ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 11–20

ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध · पृष्ठ 11–20

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१ भूमिका ब्राह्मणसाहित्य– विश्ववाङ्मय में वेद ज्ञानविज्ञान के विशाल भाण्डागार हैं । इनमें ऐहिक और पारलौकिक- दोनों प्रकार के ज्ञान समुपलब्ध होते हैं । संहिता और ब्राह्मण- दोनों का समाहार वेद के अन्तर्गत किया गया है । जैसा कि आपस्तम्ब ने कहा है- ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' ( आप ० परि० १.३३ ) । इस परिभाषा में मन्त्र का तात्पर्य संहिता और ब्राह्मण का ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् है । ब्राह्मण के अन्तर्गत आरण्यक और उपनिषद् का भी समाहार हो जाता है । मन्त्रों के साथ- साथ ब्राह्मणग्रन्थों को भी वेदान्तर्गत माने जाने में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों में वैमत्य दृष्टिगोचर होता है । प्राचीन वेदज्ञों ने तो ब्राह्मण- ग्रन्थों को भी वेद के अन्तर्गत माना है किन्तु अर्वाचीन वेदज्ञ स्वामी दयानन्द सरस्वती का कथन है कि केवल मन्त्रों का संहिताभाग ही वेद है । उनकी स्पष्ट धारणा है कि ब्राह्मण - ग्रन्थों का समाहार वेद के अन्तर्गत नहीं होना चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण-ग्रन्थ मन्त्रों के व्याख्यापरक ग्रन्थ हैं । गम्भीरतापूर्वक विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणग्रन्थों के वेदत्व पर शङ्का करना अव्यावहारिक है; क्योंकि स्वामी जी भी यज्ञकर्म को सम्पादित करने से सहमत हैं और सभी ब्राह्मण - ग्रन्थों में विविध यज्ञों के विधिविधान और धार्मिक कर्मकाण्डों का सविस्तार विवेचन किया गया है । यज्ञ के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए मन्त्रों के साथ- साथ ब्राह्मण- ग्रन्थों का अवबोध अपरिहार्य है । अत एव प्रारम्भ से ही मन्त्र और ब्राह्मण को वेद के अन्तर्गत समाहरित किया गया. है । ब्राह्मण शब्द का अर्थ— अर्थ की दृष्टि से विचार करने पर ज्ञात होता है कि ब्राह्मण शब्द बृह् धातु से निष्पन्न 'ब्रह्मन्' शब्द से बना है । 'ब्रह्मन्' शब्द प्रार्थना अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ‘ ब्रह्मन्' ( नपुंसकलिङ्ग ) शब्द से अण् प्रत्यय होने पर 'ब्राह्मण' शब्द व्युत्पन्न होता है । इस प्रकार ब्राह्मण शब्द का अर्थ-'ब्रह्मणोऽयमिति ब्राह्मणः ' अर्थात् ब्रह्म से सम्बद्ध ब्राह्मण कहलाता है । अत: ब्रह्म शब्द के रुढ़ तथा प्रचलित विभिन्न अर्थों को दृष्टि में कर विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रस्तुत नामकरण पर विभिन्न मत प्रतिपादित किया है । ह्विटनी, वेस्टरगार्ड, मैक्डानल तथा कुछ अन्य यूरोपीय विद्वानों ने 'प्रार्थना एवं उपासना' अर्थ के द्योतक 'ब्रह्मन्' से ब्राह्मण शब्द की रचना मानी है । नपुंसक- लिङ्ग ‘ ब्रह्मन्' शब्द का अर्थ परमेश्वर है । अतः मैक्डानल ने उपर्युक्त विचार को सहमति प्रदान करते हुए कल्पना की है; क्योंकि इसमें प्रार्थना तथा उपासना के साथ- साथ ब्रह्म ( परमेश्वर) सम्बन्धी विचार प्रस्तुत किये गये हैं । अतः इस ग्रन्थ -राशि को ब्राह्मण संज्ञा दी

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६ भूमिका `गयी । ' ब्रह्म का एक अर्थ 'वितान' या ' परिबृंहण' है । कतिपय विद्वानों का विचार है कि ब्राह्मणों में चूँकि यज्ञीय क्रियाओं, निर्वचन, पुराकल्प, इतिहास, आख्यानादि विषयों, जिनका मूल वैदिक संहिताओं से है का विस्तार प्राप्त होता है, अत: इन्हें ब्राह्मण कहा गया है । किन्तु स्वयं ब्राह्मण- ग्रन्थों में ब्रह्म के इतर अर्थ भी मिलते हैं । शतपथब्राह्मण में 'ब्रह्म' का अर्थ मन्त्र दिया गया है । मेदिनीकोश ने ब्रह्म के इसी अर्थ को लेकर ब्राह्मण ( ग्रन्थवाचक ) शब्द का अर्थ स्पष्ट किया है— 'ब्रह्मणि नाम मन्त्रा संहृयन्ते स्पष्टीक्रियन्ते व्याख्यायन्ते यस्मिन् तादृश वेदभाग ब्राह्मण इत्यर्थ: ' । ऐतरेयब्राह्मण के अनुसार ब्रह्म का अर्थ यज्ञ है । इस प्रकार ब्रह्म शब्द मुख्य रूप से स्तुति का वाचक होने के कारण मन्त्रों के लिए प्रयुक्त होता था; क्योंकि स्तुतियाँ मन्त्रात्मक ही हैं । इन्हीं मन्त्रात्मक 'ब्रह्मन्' का यज्ञ के विविध कर्मों में विनियोग होता है, अतः वेद का वह भाग जिसमें मन्त्रों के विनियोग आदि का उल्लेख हुआ है, वह ब्राह्मण कहलाया । मन्त्रों के विनियोगात्मक वाक्यों को ब्राह्मण कहा जाने का एक कारण यह भी था कि मन्त्रों का यज्ञ में विनियोग होने के कारण यज्ञ को 'ब्रह्मन्' कहा गया । इस प्रकार ब्रह्मन् अर्थात् यज्ञ का विधान करने वाले ग्रन्थ को ब्राह्मण कहा जाने लगा । भट्टभास्कर ने तैत्तिरीयसंहिता के भाष्य में ग्रन्थवाचक ब्राह्मण शब्द का यही अर्थ करते हुए लिखा है कि कर्मकाण्ड और उससे सम्बन्धित मन्त्रों की व्याख्या जिन ग्रन्थों के अन्तर्गत मिलती है उसे ब्राह्मण- ग्रन्थ कहते हैं । वस्तुत: ब्राह्मण - ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त प्रथमतः यही तथ्य स्पष्ट होता है कि इन ग्रन्थों का प्रमुख विवेच्य विषय यज्ञ है । इनमें याज्ञिक कर्मकाण्ड की सूक्ष्म विवेचना के साथ वैदिक मन्त्रों के द्वारा तत् तत् अनुष्ठानों की संगति स्थापित करके तथा उनकी व्याख्या करके उन्हें प्रामाणिकता प्रदान की गयी है । यज्ञों का वैज्ञानिक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक विवेचन तथा वेद मन्त्रों की व्याख्या- इन दोनों विषयों का इनमें समावेश होने के कारण ही इनका 'ब्राह्मण' नामकरण किया गया, यही कथन अधिक युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है । ब्राह्मण और ब्रह्मवादी --- ब्राह्मण- ग्रन्थों में मन्त्रों की व्याख्या प्रासङ्गिक रूप में ही हुई है, अत: 'ब्रह्म' (मन्त्र) की व्याख्या किये जाने के कारण ये 'ब्राह्मण' नाम से अभिहित किये गये — यह कथन एकाङ्गी ही सिद्ध होता है । वस्तुतः यज्ञ से ही ब्रह्म तथा ब्राह्मण ( ग्रन्थवाचक ) शब्द का निकटतम सम्बन्ध है । ब्राह्मण ग्रन्थों का अन्तःसाक्ष्य भी यही प्रमाणित करता है । ब्राह्मणों में यज्ञीय विषयों के मीमांसक विद्वानों को ब्रह्मवादी संज्ञा दी गयी है । ताण्ड्यब्राह्मण में 'एवं ब्रह्मवादिनो वदन्ति' कहकर अनेक यज्ञीय गुत्थियों को ( १ ) मैकडानल-द हिष्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, पृ०-२६ ( २ ) ब्रह्म वै मन्त्रः । -( शत ० ब्रा ० - ७.१.१.४.५ ) ( ३ ) ब्रह्म वै यज्ञः । —(ऐ०ब्रा० - ७.४.४ )

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ऐतरेयब्राह्मणम् ७ सुलझाने का प्रयास किया है । शतपथब्राह्मण में ऐसे कई ब्रह्मवादियों का नामोल्लेख भी किया गया है, यथा आषाढ़ सावयस, याज्ञवल्क्य आदि । इस प्रकार इन उल्लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि यज्ञ की गुत्थियों को सुलझाने वाले मीमांसक ब्रह्मवादी कहे जाते थे तथा जिन गोष्ठियों में ये अपने विचारों को प्रस्तुत करते थे वे गोष्ठियाँ ' ब्रह्मोद्य' कही जाती थीं । निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि ब्राह्मण- ग्रन्थों के उक्त नामकरण का सीधा सम्बन्ध ब्रह्मोद्य तथा ब्रह्मवादियों से है, न कि ब्राह्मणजाति से । उपर्युक्त ब्रह्मोद्य तथा ब्रह्मवादी संज्ञाएँ उस भ्रम का सहज ही निराकरण करने में समर्थ हैं कि ब्राह्मण ग्रन्थों का सम्बन्ध ब्राह्मणजाति से है । अत: यह कहना उचित होगा कि जिस प्रकार यज्ञ की गुह्यतम गुत्थियों को सुलझाने वाले मीमांसक ब्रह्मवादी कहे जाते थे, उसी प्रकार यज्ञ की गूढ़ मीमांसा से सन्निविष्ट होने के कारण प्रस्तुत ग्रन्थों का नामकरण ब्राह्मण किया गया । निरुक्त में ब्राह्मणों के निर्देश ' इति विज्ञायते ' भी प्रत्यक्षतः इसी परिभाषा की ओर इङ्गित कर रहा है; क्योंकि दुर्गाचार्य ने इसकी व्याख्या ' एवं ब्राह्मणे अपि विचार्यमाणे ज्ञायते' की है । अतः सङ्क्षिप्त रूप में कह सकते हैं कि ब्रह्म के व्याख्यापरक ग्रन्थ ही ब्राह्मण हैं । ब्राह्मण ग्रन्थ का लक्षण- मन्त्र के समान ही ब्राह्मण शब्द के कई लक्षण किये गये हैं और स्वरूप के विषय में मीमांसाग्रन्थों में पर्याप्त विवेचन किया गया है । आपस्तम्बयज्ञपरिभाषा' के अनुसार 'जो कर्म में प्रवृत्त करें वे ब्राह्मण हैं । जैमिनि ' ने ‘ जो मन्त्र नहीं है, वह ब्राह्मण हैं ' - ऐसा ब्राह्मण का लक्षण किया है । अर्थात् जो मन्त्र से अवशिष्ट भाग है वह ब्राह्मण है, यही ब्राह्मण का लक्षण है । सायण ने भी इसी लक्षण को स्वीकार किया है । विधि शब्द वाच्य ब्राह्मण का लक्षण जैमिनि तथा भाष्यकार शबर स्वामी ने इस प्रकार दिया है—

हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः ।

परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना ॥

उपमानं दशैते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु ।

एतद्वै सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ॥७

( १ ) ता०ब्रा० - ६.४.१५ ( २ ) शत० ब्रा० - १.१.१.७ ( ३ ) दुर्गाचार्य की निरुक्त टीका - ३.११; २.१८ ( ४ ) कर्म चोदना ब्राह्मणानि । -( आप ० यज्ञ परिभाषा- १.१.३२ ) ( ५ ) शेषः ब्राह्मणशब्दः । —(जै ० मी० सू०-२.१.३३ ) ( ६ ) सायण, ऋ० भा० भू०, पृ०-३५ (७) शाबरभाष्य- २.१.८

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८ इसका सङ्क्षिप्त विवरण इस प्रकार है— ( १ ) हेतु— ब्राह्मण द्वारा किये गये विधान के समर्थन में जो कारण का कथन किया जाता है, उसे हेतु कहते हैं । जैसे- ' सूर्पेण जुहोति तेन ह्यन्नं क्रियते ' ( २ ) निर्वचन– जहाँ किसी शब्द की निरुक्ति अर्थात् उस शब्द को वैसा कहे जाने का कारण बतलाया जाता है, उसे निर्वचन कहते हैं । ( ३ ) निन्दा– जहाँ पर किसी पदार्थ का निषेध करना होता है, वहाँ उसकी निन्दा की गयी है । ( ४ ) प्रशंसा– जहाँ पर किसी पदार्थ का विधान करना होता है, वहाँ उसकी प्रशंसा की गयी है | ( ५ ) संशय— जहाँ पर किसी विधेय पदार्थ में सन्देह हो, उसे संशय कहते हैं । ( ६ ) विधि— जिसमें कर्म का विधान किया जाय, उसे विधि कहते हैं । (७) परक्रिया— जहाँ पर विधान किया हुआ कर्म किसी अन्य के द्वारा किया जाय उसे परक्रिया कहते हैं । ( ८ ) पुराकल्प– जहाँ पर पूर्वकल्प की बात कही गयी हो, उसे पुराकल्प कहते हैं । ( ९ ) व्यवधारण कल्पना- जहाँ पर विशेष अवधारणा अर्थात् निश्चय ही कल्पना की जाय, उसे व्यवधारण कल्पना कहते हैं । ( १० )उपमान- जहाँ पर किसी कर्म की उपमा दूसरे कर्म से दी जाय उसे उपमान कहते हैं । उपलब्ध ब्राह्मणग्रन्थ- सम्प्रति ऋग्वेद के दो ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध होते हैं- ऐतरेयब्राह्मण और शाङ्खायनब्राह्मण । कतिपय आचार्य शाङ्खायनब्राह्मण को कौषीतकि- ब्राह्मण नाम से भी अभिहित करते हैं । यजुर्वेद के दो सम्प्रदाय हैं- कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद | कृष्णयजुर्वेद का तैत्तिरीयब्राह्मण और शुक्लयजुर्वेद का शतपथब्राह्मण उपलब्ध है । शुक्लयजुर्वेद की दो शाखाएँ माध्यन्दिन और काण्व उपलब्ध हैं ' । ' दोनों शाखाओं का ब्राह्मण शतपथ नाम से ही अभिहित है किन्तु दोनों में भेद है । माध्यन्दिन शतपथ में सौ अध्याय और काण्वशतपथ में एक सौ चार अध्याय हैं । सम्प्रति सामवेद के सर्वाधिक आठ ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं - ताण्ड्य, षड्विंश, मन्त्रदैवत, आर्षेय, सामविधान, संहितोपनिषद्, वंश और जैमिनीयब्राह्मण । अथर्ववेद का सम्प्रति अकेला गोपथब्राह्मण उपलब्ध है । ऐतरेयब्राह्मण स्वरूप— यह ब्राह्मण ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बन्धित है । इसके रचयिता

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ऐतरेयब्राह्मणम् ९ ' महीदास ऐतरेय ' हैं । यह सर्वप्रथम उल्लेखनीय ब्राह्मण है । इस ब्राह्मण का प्रधान विषय सोमयाग है ऐतरेयब्राह्मण में चालीस अध्याय, आठ पञ्चिकाएँ हैं तथा दो सौ पच्चासी कण्डिकाएँ हैं । प्रत्येक पञ्चिका में पाँच अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में ६-१४ तक कण्डिकाएँ हैं । कण्डिकाओं को खण्ड भी कहा जाता है । इस ब्राह्मण के अन्तिम दस अध्यायों की रचना पीछे की मानी जाती है; क्योंकि ये दस अध्याय ऐतिहासिक आख्यानों से पूर्ण हैं । इसका पूर्णरूपेण वर्णन नीचे लिखे उल्लेखों से स्पष्ट होता है । इस ब्राह्मण की प्रथम पञ्चिका में पाँच अध्याय हैं, जिसके पहले अध्याय में छः खण्ड, दूसरे में पाँच खण्ड, तीसरे में छ: खण्ड, चौथे में नौ खण्ड तथा पाँचवें में चार खण्डहैं । द्वितीय पञ्चिका में भी पाँच अध्याय हैं, जिसके पहले अध्याय में दस खण्ड, दूसरे में आठ खण्ड, तीसरे में छ: खण्ड, चौथे में आठ खण्ड तथा पाँचवें में नौ खण्ड हैं । तृतीय पञ्चिका में पाँच अध्याय हैं, जिसके पहले अध्याय में दस खण्ड, दूसरे में आठ खण्ड, तीसरे में छः खण्ड, चौथे में आठ खण्ड तथा पाँचवें में नौ खण्ड हैं । चतुर्थ पञ्चिका में भी पाँच अध्याय हैं, जिसके पहले अध्याय में छः खण्ड, दूसरे में आठ खण्ड, तीसरे में आठ खण्ड, चौथे में छ: खण्ड तथा पाँचवें में चार खण्ड हैं । पञ्चम पञ्चिका में पाँच अध्याय हैं, जिसके प्रथम अध्याय में पाँच खण्ड, दूसरे में दस खण्ड, तीसरे में चार खण्ड, चौथे में छ: खण्ड तथा पाँचवें में नौ खण्ड हैं । षष्ठ पञ्चिका में पाँच अध्याय हैं | प्रथम अध्याय में तीन खण्ड, दूसरे में पाँच खण्ड, तीसरे में आठ खण्ड, चौथे में आठ खण्ड तथा पाँचवें में भी आठ खण्ड हैं । सप्तम पश्चिका में पाँच अध्याय हैं । प्रथम अध्याय में एक खण्ड, दूसरे में ग्यारह खण्ड, तीसरे में छ: खण्ड, चतुर्थ में आठ खण्ड तथा पाँचवें में आठ खण्ड हैं । अष्टम पञ्चिका में भी पाँच अध्याय हैं, जिसके प्रथम अध्याय में चार खण्ड, दूसरे में छः खण्ड, तीसरे में तीन खण्ड, चतुर्थ में आठ खण्ड तथा पाँचवें में पाँच खण्ड हैं । 'विषयवस्तु— ऐतरेयब्राह्मण की प्रथम पञ्चिका में श्रौत संस्था की प्रकृति, अग्निष्टोम संस्था की दीक्षा, विधि आदि को वर्णित किया गया है । इसी क्रम में आगे चलकर सोमक्रय, आतिथ्येष्टि, अग्नि, मन्थन, घर्माभिषव ( प्रवर्ग्य), मन्त्र, सोम-सम्बन्धित आख्यायिकाएँ, उपसद, अग्निप्रणयन एवं सोमप्रणयन आदि विषयों का सविषद वर्णन उपलब्ध होता है । द्वितीय पञ्चिका में यूपोच्छ्रपणं, यूपाञ्जन, आप्रिसूक्त, पर्यग्निकरण, मनोतासूक्त, प्रातरनुवाक, कवष ऋषि की कथा, ऐन्द्रवायवग्रह, ग्रहों का विधान और आज्य- शस्त्र का स्वरूप आदि विषय वर्णित है । तृतीय पञ्चिका में प्रउगशस्त्र की प्रशंसा, माध्यन्दिनसवन में क्रियामान सोमाभिषव सम्बन्धित कर्म, निष्केवल्यशस्त्र, पित्र्येष्टि यज्ञ की दक्षिणा का विधान, अङ्गहविर्याग

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१० भूमिका धानाकर्मादियाग तृतीयसवन में होने वाले कार्य -वैश्वदेवशस्त्र, अग्निमारुतशस्त्र, पशु-पुरोडाशयाग, स्विष्टकृतयाग, पत्नीसंयाज, अवभृथेष्टि एवं अग्निष्टोम समाप्ति सूचक उदवसानीया इष्टि आदि विषय सन्निहित हैं । चतुर्थ पञ्चिका में अग्निष्टोमयाग के पश्चात् आने वाले अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम आदि यागों के स्रोत एवं गावों का विधान है । इसके अन्त में संवत्सर सत्रादि की संख्या का साधन करने के लिए प्रथम दिन साध्य यागों का वर्णन मिलता है । इसमें गवामयन, आदित्यानामयन तथा अङ्गिरसामयन मुख्य है । पञ्चम पञ्चिका में द्वादशाह के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ, सप्तम, अष्टम, नवम एवं दशम दिन के क्रतु की रचना और उसकी रूप- समृद्धि, अक्षर- समृद्धि तथा छन्द- समृद्धि आदि का वर्णन उनके शस्त्रों एवं स्तोत्रों के साथ किया गया है, तत्पश्चात् पृष्ठषडह, अग्निहोत्र, होम- प्रशंसा, सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन, होतृकर्म, अध्वर्युकर्म और उद्गातृकर्म तथा ब्रह्मत्त्व कर्म का सम्बन्ध क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद से दर्शाया गया है । षष्ठ पञ्चिका में संवत्सर सत्रों का वर्णन, उनकी अहः सम्पत्ति, सत्रों में पढ़े जाने वाले स्तोत्र एवं शस्त्रों का विधान, वेदमन्त्रों से उत्पन्न होने वाले विशिष्ट शिल्प जिसमें ऋचाओं के विभिन्न प्रकार के ( एक सूक्त से दूसरे सूक्त में ) विहरण जिन शस्त्रों में होता है, उनका वर्णन किया गया है । उन शस्त्रों में वालखिल्य सूक्त, वृषाकपि सूक्त तथा एवयामरुत आदि सूक्त मुख्य हैं । अन्त में नराशंस, कारव्य, परिच्छिति, भूतेच्छद, देवनीथ तथा दिशा क्लृप्ति आदि मन्त्रों का शस्त्रों के मध्य पाठ करने का विधान वर्णित है । सप्तम पञ्चिका में श्रौत हविर्द्रव्य के रूप में छाग ( अज) को ग्रहण किया गया है । उस छाग के किन- किन अङ्गों को कौन- कौन देवता ग्रहण करते हैं, इसको सविस्तार वर्णित किया गया है । यज्ञ में समागत समस्त ऋत्विजों द्वारा अथवा दीक्षित यजमान अथवा उनकी पत्नी द्वारा यज्ञ कर्म में होने वाले प्रमादों के प्रायश्चित्त का भी उल्लेख किया गया है । इसी प्रकार यज्ञभूमि मार्जार आदि पशुओं के मृत होने पर अथवा यजमान के परिवार में किसी स्त्री के प्रसूता होने आदि विविध प्रकार के अप्रासङ्गिक कर्म होने पर उसकी निवृत्ति के लिए विभिन्न देवताओं को उद्देश्य बनाकर तज्जन्य दोष- निवृत्ति का विधान है । तदनन्तर शुनःशेप का उपाख्यान तथा पूर्व में सम्पादित यज्ञों का एवं उनमें भाग लेने वाले ऋत्विजों का अनुसरण, क्षत्रिय यजमान द्वारा सम्पादित होने वाले यज्ञों का तथा याग में प्रयुक्त पुरोडाश आदि के भक्षण का विधान है । अष्टम पञ्चिका में राजसूय यज्ञ के पश्चात् साम्राज्य, भौज्य, स्वराज्य, पारमेष्ठ्य, महाराज्य तथा आधिपत्य आदि महान् उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऐन्द्रमहाभिषेक के विधान

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ऐतरेयब्राह्मणम् ११ का वर्णन किया गया है, साथ ही साथ ऐन्द्रमहाभिषेक की विधि का भी विवेचन किया गया है । इसके बाद पूर्वकल्प के ऐसे विशिष्ट राजाओं के नामों का उल्लेख किया गया है, जिन्होंने ऐन्द्रमहाभिषेक की विधियों का सम्पादन करके दीर्घकाल तक पृथ्वी के साम्राज्य को अपने अधीन कर रखा था । इसके पश्चात् पुरोहित के धार्मिक एवं राजनीतिक क्रिया-कलापों का वर्णन है । अन्त में पञ्चमहाभूत, विद्युत, वृष्टि, चन्द्रमा, अग्नि तथा आदित्य आदि देवताओं का सर्जन एवं विसर्जन के क्रम को वर्णित करते हुए 'ब्रह्मपरिमर' नाम का अभिचारी प्रयोग बतलाया गया है । इस क्रिया के ज्ञान द्वारा ज्ञानयज्ञ की प्रतिष्ठा की गई है जिसमें अखिल कर्मों की परिसमाप्ति हो जाती है । महत्व— ऋग्वेद से सम्बद्ध यह ब्राह्मण यज्ञ में ' होतृ' नामक ऋत्विज के विशिष्ट क्रिया- कलापों का विशेष विवरण प्रस्तुत करता है । इसके साथ सोमयाग के नाना प्रकार के स्वरूप तथा इतिहास को बतलाने में विशेष गौरव रखता है । धार्मिक दृष्टि से ऐतरेय-ब्राह्मण की समालोचना में अनेक नवीन तथा प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त होते हैं, जिनका अनुशीलन हमें बतलाता है कि तत्कालीन समाज में विष्णु की महिमा विशिष्ट स्थान पर थी । इसमें देवताओं के चार प्रकार के गुण बतलाये गये हैं-( १ ) देवता शक्ति से युक्त होते हैं । ( २ ) वे परोक्षप्रिय होते हैं । ( ३ ) वे एक- दूसरे के घर में नहीं रहते । (४ ) वे मर्त्यो को अमरत्व प्रदान करते हैं । १ ऐतरेयब्राह्मण के अन्तिम तीन अध्यायों में कुछ ऐतिहासिक विवरण भी उपलब्ध होते हैं । इसके अनुसार भारत के पूर्वी सीमा में विदेह आदि अनेक जातियों का राज्य था । दक्षिण में भोज राज्य तथा पश्चिम में 'निच्य' और ' अपाच्य' राज्य था और उत्तर में कुरु और मद्र का राज्य था तथा मध्य देश में कुरु एवं पाञ्चालों का राज्य था । इस तरह इस ब्राह्मण में अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के भी नाम आये हैं । जैसे- परीक्षित- पुत्र जनमेजय, मनु- पुत्र शर्यात, उग्रसेन- पुत्र युधांश्रौष्ठि, पिजवन- पुत्र सुदास और दुष्यन्त पुत्र भरत आदि । इसी प्रकार मत्स्य, काशी, कुरुक्षेत्र एवं खाण्डव आदि स्थानों का उल्लेख है । शुनःशेप के आख्यान के कारण यह ब्राह्मण वैदिक ग्रन्थों में चिरस्मरणीय है । शुनःशेप ऋग्वेद के ऋषि तथा प्रथम मण्डल के अनेक सूक्तों ( २४ से २७ तक) के द्रष्टा हैं । शुनःशेप का आख्यान बड़ा ही करुणोत्पादक होने के कारण साहित्यिक दृष्टि से भी लोकप्रिय हैं । ' राजा हरिश्चन्द्र वरुण की दया से प्राप्त पुत्र को वरुण देवता के लिए बलि देना चाहते हैं । समर्थ होने पर वह पुत्र ' रोहित' जङ्गल में चला जाता है । राजा हरिश्चन्द्र ( १ ) ऐत०ब्रा०-७.६, ३.३३ ( २ ) बलदेव उपाध्याय- वैदिक कहानियाँ, पृ०-३८-५८

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१२ उदर- व्याधि से ग्रसित हो जाते हैं । जब इस घटना का पता रोहित को चलता है तो वह जङ्गल से घर की ओर लौटने लगते हैं । बीच रास्ते में इन्द्र उन्हें लौटने से मना करते हैं, फिर भी वह घर को लौट आते हैं; परन्तु अजीगर्त नामक ब्राह्मण से उसके मध्यम पुत्र शुनःशेप को गायों की दक्षिणा देकर खरीद लेते हैं । वरुण के यज्ञ में पिता ही अपने पुत्र को बलि देने के लिए दक्षिणा लेकर तैयार हो जाता है; परन्तु अनेक देवताओं की अभ्यर्थना के बल पर पुत्र शुनःशेप अपना प्राण बचा लेते हैं । विश्वामित्र उनको पोष्य पुत्र बना लेते हैं । उनके जिन पचास पुत्रों को यह घटना मान्य नहीं होती, उन्हें पिता के अभिशाप से आर्यदेश की प्रान्त भूमि में म्लेच्छ जाति के रूप में परिणत होना पड़ता है । इस आख्यान को अनेक पश्चिमी वेदज्ञ वैदिक युग में मनुष्यों के बलिदान का परिचायक मानते हैं '; परन्तु भारतवर्ष में आर्यधर्म में मनुष्य की बलि देने का कहीं भी कोई विधान नहीं मिलता । शाङ्खायनश्रौतसूत्र में पुरुषमेध की राजसूय के समय योजना का वर्णन तो मिलता है, वह वास्तविक नहीं है, प्रत्युत काल्पनिक तथा प्रतीकात्मक है । रोहित को घर लौटने से इन्द्र ने रोककर ' चरैवेति- चरैवेति' की जो सुन्दर शिक्षा दी है, वह आर्य जाति के अभ्युदय का सम्बल है । कर्म की दृढ़ उपासना ही आर्य संस्कृति का मेरुदण्ड है । आर्य धर्म कर्मण्यता का पक्षपाती और अकर्मण्यता का प्रतिद्वन्दी है । यह आख्यान आर्यों के दक्षिण देशों में प्रसार के इतिहास तथा समय का पूर्ण साक्षी है । ऐतरेयब्राह्मण के काल में ही ब्राह्मण लोग अपनी अभ्यस्त सीमा के बाहरी प्रान्तों में जाकर निवास करने लगे थे । ऐतरेयब्राह्मण का भौगोलिक सम्बन्ध मध्य देश से ही था; क्योंकि मध्यदेश का उल्लेख बड़े अभिमान के साथ किया गया है और वह ध्रुव तथा प्रतिष्ठा माना गया है?; परन्तु ऋग्वेद के समान इसका भी प्रचार- प्रसार आजकल महाराष्ट्र देश में ही है । इसलिए ' ड' के स्थान पर 'ळ' का बहुत्व प्रयोग इस ब्राह्मण में मिलता है । इस प्रकार इस विशिष्ट विशेषताओं के कारण ऐतरेयब्राह्मण अन्य ब्राह्मणों में अपना विशेष स्थान रखने में गौरव प्राप्त करता है कालनिर्धारण- वेदों की भाँति ब्राह्मण ग्रन्थों के काल -निर्धारण में भी विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं । एक तरफ पाश्चात्य विद्वान् तथा उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों का समुदाय है । दूसरी तरफ आर्य इतिहास को जीवित रखने वाले तथा प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरने वाले भारतीय विद्वान् हैं । ब्राह्मणों का रचना- काल आरण्यकों एवं उपनिषदों का पूर्ववर्ती रहा है- यह तथ्य मानते हैं । पाश्चात्य विद्वान् कीथ, मैक्समूलर, वेबर ( १ ) जर्मन विद्वान् हिले ब्राण्ट इससे मनुष्य बलिदान की प्रथा की वैदिक में वास्तविक मानते हैं; परन्तु डॉ० कीथ ने इसका सप्रमाण खण्डन किया है । ( २ ) श्रुतायां मध्यमायां प्रतिष्ठायां दिशि ।

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ऐतरेयब्राह्मणम् १३ आदि एवं भारतीय विद्वानों ने ब्राह्मणों का समय लगभग ८००-६०० वर्ष ई० पू० माना है । भारतीय विद्वान् पण्डित भगवद् दत्त, युधिष्ठिर मीमांसक, बालकृष्ण दीक्षित एवं लोकमान्य तिलक आदि ने ब्राह्मणों का समय सामान्यतया ३५०० विक्रम पूर्व से ३००० विक्रम पूर्व तक निर्धारित करने का सफल प्रयास किया है । इन लोगों के अनुसार ब्राह्मणों का समय महाभारतकालीन सिद्ध होता है । ब्राह्मण- ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उनकी रचना एक ही समय में न होकर विभिन्न काल में सम्पन्न हुई थी । इस प्रकार विशालकाय ब्राह्मण- ग्रन्थों की रचना में एक दीर्घ अवधि का समय लगा होगा 1। ऋग्वेदीय ब्राह्मणों का समय भी विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर सामान्यतः १००० - ९ ०० वर्ष ईषा पूर्व तक मानना तर्कसङ्गत प्रतीत होता है । एक ही वेद की संहिता से सम्बद्ध होने पर भी कौषीतकिब्राह्मण ऐतरेयब्राह्मण के बाद की रचना प्रतीत होती है । इस प्रकार विषय-वस्तु की दृष्टि से कौषीतकिब्राह्मण ऐतरेयब्राह्मण का अनुगामी होने के कारण भी अर्वाचीन सिद्ध होता है । इस प्रकार कौषीतकिब्राह्मण को काल की दृष्टि से ऐतरेय को परवर्ती माना गया है । •उपर्युक्त सम्पूर्ण साक्ष्यों के सूक्ष्म विवेचन से भारतीय आर्य- परम्परा ही श्रेयस्कर प्रतीत होती है । पाश्चात्य एवम् उनके अनुयायी भारतीयों का विचार तर्कसङ्गत नहीं लगता । कुछ प्रमाण जरूर उनकी सत्यता को घोषित करते हैं; परन्तु पण्डित भगवद् दत्त, युधिष्ठिर मीमांसक, प्रोफेसर वासुदेवशरण अग्रवाल एवम् अन्य मनीषियों के साक्ष्य के सामने टिक नहीं पाते । अतः निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि शतपथ का समय ३००० ईसा पूर्व तथा ऐतरेय ब्राह्मण का समय ३००० के तुरन्त बाद का तथा शाङ्खायन का समय आरण्यक ग्रन्थों के समय का होगा । इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण का सङ्कलन-काल विक्रम से ३०४४ वर्ष पूर्व मानना तर्कसङ्गत है । इस प्रकार ५००० ईसा वर्ष पूर्व ब्राह्मण- ग्रन्थों की रचना हुई होगी । इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण का रचनाकाल भी ब्राह्मण- ग्रन्थों की रचना का प्रारम्भिक काल ही रहा होगा । ऐतरेयब्राह्मण के कर्त्ता- ऐतरेयब्राह्मण की रचना का श्रेय ' महिदास ऐतरेय' को मिलता है । षड्गुरुशिष्य ने ऐतरेयब्राह्मण की सुखप्रदावृत्ति में इन्हें किसी याज्ञवल्क्य नामक ब्राह्मण की इतरा नामक द्वितीय स्त्री का पुत्र बतलाया है । ' सायण ने भी ऐतरेय-ब्राह्मण के भाष्य के उपोद्घात में ‘ ऐतरेय' नाम की व्युत्पत्ति के सन्दर्भ में एक परम्परागत कथानक प्रस्तुत किया है । इसके अनुसार किसी महर्षि की अनेक पत्नियों में एक का नाम इतरा ( १ ) आसीद् विप्रो याज्ञवल्क्यो द्विभार्यस्तस्य द्वितीयामितरेति चाहु । -(इति० ऐ ०ब्रा० षड्- गुरुशिष्य प्रथम अध्याय, पृष्ठ-४ ) । ( २ ) कस्यचिद् खलु महर्षेर्वह्नः पत्नयो विद्यन्ते स्म । तासां मध्ये कस्या चिदितरेति नामधेयम् । तस्या इतरायाः पुत्रों महिदास कुमार: । -(ऐ०ब्रा ० पर सायणभाष्य )

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ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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१४ भूमिका था, जिसके पुत्र महिदास थे । पिता का स्नेह अन्य पत्नियों के पुत्रों पर अधिक था । उन्होंने किसी यज्ञसभा में महिदास को हटाकर अन्य पुत्रों को गोद में बैठाया । खिन्नमुख महिदास को देखकर इतरा ने अपनी कुलदेवता भूमि का स्मरण किया । भूमि देवता दैवी स्वरूप धारण कर यज्ञसभा में प्रकट हुयी । उन्होंने महिदास को एक दिव्य सिंहासन पर ही बैठाया और उनको अन्य कुमारों की अपेक्षा अधिक पाण्डित्य भी प्रदान किया साथ ही साथ यह वर भी दिया कि उन्हें ब्राह्मण प्रतिभासित होगा । इस अनुग्रह से महिदास के मन में ४० अध्याय का ब्राह्मण प्रादुर्भूत हुआ । इसके बाद आरण्यकरूप ब्राह्मण भी उन्हीं के मन से अविर्भूत हुआ । स्कन्दपुराण के एक अन्य कथानक के अनुसार हारीत ऋषि के वंश में माण्डूक ऋषि तथा इतरा नामक स्त्री से उत्पन्न होने के कारण इनका 'ऐतरेय' पड़ा । बचपन से ही ये ‘ ॐ नमो भागवते वासुदेवाय' मन्त्र का जप करने लगे थे । ये किसी से बोलते नहीं थे । इसलिए माण्डूक ने पिङ्गा नामक दूसरी स्त्री से विवाह किया जिससे उन्हें चार पुत्र हुए, जो बड़े ही विद्वान् थे । अतः उनका सम्मान हुआ । इतरा ने अपने पुत्र से कहा कि तेरे गुणवान् न होने के कारण तेरे पिता मेरा अपमान करते हैं । अतः अब मैं देह त्याग दूँगी । तब ऐतरेय ने उन्हें धर्म का उपदेश देकर देहत्याग के विचार पर परावृत्त कर दिया । अन्त में भगवान् विष्णु ने उन दोनों को साक्षात् दर्शन देकर आशीर्वाद दिया । बाद में भगवान् के आदेशानुसार कोटितीर्थ पर होने वाले हरिमेश्य के यज्ञ में जाकर वेदार्थ पर उन्होंने प्रवचन किया । हरिमेश्य ने इनका पूजन कर अपनी कन्या से इनका विवाह कर दिया । ऐतरेय आरण्यक में इनका अनेक बार उल्लेख है, किन्तु वहाँ कहीं भी उन्हें उस ग्रन्थ का कर्त्ता नहीं कहा गया है । ऐतरेय उपनिषद् भाष्य में भी इन्हें इतरा के तपोबल से उत्पन्न माना गया हैं५ । ब्रह्मसूत्र के मध्यभाष्य में इनके सम्बन्ध में ब्रह्माण्डपुराण से एक श्लोक भी उद्धृत किया गया है । भागवत् पुराण के टीकाकार के अनुसार इन्हें हरि का अवतार कहा गया है ।७ ( २ ) ऐ० ब्रा० षड्गुरुशिष्य, पृष्ठ-८ ( ३ ) ऐ० आ० षड्गुरुशिष्य, भूमिका । (४) इति स्कन्दपुराण- १.२४२.२८-३० (५ ) ऐ० आ० -२.१.८, ३.७ ( ६ ) प्रादुर्वभूत भगवांस्तपसेतराया, नारायणो.......दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्ध | ( ) -(, ) । ६ महिदासाभिज्ञो जज्ञे इतरायास्तपो बलात्। इति० ऐ० आ० मध्वभाष्यम् साक्षात् स भगवान् विष्णु स्तन्त्रं वैष्णवं धात् ॥ (इति ब्रह्मणाण्डे, द्र० बा० सू० भ ० भा ० )। (७ ) भागवतपुराण -२.७.१ ९, विजयध्वज ।