अग्नि पुराण — पृष्ठ 751–760

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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द्वाचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७४७ अतिक्रान्तस्तु पक्षाभ्यां त्रयोऽन्ये तद्विपर्यये । स्थूणापक्षो धनुष्पक्षो द्विस्थूणो दण्ड ऊर्ध्वगः । द्विचतुर्दण्ड इत्येते ज्ञेयः लक्षणतः क्रमात् । भोगभेदाः समाख्यातास्तथा पारिप्लवङ्गकः । मकरो व्यतिकीर्णश्च शेषः कुञ्जरराजिभिः । अष्टानीको द्वितीयस्तु प्रथमः सर्वतोमुखः । तथा कर्कटशृङ्गी च काकपादी च गोधिका । दण्डस्य स्युः सप्तदश व्यूहा द्वौ मण्डलस्य च पक्षादीनामथैकेन हत्वा शेषैः परिक्षिपेत् परे कोटी समाक्रम्य पक्षाभ्यामप्रतिग्रहात् यतः फल्गु यतो भिन्नं यतश्चान्यैरधिष्ठितम् । सारं द्विगुणसारेण फल्गुसारेण कल्पयेत् ' पक्षोरस्यैरतिक्रान्तः प्रतिष्ठोऽन्यो विपर्ययः ॥ ५३ ॥

द्विगुणोऽन्तस्त्वतिक्रान्तपक्षोऽन्यस्य विपर्ययः ॥५४ ॥

गोमूत्रिकाहि सञ्चारी शकटो मकरस्तथा ॥५५ ॥

दण्डपक्षौ युगोरस्यः शकटस्तद्विपर्यये ॥५६ ॥

मण्डलव्यूहभेदौ तु सर्वतोभद्रदुर्जयौ ॥५७ ॥

अर्धचन्द्रक ऊर्ध्वाङ्गो वज्रभेदास्तु संहतेः ॥ ५८ ॥

त्रिचतुष्पञ्चसैन्यानां ज्ञेया आकारभेदतः ॥५९ ॥

। असंघातस्य षट्पञ्च भोगस्यैव तु संगरे ॥ ६० ॥

। उरसा वा समाहृत्य कोटिभ्यां परिवेष्टयेत् ॥६१ ॥

। कोटिभ्यां जघनं हव्यादुरसा च प्रपीडयेत् ॥ ६२ ॥

ततश्चारिबलं हन्यादात्मनश्चोपबृंहयेत् ॥६३ ॥

। संहतं च गजानीकैः प्रचण्डैर्दारयेद्बलम् ॥६४ ॥

करने या वहाँ से हटाने से बनते हैं । उपर्युक्त व्यूह में दो कक्षों को जोड़ देने से और ही व्यूह बन जाता है । उरस् में एक पक्ष और उरस् को जोड़ देने से प्रतिष्ठ नामक व्यूह बन जाता है ॥४९ -५३ ॥ स्थूणपक्ष और धनुष्पक्ष नामक व्यूह दो - चार पङ्क्तियों में खड़े हुए योद्धाओं के व्यूहों का ही परिवर्तित रूप है । इन्हें अपने - अपने लक्षणों से ही पहचाना जा सकता है । गोमूत्रिका, अहिसञ्चारी, शकट, मकर, परिप्लवङ्गक- ये सब भोग नामक व्यूह के ही भेद कहे गये हैं । दण्ड के रूप में दो कक्षवर्तिनी सेनाओं को खड़ा करने से युगोरस्य और इसकी विपरीत स्थिति में शकट नामक व्यूह बनता है । मकर नामक व्यूह में हस्तिसेना के योद्धाओं की पङ्क्तियों को बढ़ा देने से शेष नामक व्यूह बन जाता है । सर्वतोभद्र और दुर्जय नामक व्यूह मण्डलव्यूह के ही परिवर्तित रूप हैं ॥५४ - ५७ ॥ इनमें से पहला व्यूह सब ओर से खुला रहता है और दूसरा आठ सैन्यदलों का बना होता है । वज्र वर्ग के व्यूह के विभिन्न अङ्गों के संयोग से अर्धचन्द्रक और ऊर्ध्वङ्ग नामक व्यूह बनते हैं । तीन, चार और पाँच योद्धाओं को विभिन्न स्थितियों में खड़ा रहने से क्रमशः कर्कट, शृङ्ग, काकपादी और गोधिका नामक व्यूहों का निर्माण होता है । संग्रामदण्ड के सत्रह प्रकार के, मण्डल के दो प्रकार के, असंघात के छह प्रकार के और भोग के पाँच प्रकार के व्यूह हुआ करते हैं ॥५८-६० ॥ ( सेनापति को ) पक्ष की ओर से आक्रमण करना चाहिए । अन्य भागों से ( शत्रु - सेना को ) छिन्न-भिन्न कर देना चाहिए । अथवा उसे उरस् नामक सेना के अंग से प्रतिपक्षी सेना के साथ युद्ध करना चाहिए और कोटि नामक अङ्ग से उसे घेर लेना चाहिए । तत्पश्चात् पक्ष नामक अङ्गों से ( शत्रु - सेना के ) कोटि भाग के ऊपर आक्रमण करना चाहिए । कोटिभागों से ( शत्रु - सेना के ) जघन नामक अङ्ग के ऊपर आक्रमण करना चाहिए । जब शत्रु-सेना थोड़ी हो, अलग - अलग हो और शत्रुओं से घिरी हुई हो तब उसके ऊपर आक्रमण करना चाहिए और अपनी सेना को बढ़ाते रहना चाहिए ॥६१-६३ ॥ शत्रु - सेना के मुख्य अङ्ग पर उसके दुगुने सैन्य दल से आक्रमण १ क. शेषं कुञ्जरवाजि । २ ख. ग. घ. पीडयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 752

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७४८ अग्निपुराणम् स्यात्कक्षपक्षोरस्यैश्च वर्तमानस्तु दण्डकः । स्याद्दण्डसमपक्षाभ्यामतिक्रान्तः प्रदारकः । कक्षाभ्यां च प्रतिक्रान्तव्यूहोऽसह्यः स्मृतो यथा ' । द्वौ दण्डौ वलयः प्रोक्तो व्यूहो रिपुविदारणः । कक्षपक्षोरस्यैर्भोगो विषमं परिवर्जयेत् । विषर्ययोऽमरः प्रोक्तः १शर्वशत्रुविमर्दकः । चक्रपद्मादयो भेदा मण्डलस्व प्रभेदकाः ।

अर्धन्द्रश्च शृङ्गारी ह्यचलो नामरूपतः ।

तत्रप्रयोगो दण्डस्य स्थानं तुर्येव दर्शयेत् ॥६५ ॥

भवेत्स पक्षकक्षाभ्यामतिक्रान्तो दृढः स्मृतः ॥ ६६ ॥

कक्षपक्षावधः स्थाप्योरस्यैः क्रान्तश्च खातकः ५ ॥६७ ॥

दुर्जयश्चतुर्वलयः शत्रोर्बलविमर्दनः ७ ॥६८ ॥

" सर्पचारी गोमूत्रिका शकटः शकटाकृतिः ११ ॥६९ ॥

स्यात्कक्षपक्षोरस्यानामेकी भावस्तु मण्डलः ३ ॥७० ॥

एवं च सर्वतोभद्रो वज्राक्षवरकाकवत् ॥७१ ॥

व्यूहा यथासुखं कार्याः शत्रूणां बलवारणाः ॥७२ ॥

अग्निरुवाच रामस्तु रावणं हत्वा ह्ययोध्यां प्राप्तवान्द्विज । रामोक्तनीत्येन्द्रजितं हतवाँल्लक्ष्मणः पुरा ॥ ७३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये राजनीतिकथनं नाम द्वाचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४२ ॥

करना चाहिए अथवा अपनी सेना के सुरक्षित भाग से आक्रमण करना चाहिए । यदि सेना के कक्ष, पक्ष और उर नामक भाग सामने खड़े हों तो अपनी सेना को दण्डक के रूप में खड़ा कर देना चाहिए । दण्ड रूप में खड़ी हुई सेना में पक्ष और कक्ष नामक अङ्गों को सम्मिलित कर देने से प्रदर नामक ( सैन्य ) अङ्ग बन जाता है, जिसका सामना करने के लिए दृढ़ व्यूह का निर्माण करना चाहिए ॥६४-६६ ॥ असह्य व्यूह में खड़ी हुई सेना का सामना खातक व्यूह से करना चाहिए । शत्रु - सेना के दो दण्डों से वलय नामक व्यूह का निर्माण होता है जो शत्रु को विदीर्ण करनेवाला हुआ करता है और शत्रु - सेना का भेदन करनेवाली चार दण्डों से बनी हुई सेना को दुर्जय ( व्यूह ) कहते हैं । भोग नामक सैन्य - -दल द उर, पक्ष और कक्ष की स्थिति में परिवर्तन कर देने से क्रमश: सर्पचारी, गोमूत्रिका और शकट की आकार का शकट - व्यूह हुआ करता है । ( शकट का ) विपरीत ( व्यूह ) अमरव्यूह कहलाता है जो सभी शत्रुओं का मर्दन करनेवाला हुआ करता है । मण्डल व्यूह में कक्ष, पक्ष और उर आदि में योद्धाओं की स्थिति समान रहती है ॥६७-७० ॥ चक्र और पद्म आदि भेद मण्डल ( व्यूह ) के ही हैं । इसी प्रकार सर्वतोभद्र, अर्धचन्द्र, शृङ्गार और अचल मण्डल के ही विभिन्न रूप हैं, जो शत्रु - सेना का सामना करने के लिए सुविधानुसार बना लिये जाते हैं ॥७१-७२ ॥ अग्निदेव बोले - हे ब्राह्मण देव! ( इसी नीति के अनुसार ) राम ने रावण को मारकर अयोध्या को पुनः प्राप्त किया और राम के द्वारा बतायी गयी नीति के अनुसार ही प्राचीन काल में लक्ष्मण ने ( भी ) इन्द्रजित् ( मेघनाद ) का वध किया था || ७३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में राजनीति कथन नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४२ ॥

द्वौ । ६ क १ क . ङ.. दृश्यते । स्या ं । २ क. ङ. ' कः । भ ° । ३ क. ङ. ' तो हरः स्मृतः । क ' । ४ क. ङ. ' था । क ' । ५ क. ङ. खादकः । “ ण । दु ” । ७ क. ङ. नः । क ' । ८ घ. ' षयं परिवर्तयन् । स । ९ क. ङ. ' त् । स । १० क. ङ. सर्वचारी । ११ क. ङ. “ तिः । वि । १२ क. ङ. ° र्दनः । स्या । १३ क डल्लः ) चु rbundation USA CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by

पृष्ठ 753

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त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७४ ९ अथ त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पुरुषलक्षणम् अग्निरुवाच ' रामोक्तोक्ता मया नीतिः स्त्रीणां राजन्नृणां वदे । लक्षणं यत्समुद्रेण गर्गायोक्तं यथा पुरा ॥ १ ॥

समुद्र उवाच पुंसां च लक्षणं वक्ष्ये स्त्रीणां चैव शुभाशुभम् । एकाधिको द्विशुक्लश्च त्रिगम्भीरस्तथैव च ॥२ ॥

त्रित्रिकस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिभिर्व्याप्नोति यस्तथा । त्रिबलीमांस्त्रिवनतस्त्रिकालज्ञश्च सुव्रत || ३ || पुरुषः स्यात्सुलक्षण्यो विपुलश्च तथा त्रिषु । चतुर्लेखस्तथा यश्च तथैव च चतुः समः ॥४ ॥

' चतुष्किष्कुश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुष्कृष्णस्तथैव च । चतुर्गन्धश्चतुर्हस्तः सूक्ष्मदीर्घश्च पञ्चसु ॥५ ॥

षडुन्नीतोष्टवंशश्च सप्तस्नेहो नवामलः । दशपद्मो दशव्यूहो न्यग्रोधपरिमण्डलः ॥६ ॥

चतुर्दशसमद्वन्द्वः षोडशाक्षश्च शस्यते । धर्मार्थकामसंयुक्तो धर्मो ह्येकाधिको मतः ॥७ ॥

अध्याय २४३ पुरुषलक्षण अग्निदेव बोले - हे राजन्! मैंने राम के द्वारा बतलायी गयी नीति को तो कह दिया है, अब मैं स्त्री - पुरुषों के उन लक्षणों को बतलाऊँगा, जिन्हें प्राचीन काल में समुद्र ने गर्ग से कहा था ॥१ ॥

समुद्र बोला - ( अब मैं ) स्त्री - पुरुषों के शुभाशुभ लक्षणों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । अये सुव्रत! वह पुरुष सुलक्षण हुआ करता है जो एकाधिक, द्विशुक्ल, त्रिगम्भीर, त्रित्रिक, त्रिप्रलम्ब, त्रिवनत, त्रिवलीवान् और त्रिकालज्ञ हो ॥२-३ ॥ इसी प्रकार जिसके शरीर के चार अङ्गों के ऊपर चार लेखाएँ हों, शरीर के चार अङ्ग विस्तृत और दीर्घ हों, ऊँचाई उपयुक्त हो, आगे के चार दाँत अच्छे हों, जिसके शरीर के चार अङ्ग श्यामवर्ण हों, जिसके शरीर के चार अङ्गों से सुगन्धि आया करती हो, जिसके चार अंग छोटे हों, पाँच अङ्ग लम्बे और पतले हों, छह अङ्ग उठे हुए हों, आठ अङ्गों की अस्थियाँ मजबूत और सीधी हों, जिसके शरीर के सात अङ्ग चिकने हों, नौ अङ्ग निर्मल हों, दस अङ्ग कमल के वर्ण के हों, दस अङ्ग विकाररहित और सुडौल हों, जिसके अङ्ग न्यग्रोधपरिमण्डल के समान हों, शरीर के चौदह अङ्ग युग्म के समान हों अथवा जिसके सोलह नेत्र हों ( चौदह ज्ञानचक्षु, दो कर्मचक्षु ), वह मनुष्य अपने जीवन में बड़े - बड़े कार्य कर सकता है । धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों का पालन करते हुए अपने कर्त्तव्य १ छ. रामायोक्ता । २ क. ' र्दष्ट्रः शुक्लः कृष्ण । ३ ग. महाबलः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 754

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७५० अग्निपुराणम् तारकाभ्यां विना नेत्रे शुक्लदन्ती द्विशुक्लकः । अनसूया दया क्षान्तिर्मङ्गलाचार युक्तता । त्रित्रिकस्त्रिप्रलम्बः स्याद् वृषणे भुजयोर्नरः । व्याप्नोति यस्त्रिकव्यापी त्रिवलीमान्नरस्त्वसौ । देवतानां द्विजानां च गुरूणां प्रणतस्तु यः । उरो ललाटं वक्त्रं च त्रिविस्तीर्णो विलेखवान् । अङ्गुल्यो हृदयं पृष्ठं कटिः शस्तं चतुःसमम् दंष्ट्राश्चतस्रश्चन्द्राभाश्चतुष्कृष्णं वदामि ते नासायां वदने स्वेदे कक्षयोर्वेदगन्धकः ' सूक्ष्माण्यङ्गुलिपर्वाणि नखकेशद्विजत्वचः वक्षः कक्षौ नखा नासोन्नतं वक्त्रं कृकाटिका जान्वोरूर्वोश्च पृष्ठस्थवंशौ द्वौ करनासयोः गम्भीरस्त्रिश्रवोनाभिः सत्त्वं चैकं त्रिकं स्मृतम् ॥८ ॥

शौचंस्पृहात्वकार्पण्यमनायासश्च शौर्य ( शूर ) ता ॥१ ॥

दिग्देशजातिवर्गाश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥१० ॥

उदरे वलयस्तिस्त्रो नरं त्रिविनतं शृणु ॥ ११ ॥

धर्मार्थकामकालज्ञस्त्रिकालज्ञोऽभिधीयते ॥१२ ॥

द्वौ पाणी द्वौ तथा पादौ ध्वजच्छत्रादिभिर्युतौ ॥१३ ॥

। षण्णवत्यङ्गुलोत्सेधश्चतुष्किष्कुप्रमाणतः ॥१४ ॥

। नेत्रतारौ भ्रुवौ श्मश्रुः कृष्णाः केशास्तथैव च ॥ १५ ॥

। ह्रस्वं लिङ्गं तथा ग्रीवा जङ्घे स्याद्वेदह्रस्वकः ॥१६ ॥

। हनू नेत्रे ललाटे च नासा दीर्घा स्तनान्तरम् ॥१७ ॥

। स्निग्धास्त्वक्केशदन्ताश्च लोमदृष्टिर्नखाश्च वाक् ॥१८ ॥

। नेत्रे नासापुटौ कर्णौ मेढूं पायुमुखेऽमलम् ॥१९ ॥

का पालन करना एकाधिक कहलाता है । द्विशुक्ल उसे कहते हैं जिसके दाँत और कनीनिकाएँ शुक्ल हों । धैर्य, कान और नाभि की गम्भीरता ही त्रिगम्भीरत्व है ॥४-८ ॥ नौ गुणों का होना ही ' त्रित्रिक ' कहलाता है । वे गुण हैं- अनसूया, दया, क्षमा, मङ्गलाचार, शुचिता, स्पृहा, अकार्पण्य, अनायासता और शूरता । त्रिलम्ब का अभिप्राय है हाथों, अण्डकोषों और शरीर के नीचेवाले भागों का लम्बा होना । जो व्यक्ति अपने तेज, यश और ऐश्वर्य से सभी दिशाओं को, अपने देश को और अपनी जाति को प्रभावित कर लेता है, उसे त्रिव्यापी कहते हैं । जिसके उदर में तीन रेखाएँ पड़ी हुई होती हैं, उसे त्रिवलीमान् कहते हैं । त्रिविनत उसे कहते हैं जो देवताओं, ब्राह्मणों और गुरुजनों के प्रति विनम्र रहता है । धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों की प्राप्ति के अवसर के ज्ञाता पुरुष को त्रिकालज्ञ कहते हैं ॥९ -१२ ॥ त्रिविस्तीर्ण उसे कहते हैं जिसका वक्ष: स्थल, मस्तक और मुख विस्तृत ( विशाल ) होता है । जिस व्यक्ति के दोनों हाथ और दोनों पैर ध्वज और छत्रादि चिह्नों से युक्त होते हैं, उसे चतुर्लेख कहते हैं । अङ्गुलियों, हृदय, पीठ और कटि का चौड़ा होना शुभ माना गया है । ( पुरुष की ) छियानबे अङ्गुलि की लम्बाई मानी गयी है । आगे के चार दाँतों का मोती के समान उज्ज्वल होना चतुर्दंष्ट्र कहलाता है । अब मैं तुम्हें चतुष्कृष्ण बतला रहा हूँ । कनीनिकाओं, भौंहों, दाढ़ी और केशों का काला होना चतुष्कृष्ण कहलाता है ॥ १३-१५ ॥ नासिका, मुख और बगल से दुर्गन्ध न आना चतुर्गन्ध कहलाता है । लिङ्ग, ग्रीवा और दोनों जंघाओं का छोटा होना चतुर्हस्व कहलाता है । लम्बे और पतले अङ्गुलियों की पोरें, नाखून, केश, दाँत और पतली त्वचा ( भाग्यशाली पुरुष के लक्षण होते हैं ), उठी हुई कनपटियाँ, हनु ( जबड़ा ), नासिका और स्तनों के बीच का स्थान षडोन्नत कहलाता है । सप्तस्निग्ध उस व्यक्ति को कहते हैं जिसकी त्वचा, केश, शरीर के रोयें, नाखून, दृष्टि और वाणी स्निग्ध हुआ करती है । अष्टवंश का अभिप्राय है नासिका, रीढ़ की हड्डी, ( दोनों ) जङ्घाओं और दोनों घुटने का सीधा होना । मुख, ( दोनों ) नासपुट, दोनों ( पपोटों ), मुख, १ छ. “ योर्विडग ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 755

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चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७५१ जिह्वौष्ठौ तालुनेत्रे तु हस्तपादौ नखास्तथा । शिश्नाग्रवक्त्रं शस्यन्ते पद्माभा दश देहिनाम् ॥२० ॥

पाणिपादं मुखं ग्रीवा श्रवणे हृदयं शिरः । ललाटमुदरं पृष्ठं बृहन्तः पूजिता दश ॥ २१ ॥

प्रसारितभुजस्येह मध्यमाग्रद्वयान्तरम् । उच्छ्रायेण समं यस्य न्यग्रोधपरिमण्डलः ॥२२ ॥

पादौ गुल्फौ स्फिचौ पार्श्वो वङ्क्षणौ वृषणौ कुचौ । कर्कोष्ठे ( ष्ठौ ) सक्थिनी जङ्घे हस्तौ बाहू तथाऽक्षिणी ॥२३ ॥

चतुर्दश समद्वन्द्व एतत्सामान्यतो नरः । विद्याश्चतुर्दश द्व्यक्षैः पश्येद्यः षोडशाक्षकः ॥२४ ॥

रुक्षं शिराततं गात्रमशुभं मांसवर्जितम् । दुर्गन्धिविपरीतं यच्छस्तं दृष्ट्या प्रसन्नया ॥ २५ ॥

धन्यस्य मधुरा वाणी गतिर्मत्तेभसंनिभा । एककूपभवं रोम भये रक्षा सकृत्सकृत् ॥२६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये पुरुषलक्षणकथनं नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२४३ ॥

अथ चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः स्त्रीलक्षणम् समुद्र उवाच शस्ता स्त्री चारुसर्वाङ्गी मत्तमातङ्गगामिनी । गुरूरुजघना या च मत्तपारावतेक्षणा ॥१ ॥

दोनों ( गुप्ताङ्ग ) और दोनों कर्णकुहरों की स्वच्छता है नवामल । दशपद्म का अभिप्राय है - जिह्वा, तालु, नेत्र ( के डोरों ), गदेलियों, चरणों, नाखूनों, लिङ्गमणि और मुख का कमल के समान रक्तवर्ण होना ॥१६-२० ॥ जिस व्यक्ति का मुख, ग्रीवा, कान, वक्ष: स्थल, सिर, उदर, मस्तक, हाथ और पैर विकाररहित और सुडौल हआ करता है वह सम्पूर्ण संसार में सम्मानित होता है । दोनों हाथों को फैलाकर खड़े होने पर जिसके दोनों हाथों की लम्बाई और शरीर की लम्बाई बराबर होती है, उसे न्यग्रोध- परिमण्डल कहते हैं । चतुर्दश समद्वन्द्व का अभिप्राय है पैरों, टखनों, नितम्बों, पाव, उरुसन्धियों, अण्डकोषों, स्तनों, कानों, ओंठों और जङ्घाओं का समान होना । षोडशाक्ष का अभिप्राय है चौदह विद्याओं से उत्पन्न ( ज्ञान की ) दृष्टि तथा दो स्थूल नेत्र ॥२१-२४ ॥ जिस व्यक्ति का मुख रुक्ष, मांसहीन, दुर्गन्धयुक्त और उभरी हुई नसों से युक्त होता है वह अभागा माना जाता है । भाग्यवान् मनुष्य की वाणी मधुर और गति हाथी के समान होती है । मनुष्य के शरीर में एक ही छिद्र से उत्पन्न होनेवाले दो रोयें ऐसे भय को सूचित करनेवाले होते हैं जिसका प्रतिकार किसी प्रकार नहीं हो सकता है ॥ २५-२६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पुरुष लक्षण कथन नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४३ ॥

अध्याय २४४ स्त्रीलक्षण समुद्र बोला- -वह स्त्री अच्छी मानी जाती है, जो सर्वसुन्दरी हो, जिसकी गति मत्त गजराज के समान हो और CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 756

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७५२ अग्निपुराणम् सुनीलकेशी तन्वङ्गी विलोमाङ्गी मनोहरा । समभूमिस्पृशौ पादौ संहतौ च तथा स्तनौ || २ || नाभिः प्रदक्षिणावर्ता गुह्यमश्वत्थपत्रवत् । गुल्फौ निगूढौ मध्येन नाभिरङ्गुष्ठमानिका || ३ ||

जठरं च प्रलम्बं च रोमरूक्षा न शोभना । नर्क्षवृक्षनदीनाम्नी न सदा कलहप्रिया ॥४ ॥

न लोलुपा न दुर्भाषा शुभा देवादिपूजिता । गण्डैर्मधूकपुष्पाभैर्न शिराला न लोमशा ॥५ ॥

न संहतभ्रुकुटिला पतिप्राणा पतिप्रिया । अलक्षणाऽपि लक्षण्या यत्राऽऽकारस्ततो गुणाः ॥ भुवं कनिष्ठिका यस्या न स्पृशेन्मृत्युरेव सा ॥६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्त्रीलक्षणकथनं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४४ ॥

अथ पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः चामरादिलक्षणम् अग्निरुवाच चामरो रुक्मदण्डोऽग्न्यश्छत्रं राज्ञः प्रशस्यते । हंसपक्षैर्विरचितं मयूरस्य शुकस्य च ॥ १ ॥

जिसकी दृष्टि मत्त कबूतर के समान हो । उसके केश अत्यन्त काले, शरीर दुबला और रोमरहित हो । उसे सुन्दर होना चाहिए और उसके दोनों पैरों को समान रूप से पृथ्वी का स्पर्श करना चाहिए । तथा उसके दोनों स्तनों को गठा हुआ होना चाहिए । नाभि को दक्षिण की ओर से भँवर के समान और गुप्ताङ्ग को पीपल के पत्ते के समान होना चाहिए । एड़ियों को बीच से झुका हुआ होना चाहिए । नाभि को अंगुष्ठप्रमाण होना चाहिए । रुक्ष रोमावलिवाली स्त्री सुन्दर नहीं हुआ करती है । उसका नाम नक्षत्र, वृक्ष और नदी के नाम पर नहीं होना चाहिए और न उसे झगड़ालू होना चाहिए । उसे न तो लालची होना चाहिए और न कटु बोलनेवाली । उसे सुन्दरी तथा देवता आदि की पूजा करनेवाली होना चाहिए । कपोल महुए के पुष्पों के समान होना चाहिए । उसके ( शरीर ) में न तो शिराएँ उभरी हुई हों और न रोम हों । भृकुटियों को आपस में मिली नहीं होनी चाहिए । वह पति को प्राणों के समान माननेवाली और पति की प्रिय हो । इस प्रकार की स्त्री ( अन्य शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी सुलक्षणा होती है । जहाँ आकार है वहीं गुण होते हैं । जिस स्त्री ( के पैर ) की छोटी उँगली भूमि का स्पर्श करती है, वह मृत्यु ( रूप ) ही हुआ करती है ॥१-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्त्रीलक्षण - कथन नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४४ ॥

अध्याय २४५ चामरादिलक्षण अग्निदेव बोले - राजा के लिए सोने के दण्ड से युक्त चामर उत्तम होता है । वह हंस, मयूर, शुक तथा बगुली CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 757

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पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पक्षैर्वाऽथ बलाकाया न कार्यं मिश्रपक्षकैः त्रिचतुष्पञ्चषट्सप्त अ ( का ) ष्टपर्वश्च दण्डकः विस्तारेण त्रिहस्तं स्यात्सुवर्णाद्यैश्च चित्रितम् ज्याद्रव्यत्रितयं चैव वंशभङ्गत्वचस्तथा तदेव समहीनं तु प्रोक्तं मध्यकनीयसि स्वल्पकोटिस्त्वचाशृङ्गं शार्ङ्गलोहमये द्विज पृथग्वा विप्र मिश्रं वा लौहं शार्ङ्गं तु कारयेत् । कुटिलं स्फुटितं चापं सच्छिद्रं च न शस्यते । माहिषं शारभं शार्ङ्गं रौहिषं वा धनुः शुभम् । सर्वश्रेष्ठं धनुर्वंशैर्गृहीतैः शरदि श्रितैः । अयसश्चाथ वंशस्य शरस्याप्यशरस्य च । रुक्मपुङ्खाः सुपुङ्खास्ते तैलधौताः सुवर्णकाः । ७५३ । चतुरस्त्रं ब्राह्मणस्य वृत्तं राज्ञश्च शुक्लकम् ॥२ ॥

। भद्रासनं क्षीरवृक्षैः पञ्चाशदङ्गुलोच्छ्रयैः ॥३ ॥

। धनुर्द्रव्यत्रयं लोहं शृङ्गं दारु द्विजोत्तम ॥४ ॥

। दारुचापप्रमाणं तु श्रेष्ठं हस्तचतुष्टयम् ॥५ ॥

। मुष्टिग्राहनिमित्तानि मध्ये द्रव्याणि कारयेत् ॥६ ॥

। कामिनीभ्रूलताकारा कोटिः कार्या सुसंयता ॥७ ॥

शार्ङ्ग समुचितं कार्यं रुक्मविन्दुविभूषितम् ॥८ ॥

सुवर्णं रजतं ताम्रं कृष्णायो धनुषि स्मृतम् ॥९ ॥

चान्दनं वैतसं सालं धावलं काकुभं तथा ॥१० ॥

पूजयेत्तु धनुः खड्गं मन्त्रैस्त्रैलोक्यमोहनैः ॥११ ॥

ऋजवो हेमवर्णाभाः स्नायुश्लिष्टाः सुपत्रकाः ॥१२ ॥

यात्रायामभिषेकादौ यजेद्बाणधनुर्मुखान् ॥१३ ॥

के पंखों से बना हुआ रहता है । किन्तु उसे ( कई पक्षियों के ) मिले - जुले पंखों का नहीं बना होना चाहिए । ब्राह्मण का छत्र चौकोर तथा राजा का गोलाकार और श्वेत होना चाहिए ॥ १-२ ॥ उसके दण्ड में तीन, चार, पाँच, छह, सात या आठ पर्व होने चाहिए । भद्रासन ( राजा का आसन ) गूलर की लकड़ी का बना होना चाहिए, जिसकी लम्बाई पचास अङ्गुल और चौड़ाई तीन हाथ की होती है उसे सुवर्ण आदि से मढ़ा होना चाहिए । अये द्विजवर! धनुष तीन द्रव्यों - लोहा, सींग, लकड़ी का बना हुआ होता है ॥ ३-४ ॥ प्रत्यञ्चा भी तीन चीजों की बनी हुई होती है - बाँस का टुकड़ा, छिलका और डोरी । लकड़ी के धनुष की लम्बाई चार हाथों की उत्तम मानी गयी है । वही तीन हाथों का मध्यम और दो हाथों का अधम होता है । मध्य में जहाँ मुट्ठी से पकड़ते हैं, वहाँ उसे अन्य द्रव्यों से मढ़ देना चाहिए । अये द्विज! सींग तथा लोहे के बने धनुष का अग्रभाग छोटा होना चाहिए । उसकी आकृति सुडौल तथा कामिनी की भ्रूलता के समान होनी चाहिए ॥५-७ ॥ धनुष लोहे तथा सींग को मिलाकर अथवा पृथक् बनाना चाहिए । सींग से बने हुए धनुष को सोने के विन्दुओं से विभूषित होना चाहिए । टेढ़ा - मेढ़ा, टूटा हुआ तथा छिद्रवाला धनुष अच्छा नहीं हुआ करता । धनुष के लिए सोने, चाँदी, ताँबे तथा काले लोहे का व्यवहार करना चाहिए । महिष, शरभ तथा रोहिष के सींग का बना धनुष अच्छा माना जाता है । चन्दन, बेंत, साखू, अर्जुन तथा धवल वृक्ष का भी धनुष उत्तम होता है । सबसे उत्तम धनुष तो वह होता है, जो शरद् ऋतु में उत्पन्न होनेवाले बाँसों का बनाया जाता है । धनुष तथा खड्ग की पूजा त्रैलोक्यमोहन मन्त्रों से करनी चाहिए ॥८-११ ॥ बाण लोहे या ऐसे बाँस का बनाना चाहिए जो सीधा तथा स्नायुबद्ध हो, तेल में भिगोया गया हो, जिसका वर्ण सुवर्ण के समान हो, पत्र मनोहर हो और पुङ्ख ( बाणमूल ) सोने का हो । उनका मूल नुकीला होना चाहिए तथा उन्हें तेल में घुला हुआ और सुन्दर वर्णवाला होना चाहिए । ( राजा को ) यात्रा तथा अभिषेक आदि के समय धनुष, बाण, पताका और अस्त्र - शस्त्रों का पूजन करना चाहिए । ( प्राचीन १ छ. तरुः । ४८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अग्निपुराणम् ७५४ । सपताकास्त्रसंग्राहसंवत्सरकरान्नृपः लोहदैत्यं स ददृशे विघ्नं यज्ञे तु चिन्तयन् । ववन्देऽजं च तं देवा अभ्यनन्दन्त हर्षिताः । तं जग्राह ' गले देवो विकोषः सोऽभ्यपद्यत 1 । दैत्यः स गदया देवान्द्रावयामास वै रणे । पतितानि तु संस्पर्शान्नन्दकस्य च तानि हि । ददौ पवित्रमङ्गं ते आयुधाय भवेद्भुवि । पूजयामास यज्ञेन वक्ष्येऽथो खड्गलक्षणम् कायच्छिदस्त्वार्षिकाः स्युर्दृढाः सूर्पारकोद्भवाः शतार्धमङ्गुलानां च श्रेष्ठं खड्गं प्रकीर्तितम् दीर्घः सुमधुरः शब्दो यस्य खड्गस्य सत्तम खड्गः पद्मपलाशाग्रो मण्डलाग्रश्च शस्यते ब्रह्मा वै मेरुशिखरे स्वर्गगङ्गातटेऽयजत् ॥ १४ ॥

तस्य चिन्तयतो वह्नेः पुरुषोऽभूद्बली महान् ॥१५ ॥

तस्मात्स नन्दकः खड्गो देवोक्तो हरिरग्रहीत् ॥ १६ ॥

खड्गो नीलो रत्नमुष्टिस्ततोऽभूच्छतबाहुकः ॥१७ ॥

विष्णुना खड्‌गच्छिन्नानि दैत्यगात्राणि भूतले ॥ १८ ॥

लोहभूतानि सर्वाणि हत्वा तस्मै हरिर्वरम् ॥ १ ९ ॥ हरिप्रसादाद्ब्रह्माऽपि विना विघ्नं हरिं प्रभुम् ॥ २० ॥

। खटीखट्टरजाता ये दर्शनीयास्तु ते स्मृताः ॥ २१ ॥

। तीक्ष्णाश्छेदसहा वङ्गास्तीक्ष्णाः स्युश्चाङ्गदेशजाः ॥२२ ॥

। तदर्थं मध्यमं ज्ञेयं ततो हीनं न धारयेत् ॥ २३ ॥

। किङ्किणीसदृशस्तस्य धारणं श्रेष्ठमुच्यते ॥२४ ॥

। करवीरदलाग्राभो घृतगन्धः वियत्प्रभः ॥ २५ ॥

काल में ) ब्रह्मा ने सुमेरु पर्वत के शिखर पर स्वर्गगङ्गा के तट पर धनुष आदि की पूजा की थी ॥ १२-१४ ॥ उस समय उनको एक ऐसा लोहे का दैत्य दिखलायी पड़ा जिससे वे घबड़ा उठे । उन्होंने सोचा कि यह कोई यज्ञ में विघ्न डालने के लिए आया है । इतने में अग्नि से एक महाबली पुरुष उत्पन्न हो गया । देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम किया और वे आनन्दित हो गये । भगवान् विष्णु ने देवताओं के कहने से नन्दक नामक उस खड्ग को उससे ले लिया । भगवान् ने उस म्यान से रहित खड्ग को मूठ से पकड़ लिया । वह खड्ग नीला था और उसकी मूठ सोने की थी । दैत्य ने ( भी ) अपने - आपको सौ भुजाओं से युक्त कर लिया । उस दैत्य ने रण में गदा से देवताओं को भगा दिया । विष्णु ने दैत्य के अङ्गों को खड्ग से काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१५-१८ ॥ नन्दक ( नामक खड्ग ) के स्पर्श से वे सभी ( कटे हुए शरीरावयव ) लौह के बन गये । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु ने दैत्य को मारकर यह वर दे दिया कि ‘ तुम्हारे पवित्र अङ्ग पृथ्वी पर शस्त्रों के काम में लाये जायँगे । ' भगवान् विष्णु की कृपा से ब्रह्मा ने भी निर्विघ्न यज्ञ से उनकी पूजा की । अब मैं खड्ग लक्षण बतलाऊँगा । खटीखट्टर देश में बने हुए खड्ग दर्शनीय होते हैं । उसी तरह ऋषिक देश के खड्ग शरीर को काटनेवाले, सूर्पारक देश के दृढ़, वंग देश के तीक्ष्ण और चोट सहनेवाले तथा अङ्ग देश के बाण तीक्ष्ण होते हैं ॥१९ -२२ ॥ पचास अङ्गुल लम्बा खड्ग उत्तम कहा गया है । उसकी आधी लम्बाईवाला मध्यम होता है और उससे कम लम्बाई के खड्ग को नहीं धारण करना चाहिए । जो खड्ग लम्बा तथा किंकिणी के समान सुमधुर शब्द करनेवाला हो, उसका धारण करना अच्छा कहा गया है । जिस खड्ग का अग्रभाग कमलपत्र के समान हो या मण्डलाकार हो, वह प्रशंसनीय होता है । जिसका गन्ध घी के समान, प्रभा आकाश के १ छ. ह शनैर्देवो ' CC । - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७५५ समाङ्गुलस्थाः शस्यन्ते व्रणाः खड्गेषु लिङ्गवत् । काकोलूकसवर्णाभा विषमास्ते न शोभनाः ॥ २६ ॥

खड्गे न पश्येद्वदनमुच्छिष्टो न स्पृशेदसिम् । मूल्यं जातिं न कथयेन्निशि कुर्यान्न शीर्षके ॥२७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये चामरादिलक्षणकथनं नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥२४५ ॥

अथ षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः रत्नपरीक्षा अग्निरुवाच रत्नानां लक्षणं वक्ष्ये रलं धार्यमिदं नृपैः । वज्रं मरकतं रलं पद्मरागं च मौक्तिकम् ॥१ ॥

इन्द्रनीलं महानीलं वैदूर्यं गन्धशस्यकम् । चन्द्रकान्तं सूर्यकान्तं स्फटिकं पुलकं तथा ॥ २ ॥

कर्केतनं पुष्परागं तथा ज्योतीरसं द्विज । स्फटिकं राजपट्टं च तथा राजमयं शुभम् ॥३ ॥

सौगन्धिकं तथा गञ्जं शङ्खब्रह्ममयं तथा । गोमेदं रुधिराक्षं च तथा भल्लातकं द्विज ॥४ ॥

धूलीं मरकतं चैव तुत्थकं सीसमेव च । पीलुं प्रवालकं चैव गिरिवज्रं द्विजोत्तम ॥५ ॥

भुजङ्गममणि चैव तथा वज्रमणिं शुभम् । टिट्टिभं च तथा पिण्डं भ्रामरं च तथोत्पलम् ॥६ ॥

सुवर्णप्रतिबद्धानि रत्नानि श्रीजयादिके । अन्तःप्रभत्वं वैमल्यं सुसंस्थानत्वमेव च ॥७ ॥

समान और अग्रभाग करवीर पत्र के समान हो, वह भी उत्तम होता है । दो अँगुलियों की चौड़ाई के बराबर लम्बा खड्ग शुभ माना जाता है । खड्गों में रहनेवाले छिद्र आदि के गुण - दोष को लिङ्गवत् समझना चाहिए । कौए और उल्लू के समान वर्णवाली ऊँची - नीची खड्ग शुभ नहीं होती है । खड्ग में न तो मुख देखना चाहिए और न तो उसे जूठे हाथ छूना ही चाहिए । उसके मूल्य तथा जाति को किसी से नहीं बताना चाहिए और न रात्रि में लटकते हुए खड्ग के नीचे सोना चाहिए ॥२३-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चामरादिलक्षण कथन नामक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २४५ ॥

अध्याय २४६ रत्नपरीक्षा अग्निदेव बोले - मैं रत्नों का लक्षण बतलाता हूँ । राजा को जिन - जिन रत्नों को धारण करना चाहिए वे हैं-वज्र, मरकत, रत्न, पद्मराग, मौक्तिक, इन्द्रनील, महानील, वैदूर्य, गन्धशस्य, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक, पुलक, कर्केतन, पुष्पराग, ज्योतीरस, स्फटिक, राजपट्ट, राजमय, सौगन्धिक, गञ्ज, शंखब्रह्ममय, गोमेद, रुधिराक्ष, भल्लातक, धूली, मरकत, तुत्थक, सीस, पीलु, प्रवालक, गिरिवज्र, भुजङ्गमणि, वज्रमणि, टिट्टिभ, पिण्ड, भ्रामर तथा उत्पल । श्री और विजय आदि की प्राप्ति के लिए स्वर्ण में जड़े हुए रत्न को धारण करना चाहिए ॥१-६३ ॥ जो रत्न अन्दर से चमकता हो और अच्छे स्थान से प्राप्त किया गया हो, उसे ही धारण करना चाहिए । प्रभाहीन, मलिन, खण्डित तथा रेतीले CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अग्निपुराणम् ७५६ सुधार्या नैव धार्यास्तु निष्प्रभा मलिनास्तथा अम्भस्तरति यद्वज्रमभेद्यं विमलं च यत् शुकपक्षनिभः स्निग्धः कान्तिमान्विमलस्तथा स्फटिकाः पद्मरागाः स्यू रागवन्तोऽतिनिर्मलाः सौगन्धिकोत्थाः काषाया मुक्ताफलास्तु शुक्तिजाः नागदन्तभवाश्चाग्र्याः कुम्भसूकरमत्स्यजाः वृत्तत्वं शुक्लता स्वाच्छ्यं महत्त्वं मौक्तिके गुणाः । खण्डाः सशर्करा ये च प्रशस्तं वज्रधारणम् ॥८ ॥

। षट्कोणं शक्रचापाभं लघुचार्कनिभं शुभम् ॥९ ॥

। स्वर्णचूर्णनिभैः सूक्ष्मैर्मरकतैश्च बिन्दुभिः ॥१० ॥

। ' जातरङ्गाः भवन्तीह कुरुविन्दसमुद्भवाः ॥ ॥११ ११ ॥ ॥ 1 । विमलास्तेभ्य उत्कृष्टा ये च शङ्खोद्भवा मुने ॥१२ ॥

। वेणुनागभवाः श्रेष्ठा मौक्तिकं मेघजं वरम् ॥१३ ॥

। इन्द्रनीलं शुभं क्षीरे राजते भ्राजतेऽधिकम् ॥१४ ॥

रञ्जयेत्स्वप्रभावेण तममूल्यं विनिर्दिशेत् । नीलरक्तं तु वैदूर्यं श्रेष्ठं हारादिकं भजेत् ॥ १५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रत्नपरीक्षाकथनं नाम षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥

रत्न को नहीं धारण करना चाहिए । मणि का धारण करना भी शुभ होता है । जो वज्र पानी में तैर सके, जिसका वर्ण इन्द्रधनुष तथा सूर्य के समान हो, जिसमें छह कोने हों और जो लघु, अभेद्य और विमल हो, उसे धारण करना चाहिए । मरकत ( मणि ) वह अच्छा होता हैं जो तोते के पंख के समान स्निग्ध, कान्तिमान्, विमल तथा सुवर्ण चूर्ण के समान सूक्ष्म विन्दुओं से युक्त हों । जो स्फटिक तथा पद्मराग अति निर्मल तथा लाल हो, जो वङ्ग या कुरुविन्द देश में उत्पन्न हुआ हो, वह उत्तम होता है ॥ ७-११ ॥ हे मुने! मुक्ताफल ( मोती ) वे अच्छे होते हैं जिनका रंग काषाय होता है और जो सीपी से या रक्तकमल से उत्पन्न होते हैं । परन्तु शंख से उत्पन्न होनेवाले और शुभ्र मोती उनसे भी उत्तम होते हैं । हस्तिदन्त, हस्तिशिर, शूकर, मत्स्य तथा वेणु से उत्पन्न होनेवाला मुक्ताफल भी अच्छा होता है । मेघोत्पन्न मौक्तिक को श्रेष्ठ कहा गया है । गोलापन, शुक्लता, स्वच्छता तथा महत्ता - ये मौक्तिक के गुण होते हैं । जो इन्द्रनील ( मणि ) दूध में डालने से अधिक चमकने लगता है तथा अपने प्रभाव ( छवि ) से लोगों का अनुरञ्जन करता है, उसे अमूल्य ( बहुमूल्यक ) समझना चाहिए । नील और रक्तवर्णवाला वैदूर्य हार आदि के लिए अत्युत्तम होता है ॥१२-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में रत्नपरीक्षा नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४६ ॥

१ छ. ' जातवङ्गाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA