ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा
Brahma Vigyan - Madhusudan Ojha · 468 पृष्ठ · 47 खण्ड
विषय सूची
- ( 3.0 ब्रह्मविज्ञान 4. मधुसूदन ओला fereren ora कजस्थान पत्रि, 130 ब्रह्मविज्ञान ग्रन्थ रचयिता: समीक्षा चक्रवर्ती पं. मधुसूदन ओझा विद्यावाचस्पति सम्पादन:… 1–10
- * ब्रह्मविज्ञान प्रायः नित्य ही कुछ समय इनमें शास्त्रीय वार्तालाप किया करते थे जिसका महाराज पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह पण्डितजी की अनुमति बिना कोई भी… 11–20
- * ब्रह्मविज्ञान क विषय छन्दवेद का उपयोग दृष्टिविचार १३ वेद का मन, प्राण, वाक् से सम्बन्ध १४ वेद शब्द की व्युत्पत्ति १५ वेद की पौरुपेयता ६ - यज्ञ १… 21–30
- * ब्रह्मविज्ञान के विषय ४ - श्रात्मगति परिच्छेद १ गतिस्वरूप २ गतिप्रभेद १ संसारगति ( नित्यगति ) २ अतिमुक्ति = भूतगति ३ श्रतिमृत्यु = देवगति ४ पञ्चत्वगति =… 31–40
- * ब्रह्मविज्ञान और वस्तुएं कुछ भी न थी, ग्रतः कहा जा सकता है । पहले ये सब ग्रसत थीं ग्रर्थात् विद्यमान नहीं थीं… 41–50
- ॐ ब्रह्मविज्ञान ही हम द्रष्टा को भी पाते हैं; इसलिए द्रष्टा भी एक प्रकार का दृश्य ही है । दृश्य से अलग करके द्रष्टा को कोई सत्ता नहीं… 51–60
- * ब्रह्मविज्ञान नहीं है | अर्थात् जो कुछ है सब ईश्वर है तो अब कहिये कि आप तो ईश्वर से अलग जगत् औौर जगत् से भिन्न ईश्वर को मानते हैं… 61–70
- * ब्रह्मविज्ञान टैंड छोटा और रात बहुत बड़ी होनी चाहिये । क्योंकि आकाश का गोला जो ३६० ग्रंथ में बटा हुआ है, वह ' क ' रेखा से ग्राचे ( मध्य ) में कटता है |… 71–80
- * ब्रह्मविज्ञान र साराश आँख पर और आक्षेप – एक मनुष्य को दो भाँति से दिखलाना - एक और अनेक । प्रत्येक मनुष्य की दो ग्रात्मा है— शरीरात्मा और अन्तरात्मा एक… 81–90
- के ब्रह्मविज्ञान * जस एक सूर्य एक ब्रह्माण्ड का नियन्ता है वैसे ही अनन्त ब्रह्माण्डों के अनन्त सूर्य नियन्ता हैं… 91–100
- * ब्रह्मविज्ञान कर बाहरी भीतरी वस्तु का जो देश, काल से भेद सम्बन्ध प्रतीत होता है वह निर्मूल हो जाता… 101–110
- * ब्रह्मविज्ञान * भी अपने ज्ञानमण्डल में सर्वदा बहिर्जगत् को बनाकर अपने में रखता है और अपने ही में लय करता है… 111–120
- ब्रह्मविज्ञान के रूप में उत्रथ नहीं है और जब उपथ की सत्ता नहीं तो अकं और अशीति भी जीव के सदृश ईश्वर नहीं हो सकते ग्रतः त्रिवत् रूप नहीं है… 121–130
- ब्रह्मविज्ञान और आगे भी उसी मार्ग में चलने के लिए प्रबल इच्छा और प्रकृति होती है । इस प्रकार अनेक जन्म में कभी न कभी सायुज्य मुक्ति मिल जाती है… 131–140
- * ब्रह्मविज्ञान श्राकार बड़े का घडापन है इसी को विशेषण कहते है । इस घड़ेपन को देखकर जिस द्रव्य को हम घट कहते हैं वह विशेष्य है इस घटत्व को हम आखों से… 141–150
- ब्रह्मविज्ञान मन ही ऐसा पदार्थ है जो जड़ न होने के कारण अकस्मात् वदला करता है उसी मन की वदल को ' इच्छा ' कहते हैं… 151–160
- * ब्रह्मविज्ञान & ले जाये तो उन के अन्दर में आकलना प्रवेश करता जायगा जो अत्यन्त है उसके के दर सुक्ष्म से सूक्ष्म परमाणु भी है… 161–170
- * ब्रह्मविज्ञान करने वाला मण्डल साम के कारण ही कहलाता है जो कि एक सहस्र माना गया है । इस साम में मुर्ति की समानता माम मंत्रा रक्बी गईहै… 171–180
- * ब्रह्मविज्ञान होती रहेंगी । तात्पर्य है कि जिस की जीवन होती है उसी प्रकार प्रत्येक यह पदार्थों की प्रकार उत्पत्ति वस्तु भी का यज्ञ से स्वरूप ही समझनी या… 181–190
- * ब्रह्मविज्ञान * १ इच्छा, तप ३ , श्रम । क्रिया यद्यपिप्राण की ही वृति है, मन और वाक् में स्वतः क्रिया नहीं होती… 191–200
- ॐ ब्रह्मविज्ञान उवथ, ब्रह्म, साम हो बढ़ उसकी आत्मा है, इसी नियम के अनुसार हमारे संसार का समस्त व्यवहार और कुटुम्ब आदि परिवार और मेरे सब कर्म इन सबका यह… 201–210
- * ब्रह्मविज्ञान टैं मनुष्य जीवों की सृष्टि होती है । इस त्रैलोक्य में भी ये भिन्न - भिन्न तीनों लोक भिन्न - भिन्न तीन ईश्वर हैं, जैसा कि पृथ्वी एक ईश्वर… 211–220
- ब्रह्मविज्ञान है और उसी में से टटोल कर नया ज्ञान लाभ करके जगत् में उसका प्रचार करता है यह सब परमेश्वर के जगत् का कुछ आभासमान प्रमाण है किन्तु वास्तव में… 221–230
- ॐ ब्रह्मविज्ञान * एक दृष्टि से परमेश्वर को यों भी देख सकते हैं कि इस विश्व में जितने मन, प्राण, वाक् हैं वे सब उसके वास्तविक रूप हैं और वेद, यज्ञ, प्रजा… 231–240
- ब्रह्मविज्ञान सबका साधारण ( साधारण आत्मा ग्रात्मा है उसी ) प्रातिविक ( पान ग्रात्मा ) माना रूप से सर्वत्र प्रकार जीव की भी जाता है वह जिस प्रकार सूर्य की… 241–250
- * ब्रह्मविज्ञान के कारण सब पदार्थों का संबन्ध परमेश्वर कहा जा सकता है । अर्थात् देवसङ्घ, भूतसङ्घ इन दोनों के लोक और इन सब के सूत्र ये सब ईश्वर की दशा में… 251–260
- ' ' ब्रह्मविज्ञान उस समय ज्ञान का ज्ञेय के रूप में वदलने के नियमानुसार जीव का ज्ञान ईश्वर रूपी ज्ञेय में बदल कर कुछकाल के लिये ईश्वरमय बन जाता है… 261–270
- * ब्रह्मविज्ञान इसी प्रकार राजयोग के चार पाद हैं । प्रथम बहिरङ्गसाधन प्रासन, प्राणायाम, यम, नियम आदि हैं और द्वितीय ग्रन्तरङ्गसाघन है जिनमें धारण, ध्यान,… 271–280
- * ब्रह्मविज्ञान अंश सेमाथा बनता मांस रहता है और दूसरे किसी अंश से धड़ या हाथ पाँव उसी तरल वस्तु से अस्थि -, स्नायु, मज्जा शोणित श्रादि भिन्न की जाती सबके… 281–290
- ब्रहा विज्ञान में नाम, रूप. कर्म भिन्न - भिन्न प्रकार के होते हैं तथापि उन सब भिन्न - भिन्न रूपों में भी तीन बल सर्वत्र समान रूप से रहते है और उन तीनों को… 291–300
- * ब्रह्मविज्ञान सृष्टि करता है । इस अक्षर में वीजचिति, देवचिति, भूतचिति का सन्निवेश है इसी से इन बीज, देव, भूत-चिति सामग्नियों के द्वारा वह सब प्रकार की… 301–310
- * ब्रह्मविज्ञान अपने ही ज्ञान का अपने पर विश्वास नहीं होता । अथवा अपने निश्चय को पीछे कभी भूल मानता है । यह तीसरा ' तमज्ञान ' हुआ… 311–320
- * ब्रहाविज्ञान * मुमूर्षु ( मरनेवाला ) के मरण से कुछ पूर्व तक हृदयमात्र में अन्तधि रहता है । उसी ज्ञान प्रकाश के साथ सब इन्द्रियां प्राणों को लिये हुए… 321–330
- * महाविज्ञान योगाभ्यास थोड़ी ग्रावि गिद्धि देर के शिलाओं में लिये इसी हमारे श्रद्धा की ही साल ग्रात्मा की बनी हुई ईश्वर बनी होती से जाती हैं या देवताओं की… 331–340
- * ब्रह्मविज्ञान * इन तीनों तेजों के साथ तीन - तीन परिवार देवता भी संयुक्त रहते हैं । जैसे— १ - सूर्य, ग्रग्नि, पृथ्वी, ग्रन्न, २ - चन्द्र, नक्षत्र, आप्,… 341–350
- * ब्रह्मविज्ञान होकर भिन्न भिन्न सा प्रतीत होता है । किन्तु यदि प्राज्ञ का सम्बन्ध छुट जाय तो उस क्षेत्रज्ञ का शरीर-अभिमान भी छूट जाता है… 351–360
- * ब्रह्मविज्ञान * ब्रह्मा जो स्वभाव से ही दो शरीर धारण करता है उसमें एक प्राण रखने वाला धातुपुरुष श्रीर दूसरी मूर्ति भूतधात्री स्त्री रूपा है… 361–370
- ब्रह्मविज्ञान और संज्ञा व स्नायु में मूर्च्छना होने से इन्द्रियों में ज्ञान का सम्बन्ध नहीं होता इसी को निद्रा कहते है… 371–380
- * ब्रह्मविज्ञान हैं । तथापि यह ग्रात्मा निज के स्वरूप में सर्वत्र एक ही प्रकार का है । ६ ऊर्मियां और प्रदान ( लेन ) विसर्ग ( निकालना ) जाग्रत् स्वप्नादि… 381–390
- * ब्रह्मविज्ञान इनमें ग्रखण्ड आत्मा दिक्, देश, काल से अनवच्छिन्न होने के कारण गति नहीं रखता । गति परिच्छिन्न की ही होती है… 391–400
- ॐ ब्रह्मविज्ञान होता है उसी प्रकार भूतात्मा सुनामा पृथ्वी से उत्पन्न होती जीवित दशा में है । तो संभव है कि पूर्वोक्त नियमानुसार वह भी पृथ्वी जिन प्रकार… 401–410
- * ब्रह्मविज्ञान * दुःखी हो जायतो वह ' मलिनी भी यदि प्रकृति कारण है किन्तु ब्राह्मण या राजा अपनी ही जाति या कक्षा पर रहकर का नीच करण " है दुष्ट हो जावे,… 411–420
- * ब्रह्मविज्ञान इनमें देव दो प्रकार के हैं - ग्रग्नि और सोम । इन दोनों को पृथक् २ समझने के लिए सोमवाले प्राण को पितर कहते हैं और अग्निवाले को देवता… 421–430
- * ब्रह्मविज्ञान यहां प्रश्न होता है कि कर्म, काम और शुक्र ये तीनों ही श्रात्मा स्वरूप विद्या से भिन्न होने के कारण श्रविद्या कहे जा सकते हैं… 431–440
- * ब्रह्मविज्ञान * रहता, परीक्षा से स्थिर हुआ है कि भोजन, जलपान, भाषण, शयन, मूत्र, पुरीषोत्सर्ग, मैथुन, सूर्य चन्द्र-ग्रहण, तीर्थं विशेष संसर्ग, किसी… 441–450
- ब्रह्मविज्ञान * १ ब्रह्मरन्ध्र - मुक्ति पितृस्वर्ग | २ कंठ- देवस्वर्ग ३ - हृदय- पितृस्वर्ग 6 ३ नरक ४ पिल्लू स्वर्ग बाग्रन्थिनरक ] [ ४१६ * ब्रह्मविज्ञान क… 451–460
- * ब्रह्मविज्ञान * " पार " है । ऐसा होने पर भी ब्रह्म व्यापक होने से ग्रवार में भी सर्वत्र व्याप्त है, किन्तु यह कर्म पार में व्याप्त नहीं इसलिने अवार में… 461–468