ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 21–30
ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध · पृष्ठ 21–30
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ऐतरेयब्राह्मणम् १५ कीथ महोदय के अनुसार यह सम्भव है कि महिदास ऐतरेय, ऐतरेयब्राह्मण के सम्पादक हैं । इसी विचारधारा को मानने वाले अन्य पाश्चात्य विद्वान् औफ्रेक्ट भी हैं । इस प्रकार सायण इन्हें परम्परानुसार इतरा और आनन्द तीर्थ विशाल के पुत्र और नारायण का अवतार बताते हैं । छान्दोग्य उपनिषद् में इनके एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहने की बात कही गयी है । अतः यह निःसन्दिग्ध है कि ये एक प्रख्यात ऋषि थे । शाङ्खायनगृह्यसूत्र में निर्दिष्ट ऐतरेय एवं महैतरेय नामों के उल्लेख से इसकी पुष्टि हो जाती है । ' महिदास' शब्द की व्युत्पत्ति चुरादिगणीय पूजार्थक 'मह्' धातु, दानार्थक ' मञ्' धातु और आसनार्थक ' आस्’ धातु से होती है । ऐतरेयब्राह्मण का प्रतिपाद्य •सोमयाग— इस यज्ञ में सोमरस मुख्य हवनीय द्रव्य होता है । इसी कारण इस यज्ञ का नाम सोमयाग हुआ । सोम एक लता विशेष है । पूर्वकाल में यह विशेष स्थानों पर होती थी आजकल सोम सर्वथा उच्छिन्न हो गया है । इसके अभाव में अनुकल्प रूप में 'पूती' नामक एक लता विशेष का याज्ञिक लोग उपयोग करते हैं । सोमयज्ञ एकाह से लेकर संवत्सर पर्यन्त किये जाते हैं । एक दिन में सम्पन्न होने वाला यज्ञ ‘एकाह' कहलाता है । दो दिन में सम्पन्न होने वाला यज्ञ 'द्विरात्र कहलाता है, इसी प्रकार बारह रात्रि पर्यन्त होने वाला यज्ञ ' अहीन' कहा जाता है 1। त्रयोदश रात्रि से प्रारम्भ करके सहस्र संवत्सर पर्यन्त किये जाने वाला यज्ञ ' सत्र' कहा जाता है । इनमें त्रयोदश रात्रि से ' शतरात्रि' पर्यन्त किये जाने वाला यज्ञ ' रात्रिसत्र' कहा जाता है तथा इसके बाद के सब यज्ञ केवल ' सत्र' कहे जाते हैं । ' द्वादशाह यज्ञ' को अहीन और ' सत्र' दोनों प्रकार का माना जाता है । सोम यज्ञ करने वाले यजमान को अपने देश के राजा से भूमि की याचना करनी होती है* । यहाँ तक की राजा को भी यज्ञ करने के लिए आदित्य से भूमि की याचना करनी होती थी । इस उक्ति से प्रकट होता है कि भूमि का आधिपत्य दिव्य था और राजा देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में यज्ञ करने के लिए भूमि प्रदान करता था । सोमयज्ञों में ‘ ज्योतिष्टोम यज्ञ' को ' सायण' ने सबसे मुख्य यज्ञ माना है ' । 'ऐतरेय-ब्राह्मण' में सोमयज्ञों के रूप में केवल 'ज्योतिष्टोम ' यज्ञ का ही वर्णन किया गया है, अन्य ( १ ) The Aitareya aranyaka by A.B. Keith, p. 16 in the introduction.( ) ( )(४२) छाऐ००ब्रा०-३४.२उ०- ३ शा०गृ० सू०-४.१०.३ ( ५ ) एष वाव प्रथमो३.१६७ यज्ञो यज्ञानां यज्जयोतिष्टोमः । -( ऐ०ब्रा० (सायण)- १.१ भूमिका)
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१६ भूमिका तीन सोम यज्ञों का केवल नामोल्लेख है, वे हैं- गोष्टोम, आयुष्टोम, चतुष्टोम ' । 'ज्योतिष्टोम यज्ञ' के नामकरण के विषय में कहा गया है कि अग्नि ऊपर जाकर प्रकाश का रूप धारण करता है, अतः इसे परोक्ष रूप से ज्योतिष्टोम कहा गया है; क्योंकि देवता परोक्षप्रिय होते हैं । 'ज्योतिष्टोम यज्ञ' की सात संस्थाएँ होती हैं- ( १ ) अग्निष्टोम, ( २ ) अत्यग्निष्टोम, ( ३ ) उक्थ्य, (४ ) षोडशी, ( ५ ) वाजपेय, ( ६ ) अतिरात्र और ( ७ ) आप्तोर्याम I। ऋग्वेदीय ब्राह्मण में अग्निष्टोम, उक्थ्य षोडशी तथा अतिरात्र- इन चार संस्थाओं का ही वर्णन किया गया है, अन्य तीन संस्थाओं का नहीं । अग्निष्टोम यज्ञ- अग्निष्टोम यज्ञ को सभी सोम यज्ञों का आदर्श रूप माना गया है । यह यज्ञ सभी सोम यज्ञों की प्रकृति है । उक्थ्यादि छः सोम संख्या विकृति यज्ञ है । अग्निष्टोम यज्ञ की प्रशंसा करते हुए कहा गया है—'जिस प्रकार सभी नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार सभी सोमयज्ञ अग्निष्टोम में मिल जाते हैं । अग्निष्टोम यज्ञ के आरम्भ में अग्नि की स्तुति की जाती है और अन्तिम स्तोत्र अग्नि को ही सम्बोधित करके पढ़ा जाता है । अत: इसका नाम ' अग्निष्टोम' पड़ा' । इस यज्ञ के मुख्य कृत इस प्रकार हैं — पुरोहितवरण, दीक्षणीयेष्टि ( यजमान की दीक्षा ), प्रायणीय इष्टि (आरम्भ वाली इष्टि ), सोमक्रय, अतिथ्येष्टि ( सोम की आतिथ्य करने वाली इष्टि ), प्रवर्ग्य एवं उपसद्, अग्निप्रणयन, अग्निषोम प्रणयन, हविर्धान-प्रणयन, पशुयज्ञ, सोम अभिषणव, सोम की आहुति देना एवं सोमयज्ञ करना उदयनीयेष्टि और अवभृथ स्नान । सर्वप्रथम यज्ञ के पुरोहितों का वरण किया जाता है, जो वेदज्ञ, निर्लोभी, तपस्वी और यशस्वी ब्राह्मण हो । इनकी संख्या सोलह होती है । वरण के बाद इनको मधुपर्क अर्पण किया जाता है । यजमान अपने देश के राजा से यज्ञ- सम्पादन हेतु भूमि को दान-स्वरूप प्राप्त करने की याचना करता है । ७ इस कृत्य के बाद दीक्षणीय- इष्टि का सम्पादन होता है । इसके फलस्वरूप यजामन दीक्षित समझा जाता है । इसमें अग्नि और विष्णु देवताओं को उद्दिष्ट करके ग्यारह कपालों के पुरोडाश की आहुति प्रदान की जाती है । इस इष्टि का सम्पादन अमावस्या अथवा पूर्णिमा को किया जाता है । दीक्षा की क्रिया में यजमान के पुनर्जन्म का ( १ ) ऐ० ब्रा० ( सायण )-२४.५, सायण भूमिका । - ( ऐ० ब्रा० (सायण) - १.१ ) ( २ ) अथ यदूर्ध्वं सन्तं ज्योतिभूतमस्तुवंस्तस्माज्ज्योतिस्तोमस्तं ज्योतिस्तोमं सन्तं ज्योतिष्टोम इत्याचक्षते.....। - ( ऐ ० ब्रा० ( सायण)- १४.५ ) ( ३ ) अग्निष्टोमः प्रकृतिः कृत्स्नस्यापि अनुष्ठेयस्य । –(ऐ०ब्रा० - १.१ )( ) ( ) ४ ऐ० ब्रा०-४१.५ ५ ऐ०ब्रा०-१४.५( ) ( ) ६ ऐ०ब्रा०-१५.२ ७ ऐ०ब्रा०-३४.२
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ऐतरेयब्राह्मणम् १७ भावनिहित है । यजमान के लिए क्रियमाण कृत्य सद्यजात शिशु के समान होता है । दीक्षित पुरुष मौन रहता हुआ ऐसे स्थान पर निवास करता है, जहाँ पर सूर्य का प्रकाश न पहुँचे । · नये वस्त्रों को धारण करके ऊपर से मृगचर्म को धारण करता है । विभिन्न देवता- विषयक अनुवाक्या और याज्या मन्त्रों का पाठ करता हुआ, विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु स्विष्टकृत् संयाज्या में विभिन्न छन्दों वाले मन्त्रों का उच्चारण करता है । सत्य बोलने का व्रत लेता है । इस दीक्षा का फल संस्रव-दोष से मुक्ति बतायी है । दीक्षणीय- इष्टि के उपरान्त प्रायणीय- इष्टि का कृत्य किया जाता है जिसका अभिप्राय प्रारम्भ में क्रियमाण कृत्य से है । इसमें चरु (चावल ) को पकाकर अदिति को आहुति दी जाती है । इसके अतिरिक्त आज्य की चार आहुतियाँ पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम और सविता देवों के लिए अर्पित की जाती है । तेज, ब्रह्मवर्चस्, अन्न, पशु, सोमपान और स्वर्ग की प्राप्ति हेतु क्रमश: पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और ऊर्ध्व दिशा में आहुति दी जाती है । होता सभी छन्दों के प्रतीक रूप में त्रिष्टुप, गायत्री और जगती छन्दों वाले मन्त्रों का उच्चारण करता है । प्रयुक्त मन्त्रों में प्र, नी, पथि, स्वस्ति शब्दों का प्रयोग होता है । प्रायणीय- इष्टि के अनन्तर ' सोमक्रय' का कृत्य सम्पन्न होता है । सोम को संवत्सर के तेरहवें महीने ( अधिमास ) में खरीदा जाता है । खदीरते समय सुब्रह्मण्या पुरोहित के साथ रहता है । इसके मूल्य के रूप में बछिया को दिया जाता है । बछिया की संज्ञा ‘ सोमक्रयणी’ है ।“ खरीदकर सोम को गाड़ी में लाया जाता है । गाड़ी को प्रथम पूर्वाभिमुख, फिर दक्षिणाभिमुख और अन्त में उत्तराभिमुख चलाते हैं तथा उत्तराभिमुख रहते हुए ही सोम को नीचे उतारते हैं । इस समय गाड़ी का एक बैल छोड़ दिया जाता है और एक बैल गाड़ी से जुता रहता है । नीचे उतार कर वेदी के अन्दर मृगचर्म पर रखा जाता है । सोमक्रय के अनन्तर सोम के स्वागत में ' आतिथ्य- इष्टि' का सम्पादन होता है । इस इष्टि का प्रमुख देवता विष्णु हैं । इनके लिए नौ कपालों का पुरोडाश बनाया जाता है । तदुपरान्त अरणिमन्थन से अग्नि को उत्पन्न किया जाता है ।" सविता, द्यावापृथिवी और अग्नि देवों की ऋचाओं का पाठ किया जाता है । यदि अग्नि शीघ्र प्रज्वलित न हो तो ( १ ) द्वयोर्बहूनां वा यजमानानां सम्भूयसोमाभिषवः संसवः, स च महान्दोषः तस्मिन्नैव देशे तस्मिनैव काले मत्सरग्रस्तैर्यजमानैः प्रवर्तित्त्वात्। -(ऐ०ब्रा० (सायण भाष्य)- १.३ ) (२ ) ऐ०ब्रा० - २.१-५; कौ०ब्रा० - ७.५ - ९ (३ ) ऐ०ब्रा ० - ३.१-३; कौ० ब्रा० - ७.१० ( ) ( ) -; (४६ ) ऐऐ००ब्राब्रा०-२६.३० - ३.१-३; कौ०ब्रा५० - ८.१ऐ०ब्रा- ०२ ५.१ कौ ० ब्रा०-६.१० (७ ) ऐ ०ब्रा०- ३.४-७ ऐ.ब्रा. भू- २
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१८ भूमिका समझा जाता है कि राक्षसों ने अग्नि को पकड़े हुए है । तब राक्षस हनन विषयक ऋचाओं का पाठ होता है प्रज्ज्वलित अग्नि को आह्वनीय कुण्ड में रखते हैं । अन्त में यज्ञशेष का भक्षण किया जाता है । आतिथ्य - इष्टि के अनन्तर 'प्रवर्ग्य- इष्टि' का सम्पादन किया जाता है । ' सूत्र-ग्रन्थों में ‘प्रवर्ग्य - इष्टि' को एक स्वतन्त्र यज्ञ प्रतिपादित किया गया है । इस कृत्य से यजमान के लिए दैवी शरीर के प्राप्ति की कल्पना की गयी है । मिट्टी का एक पात्र निर्मित किया जाता है, जिसकी संज्ञा ' महावीर' है । इसके अतिरिक्त दो अन्य पात्र निर्मित किये जाते हैं । पात्र में घृत को गर्म करते हैं । उबलते हुए घृत में गौ तथा बकरी का दूध मिलाया जाता है । इस प्रकार मिश्रित गर्म दूध व घृत की संज्ञा ' धर्म' है । इस ' धर्म' की आहुति मुख्य रूप से ब्रह्मा, सविता, वाक्, बृहस्पति आदि को दी जाती है । प्रवर्ग्य -इष्टि के अनन्तर उपसद्- इष्टि का सम्पादन होता है जिसमें घृत की आहुतियाँ अग्नि, सोम और विष्णु देवों के लिए अर्पित की जाती है । आज्य भागों, प्रयाजों और अनुयाजों की क्रियाएँ नहीं की जाती । तीन सामिधेनियों और तीन देवताओं के याज्या मन्त्रों का पाठ किया जाता है । उपसद् के मन्त्रों से ज्ञात है कि वे लोहे, सोने और चाँदी के दुर्गों की ओर सङ्केत करते हैं । उपसद् के समय महावेदी का निर्माण, सोमवृद्धि आदि विविध कृत्य किये जाते हैं । इनके मध्य 'तनूनप्त्र-क्रिया " की जाती है । इस क्रिया के द्वारा पुरोहित और यजमान घृत को छूकर सत्य भाषण करने की प्रतिज्ञा करते हैं । तदनन्तर सोमपान, सोम- अभिषवण, हविर्धान, अग्नि प्रणयन', कुशप्रस्तारण, आदि विविध कृत्य करने के उपरान्त पशु बलि का कृत्य किया जाता है जो विशेष रूप से अग्नि और सोम को उद्दिष्ट करके सम्पादित होता है । पशु - इष्टि – सर्वप्रथम सोम यज्ञ में पशु बलि के लिए पशु बाँधने हेतु यूप का निर्माण किया जाता है, यह खदिर, बिल्ब और पलाश के काष्ठ से बनाया जाता है । पशु-बलि का भाव यह प्रतिपादित करता है कि दीक्षित यजमान देवों को प्राप्त हो जाता है । पशु- बलि के द्वारा वह देवों से अपने को छुड़ा लेता है । वध के समय पशु के चारों ओर अग्नि को घुमाया जाता है । आत्री मन्त्रों के द्वारा पशु को शुद्ध किया जाता है । पशु - वध ( १ ) ऐ०ब्रा० -४.१-५; कौ ० ब्रा०-८.३-७ ( २ ) आपस्तम्बश्रौतसूत्र १५.५.१२; बौधायन श्रौतसूत्र- ९.६ तथा वैदिक धर्म और दर्शन, पृष्ठ-४१२ ( ३ ) ऐ ०ब्रा०-४.६- ९; कौ० ब्रा०-८.८ - ९ ( ४ ) वैदिक धर्म और दर्शन, पृ ० ४०६ पर टिप्पणी नं०-२( ) - ( ) -(५७) ऐऐ००ब्राब्रा०० - ५.१६.१ से - ७.४ तक६; कौकौ००ब्राब्रा०-१०.१-६० ९.१
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ऐतरेयब्राह्मणम् १ ९ के समय पशु के लिए स्वर्ग जाने की कामना की जाती है । पशु - वध के कृत्य में माता-पिता, भाई- बहन आदि परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग रहता है । पशु संज्ञपन ( वध ) के समय मल- मूत्र आदि को छिपाने के लिए एक गर्त खोदा जाता है । पशु के नीचे दर्भ बिछाते हैं । वधकर्त्ता दो होते हैं । एक की संज्ञा 'शमिता' और दूसरे की संज्ञा 'अध्रिगु' है । वध के समय पशु के पैर उत्तर और आँखें सूर्य की ओर होती है । वध के बाद त्वचा को प्रथम निकालते हैं, तदनन्तर वपा निकाली जाती है । पशु के एक भाग को काटकर पृथक् किया जाता है । वपा को स्रुवा में डालकर भूनते हैं और घृत के साथ उसकी आहुति दी जाती है । इस ' पशु - इष्टि' में चावल के पुरोडाश की आहुति का विशेष भाग है । इस समय पुरोडाश की आहुति में ही पशु की कल्पना किये जाने का सङ्केत है जिससे पशु-वध का निषेध होता है । पशु - इष्टि के अनन्तर प्रातरनुवाक जब पक्षी भी नहीं जागते उस समय अध्वर्यु का' होताउच्चारण' को प्रातरनुवाककिया जाता (प्रातहै । ' काल: सूर्योदयकी स्तुतिके पूर्व) करने के लिए आदेश देता है । यह स्तुति अग्नि, उषा एवं अश्विनों के लिए कही जाती है; क्योंकि ये देव प्रात: काल आते हैं । प्रातरनुवाक के समय अग्नीध्र या प्रतिप्रस्थाता नामक ऋत्विज् निर्वाप ( आहुतियों की सामग्री) निकालता है । इसमें ग्यारह कपालों वाली एक रोटी इन्द्र के लिए, इन्द्र के घोड़ों के लिए धाना ( भुने हुए जौ), पूषा के लिए करम्भ (दही से मिला जौ का सत्तु), सरस्वती के लिए दही तथा मित्र एवं वरुण के लिए पयस्या ( मट्ठा) होता है । इसके उपरान्त अन्य अनेक कृत्य किये जाते हैं । प्रातरनुवाक के समय दीर्घ- आयु, यज्ञ, प्रजा, पशु, पाप से मुक्ति, स्वर्ग आदि की प्राप्ति हेतु सौ, तीन सौ साठ, सात सौ बीस, आठ सौ, सहस्र अथवा अपरिमित मन्त्रोच्चारण का विधान है । सोम अभिषवण— तदनन्तर सोम रस निकालने का कृत्य किया जाता है । ' दो प्रकार के जलों का प्रयोग होता है । प्रथम जल की संज्ञा ' वसतीवरी' है, जो ' सूर्य- रात्रि’ में लाया जाता है । दूसरे जल की संज्ञा ' एकधना' है, जो उसी दिन प्रातःकाल लाया गया होता है । इन दोनों प्रकार के जलों को ' होता' नामक पुरोहित वेदि पर रखता है । तदनन्तर इन जलों से सोम को भिगोकर निचोड़ा जाता है । यह कृत्य माध्यन्दिन- सवन में आँख पर पट्टी बाँधकर किया जाता है । सोम पीसने के लिए पत्थर का प्रयोग होता है । इस समय सोम- विषयक सूक्तों के अतिरिक्त अन्य सौ अथवा अपरिमित ऋचाओं का पाठ किया जाता है । " सोम- अभिषवण के समय प्रयोग में आने वाले उपकरण हैं -चर्म, दो तख्ते, ( १ ) ऐ० ब्रा० - ६.५-८; कौ०ब्रा० - ११.१-८ (२ ) ऐ०ब्रा० -८.८ ( ३ ) ऐ० ब्रा०- ८.१-६; कौ०ब्रा०-१२.१-८ (४ ) ऐ०ब्रा०-२६.१
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• २० भूमिका द्रोणकलश, दशपवित्र, पूतभृत्, आधवनीय, उदंचन और चमस । तदनन्तर अन्य अनेक कृत्यों के साथ पात्र पर पात्र रखे जाते हैं । सोम से जो पात्रपूरित किये जाते हैं उनका नाम— ऐन्द्रावायव, मैत्रावरुण, शुक्र, मन्थी, आग्रायण, उक्थ्य और ध्रुव हैं । जो प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन करके जल में प्रवेश करता है, वह वरुण हो जाता है, इसीलिए इसमें वरुण सम्बन्धी पुरोडाश समर्पित किया जाता है । शस्त्र एवं स्तोत्र — अग्निस्तोम यज्ञ में शस्त्रों के वाचन के सात प्रकार हैं— ( १ ) मौनरूप से जप, ( २ ) आहाव एवं प्रतिगर, ( ३ ) तूष्णींशस:, (४ ) निविद् या पुरोरुक्, ( ५ ) सूक्त, ( ६ ) उक्थ्यंवाचि शब्दों का जप, ( ७ ) याज्या ।± शस्त्र और स्तोत्र शब्दों का अर्थ है कि स्तुति करना । स्तोत्र स्तुति में स्वर सहित गायन होता है । शस्त्र स्तुति में स्वर का समावेश नहीं होता । अग्निष्टोम यज्ञ में इनकी संख्या बारह - बारह है । * प्रातः सवन में पाँच स्तोत्र गाये जाते हैं, बाहिष्पवमान स्तोत्र तथा चार आज्य स्तोत्र | माध्यन्दिन पवमान स्तोत्र तथा चार पृष्ठ स्तोत्र । सायंसवन में दो ' स्तोत्र', आर्भव पवमान तथा अग्निष्टोम साम । बारह शस्त्रु ये हैं — प्रात: सवन में आज्यशस्त्र, प्रउगशस्त्र, मैत्रावरुणशस्त्र, ब्राह्मण- च्छंसीशस्त्र एवं अच्छावाकशस्त्र । माध्यन्दिनसवन में मरुत्वतीयशस्त्र, निष्केवल्यशस्त्र, मैत्रावरुणशस्त्र, ब्राह्मणच्छंसीशस्त्र एवं अच्छावाक्शस्त्र । सायंसवन में दो शस्त्र होता है- वैश्वदेवशस्त्र व अग्निमारुतशस्त्र । उक्थ्य यज्ञ- अग्निष्टोम के बाद सोम यज्ञ के विकृति रूप यज्ञों में उक्थ्य यज्ञ का उल्लेख हुआ है । इस सोम यज्ञ में अग्निष्टोम के स्तोत्रों तथा शस्त्रों के अतिरिक्त अन्य तीन उक्थ्य स्तोत्र और तीन उक्थ्य शस्त्र पाये जाते हैं । इस प्रकार सायंकालीन सोमरस निकालते समय गाये जाने वाले स्तोत्र एवं पढ़े जाने वाले शस्त्र, छन्द कुल पन्द्रह होते हैं । ७ षोड्शी यज्ञ– इस यज्ञ में उक्थ्य के पन्द्रह स्तोत्रों एवं शस्त्रों के अतिरिक्त एक अन्य स्तोत्र एवं शस्त्र का गायन और पाठ होता है । इस प्रकार स्तोत्रों और शस्त्रों की संख्या सोलह होती है 1। सोलह अक्षर के बाद ' ओ३ म्' पद का उच्चारण किया जाता है । सोलह ( ) ( ) १ ऐ०ब्रा०-३५.६ २ आश्वलायनश्रौतसूत्र-५.१०.२१.२४( ) - ( ) -( ३५ ) इनपूर्वमीमांसासूत्रशस्त्रों का विस्तृत७.२.१७विवेचन डॉ० जमुनापाठक४ ऐ०ब्राद्वारा० १४.१सम्पादित ऐतरेयाण्यक में दिया( ६ ) ऐ० ब्रा०-१५.६-६ गया है । इसे; कौवहीं० ब्रा०-१६.११देख लेना चाहिए । की भूमिका (७ ) ऐ० ब्रा०-१४.३
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ऐतरेयब्राह्मणम् २१ पदों का निविद् रखा जाता है । इसलिए इस यज्ञ का नाम 'षोडशी यज्ञ' है इस यज्ञ में पिङ्गल अश्व या खच्चर की दक्षिणा दी जाती है । अतिरात्र यज्ञ ' – षोड्शी स्तोत्र के अनन्तर अतिरात्र संज्ञक सामों का गायन इस यज्ञ के अन्त में होता है । इसमें उन्नीस स्तोत्र और उन्नीस शस्त्र होते हैं । यह एक दिन और एक रात्रि में पूर्ण होता है, अतः इसका नाम अतिरात्र है । इसके अतिरिक्त स्तोत्र एवं शस्त्र रात्रि के समय स्तोत्रों एवं शस्त्रों के चार आवर्तों में कहे जाते हैं । इनकी अपर संज्ञा ' पर्याय' भी है । एक सहस्र मन्त्रों वाले आश्विन् शस्त्र का प्रातरनुवाक की रीति से किया जाता है । अत्यग्निष्टोम यज्ञ– कर्मकाण्ड में इस यज्ञ के पृथक् अस्तित्व को नहीं माना जाता अपितु अग्निष्टोम यज्ञ अथवा षोडशी यज्ञ के समान ही प्रतिपादित किया जाता है । इसमें षोडशी यज्ञ से एक स्तोत्र और एक शस्त्र अधिक रहता है । आप्तोर्याभ यज्ञ- इस यज्ञ का अतिरात्र के अन्तर्गत परिगणन है । इसमें तैंतीस स्तोत्र और तैंतीस शस्त्र होते हैं । अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेव एवं विष्णु के लिए क्रमशः एक-एक सोम की आहुति दी जाती है । इसका सम्पादन पशु-हित के लिए किया जाता है । * सोम यज्ञों के भेद एकाह यज्ञ- अग्निष्टोम तथा अन्य सोमयज्ञ एकाह कहते जाते हैं । इन यज्ञों में प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन में एक ही दिन में तीन बार सोमरस का पान किया जाता है ।५ अहीन यज्ञ- इन यज्ञों का सम्पादन बारह दिनों तक किया जाता है । इनकी समाप्ति पर अतिरात्र यज्ञ करने का विधान है । दीक्षा और उपसद कृत्यों के दिनों को यदि इसमें सम्मिलित कर लिया जाय तो इसकी अवधि एक मास हो जाती है । सत्र यज्ञ - ऐसे यज्ञों को ' सत्र' कहा जाता है, जो दीर्घकाल की अवधि तक के लिए सम्पादित किये जाते हैं । इनका सम्पादन बारह दिनों से लेकर एक वर्ष या इससे अधिक रहता है । सत्रयज्ञों की प्रकृति 'द्वादशाह यज्ञ' को माना गया है । द्वादशाह यज्ञ – 'ऐतरेयब्राह्मण' में इस यज्ञ का विस्तृत विवेचन उपलब्ध है । इसका परिगणन अहीन और सत्र- इन दोनों यज्ञों में किया जाता है । इस यज्ञ में तीन त्र्यह ((नौ) दिन) एक- दशवीं और दो अतिरात्र होते( हैं) । द्वादशाह- 'प्रायणीय' से प्रारम्भ होकर १ ऐ०ब्रा० १६.१-४ २ ऐ०ब्रा० १४.३ तथा १६.५-६( ३ ) वैदिक धर्म और दर्शन, पृ०-४१५ (४ ) आश्वलायनश्रौतसूत्र- ९.११.१( ) ( ), ५ आश्वलायनश्रौतसूत्र-८.५.११ ६ ऐ०ब्रा० अध्याय १ ९ से २४ तक
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भूमिका ‘उदयनीय२२ ' पर समाप्त होता है । ये दोनों अतिरात्र दिवसों के होते हैं । पृष्ठषडह के आरम्भिक कृत्यों के रूप में इसमें चार छन्दोभ होते हैं और एक अतिवाक्य दिन जो कि दसवाँ होता है । पृष्ठषडह के सभी छः दिनों में पृष्ठ स्तोत्र भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है । प्रथम दिन रथन्तर स्वर में, द्वितीय दिन बृहत् में, तृतीय दिन वैरूप में, चतुर्थ दिन वैराज में, पञ्चम दिन शाक्वर में और षष्ठ दिन रैवत साम होता है । ऋत्विजों की संख्या सोलह होती है, जोकि मुख्य कृत्यों से पूर्व दीक्षा प्राप्त करते हैं । दीक्षा का समय शिशिर ऋतु में शुक्ल पक्ष को उत्तम माना गया है । दीक्षा से पूर्व प्रजापति के लिए पशु - आलम्भन किया जाता है । इस यज्ञ की उत्पत्ति प्रजापति के अङ्गों से प्रतिपादित की गयी है । इस यज्ञ का सम्पादन श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए किया जाता है, जिस तथ्य को एक आख्यायिका के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट किया गया है कि ' एक बार देवों ने इन्द्र को ज्येष्ठ और श्रेष्ठ नहीं माना तो इन्द्र ने श्रेष्ठता प्राप्ति हेतु द्वादशाह यज्ञ का सम्पादन किया । गवामयन यज्ञ– यह सत्र- यज्ञ सांवत्सरिक सत्र यज्ञों का आधार है । इसका अभिप्राय गौ = सूर्य की किरणों के मार्ग से है । इस सत्र का प्रारम्भ फाल्गुन या चैत्रमास की पूर्णिमा पर या माघ की पूर्णिमा के चार दिन पूर्व किया जाता है । इस सत्रयज्ञ में छ: मास पूर्वार्द्ध में और छ: मास उत्तरार्द्ध में होते हैं । मध्य में विषुवन्त दिवस होता है । जिसके मुख्य कृत्य इस प्रकार हैं— प्रायणीय अतिरात्र ( आरम्भिक दिन) एक चतुर्विंश दिवस (उक्थ्य ) जिस पर चौबीस गुने स्तोम का प्रयोग होता है । पाँच मास जिनमें प्रत्येक चार अभिप्लव षडह के चौबीस दिन, एक पृष्ठ्य षडह के छः दिवस होते हैं । छठे महीने में तीन अभिप्लव षडह, एक पृष्ठ्य षडह इस प्रकार कुल चौबीस दिवस होते हैं, एक अभिजित् दिवस (अग्निष्टोम) तीन स्वरसाम दिवस मिलाकर ये अट्ठाईस दिवस होते हैं । महीना पूरा करने के लिए दो दिवसों का आधान कर दिया जाता है । इसके बाद मध्य दिवस 'विषुवत्' आता है । इस दिन एकविंश स्तोम का पाठ तथा अतिग्राह्य सोमपात्र सूर्य तथा किसी अपराधी को दिया जाता है । संवत्सर के उत्तरार्द्ध के में सातवें महीने में तीन स्वर साम दिन, एक विश्वजित् दिन ( अग्निष्टोम), एक पृष्ठ्य षडह तथा तीन अभिप्लव षडह रहते हैं । इस प्रकार ये अट्ठाईस दिन हुए, पूर्व की भाँति दो दिनों का आधान करके महीना पूरा किया जाता है । इससे आगे ( १ ) ऐ ०ब्रा० - १ ९.३ ( २ ) ऐ ० ब्रा०-१७.६-८ तक तथा १८ वाँ अध्याय सम्पूर्ण । (३ ) ऐ० ब्रा० - १ ९.४
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ऐतरेयब्राह्मणम् २३ के चार मासों ( आठवाँ, नवाँ, ग्यारहवाँ) में एक- एक पृष्ठ्य षडह तथा चार- चार अभिप्लव षडह होते हैं । बारहवें मास में तीन अभिप्लव षडह, एक आयुष्टोम दिवस, एक गोष्टोम दिवस, दशरात्र, महाव्रत और उदयनीय दिवस होते हैं । राजकर्तृक यज्ञ – सामाजिक प्रतिष्ठा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति राजा होता है । प्रत्येक व्यक्ति की अभिलाषा इस प्रकार के पद को प्राप्त करने की होती है । ब्राह्मण-काल में राजा का पद भी विभिन्न यज्ञों के माध्यम से सम्भव था । अतः राजसूय, राज्याभिषेक, अश्वमेध आदि यज्ञों का विकास हुआ । राजत्व से सम्बन्ध होने के कारण इन यज्ञों का ‘ राजकर्तृक' नाम पड़ा । ऐन्द्रमहाभिषेक' – यह एक ऐसा राजत्व सम्बन्धी यज्ञ था जिसे देवों ने इन्द्र को ओजस्वी, साहसी और पराक्रमी मानकर राजा बनाने के लिए किया था । इन्द्र के लिए ऋचाओं से वेदमयी आसन्दी ( सिंहासन ) को तैयार किया था । देवताओं ने बृहद् और रथन्तर सामों को आसन्दी के अगले दो पाद बनाया था । वैरूप और वैराज को पिछले दो पाद, शाक्वर रैवत को ऊपर का शीर्ष, नैधस और कालेय को बगल के तख्ते, ऋचाओं का ताना, साम का बाना, यजुषों को बीच का छिद्र भाग, यश को विस्तर, श्री को तकिया बनाया । इस प्रकार सिंहासन को तैयार करके सविता और बृहस्पति ने इसके अगले पाद को पकड़ा, वायु और पूषा ने पिछले पाद को, मित्र और वरुण ने दो ऊपर के तख्ते को और अश्विनों ने दो बगल के तख्तों को पकड़ा । इन्द्र ने इस सिंहासन पर वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, मरुत्, अङ्गिरा आदि के बाद आरोहण किया । सिंहासन पर आरोहण के समय इन्द्र ने कामना की कि मैं सिंहासन पर साम्राज्य,. भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, राज्य, पारमेष्ठ्य, महाराज्य, आधिपत्य और स्वावश्य–इन विविध शासन प्रणालियों की प्राप्ति के लिए आरोहण करता हूँ । सिंहासन पर आरोहण करने के बाद देवों ने इन्द्र के गुणों की घोषणा करते हुए कहा कि आज साम्राज्य का सम्राट्, भोज शासन-प्रणाली के राजा का पिता, पारमेष्ठ्य का परमेष्ठी क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है । सम्पूर्ण प्राणी जगत् का अधिपति, प्रजा का रक्षक, असुरों का हन्ता, ब्राह्मणों और धर्म का रक्षक उत्पन्न हो गया है । इस प्रकार घोषणा किये जाने के पश्चात् प्रजापति ने उदुम्बर और पलाश की आर्द्र शाखा से उसका अभिषिञ्चन किया । इस अभिषेक की क्रिया के बाद वसु देवों ने साम्राज्य की प्राप्ति के लिए पूर्व दिशा में इन्द्र का अभिषेक किया, रुद्र देवों ने दक्षिण दिशा में भोज्य के लिए, आदित्यों ने पश्चिम दिशा में स्वराज्य के लिए, विश्वेदेवों ने उत्तर दिशा में वैराज्य के लिए, साध्य और ( १) ऐ० ब्रा० - ३८.१-३
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भूमिका २४ आप्त्य देवों ने बीच की ध्रुवा दिशा में राज्य के लिए, मरुतों और अङ्गिरसों ने ऊर्ध्व दिशा में पारमेष्ठ्य, महाराज्य, आधिपत्य और स्वावश्य के लिए इन्द्र का अभिषेक किया । इस प्रकार अभिषिक्त इन्द्र ने सब दिशाओं को जीत लिया । यह ऐन्द्र महाभिषेक ही परवर्ती राजाओं के राज्याभिषेक का मूल प्रतीत होता है । कहा गया है कि जो ऋत्विज् क्षत्रिय को उपर्युक्त आठ शासन प्रणालियों का अधिपति बनाना चाहे वह ऐन्द्र महाभिषेक की रीति से उस क्षत्रिय का राज्याभिषेक करें ।' ऐन्द्र महाभिषेक के समान राज्याभिषेक से अभिषिक्त, जनमेजय, शर्यातमानव, शतानीक, सत्राजित्, विश्वकर्मा, सुदासपर्वत, अङ्ग, भरत दौष्यन्ति, पाञ्चाल आदि अनेक राजाओं का उल्लेख है, जिन्होंने अभिषेक के प्रभाव से सर्वत्र विजयी होकर प्रभूत सम्पत्ति का अर्जन किया था । २ राजसूय यज्ञ एवं राज्याभिषेक - राजसूय यज्ञ का सम्पादन केवल क्षत्रिय वर्णस्थ जन करते थे । विश्वास किया जाता था कि इस यज्ञ के सम्पादन से राजा बनता है । इस कृत्य के सम्पादन से पूर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन दीक्षा का विधान है । तदनन्तर ‘ अनुमति' और 'निर्ऋति' को आहुतियाँ दी जाती हैं 1। महीने के पन्द्रहवें दिन से एक वर्ष तक चातुर्मास्य इष्टियों का सम्पादन होता है । चातुर्मास्य वाले पर्वों के बीच पूर्णिमा एवं अमावस्या के मासिक यज्ञ होते हैं । फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन ‘ शुनासीरीय यज्ञ ' के साथ चातुर्मास्य यज्ञों की परिसमाप्ति होती है । राजसूय यज्ञ का मुख्य कृत्य अभिषेक होता है । इसमें क्षत्रिय को राजा घोषित किया जाता है । दीक्षा के बाद क्षत्रिय ब्राह्मणोचित वेशभूषा धारण करके अभिषेक के कृत्यों का सम्पादन करता है । अभिषेक के समय प्रयुक्त सामग्री- उदुम्बर की आसन्दी (सिंहासन ) जिसके पाये प्रादेश मात्र स्थूल होते हैं । आसन्दी मूँज के बन्धन से बँधी होती है और व्याघ्रचर्म से आच्छादित की जाती है । एक उदुम्बर की शाखा, उदुम्बर का चमस होता है, चमस में आठ वस्तुएँ होती हैं— दही, घृत, मधु, धूप में बरसने वाला वर्षा का जल, शष्प, तोक्म ( अङ्कुर), सुरा और दूर्वा । 'स्फ्य' से रेखा खींचकर आसन्दी को वेदी के प्राची दिशा में स्थापित किया जाता है । तदनन्तर अभिषिक्त होने वाला क्षत्रिय आसन्दी पर पीछे से आरूढ़ होते समय दोनों हाथों से आसन्दी को पकड़ कर दाहिनी जाँघ से भूमि का स्पर्श करके कहता है कि हे आसन्दी! अग्नि गायत्री छन्द से, सविता उष्णिक् छन्द से, ( ) - ( ) - १ ऐ०ब्रा० ३ ९.१ २ ऐ ०ब्रा०-३९.७ ९ ( ३ ).इस सम्पूर्ण कृत्य का विशद विवेचन द्रष्टव्य ऐ०ब्रा० अध्याय ३६-३९ तक । (४) शत ० ब्रा० - ९.३.४.८