अग्नि पुराण — पृष्ठ 731–740

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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अष्टत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७२७ अथाष्टत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः रामोक्तनीतिः अग्निरुवाच नीतिस्ते पुष्करोक्ता तु रामोक्ता लक्ष्मणाय या । जयाय तां प्रवक्ष्यामि शृणु धर्मादिवर्धिनीम् ॥१ ॥

राम उवाच न्यायेनार्जनमर्थस्य वर्धनं रक्षणं चरेत् । सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च राजवृत्तं चतुर्विधम् ॥२ ॥

नयस्य विनयो मूलं विनयः शास्त्रनिश्चयात् । विनयो हीन्द्रियजयस्तैर्युक्तः पालयेन्महीम् ॥३ ॥

शास्त्रं प्रज्ञा धृतिर्दाक्ष्यं प्रागल्भ्यं धारयिष्णुता । उत्साहो वाग्मितौदार्यमापत्कालसहिष्णुता ॥४ ॥

प्रभावः शुचिता मैत्री त्यागः सत्यं कृतज्ञता । कुलं शीलं दमश्चेति गुणाः स्पत्तिहेतवः ॥ ५ ॥

प्रकीर्णविषयारण्ये धावन्तं विप्रमाथिनम् । ज्ञानङ्कशेन कुर्वीत वश्यमिन्द्रियदन्तिनम् ॥६ ॥

कामः क्रोधस्तथा लोभो हर्षो मानो मदस्तथा । षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥७ ॥

आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्ता दण्डनीतिं च पार्थिवः । तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद्विनयान्वितः ॥८ ॥

आन्वीक्षिक्याऽर्थविज्ञानं धर्माधर्मो त्र्यीस्थितौ 1 | अर्थानर्थौ तु वार्तायां दण्डनीत्या नयानयौ ॥९ ॥

अहिंसा सूनृता वाणी सत्यं शौचं दया क्षमा । वर्णिनां लिङ्गिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते ॥१० ॥

अध्याय २३८ रामोक्त - नीति अग्निदेव बोले - राम ने लक्ष्मण को जो नीति बतायी थी और पुष्कर ने जिसे परशुराम से कहा था, धर्म आदि को बढ़ानेवाली उस नीति को मैं बतलाऊँगा ॥१ ॥

राम ने कहा - राजा का कर्त्तव्य चार प्रकार का हुआ करता है - न्यायपूर्वक धनोपार्जन करना, उसे बढ़ाना, उसकी रक्षा करना और उसे सत्पात्र को ( दान में ) देना । नीति का मूल विनय है । विनय शास्त्र चिन्तन से प्राप्त होता है । विनय ही इन्द्रियों पर विजय ( प्राप्त करता ) है ( अतएव ) इनसे युक्त होकर ( ही ) पृथ्वी का पालन करना चाहिए ॥२-३ ॥ शास्त्र, प्रजा, धैर्य, दक्षता, प्रौढ़ता, धारण करने की शक्ति, उत्साह, वाचालता, उदारता, आपत्तिकालीन सहिष्णुता, प्रभाव, शुचिता, मैत्री, त्याग, सत्य, कृतज्ञता, कुल, शील तथा दम - ये गुण सम्पत्ति के हेतु हुआ करते हैं । विषयरूपी गहन वन में दौड़नेवाले मदमत्त इन्द्रियरूपी हाथी को ज्ञानरूपी अंकुश के वश में करते रहना चाहिए ॥४-६ ॥ काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, मान, मद-इन छह का परित्याग कर देना चाहिए । क्योंकि इनका परित्याग कर देने पर ही राजा सुखी होता है । राजा को आन्वीक्षिकी ( तर्कशास्त्र ), ( वेद ) त्रयी, वार्ता और दण्डनीति के ज्ञाता तथा उनके अभ्यास करनेवाले पुरुषों से विनयपूर्वक उनकी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ॥ ७-८ ॥ आन्वीक्षिकी से अर्थज्ञान, वेद ( त्रयी ) से धर्म - अधर्म का ज्ञान, वार्ता से अर्थ - अनर्थ का ज्ञान और दण्डनीति से नीति - अनीति का ज्ञान होता है । अहिंसा, प्रिय और सत्यवचन, पवित्रता, इन्द्रियदमन तथा क्षमा- यह ब्रह्मचारियों और संन्यासियों का सामान्य धर्म कहा गया है ॥९ -१० ॥ राजा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 732

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७२८ अग्निपुराणम् प्रजाः समनुगृह्णीयात्कुर्यादाचारसंस्थितिम् । इतिवृत्तं सतां साधुहितं सत्पुरुषव्रतम् । को हि राजा शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् कृपणः पीड्यमानो हि मन्युना हन्ति पार्थिवम् । ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनायशिवार्थिना । देवास्ते प्रियवक्तारः पशवः क्रूरवादिनः देवतावद्गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् । कुर्वीताभिमुखान्भृत्यैर्देवान्सुकृतकर्मणा स्त्रीभृत्यान्प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् कृपणेषु दयालुत्वं सर्वत्र मधुरा गिरः गृहागते परिष्वङ्गः शक्त्या दानं सहिष्णुता अपरोपतापि वचनं मौनव्रतचरिष्णुता उचितानुविधायित्वमिति वृत्तं महात्मनाम् वाक्सूनृता दयादानं हीनोपगतरक्षणम् ॥११ ॥

आधिव्याधिपरीताय अद्यश्वो वा विनाशिने ॥ १२ ॥

। न हि स्वसुखमन्विच्छन्पीडयेत्कृपणं जनम् ॥१३ ॥

क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय स्वजनाय यथाऽञ्जलिः ॥१४ ॥

प्रियमेवाभिधातव्यं सत्सु नित्यं द्विषत्सु च ॥ १५ ॥

। शुचिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवताः सदा ॥ १६ ॥

प्रणिपातेन हि गुरुं सतोऽमृषानुचेष्टितैः ॥१७ ॥

। ' सद्भावेन हरेन्मित्रं संभ्रमेण च बान्धवान् ॥ १८ ॥

। अनिन्दा परकृत्येषु स्वधर्मपरिपालनम् ॥१९ ॥

। प्राणैरप्युकारित्वं मित्रायाव्यभिचारिणे ॥२० ॥

। स्वसमृद्धिष्वनुत्सेकः परवृद्धिष्वमत्सरः ॥२१ ॥

। बन्धुभिर्बद्धसंयोगः स्वजने चतुरश्रता ॥ ॥२२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रामोक्तनीतिकथनं नामाष्टत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३८ ॥

को प्रजा के ऊपर अनुग्रह, ( देश के ) आचारानुकूल आचरण, सत्य, दया, दान, दीन - दु: खियों की रक्षा और सज्जनों का हित करना - ये ही सत्पुरुष का धर्म है । ऐसा कौन - सा राजा है जिसे आधि - व्याधि से युक्त और आज या कल नष्ट होनेवाले शरीर के लिए धर्म के विरुद्ध आचरण करना चाहिए? अपने सुख की इच्छा से किसी दीन जन को सताना नहीं चाहिए क्योंकि सताये हुए दीन ( जन ) के क्रोध से राजा का सर्वनाश हो जाता है । जिस प्रकार किसी अपने ही पूज्य व्यक्ति के लिए हाथ जोड़कर व्यवहार किया जाता है उससे भी अधिक विनम्रता से राजा को अपने कल्याण के लिए दुर्जन के साथ व्यवहार करना चाहिए । सज्जनों अथवा दुर्जनों से प्रिय वचन ही बोलना चाहिए क्योंकि देवता तो प्रियभाषी ही हुआ करते हैं और पशु कठोर वचन बोलनेवाले । सदैव शुचि और आस्तिकता से पवित्र मन होकर देवपूजन करना चाहिए ॥११-१६ ॥ देवता की तरह गुरुजनों को और अपनी तरह इष्टमित्रों को समझना चाहिए । प्रणाम से गुरु को, सत्य व्यवहार से सज्जनों को, पुण्य कर्मों से देवताओं को, सद्भावना से मित्र को, स्नेह से बन्धुओं को, प्रेम और दान से क्रमशः स्त्री और सेवकों को तथा ( सबके ) अनुकूल व्यवहार से अन्य मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहिए । दूसरों के कार्यों की निन्दा न करना, सबके साथ मधुर वाणी का व्यवहार, अव्यभिचारी मित्र का प्राणों से भी उपकार करना, घर में आये हुए का आदरपूर्वक आलिङ्गन करना, यथाशक्ति दान देना, सहिष्णुता, अपनी समृद्धि से ईर्ष्या न करना, दूसरों को उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलना, मौन व्रत का आचरण करना, बन्धुओं के साथ मेल - मिलाप रखना, स्वजनों के प्रति उदारता और उचित कार्य करना - ये सब सज्जनों के गुण हुआ करते हैं ॥१७-२२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में रामोक्तनीति - कथन नामक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३८ ॥ १ क. ङ. स्वभावेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 733

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एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७२ ९ अथैकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्माः राम उवाच स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्ग: कोषो बलं सुहृत् । राज्याङ्गानां वरं राष्ट्रं साधनं पालयेत्सदा । अविसंवादिता सत्यं वृद्धसेवा कृतज्ञता । शक्यसामन्तता चैव तथा च दृढभक्तिता । विनीतत्वं धार्मिकता साधोश्च नृपतेर्गुणाः कुर्वीताऽऽत्महिताकाङ्क्षी परिचारं महीपतिः नेता दण्डस्य निपुणः कृतशिल्पपरिग्रहः परवृत्तान्तवेत्ता च संधिविग्रहतत्त्ववित् आदाता सम्यगर्थानां विन ( नि ) योक्ता च पात्रवित् परोपतापपैशू ( शु ) न्यमात्सर्येर्षा ( र्ष्या ) नृतातिगः परस्परोपकारीदं कुलं शीलं वयः दैवसम्पन्नता । दीर्घदर्शित्वमुत्साहः । प्रख्यातवंशमक्रूरं ॥ वाग्मी प्रगल्भः । पराभियोगप्रसहः । गूढमन्त्रप्रचारज्ञो सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥१ ॥

सत्त्वं दाक्षिण्यं क्षिप्रकारिता ॥२ ॥

बुद्धिरक्षुद्रपरिवारता ॥३ ॥

शुचिता स्थूललक्षिता ॥४ ॥

लोकसंग्राहिणं शुचिम् ॥५ ॥

स्मृतिमानुदग्रोबलवान्वशी ॥६ ॥

सर्वदुष्टप्रतिक्रिया ॥७ ॥।

देशकालविभागवित् ॥८ ॥

। क्रोधलोभभयद्रोहदम्भचापलवर्जितः ॥९ ॥

। वृद्धोपदेशसंपन्नः शक्त मधुरदर्शनः ॥१० ॥

अध्याय २३ ९ राजधर्म राम बोले - राजा, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, बल तथा मित्र- ये सातों राज्य के अङ्ग हैं, जो परस्पर उपकारक हुआ करते हैं ॥१ ॥ राज्य के अङ्गों में राजा और मन्त्री के बाद राष्ट्र प्रधान एवं अर्थ का साधन है, अतः उसका सदा पालन

करना चाहिए । ( इन अङ्गों में पूर्व - पूर्व ) अङ्ग पर की अपेक्षा श्रेष्ठ है । कुलीनता सत्त्व ( व्यसन और अभ्युदय में भी निर्विकार रहना ), युवावस्था, शील, दाक्षिण्य, शीघ्रकारिता, अविसंवादिता, सत्य, वृद्धसेवा, कृतज्ञता, दैवसम्पन्नता, बुद्धि, अक्षुद्र, परिवारता, शक्यसामन्तता, दृढभक्तिता, दीर्घदर्शिता, उत्साह, शुद्धचित्तता, स्थूललक्षता, विनीतता और धार्मिकता - ये अच्छे आभिगामिक गुण हैं । जो प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न, क्रूरतारहित, गुणवान् पुरुषों का संग्रह करनेवाले तथा पवित्र ( शुद्ध ) हों, राजा का हितचिन्तक परिचारक बनाये ॥२-५३ ॥ वाक्चतुर, प्रगल्भ, स्मरण शक्तिवाला, उत्साही, बलवान्, ( इन्द्रियों को ) वश में करनेवाला, दण्ड देने में निपुण, शिल्प आदि वेत्ता, दूसरों के लगाये हुए अभियोग को सहन कर सकनेवाला, सभी दुष्टों को दण्ड दे सकनेवाला, दूसरों के वृत्तान्त को जाननेवाला, सन्धि - विग्रह के रहस्य को समझनेवाला, गूढ़ मन्त्रणा और प्रचार का ज्ञाता, देश - काल के विभाग का ज्ञान रखनेवाला, सम्यक् प्रकार से धन प्राप्त करनेवाला, ( दूसरों से ) काम लेनेवाला, पात्र को समझनेवाला, क्रोध, लोभ, भय, द्रोह, दम्भ तथा चञ्चलता से रहित, दूसरे को कष्ट न देनेवाला, पिशुनता, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा असत्य से अलग रहनेवाला, वृद्धों के उपदेश से युक्त, मधुरदर्शी, समर्थ, प्रियदर्शी और CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 734

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७३० अग्निपुराणम् गुणानुरागस्थितिमानात्मसंपद्गुणाः स्मृताः दण्डनीतेः प्रयोक्तारः सचिवाः स्युर्महीपतेः वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान् सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुतः दृढभक्तिरकर्ता च वैराणां सचिवो भवेत् दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसंपत्प्रकीर्तिता अथर्व वेदविहितं कुर्याच्छान्तिकपौष्टिकम् चक्षुष्मत्तां त शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम् परिकर्मसुदक्षं च विज्ञानं धारयिष्णुताम् कथायोगेषु बुध्येत वाग्मित्वं सत्यवादिताम् धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चाऽऽपदि लक्षयेत् संवासिभ्यो बलं सत्त्ववमारोग्यं शीलमेव च प्रत्यक्षतो विजानीयाद्भद्रतां क्षुद्रतामपि । कुलीनाः शुचयः शूराः ' श्रुतवन्तोऽनुरागिणः ॥११ ॥

। सुविग्रहो जानपदः कुलशीलकलान्वितः ॥१२ ॥

। स्तम्भचापलहीनश्च मैत्रः क्लेशसहः शुचिः ॥१३ ॥

। कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान्धारणान्वितः ॥१४ ॥

। स्मृतिस्तत्परताऽर्थेषु चित्तज्ञो ज्ञाननिश्चयः ॥ १५ ॥

। त्रय्यां च दण्डनीत्यां च कुशलः स्यात्पुरोहितः ॥१६ ॥

। साधुतैषाममात्यानां तद्विद्यैः सह बुद्धिमान् ॥१७ ॥

। स्वजनेभ्यो विजानीयात्कुलं स्थानमवग्रहम् ॥१८ ॥

। गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रीति ( त ) तां तथा ॥ १ ९ ॥ । उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम् ॥२० ॥

। भक्ति मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारतः ॥२१ ॥

। अस्तब्धतामचापल्यं वैराणां चाप्यकीर्तनम् ॥२२ ॥

। फलानुमेयाः सर्वत्र परोक्षगुणवृत्तयः ॥२३ ॥

गुणानुरागी राजा श्रेष्ठ है । इस प्रकार राजा के आत्म - सम्पत्ति - सम्बन्धी गुण बताये गये हैं ॥६- १०३ ॥ राजा के मन्त्रियों को कुलीन, पवित्र, शूर, शास्त्रज्ञ, अनुरागी और दण्डनीति में कुशल होना चाहिए । राजा का मन्त्री वह हो सकता है जो सन्धि - विग्रह आदि का ज्ञाता, कुल, शील तथा कला से युक्त, वाक्चतुर, प्रगल्भ, उत्साही, सोच - समझकर काम करनेवाला, बुद्धिमान्, स्तब्धता, चपलता से वर्जित, मित्रवान्, क्लेश को सहन करनेवाला, पवित्र, सत्य, पराक्रम, धैर्य, स्थिरता, प्रभाव और आरोग्य से सम्पन्न, शिल्प - कुशल, कार्य - निपुण, प्रज्ञावान्, धारणाशक्ति से युक्त, राजा के प्रति दृढ़भक्ति रखनेवाला और वैरियों को न बढ़ानेवाला हो ॥११-१४३ ॥ स्मरणशक्ति, अर्थोपार्जन में तत्परता, दूसरे का आशय समझना, दृढ़निश्चय, मन्त्रणा को गुप्त रखना ये सब मन्त्रियों के गुण कहे गये हैं । पुरोहित को ( वेद ) त्रयी और दण्डनीति में कुशल होना चाहिए । उन्हें अन्य ब्राह्मणों के साथ, जो विद्या और चरित्र में उसके समान हों, अथर्ववेद में बतायी हुई विधि से ( राजा के कल्याण के लिए ) यज्ञ ( शान्ति, पौष्टिक ) कराना चाहिए ॥१५-१६३ ॥ मन्त्रियों की सूझ - बूझ और उनकी शिल्प - कुशलता की परीक्षा राजा को स्वयं कर लेनी चाहिए । किन्तु उनके कुल, स्थापना और स्वभाव का पता उन ( मन्त्रियों ) के स्वजनों से लगाना चाहिए । इसी प्रकार कार्यकुशलता, ज्ञान और सहिष्णुता - इन तीनों गुणों तथा प्रगल्भता और प्रेम की परीक्षा भी कर लेनी चाहिए ॥१७-१९ ॥ उनकी वाक्चतुरता तथा सत्यवादिता की परीक्षा वाग्व्यवहार में और उनके उत्साह, प्रभाव, क्लेश - सहिष्णुता, धैर्य, अनुराग और स्थैर्य की परीक्षा आपत्तिकाल में कर लेनी चाहिए । भक्ति, मैत्री तथा पवित्रता की परख व्यवहार से करनी चाहिए तथा उनके बल, सत्त्व, आरोग्य, शील, शठता, चपलता और शत्रु की प्रशंसा न करने के गुण को सहवासियों से जानना चाहिए । उनकी भद्रता और क्षुद्रता को प्रत्यक्ष व्यवहार से और परोक्ष में किये गये व्यवहार की परीक्षा उनके परिणाम में करनी चाहिए ॥२०-२३ ॥ राज्यभूमि वही १ क. ङ. शूरा गुणव ' । २ क. ङ. ' लगुणान्वि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 735

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एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७३१ सस्याकरवती पुण्या खनिद्रव्यसमन्विता । रम्या सकुञ्जरबला वारिस्थलपथान्विता । शूद्रकारुवणिक्प्रायो महारम्भः कृषीबलः । नानादेश्यैः समाकीर्णो धार्मिकः पशुमान्बली । पृथुसीमं महाखातमुच्चप्राकारतोरणम् ' । जलबद्धान्यधनवदुर्गं कालसहं महत् । ईवप्सितद्रव्यसंपूर्णः पितृपैतामहोचितः । पितृपैतामहो वश्यः संहतो दत्तवेतनः नानाप्रहरणोपेतो नानायुद्धविशारदः । प्रवासायासदुःखेषु युद्धेषु च कृतश्रमः योगविज्ञानसत्त्वाढ्यं महापक्षं प्रियंवदम् गोहिता भूरिसलिला पुण्यैर्जनपदैर्युता ॥२४ ॥

अदेवमातृका चेति शस्यते भूरिभूतये ॥ २५ ॥

सानुरागो रिपुद्वेषी पीडासहकरः पृथुः ॥२६ ॥

ईदृग्जनपदः शस्तोऽमूर्खव्यसनिनायकः ॥२७ ॥

पुरं समावसेच्छैलसरिन्मरुवनाश्रयम् ॥२८ ॥

औदकं पार्वतं वार्क्षमैरिणं धन्विनं च षट् ॥२९ ॥

धर्मार्जितो व्ययसहः कोषो धर्मादिवृद्धये ॥३० ॥

। विख्यातपौरुषो जन्यः कुशलः शकुनैर्वृतः ॥३१ ॥

नानायोधसमाकीर्णो नीराजितहयद्विपः ॥३२ ॥

। अद्वैधक्षत्रियप्रायो दण्डो दण्डवतां मतः ॥३३ ॥

। आयतिक्षममद्वैधं मित्रं कुर्वीत सत्कुलम् ॥३४ ॥

होती है, जहाँ अन्न प्रचुरता से उपजता हो, खानें पर्याप्त हों, गौओं के लिए चरागाह हो, जल पर्याप्त ( मात्रा में ) हो, सुन्दर देश बसे हुए हों, जो हाथी, घोड़े, मार्ग, जल - स्थल और नदियों से युक्त हों तथा जो ( जलवृष्टि आदि ) दैवीकार्यों पर निर्भर न हो ॥२४-२५ ॥ जहाँ शूद्र, कारीगर तथा बनिये रहते हों, खेती अच्छी तरह की जाती हो; जहाँ के निवासी परस्पर अनुरक्त, शत्रुओं से द्वेष करनेवाले, पीड़ा को सहन करनेवाले हों, जो बहुत विस्तृत हो, जहाँ अनेक देशों के लोग रहते हों, प्रजा धार्मिक, बली तथा पशु आदि से सम्पन्न हो और जहाँ का मुखिया विद्वान् हो किन्तु व्यसनी न हो । नगर ऐसा होना चाहिए जिसकी सीमा लम्बी - चौड़ी हो, चारों तरफ गहरी - गहरी खाइयाँ खुदी हों, ऊँची - ऊँची चहारदीवारियाँ तथा ऊँचे - ऊँचे फाटक हों और वह नगर पर्वत पर अथवा नदी, मरुस्थल और वन के समीप बसा हो ॥२६-२८ ॥ जल, पर्वत, वृक्ष, निर्जन स्थान तथा रेगिस्तान में बना हुआ दुर्ग, पर्याप्त जल तथा धन - धान्य से युक्त होना चाहिए, जिससे ( विपत्तिकाल में ) वहाँ बहुत समय व्यतीत किया जा सके । कोष ( खजाना ) ऐसा होना चाहिए जिसमें न्याय से सञ्चित अभीष्ट धनराशि हो, जो पिता, पितामह आदि के काल से ही चलता आ रहा हो और जिसे व्यय किया जा सके । ऐसा कोष धर्म आदि की वृद्धि के लिए हुआ करता है ॥ २ ९ -३० ॥ दण्डशास्त्र के वेत्ताओं के अनुसार दण्ड देनेवाला ऐसा होना चाहिए जो पिता- पितामह से चला आ रहा हो, वश में रहनेवाला हो, मेल - मिलापवाला हो, वैतनिक हो, जिसका पौरुष विख्यात हो, सत्कुल में उत्पन्न, कुशल और ( नाना प्रकार के ) पक्षियों से युक्त हो, नाना प्रकार के शस्त्रों को धारण करनेवाला हो, विभिन्न युद्धों में निपुण हो, विभिन्न योद्धाओं से घिरा हुआ हो, हाथी– घोड़ों का संग्रह करनेवाला हो, जिसने विदेशवास, परिश्रम के कार्यों, ( विभिन्न ) दुःखों और युद्धों में परिश्रम किया हो और जिसमें द्विविधा न हो, उसे प्रायः क्षत्रिय जाति का होना चाहिए । मित्र ऐसा होना चाहिए जो योग, विज्ञान तथा सत्त्व गुण सम्पन्न, पक्ष लेनेवाला हो, प्रियवक्ता, विपत्ति में साथ देनेवाला और सत्कुलीन हो ॥ ३१-३४ ॥ दूर से ही अगवानी से १ क. ङ. ' रगोपुरम् । २ क. ङ. ' रित्सहबलाश्र ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 736

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७३२ अग्निपुराणम् दूरादेवाभिगमनं स्पष्टार्थहृदयानुगा । धर्मकामार्थसंयोगो मित्रात्तु त्रिविधं फलम् 1 । रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् वक्ष्येऽनुजीविनां वृत्तं सेवी सेवेत भूपतिम् । सन्तोषः शीलमुत्साहो मण्डयत्यनुजीविनम् परस्थानगमं क्रौर्यमौद्धत्यं मत्सरं त्यजेत् गुह्यं मर्म च मन्त्रं च न च भर्तुः प्रकाशयेत् । अकार्ये प्रतिषेधश्च कार्ये चापि प्रवर्तनम् आजीव्यः सर्वसत्त्वानां राजा पर्जन्यवद्भवेत् कुर्यादुद्योगसम्पन्नानध्यक्षान्सर्वकर्मसु खन्याकरबलादानं शून्यानां च निवेशनम् आमुक्तिकेभ्यश्चौरेभ्यः पौरेभ्यो राजवल्लभात् करना, हृदय खोलकर बात करना और सत्कारपूर्वक वाक्सत्कृत्य प्रदानं च त्रिविधो मित्रसंग्रहः ॥३५ ॥

औरसं तत्र संनद्धं तथा वंशक्रमागतम् ॥ ३६ ॥

। मित्रे गुणाः सत्यताद्याः समानसुखदुःखता ॥ ३७ ॥

दक्षता भद्रता दादर्थं क्षान्तिः क्लेशसहिष्णुता ॥ ३८ ॥

। यथाकालमुमासीत राजानं सेवको नयात् ॥ ३ ९ ॥ । विगृह्य कथनं भृत्यो न कुर्याज्यायसा सह ॥ ४० ॥

रक्ताद्वृत्तिं समीहेत विरक्तं सत्यजेन्नृपम् ॥४१ ॥

। संक्षेपादिति सद्वृत्तिं बन्धुमित्रानुजीविनाम् ॥४२ ॥

। आयद्वारेषु चाऽऽप्त्यर्थं धनं चाऽऽददतीति च ॥४३ ॥

। कृषिर्वणिक्पथो दुर्गं सेतुः कुञ्जरबन्धनम् ॥ ४४ ॥

। अष्टवर्गमिमं राजा साधुवृत्तोऽनुपालयेत् ॥४५ ॥

। पृथिवीपतिलोभाच्च प्रजानां पञ्चधा भयम् ॥४६ ॥

( उपहार आदि ) प्रदान करना - ये तीन मित्रसंग्रह के उपाय हैं । मित्र से धर्म, अर्थ, काम ये तीन फल मिलते हैं । मित्र चार प्रकार के होते हैं - एक औरस ( पुत्र या सगोत्र ), दूसरा संनद्ध ( सदा साथ रहनेवाला ), तीसरा वंशक्रमानुगामी और चौथा व्यसनों से छुड़ानेवाला । सुख - दुःख में समान रूप से भाग लेना तथा सत्य व्यवहार करना - ये मित्र के गुण हैं ॥३५-३७ ॥ अब मैं राजा के अनुजीवियों के कर्त्तव्यों को बताऊँगा । ( पहले तो ) सेवक को राजा की सेवा करनी चाहिए । दक्षता, भद्रता, दृढ़ता, क्षमाशीलता, क्लेश-सहिष्णुता, सन्तोष, शील तथा उत्साह - ये गुण सेवक को ( और भी ) विभूषित करते हैं । सेवक को नीति के अनुसार अवसरानुकूल राजा की सेवा करनी चाहिए । उसे ( अपने कार्यकाल में ) कहीं अन्यत्र जाना नहीं चाहिए और क्रूरता, औद्धत्य तथा मात्सर्य को छोड़ देना चाहिए । सेवक को अपने से श्रेष्ठ के साथ बढ़ - बढ़कर बातचीत नहीं करनी चाहिए । स्वामी की गुप्त, रहस्यपूर्ण और मन्त्रणा की बातों को प्रकट नहीं करना चाहिए । अनुरक्त राजा से ही चाकरी की इच्छा करनी चाहिए और ( अपने से ) विरक्त राजा का परित्याग कर देना चाहिए ॥३८-४१ ॥ उसे अकार्य का परित्याग और कर्त्तव्य का ग्रहण करना चाहिए । संक्षेप में बन्धु, मित्र और सेवक का यही आचरण होना चाहिए । राजा को समस्त प्राणियों के लिए मेघ के समान जीवन देनेवाला होना चाहिए । उसे आय के स्रोतों से धन प्राप्त करके ( पुनः प्रजा के कल्याण के लिए प्रजा को ही ) दे देना चाहिए । उसे उद्योगी व्यक्तियों को सभी कार्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिए । सदाचारी राजा को कृषि, व्यापार, दुर्ग, सेतु ( पुल ), हाथी फँसाने का वन, खान, सेना तथा सुरंग-इन अष्टवर्गों की रक्षा करनी चाहिए ॥४२-४५ ॥ प्रजा को इन पाँच से भय रहा करता है - शस्त्र धारण करनेवाले चोर, राजकर्मचारी, राजा के प्रियजन और बाहरी राजा का लोभ । इस भय को देखते हुए राजा, को कर लेकर उसे CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 737

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चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७३३ अवेक्ष्यैतद्भयं काल आददीत करं नृपः । अभ्यन्तरं शरीरं स्वं वा ( बा ) ह्यं राष्ट्रं च रक्षयेत् ॥४७ ॥

दण्ड्यांस्तान्दण्डयेद्राजा स्वं रक्षेच्च विषादितः । स्त्रियः पुत्रांश्च शत्रुभ्यो विश्वसेन्न कदाचन ॥४८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये राजधर्मकथनं नामैकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३९ ॥

अथ चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः षाड्गुण्यम् राम उवाच मण्डलं चिन्तयेन्मुख्यं राजा द्वादशराजकम् । अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम् ॥१ ॥

तथाऽरिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरः स्मृताः । पाणिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम् ॥२ ॥

आसारावनयोश्चैवं विजिगीषोश्च मण्डलम् । अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यमो भूम्यनन्तरः ॥ ३ ॥

अनुग्रहे संहतयोर्निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः । मण्डलाद्बहिरेतेषामुदासीनो बलाधिकः ॥४ ॥

अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च वधे प्रभुः । सन्धिं च विग्रहं यानमासनादि वदामि ते ॥ ५ ॥

अपनी तथा राष्ट्र की आन्तरिक एवं बाह्य रूप से रक्षा करनी चाहिए । राजा को दण्ड के योग्य मनुष्यों को दण्ड देना चाहिए और विष आदि से अपनी, अपनी स्त्रियों और अपने पुत्रों की रक्षा करनी चाहिए । उसे शत्रुओं का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए ॥४६-४८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में राजधर्म - कथन नामक दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३९ ॥

अध्याय २४० षाड्गुण्य- -वर्णन राम बोले- राजा को सदैव बारह राजाओं के मण्डल ( बलाबल ) का विचार करते रहना चाहिए । विजयाकांक्षी राजा के सम्मुख परस्पर मिले हुए राज्यों में मित्र- अमित्र का व्यवहार इस क्रम से करना चाहिए उस राजा को जिसका राज्य विजयाकांक्षी राजा के राज्य की सीमा से मिला हुआ हो, शत्रु समझना चाहिए, उस राज्य से भी दूर रहनेवाले राजा को मित्र का मित्र समझना चाहिए और उससे भी अधिक दूर रहनेवाले राजा को शत्रु के मित्र का मित्र समझना चाहिए । विजयाकांक्षी राजा के सहित इन छह राजाओं का अर्ध ( राज ) मण्डल कहा जाता है । पाणिग्राह ( जिसका राज्य विजयाकांक्षी राजा के पीछे की सीमा से मिला हो ) को शत्रु समझना चाहिए, आक्रन्द ( जिसका राज्य उससे दूर हो ) को मित्र समझना चाहिए और आक्रन्दासार ( वह राजा जिसका राज्य उससे भी दूर हो ) को मित्र आक्रन्द राजा का मित्र समझना चाहिए । असार ( उससे भी दूरवर्ती राज्य के स्वामी ) को वैरी पाष्णिग्राह का मित्र समझना चाहिए और आक्रन्दासार ( वह राजा जिसका राज्य उससे भी दूर हो ) आक्रन्दराजा का मित्र समझना चाहिए । वह राजा जिसका राज्य विजयाकांक्षी राजा और शत्रु के राज्य के बीच में हो, मध्यम कहलाता है । वह राजा, जो इन द्वादश राजाओं के मण्डल से बाहर रहता है, सबको एक साथ या अलग-अलग हरा सकता है, उदासीन कहलाता है ॥१-४ ॥ अब मैं सन्धि, विग्रह, यान, आसन आदि के सम्बन्ध में तुमसे CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७३४ अग्निपुराणम् बलवद्विगृहीतेन संधिं कुर्याच्छिवाय च । उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः । परिक्रमस्तथा छिन्नस्तथा च परदूषणम् । परस्परोपकारश्च मैत्रः सम्बन्धकस्तथा । बालो वृद्धो दीर्घरोगस्तथा बन्धुबहिष्कृतः । विरक्तप्रकृतिश्चैव विषयेष्वतिशक्तिमान् दैवोपहतकश्चैव दैवनिन्दक एव च स्वदेशस्थो बहुरिपुर्मुक्तः कालेन यश्च ह । एतैः सन्धिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केवलम् । आत्मनोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा राज्यस्त्रीस्थानदेशानां ज्ञानस्य च बलस्य च ज्ञानात्मशक्तिधर्माणां विद्यातो दैवमेव च भूतानुग्रहविच्छेदस्तथा मण्डलदूषणम् सापल्यं वास्तुजं स्त्रीजं वाग्जातमपराधजम् किञ्चित्फलं निष्फलं वा संदिग्धफलमेव च कपाल उपहारश्च संतानः संगतस्तथा ॥ ६ ॥

अदृष्टनर आदिष्ट आत्माऽपि स उपग्रहः ॥७ ॥

स्कन्धोपनेयः संधिश्च संधयः षोडशेरिताः ॥८ ॥

उपहाराश्च चत्वारस्तेषु मुख्याश्च संधयः ॥ ९ ॥

भीरुको भीरुकजनो ' लुब्धो लुब्धजनस्तथा ॥१० ॥

। अनेकचित्तमन्त्रश्च देवब्राह्मणनिन्दकः ॥११ ॥

। दुर्भिक्षव्यसनोपेतो बलव्यसनसंकुलः ॥१२ ॥

सत्यधर्मंव्यपेतश्च विंशतिः पुरुषा अमी ॥ १३ ॥

परस्परापकारेण पुंसां भवति विग्रहः ॥१४ ॥

। देशकालबलोपेतः प्रारभेतेह विग्रहम् ॥१५ ॥

। अपहारो मदो मानः पीडा वैषयिकी तथा ॥ १६ ॥

। मित्रार्थं चापमानश्च तथा बन्धुविनाशनम् ॥१७ ॥

। एकार्थाभिनिवेशित्वमिति विग्रहयोनयः ॥१८ ॥

। वैरं पञ्चविधं प्रोक्तं साधनैः प्रशमं नयेत् ॥ १ ९ ॥ । तदात्वे दोषजननमायत्यां चैव निष्फलम् ॥२० ॥

बतलाऊँगा । यदि अपने से बलवान् के साथ युद्ध छिड़ गया हो तो उससे सन्धि कर लेने में ही कल्याण है । सन्धि के सोलह भेद हैं - कपाल, उपहार, सन्तान, संगत, उपन्यास, प्रतीकार, संयोग, पुरुषान्तर, अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मा, उपग्रह, परिक्रम, छिन्न, परदूषण और स्कन्धोपनेय ॥५-८ ॥ उनमें मुख्य सन्धियाँ चार हैं- परस्पर उपकार, मित्रता, सम्बन्ध तथा उपहार । बालक, वृद्ध, दीर्घरोगी, बन्धुबहिष्कृत, डरपोक, कायरता उत्पन्न करनेवाले, लोभी, प्रलोभित, विरक्त स्वभाववाले, विषयासक्त, अस्थिर चित्त से विचार करनेवाले, देव - ब्राह्मण - निन्दक, अभागे, भाग्य को न माननेवाले, दुर्भिक्ष से पीड़ित, अपने बल का अनुचित प्रयोग करनेवाले, अपने देश से न निकलनेवाले, शत्रुओं से घिरे रहनेवाले, समय के प्रतिकूल कार्य करनेवाले और सत्य तथा धर्म का परित्याग कर देनेवाले - ये बीस प्रकार के पुरुष ऐसे हैं जिनके साथ सन्धि नहीं करनी चाहिए, केवल विग्रह ही करना चाहिए ॥९ -१३३ ॥ परस्पर अपकार करने से मनुष्यों में विग्रह होता है । इस लोक में विग्रह उसे ही करना चाहिए, जो अपना अभ्युदय चाहता हो या दूसरे के द्वारा पीड़ित किया गया हो तथा जो देश - काल ( के ज्ञान ) एवं बल से युक्त हो । राज्य, स्त्री, स्थान, देश, ज्ञान तथा बल का अपहरण, मद, मान,, प्रजा को पीड़ा देना, ज्ञान, आत्मशक्ति तथा धर्म का हनन, भाग्य, मित्र के लिए अपमान, बन्धु का विनाश, प्राणियों के ऊपर दया न करना, राजमण्डल को दूषित करना, एक ही चीज के ऊपर अड़े रहना - ये सब झगड़े की जड़ें हैं ॥१४-१८ ॥ वैर पाँच प्रकार का होता है - सापल्य भाव से उत्पन्न, द्रव्य के कारण उत्पन्न, वाणी से उत्पन्न तथा अपराध से उत्पन्न । इस वैर को, उपायों से शान्त कर देना चाहिए । जब विग्रह करने से बहुत अल्प फल मिले या कुछ भी फल न मिले, १ क. ङ. भीरुजनको । २ क. ङ. ' स्परोप ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७३५ आयत्यां च तदात्वे च दोषसंजननं तथा । परार्थं स्त्रीनिमित्तं च दीर्घकालं द्विजैः सह तदात्वे फलसंयुक्तमायत्यां फलवर्जितम् । इतीमं षोडशविधं न कुर्यादेव विग्रहम् हृष्टं पुष्टं बलं मत्वा गृह्णीयाद्विपरीतकम् परस्य विपरीतं च तदा विग्रहमाचरेत् उपेक्षया च निपुणैर्यानं पञ्चविधं स्मृतम् अरेश्च विजिगीषोश्च यानवत्पञ्चधा स्मृतम् द्वैधीभावेन तिष्ठेत काकाक्षिवदलक्षितः यदा द्वावपि नेच्छेतां संश्लेषं जातसंविदौ उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः तद्दर्शनोपास्तिकता नित्यं तद्भावभाविता अपरिज्ञातवीर्येण परेण स्तोभितोऽपि वा ॥ २१ ॥

। अकालदैवयुक्तेन बलोद्धतसखेन च ॥२२ ॥

आयत्यां फलसंयुक्तं तदात्वे निष्फलं तथा ॥२३ ॥

। तदात्वायतिसंशुद्धं कर्म राजा सदाऽऽचरेत् ॥२४ ॥

। मित्रमाक्रन्द आसारो यदा स्युर्दृढभक्तयः ॥ २५ ॥

। विगृह्य संधाय तथा संभूयाथ प्रसंगतः ॥ २६ ॥

। परस्परस्य सामर्थ्यविधातादासनं स्मृतम् ॥२७ ॥

। बलिनोर्द्विषतोर्मध्ये वाचाऽऽत्मानं समर्पयन् ॥ २८ ॥

। उभयोरपि संपाते सेवेत बलवत्तरम् ॥२९ ॥

। तदोपसर्पेत्तच्छत्रुमधिकं वा स्वयं व्रजेत् ॥ ३० ॥

। कुलोद्धतं सत्यमार्यमासेवेत बलोत्कटम् ॥ ३१ ॥

। तत्कारितप्रश्रयिता वृत्तं संश्रयिणः श्रुतम् ॥३२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये षाड्गुण्यकथनं नाम चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२४० ॥

वर्तमान समय में उसे करने से बुरा परिणाम हो, भविष्य में भी वह निष्फल हो, वर्तमान तथा भविष्य दोनों कालों में बुरा ही परिणाम हो, अज्ञात शक्तिवाले शत्रु के द्वारा क्षुब्ध कर दिया गया हो, दूसरे के लिए, स्त्री के निमित्त, दुर्भाग्य के समय, बलाभिमानी मित्र के साथ तत्काल कुछ फल दिखायी दे किन्तु भविष्य में ( फल की ) सम्भावना न हो या भविष्य में यदि फल हो भी किन्तु तत्काल फल का अत्यन्त अभाव रहे, दीर्घकाल तक चलनेवाला तथा द्विजों के साथ होनेवाला - इन सोलह प्रकार की स्थितियों में विग्रह नहीं करना चाहिए ॥१ ९ -२३ - २३३ ॥ राजा को ऐसा ही कर्म करना चाहिए जो वर्तमान तथा भविष्य दोनों में लाभदायक हो, जब सेना हृष्ट - पुष्ट हो तथा मित्र आक्रन्द और आसार राजा के प्रति भक्ति - भाव रखते हों और उसके शत्रु इससे विपरीत परिस्थिति में हों तभी विग्रह करना चाहिए । सेना का प्रयाण पाँच परिस्थितियों में हुआ करता है - युद्ध के लिए, सन्धि के लिए, ( किसी सेना के साथ मिलकर ) प्रसंगवश अथवा ( युद्ध में ) निपुण लोगों के साथ ( युद्ध की ) उपेक्षा से शत्रु और विजिगीषु के परस्पर सामर्थ्य के नष्ट हो जाने पर ( सेनाओं के रुक जाने को ) आसन कहा गया है । यान के समान आसन भी पाँच प्रकार का कहा गया है ॥२४-२७ ॥ राजा को दो बलवान् शत्रुओं ( की सेनाओं ) के बीच अपनी उपस्थिति की घोषणा करते हुए आना चाहिए और वहाँ कौए की आँख के समान स्वयं अलक्षित रहते हुए दोनों सेनाओं को देखते रहना चाहिए । दोनों में संघर्ष छिड़ जाने पर दोनों में जो अधिक बलवान् हो, उसी का साथ करना चाहिए, यदि वे दोनों अपने - अपने साथ में न रहने दें तो उनके शत्रु से जा मिले; जो उनसे अधिक बलवान् हों । यदि बलवान् मनुष्य कुछ अपकार करे और उसकी प्रतिक्रिया करने की सामर्थ्य अपने में न हो तो उस व्यक्ति की शरण लेनी चाहिए जो सत्कुलोत्पन्न, प्रभावशाली और आर्य हो । शरणार्थी का कर्त्तव्य है कि उसे अपने आश्रयदाता का परमभक्त, आज्ञाकारी और कृतज्ञ होना चाहिए ॥२८-३२ ॥ श्री अग्निमहानुराण में षाड्गुण्य - कथन नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४० ॥

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७३६ अग्निपुराणम् अथैकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सामादिकथनम् राम उवाच प्रभावोत्साहशक्तिभ्यां मन्त्रशक्तिः प्रशस्यते । प्रभावोत्साहवान्काव्यो जितो देवपुरोधसा ॥१ ॥

मन्त्रयेतेह कार्याणि नानाप्तैर्ना विपश्चिता । अशक्यारम्भवृत्तीनां कुतः क्लेशादृते फलम् ॥२ ॥

अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः । अर्थद्वैधस्य संदेहच्छेदनं शेषदर्शनम् ॥३ ॥

सहायाः साधनोपाया विभागो देशकालयोः । विपत्तेश्च प्रतीकारः पञ्चाङ्गो मन्त्र इष्यते || ४ || मनः प्रसादं श्रद्धा च तथा कारणपाटवम् । सहायोत्थानसंपच्च कर्मणां सिद्धिलक्षणम् ॥५ ॥

मदः प्रमादः कामश्च सुप्तप्रलपितानि च । भिन्दन्ति मन्त्रं प्रच्छन्नाः कामिन्यो रमतां तथा ॥६ ॥

प्रगल्भः स्मृतिवान्वाग्मी शस्त्रे शास्त्रे च निष्ठितः । अभ्यस्तकर्मा नृपतेर्दूतो भवितुमर्हति ॥७ ॥

निसृष्टार्थो मितार्थश्च तथा शासनहारकः । सामर्थ्यात्पादतो हीनो दूतस्तु त्रिविधः स्मृतः || ८ || नाविज्ञातं पुरं शत्रोः प्रविशेच्च न संसदम् । कालमीक्षेत कार्यार्थमनुज्ञातश्च निष्पतेत् ॥९ ॥

छिद्रं च शत्रोर्जानीयात्कोषमित्रबलानि च । रागापरागौ जानीयाद्दृष्टिगात्रविचेष्टितैः ॥१० ॥

अध्याय २४१ सामादि - कथन राम बोले - प्रभाव तथा उत्साहशक्ति से मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ हुआ करती है, क्योंकि प्रभाववान् और उत्साहवान् शुक्राचार्य को बृहस्पति ने मन्त्रशक्ति के प्रभाव से जीत लिया था ॥१ ॥ इस लोक में कार्यों के सम्बन्ध में अनात्मीय

और अविद्वानों के साथ मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए । बिना क्लेश उठाये कठिन कार्य में फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है । मन्त्रणा के पाँच अङ्ग हुआ करते हैं - अविज्ञान का ज्ञान, ज्ञात का निश्चय, जहाँ पर द्विविधा हो वहाँ से सन्देह को हटाकर सहायता और साधनों के उपायों का निश्चय करना, ( उचित ) देश - काल का विभाग करना और विपत्ति से बचाव ॥२-४ ॥ मानसिक प्रसन्नता, श्रद्धा, साधनपटुता, साहाय्य तथा उत्थान- यह कर्मों की सिद्धि का लक्षण है । मद, प्रमाद, काम, सुप्तप्रलाप तथा रमणकाल में स्त्रियों का विश्वास करना, गुप्त - से - गुप्त मन्त्रणा को भी प्रकट कर दिया करते हैं । राजा का दूत वही हो सकता है जो प्रगल्भ, स्मृतिशील, वाक्चतुर, शस्त्र तथा शास्त्र में निपुण और कर्मठ हो ॥५-७ ॥ दूत तीन प्रकार के हुआ करते हैं - निसृष्टार्थ ( अपनी इच्छा से कार्य करनेवाला ), मितार्थ ( राजा के आदेशानुसार कार्य करनेवाला ) और शासनहारक जो किसी विशेष समस्या पर राजा का निर्णय सुनानेवाला हो । इनमें पूर्व - पूर्ववाला दूत बाद- बादवाले दूत की अपेक्षा सामर्थ्य में कम हीन हुआ करता है । उसे शत्रु के अज्ञात नगर अथवा उसकी अज्ञात संसद् में प्रवेश नहीं करना चाहिए । उसे कार्य करने के लिए शत्रु की प्रतीक्षा करनी चाहिए और ( राजा की ) अनुज्ञा से ( कार्य में ) जुट पड़ना चाहिए । राजा को शत्रु की दृष्टि और अंगविकार से उसके दोष, कोष, मित्र, सेना, राग और द्वेष का पता लगा लेना चाहिए । उसे ( शत्रु - देश में जाकर, अपने और शत्रु ) दोनों पक्षों CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA