्यचरन्मुहुः म्रियमाणो मृगः प्राह हा सीते! लक्ष्मणेति च रावणोऽप्यहरत्सीतां हत्वा गृध्रं जटायुषम् गतो लङ्कामशोकाख्ये धारयामास चाब्रवीत् । अवश्यं यदि मर्तव्यं वरं रामो न रावणः ॥१५ ॥

। सीतया प्रेरितो रामः शरेणाथावधीच्च तम् ॥१६ ॥

। सौमित्रिः सीतयोक्तोऽथ विरुद्धं राममागतः ' ॥१७ ॥

। जटायुषा स विरथो ' अंसमादाय जानकीम् ॥१८ ॥

॥१९ ॥

रावण उवाच ‘ भव भार्या ममाग्र्या त्वं ', ' राक्षस्यो! रक्ष्यतामियम् ' । रामो हत्वाथ मारीचं दृष्ट्वा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥२० ॥

श्रीराम उवाच मायामृगोऽसौ सौमित्रे! यथा त्वमिह चागतः । तथा सीता हृता नूनं नापश्यत्स गतोऽथ ताम् ॥ २१ ॥

शुशोच विललापार्तो मां त्यक्त्वा क्व गतासि वै । लक्ष्मणाश्वासितो रामो मार्गयामास जानकीम् ॥ २२ ॥

दृष्ट्वा जटायुस्तं ' प्राह रावणो हृतवांश्च ताम् । मृतोऽथ संस्कृतस्तेन कबन्धं चावधीत्ततः ॥ २३ ॥

शापमुक्तोऽब्रवीद्रामं स त्वं सुग्रीवमाव्रज ॥२४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामायणेऽरण्यकाण्डे सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

( मारीच ने मन में सोचा- ) मुझे रावण से भी मरना है और राम से भी । यदि मुझे मरना ही है तो राम के हाथों से ही मरना श्रेयस्कर है, रावण के हाथों से नहीं ॥ १५ ॥ ऐसा निश्चित करके वह मारीच मृग बनकर सीता के सामने बार-बार घूमने लगा । सीता के कहने पर राम ने उसको बाण से मार गिराया || १६ || मरता हुआ मृग चिल्लाया- हा सीता!

हा लक्ष्मण! सुमित्रानन्दन लक्ष्मण सीता द्वारा ( कटु वचन ) कहे जाने पर राम की आज्ञा के विरुद्ध राम के समीप चले गये ॥१७ ॥ रावण ने भी जटायु नामक गीध को मारकर सीता का हरण किया । जटायु ने रावण को रथविहीन कर दिया

था, अतएव वह सीता को कन्धे पर रखकर लंका ले गया । वहाँ अशोक वन में सीता को रखकर बोला - ॥ १८-१९ ॥ रावण ने कहा- ' ( हे सीते! ) तुम मेरी पटरानी बनो । ' ' अयि राक्षसियो! तुम सब इसकी निगरानी करती रहो । ' मारीच को मारकर लौटते हुए राम ने ( मार्ग में ) लक्ष्मण को देखकर कहा- ॥२० ॥

श्रीराम बोले - अरे, सुमित्रानन्दन लक्ष्मण! वह तो कपटमृग था । तुम जैसे ही इधर आये वैसे ही, लगता है कि किसी ने जरूर सीता का अपहरण कर लिया है । ऐसा कहकर राम ( कुटी में ) आये किन्तु वहाँ उन्होंने सीता को नहीं देखा ॥२१ ॥ ( सीता को न पाकर ) भगवान् राम शोक करने लगे और व्यथित होकर विलाप करने लगे - ‘ अयि सीते!

तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी हो? ' लक्ष्मण के समझाने - बुझाने पर राम सीता की खोज में लग गये ॥२२ ॥ ( मार्ग

में ) जटायु ने राम को देखकर कहा - ' सीता को रावण हर ले गया है । ' इतना कहकर ( रावण के द्वारा घायल किये गये ) जटायु ने प्राण त्याग कर दिया । राम ने जटायु की अन्त्येष्टि क्रिया करके फिर ( मार्ग में ) कबन्ध का वध किया ॥२३ ॥

शापमुक्त होकर कबन्ध ने राम से कहा- ' आप सुग्रीव के पास जाइये ' ॥२४ ॥

श्री अग्निमहापुराण में रामायणान्तर्गत अरण्यकाण्ड वर्णन नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ॥७ ॥

१ च. मृगमागतः । २ ख. ग. भिन्नाङ्गो । ३ क. अङ्कमादाय । ख. अंसेनादाय । ग. अङ्गेनादाय । घ. अङ्केनादाय । ४ क. ' स्यो भक्ष्य ' । ५ क. ' टायुः सम्प्रा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 87

अग्नि पुराण, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टमोऽध्यायः ८३ अष्टमोऽध्यायः 1517 रामायणे किष्किन्धाकाण्डम् नारद उवाच रामः पम्पासरो गत्वाऽशोचत्स शबरीं गतः सप्ततालान्विनिर्भिद्य शरेणैकेन पश्यतः । तद्रिपुं वालिनं हत्वा भ्रातरं वैरकारिणम् । ऋष्यमूके हरीशाय, किष्किन्धेशोऽब्रवीदथ । तच्छ्रुत्वा माल्यवत्पृष्ठे चातुर्मास्यं चकार सः । तदाब्रवीत्तं रामोक्तो ' लक्ष्मणो व्रज राघवम् । समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः । इत्युक्त्वा स गतो रामं नत्वोवाच हरीश्वरः । हनूमताऽथ सुग्रीवं नीतो मित्रं चकार ह ॥१ ॥

पादेन दुन्दुभेः कायं चिक्षेप दशयोजनम् ॥२ ॥

किष्किन्धां कपिराज्यं च रुमां तारां समर्पयत् ॥३ ॥

सीतां त्वं प्राप्स्यसे यद्वत्तथा राम! करोमि ते ॥४ ॥

किष्किन्धायां च सुग्रीवो यदा नायाति दर्शनम् ॥५ ॥

न च सङ्कुचितः पन्था येन वाली ' हतो गतः ॥६ ॥

सुग्रीव आह संसक्तो गतं कालं न बुद्धवान् ॥७ ॥

11211 अध्याय ८ किष्किन्धाकाण्ड वर्णन नारद बोले - राम पम्पा सरोवर के समीप जाकर शोकयुक्त हो गये । फिर वह शबरी के आश्रम में गये, तदनन्तर हनुमान् ने उन्हें सुग्रीव के पास ले जाकर उनसे मैत्री करा दी ॥१ ॥ ( सुग्रीव के विश्वास के लिए )

देखते - ही - देखते राम ने एक बाण से ताड़ के सात वृक्षों को गिरा दिया ( और ) एक पैर से दुन्दुभि राक्षस के शरीर को दस योजन ( ४० कोस दूर फेंक दिया || २ || राम ने सुग्रीव से शत्रुता रखनेवाले उसके भाई बालि को मारकर किष्किन्धा नामक वानर - राज्य तथा रुमा और तारा को ( सुग्रीव को ) दे दिया ॥३ ॥ तदनन्तर

किष्किन्धा के महाराज सुग्रीव ने कहा- - हे राम! मैं वैसा ही उपाय करूँगा जिससे सीता आपको प्राप्त हो सके ॥४ ॥ उसकी उस बात को सुनकर भगवान् ने माल्यवान् पर्वत पर चातुर्मास्य बिताया, ( इसके बाद भी ) जब

किष्किन्धा में सुग्रीव दिखायी तक न पड़ा तब भगवान् राम द्वारा कहे जाने पर लक्ष्मण ने उस ( सुग्रीव ) से कहा-हे सुग्रीव! तुम भगवान् राम के पास जाओ ( और अपने वचन को पूरा करो ) अन्यथा वह रास्ता सँकरा नहीं है जिससे बालि मारे जाने पर गया । हे सुग्रीव! अपने वादे को पूरा करो, बालि के मार्ग को मत अपनाओ । ( लक्ष्मण के द्वारा राम के सन्देश को पाकर ) सुग्रीव ने ( लक्ष्मण से ) कहा - ' वासना में फँसे होने के कारण मुझे समय का व्यतीत होना ज्ञात ही नहीं हुआ ' यह कहकर वानरराज सुग्रीव राम के पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले- ॥५-८ ॥ १ ग. रामोक्तं । २ क. वालिहतो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 88

अग्नि पुराण, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ८४ आनीता वानराः सर्वे सीतायाश्च गवेषणे । पूर्वादौ मासपर्यन्तं मासादूर्ध्वं निहन्मि तान् । जग्मू रामं ससुग्रीवमपश्यन्तस्तु जानकीम् (? ) । दक्षिणे मार्गयामास सुप्रभाया गुहान्तिके ' । ऊचुर्वृथा मरिष्यामो जटायुर्धन्य एव सः । तच्छ्रुत्वा प्राह सम्पातिर्विहाय कपिभक्षणम् । अर्कतापाद्रक्षितोऽगाद्दग्धपक्षोऽहमत्रगः ५ ' । पश्याम्यशोकवनिकागतां लङ्कागतां किल । ज्ञात्वा, रामं ससुग्रीवं वानराः कथयन्तु वै त्वन्मताः ' प्रेषयिष्यामि विचिन्वन्तु च जानकीम् ॥९ ॥

इत्युक्ता वानराः पूर्वपश्चिमोत्तरमार्गगाः ॥१० ॥

रामाङ्गुलीयं सगृह्य हनूमान् वानरैः सह ॥११ ॥

मासादूर्ध्वं च विन्ध्यस्था ' अपश्यन्तस्तु जानकीम् ॥१२ ॥

सीतार्थे योऽत्यजत्प्राणान् रावणेन हतो रणे ॥१३ ॥

भ्रातासौ मे जटायुर्वै मयोड्डीनोऽर्कमण्डलम् ॥१४ ॥

रामवार्ताश्रवात्पक्षौ जातौ भूयोऽथ जानकीम् ॥१५ ॥

शतयोजनविस्तीर्णे लवणाब्धौ त्रिकूटके ॥ १६ ॥

॥१७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामायणे किष्किन्धाकाण्डेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

1138 सुग्रीव ने कहा - मैं सब वानरों को सीता की खोज करने के लिए ले आया हूँ । इन्हें मैं आपके आज्ञानुसार ( इधर-उघर ) भेज दूँगा जिससे ये जानकी की खोज कर सकें || ९ || उन्होंने वानरों से भी कहा- ' वानरो! पूर्व आदि दिशाओं में जाकर एक मास के अन्दर ही सीता की खोज कर लो । एक माह से अधिक होने पर मैं सबको मार डालूँगा'-यह सुनकर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं के मार्गों पर ( सीता की खोज में ) जानेवाले वानर सीता जी को न पाकर सुग्रीव सहित भगवान् राम के पास ( वापस लौट गये || १० - १०३ ॥ भगवान् राम की अँगूठी लेकर हनुमान् जी वानरों के साथ दक्षिण में सुप्रभा की गुहा के पास ( सीता जी की खोज करते रहे ॥११-११३ ॥ एक महीने से अधिक समय तक विन्ध्याचल पर भटकते हुए जब उन्होंने सीता जी को नहीं देखा तब कहने लगे- " हम लोग तो व्यर्थ ही मरेंगे । जटायु ही धन्य था जिसने सीता जी के लिए रावण द्वारा मारे जाने पर प्राण त्याग कर दिया ॥१२-१३ ॥ यह सुनकर सम्पाति ने वानरों को खा जाने का विचार छोड़कर कहा- वह जटायु तो मेरा भाई था । एक बार हम दोनों सूर्यमण्डल तक पहुँचने के उद्देश्य से उड़े || १४ || ( जटायु तो मेरे द्वारा ) सूर्य की गर्मी से बचा लिया गया और ( उसे बचाने में ) जले हुए पंखोंवाला मैं यहाँ गिर पड़ा । भगवान् राम की वार्ता सुनने से मेरे पंख पुनः उत्पन्न हो गये ॥१५ ॥ मैं यहीं से लवणसागर के बीच में सौ योजन विस्तृत त्रिकूट पर्वत पर स्थित लङ्का में अशोक वाटिका

में बैठी हुई सीता को देख रहा हूँ । हे वानरो! ( अब सीता का पता ) जानकर सुग्रीव - सहित भगवान् राम से जाकर कह दो ॥१६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण के रामायणान्तर्गत किष्किन्धाकाण्ड वर्णन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८ ॥

१ न्मतात्प्रेष । २ क. ङ. च. गुहान्तिके । ३ घ. विन्यस्ता । ४ च. ' क्षोऽय म ' । ५ घ. ' हमभ्रगः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 89

अग्नि पुराण, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः ८५ अथ नवमोऽध्यायः रामायणे सुन्दरकाण्डम् नारद उवाच सम्पातिवचनं श्रुत्वा हनूमानङ्गदादयः कपीनां जीवनार्थाय रामकार्यप्रसिद्धये दृष्ट्योत्थितं च मैनाकं सिंहिकां विनिपात्य च दशग्रीवस्य कुम्भस्य कुम्भकर्णस्य रक्षसः नापश्यत्पानभूम्यादौ सीतां चिन्तापरायणः । राक्षसीरक्षितां सीतां, भव भार्येतिवादिनम् । भव भार्या रावणस्य राक्षसीर्वादिनीः कपिः । रामोऽस्य लक्ष्मणः पुत्रौ वनवासं गतौ वरौ ॥ अब्धि दृष्ट्वाऽब्रुवंस्तेऽब्धि लङ्घयेत्को नु ' जीवयेत् ॥१ ॥

। शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवेऽब्धि स मारुतिः ॥२ ॥

। लङ्कां दृष्ट्वा राक्षसानां गृहाणि, वनितागृहे ॥ ३ ॥

। विभीषणस्येन्द्रजितो ' गृहेऽन्येषां च रक्षसाम् ॥४ ॥

अशोकवाटिकां गत्वा दृष्टवान् ( शिंशपातलें ॥५ ॥

रावणं शिंशपास्थोऽथ नेति सीतां सुवादिनीम् ) ॥६ ॥

गते तु रावणे प्राह राजा दशरथोऽभवत् ॥७ ॥

रामपत्नी जानकी त्वं रावणेन हृता बलात् ॥ ८ ॥

अध्याय ९ सुन्दरकाण्ड वर्णन नारद बोले - सम्पाति की बातों को सुनकर और साथ ही समुद्र को देखकर हुनमान्, अंगद आदि परस्पर कहने लगे कि ' हममें से कोई एक समुद्र को पार करके ( सीता का पता लगाकर ) हम सबकी प्राण रक्षा कर ले ॥१ ॥

वानरों के प्राणों की रक्षा और राम के कार्य को भी सिद्ध करने के लिए पवनपुत्र हनुमान् सौ योजन चौड़े समुद्र को लाँघ गये ॥२ ॥ उन्होंने ( मार्ग में जल के ऊपर ) उठे हुए मैनाक पर्वत को देखकर और सिंहिका को मारकर

( फिर ) लङ्का में ( जाकर सीता जी को खोजना शुरू कर दिया । ) वहाँ राक्षसों के घरों में ( सीता जी को खोजा- ) । रावण, कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभीषण, मेघनाद तथा दूसरे राक्षसों के स्त्रीगृहों में तथा मदिरालयों में भी सीता को ( खोजने पर ) चिन्ताग्रस्त हनुमान् ने नहीं पाया ॥३-४३ ॥ ( अन्त में ) अशोक वाटिका में जाकर शीशम के वृक्ष के नीचे बैठी हुई राक्षसियों से रक्षित सीता को हनुमान् जी ने देखा । शीशम के पेड़ पर बैठे हुए हनुमान् जी ने देखा कि रावण सीता जी से कह रहा है कि ' तुम मेरी पत्नी बन जाओ । ' और सीता जी ने उसके प्रस्ताव को सम्यक् प्रकार से बोलते हुएं अस्वीकार कर दिया । राक्षसियाँ भी सीता जी से कह रही थीं कि ' तुम रावण की भार्या बन जाओ ' - ऐसा हनुमान् जी ने देखा ॥५-६३ ॥ रावण के चले जाने पर हनुमान् ने ( वृक्ष पर बैठे - ही - बैठे ) कहना प्रारम्भ किया-एक थे राजा दशरथ । उनके दो श्रेष्ठ पुत्र हुए- राम और लक्ष्मण जिन्हें वनवास के लिए वन में जाना पड़ा । हे जानकी!

आप राम की पत्नी हैं । रावण ने हठात् आपका अपहरण कर लिया है ॥७-८ ॥

१ ग. ङ. न । २ क. ङ. च. दृष्ट्वा स्थितं । ३ ङ ' हे तेषां । ४ शिंशपातले सुवादिनीम् ङ. सञ्ज्ञिते पुस्तके नास्ति । ५ क. ङ. च. ' वासग ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 90

अग्नि पुराण, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ८६ माम् । साभिज्ञानं चाङ्गुलीयं रामदत्तं गृहाण वै ॥९ ॥

रामः सुग्रीवमित्रस्त्वां ' मार्गयन्त्रैषयच्च तमुवाच यदि जीवति ॥ १० ॥

सीताङ्गुलीयं जग्राह सापश्यन्मारुतिं तरौ । भूयोऽग्रे चोपविष्टं ॥११ ॥

रामः कथं न नयति शङ्कितामब्रवीत्कपिः हनुमानुवाच रामः सीते न जानाति ज्ञात्वा त्वां स नयिष्यति । साभिज्ञानं देहि मे त्वं मणिं सीताऽददात् कपौ । " काकाक्षिपातनकथां " प्रातर्याहि हि शोकहा । अथवा ते त्वरा काचित्पृष्ठमारुह मे शुभे । सीताऽब्रवीद्धनूमन्तं नयतां मां हि राघवः । वनं बभञ्ज तत्पालान्हत्वा दन्तनखादिभिः । पुत्रमक्षं कुमारं च शक्रजिच्च बबन्ध तम् । उवाच रावणः ‘ कस्त्वं ' मारुतिः प्राह रावणम् रावणं राक्षसं हत्वा सबलं देवि मा शुचः ॥१२ ॥

उवाच मां यथा रामो नयेच्छीघ्रं तथा कुरु ॥ १३ ॥

मणि कथां गृहीत्वाऽऽह हनूमान्नेष्यते पतिः ॥ १४ ॥

अद्य त्वां दर्शयिष्यामि ससुग्रीवं च राघवम् ॥ १५ ॥

हनूमान् स दशग्रीवदर्शनोपायमाकरोत् ॥ १६ ॥

हत्वा तु किङ्करान् सर्वान् सप्त मन्त्रिसुतानपि ॥१७ ॥

नागपाशेन पिङ्गाक्षं दर्शयामास रावणम् ॥१८ ॥

॥१९ ॥

राम ने सुग्रीव से मित्रता कर ली है । उन्होंने मुझे आपका पता लगाने के लिए स्मृति - चिह्न के साथ आपके पास भेजा है । अतः राम की दी हुई इस अँगूठी को ग्रहण कीजिये ॥ ९ ॥ सीता ने अँगूठी ले ली और वृक्ष पर बैठे हुए मारुति

को देखा । पुनः अपने आगे आये हुए हनुमान् से सीता ने प्रश्न किया- ' यदि राम जीवित हैं, तो क्यों नहीं मुझे यहाँ से ले जाते हैं? ' वानरराज हनुमान् ने शंकाकुला सीता को ( समझाते हुए ) कहा ॥१०-११ ॥ हनुमान् ने कहा- हे सीते! राम अभी तक आपका पता ही नहीं जानते हैं । पता लग जाने पर सेना के साथ रावण का वध करके वे अवश्य आपको ले चलेंगे । देवि! आप शोक मत कीजिये || १२ || आप भी मुझे कोई अपनी पहचान दे दीजिये । पहचान के लिए वानरराज हनुमान् को अपनी चूड़ामणि देकर सीता जी ने कहा- ' तुम ऐसा उपाय करना जिससे राम मुझे शीघ्र ही यहाँ से ले जायँ ॥१३ ॥ ( सीता ने आगे कहा- ) कौआ का रूप धारण करनेवाले इन्द्रपुत्र

की एक आँख फोड़ने की कथा को ( इस समय मुझसे सुनकर ) हे मेरे शोक को दूर करनेवाले वानर तुम कल सवेरे जाना! हनुमान् जी ने चूड़ामणि ले लिया और कथा भी सुन ली । फिर उन्होंने कहा - ' राम अवश्य आपको यहाँ से ले चलेंगे ' ॥१४ ॥ अथवा यदि आपको शीघ्रता हो तो आप मेरी पीठ पर बैठ जाइये । मैं आज ही आपको सुग्रीव के साथ

राम का दर्शन करा दूँगा ॥१५ ॥ किन्तु सीता जी ने हनुमान् जी से कहा - ' नहीं, मुझे राम ही यहाँ से ले चलें । ' तदनन्तर

हनुमान् ने रावण को देखने के लिए उपाय ढूँढ़ निकाला || १६ || उन्होंने वाटिका को उजाड़ दिया । दाँत और नाखूनों से वाटिका के राक्षसों को मार डाला । उन्होंने सभी सेवकों और सात मन्त्रिकुमारों तथा रावण के पुत्र अक्षयकुमार को भी मार डाला । इतने में इन्द्रजित् ( मेघनाद ) नागपाश से हनुमान् को बाँधकर पीले नेत्रोंवाले रावण के सामने ले गया । रावण के द्वारा यह पूछे जाने पर कि ' तुम कौन हो ' हनुमान् ने रावण से कहा- ॥१७-१९ ॥ १ ङ. ॰गयेत्प्रेषयेच्च । २ ख. ग. घ. ङ. च. जानीते । ३ ङ. ' त्कपेः । उ ° । ४ काकाक्षिपातन - कथा - रूपप्रत्यभिज्ञानं गृहीत्वा त्वं प्रातर्याहि, त्वं मच्छोकहाऽसीत्यर्थः । ५ घ. ' थां प्रतियाहि हि शोकह । म ' । ६ क. ख. ग. ङ. च. ' मानेष्य ° । ७ क. ख. च. ङ. ला ° हता द ° । ८ क. च. ' त्रमङक ' । ख. ग. ' त्रमक्षकु ' । ङ ' मुख्यं कु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA