ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 1–10
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 1–10
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( 3.0 ब्रह्मविज्ञान 4. मधुसूदन ओला fereren ora कजस्थान पत्रि,
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130 ब्रह्मविज्ञान ग्रन्थ रचयिता: समीक्षा चक्रवर्ती पं. मधुसूदन ओझा विद्यावाचस्पति सम्पादन: पं. प्रद्युम्न शर्मा ओझा 1 प्रकाशक: राजस्थान पत्रिका प्रा ० लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । वि. सं. २०४४ [ 3
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प्रकाशकः राजस्थान पत्रिका प्रा ० लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । मुद्रक: श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, " मानवाश्रम ", दुर्गापुरा रोड़, जयपुर -१५
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प्रकाशकीय ' ब्रह्मविज्ञान ' का द्वितीय संस्करण प्रस्तुत करते हुए मुझे अपार हर्ष होता है । वेदविद्या वाचस्पति पं ० मधुसूदन ग्रोझा का यह एकमात्र ग्रन्थ है जो उन्होंने बोल - बोल कर हिन्दी में लिखवाया था । प्रथम बार ग्रोझा जी महाराज के सुपुत्र पं ० प्रद्युम्न कुमार ओझा ने वि. संवत् २००० में इसे संपादित कर प्रकाशित किया था । इसके बाद ग्रन्थ अप्राप्य हो गया । विद्यावाचस्पतिजी के ग्रन्थों की खोजबीन के दौरान जब मैं उनकी पौत्री श्रीमती शान्ता देवी और पौत्र श्री पद्मलोचन से मिला तो मुझे उन्होंने बताया कि हिन्दी में लिखा हुआ उनके पूज्य दादाजी का एक ग्रन्थ " ब्रह्मविज्ञान " रतनगढ़ के राजकीय पुस्तकालय में उपलब्ध है । उन्होंने सुझाव दिया कि इस ग्रन्थ का नियमित प्रकाशन हिन्दी पाठकों के लिए किया जाय । मुझे यह सुझाव शिक्षाप्रद मालूम हुआ । इस बीच श्री किशोर कल्पनाकान्त को पत्र लिख कर रतनगढ़ के पुस्तकालय से यह ग्रन्थ मंगवाया और फोटोस्टेट कापी कर के वापिस लौटा दिया । ग्रन्थ उपलब्ध होते ही पहला कदम तो यह उठाया कि ' राजस्थान पत्रिका ' ने इसे धारावाहिक रूप में ‘ विज्ञान वार्ता ' स्तम्भ में प्रकाशित करना शुरू कर दिया । बाद में समूचे ग्रन्थ का दुसरा संस्करण भी प्रकाशित करने का निर्णय किया गया । ' मानवाश्रम ' में ही ग्रन्यान्य ग्रन्थों के साथ इसे भी छपते के लिए दे दिया गया । प्रूफ देखने का काम श्री कैलाश चतुर्वेदी ने संभाला । प्रूफ देखने में सबसे बड़ा काम यह था कि बोली हुई भाषा का स्वरूप यथावत् रखा जाय । निश्चय ही श्रोभा जी की बोली हुई भाषा उनकी लिखित भाषा से सर्वथा भिन्न है । हमने उसके " श्रुति " रूप को यथेष्ट महत्त्व दिया है । ग्रन्थ मुद्रण की देख - भाल का दायित्व श्री प्रद्युम्न कुमार शर्मा ने लिया । “ ब्रह्मविज्ञान ” वेद शास्त्र की कुञ्जी है । इसको पढ़ कर विश्व की रचना का स्वरूप अवश्य ही समझ में ग्रायेगा और यह भी समझ में आ जायेगा कि वेद का वास्तविक स्वरूप क्या है | मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि पाठक अवश्य ही इस ग्रन्थ को पढ़ कर लाभान्वित होंगे । जो लोग वेद को सीधे नहीं पढ़ सकते उनके लिए तो यह वरदान ही सिद्ध होगा । मकर संक्रान्ति सम्वत् २०४४ वि. कर्पूर चन्द कुलिश
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वक्तव्य पूज्य पिताजी के स्वर्गवास के अनन्तर उनके रचित जो ग्रन्थ है उनके प्रकाशन के लिये समिति आदि कई व्यवस्थायें हुई परन्तु कार्य में परिणत होने की निकट भविष्य में मुझे कोई सम्भावना प्रतीत न हुई । इसका मुख्य कारण यह प्रत्यक्ष है कि प्रथमतः ये वैज्ञानिक विषय उपन्यास आदि की तरह रोचक नहीं हैं; दूसरी बात यह है कि वेदों के अन्तर्गत जो फिलासॉकी प्रादि कूट - कूट कर भरी हुई हैं उन गम्भीर विषयों को ही प्रकाश में लाया गया है जो बहुत से तो क्रोड़ - पत्रों ( रफ कापियों ) से मूल ग्रन्थ तैयार किये गये और उनमें से कुछ प्रेस कापियां भी तैयार हुई शेष ज्यों के त्यों क्रोड़ पत्र ही रहे । उक्त मूल तथा प्रेस कापियां विभिन्न लेखकों ने लिखी जिससे उनमें बहुत सी गलतियां रह गई साथ ही जहां - जहां प्रमाण के लिये श्लोक श्रथवा ऋनायें दी गई हैं उनमें कहीं ग्रन्थों का नम्बरों के रूप में सङ्केत दिया गया है और कहीं यह कार्य शेष ही रह गया है तात्पर्य यह कि इन सब बातों को यथावत् ठीक तरीके से सम्पादन करना भी आसान बात नहीं । इन ग्रन्थों के लिये मुख्यतया ऐसे विद्वान की आवश्यकता है जो ग्रन्थों की रचना शैलियों से भी पूर्ण अभित हो, यह एक कठिन समस्या उपस्थित हुई । इनके अतिरिक्त आर्थिक संस्था का भी होना परमावश्यक तथा मुख्य बात है । अत: इन्हीं परामर्शो में समय व्यतीत होते देखकर मैंने यही उचित समझा कि जब तक यह सब कुछ तय नहीं पाता है तब तक कम से कम, मैं इस कार्य को शीघ्र प्रारम्भ कर दूं । यही सोचकर में इस महान् कार्य में यथाशक्य संलग्न हो गया और आज करीब ४ वर्ष होते आये, इस सम्पादन तथा प्रकाशन के कार्य को उसी प्रगति से बराबर करता चला आ रहा हूं । इस अवसर में १२ ग्रन्थ प्रकाशित भी हो चुके हैं और ५ ग्रन्थ विभिन्न प्रेसों में प्रका— शनार्थं दिये जा चुके हैं शेष का सम्पादन आदि कार्य हो रहा है । अभी तक करीब - करीब यह संपूर्ण कार्य भार मेरे ही ऊपर है, यह स्पष्ट है कि उपरोक्त कार्य को एक व्यक्ति का सम्पन्न कर लेना सर्वथा अगम्भव हैं परन्तु मैंने यही विचार रखा है कि मुझसे जितना हो सके वह तो मैं यावज्जीवन करता रहकर अपने कर्तव्य का पालन करता रहूं जो शेष रह जायगा उसके लिये परमेश्वर किसी न किसी को अवश्य प्रेरणा करेंगे, यह पूर्ण विश्वास भी है । इसके व्यय के विषय में मन तो अपना सर्वस्व अर्पण कर देना निश्चित कर ही रखा है परन्तु श्रीमान् श्रलवरेन्द्र का भी पूर्ण साहय रहा है । मुझे श्रीमान् जयपुर नरेश तथा श्रीमान् मिथिलाधीश से भी पूर्ण भरोसा है कि वे भी अवश्य इस कार्य में अपनी उदारता दिखायेगें, इनके अतिरिक्त कतिपय विद्यानुरागी रईस यादि भी इसे अपनावेंगे ऐसी ग्राशा होती है । यह जो ब्रह्मविज्ञान नामक हिन्दी भाषा का ग्रन्थ है इसका श्रेय पुरोहित गोपीनाथजी जोशी भूत-पूर्व हैंडमास्टर चांदपोल हाईस्कूल तथा पर्सनल ऐसिस्टेन्ट शिक्षा विभागाध्यक्ष जयपुर को ही है । उन्होंने बरसों पूज्य पिताजी की सेवा में उपस्थित होकर जब जितना सा समय पाते उनसे आग्रह पुरस्सर निवेदन [ ५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * करके जो वे कहते जाते वह जोशी जी अक्षरशः लिखते जाते । जोशीजी के इस ब्रह्मविज्ञान के असली कापी में जिस दिन जितना लिखा गया उसके अन्त में तिथि लिखी हुई है यह तिथियां कभी कुछ पक्तियो के बाद ही हैं तो कभी एक दो पृष्ठ के बाद लगी हुई हैं इस प्रकार यह वि ० सं ० १ ९ ७७ के कार्तिक शु ० 3 से प्रारम्भ करके वि ० सं ० १ ९ ८१ कार्तिक शु ० ११ को ४ वर्षों में बड़े परिश्रम से जोशीजी ने इसको पूर्ण किया है । उन्होंने कही कही संस्कृत श्लोकों का अनुवाद हिन्दी पद्य में कर दिया है जोशीजी का इस वृद्धावस्था में इतना विद्यानुराग साथ ही इतने परिश्रम की क्षमता, यह साधारण बात नहीं बल्कि आपको एक आदर्श विद्या प्रेमी कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी । पूज्य पिताजी ने इस ब्रह्म के विषय पर कई ग्रन्थ लिखे हैं किन्तु वे संस्कृत में ही हैं परन्तु यह हिन्दी भाषा में होने से आशा है कि हिन्दी भाषा के प्रेमी विद्वज्जन भी इससे लाभ उठावेंगे । जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किये जा रहे हैं यथाशक्ति शुद्ध छपने का पूरा ध्यान रखा जाता है फिर भी बहुत सी अशुद्धियां रह ही जाती हैं जिसके लिये पाठकवृन्द से क्षमा चाहता हूँ । अन्त में विद्याप्रेमी संसार से मेरा यही एक मात्र निवेदन है कि मुझे इस कार्य में सफलता हो, ऐसी परमेश्वर से प्रार्थना करें । पं. प्रद्युम्न शर्मा ओझा विद्याधर का रास्ता जयपुर सिटी ता ० १-५-४३ [ ६ ।
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पूज्यपाद विद्यावाचस्पति श्री मधुसूदनजी महाराज ( श्रीगुरुचरणा:)
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$ 2: समीक्षा चक्रवर्ती पं. मधुसूदन ओझा संक्षिप्त परिचय लेखक - म ० म ० पं ० श्रीगिरिधरजी शर्मा चतुर्वेदी, प्रधानाध्यक्ष, महाराजा संस्कृत कॉलेज, जयपुर । १ जून, सन् १६४२ ई ० यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ( गीता ) इस भगवदुक्ति के अनुसार जब जब वैदिक सत्यविद्या अज्ञान धूम से प्रावृत होने लगती है और मोहवश जनता का विश्वास हटने लगता है, तब परमेश्वर की प्रेरणा से कोई शक्ति प्रकट होकर सत्य-विद्या व सत्य - धर्म को राहुग्रास से मुक्तकर अज्ञान का नाश कर देती है । वेद एक सत्य - विद्या है और वैदिक धर्म सत्य धर्म है, अतएव इनकी रक्षा का ग्रायोजन ईश्वर की ओर से समय समय पर सदा होता रहता है, जिसकी साक्षी इतिहास दे रहे हैं । वर्तमान समय में वेद विद्या और वैदिक धर्म के लिए एक प्रचंड आपत्ति का समय है । पुराने इतिहास की खोज के लिए चाहे ग्राज नाम मात्र को वेद का गौरव माना जाता हो, किन्तु वेद सत्यविद्या का निधान है, सब प्रकार के विज्ञानों का मूल स्रोत है, या भारतीय. विज्ञान सूर्य्य के प्रकाश का पूर्ण विवरणात्मक इतिहास है, इस अटल सत्य को मानने के लिए आज की शिक्षित जनता तैय्यार नहीं । वैदिक धर्म्म एक वैज्ञानिक धर्म है, त्रिकालावाव्य एक रस है, यह विश्वास श्राज पाश्चात्य क्रम से शिक्षित जनता के अंतःकरण में स्थान नहीं पाता । पावे कहां से? आज सत्य-विद्या या सत्य - धर्म की तौल होती है वस्तु - विज्ञान ( Science ) की तराजू पर? वस्तुविज्ञान ही इस युग की मुख्य विद्या है | वस्तु विज्ञान को वर्त्तमान शैली के अनुकुल प्रस्फुटित करने वाला कोई वेद का भाष्य आजतक उपलब्ध नहीं । वैदिक धर्म का वस्तु - विज्ञानों से सम्बन्ध बताने के साधन काल समुद्र की तरंगों में लीन हो चुके हैं, फिर विज्ञान राशि कहकर वेद का गौरव इस युग में किस आधार पर टिक सके! बस, नाममात्र की श्रद्धा वेद की बच गई है । " इलहामी पुस्तक " कहकर कुछ ग्रास्तिक लोग " कुरान " आदि की तरह उस पर भी श्रद्धा कर लेते हैं; किन्तु श्रद्धा का आधार अंधकारमय है । यह निराधार श्रद्धा कितने दिन चल सकती है? इस बीसवीं शताब्दी में अंधविश्वास का कहां ठिकाना? भारत के कई योग्य प्राधुनिक विद्वानों ने वेद गौरव शिक्षा के लिये वस्तु विज्ञान से वेद का सम्बन्ध दिखाने का प्रयत्न किया, किन्तु भारतीय शास्त्रों की नियत परिभाषा के अनुसार क्रमबद्ध विज्ञान का मूल वेद में न बताया जा सका और विना उसके वैज्ञानिकों का विश्वास उस बिवरण पर नहीं जम सकता था । वे इधर उधर की ले उड़ी बातें कह कर ऐसे प्रयत्नों को उपहास का ही स्थान मानते रहे । ! ७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * जब तक क्रम बद्ध रूप में वैज्ञानिकों को स्पष्ट न बना दिया जाय कि वेद में वस्तु विज्ञान की इतनी ऊँची परिभाषाएं हैं कि जहां तक का बीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों को स्वप्न भी नहीं आया | जब तक यह सिद्ध न कर दिया जाए कि याधुनिक वस्तु विज्ञान की बहुत सी उलकने वैदिक विज्ञान की शरण में आने से अनायास सुलझ सकती हैं तब तक वैज्ञानिक जगन् वेद का यथोचित गौरव नहीं मान सकता । किन्तु जगन्नियन्ता जगदीश्वर को यह कब सह्य हो सकता था कि सत्यविद्या का गौरव विज्ञान के मध्याह्न काल में छिपा रह जाय? उसने एक ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को संसार क्षेत्र में उतार दिया, जिसने उसी जगन्नियन्ता की प्रेरणा से अपनी सब आयु वैदिक विज्ञान और वैदिक इतिहास के ग्रन्वेषण में लगा-कर उक्त महत्व पूर्ण विज्ञान और इतिहास का एक क्रमबद्ध सुन तैय्यार कर ही डाला, जिसके तुल परिश्रम और अलौकिक प्रतिभा के प्रकाश से अनेक शताब्दियों से अमूल्य विज्ञान रत्नों को अपने उदर में छिपा रखने वाली गुहा का द्वार ग्राज देखने में आ गया और उसमें प्रवेश करने वालों को परम सौकर्य्यं मिल गया । वही व्यक्ति हमारे ( चरित नायक ) गुरुवर जयपुर राज्य के प्रधान राजपंडित समीक्षा चक्रवर्ती स्वर्गीय पं ० श्री मधुसूदनजी ओझा विद्यावाचस्पति महामहोपदेशक हुए | आपका वैदिक ग्रन्वेषण सम्बन्धी कार्य जब पूर्ण रूप में प्रकाश में आवेगा तब विद्वज्जन हमारी इन पंक्तियों की सत्यता का अनुभव करेंगे, यह हमें पूर्ण विश्वास है । प्रस्तु ऐसे महापुरुषों का पवित्र परिचय जाति की एक सम्पत्ति होती है, कार्य क्षेत्र में उतरने वालों के लिये योग्यतम प्रादर्श होता है, और विद्या रमिको के लिये कोतूहलवर्द्धक होता है । इस विचार से श्री पंडितजी महाराज का संक्षिप्त परिचय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता विहार प्रान्त में मिथिला के मुजफ्फरपुर जिले के गाढ़ा नामक ग्राम में जो कि रेलवे स्टेशन सीता-मढ़ी से दक्षिण की ओर दश मील की दूरी पर है पंडित श्री बैद्यनाथ गोगाजी के घर वि ० सं ० १ ९ २३ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ( भा ० क्र ० ८ ) की रात्रि को १० १ / २ बजे मृगशिरा नक्षत्र में आपका जन्म हुआ । आपकी जन्म कुण्डली इस प्रकार है । च ०२ १२ के. ३.मं. १ ११ ४ ( १०८० भू. पू. सु. सु. ७ श ६ रा. आपका कुल एक प्रसिद्ध विद्वान् और प्रतिष्ठित पुरुषों की परारा का है । ग्रापण बाल्यकाल स्वदेश में पिता के पास ही लालन - पालन व प्रारम्भिक शिक्षा में व्यतीत हुया | आपके पिता के बड़े भाई [ प 1
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* ब्रह्मविज्ञान * पं ० राजीवलोचनजी ओक जिनने जयपुर महाराज स्व ० रामसिंह जी से अतुल सम्मान और पूर्ण-जीविका प्राप्त की थी, उनके कोई सन्तान न थी उससे वे अपने छोटे भ्राता वैद्यनाथ झा के पुत्र श्री मधु-सूदना जी को यवना दत्तक पुत्र बनाकर यज्ञोपवीत संस्कार के ग्रनन्तर वि ० सं ० १ ९ ३२ में अपने साथ जयपुर ले जाये और जयपुर में ही उच्च कक्षा के विद्वानों के पास आपके पठन पाठन का प्रबन्ध किया गया । पं ० श्री राजीवलोचनजी प्रपने साथ महाराजा साहिब के पास भी उक्त पंडितजी को ले जाया करते थे पण्डितजी बचपन से ही बड़े कुशाग्र बुद्धि थे अतः कभी - कभी महाराज के प्रेम पूर्वक किसी प्रश्न का बड़ी मधुरता और बुद्धिमत्ता से उत्तर देते, जिससे महाराज इनको वात्सल्य पूर्ण प्रेम दृष्टि से देखते और पण्डित राजीवलोचन जी से यह कहा करते कि यह लड़का बड़ा होनहार मालूम होता है । पांच छः वर्ग व्यतीत हुये थे, उक्त पण्डितजी सिद्धान्तकौमुदी ही पढ रहे थे कि इस अवसर में आपके पितृव्य पं ० राजीवलोचन झोगा जी का स्वर्गवास हो गया । इसके एक या डेढ़ वर्ष बाद ही महा-राज रामसिंहजी का स्वर्गवास हो गया । अतः इन घटनानों से आपके जीवन क्रम का एकदम परिवर्तित हो जाना एक स्वाभाविक बात थी किन्तु चरित्र नायक को स्वाभाविक विद्या का व्यसन था, ग्रापको विद्याध्ययन के अतिरिक्त और कुछ अच्छा नहीं लगता था । अव जयपुर में विद्या प्राप्ति का सुयोग न देखकर इन्हें अपनी पितृव्य पत्नी के साथ सं ० १ ९ ३६ वि ० में अपनी जन्म भूमि को प्रस्थान करना पड़ा, किन्तु वहां भी अध्ययन क्रम आपकी रुचि के अनुकूल न हो सका और आपकी विद्यापिपासा प्रति प्रबल थी, इस कारण आप अपने कुटुम्बियों को समझा बुझा कर श्रव्ययनार्थ काशी चले गये, वहां दरभंगा पाठ-शाला में स्वनाम धन्य म ० म ० स्वर्गीय श्री शिवकुमार मिश्र जी के समीप विद्याध्ययन करने लगे और लगातार = वर्ष तक वहां ही पढ़ते रहे । अपने उत्कट परिश्रम तथा अद्भुत बुद्धि के कारण व्याकरण, न्याय, साहित्य, मीमांसा, वेदान्त आदि के ग्रन्थों का ग्रापने गुरु मुख से न केवल अव्ययन ही कर लिया प्रत्युत उन पर पूर्ण अधिकार भी प्राप्त कर लिया । आपने काशी में विद्याध्ययन के अतिरिक्त भगवान् कामेश्वर शंकर की उपासना भी बड़े मनोयोग से की जिससे आपको विद्योन्नति में पूर्ण सफलता प्राप्त आपका विवाह १७ वर्ष की अवस्था में अलवर के राजगुरु पं ० श्री चंचल आंभाजी गन्त्र शास्त्री की कन्या से वि ० सं ० १ ९ ४० में हुग्रा । उस समय चंचल झा के सुपुत्र पं ० रामभद्र श्रोझाजी राज्य के लब्धप्रतिष्ठ रिटायर्ड जुडीशियल मिनिस्टर हैं । काशी में विद्याध्ययन पूर्णकर पण्डितजी बूँदी, कोटा, झालरापाटन, रतलाम आदि के नरेशों से मिले और पूर्ण सम्मानित हुए । अन्त में जयपुर राज्य से विशेष अनुरोध होने पर वि ० सं ० १ ९ ४६ में जयपुर चले प्राये । में आते ही पण्डितजी महाराजाज कॉलेज में संस्कृत प्रोफेसर नियुक्त हुए । बीच में आपने जयपुर कुछ समय संस्कृत कालेज में वेदान्त के प्रधान ग्रध्यापक का कार्य भी किया था । इस अरसे में कई घटना ऐसी हुई जिनसे आपके प्रखर पाण्डित्य की महिमा भूतपूर्व जयपुर नरेश स्व ० महाराज माधवसिंहजी के के कानों तक पहुंची और गुणग्राहक महाराज ने इन्हें अपने प्रात्मिक परिजनों में नियुक्त कर वि ० सं ० १ ९ ५१ में निजी पुस्तकशाला का प्रबन्ध इनके अधीन कर दिया व मौजमन्दिर ( धर्मशाला ) का सभापति बना दिया और राज्य के सर्वप्रधान पण्डित मान कर परम ग्रादर पूर्वक अपने पास रखा । श्रीमान् [ ]