अग्नि पुराण — पृष्ठ 761–770
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 761–770
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सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७५७ अथ सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वास्तुलक्षणम् अग्निरुवाच वास्तुलक्ष्यप्रवक्ष्यामि विप्रादीनां च भूरिह घृतरक्तान्नमद्यानां गन्धाढ्या रसतश्च भूः कुशैः शरैस्तथा काशैर्दूर्वाभिर्या च संश्रिता चतुःषष्टिपदं कृत्वा मध्ये ब्रह्मा चतुष्पदः । दक्षिणेन विवस्वांश्च मित्रः पश्चिमतस्तथा सावित्रश्चैव सविता जयेन्द्रौ नैर्ऋतेऽम्बुधौ महेन्द्रश्च रविः सत्यो भृशः पूर्वेऽथ दक्षिणे । पुष्पदन्तोऽसुराश्चैव वरुणो यक्ष एव च नागः करग्रहश्चैशे अष्टौ दिशि दिशि स्मृताः । पर्जन्यः प्रथमो देवो द्वितीयश्च करग्रहः पवनः पूर्वतश्चैव अन्तरिक्षधनेश्वरौ । श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैव यथाक्रमम् ॥१ ॥
। मधुरा च कषाया च अम्लाद्युपरसा क्रमात् ॥२ ॥
। प्रार्च्य विप्रांश्च निःशल्यां खातपूर्वं तु कल्पयेत् ॥३ ॥
प्राक्तेषां वै गृहस्वामी कथितस्तु तथाऽर्यमा ॥४ ॥
। उदङ्महीधरश्चैव आपवत्सौ च वह्निगे ॥ ५ ॥
। रुद्रव्याधी च वायव्ये पूर्वादौ कोणगाद्बहिः ॥ ६ ॥
गृहक्षतोऽर्यमधृती गन्धर्वाश्चाथ वारुणे ॥७ ॥
। सौम्ये भल्लाटसोमौ च अदितिर्धनदस्तथा ॥ ८ ॥
आद्यन्तौ तु तयोर्देवौ प्रोक्तावक्त्र गृहेश्वरौ ॥ ९ ॥
। महेन्द्ररविसत्याश्च भृशोऽथ गगनं तथा ॥१० ॥
। आग्नेये चाथ नैर्ऋत्ये मृगसुग्रीवकौ सुरौ ॥११ ॥
अध्याय २४७ वस्तु लक्षण अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं वास्तुभूमि का लक्षण बतलाऊँगा । ब्राह्मण आदि वर्णों की भूमि क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत तथा कृष्ण रंग की होनी चाहिए । उन भूमियों में से क्रमशः घी, शोणित, अम्ल तथा मद्य की - सी गन्ध निकलती रहती है । उसका रस क्रमशः मधुर, कषाय, अम्ल और कटु होता है । वह कुश, सरपत, काश तथा दूर्वा से आच्छादित रहती है । ऐसी भूमि पर विप्रों की पूजा करके शल्योद्धार करे ( अर्थात् मिट्टी खोदकर ) हड्डी आदि अपवित्र वस्तुओं को निकाल देना चाहिए ॥१-३ ॥ फिर चौंसठ पद भूमि को नापकर मध्य में ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिए । उनसे चार पग पूर्व की ओर गृहस्वामी तथा अर्यमा की पूजा करनी चाहिए । दक्षिण में विवस्वान् की, पश्चिम में मित्र की और उत्तर में महीधर की पूजा करनी चाहिए । दक्षिण - पूर्व दिशा में आप तथा वत्स की, नैर्ऋत में सावित्र की तथा सविता की, ईशान में जय तथा इन्द्र की और वायव्य में रुद्र और व्याधि ( के अधिष्ठाता देवता की पूजा करनी चाहिए । पुनः पूर्व दिशा में महेन्द्र, रवि, सत्य तथा भृश की, दक्षिण में गृहक्षत, अर्यमा, धृति तथा गन्धर्व की, पश्चिम में पुष्पदन्त, असुर, वरुण तथा यक्ष की और उत्तर में भल्लाट, सोम, अदिति, कुबेर, नाग और करग्रह की पूजा करनी चाहिए ॥४-८ -८३ ॥ इनकी पूजा करके पूर्व दिशा में महेन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, गगन तथा पवन की, दक्षिण-पूर्व दिशा में अन्तरिक्ष तथा धनेश्वर की; दक्षिण - पश्चिम में मृग तथा सुग्रीव की, पश्चिमोत्तर दिशा में रोग के अधिष्ठाता CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७५८ अग्निपुराणम् रोगो मुख्यश्च वायव्ये दक्षिणे पुष्पवित्तदौ । आप्ये दौवारिक सुग्रीवौ पुष्पदन्तोऽसुरो जलम् । मुख्यो भल्लाटशशिनौ अदितिश्च कुबेरकः । दक्षे गृहक्षतः पुष्प आप्ये सुग्रीव उत्तमः । शिलेष्टकादिविन्यासं मन्त्रैः प्रार्च्य सुरांश्चरेत् । जये भार्गवदायादे प्रजानां जयमावह । भद्रे काश्यपदायादे कुरु भद्रां मतिं मम । रुचिरे नन्दने नन्दे वाशिष्ठे रम्यतामिह सुभगे सुव्रते भद्रे गृहे काश्यपि रम्यताम् भवभूतिकरे देवि गृहे भार्गवि रम्यताम् इष्टके त्वं प्रयच्छेष्टं प्रतिष्ठां कारम्याम्यहम् मनुष्यधनहस्त्यश्वपशुवृद्धिकरी भव उत्तरेण शुभः प्लक्षो वटः प्राक्स्याद्गृहादितः गृहक्षतो यमभृशौ गन्धर्वो नागपैतृकः ॥१२ ॥
