अग्नि पुराण — पृष्ठ 771–780
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 771–780
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द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७६७ अथ द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः धनुर्वेदकथनम् अग्निरुवाच भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं प्लुतम् । संपातं ' समुदीशं च श्येनपातमथाऽऽकुलम् ॥१ ॥
उद्धूतमवधूतं च सव्यं दक्षिणमेव च । अनालक्षितविस्फोटौ करालेन्द्रमहासखौ ॥२ ॥
विकरालनिपातौ च विभीषणभयानकौ । समग्रार्धतृतीयांशपादपादार्धवारिजाः ॥३ ॥
प्रत्यालीढमथाऽऽलीढं वराहं लुलितं तथा । इति द्वात्रिंशतो ( त्का ) ज्ञेया (: ) खड्गचर्मविधौ ( धारणे ॥४ ॥
परावृत्तमपावृत्तं गृहीतं लघुसंज्ञितम् । ऊर्ध्वक्षिप्तमधः क्षिप्तं संधारितविधारितम् ॥५ ॥
श्येनपातं गजपातं ग्राहग्राह्यं तथैव च । एवमेकादश विधा ज्ञेयाः पाशविधारणे ॥ ६ ॥
ऋज्वायतं विशालं च तिर्यग्भ्रामितमेव च । पञ्चकर्म विनिर्दिष्टं व्यस्ते पाशे महात्मभिः ॥७ ॥
छेदनं भेदनं पातो भ्रमणं शमनं तथा । विकर्तनं कर्तनं च चक्रकर्मेदमेव च ॥८ ॥
आस्फोटः क्ष्वेडनं भेदस्त्रासान्दोलितकौ तथा । शूलकर्माणि जानीहि षष्ठमाघातसंज्ञितम् ॥९ ॥
दृष्टिघातं भुजाघातं पार्श्वघातं द्विजोत्तम । ऋजुपक्षेषुणापातं तोमरस्य प्रकीर्तितम् ॥१० ॥
आहतं विप्रगोमूत्रप्रभूतं कमलासनम् 1 । ततोर्ध्वगात्रं नमितं वामदक्षिणमेव च ॥ ११ ॥
अध्याय २५२ धनुर्वेद - कथन अग्निदेव बोले - ढाल और तलवार धारण करनेवाले योद्धा को वास्तविक युद्ध प्रारम्भ करने के पूर्व बत्तीस प्रकार की पैतरेबाजी करनी चाहिए । पैतरेबाजी के बत्तीस प्रकार ये हैं- भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत, सम्पात, समुदीश, श्येनपात, आकुल, उद्भूत, अवधूत, वाम, दक्षिण, अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख, विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्रवारिज, अर्धवारिज, तृतीयांशवारिज, पादवारिज, पादार्धवारिज, प्रत्यालीढ, आलीढ, वराह और लुलित ॥१-४ ॥ फन्दा डालने की दस विधियाँ हैं- परावृत्त, अपावृत्त, लघु, ऊर्ध्वक्षिप्त, अधः क्षिप्त, संधारित, विधारित, श्येनपात, गजपात और ग्राहग्राह्य । महापुरुषों ने फन्दा डालने की जिन पाँच विधियों को बतलाया है वे हैं-सीधा, आयत, विशाल, तिर्यग् और भ्रामित । चक्र के कर्म हैं - काटना, छेदना, गिराना, घुमाना और अलग कर देना । शूल के प्रयोग हैं- आस्फोट, क्ष्वेडन, भेदन, भास, आन्दोलित और आघात ॥५ - ९ ॥ अये द्विजश्रेष्ठ! तोमर का प्रयोग ( शत्रु के ) नेत्र, भुजा और पार्श्व काटने में करना चाहिए और उसका प्रतिकार सीधे पंखों से युक्त बाण से करना चाहिए । अये विप्र! आहत, गोमूत्रप्रभूत, कमलासन, ( शरीर के ) ऊर्ध्व, वाम और दक्षिण अङ्गों का नमन, १ ख. समुदीर्णं । २ छ. शयनं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७६८ अग्निपुराणम् आवृत्तं च परावृत्तं पादोद्धूतमवप्लुतम् । करालमवघातं च दंशोपप्लुतमेव च । ताडनं छेदनं विप्र तथा चूर्णनमेव च । संश्रान्तमथ विश्रान्तं गोविसर्गं सुदुर्धरम् 1 अन्त्यं मध्यं परावृत्तं निदेशान्तं द्विजोत्तम । हरणं छेदनं घातो ' भेदनं रक्षणं तथा । त्रासनं रक्षणं घातो बलोद्धरणमायतम् । सप्ताङ्गमवदंशश्च वराहोद्धतकं तथा । द्विहस्तबाहुपाशे च कटिरोचितकोद्गते करोद्भूतं विमानं च पादाहति विपादिकम् ऊर्ध्वप्रहारं घातं च गोमूत्रं सव्यदक्षिणे तिर्यग्बन्धमपामार्ग भौमवेगं सुदर्शनम् गदाकर्माणि जानीयान्नियुद्धस्याथ कर्म च ग्रीवाविपरिवर्तं च पृष्ठभङ्गं सुदारुणम् पादप्रहारमास्फोटं कटिरेचितकं तथा हंसमर्दं विमर्दं च गदाकर्म प्रकीर्तितम् ॥१२ ॥
क्षिप्तहस्तं स्थितं शून्यं परशोस्तु विनिर्दिशेत् ॥१३ ॥
मुद्गरस्य तु कर्माणि तथा प्लवनघातनम् ॥१४ ॥
। भिन्दिपालस्य कर्माणि लगुडस्य च तान्यपि ॥१५ ॥
वज्रस्यैतानि कर्माणि पट्टिशस्य च तान्यपि ॥१६ ॥
कृपाणकर्म निर्दिष्टं पातनं स्फोटनं तथा ॥ १७ ॥
क्षेपणीकर्म निर्दिष्टं यन्त्रकर्मैतदेव तु ॥ १८ ॥
हस्तावहस्तमालीनमेकहस्तावहस्तके ॥१९ ॥
। उरोललाटघाते च । गात्रसंश्लेषणं शान्तं । पारकं तारकं दण्डं । सिंहाक्रान्तं गजाक्रान्तं । आकर्षणं विकर्षं च । पर्यासनविपर्यासौ । गात्राश्लेषं स्कन्धगतं भुजाविधमनं तथा ॥२० ॥
तथा गात्रविपर्ययः ॥ २१ ॥
कबरीबन्धमाकुलम् ॥२२ ॥
गर्दभाक्रान्तमेव च ॥ २३ ॥
बाहूनां मूलमेव च ॥ २४ ॥
पशुमारमजाविकम् ॥२५ ॥
महीव्याजनमेव च ॥ २६ ॥
आवृत्त, परावृत्त, पादोद्धूत, अवप्लुत, हंसमर्द और विमर्द - ये सब गदा के कार्य बतलाये गये हैं ॥ १०-१२ ॥ फरसे का कार्य समझना चाहिए- कराल, अवघात, दंशोपप्लुत, क्षिप्रहस्त, स्थित और शून्य । अये विप्र! ताड़न, छेदन, चूर्णन तथा प्लवनघातन - ये मुद्गर के कर्म हैं । भिन्दिपाल के कर्म हैं - संश्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग और सुदुर्धर । यही सब काम लगुड के भी हैं ॥१३-१५ ॥ कृपाण के कार्य हरण, छेदन, वात, भेदन, रक्षण, पातन और स्फोटन बताये गये हैं । क्षेपणी ( नामक अस्त्र ) के यह कार्य बताये गये हैं - भयभीत करना, रक्षण, घात, बलोद्धरण और ( लड़ाई करती हुई सेना को ) फैलने में सहायता करना । यन्त्र का भी यही सब कार्य है । गदा के कार्य हैं - सप्तांश, अवदंश, सुअर के समान आक्रमण करना, गुत्थम - गुत्था, चिपटना, हाथ में हाथ डाल देना, दोनों हाथों से भुजापाश बनाना, कटि में चिपट जाना, वक्षःस्थल और मस्तक पर प्रहार करना, भुजा को तोड़ना, हाथ उठाकर विमान की आकृति बनाना, पैरों से प्रहार करना, पादहीन करना, अंगों में लिपट जाना, उन्हें शान्त कर देना, उन्हें मरोड़ देना, ऊपर की ओर प्रहार करना, हनन करना, ( सेना को ) गोमूत्र के रूप में तितर - बितर कर देना, ( सेना को ) दायें - बायें भगा देना, सेना को पार कर लेना, उसके बीच से निकल जाना, उसे दण्ड देना, उसे वेणी के रूप में कर देना, व्याकुल बना देना, तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन और सिंह, हाथी तथा गर्दभ की भाँति आक्रमण करना ॥१६-२३३ ॥ आकर्षण, विकर्षण, बाहुमूल, ग्रीवाविपरिवर्त, सुदारुण, पृष्ठभङ्ग पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक, पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्राश्लेष, स्कन्धगत, महीव्याजन, १ छ. ' तो बलोद्धरणमायतम् । कृ ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः उरोललाटघातं च विस्पष्टकरणं तथा गजस्कन्धमवक्षेपमपराङ्मुखमेव च यष्टिघातमवक्षेपो वसुधादारणं तथा विपृष्ठं सोदकं शुभ्रं भुजावेष्टितमेव च वराङ्कुशधरौ चोभावेको ग्रीवागतोऽपरः रथे रथे रणे चैव तुरंगाणां त्रयं भवेत् धन्विनो रक्षणार्थाय चर्मिणं तु नियोजयेत् यो युद्धे याति स जयेदरीन्संपालयेद्भुवम् ' इत्यादिमहापुराण आग्नेये धनुर्वेदकथनं ७६ ९ । उद्धूतमवधूतं च तिर्यङ्मार्गगतं तथा ॥ २७ ॥
। देवमार्गमधोमार्गममार्गगमनाकुलम् ॥२८ ॥
। जानुबन्धं भुजाबन्धं गात्रबन्धं सुदारुणम् ॥२९ ॥
। संनद्धैः संयुगे भाव्यं सशस्त्रैस्तैर्गजादिभिः ॥३० ॥
। स्कन्धगौ द्वौ च धानुष्कौ द्वौ च खड्गधरौ गजे ॥३१ ॥
। धानुष्काणां त्रयं प्रोक्तं रक्षार्थे तुरगस्य च ॥३२ ॥
। स्वमन्त्रैः शस्त्रमभ्यर्च्य शास्त्रं त्रैलोक्यमोहनम् ॥ ॥३३ ॥
नाम द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५२ ॥
अथ त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः व्यवहारकथनम् अग्निरुवाच व्यवहारं प्रवक्ष्यामि नयानयविवेकदम् । स चतुष्पाच्चतुःस्थानश्चतुःसाधन उच्यते ॥ १ ॥
उरोललाटघात, विस्पष्टकरण, उद्धूत, अवधूत, तिर्यङ्मार्गगत, गजस्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग, अधोमार्ग, अमार्गगमनाकुल, यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधादारण, जानुबन्ध, सुदारुण, गात्रबन्ध, भुजाबन्ध, विपृष्ठ, सोदक, शुभ्र तथा भुजावेष्टित ॥२४-२९ ३ ॥ युद्ध में कवच धारण करके, अस्त्र - शस्त्र से सम्पन्न हो, हाथी आदि वाहनों पर चढ़कर उपस्थित होना चाहिए । हाथी पर उत्तम अङ्कुश धारण किये दो महावत या चालक रहने चाहिए । उनमें से एक तो हाथी की गर्दन पर सवार हो और दूसरा उसके कंधे पर । इनके अतिरिक्त सवारों में दो धनुर्धर होने चाहिए और दो खड्गधारी । प्रत्येक रथ और हाथी की रक्षा के लिए तीन - तीन धनुर्धर पैदल सैनिक रहने चाहिए । धनुर्धर की रक्षा के लिए चर्म या ढाल लिये रहनेवाले योद्धा की नियुक्ति करनी चाहिए । जो प्रत्येक शस्त्र का उसके अपने मन्त्रों से पूजन करके ' त्रैलोक्यमोहन कवच ' पाठ करने के अनन्तर युद्ध में जाता है, वह शत्रुओं पर विजय पाता है और भूतल की रक्षा करता है ॥३०-३३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में धनुर्वेद - कथन नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥२५२ ॥
अध्याय २५३ व्यवहार - कथन अग्निदेव बोले - अब मैं व्यवहार का वर्णन करूँगा जिससे नीति - अनीति का विवेक हुआ करता है । व्यवहार को चार पादोंवाला, चार स्थानोंवाला और चार साधनोंवाला कहा जाता है ॥ १॥ वह चार ( वर्गों ) की हितकारी, चार
१ क. ख. ङ. ' पातयेद्ध्रुव ' । ४ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७७० अग्निपुराणम् चतुर्हितश्चतुर्व्यापी चतुष्कारी च कीर्त्यते । त्रियोनिर्दव्यभियोगश्च द्विदारो द्विगतिस्तथा । चतुष्पाद्व्यवहाराणामुत्तरः पूर्वसाधकः । चरित्रे संग्रहे पुंसां राजाज्ञायां तु शासनम् । चतुर्णामाश्रमाणां च रक्षणात्स चतुर्हितः । व्याप्नोति पादशो यस्माच्चतुर्व्यापी ततः स्मृतः । चतुर्णा करणादेष चतुष्कारी प्रकीर्तितः । हिरण्यमग्निरुदकमष्टाङ्ग समुदाहृतः । त्रियोनिः कीर्त्यते तेन त्रयमेतद्विवादकृत् । शङ्कासद्भिस्तु संसर्गात्तत्त्वं षोडाभिदर्शनात् । पूर्ववादस्तयोः पक्षः प्रतिपक्षस्त्वनन्तरः ऋणं देयमदेयं च येन यत्र यथा च यत्
स्वद्रव्यं यत्र विश्रम्भान्निक्षिपत्यविशङ्कितः ।
' अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः शतशाखस्तथैव च ॥२ ॥
धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम् ॥३ ॥
` तत्र ' सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु ॥४ ॥
सामा ( ' द्युपायसाध्यत्वाच्चतुः साधन उच्यते ॥ ५ ॥
कर्तारं साक्षिणश्चैव सभ्या ) राजानमेव च ॥६ ॥
धर्मस्यार्थस्य यशसो लोकपङ्क्तेस्तथैव च ॥ ७ ॥
राजा सपुरुषः सभ्याः शास्त्रं गणकलेखक ॥ ८ ॥
६ ( कामात्क्रोधाच्च लोभाच्च त्रिभ्यो यस्मात्प्रवर्तते ॥९ ॥
द्व्यभियोगस्तु विज्ञेयः शङ्कातत्त्वाभियोगतः ॥ १० ॥
पक्षद्वयाभिसम्बन्धाद्विद्वारः समुदाहृतः ) ॥११ ॥
। भूतश्छलानुसारित्वाद्विगतिः समुदाहृतः ॥१२ ॥
। दानग्रहणधर्मश्च ऋणादानमिति स्मृतम् ॥१३ ॥
निक्षेपं नाम तत्प्रोक्तं व्यवहारपदं बुधैः ॥१४ ॥
( पक्षों ) में व्याप्त और चार प्रकार से कल्याणकारी होता है । वह आठ अंगोंवाला, अठारह पदोंवाला, सौ शाखाओंवाला, तीन उद्गमोंवाला, दो अभियोगोंवाला, दो द्वारोंवाला तथा दो गतियोंवाला हुआ करता है । व्यवहार के चार पाद होते हैं-धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन । इनमें से बादवाला अपने पूर्ववर्ती का साधक हुआ करता है । धर्म सत्य में स्थित रहता है, व्यवहार साक्षियों में विहित रहता है, चरित्र जन - समुदाय में स्थित रहता है और साधन राजाज्ञा में विद्यमान रहता है ॥२-५ ॥ व्यवहार को चतुःसाधन इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह साम आदि उपायों के द्वारा साध्य हुआ करता है । चार आश्रमों की रक्षा करने के कारण उसे ' चतुर्हित ' कहा जाता है । उसे ' चतुर्व्यापी ' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह वादी, साक्षी, सभासद और राजा - इन चारों में व्याप्त रहता है । धर्म, अर्थ, यश और लोकव्यवहार को प्रभावित करने के कारण उसे चतुष्कारी कहा जाता है ॥६-७३ ॥ उसे अष्टज इसलिए कहा जाता है क्योंकि ( व्यवहार - निर्णय में ) जिन आठ व्यक्तियों की आवश्यकता होती है वे हैं - राजपुरुष के साथ राजा, सभासद, शास्त्र, गणक, लेखक, सोना, अग्नि और जल । उसे ‘ त्रियोनि ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति काम, क्रोध और लोभ से होती है । इन तीनों के विवाद को उत्पन्न करनेवाला त्रियोनि कहा जाता है । शङ्कित और वास्तविक अभियोगों के कारण वह ' द्व्यभियोग ' कहलाता है । शङ्का और तत्त्व इन दोनों के छह - छह भेद किये गये हैं । उसे ' द्विद्वार ' इसलिए कहा गया है कि उसमें दो पक्ष ( पक्ष और विपक्ष ) हुआ करते हैं ॥८-११ ॥ ( पक्ष और विपक्ष में ) जो पहले ( राजभाषा में ) कुछ कहता है उसे वादी और बाद में बोलनेवाले को प्रतिवादी कहते हैं । व्यवहार को ' द्विगति ' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसमें कुछ बातें सत्य और कुछ असत्य हुआ करती हैं । ऋणादान के अन्तर्गत आनेवाला ऋण वह है जो देय हो या अदेय हो, जो दान में दिया गया हो अथवा किसी धार्मिक कृत्य के लिए दिया गया हो । जब कोई व्यक्ति अपने विश्वास के कारण निःशङ्क होकर अपना धन किसी के पास धरोहर के रूप में रख देता है तब उसे बुद्धिमान् लोग ' निक्षेप ' कहा करते हैं ॥१२-१४ ॥ जब १ क. ' ष्टांशौऽष्टा । २ छ. द्विहारो । ३ क. त्र संवेष्टितो । ४ च. सभ्योत्थितो । ५ ' द्युपायसाध्यत्वा सभ्या ' क. ङ. च. पुस्तकेषु CC नास्ति - 0. JK । Sanskrit ६ कामात्कोधात Academy, Jammma समुदाहृतः . Digitized च, by पुस्तके s नास्ति USA
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त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७७१ वणिक्प्रभृतयो यत्र कर्म संभूय कुर्वते दत्त्वा द्रव्यं च सम्यग्यः पुनरादातुमिच्छति ' अभ्युपेत्य च शुश्रूषां यस्तां न प्रतिपद्यते ( ' भृत्यानां वेतनस्योक्तो ' दानादानविधिश्च यः निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वाऽपहृत्य वा विक्रीय ( " पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यच्च न दीयते क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं क्रेता न बहु मन्यते पाषण्डनैगमादीनां स्थितिः समय उच्यते सेतुकेदारमर्यादा विकृष्टाकृष्टनिश्चयाः वैवाहिको विधिः स्त्रीणां यत्र पुंसां च कीर्त्यते ) विभागोऽर्थस्य ' पैत्रस्य पुत्रैर्यस्तु प्रकल्प्यते सहसा क्रियते कर्म यत्किंचिद्बलदर्पितैः ' देशजातिकुलादीनामाक्रोशाद्व्यङ्गसंयुतम् बनिये इत्यादि एक साथ मिलकर कोई ( व्यावसायिक । तत्सम्भूय समुत्थानं व्यवहारपदं विदुः ॥ १५ ॥
। दत्ता प्रदानिकं नाम तद्विवादपदं स्मृतम् ॥१६ ॥
। अशुश्रूषामुपेत्यैतद्विवादपदमुच्यते ॥१७ ॥
। वेतनस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम् ॥१८ ॥
। विक्रीयते परोक्षं यत्स ज्ञेयोऽस्वाभिविक्रि ( क्र ) यः ॥१९ ॥
। विक्रीयासम्प्रदानं तद्विवादपदमुच्यते ) ॥२० ॥
। ' कृत्वा मूल्यं तु यः पण्यं दुष्क्रीतं मन्यते क्रयी ॥२१ ॥
। समयस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम् ॥२२ ॥
। क्षेत्राधिकारे यत्र स्युर्विवादः क्षेत्रजस्तु सः ॥२३ ॥
। स्त्रीपुंसयोगसंज्ञं तु तद्विवादपदं स्मृतम् ॥२४ ॥
। दायभागमिति प्रोक्तं तद्विवादपदं बुधैः ॥ २५ ॥
। तस्साहसमिति प्रोक्तं विवादपदमुच्यते ॥२६ ॥
। यद्वचः प्रतिकूलार्थं वाक्पारुष्यं तदुच्यते ॥ २७ ॥
) कर्म करते हैं, तब उसे सम्भूयसमुत्थान नामक विवाद कहा जाता है । सम्यक् प्रकार से किसी द्रव्य को दान कर देने के पश्चात् जब दान देनेवाला पुनः उसे प्राप्त करने की इच्छा करता है, तब उसे दत्ताप्रदानिक नामक विवाद कहा जाता है । सेवा करने की प्रतिज्ञा करके भी जो व्यक्ति सेवा नहीं करता है, उसे सेवा न करने का विवाद कहते हैं ॥ १५-१७ ॥ सेवकों के वेतन को न देने की जो विधि है, उसे वेतनादान नामक विवाद कहते हैं । दूसरे की धरोहर को अथवा दूसरे के खोये हुए धन को प्राप्त करके या उसे चुराकर बेचनेवाले को अस्वामिविक्रयी कहते हैं । मूल्य लेकर किसी वस्तु को बेच देने के बाद भी जब वह वस्तु खरीदार को नहीं दी जाती है तब उसे विक्रीयासम्प्रदान नामक विवाद कहते हैं ॥ १८-२० ॥ मूल्य चुराकर किसी वस्तु को बेचनेवाला व्यक्ति उसके मूल्य को वस्तु के अनुरूप जब नहीं समझता है, तब भी विवाद उठ खड़ा होता है । पाखण्डी अथवा दुराचारी लोगों के द्वारा सद्व्यवहार के लिए की गयी प्रतिज्ञा को ' समय ' कहते हैं । इस ' समय ' को तोड़ना भी विवाद का कारण बनता है । खेतों के अधिकार के सम्बन्ध में तथा पुल, चरागाह और सीमा को प्राप्त करने या अपने में मिला लेने के सम्बन्ध में जो विवाद होते हैं, उन्हें ' क्षेत्रज ' कहा जाता है । जहाँ पर स्त्रियों तथा पुरुषों के विवाह की विधि बतायी जाती है, उसे ‘ स्त्रीपुंसयोग ' नामक विवाद कहते हैं ॥२१-२४ ॥ पैतृक सम्पत्ति के विषय में पुत्रों में जो विवाद उत्पन्न हो जाता है, उसे बुद्धिमान् लोग दायभाग - विवाद कहते हैं । बल के दर्प के कारण जो कार्य सहसा ( बिना विचार किये हुए ) कर डाला जाता है, उसे साहस कहते हैं और वह भी विवाद का कारण बन जाता है । आक्रोशवश ( किसी के ) देश, जाति और कुल आदि के प्रतिकूल जिन वचनों का प्रयोग किया जाता है, उसे ' वाक्पारुष्य ' कहते हैं ॥२५-२७ ॥ हाथ, पैर, १ ग. समुत्पत्य । २ भृत्यानां मुच्यते क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ ख. ग. छ. ' स्योक्त ' दा ' । ४ ख. ग. छ. धिक्रिया । बे ' । ५ पण्यं “ मुच्यते च. पुस्तके नास्ति । ६ छ. क्रीत्वा । ७ क. ङ. " परं स्मृ ' । ८ क. ङ. ' स्य योगस्तु पु ' । ९ क. ङ. ' शकालक्रमादी " । १० ख. ग. च. छ. क्रोशत्यङ्ग । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ७७२ परगात्रेष्वभिद्रोहो ' हस्तपादायुधादिभिः । अक्षवज्रशलाकाद्यैर्देवनं द्यूतमुच्यते । प्रकीर्णकः पुनर्ज्ञेयो व्यवहारो निराश्रयः । व्यवहारो ' दशपदस्तेषां भेदोऽथ वै शतम् 1 । व्यवहारान्नृपः पश्येज्ज्ञानिविप्रैरकोपनः । अपश्यता कार्यवशात्सभ्यैर्विप्रं नियोजयेत् । सभ्याः पृथक्पृथग्दण्ड्या ' विवादाद्द्द्विगुणो दमः । आवेदयति यद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत् । समामासतदर्धाहर्नामजात्यादिचिह्नितम् । ततोऽर्थी लेखयेत्सद्यः प्रतिज्ञातार्थसाधनम् । चतुष्पाद्व्यवहारोऽयं विवादेषूपदर्शितः अस्त्र, शस्त्र अथवा अग्नि आदि घातक साधनों के द्वारा कहते हैं । पासे, वज्र और शलाकाओं से जुआ खेलने को कहलाती है । इसके अतिरिक्त जो विवाद किसी कोटि में हैं - राजाज्ञा का उल्लंघन और उस ( राजा ) के कर्म को अग्न्यादिभिश्चोपघातैर्दण्डपारुष्यमुच्यते ॥२८ ॥
पशुक्रीडावयोभिश्च प्राणिद्यूतं समादिशेत् ॥२९ ॥
राज्ञामाज्ञाप्रतीघातस्तत्कर्माकरणं तथा ॥३० ॥
क्रियाभेदान्मनुष्याणां शतशाखो निगद्यते ॥ ३१ ॥
शत्रुमित्रसमाः सभ्या अलोमाः श्रुतिवेदिनः ॥ ३२ ॥
रागाल्लोभाद्भयाद्वाऽपि श्रुत्यपेतादिकारिणः ॥३३ ॥
स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाधर्षितः परैः ॥३४ ॥
' प्रत्यर्थिनोऽग्रतो लेख्यं यथावेदितमर्थिना ॥३५ ॥
' श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यं पूर्वावेदकसंनिधौ ॥ ३६ ॥
तत्सिद्धौ सिद्धिमाप्नोति विपरीतमतोऽन्यथा ॥३७ ॥
। अभियोगमनिस्तीर्य नैनं प्रत्यभियोजयेत् ॥ ३८ ॥
दूसरे के अङ्गों के प्रति जो अपराध किया जाता है, उसे ‘ दण्डपारुष्य ’ द्यूत कहते हैं । पशुक्रीड़ा या पक्षियों से की जानेवाली क्रीड़ा ' प्राणिद्यूत ’ नहीं आता है उसे प्रकीर्णक व्यवहार कहते हैं । उसके अन्तर्गत आते न करना । व्यवहार के दस अङ्ग होते हैं, उसके सौ भेद होते हैं और मनुष्यों के कार्यों के भेद से वह सौ भेदोंवाला कहा जाता है ॥२८-३१ ॥ राजा को ज्ञानवान् ब्राह्मणों के साथ मिलकर बिना क्रोध किये विवादों का निपटारा करना चाहिए । उसके सभासदों को ऐसा होना चाहिए जो शत्रु मित्र को समान समझते हों, लोभरहित हों, वेदों के ज्ञाता हों । कार्यवश यदि कोई राजा अपने सभासदों के साथ विवादों का निपटारा न कर सके तो उसे इसके लिए किसी ब्राह्मण की नियुक्ति कर देनी चाहिए । राग, लोभ और भय के कारण वेदादि के विरुद्ध कार्य करनेवाले सभासद अलग - अलग दण्ड के भागी हुआ करते हैं । दूसरों के द्वारा बिना दबाव डाले हुए ही जो सभासद स्मृति और आचार के विरुद्ध मार्ग को अपनाता है, उसे विवाद के दुगुने दण्ड का भागी बनना पड़ता है ॥३२-३४ ॥ ( अर्थी या वादी ) राजा से जो कुछ निवेदन करता है वही व्यवहार का विषय बन जाता है । वादी जो कुछ ( मौखिक रूप से ) निवेदन करता है उसे प्रत्यर्थी ( अथवा प्रतिवादी ) के सामने लिखवा लेना चाहिए । उसे लेख में वर्ष, मास, पक्ष, दिन, ( वादी का ) नाम और उसकी जाति का भी उल्लेख होना चाहिए । वादी के लेख का उत्तर उसी के सामने प्रतिवादी से लिखवा लेना चाहिए । तदनन्तर वादी को अपने कथन को सिद्ध करने के लिए ( अन्य ) साधनों का उल्लेख करवाना चाहिए । उन साधनों की पुष्टि से वाद सिद्ध माना जाता है, अन्यथा असिद्ध हो जाता है । इस प्रकार विवादों में ( उपर्युक्त ) चार प्रकार का व्यवहार बताया गया है । प्रथम अभियोग का निर्णय किये बिना ( प्रतिवादी के द्वारा वादी के विरुद्ध ) अभियोग की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए ॥३५-३८ ॥ १ क. ङ. ‘ पादमुखादि ' । २ ख. ग. च. छ. ' द्यूतसमाह्वयः । प्र ' । ३ ख. ग. छ. ' रोऽष्टाद ' । ४ ख. ग. छ. ॰पि स्मृत्य ’ । ५ क. ख. ग. ङ. ' गुणं दमम् । स्मृ । ६ छ. गर्गेण ध । ७ क. ख. ग. ङ. च. ' र्थितोऽग्र ' । ८ ङ. च. ° र्थ स्यान्तरं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७७३ अभियुक्तं च नान्येन त्यक्तं विप्रकृतिं नयेत् उभयोः प्रतिभूर्गाह्यः समर्थः काम्यनिर्णये मिथ्याभियोगाद्विगुणमभियोगाद्धनं हरेत् विचारयेत्सद्य एव कालोऽन्यत्रेच्छया स्मृतः । ललाटं स्विद्यते चास्य मुखवैवर्ण्यमेव च । अभियोगेऽथवा साक्ष्ये वाग्दुष्टः परिकीर्तितः । न चाऽऽहूतो वदेत्किञ्चिद्दीनो ' दण्ड्यश्च स स्मृतः । पूर्वपक्षेऽधरीभूते भवन्त्युत्तरवादिनः । ' दण्डं पणं वसुं चैव धनिनो धनमेव च । " भूतमप्यनुपन्यस्तं ' हीयते व्यवहारतः । दाप्यः सर्वोनृपेणार्थो न ग्राह्यस्त्वनिवेदितः ॥ कुर्यात्प्रत्यभियोगं तु कलहे साहसेषु च ॥ ३ ९ ॥ । निह्नवे भावितो दद्याद्धनं राज्ञे तु तत्समम् ॥४० ॥
। ` साहसस्तेयपारुष्येष्वभिशापात्यये स्त्रियाः ॥४१ ॥
( देशाद्देशान्तरं याति सृक्किणी परिलेढि च ॥४२ ॥
स्वभावाद्विकृतं गच्छेन्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥४३ ॥
संदिग्धार्थं स्वतन्त्रो यः साधयेद्यश्च निष्पतेत् ॥ ४४ ॥
साक्षिषूभयतः सत्सु ) साक्षिणः पूर्ववादिनः ॥ ४५ ॥
` सपणश्चेद्विवादः स्यात्तत्र हीनं तु दापयेत् ॥४६ ॥
छलं निरस्य दूतेन व्यवहारान्नयेन्नृपः ॥४७ ॥
` निनुते निखिला ( ता? ) नेकमेकदेशविभावितम् ॥४८ ॥
स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारतः ॥४९ ॥
अन्य ( अधिकारी ) के द्वारा निर्णीत अभियोग को पुन: ( विचारार्थ ) नहीं ग्रहण करना चाहिए । किन्तु कलह और साहस ( के अभियोगों ) में प्रत्यभियोग स्वीकार कर लेना चाहिए । दोनों पक्षों के द्वारा ऐसे प्रतिभू ( जमानत करनेवाले ) को स्वीकार कर लेना चाहिए जो वांछित निर्णय में समर्थ हो । ( वादी अथवा प्रतिवादी में ) किसी एक के लुप्त हो जाने पर प्रतिभू से ( अभियोग के ) बराबर धन राजा को दिलवाना चाहिए । मिथ्या अभियोग लगानेवाले को अभियोग के दुगुने दण्ड का भागी बनना पड़ता है ॥३९ -४०३ ॥ साहस, चोरी ( वाक् अथवा दण्ड ), पारुष्य, अभिशाप और स्त्रियों के साथ भागने के अभियोगों पर तुरन्त ही विचार करना चाहिए, अन्य प्रकार के अभियोगों में इच्छानुसार ( अभियोगों के निर्णय का ) काल निर्धारित किया जा सकता है । वह अभियोग लगानेवाला या साक्षी देनेवाला वाग्दुष्ट कहा जा सकता है जो ( राजा के द्वारा बुलाये जाने पर ) एक स्थान से दूसरे स्थान को भाग जाता है, होंठ चाटता है, जिसके मस्तक से पसीना आने लगता है, मुँह पीला पड़ जाता है और जो मन, वचन और कर्म से अस्वाभाविक चेष्टाएँ करता है, जो अपने - आप ही ( बिना पूछे हुए ) कुछ सिद्ध करने लगता है, संदिग्ध बातें करता है, ( बुलाने पर ) भाग जाता है या बुलाये जाने पर ( आकर भी ) कुछ बोलता नहीं वह साक्षी दण्डनीय कहा गया है ॥४१-४४३ ॥ ( वादी और प्रतिवादी ) दोनों ओर से साक्षियों को प्रस्तुत किये जाने पर पहले वादी के साक्षियों को सुनना चाहिए । पूर्वपक्ष निश्चित हो जाने के बाद ही उत्तर पक्ष ( प्रतिवादी ) के साक्षियों को सुनना चाहिए । यदि विवाद धन के सम्बन्ध में हो तो ( वादी और प्रतिवादी ) जो हीन हो, उससे धन दिलवाना चाहिए । जुए में दाँव पर लगायी हुई प्रत्येक वस्तु की चाहे वह धन हो, मणियाँ हों या धनिक की सम्पूर्ण सम्पत्ति ही हो, राजा के व्यवहार का विषय बना लेना चाहिए । इस प्रकार व्यवहार का विषय बनायी हुई सम्पूर्ण सम्पत्ति ( उसके अधिकारी को ) दिलवा देनी चाहिए, किन्तु जब तक वह ( वस्तु किसी पक्ष के द्वारा ) राजा को दे न दी जाय तब तक राजा को उसे अपने अधिकार में नहीं कर लेना चाहिए । दो स्मृति - ग्रन्थों में परस्पर विरोध होने पर न्याय, व्यवहार से बलवान् माना गया है ॥४५-४९ ॥ स्थिति यह १ क. ङ. च. भार्गवे । २ क. ख. ग. ङ. च. ' रुष्यगोभि । ३ देशाद् " सत्सु च. पुस्तके नास्ति । ४ छ. ' चिद्धनी द ' । ५ छ. सगण । ६ छ. दत्तं । ७ छ, ' प्यर्थमप्यस्तं । ८ क. ङ. दीयते । ९ छ. ' ते निखि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७७४ अग्निपुराणम् अर्थशास्त्राद्धि बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः । एषामन्यतमाभावे दिव्यान्यतममुच्यते । आधौ प्रतिग्रहे क्रीते पूर्वा तु बलवत्तरा । परेण भुज्यमानाया धनस्य दशवार्षिकी । तथोपनिधिराजस्त्रीश्रोत्रियाणां धनैरपि । दण्डं च तत्समं राज्ञे शक्त्यपेक्ष्यमथापि वा । आगमोऽपि बलं नैव भुक्तिस्तोकाऽपि यत्र न । अविशुद्धागमो भोगः प्रामाण्यं नाधिगच्छति । न तत्सुतस्तत्सुतो वा भुक्तिस्तत्र गरीयसी । न तत्र कारणं भुक्तिरागमेन विना कृता । स्त्रीनक्तमन्तरागारबहिःशत्रुकृतस्तथा । है कि धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र से अधिक बलवान् माना प्रमाणं लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्तितम् ॥५० ॥
सर्वेष्वेव विवादेषु बलवत्युत्तरा क्रिया ॥ ५१ ॥
पश्यतो ब्रुवतो भूमेर्हानिर्विंशतिवार्षिकी ॥५२ ॥
अधिसीमोपनिःक्षेपजडबालधनैर्विना ॥५३ ॥
आध्यादीनां विहर्तारं धनिने दापयेद्धनम् ॥५४ ॥
आगमोऽप्यधिको भुक्तिं विना पूर्वक्रमागताम् ॥ ५५ ॥
आगमेन विशुद्धेन भोगो याति प्रमाणताम् ॥५६ ॥
( ' आगमस्तु कृतो येन सोऽभियुक्तस्तमुद्धरेत् ॥५७ ॥
योऽभियुक्तः परेतः स्यात्तस्य ऋक्थात्तमुद्धरेत् ॥५८ ॥
बलोपाधिविनिर्वृत्तान्व्यवहारान्निवर्तयेत् ॥५९ ॥
मत्तोन्मत्तार्तव्यसनिबालभीतप्रयोजितः " ॥६० ॥
गया है । प्रमाण तीन माने गये हैं - लेख, भोग और साक्षी । इनमें से किसी एक के अभाव में दिव्य प्रमाण ( सौगन्ध आदि ) को मान्यता दी गयी है । सभी प्रकार के विवादों में बाद में होनेवाले कार्य अधिक बलशाली हुआ करते हैं, किन्तु अधिदान और क्रय - विक्रय में पहले का कार्य अधिक बलवान् हुआ करता है । ( स्वामी के ) देखते - देखते और बातचीत करते हुए ( यदि कोई व्यक्ति उसकी भूमि के ऊपर अधिकार कर ले तो ) बीस वर्ष में भूमि से उसके स्वामी का अधिकार समाप्त हो जाता है । दूसरों के द्वारा उपभोग किये जानेवाले धन से दस वर्षों में ही अधिकार समाप्त हो जाता है । किन्तु सीमा, आधि, धरोहर, मूर्ख, बालक, राजा, स्त्री और श्रोत्रिय, ब्राह्मणों के धन के सम्बन्ध में यह नियम नहीं होता । आधि इत्यादि को हड़प कर लेनेवाले से उसके स्वामी को आधि की वस्तु दिलवानी चाहिए ॥५०-५४ ॥ उसके बराबर अथवा ( आधि इत्यादि को हड़प करनेवाली की ) शक्ति के अनुरूप दण्ड ( का धन ) राजा को दिलवाना चाहिए । पूर्व परम्परा से प्राप्त भोग के बिना भी आगम ( अधिकार ) मान्य हुआ करता है, किन्तु जहाँ लेशमात्र भी निर्विघ्न भोग न हो वहाँ ( केवल ) अधिकार में बल नहीं रहता । विशुद्ध अधिकार से भोग भी प्रमाणित हो जाता है, किन्तु अविशुद्ध ( विघ्नयुक्त ) अधिकार से भोग प्रमाणित नहीं हुआ करता है । जिस व्यक्ति ने किसी वस्तु पर ( अनुचित ) अधिकार कर लिया हो, उसी के अधिकार को समाप्त कर देना चाहिए । ( इस प्रकार अनुचित ढंग से अधिकार करनेवाले ) उसके पुत्र अथवा पौत्र के अधिकार को नहीं छीना जा सकता है क्योंकि वहाँ तो भोग ही बलवान् हो जायगा । ( अनुचित ढंग से अधिकार करनेवाले ) अभियुक्त की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारी से अनुचित अधिकार को समाप्त करवा देना चाहिए ॥५५-५८ ॥ ऐसी स्थिति में भोग भी प्रमाणित नहीं हुआ करता है, क्योंकि वह अधिकार से रहित है । बल तथा अधिकार से किये गये व्यवहारों को समाप्त कर देना चाहिए । वह व्यवहार - सिद्ध नहीं हुआ करता है जो स्त्री, शत्रु, मत्त, उन्मत्त, रोगी, दुःखी, बालक और भयभीत के साथ किया १ आगमस्तु जनपदाय तु च. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. निबलमन्त्रप्र ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७७५
असंबद्धकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति । प्रनष्टाधिशतं देयं नृपेण धनिने धनम् ॥ ६१ ॥
विभावयन्न चेल्लिङ्गैस्तत्समं ' दातुमर्हति । देयं चौरहृतं द्रव्यं राज्ञा जनपदाय तु ) ॥६२ ॥
अशीतिभागो वृद्धिः स्यान्मासि मासि सम्बन्धके । वर्णक्रमाच्छतं द्वित्रिचतुष्पञ्चकमन्यथा ॥ ६३ ॥
सप्ततिस्तु पशुस्त्रीणां रसस्याष्टगुणा परा । वस्त्रधान्यहिरण्यानां चतुस्त्रिद्विगुणा तथा ॥ ६४ ॥
ग्रामान्तरात्तु दशकं सामुद्रादपि विंशतिम् । दद्युर्वा स्वकृतां वृद्धिं सर्वे सर्वासु जातिषु ॥६५ ॥
" प्रपन्नं साधयन्नर्थं न वाच्यो नृपतिर्भवेत् । साध्यमानो नृपं गच्छेद्दण्ड्यो दाप्यश्च तद्धनम् ' ॥६६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये व्यवहारकथनं नाम त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२५३ ॥
अथ चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः व्यवहारकथनम् अग्निरुवाच गृहीतार्थः क्रमाद्दाप्यो धनिनामधमर्णिकः । दत्त्वा तु ब्राह्मणायाऽऽदौ नृपतेस्तदनन्तरम् ॥१ ॥
जाता है । रात्रि में, घर के अन्दर और बाहर तथा असम्बद्ध व्यक्तियों से किया गया व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता है । आधि के नष्ट हो जाने पर राजा के द्वारा धनिक को सौ गुना धन दिलाना चाहिए । यदि उन्हीं विशेषताओं से युक्त आधि को प्राप्त कर सकना असम्भव हो तो आधि के समान वस्तु ( उसके स्वामी को ) दिलवाना चाहिए । राजा को चोरों द्वारा चुराया गया धन ( सम्पूर्ण ) जनपद को दे देना चाहिए ॥५९ -६२ ॥ बन्धक के साथ किये गये ऋण पर ( सौ का ) अस्सीवाँ भाग प्रतिमास ( ब्याज के रूप में ) वृद्धि होगी, अन्यथा ( बन्धकरहित ऋण पर ) वर्णक्रम के क्रमशः दो, तीन, चार और पाँच प्रतिशत वृद्धि होगी । पशुओं और स्त्रियों पर सत्तरवाँ भाग वृद्धि होगी । रसों पर आठ गुनी और वस्त्र, धान्य तथा सोने पर क्रमशः उसकी चार गुनी, तीन गुनी या दो गुनी वृद्धि होगी । अन्य ग्राम में रहनेवाले ऋणकर्त्ता को दिये गये ऋण पर दस प्रतिशत तथा सामुद्रिक यात्रा पर जानेवाले व्यक्ति को दिये गये ऋण पर बीस प्रतिशत वृद्धि होगी । अथवा सभी वर्णों के सभी लोगों को परस्पर निर्धारित ब्याज देना चाहिए । विपत्तिग्रस्त को ( ऋण रूप में ) धन देनेवाला राजा निन्दनीय नहीं होता है । ( निर्धारित दर से ) अधिक ब्याज लेनेवाला राजा के द्वारा दण्डनीय हुआ करता है और उसका धन राजा ले लिया करता है ॥६३-६६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में व्यवहारकथन नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय समाप्त ॥२५३ ॥
अध्याय २५४ व्यवहारकथन अग्निदेव बोले - ऋण लेनेवाले व्यक्ति से ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ऋण देनेवालों को ) क्रमशः ऋण १ क. ख. ग. ङ. ` मं दणुम । २ क. ङ. ' पदस्य तु । ३ च. सवर्णके । ४ च. प्रसन्नं । ५ अत्र क. ङ. पुस्तकयोः
श्लोकार्धमधिकं तद्यथा -- " अनेन विधिना राज्ञा व्यवहारो न सिध्यति " इति ।
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७७६ अग्निपुराणम् राज्ञाऽधमर्णिको दाप्यः साधिताद्दशकं स्मृतम् । हीनजातिं परिक्षीणमृणार्थं कर्म कारयेत् । दीयमानं न गृह्णाति प्रयुक्तं यः स्वकं धनम् । ऋक्थग्राह ऋणं दाप्यो योषिद्ग्राहस्तथैव च । अविभक्तैः कुटुम्बार्थं यदृणं तु कृतं भवेत् । न योषित्पतिपुत्राभ्यां न पुत्रेण कृतं पिता । गोपशौण्डिशकैलूषरजकव्याधयोषिताम् । प्रतिपन्नं स्त्रिया देयं पत्या वा सह यत्कृतम् । पितरि प्रोषिते प्रेते व्यसनाभिप्लुतेऽथ वा ।
सुराकामद्यूतकृतं दण्डशुल्कावशिष्टकम् ।
पञ्चकं तु शतं दाप्यः प्राप्तार्थो ह्युत्तमर्णिकः ॥२ ॥
ब्राह्मणस्तु परिक्षीणः शनैर्दाप्यो यथोदयम् ॥३ ॥
मध्यस्थस्थापितं तत्स्याद्वर्धते न ततः परम् ॥ ४ ॥
पुत्रोऽनन्याश्रितद्रव्यः पुत्रहीनस्य ऋक्थिनः ॥५ ॥
दद्युस्तदृक्थिनः प्रेते प्रोषिते व कुटुम्बिनि ॥६ ॥
दद्यादृते कुटुम्बार्थान्न पतिः स्त्रीकृतं तथा ॥ ७ ॥
ऋणं दद्यात्पतिस्त्वासां यस्माद्वृत्तिस्तदाश्रया ॥ ८ ॥
स्वयं कृतं वा यदृणं ( ' नान्यस्त्री ( त्स्त्री ) दातुमर्हति ॥९ ॥
पुत्रपौत्रैर्ऋऋणं देयं ) निह्नवे साक्षिभावितम् ॥ १० ॥
वृथाऽऽदानं तथैवेह पुत्रो दद्यान्न पैतृकम् ॥११ ॥
वापस दिलवाना चाहिए । राजा को ऐसे ऋण लेनेवाले से दस प्रतिशत ब्याज दिलवाना चाहिए । जो भाग गया हो और जिसे पकड़ लिया गया हो, किन्तु जिस ऋण देनेवाले को राजा के सम्मुख ही उसका ऋण प्राप्त हो जाय उसे पाँच प्रतिशत ब्याज दिलवाना चाहिए । यदि हीन जाति का ऋण लेनेवाला ऋण चुकाने में असमर्थ हो तो उसे ऋण चुकाने के लिए ( ऋण लेनेवाले का ) कार्य करना चाहिए । किन्तु भाग लेनेवाला यदि ब्राह्मण हो तो उससे शनैः-शनैः यथाशक्ति ऋण चुकाना चाहिए ॥१-३ ॥ यदि ऋण देनेवाला व्यक्ति ऋण लेनेवाले से वापस किये गये धन को स्वीकार न करे तो ऋण लेनेवाले को उसे किसी मध्यस्थ के पास रख देना चाहिए । उसके बाद से उस ऋण पर ब्याज नहीं लगता है । ( ऋण लेनेवाले की मृत्यु के अनन्तर मृतक ऋणी के ) धन को तथा उसकी स्त्री को ग्रहण करनेवाला उसके ऋण को चुकाता है और यदि वह ( मृतक ऋणी ) पुत्रहीन हो तो उसका ऋण उसकी सम्पत्ति को ग्रहण करनेवाले को चुकाना पड़ता है । यदि किसी अविभाजित कुटुम्ब के मुखिया ने कुटुम्ब के लिए ऋण लिया हो तो उसकी मृत्यु के बाद अथवा विदेश चले जाने के बाद ऋण चुकाने का दायित्व उसकी सम्पत्ति को ग्रहण करनेवालों का हुआ करता है । पति और पुत्र किये गये ऋण को चुकाने का दायित्व स्त्री पर नहीं रहता है और न पुत्र के द्वारा लिया गया ऋण पिता को चुकाना पड़ता है । किन्तु यदि वह ऋण कुटुम्ब के लिए लिया गया हो तो यह नियम मान्य नहीं हुआ करता है ॥४-७ ॥ ( साधारणतया ) स्त्री के द्वारा ( कुटुम्ब के लिए ) लिया गया ऋण पति को नहीं चुकाना पड़ता है, किन्तु ग्वाले, मदिरा बनानेवाले, नट, धोबियों और बहेलियों की स्त्रियों द्वारा लिये गये ऋण को उनके पतियों को ( भी ) चुकाना पड़ता है, क्योंकि उन लोगों की स्त्रियों के अधीन ही हुआ करती है । स्त्री को केवल वही ऋण चुकाना पड़ता है जिसे उसने स्वयं लिया हो या पति के जीविका साथ मिलकर लिया हो । इसके अतिरिक्त कोई भी ऋण ( साधारणतया ) स्त्री को चुकाना नहीं पड़ता है । पिता की मृत्यु के अनन्तर, उसके प्रवास के बाद और उसके विपत्ति में पड़ जाने पर उसके द्वारा लिया गया ऋण पुत्र - पौत्रों को चुकाना पड़ता पौत्रों को वह ऋण भी चुकाना पड़ता है जो पिता के ऊपर अनुचित व्यवहार में साक्षी बनने के लिए है । पुत्र-अपने पिता द्वारा लिये गये उस ऋण को चुकाने के लिए बाध्य नहीं हुआ करता है जो ऋण पिता ने मदिरापान आ पड़ा हो । किन्तु पुत्र के लिए, कामोपभोग १ क. ख. ङ. शतम् । २ नान्यस्त्री देयं च. पुस्तके नास्ति । ३ क. ङ. निह्नुते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA