ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 31–40

ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध · पृष्ठ 31–40

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ऐतरेयब्राह्मणम् २५ सोम अनुष्टुप् छन्द से, बृहस्पति बृहती छन्द से, मैत्रावरुण पंक्ति छन्द से और इन्द्र त्रिष्टुप् छन्द से, विश्वेदेव जगती छन्द से तुझ पर आरूढ़ होवें, तत्पश्चात् मैं राज्य, साम्राज्य, वैराज्य, पारमेष्ठ्य, महाराज्य, आधिपत्य, स्वावश्य और अतिष्ठ्य के लिए तुझ पर आरूढ होऊँ । आसन्दी पर बैठ जाने पर पुरोहित उदुम्बर की जल में भीगी शाखा को क्षत्रिय के सिर पर रखकर जल की शान्ति के लिए ऋचाओं का पाठ करता है । राजा को सम्बोधित करके कहता है कि ' तेरी भद्रा माता ने तुझे महान् साम्राज्य करने के लिए उत्पन्न किया है' । तत्पश्चात् सविता, अश्विन्, पूषा, अग्नि, इन्द्र- इन देवों से शक्ति प्राप्ति की कामना की जाती है । तदनन्तर अन्य विविध कृत्यों के सम्पादन के बाद सोमरस का पान करके राजा आसन्दी से नीचे उतरता है और अपने राज्य की सुख- समृद्धि के लिए पुरोहित को तीन बार प्रणाम करके जय, अभिजय, विजय और संजय के लिए आशीर्वाद प्राप्त करता है । प्रतीकात्मक रूप से शत्रु को पराजित करने का कृत्य किया जाता है । इस कृत्य के बाद राजा महल में जाकर यज्ञीय कृत्य का सम्पादन करता है, जिसमें पुरोहित चार कास्यपात्रों से घी की आहुति देता है । इस समय राजा को शुनःशेप का आख्यान विशेष रूप से सुनाया जाता है । ' अश्वमेध यज्ञ- यह क्षत्रिय के लिए विजय प्राप्ति के अनन्तर सम्पाद्यमान विशेष कृत्य है, जिसके द्वारा राजा अपनी शक्ति व प्रभाव की स्थापना करता है । इस यज्ञ की विशेष- विधि और कर्त्तव्यों का इस ब्राह्मण में उल्लेख नहीं किया गया है । केवल उन सार्वभौम राजाओं की सूचना मात्र है, जिन्होंने इस यज्ञ का अनुष्ठान किया और सम्पादन के बाद प्रभूत धन- सम्पत्ति दक्षिणा- स्वरूप ऋत्विज् ब्राह्मण को वितरित किया ।२ ऋत्विज्— जिन विभिन्न यज्ञों का विवेचन ऊपर किया गया है, उन सभी यज्ञों में विभिन्न ऋत्विजों की आवश्यकता अपेक्षित है; क्योंकि सूक्ष्म और रहस्यात्मक क्रियाएँ कर्मकाण्ड के विशेषज्ञ ऋत्विजों द्वारा की सम्पाद्य हैं । इन यज्ञों में एक से सोलह ऋत्विजों की आवश्यकता होती है । इन सभी ऋत्विजों को चार वर्गों के विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार हैं- (क ) होतृवर्ग— इस वर्ग में 'होता' मुख्य ऋत्विज् होता है और तीन इसके सहायक होते हैं— मैत्रावरुण, अच्छावाक, ग्रावस्तुत । ब्राह्मण-साहित्य में होतृवर्ग के कार्यों का ही मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है । यज्ञ- विधि में देवताओं का आह्वान करने के कारण ( ) ( ) - - १ ऐ०ब्रा०-३३.६ २ ऐ०ब्रा० ३ ९.७ ९ (२ ) आश्वलायनश्रौतसूत्र- ४.१.६; आपस्तम्बश्रौतसूत्र- १०.१.९; ऐ ० ब्रा ० - ९.८

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भूमिका २६ इसका यह नाम हुआ । ' यज्ञ में इसका कृत्य ऋग्वेद की ऋचाओं का शंसन करना है । यह यजमान के कल्याण के लिए यज्ञ - कृत्य में प्रवृत्त होता है; परन्तु किसी कारण से रुष्ट होकर यजमान का अनर्थ भी कर सकता है । (ख) अध्वर्युवर्ग - इस वर्ग में अध्वर्यु ऋत्विज् मुख्य और तीन सहायक ये हैं-प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा, पोता । इसका कार्य यज्ञ -विधि में यजुर्वेद के यजुषों का पाठ करना है । * यह सोम अभिषवण के समान की भी देख - रेख करता है' और विशेष कृत्यों के लिए होतृ वर्ग को आदेश होता है । ( ग ) उद्गातृवर्ग— इस वर्ग में उद्गाता प्रमुख ऋत्विज् और प्रस्तोता, प्रतिहर्त्ता, सुब्रह्मण्या--ये तीन इसके सहायक होते हैं । यज्ञ- विधि में सामगान करना इसका मुख्य कार्य है ।७ ब्रह्मावर्ग- इस वर्ग में मुख्य ऋत्विज् ब्रह्मा तथा ब्राह्मणाच्छंसी, अग्नीध्र और होता इसके सहायक ऋत्विज् हैं । यद्यपि इसका अपना वेद अथर्ववेद है, तथापि यह अन्य सभी वेदों का ज्ञाता भी होता है । यह यज्ञ का अध्यक्ष होता है । ऋक्, यजु और साम के उच्चारण में त्रुटि होने पर ब्रह्मा से निवेदन किया जाता है और वह उस त्रुटि का मार्जन करके यज्ञ को शुद्ध करता है । इसी कारण ब्रह्मा को यज्ञ का चिकित्सक कहा गया है । विविधि यज्ञों के कार्य—' अग्निहोत्र' नामक यज्ञ में केवल ' अध्वर्यु' नामक ऋत्विज् की आवश्यकता होती है । अग्न्याध्येय, दर्शपूर्णमास आदि यज्ञों में अध्वर्यु, अग्नीध्र, होता एवं ब्रह्मा- इन ऋत्विजों की आवश्यकता होती है । चातुर्मास्य यज्ञों में पाँच ऋत्विजों की आवश्यकता होती है— चार दर्शपूर्णमास यज्ञ में वर्णित ऋत्विज् एवं एक प्रतिप्रस्थाता ऋत्विज् । पशुबन्ध यज्ञ में इनके अतिरिक्त मैत्रावरुण नामक छठा ऋत्विज् ( १ ) कस्मात्तं होतेत्याचक्षते यद्वाव स तत्र यथा भोजनं देवता अमुमावहामुमाव हेत्यावाहयति तदेव होतुर्होतृत्त्वं होता भवति । -( ऐ०ब्रा० - १.२ ) ( २ ) ऐ० ब्रा० - २५.७; कौ ० ब्रा०-६.११ ( ३ ) ऐ ० ब्रा० - १०.५; ११.३, ७; १२.८, ११ (४ ) ऐ० ब्रा० - २५.७; कौ० ब्रा०-६.११ ( ५ ) ऐ ०ब्रा०-३५.६ ( ६ ) ऐ० ब्रा०-५.४; ६.२,५ ( ७ ) ऐ० ब्रा०-८.४; २५.७; कौ० ब्रा० - ६.११ ( ८ ) ऐं० ब्रा० - २५.९; कौ ०ब्रा० - ६.११ तथा ब्राह्मणि वै यज्ञः प्रतिष्ठितः । यद्वै यज्ञस्य स्खलितं वोल्बणं भवति ब्राह्मण एव तत्प्राहुः । तत्स त्र्यया विद्या भिषज्यति । — ( कौ० ब्रा०-६: १२ )

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ऐतरेयब्राह्मणम् २७ भी होता है । सोम यज्ञों में सभी सोलह ऋत्विजों की आवश्यकता होती है । दक्षिणा— यज्ञ कर्म में ऋत्विजों को दिये गये दान को ' दक्षिणा' कहा जाता है । क्षत्र यज्ञ का पुनः सन्धान (दक्षता ) इस कर्म के द्वारा होती है, अतः इसे दक्षिणा नाम से अभिहित करना अन्वर्थक है । इसके बिना यज्ञकर्म खण्डित हो जाता है । यज्ञ कर्म के निष्पादन में यजमान के अतिरिक्त ऋत्विजों की सहायता अनिवार्य है । इन सबका सम्मिलित कर्म यजमान के यज्ञकर्म का स्वरूप सम्पादन करना है । कर्म द्वारा ऋत्विजों का आत्मप्राण भी इस यज्ञाग्नि में प्रविष्ट रहता है । यज्ञकर्म से उत्पन्न होने वाला यज्ञफल तब तक यज्ञकर्त्ता यजमान की निजी सम्पत्ति नहीं बन सकता जब तक कि वह उन ऋत्विजों के कर्मानुगत फल को यज्ञ फल से बाहर न निकाल दे । इसके निकालने का उपाय ही 'दक्षिणा' दान है । वेद के विद्वान् ऋत्विजों ने जितना श्रम किया, उसके प्रतिरूप में शास्त्र-विहित गौ, वस्त्र, हिरण्य, रजत आदि देने से उनका स्वत्व यज्ञ फल से निवृत्त हो जाता है और यज्ञफल एक मात्र यजमान की निजी सम्पत्ति बन जाता है । दक्षिणा दान एक शास्त्रीय कर्म है, अतः अधिकारी भेद से ही दानपात्र की व्यवस्था है । यज्ञ कराने वाले ऋत्विजों की आवश्यकता के अनुसार दक्षिणा की कल्पना नहीं की जाती । विभिन्न यज्ञों में विभिन्न ऋत्विजों के लिए विभिन्न प्रकार की ' दक्षिणा' दान स्वरूप प्रदान करने का विधान है । यथा राजसूय यज्ञ में होता को हजार गौ, स्वर्ण का आसन, खच्चरों सहित चाँदी का रथ, अध्वर्यु को गौ और स्वर्ण का आसन दक्षिणा स्वरूप प्रदान करने का विधान है । ३ राज्याभिषेक के बाद तथा विजय के उपरान्त अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन करके प्रभूत दक्षिणा विसर्जित करने का उल्लेख अनेकशः हुआ है । जिसमें हजार गौ, आयताकार खेत', दस हजार हाथी, दस हजार दासियाँ, अट्ठासी हजार वस्त्र आदि दक्षिणा स्वरूप प्रदान किये गये हैं । “ संस्करण— सर्वप्रथम मार्टिंग हाग ने १८६३ में अंग्रेजी व्याख्या के साथ इस ग्रन्थ को सम्पादित कर बम्बई से प्रकाशित किया । थ्यूडर आउफ्रैक्ट ने १८७ ९ ई० में सायणं- भाष्य के सारांश के साथ बोन से प्रकाशित किया । चार भाग में सम्पूर्ण सायणभाष्य के साथ १८ ९४-१९ ०६ ई ० में सत्यव्रत सामश्रमी महोदय ने सम्पादित कर कलकत्ता से प्रकाशित किया । पण्डित काशीनाथ शास्त्री आगाशे ने सायणभाष्य के साथ दो भागों में सम्पादित कर १८ ९ ६ ई ० में आनन्दाश्रम पूना से प्रकाशित किया । अनन्त कृष्ण शास्त्री ( १ ) दक्षिणाभिर्वै यज्ञं दक्षयति । कौ ० ब्रा० - १५.१ ( ) - ( ) २ ऐ० ब्रा० ३.२ ३ ऐ ० ब्रा०-३३.६ ( ) ( ) ४ ऐ०ब्रा०-३९.६ ५ ऐ०ब्रा०-३९.८

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२८ भूमिका ने षड्गुरुशिष्य की सुखप्रदा वृत्ति के साथ तीन भागों में ( अपूर्ण) १ ९ ४२- १ ९ ५२ में त्रिवेन्द्रम् से प्रकाशित किया था । ए० बी ० कीथ द्वारा १ ९ २० में (हार्वड ओरियण्टल सीरीज़ २५ वीं जिल्द) अंग्रेजी में अनूदित हुआ । इसके अतिरिक्त निर्णय सागर से १ ९ २५ में मूलमात्र छपा था । पण्डित गङ्गाप्रसाद उपाध्याय ने विक्रम संवत् २००६ में ऐतरेयब्राह्मण का हिन्दी अनुवाद के साथ हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से प्रकाशित किया था । इसके बाद डॉ॰ सुधाकर मालवीय ने १ ९ ८० ई ० में ऐतरेयब्राह्मण को सायण- भाष्य और हिन्दी अनुवाद के साथ दो भागों में वाराणसी से प्रकाशित किया । प्रस्तुत संस्करण— ऐतरेयब्राह्मण के अनेक संस्करण सायणभाष्य के साथ प्रकाश में आये हैं जो संस्कृत भाषा के माध्यम से वेदाध्यायियों के लिए महदुपयोगी है, किन्तु हिन्दी भाषा के माध्यम से अध्ययन करने वाले वेदपाठियों के लिए दुरूह है । यद्यपि हिन्दी के साथ डॉ० सुधाकर मालवीय का संस्करण उपलब्ध है किन्तु अध्येताओं के लिए सुगम नहीं है । इसके माध्यम से अध्येता ब्राह्मण- वाक्यों का भाव तो समझ सकते हैं किन्तु शब्दों के ज्ञान से अनभिज्ञ ही रहते हैं । अतः इस संस्करण में शब्दों के ज्ञान के द्वारा वाक्यों के भाव को स्पष्ट किया गया है । इस संस्करण में ऐतरेयब्राह्मण में प्रयुक्त शब्दों को देकर उसकी हिन्दी दी गयी है जिससे अध्येता सुगमतापूर्वक शब्दों के अर्थ से परिचित हो जाते हैं । इसके साथ ही साथ गूढ़ विषयों को समझने के लिए स्थल- स्थल पर 'विमर्श' का संयोजन किया गया है जिससे गूढ़ तथ्य सरलतापूर्वक बोधगम्य हो जाता है । ( 1 )

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विषयानुक्रमणी विषयाः प्रथमोऽध्यायः पृष्ठाङ्काः विषयाः पृष्ठाङ्काः अञ्जनस्य प्रशंसा २९सोमयाग निरूपण ९ दर्भपिञ्जलैः पवित्रकरणम् २९ :तत्रादौदीक्षणीयेष्टिविधानम्अग्निविष्णुदेवतयोः प्रशंसनम् १०९ यजमानस्यप्रवेश प्राचीनवंशाख्यशालां ३० अग्नाविष्णवोर्मध्येऽन्येभ्यो देवेभ्यो योनित्वेन प्राचीनवंशप्रशंसनम् ३० तत्र दीक्षितस्य नियमविशेषकथनम् ३० निर्वापः ११अग्नाविष्ण्योः सर्वदेवतान्तर्भावप्रदर्शनम् १२ यजमानस्य प्राचीनवंशत: बहिर्गमन-अग्नाविष्णुपुरोडाशयोः यज्ञस्याद्यन्तत्वम् १३ निषेधः ३२तयोमध्ये पुरोडाशविभक्तिनिर्देशनम् १३ दीक्षितस्य वाससाच्छादनसंस्कारः ३२पुरोडाशमपोद्य द्रव्यान्तरविधानम् १५ वस्त्रस्योल्बत्वकथनम् ३२ दीक्षितस्य कृष्णाजिनेनाच्छादानसंस्कारः ३२घृतचरुणाप्रतिष्ठितदोषपरिहारः १५प्रतिष्ठाहेतुत्ववेदनप्रशंसनम् १६ कृष्णाजिनस्य जरायुरूपत्वम् ३२दीक्षंणीयेष्टिकालविधानम् १६ मुष्टिद्वयबन्धनसंस्कारः ३३सप्तदशसामिधेनीविधानम् १८ मुष्टिद्वयप्रशंसनम् ३३ अवभृथगमनात्पूर्वं कृष्णाजिनस्यो-सप्तदशसंख्याप्रशंसन् १ ९सप्तदशसङ्ख्यावेदनप्रशंसनम् २० मोचनम् ३४ कृष्णाजिनोन्मोचनकाले वस्त्रोन्मोचन-इष्टिशब्दनिर्वचनम् २३आहूतिशब्दनिर्वचनम् २४ निषेधः ३५ऊतिशब्दनिर्वचनम् २४ विवक्षितहोत्रविधानम् ३६ तत्र अनीजानस्य प्रथमद्वितीयोराज्य-होतृशब्दनिर्वचनम् २५दीक्षितस्य संस्कारविधानम् २६ भागस्य पुरोनुवाक्याद्वयम् ३६ ईजानस्य प्रथमद्वितीययोराज्यभागस्य अद्भिरभिषेचनसंस्कारः २७अपां प्रशंसनम् २७ पुरोनुवाक्याद्वयम् ३६नवनीतेनाभ्यञ्जनसंस्कारः २८ स्वपक्षेप्रधानहविषिपुरोनुवाक्याद्वयम्याज्यानुवाक्याविधानम् ३८३८नेत्रयोरञ्जनसंस्कारः २८

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३० ऐतरेयब्राह्मणम् ब्रह्मवर्चसकामस्य प्रागपवर्गत्वम् ६३,ऋग्द्वयोःअग्नेर्विष्णोश्चकर्मानुकूलत्वम्दीक्षापालत्वेन प्रशंसनम् ४०३ ९ अन्नाद्यकामस्य दक्षिणापवर्गत्वम् ६४मन्त्रगतछन्दसः प्रशंसनम् ४१ पशुकामस्य प्रत्यगपवर्गत्वम् ६५ स्विष्टकृद्रूपस्य यागस्य याज्यानु- सोमपानकामस्योत्तरापवर्गत्वम् ६५ | स्वर्गकामस्योर्ध्वापवर्गत्वम् ६६ वाक्याविधानम् ४२तत्र ब्रह्मवर्चसकामस्य गायत्री- पथ्यायागस्य प्रशंसनम् ६६ छन्दस्कयोर्विधानम् ४२ अग्निसोमादीनां प्रशंसनम् ६८ आयुष्कामस्योष्णिक्छन्दस्कयोर्विधानम् ४३ अदितेः प्रतिष्ठाहेतुत्वप्रशंसनम् ६८स्वर्गकामस्यानुप्छन्दस्कयोर्विधानम् ४३ प्रायणीयदेवतादिकविधानम् ६९ यशस्कामस्य बृहतीछन्दस्कयोर्विधानम्४४ तत्र याज्यानुवाक्यानिर्देशनम् ६९ प्रथमदेवतायाः पथ्यायाः पुरोनुवाक्या ७१ यज्ञकामस्य पङ्क्तिछन्दस्कयोर्विधानिम्४५ वीर्यकामस्य त्रिष्टुप्छन्दस्कयोर्विधानम् ४६ पञ्चदेवानां क्रमेण याज्यानुवाक्ये ७२ पथ्यादीनां पञ्चदेवानां क्रमेण संयाज्ये ७४ पशुकामस्य जगतीछन्दस्कयोर्विधानम् ४७ प्रयाजवदनुयाजवत् कर्त्तव्यमिति विधिः ७७ अन्नकामस्य विराट्छन्दस्कयोर्विधानम् ४७ निष्कासस्थापनविधानम् ८०नित्यसंयाज्याविधानम् ४९ प्रायणीयोदयनीयेष्टौ याज्यानुवाक्यानां तत्र विराट्छन्दसः प्रशंसा ४९ विराट्छन्दस्कयोः संयाज्ययोर्विधानम् ५० व्यत्यासविधानम् ८१ अदितेश्चरुप्रशंसनम् ८३ विराट्छन्दस्कमन्त्रप्रतीकद्वयम् ५१ तृतीयोऽध्यायः दीक्षितस्य सत्यवदनविधानम् ५१ विचक्षणशब्दस्य चक्षुःपर्यायत्वम् ५२ सोमक्रयदिनिरूपणम् ८६ प्राचीनवंशं प्रति नीयमाने सोमे पठित- द्वितीयोऽध्यायः व्यानामृचामष्टसंख्यानां प्रशंसनम् ८७ प्रायणीयादिकविधानम् ५६ सोमप्रवहणीनां प्रैषमन्त्रः ८९ सोमप्रवहणीयानामष्टमन्त्राणां निर्देशनम्८९ तत्र प्रायणीयेष्टिविधानम् ५६ प्रायर्णीयोदयनीययोरिष्ट्योः प्रशंसनम् ५६ व्यग्रतयानुष्ठानस्य निषेधः ९४ प्रायणीयेष्टिविधानार्थमाख्यायिका ५७ वारुण्या सोमप्रवहणीयपाठसमापन- प्रायणीयेष्टौ पूर्वदिशायां पथ्यदेवतायाः कारणम् ९९. यजनम् ५९ सोमस्य शकटादवरोहणम् १०३ उभयोरनडुहोर्विमोचने दोषविधानम् १०३ दक्षिणदिग्वर्तिनोऽग्नेर्यजनम् ६० पश्चिमदिग्वर्तिनः सोमस्य यजनम् ६१ | उभयोरनडुहोः शकटयोगेऽपि दोष- उत्तरदिग्वर्तिनः सवितुर्यजनम् ६१ कथनम् १०३ आख्यायिकाद्वारा सोमोपाहरणस्य ऊर्ध्वदिग्वर्तिन्यदितेर्यजनम् ६२ प्रयाजाहुतिरूपप्रायणीयाङ्गकर्मविधानम् ६३ दिग्विधानम् १०४

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विषयानुक्रमणी ३१ सोमस्य जयहेतुत्वकथनम् १०५ होमादूर्ध्वं होत्रा पठनीया सप्तर्चः १५६ आतिथ्येष्टिविधानम् १०७ | होत्रा प्रवर्ग्यहविःशेषभक्षणाकाङ्क्षा १५६ नवकपालहविर्द्रव्याणां विधानम् १०८ होत्रा समन्त्रकं हविःशेषभक्षणम् १५६ विष्णुदैवत्यविधानम् १०८ पात्राणां संसादने होतुर्मन्त्रद्वयम् १५७ शाखान्तरीयनिर्वापमन्त्रप्रशंसनम् १० ९ उत्तमदिने पराह्नकाले समधिकर्क्- अग्निमन्थनविधानम् अग्निमन्थनीयानां प्रैषमन्त्रः ११० पाठविधानम् १५७ अग्निमन्थनीयत्रयोदशमन्त्रविधानम् १११ अभिष्टवस्य समापनविधानम् १५८ १११ देवमिथुनरूपेण प्रवर्ग्यप्रशंसनम् १५८ तत्र नैमित्तिकानां रक्षोघ्नानां नवानामृचामनुवाचनविधानम् उपसदिष्टिविधानम् १६० आतिथ्येष्टौ इष्टिशेषविधानम् ११४ तत्राख्यायिकाकथनम् १६० तत्राज्यभागयोः पुरोनुवाक्याद्वय- १२६ देवानां विजयकथनम् १६२ विधानम् १२६ उपसदः प्रशंसनम् १६७ तत्राक्षेपकथनम् १२७ तानूनप्त्रकर्मविधानम् १६७ तत्र तानूनप्त्रनामनिर्वचनार्थमाख्यायिका १६७ आक्षेपसमाधानम् १२७ आज्यभागयोर्याज्याद्वयविधानम् १२८ देवानां पर्यालोचनपूर्वककृत्यम् १६८ स्विष्टकृतः संयाज्ययोर्विधानम् १२ ९ तानूनप्त्रशब्दनिर्वचनम् १६ ९ ईडाभक्षणादूर्ध्वभाविकर्त्तव्यम् १३० उपसत्सु द्रव्यदेवताविधानप्रस्तावनम्१७१ चतुर्थोऽध्यायः द्रव्यदेवताविधानम् १७२ प्रवर्य्येष्टिविधानम् | १३५ उपसदङ्गभूतव्रतोपायनविधानम् १७२ तत्राख्यायिका १३५ पूर्वाह्णापराह्णयोः सामधेनीविधानम् १७४ प्रवर्ग्यसाधनानां सम्पादनविधानम्प्रवर्गस्यानुज्ञापनमन्त्रः प्रैषमन्त्रश्च १३६ याज्यानुवाक्यानां विधानम् १७४ १३७ आज्यहविष्कत्वेनोपसदां प्रशंसनम् १७६ अभिष्टवस्यैकविंशत्यृचां विधानम् १३८ उपनिसत्सु प्रयाजानुयाजानां निषेधः १७८ अभिष्टवस्य त्रयोदशर्चां विधानम् अभिष्टवस्य षट्सप्तत्यृचां विधानम् १४२ आश्रावणविधानम् १७९ अभिष्टवस्य पूर्वभागसमाप्तिकथनम् १४४ सोमस्याप्यायनविधानम् १७९ अभिष्टवस्योत्तरपटलारम्भविधानम् १५१ तानूनप्त्रस्य क्रूरकर्मनिवारणम् १८०तत्राभिष्टवस्य पुनरेकविंशत्यृचां १५२ सोमस्य निह्नवविधानम्पञ्चमोऽध्यायः १८१ विधानम् | १५२ सोमक्रयार्थाख्यायिकाकथनम् १८४ षड्भिर्मन्त्रैः षण्णां कर्मणां विधानम् अनुवषट्कारमन्त्रः १५४ सोमक्रयविधानम् १८५प्रवर्ग्यस्य ब्रह्माद्वारा जपमन्त्र: १५४ मन्त्राणां मन्द्रध्वनिविधानम् १८६ १५५ अग्निप्रणयनीयर्चां प्रैषमन्त्रः १८८

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ऐतरेयब्राह्मणम् ३२ होत्रा पठितव्या अष्टर्च: १८८, पञ्चदशी ऋचा २१८ २१९ १८८ षोडशी ऋचातत्र ब्राह्मणयजमानाय प्रथमर्चा क्षत्रिययजमानाय प्रथमर्चा १८ ९ | परिधानीया सप्तदशी ऋचा २२० वैश्ययजमानाय प्रथमर्चा २२० १९० नैमित्तिकान्या ऋचा वर्णत्रयकृते द्वितीयर्चा १९ १ षष्ठोऽध्यायः वाच: विसर्गः १ ९ १ | अग्निषोमीयपशुविधानम् २२४ २२४तृतीयर्चा १ ९ २ तत्राख्यायिकाकथनम् २२६ चतुर्थी ऋचा १ ९ ४ | यूपनिखननविधानम् पञ्चमी ऋचा २२६ १ ९ ५ यूपस्य वज्रत्वम् षष्ठी ऋचा १ ९ ६ कामनाविशेषेण यूपस्य वृक्षविशेष- सप्तमी ऋचा १९ ७ विधानम् २२७ अष्टमी परिधानीया ऋचा १ ९९ तत्र स्वर्गकामनया खादिरयूपविधानम्२२७ आद्यन्तयोर्ऋचोरावृत्तिविधानम् _____२०१ | अन्नाद्यपुष्ट्योः कामनया बैल्वयूपम् २२७ हविर्धानप्रवर्तनीयर्चां प्रैषमन्त्रः २०२ बिल्बस्य प्रशंसा २२८हविर्धानप्रवर्तनीयर्व्विधानम् २०२ | तेज:ब्रह्मवर्चसयोः कामनया तत्र प्रथमा ऋचा द्वितीयाद्यास्तिस्र ऋचः २०२ | पालाशयूपः २२९ पञ्चमी ऋचा २०३ बिल्वात्पलाशप्रशंसनम् २२९ २०४ यूपाञ्जनानुवचनीयानामृचां प्रैषमन्त्रः २३० षष्ठी ऋचा २०५ यूपस्याञ्जनकालेऽनुवचनीयर्व्विधानम् २३१ सप्तमी ऋचा २३१ २०७ तत्र प्रथमा ऋचा सप्तमर्गनुवाचने रराटीक्षणविधानम् २०७ द्वितीया ऋचा २३२ अष्टमी परिधानीया ऋचा २३३ २०८ तृतीया ऋचा परिधानविधिः २० ९ पञ्चमी ऋचा २३६ अग्नीषोमयोः प्रणयनम् २११ षष्ठीऋचा २३८ तत्र अग्नीषोमप्रणयनीयर्चां प्रैषमन्त्रः २११ सप्तमी परिधानीया ऋचा २३ ९ अग्नीषोमप्रणयनीयर्व्विधानम् २१२ अनुप्रहरणविचारः २४२ तत्र प्रथमा ऋचा २१२ यूणवस्थानविषयकाख्यायिका २४३ द्वितीया ऋचा २१३ यूपस्यानुप्रहरणविधानम् २४४ तृतीयाद्यास्तिस्र ऋचः २१४ अग्नीषोमीयपश्चालम्भनविधानम् २४६ षष्ठीमारभ्य चतस्र ऋच: २१५ पशुशरीररूपविशेषविधानम् २४६ दशमी ऋचा २१६ पशुलक्षणस्य हविषः शेषभक्षण- एकादशीमारभ्य त्रिस्र ऋच: २१६ चतुर्दशी ऋचा २१७ विवेचनम् २४७

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: विषयानुक्रमणीहविषोऽनुरूपं सूक्तनिर्देशनम् २९३३० तत्रपूर्वपक्ष २४७ हृदयाद्यङ्गस्य प्रधानहविषो याज्या- सिद्धान्तपक्षः २४८ अग्नीषोमीयपशोः प्रयाजानां विधानम्२५० विधानम् २९ १ पर्यग्निकरणर्चां विधानम् २५७ वनस्पतियागविधानम् २९ २ तत्र प्रैषमन्त्रः २५७ स्विष्टकृद्यागविधानम् २ ९ ३ सप्तमोऽध्यायः मैत्रावरुणेन पठनीया तिस्रो ऋचः २५८ होतारं प्रति मैत्रावरुणस्योपप्रैषमन्त्रः २५ ९ मैत्रावरुणेन पठनीयो मन्त्रः २५ ९ पर्यग्निकरणस्तोतुमाख्यायिकापर्यग्निकरणविधानम् २२९९६५ अन्यमनस्कस्य यज्ञीयवाक्प्रयोग- पशोः शामित्रदेशं प्रत्यायनम् २९७ नीयमानस्य पशोः पुरतः उल्मुका- निषेधः २६०: नयनम् २९७ अधित्रुं प्रति होतुः प्रैषमन्त्र २६१ शाखान्तरीयाधिग्रुप्रैषस्य पूर्वार्द्धस्य · वह्निनयनप्रशंसनम् २९८ व्याख्यानम् २६२ हननस्थले बर्हिष्प्रक्षेपणम् २९८ मेधश्शब्दव्याख्यानम् २६२ बर्हिष्प्रक्षेपप्रशंसनम् २९९ पुरीषगोपनार्थमवटखननम् २९९ मात्राद्यनुज्ञाग्रहणम् २६५पदामुदीचीकरणम् २६५ स्तोकावचनीयायाः प्रैषमन्त्रः ३०२ त्वक्च्छेदनविधानम् २६५ अनुवाचनमन्त्राः ३०३वक्षाद्यङ्गानां परिचयः २६६ | वपाप्रशंसायां प्रश्नद्वयम् ३०८ पुरीषगूहनस्थानखननम् २६७ वपाहोमप्रशंसितुमाख्यायिका ३१० शाखान्तरीयस्याधिप्रैषस्योत्तरार्द्धस्य ऋचाद्वारा वपाप्रशंसनम् ३११ आज्याद्याहुतिभिः सह वपाहुतेः • व्याख्यानम् २७२ अध्रिगुमन्त्रपाठान्तरं जपविधानम् २७७ प्रशंसनम् ३१२पशुपुरोडाशंविधानार्थमाख्यायिका २८० अवदाने विशेषविधानम् ३१४ आज्यस्य हिरण्यप्रतिनिधित्वम् ३१५पुरोडाशविधानम् २८२ अवदानगतपञ्चसंख्याप्रशंसनम् ३१५पुरोडाशयागस्य प्रशंसनम् २८५पशुपुरोडाशयोः सादृश्यकथनम् २८५ प्रातरनुवाकार्थं प्रैषमन्त्रः ३१६वपायाज्याविधानम् २८६. प्रातरनुवाकीया ऋचा ३१७पुरोडाशस्य याज्याविधानम् २८७ प्रातरनुवाकशब्दनिर्वचनम् ३१ ९पुरोडाशस्य स्विष्टकृतो याज्या- प्रातरनुवाकस्य कालविशेषः ३१ ९ प्रातरनुवाकविषये पक्षान्तरविधानम् ३२२ विधानम् २८८ प्रातरनुवाके प्रथमचें विधातु-पशुपुरोडाशसम्बन्धीडोपाह्वानम् २८९ हृदयाद्यङ्गावदानसूक्तविधौ प्रैषमन्त्रः २ ९ ० माख्यायिका ३२३ ऐ.ब्रा. भू- ३

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ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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ऐतरेयब्राह्मणम् ३४ फलविशेषाय ऋगन्तरकथनम् ३५४, अर्थवादेन विधेरुन्नयनम् ३२४ तत्र तेजस्कामाय ऋगन्तरकथनम् ३५४आख्यायिकाद्वारा तदृक्प्रशंसनम् - २३५ : पशुकामाय ऋगन्तरकथनम् ३५४तस्या ऋच त्रिरावृत्तिविधानम् ३२७ कामनाविशेषेण प्रातरनुवाकस्य- विधेरुपसंहारः ३५५ | अपोनप्त्रीय समापनविधानम् ३५६ विधानम् ३२८तत्रायुष्कामस्य संख्यानिर्धारणम् ३२८ उपांश्वन्तर्यामयोर्विधानम् ३५६ तत्र वाग्विसर्जनम् ३५६क्रतुकामस्य संख्यानिर्धारणम् ३२८प्रजापशुकामस्य संख्यानिर्धारणम् ३२ ९ वाग्विसर्गप्रकारविधानम् ३५८ दुर्ब्राह्मणत्वपरिहारकामनया संख्या- होतुः सर्पणनिवारणम् ३६० बहिष्पवमानानुमन्त्रणंविधानम् ३६१ | निर्धारणम् ३३०स्वर्गकामनया संख्यानिर्धारणम् ३३१ अनुमन्त्रणमन्त्रः ३६२ सर्वकामसिद्ध्यर्थमपरिमितसंख्या- बहिष्पवमानानुमन्त्रणे यजुर्मन्त्रः ३६२ मैत्रावरुणपयस्याप्रशंसार्थमाख्यायिका ३६३ निर्धारणम् ३३१ 'प्रातरनुवाकगतास्वृक्षु छन्दोविशेष- सवनीयपुरोडाशविधानम् ३६४ पुरोडाशशब्दनिर्वचनम् ३६६ विधानम् ३३२ पुरोडाशस्वरूपविशेषनिर्धारणम् ३६६प्रातरनुवाकस्यानुवचनप्रकारविशेषः ३३५ पुरोडाशशेषभक्षणविधानम् ३६८प्रातरनुवाकस्य क्रमसमाधानम् ३३७ धनादिरूपसवनीयपुरोडाशानांप्रातरनुवाकप्रशंसनम् ३३७सोमपासोमपदेवतानां परिगणनम् ३३८ प्रशंसनम् ३६ ९प्रातरनुवाकस्य परिधानीयर्व्विधानम् ३४० तत्र हविष्पङ्किविधानम् ३६ ९ अष्टमोऽध्यायः अक्षरपङ्क्त्युन्नयनविधानम् ३७० अपोनप्त्रीयानुवचनं विधातुमाख्यायिका ३४२ नाराशंसपंक्त्युन्नयनविधानम् ३७१ सवनपंक्तिविधानम् ३७१ सत्रानुष्ठायिनामृषीणां कृत्यम् ३४४ सवनीयपुरोडाशानां क्रमेण याज्या- अपोनप्त्रीयसूक्तस्य नैरन्तर्येणानुवाचनम् ३४४ प्रथमाया ऋचः सावृत्तिं सान्तत्यम् ३४५ विधानम् ३७२ नवमोऽध्यायः अपोनप्त्रीयसूक्तानुवचने प्रकार- ऐन्द्रवायवादिद्विदेवत्यग्रहस्य विशेषविधानम् ३४६ विधातुमाख्याका ३७६ होतुः प्रश्नार्थं यजुर्मन्त्रः ३५० अध्वर्योः प्रत्युत्तरमन्त्रः ५५० धावने वायोरिन्द्रस्य संवादः ३७७ निगदरूपेण मन्त्रेण होतुः प्रत्युत्थान- सोमपानक्रमविधानम् ३७८ | विधानम् ३५१ । द्विदेवत्यग्रहाणांऐन्द्रवायवग्रहविधानम्प्राणरूपत्वेन प्रशंसनम्३७८३८० होतुरपानुवर्तनविधानम् ३५२