ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 1–10
ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध · पृष्ठ 1–10
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ऋग्वेदीयम् ऐतरेयब्राह्मणम् #(पूर्वार्त सायणभाष्योपेतम् सविमर्श शशिप्रभा नामहिन्दीव्याख्ययाविभूषितम् व्याख्याकारः प्रो० उमेशप्रसादसिंहः सम्पादकः डॉ० जमुनापाठकः
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॥ श्रीः ॥ विद्याभवन प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला २७९ ऋग्वेदीयम् ऐतरेयब्राह्मणम् ( पूर्वार्द्धम् ) सायणभाष्योपेतम् सविमर्श' शशिप्रभा 'नामहिन्दीव्याख्ययाविभूषितम् व्याख्याकारः प्रो० उमेशप्रसादसिंहः संस्कृतविभागस्थः काशीहिन्दूविश्वविद्यालयः, वाराणसी सम्पादकः. डॉ० जमुनापाठकः सेवानिवृत्तः, संस्कृतविभागतः काशीहिन्दूविश्वविद्यालयः, वाराणसी प्रकाशक: चौखम्बा विद्याभवन चौक, वाराणसी- २२१००१
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प्रकाशन के किसी भी अंश काकिसी भी रूप में पुनर्मुद्रण या किसी भी विधि ( जैसे - इलेक्ट्रानिक, यांत्रिक, © ): फोटोइसप्रतिलिपि, रिकॉर्डिंग या अन्यकी कोईपूर्वलिखितविधि अनुमतिसे प्रयोगकेयाबिनाकिसीनहींऐसेकियायन्त्रजामें भण्डारणसकता । जिससे इसे पुन प्रा किया जा सकता हो, प्रकाशक ऋग्वेदीयम् ऐतरेयब्राह्मणम् ( पूर्वार्द्धम् ) प्रकाशक चौखम्बा विद्याभवन ( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक ) चौक ( बैंक ऑफ बड़ौदा भवन के पीछे ), वाराणसी - २२१००१ दूरभाष: ०५४२-२४२०४०४ ई-मेल: cvbhawan@yahoo.co.in ' © सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन संस्करण २०१६ ई० मूल्य: I 3000.00 ( १-२ भाग ) सजिल्द त अन्य प्राप्तिस्थान: र चौखम्बा इण्डोवेस्टर्न पब्लिशर्स प के. ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन, वाराणसी - २२१००१ न दूरभाष - ०५४२-२३३३४३१ f वेबसाइट: www.indowesternpublishers.com ' स चौखम्बा पब्लिशिंग हाउस त ४६ ९७/ २, भू- तल (ग्राउण्ड फ्लोर ), गली नं. २१ -ए. ए. अंसारी रोड प दरियागंज, नई दिल्ली- ११०००२ दूरभाष: ०११-२३२८६५३७ उ स चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान श ३८ यू. ए. बंगलो रोड, जवाहर नगर, दिल्ली- ११०००७ दूरभाष- ०११-२३८५६३९ १ प्र म ग्र चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन श के. ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन, वाराणसी--२२१००१ दूरभाष- ०५४२-२३३५२६३
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I क,3TH सम्पादकीयम् ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इत्यापसतम्बीयपरिभाषानुसारं मन्त्रब्राह्मणात्मकशब्द- राशिर्वेदनामाभिधेयः । मन्त्रशब्देनात्र वेदानां संहिताभागः प्रोक्तः । ब्राह्मणानि तु संहि- तानां व्याख्यानि । ब्राह्मणेषु संहितागतमन्त्राणां विविधदृष्ट्या व्याख्यानं विद्यते । तत्र ब्राह्मणान्तर्गतं ब्राह्मणारण्यकोपनिषदानि समाहृतानि । कैश्चिद् वैदिकपण्डितैः ब्राह्मण- ग्रन्थानां वेदत्वं न स्वीकृतम् मन्त्राणां व्याख्यानपरत्वात् । परञ्च तैरपि यज्ञानां महत्व- मुपयोगित्वञ्च समवेतस्वरेण स्वीकृतं भवति । वस्तुतस्तु यज्ञानां विविधदृष्ट्या प्रतिपादनं ब्राह्मणेष्वेवोपलभ्यते, न तु संहितायाम् । अत एव यज्ञानां प्रतिपादकत्वाद् ब्राह्मणानामपि वेदत्वं निश्प्रचमेव । ऋग्यजुस्सामाथर्ववेदानां बहवः शाखाः आसन्, तत्र सर्वेषां संहिता नोपलभ्यन्ते । तासां बहूनि ब्राह्मणान्यपि भवितुमर्हन्ति । परञ्च साम्प्रतं संहितावत्सर्वाणि न, प्रत्युत कानिचिदेव दृष्टिपथमायान्ति । तेषु समुपलभ्यमानेषु ब्राह्मणेष्वैतरेयब्राह्मणस्य महत्वपूर्णं स्थानम् । यद्यपि कलेवरदृष्ट्या शुक्लयजुर्वेदस्य शतपथनामब्राह्मणं विशालतमं विद्यते परञ्च विषयप्रतिपादनदृष्ट्यैतरेयस्य महत्वमूनं न वर्तते । यतो हि विश्ववाङ्मयेषु सर्व- प्राचीनतमस्यर्वेदस्य मन्त्राणां विविधदृष्ट्या सप्रयोजनं सविनियोगञ्च व्याख्यानमत्र विवेचितम् । ब्राह्मणस्यास्य ' चरैवेति चरेवैति' सूक्तिरेषा भारतीयानामेव न, प्रत्युत विश्वस्य सर्वेषां मानवानां कृते स्वकर्मणि संयोजयितुं प्रेरणास्पदम् । ऐतरेयब्राह्मणं शाकलशाखासम्बन्धी विद्यत इत्यध्येतृणां सुदृढो विश्वासः । परञ्च तत्वतो विचार्यमाणे न केवलमेकामेव शाखामवलम्ब्य प्रवृत्तमिदं प्रत्युत शाखान्तराण्य- प्यवलम्बत इति ज्ञायते । तद्यथा—-'' अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानाम्', ' अग्निश्च विष्णो तप उत्तमह' ( ऐ ० ब्रा० १.४.८ ) इति मन्त्रौ प्रतीकग्रहणेन विनियुक्तौ । वेदमन्त्रद्वयं शाकल- संहितायां समाम्नातम् । एवमेवान्येऽपि मन्त्रा विनियुक्ता बहवः प्रतीकग्रहणेन, येषां शाकलसंहितायां पाठो नोपलभ्यते ऋक्शाखान्तरोक्ताऽत्र विनियुक्ताः । ब्राह्मणभागस्य सूत्राणां वाऽयं नियमो यद् यामेकां शाखावलम्ब्य तानि प्रवर्तन्ते तदा तत्रत्यान् मन्त्रान् प्रतीकमात्रं गृहीत्वा विनियुञ्जते । शाखान्तरस्थानां सत्यावश्यके विनियोगप्रसङ्गे समग्रं मन्त्रं पठित्वैव विनियुञ्जत इति । ब्राह्मणेऽस्मिन्तु शाखान्तरीया अपि मन्त्राः प्रतीकमात्र- ग्रहणेन विनियुक्ताः । अतो न एकामेव शाखामेकान्ततोऽवलम्बते ब्राह्मणमिदं किन्तु शाखान्तराण्यपीति स्पष्टमवगम्यते । ऐतरेयो महिदासः ब्राह्मणस्यास्य कर्त्ता । ब्राह्मणमिदं पञ्चपञ्चाध्यायमितोऽष्टपञ्चिकायां ऐ.ब्रा. भू- १
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२ ऐतरेयब्राह्मणम् विभक्तमेवमत्र चत्वारिंशोऽध्यायः विद्यन्ते । ब्राह्मणस्यास्य मुख्यप्रतिपाद्यविषयः सोमयागः विद्यते । ब्राह्मणस्यान्तिमेऽध्यायन्त्रये किञ्चिदैतिहासिकं विवरणमुपलभ्यते । तत्रानेकेषां परिक्षितपुत्रजनमेजयत्यादीनां राज्ञामुल्लेखः प्राप्यते । ब्राह्मणेस्मिन् निर्दिष्टं शुनःशेपोपाख्यानं साहित्यदृष्ट्या लोकप्रियं विद्यते, करुणस्योत्पादकत्वात् । एतादृशस्य महत्वपूर्णब्राह्मणग्रन्थस्यैकाधिकानि संस्करणानि ससायणभाष्येण प्रकाशितानि, यानि संस्कृतभाषायाः माध्यमेनाध्येतॄणां कृते महदुपयोगिनि विद्यन्ते परञ्च हिन्दीभाषामाध्यमेन वेदाध्यायिनां कृते दुःसाध्यान्येव । तेषां कृते तु हिन्दीभाषायां व्याख्या-नेन सह ब्राह्मणस्यास्य संस्करणमपेक्षितम् । हिन्दीभाषायां व्याख्यानेन सह वाराणसीतः संस्करणमेकं प्रकाशितं परञ्चाध्येतृणां कृते तत्सम्यग्रूपेण बोधगम्यं भवितुं जिज्ञासापूरयितुञ्च नार्हति । अत एव वेदाध्यायिनां बोधगम्यत्वमवगत्य मयाऽस्य नूतनसंस्करणस्यावश्यकता- मनुभूता । तत्कार्यार्थं मया शिष्यद्वयं नियोजितम् । ब्राह्मणस्यास्य पूर्वार्धमुत्तरार्धञ्च भागद्वयं कृत्वा प्रियशिष्याय प्रो ० उमेशप्रसादसिंहाय पूर्वार्धं तथा चापराय शिष्याय डॉ॰ दानपति-तिवारीनाम्नं शिष्यो चोत्तरार्धं हिन्दीव्याख्यानार्थं समर्पितम् । शिष्यद्वयेनातिश्रमसाध्येन परिश्रमेण हिन्दीव्याख्यानं सम्पादितम् । तयोः परिश्रमेण भागद्वययुतं संस्करणमिदं प्रकाशितं भवति । कार्यस्यास्य कृतेऽहं शिष्यद्वयोरभ्युदयं कामये । अस्तु, सम्पादकः " जगुला पा जमुनापाठकः
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1 प्राक्कथन वेद विश्वसाहित्य के प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ हैं । मानवसंस्कृति के प्राचीनतम रूप तथा विकास को समझने के लिए वेदों का परिशीलन अपरिहार्य है । मानवजाति के इतिहास के ज्ञान के लिए, भारतीय संस्कृति को समझने के लिए और भाषा- वैज्ञानिक गुत्थियों को सुलझाने के लिए वेदों का अध्ययन आवश्यक माना जाता है । वेद भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अमूल्य निधि है, जो आज भी वैज्ञानिक उपलब्धियों के बीच अपने ज्ञान - गौरव की अक्षुण्णता का निर्बाध रूप से उद्घोष कर रहे हैं । वेदों के ही आधार पर भारतीय दार्शनिक, धार्मिक तथा सामाजिक ज्ञान के भव्य प्रासाद को प्रतिभासम्पन्न वाक् शिल्पियों ने खड़ा किया है । अत एव वेदों का अनुशीलन तथा उनके मौलिक सिद्धान्तों और तथ्यों का उद्घाटन ज्ञान् के संवर्धन एवम् उन्नयन के लिए विशेष उपयोगी है । वेद शब्द का प्रयोग मन्त्र तथा ब्राह्मण के लिए प्रयुक्त किया जाता है । आपस्तम्ब ने अपने ‘ यज्ञ परिभाषा’ ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' में मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग का नाम वेद बतलाया है । ब्राह्मण वेद का वह भाग है जो विविध यज्ञादि के विषय में मन्त्रों के विनियोग तथा उनकी विधियों का प्रतिपादन करता है, साथ ही उनके मूलभाग तथा विवरणात्मक व्याख्या को आख्यानों-उपाख्यानों के रूप में विद्यमान तत्सम्बन्धी निदर्शनों के साथ प्रस्तुत करता है । ऋग्वेदीय ऐतरेयब्राह्मण के कर्ता महीदास माने जाते हैं, भाष्यकार सायण ने अपने भाष्य के प्रारम्भ में एक कथानक दिया है जिसके अनुसार इनकी माता का नाम इतरा था । इसी कारण ये महीदास ऐतरेय कहे जाते थे और इन्हीं के नाम पर इसका नाम ऐतरेयब्राह्मण हुआ । ऐतरेयब्राह्मण में ४० अध्याय हैं, प्रत्येक ५ अध्यायों की एक पञ्चिका मानी गयी है, इस प्रकार इसमें ८ पञ्चिकाएँ हैं । प्रत्येक पञ्चिका को कण्डिकाओं में बाँटा गया है और कुल २८५ कण्डिकाएँ हैं । इस ब्राह्मण में यज्ञ के होता नामक ऋत्विज् के क्रिया- कलापों का विशेष- रूप से वर्णन है । प्रथम, द्वितीय पञ्चिकाओं में 'अग्निष्टोम' में होता की क्रियाओं का वर्णन है, तृतीय- चतुर्थ पञ्चिका में प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन के समय प्रयोग में आने वाले शस्त्रों का वर्णन है और अग्निष्टोम की उक्थ्यादि विकृतियाँ सङ्क्षेप में दर्शायी गयी हैं, पञ्चम में द्वादशाह यज्ञों तथा षष्ठ में अधिक काल तक चलने वाले यज्ञों में होता और उसके सहायकों के कार्य दर्शाये गये
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४ ऐतरेयब्राह्मणम् हैं । सप्तम में राजसूय यज्ञ और अष्टम पञ्चिका में ऐन्द्रमहाभिषेक तथा उसके आधार पर होने वाले राज्याभिषेक एवं पुरोहित का महत्व दर्शाया है । इसी पञ्चिका में ३३ वाँ अध्याय शुनःशेपोपाख्यान है । इस ब्राह्मण में 'चरैवेति' का सर्वोत्तम उपदेश दिया गया है । ऐसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ के कई संस्करण प्रकाश में आये हैं जो संस्कृत भाषा के माध्यम से वेद का अध्ययन करने वाले के लिए महदुपयोगी हैं, किन्तु हिन्दी भाषा के माध्यम से अध्ययन करने वाले के लिए दुःसाध्य हैं । अतः हिन्दीव्याख्या के साथ इस ग्रन्थ का संस्करण तैयार करने के लिए श्रद्धेय गुरुचरण डॉ० जमुनापाठक, सेवानिवृत्त संस्कृत विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने योजना बनाया । उन्होंने इस ब्राह्मण को पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध दो भागों में बाँटकर पूर्वार्द्ध पर व्याख्या लिखने का आदेश दिया । अक्षम होते हुए भी मैं इस कार्य को उनका आशीर्वाद• मानकर स्वीकार कर लिया और लेखन कार्य में संलग्न हो गया । ग्रन्थ की गूढ़ गुत्थियों को उन्हीं गुरुचरणों के सान्निध्य में उन्हीं की कृपा से समझ सका हूँ । उन्हीं के आशीर्वाद से व्याख्या का यह कार्य पूर्ण हो सका है, अतः मैं उनका आजीवन ऋणी रहूँगा । प्रस्तुत व्याख्या अपने उद्देश्य में कितनी सफल होगी, यह तो सुधीजन ही विचार करेंगे । इस व्याख्या को तैयार करने में अन्य जिन विद्वानों के ग्रन्थों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहायता प्राप्त हो सकी है, उन सबके प्रति नतशिरसा कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ । व्याख्याकार- रामनवमी, २०१५ वाराणसी उमेश प्रसाद सिंह.