यक्ष्मरोगश्च ' शेषश्च उत्तरे नागराजकः ॥१३ ॥
नागो हुताशः श्रेष्ठो वै शक्रसूर्यौ च पूर्वतः ॥१४ ॥
पुष्पदन्तो ह्युदग्द्वारि भल्लाटः पुष्पदन्तकः ॥१५ ॥
नन्दे नन्दय वाशिष्ठे वसुभिः प्रजया सह ॥ १६ ॥
पूर्णेऽङ्गिरसदायादे पूर्णकामं कुरुष्व माम् ॥१७ ॥
सर्वबीजसमायुक्ते सर्वंरत्नौषधैर्वृते ॥१८ ॥
। प्रजापतिसुते देवि चतुरस्त्रे महीमये ॥१९ ॥
। पूजिते परमाचार्यैर्गन्धमाल्यैरलङ्कृते ॥२० ॥
। अव्यङ्ग्ये चाक्षते पूर्णे मुनेरङ्गिरसः सुते ॥ २१ ॥
। देशस्वामिपुरस्वामिगृहस्वामिपरिग्रहे ॥२२ ॥
। गृहप्रवेशेऽपि तथा शिलान्यासं समाचरेत् ॥२३ ॥
। उदुम्बरश्च याम्येन पश्चिमेऽश्वत्थ उत्तमः ॥२४ ॥
देवता की, दक्षिण में पुष्पदन्त, कुबेर, गृहक्षत, यम, भृश, गन्धर्व तथा नागपैतृक की; पश्चिम में सुग्रीव, दौवारिक, पुष्पदन्त, असुरजल, यक्ष्मा तथा शेष रोगों के अधिष्ठाता देवताओं की तथा उत्तर में नागराज, भल्लाट, शशि, अदिति, कुबेर, नाग तथा अग्नि की पूजा करनी चाहिए । पुनः पूर्व में इन्द्र, सूर्य का, दक्षिण में गृहक्षत, पुष्पदन्त का, पश्चिम में सुग्रीव, उत्तम का और उत्तर में भल्लाट और पुष्पदन्त का पूजन करना चाहिए ॥९ -१५ ॥ तदनन्तर मन्त्रपूर्वक शिलान्यास, इष्टकान्यास आदि करके देवतार्चन करना चाहिए । तत्पश्चात् देवियों से इस तरह प्रार्थना करनी चाहिए-“ नन्दे! मुझे आनन्दित करो । वाशिष्ठे! वसुओं के साथ आकर मेरा कल्याण करो । भार्गव की पत्नी जये! अपनी प्रजा सहित आकर मेरी पूजा को विजयी बनाइये । अङ्गिरा की पत्नी पूर्णे! मेरी कामनाओं को पूर्ण कीजिये ॥१६-१७ ॥ काश्यप की पत्नी भद्रे! मुझे शुभ मति प्रदान कीजिये । सब प्रकार के बीजों, रत्नों और ओषधियों से युक्त रुचिरे! नन्दने! नन्दे! वाशिष्ठे! यहाँ रमण कीजिये । अयि प्रजापति की पुत्रि! देवि! चतुरस्रे! महीमये! सुभगे! सुव्रते! भद्रे! काश्यपि! मेरे इस घर में रमण कीजिये । अव्यङ्ग्ये! अक्षते! पूर्णे! अङ्गिराकन्ये! इष्टके! मुझे इष्टसिद्धि प्रदान कीजिये । मैं तुम्हारी प्रतिष्ठा करूँगा ॥१८-२१ ॥ देश, पुर तथा गृह की स्वामिनि! मुझे मनुष्य, धन, हाथी, घोड़े और गाय-भैंस अधिक मात्रा में दीजिये । ” गृह - प्रवेश के दिन भी शिलान्यास करना चाहिए । गृह के उत्तर भाग में पाकर, पूर्व में बरगद, दक्षिण में गूलर और पश्चिम में पीपल का वृक्ष लगाना उत्तम होता है ॥२२-२४ ॥ बायें भाग में उद्यान १ क. ङ. ' श्च CC - शोष 0. JK ' Sanskrit । Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अथाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७५ ९ वामभागे तथोद्यानं कुर्याद्वासं गृहे शुभम् । सायं प्रातस्तु धर्माप्तौ शीतकाले दिनान्तरे ॥ २५ ॥
' वर्षाकाले भुवः शोषे सेक्तव्या रोपितद्रुमाः । विडङ्गघृतसंयुक्तान्सेचयेच्छीतवारिणा ॥२६ ॥
फलनाशे कुलत्थैश्च माषैर्मुद्गैस्तिलैर्यवैः । घृतशीतपयः सेकः फलपुष्पाय सर्वदा ॥२७ ॥
मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनाम् । आविकाजशकृच्चूर्णं यवचूर्णं तिलानि च ॥ २८ ॥
गोमांसमुदकं चेति सप्तरात्रं निधापयेत् । उत्सेकं सर्ववृक्षाणां फलपुष्पातिवृद्धिदम् ॥२९ ॥
मत्स्योदकेन शीतेन आम्राणां सेक इष्यते । प्रशस्तं चाप्यशोकानां कामिनीपादताडनम् ॥३० ॥
खर्जूरनारिकेलादेर्लवणाद्भिर्विवर्धनम् । विडङ्गमत्स्यमांसाद्भिः सर्वेषां दोहदं शुभम् ॥ ३१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वास्तुलक्षणकथनं नाम सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२४७ ॥
अथाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पुष्पादिपूजाफलम् अग्निरुवाच पुष्पैस्तु पूजनाद्विष्णुः सर्वकार्येषु सिद्धिदः । मालती मल्लिका यूथी पाटलाकरवीरकम् ।१ ॥ पावन्तिरतिमुक्तश्च (? ) कर्णिकारः कुरण्टकः । कुब्जकस्तगरो नीपो वाणो वर्वरमल्लिका ॥ २ ॥
( बगीचा ) लगाकर शुभ दिन में गृहवास करना चाहिए । ग्रीष्म ऋतु में सायं प्रातःकाल, शीतकाल में दोपहर के बाद और वर्षाऋतु में भूमि सूख जाने पर उन रोपे हुए वृक्षों को विडङ्ग ( औषध - विशेष ) तथा घी मिले हुए जल से सींचना चाहिए । यदि वृक्ष में फल आना समाप्त हो गया हो तो उसके फलने - फूलने के लिए कुलथी, उड़द, मूँग, तिल, यव तथा घी मिले हुए जल से सींचना चाहिए । मछली मिले हुए जल से सींचने पर वृक्षों की वृद्धि होती है । भेंड़े तथा बकरे की लेंड़ी ( मल ) का चूर्ण, यव का चूर्ण, तिल का चूर्ण, गोमांस तथा जल से सात रात सींचने से वृक्षों में फल, पुष्प आदि की वृद्धि होती हैं ॥ २५-२९ ॥ मछलीवाले ठंडे जल से आमों का सिञ्चन अच्छा होता है । अशोक वृक्ष के ऊपर कामिनी का चरण - प्रहार अच्छा होता है । खजूर तथा नारियल आदि को नमक मिले हुए जल से सींचने पर वृद्धि होती है । विडङ्ग, मत्स्य तथा मांस के जल के सींचना सब प्रकार के वृक्षों के लिए लाभदायक हुआ करता है ॥ ३०-३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वास्तुलक्षण - कथन नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४७ ॥
अध्याय २४८ पुष्पादिपूजाफल अग्निदेव बोले - पुष्पों से भगवान् विष्णु का पूजन करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं । मालती, मल्लिका, यूथी, पाटला, करबीर, पावन्ती, अतिमुक्त, कर्णिकार, कुरण्टक, कुञ्जक, तगर, कदम्ब, वाण, बर्बर, मल्लिका, अशोक, १ छ. वर्षारात्रे । २ क. ङ. म् । परेतिरतियुक्तश्च । ३ क. ङ. बर्बरकेतकी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७६० अग्निपुराणम् अशोकस्तिलकः कुन्दः पूजायै स्यात्तमालजम् । बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृङ्गरजस्य तु ॥ ३ ॥
तुलसीकालतुलसीपत्रं वासकमर्चने । केतकीपत्रपुष्पं च पद्मं रक्तोत्पलादिकम् ॥४ ॥
नाऽऽर्कं नोन्मत्तकं काञ्ची पूजने गिरिमल्लिका । कौटजं शाल्मलीपुष्पं कण्टकारीभवं न हि ॥५ ॥
घृतप्रस्थेन विष्णोश्च स्नानं गोकोटिसत्फलम् । आढकेन तु राजा स्याद्धृतक्षीरैर्दिवं व्रजेत् || ६ || इत्यादिमहापुराण आग्नेये पुष्पादिपूजाकथनं नामाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४८ ॥
अथैकोनपञ्चाशदरिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः धनुर्वेदः अग्निरुवाच चतुष्पादं धनुर्वेदं वदे पञ्चविधं द्विज । रथनागाश्वपत्तीनां योधांश्चाऽऽश्रित्य कीर्तितम् ॥१ ॥
' यन्त्रमुक्तं पाणिमुक्तं मुक्तसंधारितं तथा । अमुक्तं बाहुयुद्धं च पञ्चधा तत्प्रकीर्तितम् ॥२ ॥
तत्र शस्त्रास्त्रसम्पत्त्या द्विविधं परिकीर्तितम् । ऋजुमायाविभेदेन भूयो द्विविधमुच्यते ॥३ ॥
क्षेपणीचापयन्त्राद्यैर्यत्रमुक्तं प्रकीर्तितम् । शिलातोमरयन्त्राद्यं पाणिमुक्तं प्रकीर्तितम् ॥४ ॥.
तिलक तथा कुन्द - ये पुष्प और तमाल, बिल्व, शमी, भृंगराज तथा तुलसी- ये पत्र पूजा के लिए उत्तम हैं । केतकी के पत्र - पुष्प तथा रक्तोत्पल आदि कमल भी पूजन के लिए प्रसिद्ध हैं । आक, काञ्ची, गिरिमल्लिका, कुटज, शल्मलीपुष्प तथा कण्टकारिपुष्प से पूजा नहीं करनी चाहिए । एक सेर घी से विष्णु का स्नान कराने से एक करोड़ गो - दान करने का फल होता है । एक अढैया घी से विष्णु को स्नान करानेवाला मनुष्य राजा होता है और घी - दूध से स्नान करानेवाला मनुष्य स्वर्ग को जाता है ॥१-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पुष्पादिपूजा - कथन नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४८ ॥
अध्याय २४ ९ धनुर्वेद अग्निदेव बोले - अये ब्राह्मण! धनुर्वेद के चार भेद हैं - रथ, गज, अश्व और पैदल । इसमें योद्धाओं को मिलाकर इसके पाँच भेद कहे जाते हैं । यों तो यन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तसंधारित, अमुक्त और बाहुयुद्ध - ये पाँचों भी इसी के भेद हैं ॥१-२ ॥ पहले इनके अस्त्र और शस्त्र से दो भेद होते हैं और फिर ऋजु और माया के भेद से भी इन पाँचों के दो - दो भेद हो जाते हैं । ( क्षेपड़ी ) डाँड़, धनुष तथा यन्त्र आदि से जो युद्ध किया जाता है, उसे यन्त्रमुक्त कहते हैं । शिला, तोमर और यन्त्र आदि से किये जानेवाले युद्ध को पाणिमुक्त, भाले आदि से होनेवाले युद्ध को CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनपञ्चाशदरिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७६१ मुक्तसंधारितं ज्ञेयं प्रासाद्यमपि यद्भवेत् । कुर्याद्योग्यानि पात्राणि योद्धुमिच्छुर्जितश्रमः । तानि खड्गजघन्यानि बाहुप्रत्यवराणि च । युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं ' चाऽऽपदि शिक्षया । अङ्गुष्ठगुल्फपाण्यङ्घ्रयः श्लिष्टाः स्युः सहिता यदि । बाह्याङ्गुलिस्थितौ पादौ स्तब्धजानुबलावुभौ । हंसपङ्क्त्याकृतिसमे दृश्यते यत्र जानुनी । हलाकृतिमयं यच्च स्तब्धजानूरुदक्षिणम् एतदेव विपर्यस्तं प्रत्यालीढमिति स्मृतम् । गुल्फौ पाणिग्रहौ चैव स्थितौ पञ्चाङ्गुलान्तरौ ऋजुजानुर्भवेद्वामो दक्षिणः सुप्रसारितः दण्डायतो भवेदेष चरणः सह जानुना खड्गादिकममुक्तं च नियुद्धं विगतायुधम् ॥५ ॥
धनुः श्रेष्ठानि युद्धानि प्रासमध्यानि तानि च ॥६ ॥
धनुर्वेदे गुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च ॥७ ॥
देशस्थैः शंकरैः राज्ञः कार्या युद्धे सहायता ॥८ ॥
दृष्टं समपदं स्थानमेतल्लक्षणस्तथा ॥९ ॥
त्रिवितस्त्यन्तरास्थानमेतद्वैशाखमुच्यते ॥१० ॥
चतुर्वितस्तिविच्छिन्ने तदेतन्मण्डलं स्मृतम् ॥११ ॥
। वितस्त्यः पञ्चविस्तारे तदालीढं प्रकीर्तितम् ॥१२ ॥
तिर्यग्भूतो भवेद्वामो दक्षिणोऽपि भवेदृजुः ॥ १३ ॥
। स्थानं जातं भवेदेतद्द्द्वादशाङ्गुलमायतम् ॥१४ ॥
। अथवा दक्षिणं जानु कुब्जं भवति निश्चलम् ॥ १५ ॥
। एवं विकटमुद्दिष्टं द्विहस्तान्तरमायतम् ॥१६ ॥
मुक्तसंधारित, खड्ग आदि से होनेवाले युद्ध को बाहुयुद्ध कहते हैं । युद्धाभिलाषी राजा को कठोर परिश्रमी होना चाहिए तथा उसे युद्ध के निमित्त योग्य पात्रों को चुनना चाहिए । धनुष से होनेवाले युद्ध को मध्यम, खड्ग से होनेवाले को अधम और बाहु से होनेवाले को अति अधम कहा गया है । धनुर्वेद की शिक्षा देने के लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय को नियुक्त करना चाहिए, क्योंकि इसका अधिकार इन्हीं दो वर्णों को हुआ करता है ॥ ३-७ ॥ शूद्र को युद्ध का अधिकार केवल आपत्तिकाल में होता है और वह भी उसकी शिक्षा ले लेने के बाद । युद्ध के समय देश में रहनेवाले वर्णसङ्कर लोगों को भी राजा की सहायता करनी चाहिए । ( अब धनुर्वेद सीखनेवालों का आसन - स्थानभेद बताते हैं ) जिस स्थान - आसन में अँगूठा, एड़ी, हाथ और पैर परस्पर मिले हुए हों, वह समपात स्थान कहलाता है । जिस आसन में दोनों चरण तीन बित्ते की दूरी पर अङ्गुलियों और घुटनों के बल स्थित हों, उसे वैशाख आसन कहते हैं ॥८-१० ॥ जिसमें दोनों घुटने चार बित्ते की दूरी पर हंसपंक्ति के आकार में स्थित हों, उसे मण्डलस्थान कहते हैं । जिसमें पाँच बित्ते की दूरी पर दाहिना घुटना और जंघाएँ निश्चल भाव से हल के आकार में स्थित हों उसे आलीढ़ कहते हैं ( अर्थात् वामपाद प्रसारणपूर्वक दक्षिणपाद संकोचयुक्त अवस्थान को आलीढ़ कहते हैं ) और इसके विपरीत स्थिति को प्रत्यालीढ़ कहते हैं ॥११-१२३ ॥ जिस आसन में बायाँ चरण टेढ़ा और दाहिना सीधा रहता है और दोनों के गुल्फ ( घुट्ठी ) तथा एड़ी पाँच अँगुलियों की दूरी पर रहती हैं, उसे जात आसन कहते हैं । जिसमें घुटने सहित बायाँ पैर सीधा हो और दाहिना पाँव अच्छी तरह फैला हो अथवा दाहिना घुटना टेढ़ा और निश्चल हो और बायाँ दण्ड के समान सीधा हो, उसे विकट आसन कहते हैं ॥१३-१६ ॥ जिसमें दोनों घुटने मुड़े हुए हों और दोनों चरण ऊपर १ छ. " यं व्याप ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७६२ अग्निपुराणम् जानुनी द्विगुणे स्यातामुत्तानौ चरणावुभौ । किंचिद्विवर्जितौ पादौ समदण्डायतौ स्थिरौ । स्वस्तिकेनात्र कुर्वीत प्रणामं प्रथमं द्विज । वैशाखे यदि वा जाते स्थितौ वाऽप्यथ वाऽऽयतौ । अध: कोटिं तु धनुषः फलदेशं तु पत्रिणः । ' भुजाभ्यामत्र कुब्जाभ्यां प्रकोष्ठाभ्यां शुभवत । विन्यासो धनुषश्चैव द्वादशाङ्गुलमन्तरम् । निवेश्य कार्मुकं नाभ्यां नितम्बे ' शरसंकरम् । पूर्वेण मुष्टिना ग्राह्यः स्तनाग्रे दक्षिणे शरः । नाऽऽभ्यन्तरा नैव बाह्या नोर्ध्वका नाधरा तथा । समा स्थैर्यगुणोपेता पूर्वदण्डमिव स्थिता । उरसा तूत्थितो यन्ता त्रिकोणविनतस्थितः । ललाटनासावक्त्रांसकूपरेषु समो समो भवेत् ।
प्रथमं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं द्वितीये द्व्यङ्गुलं स्मृतम् ।
अनेन विधियोगेन संपुटं परिकीर्तितम् ॥१७ ॥
दृष्टमेव यथान्यायं षोडशाङ्गुलमायतम् ॥१८ ॥
कार्मुकं गृह्य वामेन बाणं दक्षिणकेन तु ॥१९ ॥
गुणान्तं तु ततः कृत्वा कार्मुके प्रियकार्मुकः ॥२० ॥
धरण्यां स्थापयित्वा तु तोलयित्वा तथैव च ॥ २१ ॥
तस्य बाणं धनुःश्रेष्ठं पुङ्खदेशे च पत्त्रिणः ॥ २२ ॥
ज्यया विशिष्टः कर्तव्यो नातिहीनो न चाधिकः ॥२३ ॥
उत्क्षिपेदुत्थितं हस्तमन्तरेणाक्षिकर्णयोः ॥ २४ ॥
हरणं तु ततः कृत्वा शीघ्रं पूर्वं प्रसारयेत् ॥ २५ ॥
न च कुब्जा न चोत्ताना न चला नातिवेष्टिता ॥ २६ ॥
छादयित्वा ततो लक्ष्यं पूर्वेणानेन मुष्टिना ॥ २७ ॥
रेस्त्रस्तांसो निश्चलग्रीवो मयुराञ्चितमस्तकः ॥ २८ ॥
अन्तरं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं ' चिबुकस्यांशु ( स ) कस्य च ॥२९ ॥
तृतीयेऽङ्गुलमुद्दिष्टमायतं चिबुकांसयोः ॥ ३० ॥
की ओर हों, उसे संपुट आसन कहते हैं । जिसमें दोनों पाँव कुछ फैले हुए हों और दण्ड के समान सीधे और स्थिर हों तथा उनके बीच में सोलह अँगुलियों की लम्बाई हो, उसे स्वस्तिक आसन कहते हैं । अये ब्राह्मण! अपने गुरु को इसी ( स्वस्तिक ) आसन से प्रणाम करना चाहिए । शिष्य को बायें हाथ में धनुष और दाहिने हाथ में बाण लेकर प्रत्यञ्चा चढ़ानी चाहिए ॥१७-१९ ॥ उसे अपने धनुष के प्रति विशेष प्रेम रखना चाहिए । तदनन्तर धनुष के किनारे और बाण के फलक को पृथ्वी के ऊपर रखकर उसे प्रत्यञ्चा के ऊपर चढ़ाना चाहिए । इस समय धनुष के दण्ड और प्रत्यञ्चा के बीच में बारह अंगुल की दूरी होनी चाहिए । प्रत्यञ्चा न तो बहुत लम्बी और न ही बहुत छोटी होनी चाहिए । तत्पश्चात् धनुष को नाभि के समानान्तर उठाकर और तरकस को नितम्ब पर लटकाकर योद्धा को चाहिए कि वह धनुष को अपने नेत्र और कानों के बराबर उठा ले । बाण को दाहिनी मुट्ठी में पकड़कर उसे दाहिने स्तन की ओर उठाना चाहिए । तदनन्तर शीघ्र ही प्रत्यञ्चा को चढ़ाकर उसे पूरी शक्ति से खींचना चाहिए ॥ २०-२५ ॥ किन्तु प्रत्यञ्चा को इतना भी नहीं खींचना चाहिए कि बाण ( प्रत्यञ्चा और ) दण्ड के बीच में आ जाय या उसका बड़ावाला भाग इतनी दूर निकल जाय कि बाण ही हिल जाय और अपने मार्ग से इधर - उधर हट जाय या फिर धनुष के दण्ड से ही टकरा जाय । इस प्रकार निशाने को अपनी पकड़ की सीध में लाकर अपने बाण को छोड़ना चाहिए । इस समय गर्दन दृढ़तापूर्वक सधी हुई हो, सिर मोर की भाँति बिलकुल सीधा हो, वक्ष: स्थल उभरा हुआ हो, कन्धे झुके हुए हों, सम्पूर्ण शरीर त्रिभुजाकार झुका हुआ हो और धनुष चलानेवाले की कनपटी, नासिका, मुख और कन्धे घोड़े के समान हों ॥ २६-२८३ ॥ उत्तम कोटि के बाण को चलाते समय ठुड्डी और कन्धे के बीच में तीन अङ्गुल, मध्यम कोटि के बाण को चलाते समय एक अंगुल स्थान रहना चाहिए । १ क. ङ. ‘ जाभ्यां मन्त्रगुप्ताभ्यां । २ ख. " म्बे सशरं क " । ३ क. ङ. स्त्रस्ताङ्गो । छ. स्रस्तांसे । ४ छ. “ वत्रांसाः कुर्युरश्वसमं भ ' । ५ क. ङ. ' कस्याङ्गकस्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७६३ गृहीत्वा सायकं पुङ्खात्तर्जन्याऽङ्गुष्ठकेन तु । तावदाकर्षयेद्वेगाद्यावद्बाणः सुपूरितः । दृष्टिमुष्टितं लक्ष्यं भिन्द्याद्बाणेन सुव्रत । एतदुच्छेदमिच्छन्ति ज्ञातव्यं हि त्वया द्विज । ऊर्ध्वं विमुक्तके कार्यमक्षिश्लिष्टं तु मध्यमम् 1 । ज्येष्ठस्तु सायको ज्ञेयो भवेद्द्द्वादश मुष्टयः ।
कनीयस्तु त्रयः प्रोक्तं नित्यमेव पदातिनः ।
अनामया पुनर्गृह्य तथा मध्यमयाऽपि च ॥ ३१ ॥
एवं विधमुपक्रम्य मोक्तव्यं विधिवत्खगम् ॥३२ ॥
मुक्त्वा तु पश्चिमं हस्तं क्षिपेद् वेगेन पृष्ठतः ॥ ३३ ॥
कूर्परं तदधः कार्यमाकृष्य तु धनुष्मता ॥ ३४ ॥
श्रेष्ठं प्रकृष्टं विज्ञेयं धनुःशास्त्रविशारदैः ॥ ३५ ॥
चतुर्हस्तं धनुःश्रेष्ठं त्रयः सार्धं तु मध्यमम् ॥३६ ॥
अश्वे रथे गजे श्रेष्ठे तदेव परिकीर्तितम् ॥ ३७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये धनुर्वेदकथनं नामैकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४ ९ ॥
अथ पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः धनुर्वेदकथनम् अग्निरुवाच पूर्णायतं द्विजः कृत्वा ततो मांसैर्गदायुधान् ' । सुनिर्धोतधनुः कृत्वा यक्षभूमौ विधापयेत् ॥ १ ॥
ततो बाणं समागृह्य दंशितः सुसमाहितः । तूणमासाद्य बध्नीयाद्दृढां कक्षां च दक्षिणाम् ॥२ ॥
बाण के उस भाग को जिसमें पुङ्ख लगे हुए रहते हैं अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से पकड़कर तब तक वेगपूर्वक खींचता रहे जब तक पूरा बाण धनुष पर न आ जाय । ऐसा उपक्रम करके विधिपूर्वक बाण को छोड़ना चाहिए ॥२९ -३२ ॥ इस प्रकार से बाण चलानेवाला धुनर्धर अपनी दृष्टि और पकड़ के बीच में आनेवाली खड़ी हुई वस्तु को अपने बाण से अवश्य ही बींध देगा । इसके बाद उसे अपना हाथ शीघ्र ही पीठ की ओर मोड़ देना चाहिए । अये सुव्रत! उत्तम कोटि के बाण का दण्ड बारह मुट्ठी और मध्यम तथा निम्न कोटि के बाणों का दण्ड कम्रशः ग्यारह और बारह अंगुल लम्बा होना चाहिए । पदाति योद्धा का उत्तम कोटि का धनुष चार हाथ, मध्यम कोटि का साढ़े तीन हाथ और निम्न कोटि का तीन हाथ लम्बा होना चाहिए । धनुष का प्रयोग अश्वारोही, गजारोही तथा रथारोही योद्धा के द्वारा भी किया जा सकता है ॥३३-३७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में धनुर्वेद - कथन नामक दो सौ उन्चासवाँ अध्याय समाप्त ॥२४९ ॥
अध्याय २५० धनुर्वेद - कथन अग्निदेव बोले - द्विजाति वर्ण के व्यक्ति को गदा आदि आयुधों को मांस से धोकर यज्ञभूमि में स्थापित कर देना चाहिए ॥१ ॥ तत्पश्चात् बाणों का संग्रह करके, कवच धारणपूर्वक एकाग्रचित हो, तूणीर ले, उसे पीठ
की ओर दाहिनी काँख के पास दृढ़ता से बाँधे । ऐसा करने से विलक्ष्य बाण भी उस तूणीर में सुस्थिर रहता है । फिर १ क. ङ. ' र्गतायुषम् । सु ं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७६४ अग्निपुराणम् विलक्ष्यमपि तद्बाणं तत्र चैव सुसंस्थितम् । तेनैव सहितं मध्ये शरं संगृह्य धारयेत् अविषष्णमतिर्भूत्वा गुणे पुङ्खं निवेशयेत् वामकर्णोपविष्टं च फलं वामस्य धारयेत् मनो लक्ष्यगतं कृत्वा मुष्टिना च विधानवित् ललाटपुटसंस्थानं दण्डं लक्ष्ये निवेशयेत् मुक्त्वा बाणं ततः ' पश्चादद्वर्णाशिक्यं तदा तया अक्षिलक्ष्यं क्षिपेत्तूणाच्चतुरस्त्रं च दक्षिणम् तस्मादनन्तरं तीक्ष्णं परावृत्तं गतं च यत् वेध्यस्थानेष्वथैतेषु सत्त्वस्य पुटकाद्धनुः तस्मिन्वेध्यगते विप्र द्वे वेध्ये दृढसंज्ञके दाहिने हाथ से तूणीर के भीतर से बाण को निकाले । ततः समुद्धरेद्वाणं तूणाद्दक्षिणपाणिना ॥३ ॥
। वामहस्तेन वै कक्षां धनुस्तस्मात्समुद्धरेत् ॥४ ॥
। संपीड्य सिंहकर्णेन पुङ्खेनापि समे दृढम् ॥५ ॥
। वर्णान्मध्यमया तत्र वामाङ्गुल्या च धारयेत् ॥६ ॥
। दक्षिणे गात्रभागे तु कृत्वा वर्णं विमोक्षयेत् ॥७ ॥
। आकृष्य ताडयेत्तत्र चन्द्रकं षोडशाङ्गुलम् ॥८ ॥
। निगृह्णीयान्मध्यमया ततोऽङ्गुल्या पुनः पुनः ॥ ९ ॥
। चतुरस्रगतं वेद्यमभ्यसेच्चाऽऽदितः स्थितः ॥ १० ॥
। निम्नमुन्नतवेधं च अभ्यसेत्क्षिप्रकं ततः ॥ ११ ॥
। हस्तावापशतैश्चित्रैस्तर्जयेदुस्तरैरपि ॥१२ ॥
। द्वे वेध्ये दुष्करे वेध्ये द्वे तथा चित्रदुष्करे ॥ १३ ॥
। उसके साथ ही बायें हाथ से धनुष को वहाँ से उठा ले और उसके मध्य भाग में बाण का संधान करे । चित्त में विषाद न आने दे - उत्साह सम्पन्न हो, धनुष की डोरी पर बाण का पुछ्ङ्खभाग रखे, फिर ' सिंहकर्ण ' नामक मुष्टि द्वारा डोरी को पुङ्ख के साथ ही दृढ़तापूर्वक दबाकर समभाव से संधान करे और बाण को लक्ष्य की ओर छोड़े । यदि बायें हाथ से बाण को चलाना हो तो बायें हाथ में बाण ले और दाहिने हाथ से धनुष की मुट्ठी पकड़े । फिर प्रत्यञ्चा पर बाण इस तरह रखे कि खींचने पर उसका फल या पुछ्व बायें कान के समीप आ जाय । उस समय बाण को बायें हाथ की ( तर्जनी और अंगुष्ठ के अतिरिक्त ) मध्यमा अँगुली से भी धारण किये रहे ॥२-६ ॥ बाण चलाने की विधि को जाननेवाला पुरुष उपर्युक्त मुष्टि के द्वारा धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर, मन को दृष्टि के साथ ही लक्ष्यगत करके, बाण को शरीर के दाहिने भाग की ओर रखते हुए लक्ष्य की ओर छोड़े । धनुष का दण्ड इतना बड़ा हो कि भूमि पर खड़ा करने पर उसकी ऊँचाई ललाट तक आ जाय । उस पर लक्ष्यवेध के लिए सोलह अंगुल लम्बे चन्द्रक ( बाण - विशेष ) का संधान करे और उसे भलीभाँति खींचकर लक्ष्य पर प्रहार करे । इस तरह एक बाण का प्रहार करके फिर तत्काल ही तूणीर से अंगुष्ठ एवं तर्जनी अँगुली के द्वारा बारम्बार बाण निकाले । उसे मध्यमा अँगुली से भी दबाकर काबू में करे और शीघ्र ही दृष्टिगत लक्ष्य की ओर चलावे । चारों ओर तथा दक्षिण ओर लक्ष्यवेध का क्रम जारी रखे । योद्धा पहले से ही चारों ओर बाण मारकर सब ओर के लक्ष्य को बेधने का अभ्यास करे । तदनन्तर वह तीक्ष्ण, परावृत्त, गत, निम्न, उन्नत तथा क्षिप्रवेध का अभ्यास बढ़ावे ॥७-११ ॥ वेध्य लक्ष्य के ये जो उपर्युक्त स्थान हैं, इनमें सत्त्व ( बल एवं धैर्य ) का पुट देते हुए विचित्र एवं दुस्तर रीति से सैकड़ों बार-हाथ से बाणों के निकालने एवं छोड़ने की क्रिया द्वारा धनुष का तर्जन करे- रे - उस पर टङ्कार दे । विप्रवर! उक्त वेध्य के अनेक भेद हैं । पहले तो दृढ़, दुष्कर तथा चित्रदुष्कर - ये वेध्य के तीन भेद हैं । ये तीनों ही भेद दो - दो प्रकार १ छ. ' श्चादुल्काशिक्षस्तदा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७६५ न तु निम्नं च तीक्ष्णं च दृढवेध्ये प्रकीर्तिते । निम्नं दुष्करमुद्दिष्टं वेध्यमूर्ध्वगतं च यत् ॥१४ ॥
मस्तकायनमध्ये तु चित्रदुष्करसंज्ञके । एवं वेध्यगणं कृत्वा दक्षिणेनेतरेण च ॥ १५ ॥
आरोहेत्प्रथमं वीरो जितलक्ष्यस्ततो नरः । एष एव विधिः प्रोक्तस्तत्र दृष्टः प्रयोक्तृभिः ॥ १६ ॥
अधिकं भ्रमणं तस्य तस्माद्वेध्यात्प्रकीर्तितम् । लक्ष्यं च योजयेत्तत्र पत्रिपत्रगतं दृढम् ॥१७ ॥
भ्रान्तं प्रचलितं चैव स्थिरं यच्च भवेदति । समन्तात्ताडयेद्भिन्द्याच्छेदयेद् व्यथयेदपि ॥१८ ॥
कर्मयोगविधानज्ञो ज्ञात्वैवं विधिमाचरेत् । मनसा चक्षुषा दृष्ट्या योगशिक्षुर्यमं जयेत् ॥ १ ९ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये धनुर्वेदकथनं नाम पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ २५० ॥
अथैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः धनुर्वेदकथनम् अग्निरुवाच
जितस्तो जितमतिर्जितदृग्लक्ष्यसाधकः । नियतां सिद्धिमासाद्य ततो वाहनमारुहेत् ॥१ ॥
के होते हैं । ' नतनिम्न ' और ' तीक्ष्ण ' ये ' दृढवेध्य ' के दो भेद हैं । ' दुष्करवेध्य ' के भी ' निम्न ' और ' ऊर्ध्वगत'- ये दो भेद कहे गये हैं । ' चित्रदुष्कर वेध्य ' के ' मस्तकायन ' और ' मध्य ' ये दो भेद बताये गये हैं । इस प्रकार इन वेध्यगणों को सिद्ध करके वीरपुरुष पहले दायें अथवा बायें पार्श्व से शत्रु - सेना पर चढ़ाई करे । इससे मनुष्य को अपने लक्ष्य पर विजय प्राप्त होती है । प्रयोक्ता पुरुषों ने वेध्य के विषय में यही विधि देखी और बतायी है ॥ १२-१६ ॥ योद्धा के लिए उस वेध्य की अपेक्षा भ्रमण को अधिक उत्तम बताया गया है । वह लक्ष्य को अपने बाण के पुङ्खभाग से आच्छादित करके उसकी ओर दृढ़तापूर्वक शर - संधान करे । जो लक्ष्य भ्रमणशील, अत्यन्त चंचल और सुस्थिर हो, उस पर सब ओर से प्रहार करे । उसका भेदन और छेदन करे तथा उसे सर्वथा पीड़ा पहुँचाये । कर्मयोग के विधान का ज्ञाता पुरुष इस प्रकार समझ - बूझकर उचित विधि का आचरण ( अनुष्ठान ) करे । जिसने मन, नेत्र और दृष्टि के द्वारा लक्ष्य के साथ एकता - स्थापन की कला सीख ली है, वह योद्धा यमराज को भी जीत सकता है । ( पाठान्तर के अनुसार वह श्रम को जीत लेता है - युद्ध करते - करते थकता नहीं ) ॥१७-१९ ॥। श्री अग्निमहापुराण में धनुर्वेद- द- कथन नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय समाप्त ॥२५० ॥
अध्याय २५१ धनुर्वेद - कथन अग्निदेव बोले - अपने हाथ और अपनी बुद्धि तथा दृष्टि को वश में कर लेने के बाद और लक्ष्य बाँधने का अभ्यास करके ( धनुर्विद्या में ) निश्चित सिद्धि प्राप्त करके ( धनुर्विद्या चलानेवाले ) को घोड़े पर सवार होना चाहिए ॥१ ॥
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७६६ अग्निपुराणम् दशहस्तो ' भवेत्पाशो वृत्तः करमुखस्तथा अन्येषां सुदृढानां च सुकृतं परिवेष्टितम् कर्तव्यं शिक्षकैस्तस्य स्थानं कक्षासु वै तदा कुण्डलस्याऽऽकृतिं कृत्वाऽऽभ्राम्यैकं मस्तकोपरि वल्गिते च प्लुते चैव तथा प्रव्रजितेषु च विजित्वा ( त्य ) तु यथान्यायं ततो बन्धं समाचरेत् दृढं विगृह्य वामेन निष्कर्षेद्दक्षिणेन तु अयोमय्यः शलाकाश्च वर्माणि विविधानि च योजयेद्विधिना येन तथा त्वं गदतः शृणु करेणाऽऽदाय लगुडं दक्षिणाङ्गुलकं नवम् उभाम्यामथ हस्ताभ्यां कुर्यात्तस्य निपातनम् । गुणकार्पासमुञ्जानां भङ्गस्नाय्वर्कवर्मिणाम् ॥२ ॥
। तथा त्रिंशत्समं पाशं बुधः कुर्यत्सुवर्तितुम् ॥३ ॥
। वामहस्तेन संगृह्य दक्षिणेनोद्धरेत्ततः ॥४ ॥
1 । क्षिपेत्तूर्णमये तूर्णं पुरुषे चर्मवेष्टिते ॥ ५ ॥
। समयोगविधिं कृत्वा प्रयुञ्जीत सुशिक्षितम् ॥६ ॥
। कयां बद्ध्वा ततः खड्गं वामपार्खावलम्बितम् ॥७ ॥
। षडङ्गुलपरीणाहं सप्तहस्तसमुच्छ्रितम् ॥ ८ ॥
। अर्धहस्ते समे चैव तिर्यगूर्ध्वगतं तथा ॥ ९ ॥
। तूणचर्मावनद्धाङ्गं स्थापयित्वा नवं दृढम् ॥१० ॥
। उद्यम्य घातयेद्यस्य नाशस्तेन शिशोर्दृढम् ॥ ११ ॥
। अक्लेशेन ततः कुर्वन्वधे सिद्धिः प्रकीर्तिता ॥ वाहानां श्रमकरणं प्रचारार्थं पुरा तव ॥१२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये धनुर्वेदकथनं नामैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५१ ॥
पाश की लम्बाई दस फीट की होनी चाहिए । उसके किनारे पर एक छल्ला बना होना चाहिए । उसका एक किनारा हाथ में रहना चाहिए । छल्ले की रस्सियाँ सूत, मूँज, चमड़े या पशुओं की अंतड़ियों की बनी होनी चाहिए । पाश किसी अन्य वस्तु की डोरी का भी हो सकता है, जिसकी लम्बाई तीस हाथ की हो और जिसे तीन छल्लों के रूप में तह कर लिया गया हो । आचार्य को अपने शिष्य के शरीर के वाम भाग में पड़े हुए पाश को देखना चाहिए । उसके बाद बायें हाथ से पाश को पकड़कर दायें हाथ में ले लेना चाहिए । फिर सिर के ऊपर से घुमाते हुए उसे चमड़े के वेष्टन में रख लेना चाहिए । आचार्य को अपने शिष्य की परीक्षा दौड़ते हुए, चलते हुए या तेज चाल से चलते हुए घोड़े की पीठ में पाश को फेंकने में करनी चाहिए ॥२-६ ॥ खड्ग को कमर में बायीं ओर लटकाना चाहिए । बायें हाथ से दृढ़ता के साथ म्यान को पकड़कर दाहिने हाथ से खड्ग निकाल लेना चाहिए । कवच विविध प्रकार के हुआ करते हैं । लौहदण्ड की मोटाई छह अंगुल तथा लम्बाई सात हाथ होनी चाहिए । चमड़े के वेष्ठन से ढके हुए लगुड को दोनों हाथों से उठाकर और घुमाकर उसे शत्रु के सिर पर पटक देना चाहिए, जिससे उसकी मृत्यु हो जाय । या फिर उसे केवल दाहिने हाथ से ही उठाना चाहिए । गदा - युद्ध में एक ही बार में और एक ही प्रहार से शत्रु को मार डालने में विजय हुआ करती है । युद्ध में हाथों और भुजाओं के प्रयोग के विषय में पहले ही बताया जा चुका है ॥७-१२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में धनुर्वेद द - - व कथन नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त ॥ २५१ ॥
१ क. ङ. ' वेद्व्यासोवृ । २ क. ङ. र्ध्वमधस्तथा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA