अग्नि पुराण — पृष्ठ 741–750

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७३७ कुर्याच्चतुर्विधं स्तोत्रं स्तोत्रं पक्षयोरुभयोरपि चरः प्रकाशो दूतः स्यादप्रकाशश्चरो द्विधा यायादरिं व्यसनिनं निष्फले दूतचेष्टिते अनयाद्व्यस्यति श्रेयस्तस्मात्तद्व्यसनं स्मृतम् इति पञ्चविधं दैवं व्यसनं मानुषं परम् उत्थतपितेन नीत्या च मानुषं व्यसनं हरेत् दण्डनीतिरमित्रप्रतिषेधनम् इत्यमात्यस्य कर्मेदं हन्ति स व्यसनान्वितः तथाऽन्ये द्रव्यनिचया हन्ति सव्यसना प्रजा पौराद्याश्चोपकुर्वन्ति संश्रयादिह दुर्दिनम् सामन्तादिकृते दोषे नश्येत्तद्व्यसनाच्च तत् धर्मकामादिभेदश्च दुर्गसंस्कारभूषणम् मित्रामित्रवनीहेमसाधनं रिपुमर्दनम् । तपस्विव्यञ्जनोपेतैः सुचरैः सह संवसेत् ॥११ ॥

। वणिक्कृषीवलो लिङ्गी भिक्षुकाद्यात्मकाश्चराः ॥१२ ॥

। प्रकृतिव्यसनं यत्स्यात्तत्समीक्ष्य समुत्पतेत् ॥१३ ॥

। हुताशनो जलं व्याधिर्दुर्भिक्षं मरकं तथा ॥१४ ॥

। दैवं पुरुषकारेण शान्त्या च प्रशमं नयेत् ॥ १५ ॥

। मन्त्रो मन्त्रफलावाप्तिः कार्यानुष्ठानमायतिः ॥१६ ॥

। व्यसनस्य प्रतीकारो राज्यराजाभिरक्षणम् ॥१७ ॥

। हिरण्यधान्यवस्त्राणि वाहनं प्रजया भवेत् ॥१८ ॥

। प्रजानामापदि ( दा ) स्थानां रक्षणं कोषदण्डयोः ॥१९ ॥

। तूष्णीं युद्धं जनत्राणं मित्रामित्रपरिग्रहः ॥२० ॥

। भृत्यानां भरणं दानं प्रजामित्रपरिग्रहः ॥२१ ॥

। कोषात्तद्व्यसनाद्धन्ति कोषमूलो हि भूपतिः ॥ २२ ॥

। दूरकार्याशुकारित्वं दण्डात्तद्व्यसनाद्धरेत् ॥२३ ॥

की स्तुति करनी चाहिए और तपस्वियों के वेश में रहनेवाले गुप्तचरों के साथ निवास करना चाहिए ॥८-११ ॥ प्रकट रूप से रहनेवाले चर को दूत कहते हैं और अप्रकट रूप से भ्रमण करनेवाले दूत को गुप्तचर कहते हैं । इस प्रकार दूत दो प्रकार के हुआ करते हैं । गुप्तचरों को व्यापारी, कृषक, संन्यासी और भिक्षुक आदि के रूप में रहना चाहिए । दूतों की चेष्टाओं के निष्फल हो जाने पर ( राजा को ) विपत्ति में पड़े हुए शत्रु के ऊपर चढ़ाई करनी चाहिए । प्रजाओं में विपत्ति को देखकर ( शत्रु राजा के ऊपर ) आक्रमण कर देना चाहिए । अनीति से कल्याण का विनाश हो जाता है इसलिए इसे व्यसन कहते हैं । देवव्यसन कहलानेवाले हैं- अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष तथा महामारी । इनसे भिन्न जितने भी व्यसन हैं वह मनुष्यकृत हुआ करते हैं । देवव्यसन को पुरुषार्थ और शान्ति ( आदि उपायों ) से शान्त करना चाहिए || १२-१५ ॥ मनुष्य के द्वारा उत्पन्न व्यसन को बल तथा नीति से दूर करना चाहिए । मन्त्रणा करना, मन्त्रणा के फल को प्राप्त करना, कार्यानुष्ठान करना, भविष्य को सोचना, आय - व्यय का निरीक्षण करना, दण्ड देना, शत्रु का प्रतिषेध करना, व्यसन का प्रतिकार करना, राज्य तथा राजा की रक्षा करना - ये सब कर्म अमात्य के कार्य हैं किन्तु यदि वह अमात्य स्वयं व्यसनी होता है तो सब कर्मों को नष्ट कर देता है । सुवर्ण, धान्य, वस्त्र, वाहन तथा अन्य द्रव्यों की प्राप्ति प्रजा से होती है ॥१६-१८ ॥ किन्तु यदि प्रजा व्यसनग्रस्त होती है तो वह सबको नष्ट कर देती है । आपत्तिकाल में प्रजा की रक्षा कोष तथा दण्ड से करनी चाहिए । आश्रय में रहनेवाले पुरवासी इत्यादि दुर्दिन में राजा का उपकार करते हैं । चुपचाप युद्ध की तैयारी करना, जनता की रक्षा करना, मित्र - शत्रु में भेद करना - ये सामन्तों के कार्य हैं, किन्तु उन ( सामन्तों ) के दोष से इन सबका नाश हो जाता है और उनके व्यसन से भी यह नष्ट हो जाते हैं । भृत्यों का भरण, दान, प्रजा तथा मित्रों की सहायता, धर्म-कर्म आदि की परिपूर्णता और दुर्ग - संस्कार आदि कार्य कोष ही के बल पर सिद्ध होते हैं किन्तु कोष में दोष उत्पन्न होने ` से ये सब नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि राजा का मूल तो कोष ही है ।१ ९ -२२ ॥ मित्र, शत्रु, पृथिवी तथा सुवर्ण - प्राप्ति ४७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 742

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अग्निपुराणम् ७३८ संस्तम्भयति मित्राणि ह्यमित्रं नाशयत्यपि । राजा स व्यसनी हन्याद्राजकार्याणि यानि च । पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपतेः । इति पूर्वोपदिष्टं च सचिवव्यसनं स्मृतम् । विशीर्णयन्त्रप्राकारपरिखात्वमशस्त्रता । व्ययीकृतः परिक्षिप्तोऽप्रजितोऽसंजितस्तथा । उपरुद्धं परिक्षिप्तममानितविंमानितम् । परिक्षीणं प्रतिहत प्रहताग्रतरं तथा । कलत्रगर्भं निक्षिप्तमन्तःशल्यं तथैव च । अस्वाम्यसंहतं वाऽपि भिन्नकूटं तथैव च । दैवोपपीडितं मित्रं ग्रस्तं शत्रुबलेन च अर्थस्य दूषणं क्रोधात्पारुष्यं वाक्यदण्डयोः वाक्पारुष्यं परं लोक उद्वेजनमनर्थकम् धनाद्यैरुपकारित्वं मित्रात्तद्व्यसनाद्धरेत् ॥२४ ॥

वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च ॥२५ ॥

अलस्यं स्तब्धता दर्पः प्रमादो द्वैधकारिता ॥२६ ॥

अनावृष्टिश्च पीडादि राष्ट्रव्यसनमुच्यते ॥२७ ॥

क्षीणया सेनया नद्धं दुर्गव्यसनमुच्यते ॥ २८ ॥

दूषितो दूरसंस्थश्च कोषव्यसनमुच्यते ॥ २ ९ ॥ अभूतं व्याधितं श्रान्तं दूरायातं नवागतम् ॥ ३० ॥

आशानिर्वेदभूयिष्ठमनृतप्राप्तमेव च ॥३१ ॥

विच्छिन्नविविधासारं शून्यमूलं तथैव च ॥३२ ॥

दुष्पाणिग्राहमर्थं च बलव्यसनमुच्यते ॥ ३३ ॥

। कामक्रोधादिसंयुक्तमुत्साहादरिभिर्भवेत् ॥३४ ॥

। कामजं मृगया द्यूतं व्यसनं ' पानकं स्त्रियः ॥ ३५ ॥

। असिद्धिसाधनं दण्डस्तं युक्त्याऽवनयेन्नृपः ॥३६ ॥

का साधन, शत्रु को विनष्ट करनेवाला तथा विलम्ब से होनेवाले कार्य में शीघ्रता उत्पन्न करनेवाला दण्ड ही हुआ करता है । अतएव दण्ड में किसी प्रकार का दोष इन सबको नष्ट कर देता है । मित्र, मित्रों का सञ्चय करता है, शत्रुओं का संहार करता है और धन इत्यादि से ( राजा का ) उपकार करता है, किन्तु मित्र यदि व्यसनी हो तो इनका विनाश कर देता है । यदि राजा व्यसनी हो तो वह सभी राजकृत्यों को नष्ट कर दिया करता है । राजा के व्यसन हैं - वाणी और दण्ड की कठोरता, धन का दुरुपयोग, मदिरापान, स्त्रीप्रसंग, मृगया और जुआ । आलस्य, जड़ता, दर्प, प्रमाद, द्विविधा और ऊपर कहे गये दुर्गुण - ये सब मन्त्रियों के व्यसन हैं । अनावृष्टि और पीड़ा आदि राष्ट्र के व्यसन हैं ॥२३-२७ ॥ यन्त्र, चहारदीवारी तथा खाईं का नष्ट होना, शस्त्रों का अभाव, थोड़ी - सी सेना से दुर्ग का निर्माण करना - यह सब दुर्गव्यसन कहलाते हैं । व्यय कर डालना, उधार में लगा देना, वश में न रहना, ठीक से हिसाब न रखना, दूषित कर देना तथा ( देश भर में ) दूर - दूर तक स्थापित करना — ये सब कोष के व्यसन हैं ॥२८-२९ ॥ उपरुद्ध ( कहीं घिरी हुई हो ), बिखरी हुई, अनादृत, उपेक्षित, थोड़ी, व्याधिग्रस्त, थकी हुई, दूर से आयी, नयी - नयी प्राप्त की गयी, क्षीण, प्रतिहत, जिसका आगे का भाग नष्ट हो चुका है, अत्यन्त निराश, धोखा खायी हुई, स्त्रीबहुल, छिन्न - भिन्न, विभिन्न आसारों से युक्त, निराधार, असंगठित, टूटे हुए व्यूहोंवाली और दुष्ट पाष्णिग्राह से घिरी हुई - ये सब सेना के व्यसन हैं ॥३०-३३ ॥ वह मित्र भी शत्रु ही है जो अमात्यग्रस्त हो, शत्रु - सेना से घिरा हुआ हो, काम - क्रोधादि से युक्त हो और उत्साह आदि से विहीन हो । क्रोधवश धन को नष्ट कर देना, वाणी और दण्ड की कठोरता, मृगया, द्यूतक्रीड़ा, मद्यपान और स्त्रियाँ - ये सब काम से उत्पन्न होनेवाले व्यसन हैं । वाणी की कठोरता प्रजाओं को उद्विग्न करनेवाली और ( नाना प्रकार के ) अनर्थों को करनेवाली हुआ करती है । इसी प्रकार कठोर दण्ड भी हुआ करता है । अतः राजा को चाहिए कि इन दोनों को छोड़ दे || ३४-३६ ॥ जो राजा १ ख. ग. पालनं MCC - 0 ।. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 743

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एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७३ ९ उद्वेजयति भूतानि दण्डपारुष्यवान्नृपः विवृद्धाः शत्रवश्चैव विनाशाय भवन्ति ते । अर्थस्य नीतितत्त्वज्ञैरर्थदूषणमुच्यते जितश्रमार्थं मृगयां विचरेद्रक्षिते वने । कालातिपातो धर्मार्थपीडा स्त्रीव्यसनाद्भवेत् । स्कन्धावारनिवेशज्ञो निमित्तज्ञो रिपुं जयेत् । मौलीभूतं श्रेणिसुहृद्विषदाटविकं बलम् । सैन्यैकदेशः संनद्धः सेनापतिपुरःसरः । वार्ता: स्वका विजानीयाद्दरसीमान्तचारिणः । सामं दानं च भेदश्च दण्डोपेक्षेन्द्रजालकम् चतुर्विधं स्मृतं साम उपकारानुकीर्तनात् आयाते दर्शनं वाचा तवाहमिति चार्पणम् प्रतिदानं तदा तस्य गृहीतस्यानुमोदनम् ॥ भूतान्युद्वेज्यमानानि द्विषतां यान्ति संश्रयम् ॥ ३७ ॥

दूष्यस्य दूषणार्थं च परित्यागो महीयसः ॥ ३८ ॥

। पानात्कार्यादिनो ( ष्व धर्मार्थप्राणनाशादि पानदोषात्प्राणनाशः स्कन्धावारस्य मध्ये राजहर्म्यं समावृत्य परिभ्रमेच्चत्वरांश्च निर्गच्छेत्प्रविशेच्चैव ) ज्ञानं मृगयातोऽरितः क्षयः ॥ ३ ९ ॥ द्यूते स्यात्कलहादिकम् ॥४० ॥

कार्याकार्यविनिश्चयः ॥४१ ॥

तु सकोषं नृपतेर्गृहम् ॥४२ ॥

क्रमेण विनिवेशयेत् ॥४३ ॥

मण्डलेन बहिर्निशि ॥४४ ॥

सर्व एवोपलक्षितः ॥४५ ॥

। मायोपायाः सप्त परे निक्षिपेत्साधनाय तान् ॥४६ ॥

। मिथः सम्बन्धकथनं मृदुपूर्वं च भाषणम् ॥ ४७ ॥

। यः सम्प्राप्तधनोत्सर्गं उत्तमाधममध्यमः ॥४८ ॥

द्रव्यदानमपूर्वं च स्वयंग्राहप्रवर्तनम् ॥४९ ॥

प्राणियों को कठोर दण्ड देता है उससे प्रजा उद्विग्न हो जाया करती है और उद्विग्न प्रजा उसके शत्रुओं का आश्रय ले लेती है । इस प्रकार बढ़े हुए शत्रु उस राजा के विनाश का कारण बन जाते हैं । दोष निराकरण के लिए महान् धनराशि का परित्याग करना अर्थदोष है । ऐसा अर्थशास्त्रवेत्ताओं का कहना है । मद्यपान से कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक नष्ट हो जाता है और मृगया ( में लगे रहने ) से शत्रु से विनाश होता है । परिश्रम को जीतने के लिए राजा को किसी सुरक्षित वन में मृगया करनी चाहिए । द्यूतक्रीड़ा से धर्म, अर्थ और प्राणों का नाश होता है और कलह आदि बढ़ता है ॥३७-४० ॥ स्त्री-व्यसन से समय का नाश और धर्म तथा अर्थ ही हानि होती है । मदिरापान से प्राणों का नाश और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का अविवेक उत्पन्न होता है । छावनी के निर्माण में कुशल तथा निमित्तों का ज्ञाता राजा शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त कर लेता है । राजा का कोष तथा निवासगृह छावनी के बीच में होना चाहिए । सेना का मुख्य भाग और उसके अन्य भेद जैसे मित्र सेना और आटविक सेना इत्यादि को राजप्रासाद के चारों ओर रहना चाहिए ॥४१-४३ ॥ सेना के एक भाग को जिसके आगे - आगे सेनापति हो, मण्डल बनाकर रात्रि में चौराहों पर भ्रमण करना चाहिए । उसे दूर - दूर तक राज्य की सीमाओं में अपने सम्बन्ध में होनेवाली बातों का पता लगाते रहना चाहिए । बिना किसी के देखे हुए कहीं प्रवेश करना चाहिए और कहीं से निकलना चाहिए । साम, दान, भेद, दण्ड, उपेक्षा, इन्द्रजाल और मायोपाय ( षड्यन्त्र ) –इन सातों को साधन रूप में प्रयुक्त करना चाहिए । साम चार प्रकार का कहा गया है - दूसरे के उपकार का वर्णन करना ( अर्थात् कृतज्ञता प्रकट करना ), परस्पर सम्बन्ध के विषय में बातें करना, मधुर भाषण करना और ( शत्रु के ) आने पर प्रेमपूर्वक मिलना और ‘ मैं तुम्हारा ही हूँ ' यह कहकर अपने - आपको समर्पण कर देना । पहले कभी न दी गयी वस्तुओं को देना, अपनी इच्छा से किसी वस्तु को ग्रहण करना, अपनी इच्छा से दूसरों को किसी वस्तु को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना, दातव्य ऋण आदि को छोड़ देना या न लेना - इस प्रकार ये दान के पाँच भेद कहे गये हैं ॥४४-४९ ॥ भेदज्ञों ने भेद के तीन CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 744

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अग्निपुराणम् ७४० देयश्च प्रतिमोक्षश्च दानं पञ्चविधं स्मृतम् । मिथोभेदश्च भेदज्ञैर्भेदश्च त्रिविधः स्मृतः । प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकद्विष्टान्प्रकाशतः । विषेणोपनिषद्योगैर्हन्याच्छस्त्रादिना द्विषः । प्रलिम्पन्निव चेतांसि दृष्ट्वा साधु पिबन्निव । मिथ्याभिशस्तः श्रीकाम आहूयाप्रतिमानितः । विच्छिन्नधर्मकामार्थः क्रुद्धो मानी विमानितः हृतद्रव्यकलत्रश्च पूजार्होऽप्रतिपूजितः आगतान्पूजयेत्कामैर्निजांश्च प्रशमं नयेत् प्रधानदानमानं च भेदोपायाः प्रकीर्तिताः त्रिशक्तिर्देशकालज्ञो दण्डेनास्तं नयेदरीन् स्नेहरागापनयनसंहर्षोत्पादनं तथा ॥५० ॥

वधोऽर्थहरणं चैव परिक्लेशस्त्रिधा दमः ॥५१ ॥

' उद्विजेत हतैर्लोकस्तेषु पिण्डः प्रशस्यते ॥५२ ॥

जातिमात्रं द्विजं नैव हन्यात्सामोत्तरं वशे ॥ ५३ ॥

ग्रसन्निवामृतं साम प्रयुञ्जीत प्रियं वचः ॥५४ ॥

राजद्वेषी चातिकरस्त्वात्मसंभावितस्तथा ॥ ५५ ॥

। अकारणात्परित्यक्तः कृतवैरोऽपि सान्त्वितः ॥५६ ॥

। एतांस्तु भेदयेच्छत्रौ स्थितान्नित्यान्सुशङ्कितान् ॥५७ ॥

। सामदृष्टानुसंधानमत्युग्रभयदर्शनम् ॥५८ ॥

I । मित्रं हतं काष्ठमिव घुणजग्धं विशीर्यते ॥ ५ ९ ॥ । मैत्रीप्रधानं कल्याणबुद्धिं सान्त्वेन साधयेत् ॥६० ॥

भेद बतलाये हैं - परस्पर स्नेह तथा अनुराग को नष्ट कर देना, दो पक्षों में परस्पर संघर्ष उत्पन्न कर देना और भेद डाल देना । दम ( भी ) तीन प्रकार का हुआ करता है - वध, धन का अपहरण करना और क्लेश देना । दण्ड दो प्रकार का हुआ करता है - प्रकाश और अप्रकाश । समाजद्रोही को प्रकाश रूप में दण्ड देना चाहिए । मृत्युदण्ड अथवा ( अपराधी के ) शिरश्छेद की अपेक्षा शारीरिक दण्ड अधिक उत्तम माना जाता है ॥५०-५२ ॥ शत्रु को विष, मन्त्र, तन्त्र और शस्त्र आदि ( के प्रयोग से ) मारना चाहिए; पर केवल जन्म से भी द्विज कहलानेवाले का वध नहीं करना चाहिए अपितु उसे साम आदि ( उपायों ) के द्वारा वश में करना चाहिए । जिससे बातचीत की जाय उसके मुख का ( नेत्रों से ) पान करते हुए साम में ऐसे प्रिय वचनों का प्रयोग करना चाहिए जो हृदय का स्पर्श करनेवाले हों और अमृत - सा घोल रहे हों । शत्रु में ऐसे लोगों से भेद करवा देना चाहिए जिनके ऊपर मिथ्या लांछन लगाया गया हो, जिन्हें धन देने के लिए बुलाकर अपमानित किया गया हो, जो राजा से द्वेष करते हों, जिनके साथ दुर्व्यवहार किया गया है, जो आत्माभिमानी हों, धर्म, अर्थ, काम से वंचित हों, क्रोधी हों, अतिमानी हों, अकारण छोड़ दिये गये हों, जिन्हें शत्रुता करके भी सान्त्वना दे दी गयी हो, जिनका धन तथा स्त्री छीन ली गयी हो और जो पूज्य होने पर भी अपमानित किये गये हों - ऐसे लोग यदि अपनी ओर आ जायँ तो उनकी इच्छाओं को पूर्ण करके उनका सत्कार करना चाहिए, किन्तु ऐसे लोग यदि अपनी ओर हों तो उन्हें शान्त करना चाहिए ॥५३-५७ ॥ शत्रु सेना में भेद उत्पन्न करने के उपाय हैं - साम के प्रयोग, अत्यन्त उग्र भय का प्रदर्शन और ( शत्रु के ) प्रधान पुरुषों को दान देना तथा उनका सम्मान करना । झूठे मित्रों से घिरा हुआ राजा घुन लगी हुई लकड़ी की भाँति नष्ट हो जाया करता है । त्रिशक्ति ( प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति और उत्साहशक्ति ) से सम्पन्न तथा देश - काल के ज्ञाता राजा को दण्ड के द्वारा शत्रुओं को वश में कर लेना चाहिए । जो राजा से मैत्री की भावना रखता हो अथवा उसके कल्याण की कामना करता हो उसे सान्त्वना के द्वारा वशीभूत करना चाहिए ॥५८-६० ॥ लोभी तथा दरिद्र को दान से, मित्रों को परस्पर १ क. ङ. उद्वेजित ह । २ क. ङ. प्रकाश्यते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 745

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एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७४१ लुब्धं क्षीणं च दानेन मित्रानन्योन्यशङ्कया दानभेदैश्चमूमुख्यान्योधाञ्जनपदादिकान् देवताप्रतिमानां पूजयान्तर्गतैर्नरैः वेतालोल्कापिशाचानां शिवानां च स्वरूपिका तमोऽनिलोऽनलो मेघ इति माया ह्यमानुषी अन्याये व्यसने युद्धे प्रवृत्तस्यानिवारणम् मेघान्धकारवृष्ट्यग्निपर्वताद्भुतदर्शनम् छिन्नपाटितभिन्नानां संसृतानां च दर्शनम् इत्यादिमहापुराण आग्नेये सामादिकथनं । दण्डस्य दर्शनादुष्टान्पुत्रभ्रातादि सामतः ॥६१ ॥

। सामन्ताटविकान्भेददण्डाभ्यामपराद्धकान् ॥६२ ॥

। पुमान्स्त्रीवस्त्रसंवीतो निशि चाद्भुतदर्शनः ॥६३ ॥

। कामतोरूपधारित्वं शस्त्राग्न्यश्माम्बुवर्षणम् ॥६४ ॥

। जघान कीचकं भीम आस्थितः स्त्रीस्वरूपताम् ॥६५ ॥

। उपेक्षेयं स्मृता भ्रातोपेक्षितश्च हिडिम्बया ॥६६ ॥

। दूरस्थानां च सैन्यानां दर्शनं ध्वजशालिनाम् ॥ ६७ ॥

। इतीन्द्रजालं द्विषतां भीत्यर्थमुपकल्पयेत् ॥६८ ॥

नामैकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४१ ॥

एक - दूसरे से सशंकित रखते हुए, दुष्टों को दण्ड से, पुत्रों और भाइयों को साम से, मुख्य योद्धाओं, देशवासियों, सामन्तों तथा वनसैनिकों को विविध प्रकार के दान से और अपराधियों को दण्डभेद से वश में करना चाहिए । देव-प्रतिमाओं को पूजा से प्रसन्न करना चाहिए । शत्रु को भयभीत करने के लिए विभिन्न प्रकार की माया और इन्द्रजाल आदि का प्रयोग करना चाहिए जैसे रात्रि में पुरुष को स्त्री का वस्त्र पहनकर अद्भुत वेश बनाना चाहिए ॥६१-६३ ॥ कभी वेताल, उल्का, पिशाच तथा शृगाली का रूप धारण करना चाहिए, कभी शस्त्र, अग्नि, जल तथा पत्थर बरसाना चाहिए, कभी अन्धकार, कभी आँधी, कभी आग तथा कभी बादल से वातावरण को भयावह बना देना चाहिए । इस तरह की माया को अमानुषी माया कहते हैं । इसी माया के प्रभाव से भीम ने स्त्री रूप धारण करके कीचक का वध किया था । अन्याय, व्यसन तथा युद्ध में लगे हुए को हटाना उपेक्षा कहलाता है । इसी तरह की उपेक्षा हिडिम्बा ने अपने भाई से की थी ॥६४-६६ ॥ बादल, अन्धकार, वृष्टि, अग्नि तथा पर्वत का अद्भुत रूप दिखलाना, ध्वजा-पताका सहित दूर रहनेवाली सेना को समीप लाकर दिखाना, शत्रु- पक्ष की सेना को छिन्न - भिन्न रूप में दिखलाना-ये सब इन्द्रजाल हैं । शत्रुओं को डराने के लिए इनका प्रयोग करना चाहिए ॥६७-६८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सामादि - कथन नामक दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४१ ॥

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पृष्ठ 746

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अग्निपुराणम् ७४२ अथ द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः राजनीति: राम उवाच षड्विधं तु बलं व्यूह्य देवान्प्रार्च्य रिपुं व्रजेत् । पूर्वं पूर्वं गरीयस्तु बलानां व्यसनं तथा । नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र तत्र भयं भवेत् 1 । नायकः पुरतो यायात्प्रवीरपुरुषावृतः 1 । पार्श्वयोरुभयोरश्वा वाजिनां पार्श्वयो रथाः । पश्चात्सेनापतिः सर्वं पुरस्कृत्य कृती स्वयम् यायाद्व्यूहेन महता मकरेण पुरो भये पश्चाद्भये तु शकटं पार्श्वयोर्वज्रसंज्ञितम् कन्दरे शैलगहने निम्नगावनसंकटे मौलं भूतं श्रोणिसुहृद्विषदाटविकं बलम् ॥ १ ॥

षडङ्गं मन्त्रकोषाभ्यां पदात्यश्वरथद्विपैः ॥२ ॥

सेनापतिस्तत्र तत्र गच्छेद्व्यूहीकृतैर्बलैः ॥३ ॥

मध्ये कलत्रं स्वामी च कोषः फल्गु च यद्बलम् ॥४ ॥

रथानां पार्श्वयोर्नागा नागानां चाटवीबलम् ॥५ ॥

। यायात्संनद्धसैन्यौघः खिन्नानाश्वासयञ्शनैः ॥६ ॥

। श्येनेनोद्धृतपक्षेण सूच्या वा ' वीरवक्त्रया ॥७ ॥

। सर्वतः सर्वतोभद्रं भये व्यूहं प्रकल्पयेत् ॥८ ॥

1 । दीर्घाध्वनिपरिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितक्लमम् ॥९ ॥

अध्याय २४२ राजनीति राम बोले - देवताओं का पूजन करके छह प्रकार के सैन्यव्यूह की रचना करके शत्रु ( से युद्ध ) के लिए प्रयास करना चाहिए । मौल, भूत, श्रोणि, सुहृद्, द्विषद् और आटविक - ये सेना के छह अङ्ग हैं ॥१ ॥ इनमें पूर्व - पूर्व प्रकार

की सेना क्रमश: अपने बादवाले अङ्ग की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हुआ करती है । इसी क्रम से इनके व्यसन ( संकट ) के महत्त्व को भी समझना चाहिए । मन्त्र, कोष, पदाति, अश्व, रथ और गज - ये छह सेना के अंग हुआ करते हैं । नदी, पर्वत, वन, दुर्ग आदि स्थानों में जहाँ भय हो वहाँ - वहाँ सेनापति को सैन्यव्यूह बनाकर रहना चाहिए || २-३ ॥ सबसे आगे वीर योद्धाओं के साथ सेनानायक को चलना चाहिए । मध्य में स्त्री, स्वामी, कोष तथा जो सेना अशक्त हो गयी है उसको आगे रहना चाहिए । उसके दोनों ओर अश्व, अश्वों के दोनों ओर रथ, रथों के दोनों ओर हाथी, हाथियों के दोनों ओर सफरमैना सैनिक और सबसे पीछे सेनापति को रहना चाहिए । उसे सबको आगे करके स्वयं पर्याप्त सैनिकों को साथ लेकर खिन्न सैनिकों को सान्त्वना देते हुए धीरे - धीरे चलना चाहिए ॥४-६ ॥ सेना को बहुत बड़े मकरव्यूह के रूप में प्रयाण करना चाहिए । आगे किसी भय की शंका होने पर ऊपर पंख उठाये हुए श्येन, सूची अथवा भयंकर मुख के आकार के व्यूह की रचना करनी चाहिए । यदि पीछे से भय उपस्थित हो तो शकटाकार व्यूह की और सब ओर भय हो तो सर्वतोभद्रव्यूह की रचना करनी चाहिए ॥७-८ ॥ गुफा, पर्वतीय दर्रा, नदी तथा लम्बे मार्ग में भूख - प्यास से व्याकुल, परिश्रान्त, व्याधि, दुर्भिक्ष तथा महामारी आदि से पीड़ित, चोरों से १ ख. ग. क्रूस्वा anskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 747

अग्नि पुराण, पृष्ठ 747 का मूल पृष्ठ
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द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७४३ व्याधिदुर्भिक्षमरकपीडितं दस्युविद्रुतम् । प्रसुप्तं भोजनव्यग्रमभूमिष्ठमसुस्थितम् । इत्यादौ स्वचमूं रक्षेत्परसैन्यं च घातयेत् । कुर्यात्प्रकाशयुद्धं हि कूटयुद्धं विपर्यये । अभूमिष्ठं स्वभूमिष्ठः स्वभूमौ चोपजातयः । हन्यात्प्रवीरपुरुषैर्भङ्गदानापकर्षणैः । हन्यात्पश्चात्प्रवीरेण बलेनोपेत्य वेगिना । आभ्यां पार्श्वाभिघाती तु व्याख्यातौ कूटयोधने । पुरः पश्चात्तु विषम एवमेव तु पार्श्वयोः । श्रान्तं मन्दं निराक्रन्दं हन्यादश्रान्तवाहनम् पङ्कपांशुजलस्कन्धं व्यस्तं पुञ्जीकृतं पथि ॥१० ॥

चौराग्निभयवित्रस्तं वृष्टिवातसमाहतम् ॥११ ॥

विशिष्टो देशकालाभ्यां भिन्नविप्रकृतिर्बली ॥१२ ॥

तेष्ववस्कन्दपालेषु परं हन्यात्समाकुलम् ॥१३ ॥

प्रकृतिप्रग्रहाकृष्टं पाशैर्वनचरादिभिः ॥१४ ॥

पुरस्ताद्दर्शनं दत्त्वा तल्लक्षकृतनिश्चयान् ॥१५ ॥

पश्चाद्वा संकुलीकृत्य हन्याच्छूरेण पूर्वतः ॥ १६ ॥

पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यास्तु वेगवान् ॥ १७ ॥

प्रथमं योधयित्वा तु दूष्यामि त्राटवीबलैः ॥ १८ ॥

। दूष्यामित्रबलैर्वाऽपि भङ्गं दत्त्वा प्रयत्नवान् ॥१९ ॥

लूटी हुई, कीचड़, धूल तथा जल में निमग्न, भोजन के लिए आतुर, रास्ते पर सोयी, अस्थिर, अस्वस्थ, चोर तथा अग्नि - भय से संत्रस्त, वर्षा और आँधी से पीड़ित अपनी सेना की तो रक्षा करनी चाहिए, किन्तु परकीय सेना का विध्वंस करना चाहिए ॥९ -११३ ॥ । जब आक्रमण के लक्ष्यभूत शत्रु की अपेक्षा विजिगीषु राजा देश - काल की अनुकूलता की दृष्टि से बढ़ा - चढ़ा हो तथा शत्रु की प्रकृति में फूट डाल दी गयी हो और अपना बल अधिक हो तो शत्रु के साथ प्रकाशयुद्ध ( घोषित या प्रकट संग्राम ) छेड़ दे । यदि विपरीत स्थिति हो तो कूटयुद्ध ( छिपी लड़ाई ) करे । जब शत्रु की सेना पूर्वोक्त बलव्यसन ( सैन्य - संकट ) के अवसरों या स्थानों में फँसकर व्याकुल हो तथा युद्ध के अयोग्य भूमि में स्थित हो और सेना सहित विजिगीषु अपने अनुकूल भूमि पर स्थित हो, तब वह शत्रु पर आक्रमण करके उसे मार गिराये । यदि शत्रु - सैन्य अपने लिये अनुकूल भूमि में स्थित हो तो उसकी प्रकृतियों में भेदनीति द्वारा फूट डलवाकर, अवसर देख शत्रु का विनाश कर डाले । जो युद्ध से भागकर या पीछे हटकर शत्रु को उसकी भूमि से बाहर खींच लाते हैं, ऐसे वनचरों ( आटविकों ) तथा अमित्र सैनिकों ने पाशभूत होकर जिसे प्रकृति प्रग्रह से ( स्वभूमि या मण्डल से ) दूर - परकीय भूमि में आकृष्ट कर लिया है, उस शत्रु को प्रकृष्ट वीरयोद्धाओं द्वारा मरवा डाले । कुछ थोड़े से सैनिकों को सामने की ओर युद्ध के लिए उद्यत दिखा दे और जब शत्रु के सैनिक उन्हीं को अपना लक्ष्य बनाने का निश्चय कर लें, तब पीछे से वेगशाली उत्कृष्ट वीरों की सेना के साथ पहुँचकर उन शत्रुओं का विनाश कर दे अथवा पीछे की ओर ही सेना एकत्र करके दिखाये और जब शत्रु सैनिकों का ध्यान उधर ही खिंच जाय, तब सामने की ओर से शूरवीर बलवान् सेना द्वारा आक्रमण करके उन्हें नष्ट कर दे ॥ १२-१६ ॥ सामने तथा पीछे की ओर से किये जानेवाले इन दो आक्रमणों द्वारा अगल - बगल से किये जानेवाले आक्रमणों की भी व्याख्या हो गयी अर्थात् बायीं ओर कुछ सेना दिखाकर दाहिनी ओर से और दाहिनी ओर सेना दिखाकर बायीं ओर से गुप्त रूप से आक्रमण करे । कूटयुद्ध में ऐसा ही करना चाहिए । पहले दूष्यबल, अमित्रबल तथा आटविकबल - इन सबके साथ शत्रु - सेना को लड़ाकर थका दे । जब शत्रुबल श्रान्त, मन्द ( हतोत्साह ) और निराक्रन्द ( मित्ररहित एवं निराश ) हो जाय और अपनी सेना के वाहन थके न हों, उस दशा में आक्रमण करके शत्रुवर्ग को मार गिराये । अथवा दूष्य १ घ. ' जायतः प्र । २ ख. ग. विषय । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७४४ अग्निपुराणम् जितमित्येव विश्वस्तं हन्यान्मन्त्रव्यपाश्रयः । विश्रम्य ( म्भ ) न्तं परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् । अवस्कन्दभयाद्रात्रिप्रजागरकृतश्रमम् । निशि विश्रव्धसंसुप्तं नागैर्वा खड्गपाणिभिः । अभिन्नानामनीकानां भेदनं भिन्नसंग्रहः । अभिन्नभेदनं मित्रसंधानं रथकर्म च । अनुयानापसरणे शीघ्रकार्योपपादनम् अश्वकर्माथ पत्तेश्च सर्वदा शस्त्रधारणम् संस्थूलस्थाणुवल्मीकवृक्षगुल्मापकण्टकम् ।

स्वल्पवृक्षोपला क्षिप्रलङ्घनीयनगा स्थिरा ।

स्कन्धावारपुरग्रामसस्यस्वामिप्रजादिषु ॥२० ॥

अथवा गोग्रहाकृष्टं तल्लक्ष्यं मार्गबन्धनात् ॥२१ ॥

दिवाप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकम् ॥२२ ॥

प्रयाणे पूर्वयायित्वं वनदुर्गप्रवेशनम् ॥२३ ॥

विभीषिकाद्वारघातं कोषरक्षेभकर्म च ॥२४ ॥

वनदिङ्मार्गविचये वीवधासारलक्षणम् ॥२५ ॥

। दीनानुसरणं घातः कोटीनां जघनस्य च ॥ २६ ॥

। शिविरस्य च मार्गादेः शोधनं बस्तिकर्म च ॥ २७ ॥

सापसारा पदातीनां भूर्नातिविषमा मता ॥ २८ ॥

निःशर्करा विपङ्का च सापसारा च वाजिभूः ॥ २ ९ ॥

अथवा अमित्र सेना को युद्ध से पीछे हटने या भागने का आदेश दे दे और जब शत्रु को यह विश्वास हो जाय कि मेरी जीत हो गयी, अतः वह ढीला पड़ जाय, तब मन्त्र बल का आश्रय ले प्रयत्नपूर्वक आक्रमण करके उसे मार डाले । स्कन्धावार ( सेना के पड़ाव ), पुर, ग्राम, सस्यसमूह तथा गौओं के व्रज ( गोष्ठ ) -इन सबको लूटने का लोभ शत्रु - सैनिकों के मन में उत्पन्न करा दे और जब उनका ध्यान बँट जाय, तब स्वयं सावधान रहकर उन सबका संहार कर डाले ॥१७-२०३ ॥ अथवा शत्रु राजा की गायों का अपहरण करके उन्हें दूसरी ओर ( गायों को छुड़ानेवालों की ओर ) खींचे और जब शत्रु - सेना उस लक्ष्य की ओर बढ़ें, तब उसे मार्ग में ही रोककर मार डाले । अथवा अपने ही ऊपर आक्रमण के भय से रातभर जागने के श्रम से दिन में सोयी हुई शत्रु सेना के सैनिक जब नींद से व्याकुल हों, उस समय उन पर धावा बोलकर मार डाले । अथवा रात में ही निश्चिन्त सोये हुए सैनिकों को हाथ में तलवार लिये हुए पुरुषों द्वारा मरवा दे । जब सेना कूच कर चुकी हो तथा शत्रु ने मार्ग में ही घेरा डाल दिया हो तो उसके उस घेरे या अवरोध को नष्ट करने के लिए हाथियों को ही आगे - आगे ले चलना चाहिए । वन - दुर्ग में, जहाँ घोड़े भी प्रवेश न कर सकें, वहाँ हाथियों की सहायता से सेना का प्रवेश होता है - वे आगे के वृक्ष आदि को तोड़कर सैनिकों को प्रवेश के लिए मार्ग बना देते हैं । जहाँ सैनिकों की पंक्ति ठोस हो, वहाँ उसे तोड़ देना हाथियों का ही काम है तथा जहाँ व्यूह टूटने से सैनिक पंक्ति में दरार पड़ गयी हो, वहाँ हाथियों के खड़े होने से छिद्र या दरार बन्द हो जाती है । शत्रुओं में भय उत्पन्न करना, शत्रु - दुर्ग के द्वार को माथे की टक्कर देकर तोड़ गिराना, खजाने को सेना के साथ ले चलना तथा किसी उपस्थित भय से सेना की रक्षा करना - ये सब हाथियों द्वारा सिद्ध होनेवाले कर्म हैं ॥२१-२४ ॥ संगठित शत्रु - सेना को छिन्न - भिन्न करना और मित्र - सेना को संगठित करना, रथसेना का काम है । अश्वारोही सेना का कर्त्तव्य है वनों, दिशाओं और मार्गों का पर्यवेक्षण, आवागमन के साधनों और रसद की रक्षा करना, ( भागती हुई सेना का ) पीछा करना, शीघ्रता के कार्यों का सम्पादन करना, दोनों का अनुसरण करना और श्रेणीबद्ध सेना का वध करना, सदा शस्त्र धारण करना, शिविर और मार्ग आदि को साफ करना, ( शत्रु को ) मारना ॥२५-२७ ॥ पदाति सेना के लिए वह भूमि उपयुक्त हुआ करती है, जिसमें बड़े - बड़े सूखे वृक्ष, वल्मीक, वृक्ष, झाड़ियाँ और काँटे न हों, जिसमें निकलने का मार्ग हो और जो अत्यन्त ऊँची - ऊँची न हो । अश्वारोही सेना के लिए वह भूमि उपयुक्त हुआ करती है, जिसमें थोड़े - थोड़े वृक्ष और पत्थर हों, जहाँ के पर्वतों को शीघ्रता से पार किया CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७४५ निस्थाणुवृक्षकेदारा रथभूमिरकर्दमा । निर्झरागम्यशैला च विषमागजमेदिनी । प्रतिग्रह इति ख्यातो राजकार्यान्तरक्षमः । जयार्थी न च युध्येत मतिमानप्रतिग्रहः । योधेभ्यस्तु ततो दद्यात्किंचिद्दातुं न युज्यते । सेनापतिव ' तद्वद्दद्याद्धस्त्यादिमर्दने । यथा भवेदाध व्यायामविनिवर्तने । महासंकुलयुद्धेषु संश्रयेरन्मतङ्गजम् । ` इति कल्प्यास्त्रयश्चाश्वा विधेयाः कुञ्जरस्य तु । विधानमिति नागस्य विहितं स्यन्दनस्य च । तथाऽनीकस्य रन्ध्रं तु पञ्चधा संप्रचक्षते । जा सके, जो स्थिर हो, रेतीली न हो, दलदली न हो मर्दनीयतरुच्छेद्यव्रततीपङ्कवर्जिता ॥३० ॥

उरस्यादीनि भिन्नानि प्रतिगृह्णन्बलानि हि ॥ ३१ ॥

तेन शून्यस्तु यो व्यूहः स भिन्न इव लक्ष्यते ॥ ३२ ॥

यत्र राजा तत्र कोषः कोषाधीना हि राजता ॥ ३३ ॥

द्रव्यलक्षं राजघाते तदर्थं तत्सुतार्दने ॥३४ ॥

अथ वा खलु युध्येरन्पत्त्यश्वरथदन्तिनः ॥ ३५ ॥

असंकरेण युध्येरन्संकरः संकुलावहः ॥३६ ॥

अश्वस्य प्रतियोद्धारो भवेयुः पुरुषास्त्रयः ॥३७ ॥

पादगोपा भवेयुश्च पुरुषा दशपञ्च च ॥ ३८ ॥

अनीकमिति विज्ञेयमिति कल्प्याः नवद्विपाः ॥३९ ॥

इत्यनीकविभागेन स्थापयेद्व्यूहसंपदः ॥४० ॥

और जहाँ निकलने का मार्ग न हो । रथसेना के लिए वह भूमि उपयुक्त हुआ करती है जिसमें ठूंठ वृक्ष और पर्वत न हो तथा जिसमें कीचड़ भी न हो । हस्तिसेना के लिए वह भूमि उपयुक्त मानी गयी है जिसमें ऐसे वृक्ष हों जो तोड़े जा सकें, लताएँ ऐसी हों, जिन्हें ( आसानी से ) तोड़ा जा सके, जहाँ कीचड़ न हों, जहाँ निर्झर हो, अगम्य पर्वत हों और जो ऊँची - नीची हो । सेना को उर ( वक्ष: स्थल ) आदि नामों में विभक्त कर देना चाहिए ॥२८-३१ ॥ इस प्रकार की सेना का विग्रह करना ही प्रतिग्रह कहलाता है । जो व्यूह इस ( प्रतिग्रह ) से शून्य होता है वह छिन्न - भिन्न दिखलायी पड़ता है । विजयाभिलाषी राजा यदि बुद्धिमान् हो तो उसे प्रतिग्रह के बिना युद्ध नहीं करना चाहिए । जहाँ राजा है वहाँ कोष है । कोष के अधीन ही प्रभुता मानी गयी है । ( युद्ध में विजय प्राप्त करने पर ) योद्धाओं को ( पुरस्कार ) देना चाहिए, किन्तु थोड़ा - बहुत देना उपयुक्त है । ( विरोधी ) राजा की मृत्यु पर एक लाख द्रव्य देना चाहिए, उसके पुत्र की मृत्यु पर इसका आधा ( पचास हजार ) द्रव्य देना चाहिए । सेनापति की मृत्यु पर उसका भी आधा ( पचीस हजार ) द्रव्य देना चाहिए और हाथी आदि की मृत्यु पर उसका भी आधा ( साढ़े बारह हजार ) द्रव्य पुरस्कार रूप में देना चाहिए॥३२-३४३ ॥ अथवा पदाति, अश्व, रथ और हस्तिसेना के साथ ( एक साथ ) युद्ध करना चाहिए, किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि ये सारी सेनाएँ परस्पर सम्बद्ध न हो जायँ । सेनाओं में बिना हलचल उत्पन्न किये हुए युद्ध करना चाहिए, क्योंकि हलचल भयावह हुआ करती है । जब युद्ध में हलचल मची हो तब हस्तिसेना का आश्रय लेना चाहिए । पैदल सेना के तीन योद्धा एक अश्वारोही योद्धा के प्रतिद्वन्द्वी हो सकते हैं ॥३५-३७ ॥ पदातिसेना के पन्द्रह योद्धाओं को हस्तिसेना के एक योद्धा की रक्षा के लिए नियुक्त करना चाहिए । हस्तिसेना के ऐसे - ऐसे नौ योद्धाओं के बराबर पदातिसेना के योद्धाओं को एक रथारोही योद्धा की रक्षा के लिए नियुक्त करना चाहिए । व्यूह बनाकर खड़ी हुई सेना के पाँच प्रकार के दोष कहे गये हैं । उसे इस प्रकार के व्यूहों में खड़ा करना चाहिए ॥३८-४० ॥ सेना के आवश्यक अङ्ग १ ख. द्याद्दुष्टादि । २ क. ' ति कृत्वा त्रय ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७४६ अग्निपुराणम् उरस्य कक्षपक्षांस्तु कल्प्यानेतान्प्रचक्षते । कोटी च व्यूहशास्त्रज्ञैः सप्ताङ्गो व्यूह उच्यते । गुरोरेष च शुक्रस्य कक्षाभ्यां परिवर्जितः । अभेदेन च युध्येरन्रक्षेयुश्च परस्परम् । युद्धं हि नायकप्राणं हन्यते तदनायकम् । हयांश्च पक्षयोर्व्यूहो मध्यभेदी प्रकीर्तितः । पक्षयोश्च गजानीकं व्यूहोऽन्तर्भेद्ययं स्मृतः । रथाभावे तु द्विरदान्व्यूहे सर्वत्र दापयेत् । मण्डलासंहतो ' भोगो दण्डस्ते बहुधा शृणु । मण्डलः सर्वतोवृत्तिः पृथग्वृत्तिरसंहतः । प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च श्येनो विजयसंजयौ । सर्पाक्ष्यो वलयश्चैव दण्डभेदाश्च ' दुर्जयाः उरः कक्षौ च पक्षौ च मध्यं पृष्ठं प्रतिग्रहः ॥४१ ॥

उरस्यकक्षपक्षास्तु व्यूहोऽयं सप्रतिग्रहः ॥४२ ॥

तिष्ठेयुः सेनापतयः प्रवीरैः पुरुषैर्वृताः ॥४३ ॥

युद्धमध्ये फल्गुसैन्यं युद्धवस्तु जघन्यतः ॥४४ ॥

उरसि स्थापयेन्नागान्प्रचण्डान्कक्षयोः रथान् ॥ ४५ ॥

मध्यदेशे हयानीकं रथानीकं च कक्षयोः ॥ ४६ ॥

रथस्थाने हयान्दद्यात्पदातींश्च हयाश्रये ॥४७ ॥

यदि स्याद्दण्डबाहुल्यमाबाधः संप्रकीर्तितः ॥४८ ॥

तिर्यग्वृत्तिस्तु दण्डः स्याद्भोगोऽन्या वृत्तिरेव च ॥ ४ ९ ॥ प्रदरो दृढकोऽसह्यश्चापो वै कुक्षिरेव च ॥५० ॥

विशालो विजयः सूची स्थूणाकर्णचमूमुख ॥ ५१ ॥

। अतिक्रान्तः प्रतिक्रान्तः कक्षाभ्यां चैकपक्षतः ॥ ५२ ॥

तीन हुआ करते हैं - उरस्, कक्ष और पक्ष । व्यूह शास्त्र के ज्ञाताओं के अनुसार व्यूह सात अङ्गोंवाला हुआ करता है । वे अङ्ग हैं - उर, कक्ष, पक्ष, मध्य, प्रतिग्रह और कोटि ( अग्रभाग ) । गुरुव्यूह उसे कहते हैं जिसमें उर, कक्ष, पक्ष और प्रतिग्रह ( अङ्ग ) हुआ करते हैं, किन्तु जिसमें कक्ष नहीं रहते हैं उसे शुक्र - व्यूह कहते हैं । विशिष्ट योद्धाओं से घिरे हुए सेनापतियों को ( सेना के आगे रहकर ) मिलकर युद्ध करना चाहिए और परस्पर एक - दूसरे की रक्षा करनी चाहिए । दुर्बल सेना को व्यूह के बीच में रखना चाहिए । युद्ध का प्राण है ( सेना का ) नायक । जिस सेना में कोई नायक नहीं रहता है, उसका वध कर दिया जाता है ॥४१-४४३ 1 ॥ उर नामक व्यूह में गजारोही सेना को खड़ा करना चाहिए और कक्ष में बलशालिनी रथसेना को खड़ा करना चाहिए तथा पक्ष भाग में अश्वारोही सेना को स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार के व्यूह को मध्यभेदी व्यूह कहते हैं । वह व्यूह अन्तर्भेदी व्यूह कहलाता है जिसमें अश्वसेना बीच में रहती है, रथसेना कक्षों में रहती है और हस्तिसेना पक्षों में रहा करती है । उस व्यूह को आबाध व्यूह कहते हैं जिसमें रथ के स्थान में अश्वारोही सेना को खड़ा किया जाता है और रथसेना के अभाव में सर्वत्र हस्तिसेना को खड़ा किया जाता है जिसमें दण्ड का बाहुल्य हुआ करता है ॥४५-४८ ॥ सेना को मण्डलाकार खड़ा करने को भोग - व्यूह कहते हैं । अब मैं तुमसे उन व्यूहों के विषय में कह रहा हूँ जो तिरछी रेखाओं में अथवा गोलाकार रेखाओं में खड़े किये जाते हैं, उनके विषय में सुनो । जहाँ पर सेना पूर्ण वृत्ताकार खड़ी होती है उसे मण्डल - व्यूह कहते हैं और जिसमें सेनाओं को अलग - अलग वृत्तों में खड़ा किया जाता है उसे असंहर्त व्यूह कहते हैं । सेनाओं को विभिन्न रूपों में खड़ा करने से दण्ड के अनेक भेद बन जाते हैं – प्रदर, दृढ़क, असह्य, चाप, कुक्षि, प्रतिष्ठ, सुप्रतिष्ठ, श्येन, विजय, सञ्जय, विशाल, वज्र, सूची, स्थाणुकर्ण, चमूमुख, सर्पाक्ष्य और वलय । ये सब भेद दुर्जय माने जाते हैं और ये एक पक्ष से कक्षों को सम्मिलित १ क. ' हतौ भो । २ ख. ग. प्रवरो । ३ क. ख. ग. च. ' तिष्ठश्चाप्र ' । ४ ख. ' श्चतुर्दश । अ ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA