अग्नि पुराण — पृष्ठ 721–730

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७१७ अथ पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः प्रात्यहिकराजकर्म पुष्कर उवाच अजस्त्रं कर्म वक्ष्यामि दिनं प्रति यदा चरेत् वाद्यवन्दिस्वनैर्गीतैः ' पश्येद्रूढांस्ततो नरान् आ॒यव्ययस्य श्रवणं ततः कार्यं यथाविधि स्नानं कुर्यान्नृपः पश्चाद्दन्तधावनपूर्वकम् वह्नौं ' पवित्राञ्जुहुयात्तर्पयेदुदकैः पितॄन् अनुलिप्तोऽलङ्कृतश्च मुखं पश्येच्च दर्पणे औषधं भिषजोक्तं च मङ्गलालम्भनं चरेत् तत्रस्थो ब्राह्मणान्पश्येदमात्यान्मन्त्रिणस्तथा श्रुत्वेतिहासं कार्याणि कार्याणां कार्यनिर्णयम् । द्विमुहूर्तावशेषायां रात्रौ निद्रां त्यजेन्नृपः ॥१ ॥

। विज्ञायते न ये । वेगोत्सर्गं ततः । कृत्वा सन्ध्यां । दद्यात्सकाञ्चनीं । ससुवर्णे घृते । पश्येद्गुरुं तेन । प्रकृतीश्च । व्यवहारं ततः लोकास्तदीया इति केनचित् ॥ २ ॥

कृत्वा राजा स्नानगृहं व्रजेत् ॥ ३ । । ततो जप्यं वासुदेवं प्रपूजयेत् ॥४ ॥

धेनुं द्विजाशीर्वादसंयुतः ॥५ ॥

राजा शृणुयाद्दिवसादिकम् ॥६ ॥

दत्ताऽशीर्वादोऽथ व्रजेत्सभाम् ॥७ ॥

महाभाग प्रतीहारनिवेदिताः ॥८ ॥

पश्येन्मन्त्रं कुर्यात्तु मन्त्रिभिः ॥ ९ ॥

अध्याय २३५ प्रात्यहिक राजकर्म पुष्कर बोले - अब मैं राजा की दिनचर्या बतलाऊँगा जो उसे निरन्तर करते रहना चाहिए । दो मुहूर्त रात्रि शेष रह जाने पर राजा को बाजों एवं चारणों के ( जय ) घोषों और गीतों से निद्रा का परित्याग करना चाहिए । तदनन्तर उसे गुप्तचरों से मिलना चाहिए, किन्तु गुप्तचर उसे न देख सकें और कोई भी यह न कह सके कि ' ये आपके मनुष्य हैं । ' तत्पश्चात् विधिवत् आय - व्यय के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए । उसके बाद शौच आदि से निवृत्त होकर स्नानागार में जाना चाहिए ॥१-३ ॥ वहाँ मज्जन करके स्नान करना चाहिए और फिर सन्ध्यावन्दन, जप तथा भगवान् वासुदेव का पूजन करना चाहिए || ४ || तदनन्तर अग्नि में आहुतियाँ डालनी चाहिए, पितरों का तर्पण करना चाहिए, ब्राह्मणों को सोने के साथ गोदान करना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्रप्त करना चाहिए । शरीर में चन्दन लगाकर, आभूषण पहनकर, दर्पण, सुवर्ण तथा घी में मुख देखना चाहिए । तदनन्तर राजा को दिन आदि ( के फल ) के सम्बन्ध में ( ज्योतिषियों से ) सुनना चाहिए । राजा को वैद्य की बतायी हुई ओषधियों का सेवन और मांगलिक कर्मों का आचरण करना चाहिए । उसे पहले गुरु से भेंट करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए और तब सभा में जाना चाहिए ॥५-७ ॥ वहाँ बैठकर उसे ब्राह्मण, अमात्य, मन्त्री तथा उन प्रजाओं से भेंट करना चाहिए जिसके लिए द्वारपाल ने निवेदन किया हो । पहले कार्य - विवरण की जानकारी प्रप्त करनी चाहिए फिर कार्यों ( के पौर्वापर्य ) का निर्णय करना चाहिए और तदनन्तर विवादों का निर्णय करना चाहिए और मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करनी चाहिए । १ क. ङ. श्येद्वृद्धांस्तं । २ क. ङ. वह्नावाज्यं च जुहु । ३. क. ङ. कार्यनिश्चयम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 722

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७१८ अग्निपुराणम् नैकेन सहितः कुर्यान्न कुर्याद्बहुभिः सह । मन्त्रं स्वधिष्ठितं कुर्याद्येन राष्ट्रं न बाधते । आकारैरिङ्गितैः प्राज्ञा मन्त्रं गृह्णन्ति पण्डिताः । राजा विभूतिमाप्नोति वरयन्ति नृपं हिते । नियुद्धादौ नृपः स्नातः पश्येद्विष्णुं सुपूजितम् भूषितो भोजनं कुर्याद्दानाद्यैः सुपरीक्षितम् शास्त्राणि चिन्तयेद्दृष्ट्वा योधान्कोष्ठायुधं गृहम् चारान्संप्रेष्य भुक्त्वाऽन्नमन्तः पुरचरो भवेत् न च मूर्खेर्न चानाप्तैर्गुप्तं न प्रकटं चरेत् ॥ १० ॥

आकारग्रहणे राज्ञो मन्त्ररक्षा परा. मता ॥ ११ ॥

साम्वत्सराणां वैद्यानां मन्त्रिणां वचने रतः ॥ १२ ॥

मन्त्रं कृत्वाऽथ व्यायामं चक्रे याने च शस्त्रके ॥१३ ॥

। हुतं च पावकं पश्येद्विप्रान्पश्येत्सुपूजितान् ॥१४ ॥

। भुक्त्वा गृहीतताम्बूलो वामपार्श्वेन संस्थितः ॥१५ ॥

। अन्वास्य पश्चिमां सन्ध्यां कार्याणि च विचिन्त्य तु ॥१६ ॥

। वाद्यगीतै रक्षितोऽन्यैरेवं नित्यं चरेन्नृपः ॥१७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रात्यहिकराजकर्मकथनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥

मन्त्रणा न तो केवल एक व्यक्ति के साथ करनी चाहिए और न बहुतों के साथ । मूर्ख तथा अविश्वसनीय मन्त्रियों के साथ भी मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए । गुप्त बात को ( कभी ) प्रकट नहीं करना चाहिए ॥८-१० ॥ मन्त्रणा को सुनियोजित ढंग से कार्यान्वित करना चाहिए जिससे राष्ट्र पर किसी प्रकार की विपत्ति न आ सके । राजा को अपनी चेष्टाओं से भी मन्त्रणा को प्रकट नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति आकार और चेष्टाओं से भी मन्त्रणा का पता लगा लेते हैं । ज्योतिषियों, वैद्यों तथा मन्त्रियों की बात माननेवाला राजा ऐश्वर्य प्राप्त किया करता है क्योंकि ये लोग राजा के कल्याण में ही लगे रहते हैं । मन्त्रणा करने के बाद राजा को चक्र, सवारी, शस्त्र और ( अभ्यास आदि के लिए किये गये ) युद्ध आदि से व्यायाम करना चाहिए । तदनन्तर पुनः स्नान करके यह देखना चाहिए कि भगवान् विष्णु का पूजन तो हो चुका है, अग्नि में आहुतियाँ तो दी जा चुकी हैं और ब्राह्मणों का आदर - सत्कार तो हो चुका है ॥११-१४ ॥ तदनन्तर ( नाना प्रकार के वस्त्राभूषणों से ) विभूषित होकर पहले किसी को खिलाकर परीक्षा कर लिये गये भोजन को प्राप्त करना चाहिए । भोजन करके, पान खाकर बायीं करवट लेटकर शास्त्र चिन्तन करना चाहिए । तदनन्तर अपने कोष और योद्धाओं का निरीक्षण करके सायंकालीन सन्ध्या की उपासना करनी चाहिए । उसके बाद कर्त्तव्यों का चिन्तन करते हुए गुप्तचरों को ( इधर - उधर ) भेजकर अन्तःपुर में चला जाना चाहिए, जहाँ वह सुरक्षित रहकर वाद्यगीत तथा अन्य ( भोगों ) का आनन्द प्राप्त कर सके । राजा को नित्य इसी प्रकार का आचरण करना चाहिए ॥१५-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शकुन प्रात्यहिकराजकर्म - कथन नामक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३५ ॥

१ ख. घ. छ. धारयन्ति । २ छ. निःसत्त्वादौ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 723

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षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७१ ९ अथ षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः रणदीक्षा पुष्कर उवाच यात्राविधानपूर्वं तु वक्ष्ये साङ्ग्रामिकं विधिम् । सप्ताहेन यदा यात्रा भविष्यति महीपतेः ॥ १ ॥

पूजनीयो हरिः शंभुर्मोदकाद्यैर्विनायकः । द्वितीयेऽहनि दिक्पालान्संपूज्य शयनं चरेत् ॥२ ॥

शय्यायां वा तदग्रेऽथ देवान्प्रार्च्य मनुं स्मरेत् । नमः शम्भो त्रिनेत्राय रुद्राय वरदाय च ॥ ३ ॥

वामनाय विरूपाय स्वप्नाधिपतये नमः । भगवन्देवदेवेश शूलभृद्वृषवाहन ॥४ ॥

इष्टानिष्टे मयाऽऽचक्ष्व स्वप्ने सुप्तस्य शाश्वत । यज्जाग्रतो दूरमिति पुरोधामन्त्रमुच्चरेत् ॥५ ॥

तृतीयेऽहनि दिक्पालान्रुद्रांस्तान्दिक्पतीन्यजेत् । ग्रहान्यजेच्चतुर्थेऽह्नि पञ्चमे ' चाश्विनौ यजेत् ॥६ ॥

मार्गे या देवतास्तासां नद्यादीनां च पूजनम् । दिव्यायान्तरी ( रि ) क्षभौमस्थ ( भूमिष्ठ ) देवानां च तथा बलिः ॥७ ॥

रात्रौ भूतगणानां च वासुदेवादि पूजनम् । भद्रकाल्याः श्रियः कुर्यात्प्रार्थयेत्सर्वदेवताः ॥८ ॥

वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः । नारायणोऽब्जजो विष्णुर्नारसिंहो वराहक: ॥९ ॥

शिव ईशस्तत्पुरुषो ह्यघोरो राम सत्यजः । सूर्यः सोमः कुजश्चान्द्रिर्जीवः शुक्रः शनैश्चरः ॥१० ॥

अध्याय २३६ रणदीक्षा पुष्कर बोले- अब मैं ( युद्ध के लिए ) यात्रा - विधि के साथ - साथ संग्राम की विधि का वर्णन करूँगा । ( यात्रा से ) सात दिन पूर्व से राजा को यह विधान करना चाहिए । पहले दिन मोदक आदि से भगवान् विष्णु, शङ्कर तथा गणेश की पूजा होनी चाहिए । दूसरे दिन दिक्पालों का पूजन करके शयन करना चाहिए ॥१-२ ॥ वहाँ उसी शय्या पर या उसके सामने लेटकर देवताओं की पूजा करके पुरोहित को इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए- शम्भो! आपको नमस्कार है । त्रिनेत्र, रुद्र, वरदायक, वामन, विरूप तथा स्वप्नाधिपति आपको नमस्कार है । भगवन्! देवदेवेश! शूलधारिन्! वृषवाहन! मुझे नित्य स्वप्न में आप शुभाशुभ घटनाओं को बतला दिया कीजिये और जागृतावस्था में मेरे मन पर होनेवाले प्रभावों को दूर कीजिये ॥ ३ ५ ॥ तीसरे दिन दिक्पतियों और रुद्रों की पूजा करनी चाहिए । चौथे दिन ग्रहों की और पाँचवें दिन अश्विनीकुमारों की पूजा करनी चाहिए । ( यात्रा के ) मार्ग में आनेवाले देवताओं और नदियों आदि का भी पूजन करना चाहिए । तदनन्तर आकाश, अन्तरिक्ष और भूमि पर रहनेवाले देवताओं को बलि देनी चाहिए । रात्रि में भूतगण, वासुदेव, भद्रकाली और लक्ष्मी आदि का पूजन करके सब देवताओं से प्रार्थना करनी चाहिए ॥६-८ ॥ ' वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नारसिंह, वराह, शिव, ईश, तत्पुरुष, अघोर, राम, सत्यज, सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, गणपति, कार्तिकेय, चण्डिका, उमा, १ क. ख. ग. ङ. चाखिलान्यजे ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 724

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अग्निपुराणम् ७२० राहुः केतुर्गणपतिः सेनानी च ( श्च ) ण्डिकाह्युमा । रुद्रा इन्द्रादयो वह्निर्नागास्तार्क्ष्योऽपरे सुराः । ' मर्दयन्तु रणे शत्रून्संप्रगृह्योपहारकम् । चमूनां पृष्ठतो गत्वा रिपुनाशा नमोऽस्तु वः । षष्ठेऽह्नि विजयस्नानं कर्त्तव्यं चाभिषेकवत् । नीराजनोक्तमन्त्रैश्च ह्यायुधं वाहनं यजेत् । दिव्यान्तरी ( रि ) क्षभूमिष्ठाः सन्त्वायुर्दाः सुराश्च ते । रक्षन्तु देवताः सर्वा इति श्रुत्वा नृपो व्रजेत् तद्विष्णोरिति जप्त्वाऽथ दद्याद्रिपुमुखे पदम् नागं रथं हयं चैव धुर्याश्चैवाऽऽरुहेत्क्रमात् क्रोशमात्रं गतस्तिष्ठेत्पूजयेद्देवता द्विजान् राजा प्राप्य विदेशं तु देशाचारं हि पालयेत् नावमानयेत्तद्देश्यानागत्य स्वपुरं पुनः लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा ब्रह्माणी प्रमुखा गणाः ॥११ ॥

दिव्यान्तरी ( रि ) क्षभूमिष्ठा विजयाय भवन्तु मे ॥१२ ॥

सपुत्रमातृभृत्योऽहं देवा वः शरणं गतः ॥१३ ॥

विनिवृत्तः प्रदास्यामि दत्तादप्यधिकं बलिम् ॥१४ ॥

यात्रादिने सप्तमे च पूजयेच्च त्रिविक्रमम् ॥ १५ ॥

पुण्याहजयशब्देन मन्त्रमेतन्निशामयेत् ॥१६ ॥

देवसिद्धिं प्राप्नुहि त्वं देवयात्राऽस्तु सा तव ॥ १७ ॥

। गृहीत्वा सशरं चापं धनुर्नागेतिमन्त्रतः ॥ १८ ॥

। दक्षिणं पदं द्वात्रिंशद्दिक्षु प्राच्यादिषु क्रमात् ॥१९ ॥

। आरुह्य वाद्यैर्गच्छेत पृष्ठतो नावलोकयेत् ॥ २० ॥

। परदेशं व्रजेत्पश्चादात्मसैन्यं हि पालयन् ॥ ॥२१ २१ ॥ ॥ । देवानां पूजनं कुर्यान्न च्छिन्द्यादायमत्र तु ॥ २२ ॥

। जयं प्राप्यार्चयेद्देवान्दद्याद्दानानि पार्थिवः ॥ २३ ॥

लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, ब्रह्माणी, रुद्र, इन्द्र आदि, अग्नि, नाग, गरुड़ तथा आकाश, अन्तरिक्ष और भूमि पर रहनेवाले ( सभी ) देवता मुझे विजय प्रदान करें ॥ ९ -१२ ॥ हे देववृन्द । मैं अपने पुत्र, माता तथा सेवकों के साथ आपकी शरण में आया हूँ; आप मेरे उपहार को स्वीकार करके युद्ध में मेरे शत्रुओं को मसल डालिये । मेरी सेना के पीछे की ओर से शत्रु का नाश कीजिये, आपको नमस्कार है । युद्ध से लौटने पर मैं ( पहले ) दी हुई बलि से भी अधिक बलि दूँगा । छठे दिन अभिषेक की भाँति विजय - स्नान करना चाहिए । सातवें दिन अर्थात् यात्रा के दिन त्रिविक्रम की पूजा करनी चाहिए ॥१३-१५ ॥ नीराजनोक्त मन्त्रों से शस्त्रों तथा वाहनों की पूजा करनी चाहिए । फिर पवित्र जय शब्द से युक्त इस मन्त्र को राजा के सामने पढ़ना चाहिए- ' आकाश, अन्तरिक्ष और भूमि पर रहनेवाले देवगण तुम्हें आयु प्रदान करें । तुम्हें देवसिद्धि प्राप्त हो । सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें । ' यह मन्त्र सुनकर राजा को ( युद्ध के लिए ) जाना चाहिए । राजा को ' धनुर्नाग ' इत्यादि मन्त्र से धनुष - बाण उठाना चाहिए और ' तद्विष्णो इस मन्त्र से शत्रु के मुख की प्रतिमा पर अपने दाहिने पैर से प्रहार करना चाहिए । तदनन्तर पूर्व आदि दिशाओं में क्रमशः हाथी, रथ, अश्व एवं अन्य सवारियों पर चढ़कर बाजों के साथ बत्तीस पग आगे की ओर बढ़ना चाहिए और पीछे की ओर नहीं देखना चाहिए ॥१६-२० ॥ इस प्रकार एक कोश जाकर देव - ब्राह्मणों की पूजा करके रुक जाना चाहिए । तत्पश्चात् अपनी सेनाओं की रक्षा करते हुए परदेश को जाना चाहिए । विदेश में पहुँचने पर उस देश के आचार का पालन करते हुए देवताओं का पूजन करना चाहिए और वहाँ से पुन: अपने देश लौटने पर तद्देशीय मनुष्यों का अपमान नहीं करना चाहिए । विजय प्राप्त करके राजा को देवताओं की पूजा करनी चाहिए और ब्राह्मणों को दान देना चाहिए ॥२१-२३ ॥ दूसरे दिन लड़ाई होने से पूर्व हाथी, घोड़ों १ क. ङ. न्तु च मे श ं । २ च. ' म् । अवन्तु मां स्वभृ ’ । ३ ङ. पदमादिश्य दिक्षु । ४ ख. ग. घ. छ. देशपालं तु पा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 725

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षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७२१ द्वितीयेऽहनि सङ्ग्रामो भविष्यति यदा तदा । छत्रादिराजलिङ्गानि शस्त्राणि निशि वैगुणान् । पुरोधसाहुतं पश्येद्वह्निं हुत्वा द्विजान्यजेत् । देशे त्वदृश्यः शत्रूणां कुर्यात्प्रकृतिकल्पनाम् । सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह । गरुडो मकरव्यूहश्चक्रः श्येनस्तथैव च । मण्डलः सर्वतोभद्रः सूचीव्यूहश्च ते ' नव ( दश ) । द्वौ पक्षावनुपक्षौ द्वाववश्यं पञ्चमं भवेत् । भागत्रयं स्थापयेत्तु तेषां रक्षार्थमेव च । मूलच्छेदे विनाशः स्यान्न युध्येच्च स्वयं नृपः । भग्नसंधारणं तत्र योधानां परिकीर्तितम् । न संहतान्न विरलान्योधान्व्यूहे प्रकल्पयेत् ।

भेत्तुकामः परानीकं संहतैरेव भेदयेत् ।

स्नापयेद्गजमश्वादि यजेद्देवं नृसिंहकम् ॥२४ ॥

प्रातर्नृसिंहकं पूज्य वाहनाद्यमशेषतः ॥२५ ॥

गृहीत्वा सशरं चापं गजाद्यारुह्य वै व्रजेत् ॥२६ ॥

संहतान्योधयेदल्पान्कामं विस्तारयेद्बहून् ॥२७ ॥

व्यूहाः प्राण्यङ्गरूपाश्च द्रव्यरूपाश्च कीर्तिताः ॥२८ ॥

अर्धचन्द्रश्च वज्रश्च शकटव्यूह एव च ॥ २ ९ ॥

व्यूहानामथ सर्वेषां पञ्चधा सैन्यकल्पना ' ॥३० ॥

एकेन यदि वा द्वाभ्यां भागाभ्यां युद्धमाचरेत् ॥३१ ॥

न व्यूहकल्पना कार्या राज्ञो भवति कर्हिचित् ॥ ३२ ॥

सैन्यस्य पश्चात्तिष्ठेत्तु क्रोशमात्रे महीपतिः ॥ ३३ ॥

प्रधानभङ्गे सैन्यस्य नावस्थानं विधीयते ॥ ३४ ॥

आयुधानां तु संमर्दो यथा न स्यात्परस्परम् ॥३५ ॥

भेदरक्ष्याः परेणापि कर्तव्याः संहतास्तथा ॥ ३६ ॥

को नहलाकर भगवान् नृसिंह की पूजा करनी चाहिए । रात्रि में छत्र आदि राजचिह्नों, आयुधों और गणों का पूजन करना चाहिए । प्रात: काल नृसिंह देव तथा वाहन आदि की पूजा करके पुरोहित के द्वारा जिसमें आहुति दी गयी है. उस अग्नि का दर्शन करना चाहिए तथा स्वयं हवन करके ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर धनुष - बाण लेकर हाथी पर चढ़कर चल देना चाहिए ॥ २४-२६ ॥ शत्रु के देश में कहीं छिपकर सेना का संगठन करना चाहिए । युद्ध के लिए सुसंगठित रूप से थोड़ी ही सेना को भेजना चाहिए किन्तु सेना का विस्तार पर्याप्त रूप से करना चाहिए । सूचीमुख ( व्यूह ) के रूप में थोड़ी भी सेना बड़ी सेना का सामना कर सकती है । व्यूह दो प्रकार के होते हैं - प्राण्यङ्गरूप और द्रव्यरूप । व्यूह दस होते हैं - गरुड़व्यूह, मकरव्यूह, चक्रव्यूह, श्येनव्यूह, अर्धचन्द्रव्यूह, वज्रव्यूह, शकटव्यूह, मण्डलव्यूह, सर्वतोभद्रव्यूह और सूचीव्यूह । समस्त व्यूहों में पाँच प्रकार से सेना का विभाग किया जाता है ॥२७-३० ॥ इसमें दो भाग पक्ष के रूप में होते हैं, दो भाग पक्षों के पीछे और पाँचवाँ मुख्य भाग । इनमें से एक या दो भागों से ही युद्ध करना चाहिए और तीन भागों को इनकी रक्षा के लिए रखना चाहिए । राजा को स्वयं व्यूह में नहीं जाना चाहिए क्योंकि मूलनाश होने से सर्वनाश हो जाता है । राजा को स्वयं युद्ध भी नहीं करना चाहिए, अपितु उसे अपनी सेना से एक कोश पीछे रहना चाहिए । जिससे आवश्यकता के समय भग्न सैन्य - समूह फिर से उसके द्वारा संगठित किया जा सके । प्रधान सेना के भग्न हो जाने पर वहाँ रुकना नहीं चाहिए ॥३१-३४ ॥ व्यूह में योद्धाओं को न तो बहुत ही अधिक निकट रखना चाहिए और न बहुत दूर जिससे ( योद्धाओं के ) शस्त्र परस्पर टकराने न लगें । शत्रु के सैन्य - व्यूह को भंग करनेवाले ( राजा ) को एक साथ संघटित योद्धाओं के द्वारा ही वैसा करना चाहिए और शत्रु से अपने सैन्य - व्यूह की रक्षा भी संघटित योद्धाओं के द्वारा करनी चाहिए । शत्रुओं के बहुत से सैन्य - व्यूहों १ क. ग. ङ. च. छ. नराः । २ ङ. ' ना । सपक्षौ द्वौ च पक्षौ द्वौ द्वावश्य ' । ४६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 726

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७२२ अग्निपुराणम् व्यूहं भेदावहं कुर्यात्परव्यूहेषु चेच्छया । रथस्य चाश्वाश्चत्वारः समास्तस्य च चर्मिणः पृष्ठतो धन्विनः पश्चाद्धन्विनां तुरगा रथाः पदातिकुञ्जराश्वानां धर्मकार्यं प्रयत्नतः शूरान्प्रमुखतो दत्त्वा स्कन्धमात्रप्रदर्शनम् दारयन्ति पुरस्तात्तु न देया भीरवः पुरः प्रांशवः शुकनासाश्च ये चाजिह्येक्षणा नराः नित्यहृष्टाः प्रहृष्टाश्च शूरा ज्ञेयाश्च कामिनः प्रतियुद्धं गजानां च तोयदानादिकं च यत् रिपूणां भेत्तुकामानां स्वसैन्यस्य तु रक्षणम् विमुखीकरणं युद्धे धन्विनां च तथोच्यते त्रासनं रिपुसैन्यानां रतकर्म तथोच्यते गजस्य पादरक्षार्थाश्चत्वारस्तु तथा द्विज ॥ ३७ ॥

। धन्विनश्चर्मिभिस्तुल्याः पुरस्ताच्चर्मिणो रणे ॥ ३८ ॥

। रथानां कुञ्जराः पश्चाद्दातव्याः पृथिवीक्षिता ॥ ३ ९ ॥ । शूराः प्रमुखतो देया ' नो देया भीरवः क्वचित् ॥४० ॥

। कर्तव्यं भीरुसंघेन शत्रुविद्रावकारकम् ॥४१ ॥

। प्रोत्साहयन्त्येव रणे भीरुञ्शूराः पुरस्थिताः ॥ ४२ ॥

। संहतभ्रूयुगाश्चैव क्रोधनाः कलहप्रियाः ॥ ४३ ॥

। संहतानां हतानां च रणापनयनक्रिया ॥ ४४ ॥

। आयुधानयनं चैव पत्तिकर्म विधीयते ॥४५ ॥

। भेदनं संहतानां च चर्मिणां कर्म कीर्तितम् ॥ ४६ ॥

। दूरापसरणं यानं सुहतस्य तथोच्यते ॥ ४७ ॥

। भेदनं संहतानां च भेदानामपि संहतिः ॥ ४८ ॥

में से राजा को अपनी इच्छा से किसी ऐसे व्यूह को भङ्ग करना चाहिए ( जिसके भंग होने से अन्य व्यूह स्वतः समाप्त हो जायँ ) ॥३५-३७ ॥ हे ब्राह्मण! गजारोही की रक्षा के लिए चार ( योद्धाओं ) को नियुक्त करना चाहिए, रथारोही के लिए चार अश्वारोहियों को नियुक्त करना चाहिए, अश्वारोही के लिए चार खड्गधारी योद्धाओं को नियुक्त करना चाहिए और एक ढालवाले योद्धा की रक्षा के लिए चार धनुर्धारियों की नियुक्ति करनी चाहिए । धनुर्धारी, खड्गधारी योद्धा के समान हुआ करते हैं । राजा को रण में सबसे आगे खड्गधारियों को, उनके पीछे धनुर्धारियों को, उनके पीछे अश्वारोहियों को, उनके पीछे रथारोहियों को और रथारोहियों के पीछे गजारोहियों को रखना चाहिए । पैदल, गजारोही और अश्वारोही योद्धाओं में भी जो शूरवीर हों उन्हें सेना के आगे रखना चाहिए, कायरों को नहीं । सेना में कायरों को आगे कभी नहीं रखना चाहिए ॥३८-४० ॥ क्योंकि वे शत्रुओं का ही उत्साह बढ़ाया करते हैं, परन्तु सेना में आगे रहनेवाले शूर योद्धा शूरवीर कायरों को भी प्रोत्साहित कर दिया करते हैं । शूरवीर उन्हें समझना चाहिए जिनका कद लम्बा हो, नाक तोते की ( चोंच की ) तरह हो, क्रोधी स्वभाव के हों, कलहप्रिय हों, सदैव प्रसन्न रहते हों और विजय की कामना करते हों ॥४१-४३३ ॥ संगठित वीरों में से जो मारे जायँ अथवा घायल हों, उनको युद्धभूमि से दूर हटाना, युद्ध के भीतर जाकर हाथियों को पानी पिलाना तथा हथियार पहुँचाना - ये सब पैदल सिपाहियों के कार्य हैं । अपनी सेना का भेदन करने की इच्छा रखनेवाले शत्रुओं से उसकी रक्षा करना और संगठित होकर युद्ध करनेवाले शत्रुवीरों का व्यूह तोड़ना - यह ढाल लेकर युद्ध करनेवाले योद्धाओं का कार्य बताया गया है । युद्ध में विपक्षी योद्धाओं को मार भगाना धनुर्धर वीरों का काम है । अत्यन्त घायल हुए योद्धा को युद्धभूमि से दूर ले जाना, फिर युद्ध में आना तथा शत्रु की सेना में त्रास उत्पन्न करना यह सब रथी वीरों का कार्य बतलाया जाता है । संगठित व्यूह को तोड़ना, १ ख. ग. ‘ क्षार्थंचत्वा ’ । २ ख. ग. घ. छ. ' देयाः स्क ' । ३ क. ङ. ये च जि । ४ क. ङ. नित्यतृष्णाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 727

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षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७२३ प्राकारतोरणाट्टालद्रुमभङ्गश्च सद्गजे कर्दमा च नागानां युद्धभूमिरुदाहृता तथाऽनुलोमशुक्रार्किदिक्पालमृदुमारुताः । भोगप्राप्त्या च विजये स्वर्गप्राप्त्या मृतस्य च निष्कृतिः स्वामिपिण्डस्य नास्तियुद्धसमा गतिः घातादिदुःखसहनं रणे तत्परमं तपः स्वामी सुकृतमादत्ते भग्नानां विनिवर्तिनाम् त्यक्त्वा सहायान्यो गच्छेद्देवास्तस्य विनष्टये धर्मनिष्ठे जयो राज्ञि योद्धव्याश्च समाः समैः न प्रेक्षकाः प्रविष्टाश्च अशस्त्राः पतितादयः । पत्तिभूर्विषमा ज्ञेया रथाश्वानां तथा समा ॥४९ ॥

। एवं विरचितव्यूहः कृतपृष्ठदिवाकरः ॥५० ॥

योधानुत्तेजयेत्सर्वान्नामगोत्रावदानतः ॥५१ ॥

। जित्वाऽरीन्भोगसम्प्राप्तिर्मृतस्य च परा गतिः ॥५२ ॥

। ' शूराणां रक्तमायाति तेन पापं त्यजन्ति ते ॥५३ ॥

। वराप्सरः सहस्राणि यान्ति शूरं रणे मृतम् ॥५४ ॥

। ब्रह्महत्याफलं तेषां तथा प्रोक्तं पदे पदे ॥ ५५ ॥

। अश्वमेधफलं प्रोक्तं शूराणामनिवर्तिनाम् ॥५६ ॥

। गजाद्यैश्च गजाद्याश्च न हन्तव्याः पलायिनः ॥ ५७ ॥

। शान्ते निद्राभिभूते च अर्धोत्तीर्णे नदीवने ॥ ५८ ॥

टूटे हुए को जोड़ना तथा चहारदीवारी, तोरण ( सदर दरवाजा ), अट्टालिका और वृक्षों को भङ्ग कर डालना – यह अच्छे हाथी का पराक्रम है । ऊँची - नीची भूमि को पैदल सेना के लिए उपयोगी जानना चाहिए, रथ और घोड़ों के लिए समतल भूमि उत्तम है तथा कीचड़ से भरी हुई युद्ध - भूमि हाथियों के लिए उपयोगी बतायी गयी है ॥४३ - ४ ९ ३ ॥ इस प्रकार व्यूह की रचना करके सूर्य को पीछे की ओर और शुक्र, शनि, दिक्पाल तथा मन्द समीकरण को अभिमुख करके युद्ध करना चाहिए । ( युद्ध के समय ) योद्धाओं के नाम, गोत्रों तथा उनके वीरकर्मों का उच्चारण करके उन्हें उत्तेजित करना चाहिए । ( उनसे यह कहते रहना चाहिए कि ) विजय से भोगप्राप्ति होगी और मरने से स्वर्ग प्राप्त होगा, क्योंकि ऐसा कहा गया है कि युद्ध में शत्रुओं को जीतने से भोगप्राप्ति और मरने से उत्तम गति प्राप्त होती है ॥५०-५२ ॥ स्वामी के ऋण से मुक्ति मिल जाती है, अतएव युद्ध के समान कोई उपाय है ही नहीं । वीर योद्धा के शरीर से जो रक्त निकलता है वह मानो उसका पाप निकलता है । रण में आघात आदि दुःखों को सहना ही परम तप है । रण में मरे हुए वीर के समीप हजारों सुन्दरी अप्सराएँ जाती हैं । युद्ध से भाग जानेवालों का पुण्य उनके स्वामी को प्राप्त हो जाता है और उन्हें पद - पद पर ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥५३-५५ ॥ जो अपने सहायकों को छोड़कर भाग जाता है, देवता उसका विनाश कर डालते हैं और जो वीर रण से भागता नहीं है उसे अश्वमेध का फल प्राप्त होता है । जो राजा धर्म से युक्त होकर युद्ध करता है, उसकी विजय होती है । युद्ध अपने बराबरवालों के साथ करना चाहिए, जैसे हाथी आदि पर सवार योद्धाओं के साथ ही युद्ध करना चाहिए । संग्राम से भागनेवालों को नहीं मारना चाहिए ॥५६-५७ ॥ युद्ध देखनेवाले, निःशस्त्र होकर युद्ध में प्रवेश करनेवाले, गिरे हुए, शान्त तथा निद्रा से अभिभूत पुरुषों को नहीं मारना चाहिए । ऐसी सेना से भी युद्ध नहीं करना चाहिए जो किसी नदी या वन का आधा भाग ही पार कर चुकी हो । दुर्दिन में भी युद्ध नहीं करना चाहिए । शत्रु को नष्ट करने के लिए कूटयुद्ध किया जा सकता है । भुजाओं को फैलाकर जोर - जोर से चिल्लाना चाहिए कि ' शत्रु नष्ट हो गये हैं, मुझे मित्रों की बहुत - सी सेना प्राप्त हो गयी है, ( सेना ) नायक १ क. ङ. ' राणामुत्तमा जातिस्तेन । २ क. ङ. मैः । राजाद्याश्च । ३ क. ङ. श्रान्ते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७२४ अग्निपुराणम् दुर्दिने कूटयुद्धानि ' शत्रुनाशार्थमाचरेत् । प्राप्तं ' मैत्रं बलं भूरि नायकोऽत्र निपातितः । विद्रुतानां च योधानां सुखं ' घातौ विधीयते । पताकाश्चैव संभारो वादित्राणां भयावहः । रत्नानि राजगामीनि ' अमात्येन कृते रणे । शत्रुं प्राप्य रणे मुक्तं पुत्रवत्परिपालयेत् । ततश्च स्वपुरं प्राप्य ध्रुवेभे प्रविशेद् गृहम् संविभागं परावाप्तैः कुर्याद्भृत्यजनस्य च । इत्यादिमहापुराण आग्नेये रणदीक्षावर्णनं बाहू प्रगृह्य विक्रोशेद्भग्ना भग्नाः परे इति ॥५९ ॥

सेनानी नि ( र्नि ) हतश्चायं भूपतिश्चापिविप्लुतः ॥६० ॥

धूपाश्च देया धर्मज्ञ तथा च परमोहनाः ॥ ६१ ॥

संप्राप्य विजयं युद्धे देवान्विप्रांश्च ' संयजेत् ॥ ६२ ॥

तस्य स्त्रियो न कस्यापि रक्ष्यास्ताश्च परस्य च ॥६३ ॥

पुनस्तेन न योद्धव्यं देशाचारादि पालयेत् ॥ ६४ ॥

। देवादिपूजनं कुर्याद्रक्षेद्योधकुटुम्बकम् ॥६५ ॥

रणदीक्षा मयोक्ता ते जयाय नृपते ध्रुवा ॥ ६६ ॥

नाम षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥

मार गिराया गया है, सेनानी मारा जा चुका है और राजा भी भाग गया है । ' ( ऐसा कहने से शत्रु में भगदड़ मच जाती है और ) भागते हुए योद्धाओं को सुखपूर्वक नष्ट किया जा सकता है ॥५८-६०३ ॥ अये धर्मज्ञ! शत्रु सेना को मोह में डाल देनेवाला धुआँ भी करना चाहिए । पताकाओं का फहराना और बाणों का साज - बाज ( शत्रुओं के लिए ) भय बढ़ानेवाला हुआ करता है । युद्ध में विजय प्राप्त करके राजा को ब्राह्मणों और देवताओं की पूजा करनी चाहिए । अमात्य के द्वारा किये गये युद्ध में प्राप्त रत्न ( भी ) राजा के हुआ करते हैं, परन्तु शत्रु की स्त्रियाँ किसी की नहीं हो सकती हैं, इसलिए उनकी रक्षा करनी चाहिए । युद्ध में पकड़कर छोड़े गये शत्रु की पुत्र की भाँति रक्षा करनी चाहिए । पुनः उसके साथ युद्ध नहीं करना चाहिए । अपितु ( उसके सम्बन्ध में ) उसी के देशाचार आदि का पालन करना चाहिए ॥६१-६४ ॥ ( युद्ध में विजय प्राप्त करने के ) अनन्तर ध्रुव नक्षत्र में राजभवन में प्रवेश करना चाहिए । तदनन्तर पूजन करना चाहिए और युद्ध में लौटे हुए योद्धाओं के कुटुम्बों का पालन करना चाहिए । शत्रुओं के यहाँ से प्राप्त धन को नौकरों-चाकरों में बाँट देना चाहिए । यह रण - दीक्षा मैंने तुम्हें बता दी है । इसके अनुसार युद्ध करने से राजा को विजय अवश्य प्राप्त होती है ॥६५-६६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में रणदीक्षा - वर्णन नामक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३६ ॥

१ क. ङ. ॰ध्दादि शत्रूणां संधिमीरयेत् । २ ग. प्तं चित्रबलं । ३ क. ङ. मुखं । ४ क. ङ. खाते । ५ क. ङ. न्विप्रान्गुरून्य " ' । ६ क. ङ. अनघने । ख. अनयेन । ७ क. ङ. युक्तं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७२५ अथ सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः श्रीस्तोत्रम् पुष्कर उवाच राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः । स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ॥१ ॥

इन्द्र उवाच नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्धिसंभवाम् । श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥२ ॥

त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि । सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ॥३ ॥

यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने । आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ॥४ ॥

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च । सौम्या सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवि पूरितम् ॥५ ॥

का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः । अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ॥ ६ ॥

त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम् । विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम् ॥७ ॥

दाराः पुत्रास्तथाऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम् । भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम् ॥८ ॥

शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् । देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ॥९ ॥

अध्याय २३७ श्रीस्तोत्र पुष्कर बोले- पूर्वकाल में राज्यलक्ष्मी को स्थिर करने के लिए इन्द्र ने जिस प्रकार लक्ष्मी की स्तुति की थी उसी तरह राजा को भी विजय के लिए ( उसकी ) स्तुति करनी चाहिए ॥ १ ॥

इन्द्र बोले- मैं सम्पूर्ण लोकों की जननी, सागर से उत्पन्न होनेवाली, प्रफुल्लित कमल के समान नेत्रोंवाली तथा विष्णु के वक्षःस्थल पर निवास करनेवाली लक्ष्मी को नमस्कार कर रहा हूँ ॥२ ॥ अयि लोकपावनि! तुम

सिद्धि हो, तुम स्वधा हो, तुम स्वाहा हो । तुम्हीं सन्ध्या हो, तुम्हीं रात्रि हो, तुम्हीं प्रभा हो, तुम्हीं ऐश्वर्य हो, मेधा हो, श्रद्धा एवं सरस्वती हो । तुम्हीं यज्ञविद्या, महाविद्या तथा गुह्यविद्या हो । अयि सुन्दरि! तुम्हीं आत्मविद्या तथा मोक्ष फल को देनेवाली हो । आन्वीक्षिकी ( तर्कशास्त्र ), ( वेद ) त्रयी वार्ता, दण्डनीति तथा सौम्यरूपा हो । अयि देवि! यह सम्पूर्ण जगत् तुम्हीं से व्याप्त है, अतः यह भी सौम्य है ॥ ३-५ ॥ अयि देवि! तुम्हारे अतिरिक्त है ही कौन? देवाधिदेव गदाधारी विष्णु के सर्वयज्ञमय और भोगियों के द्वारा ध्येय शरीर पर तुम्हीं विराजमान रहती हो । अयि देवि! तुम्हारे द्वारा परित्यक्त होकर ये तीनों लोक नष्टप्राय हो गये थे । इन्हें इस समय तुम्हीं ने सँभाल रखा है ॥६-७ ॥ अयि महाभागे! तुम जिस पर कृपादृष्टि डालती हो उसे स्त्री, घर, मित्र, धान्य, आरोग्य, ऐश्वर्य, रिपुक्षय तथा सुख की प्राप्ति हो जाती है । देवि! तुम्हारी कृपादृष्टि को प्राप्त कर लेने पर पुरुषों के लिए कुछ १ ख. ग. घ. छ. ‘ सौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयै । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७२६ अग्निपुराणम् त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता । मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् । मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशून्मा विभूषणम् । ` सत्येन समशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः । त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स े कुलीनः स बुद्धिमान् सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः न ते वर्णयितुं शक्ता गुणाज्जिह्वाऽपि वेधसः त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ॥१० ॥

मा शरीरं कलत्रं च त्ययेथाः सर्वपावनि ॥११ ॥

त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्ष: स्थलालये ॥१२ ॥

त्यज ( ज्य ) न्ते नराः सद्यः संत्यक्ताः ये त्वयामले ॥१३ ॥

। कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निगुणा अपि ॥१४ ॥

। स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः ॥१५ ॥

। पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे ॥१६ ॥

। प्रसीद देवि पद्माक्षि ना ( माऽ ) स्मांस्त्याक्षीः कदाचन ॥१७ ॥

पुष्कर उवाच एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् । सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ॥१८ ॥

स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् । श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः ॥१९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये श्रीस्तोत्रकथनं नाम सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥

भी दुर्लभ नहीं रह जाता है । तुम सभी प्राणियों की माता हो और भगवान् विष्णु पिता हैं । तुमने और भगवान् विष्णु ने चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है ॥८-१० ॥ अयि सबको पवित्र करनेवाली! तुम मेरे मान, कोष, कवच, गृह, साधन, शरीर तथा स्त्री को न छोड़ो । अयि विष्णु के वक्षःस्थल पर रहनेवाली! मेरे पुत्र, मित्र, पशु तथा आभूषणों का भी परित्याग न करो । अयि निर्मले! जिसे तुम छोड़ देती हो, वह तुरन्त सत्य, शौच, सम तथा शील आदि गुणों से वंचित हो जाता है परन्तु तुम जिस गुणहीन पुरुष की ओर भी दृष्टिपात कर देती हो, वह तुरन्त शील आदि समस्त गुणों, ( अच्छे ) कुल और ऐश्वर्य से सम्पन्न हो जाता है ॥११-१४ ॥ अयि देवि! तुम जिसकी ओर देख लेती हो, वह श्लाघ्य, गुणी, धन्य, कुलीन, बुद्धिमान्, शूर तथा पराक्रमी हो जाता है । अयि विष्णु प्रिये! तुम संसार को धारण करनेवाली हो अतः तुम जिससे पराङ्मुखी हो जाती हो, उसके शील अदि सम्पूर्ण गुण भी तुरन्त अवगुण बन जाते हैं । अयि देवि! ब्रह्मा की जिह्वा भी तुम्हारे गुणों का वर्णन नहीं कर सकती है । अयि कमलनयने! तुम मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ और मुझे कभी न छोड़ो ॥१५-१७ ॥ पुष्कर बोले - इस प्रकार स्तुति करने पर लक्ष्मी ने इन्द्र को राज्य की स्थिरता और संग्रामविजय आदि अभीष्ट वर प्रदान किया । जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ और श्रवण करता है, उसे भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए इसमें श्रीस्तोत्र का सदा पाठ और श्रवण करना चाहिए ॥१८-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में श्रीस्तोत्र कथन नामक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३७ ॥

२ छ. सत्त्वेन सत्यशौ । ३ क. ङ. स शूरः स च पण्डितः । गुणवान्स च । ४ ख. ग. विख्यातो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA