ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 11–20
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 11–20
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* ब्रह्मविज्ञान प्रायः नित्य ही कुछ समय इनमें शास्त्रीय वार्तालाप किया करते थे जिसका महाराज पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह पण्डितजी की अनुमति बिना कोई भी धार्मिक कार्य नहीं करते थे । पंडितजी महाराज न केवल शास्त्रों ही में नैपुण्य रखते थे अपितु शासन नीति में भी ग्राप पूर्ण प्रवीण थे, अतः समय - समय पर महाराज के नैतिक विषयों में भी ग्राम से वार्तालाप होता रहता था इस प्रकार पण्डित जी रख ० जयपुर नरेन्द्र के उच्चकोटि के कृपाओं में से बन गये और महाराज के नव-रत्नों में आपकी गणना थी । जयपुर राज्य के उच्च सामन्तों के समान आप श्रादरणीय थे, और आपका प्रभाव राज्य वर्ग में तथा प्रजाजनों में बहुत विशेष या आपको महाराज ने आजीविका भी पूर्ण दे रक्खी थी, इसलिये रईसों के समान ही ग्रापका जीवन बीना । सन् १६०२ ई ० में भारत सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के समय जो ऐतिहासिक विलायत यात्रा हुई थी, उसका सब धार्मिक आयोजन पण्डितजी के सत्परामर्शानुसार ही हुआ था और महाराजाधिराज इन्हें भी अपने साथ ले गये थे । वहां संस्कृत के यूरोपियन विद्वान् जब आप से मिले तो बड़े प्रभावान्वित हुए और शीघ्र ही वहां ग्रापकी कीर्ति फैल गई । वहां के ग्रासफोर्ड के प्रसिद्ध विद्वान् मैकडोनल्ड, कैम्ब्रिज के विद्वद्वर बैंडाल और इण्डिया ग्राफिस के पुस्तकालयाध्यक्ष टामस पंडितजी से मिलकर इनकी वैज्ञानिक विवेचनाओं पर मुग्ध हो गये और आपका बड़ा सम्मान सत्कार उनने किया । ग्रापका वहां वेद धर्म पर एक बड़ा जोरदार व्याख्यान भी हुआ ( जो जयपुर के संस्कृत रत्नाकर मासिकपत्र में कई वर्ष पहले छप चुका है ) इससे वहां के सभी विद्वज्जन श्राश्रर्यान्वित हुये और श्राप के कारण वैदिक वर्ग का डंका विला-यत में गूंज उठा । उक्त कथन की सत्यता प्रमाणित करने को विलायत से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों के कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं । The Westminister Gazette - 26.70.2 A Hindoo savant in London In the back - ground of the group of Personages, who have come to London for the Cororation, the Presence has remained unnoticed of a Hindoo savant, a great celebrity in India, a human store - house of Vedic wisdom and philosophy. This is a Fundit Madhusudan Ojha a profound sanskrit scholar. The pundit's conversation in fluent Sanskrit greatly interested the Cambridge Orientalist in his Eastern visitor. The Sun — 23.7.02. The Pundit visited I'rofessor Macdonald of Oxford who was to cultivate his acquaintance. Last Sunday the Fundit was greatly pleased by Trofessor C. Eendall who with his wife gave him invited to Cambridge interested the Cambridge Orientalist most was the conversation a warm reception. what of the Pundit in [ १० ]
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ब्रह्मविज्ञान fluent Sanskrit which is a rare treat now even in India while he was deeply impressed by the deep learning of his Eastern visitor. सम्राट के राज्याभिषेक के अवसर पर पण्डितजी महाराज ने कुछ पच बनाकर इङ्गलिश अनु-वाद सहित छपाकर सम्राट को समर्पित किये थे, जिनकी सादर स्वीकृति के साथ सम्राट ने ग्रापको मैडिल, तथा एक लिखित धन्यवादपत्र सम्मानित किया था । पंडितजी महाराज सदा वैदिक विज्ञान की खोज में ही लगे रहते थे | आपका तंपुर्ण समय वेद-रहस्य के उद्घाटन के प्रयत्न में ही बीतता था । आप अस्वस्थ हो जाने की दशा में भी अपना कार्य करते ही रहते थे । अपने शरीर, स्वास्थ्य, श्राराम व अर्थोपार्जन आदि सब बातों की उपेक्षाकर यह महान् कार्य आपने आजीवन किया । ग्रापके लगभग ५० वर्ष घोर तपस्या के रूप में बीते, जिस तपस्या के फल-स्वरूप ग्रांपके लिखे हुए १२५ से भी अधिक ग्रन्थ विद्यमान हैं, जो संस्कृत विद्या, सनातनधर्म और भारत-वर्ष का वैज्ञानिक युग में मस्तक ऊँचा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं । आपने अपने हाथों से इन सब ग्रन्थों की पाण्डुलिपि, साथ ही प्रतिलिपि लिखी है । इनमें दो चार ग्रन्थों के अतिरिक्त प्रत्येक ग्रन्थ २०० से ५०० पृष्ठ तक के हैं और कोई कोई तो इससे भी अधिक हैं । इतनी मौलिक रचना कर लेना कोई मामूली बात नहीं है । श्रापका लेख भी बड़ा सुन्दर छापे के सदृश होता था और ग्राप चित्रकला में भी कुशल थे । राजकार्य और ग्रन्थ लेखन व्यसन के कारण विशेष देश भ्रमण का अवसर पण्डितजी को नहीं मिला इसीलिये आपके प्रसवार पांडित्य व अलोकिक वैदिक रहस्योद्घाटन शैली और विषयों के प्रव-चन की चतुरता का भारतीयों को विशेष परिचय प्राप्त न हो सका, किन्तु जब कभी भी ऐसा अवसर प्राप्त हुग्रा, तब श्रोतागणों को चित्रित् होता हुआ ही देखा और धीरे - धीरे देश में आपकी ख्याति बढ़ती ही गई । सन् १६०६ ई ० में काशी में कांग्रेस सभा के अवसर पर और प्रयाग के सम्वत् १ ९ ६२ वि. कुम्भ के अवसर पर जो भारतधर्म महामण्डल के महाधिवेशन हुए थे, जिनमें सभी भारतीय नरेशों को सानुरोध निमन्त्रण भेजा गया था, वहां जयपुर राज्य की ओर से पण्डितजी महाराज गये थे । उरा समय भूतपूर्व दरभंगा नरेश के सभापतित्व में ग्रापका भाषण सुनकर न केवल विद्वन्मण्डली ही, किन्तु अंग्रेजी के बड़े-बड़े विद्वान् और साधारण जनता भी मुग्ध तथा गद्गद हो गये थे । बहुत दिनों तक यह आपकी ख्याति कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही थी उसी अवसर पर भारत धर्म - महामण्डल की ओर से आपको विद्यावाचस्पति तथा महामहोपदेशक इन दो पदवियों से विभूषित किया गया था । इसके अतिरिक्त आप-के अभिभाषण लाहौर, काशी, कलकत्ता प्रादि में बड़े जोरदार हुये थे, जिनसे उपस्थित जनता बहुत प्रभावान्वित हुई और ग्रापको बड़े सम्मानपूर्वक अभिनन्दन पत्र समर्पित किये गये । आप वैदिक गहन विषयों के उद्घाटनार्थं शास्त्रों का अवलोकन तथा लेखन कार्य तो करते ही रहते थे साथ ही जिज्ञासु वर्गों को प्रायः नित्य ही कुछ समय अनेक विषयों को समझाया भी करते थे । आपकी प्रवचन शैली बहुत ही उच्चकोटि की थी श्राप श्रोतायों के हृदय में वस्तुज्ञान पूर्ण रूपेण जमा देते है श्रोतालोग अद्भ ुत [ ११ }
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* ब्रह्मविज्ञान विषयों को सुनकर चकित तथा मुग्ध हो जाते । कोई भी विषय जब तक जिज्ञामुत्रों की समझ में पूरे तौर से न ग्राजाता तब तक वह अनेक प्रकार से घण्टों तक उस वस्तु की मीमांसा करते ही रहते थे । इस कार्य में उनका मस्तिष्क कभी नहीं थकता था । उनमें यह एक खास बात थी कि गुस्तम तत्वों के विचार में इतना प्रबल परिश्रम ग्रहर्निश करते रहने पर भी उनका मस्तिष्क अश्रान्त ही दीख पड़ता था इस अत्यधिक परिश्रम के कारण पाचन शक्ति की कमी से उनका स्वास्थ्य तो ठीक नहीं रहता था और शरीर बड़ा कृश था, किन्तु लिखने या बोलने में वे कभी नहीं रखते थे । वे बहुत ही स्वल्पाहारी थे, कभी-कभी तो वे अपनी इस धुन में भोजन करना तक भूल जाते थे, दो चार बार ताकीद करने पर भोजन के लिये जाना तो नित्य नियम सा ही था । पण्डितजी महाराज के समीप जिज्ञासुत्रों के श्राने जाने की संख्या ही क्या हो सकती थी, देश विदेश से भी लोग नई - नई शंकाओं को सुलझाने के लिये उपस्थित हुआ करते थे । वर्तमान जयपुर नरेश महाराज श्री १०८ श्री मानसिंहजी को महाराजकुमार अवस्था में हिन्दी, संस्कृत की प्रथम शिक्षा का आरम्भ पण्डितजी महाराज ने ही कराया था । स्वर्गीय भूतपूर्व महाराज गाधवसिंह जी के अनुसार वर्त-मान जयपुर नरेन्द्र भी धम्मिक विषयों में सभी परामर्श पण्डितजी से ही लिया करते थे, ये पण्डितजी को बड़ी श्रद्धा तथा मान की दृष्टि से देखते थे और उनके पांडित्य से बहुत प्रभावान्ति रहते थे । अन्यान्य कई राजा महाराजा भी आपको बड़ी सम्मान की दृष्टि से देखते थे । स्वर्गीय तथा वर्त-मान श्रीमान् दरभंगा महाराज का आप पर बड़ा ही प्रेम प्रसाद था, साथ ही आपकी इस अद्वितीय विद्वता को वे अपना निजी गौरव समझते थे । वर्तमान अलवर नरेश ने तो अपने यज्ञोपवीत के बगर पर ग्राप से ही दीक्षा ग्रहण की थी और ग्रापको अपना सर्वश्रेष्ठ गुरू मानकर ये आपका बहुत सम्मान करते थे । स्व ं महाराज किशनगढ़, स्व ० भूतपूर्व काशी नरेश तथा शाहपुराधीश भी ग्रापके बड़े भक्त थे | इतने पर भी एक विशेषता यह थी कि पण्डितजी ने राजा महाराजा, बड़े - बड़े सेठ यादि किसी से भी कभी कोई याचना नहीं की । आप स्वतन्त्र प्रकृति और निरपेक्ष व्यक्ति थे । साथ ही ग्रापकी प्रकृति अतिशान्त और नितान्त सरल थी । श्रापका रहन सहन बहुत ही सादगी का था! संसार में रह-अलोकिक गुरण था । आपको किसी प्रकार का कोई शोक कर भी संसार से अलग थे यह आप में एक या वैदिक विज्ञान के श्राविष्कार का वांछा कभी नहीं हुई । यदि थी तो सर्वोपरि वहीं एक मात्र पराकाष्ठा का व्यसन, और इसी में मनसा वाचा कर्मणा ग्रन्तश्वास तक के कलीग भी रहे वा प्राण वियोग के समय तक इसी का मानना ह यी तो पंडितजी महाराज के शिष्यों की संख्या बहुत हैं, परन्तु जिनने नियमपूर्वक पुस्तक खोल-कर आपसे विद्याध्ययन किया ऐसे भी कम नहीं है । इन पंक्तियों के लेखक ने प्रायः ४० वर्षं किसी रूप में उनके चरणों में बैठकर अध्ययन किया है । मृत्यु से ३ दिन पूर्व भी मेरा पाठ हुआ था और भी बहुत से प्रतिष्ठित विद्वान् उनके शिष्य हैं जिनमें से कुछ विद्वानों के नाम निम्नलिखित हैं: ---१ – राजगुरु पं. चन्द्रदत्तजी चौधरी, रिटा. प्र. व्याकरणाध्यापक, महाराजाज संस्कृत कालेज, जयपुर । २ - पं. सूर्यनारायणजी प्राचार्य, प्र. संस्कृताध्यापक, महाराजाज कालेज, जयपुर । ३- पं. कन्हैयालालजी न्यायाचार्य प्र. न्यायाध्यापक, महाराजाज संस्कृत कालेज, जयपुर [ १२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ११ - पं. देवराजजी शास्त्री ( पंजाब ) [ १३ ] 17 " " " 1 शिक्षा ग्रस्वस्थ रहकर गुरुवर पंडित कि यह दिमागी उत्कट परिश्रम ४ - पं. मदनलालजी व्याकरणाचार्य, रिटा. धर्मशास्त्राध्यापक, ५- पं. मथुरानाथजी भट्ट साहित्याचार्य प्र. साहित्याव्यापक, ६ - पं. मोतीलालजी शास्त्री, शतपथ संपादक, वालचन्द्र यन्त्रालयाध्यक्ष, ७- स्वामी सुरजनदासजी वेदान्त, व्याकरणाचार्य, दादूविद्यालय, ८- पं. केदारनाथजी साहित्यभूषण, राजकीय ज्योतिपयन्त्रालाध्यक्ष, जयपुर । ६- पुरोहित गोपीनाथजी जोशी, भूतपूर्व हैडमास्टर चांदपोल हाईस्कूल, तथा पर्सनल एसिस्टेंट, विभागाध्यक्ष, जयपुर । १०- पं. आद्यादत्तजी, ठाकुर एम्. ए. संस्कृत प्रोफेसर लखनऊ यूनिवर्सिटी । १२ - पं. पुरुषोत्तमजी साहित्याचार्य, धर्मशिक्षक, मेयो कालेज, अजमेर । १३- पं. अशेश्वर झा ( मिथला ) वि. सं. १ ९९ ३ में अखिल भारतवर्षीय संस्कृत - साहित्य सम्मेलन की ओर से जयपुर के गण्यमान्य सरदारों, विद्वानों और सेठ साहूकारों की स्वागत समिति के तत्वावधान में पंडितजी महाराज के ७० वें वर्ष के उपलक्ष में आचार्य प्रवर गोस्वामी श्री १००८ श्री गोकुलनाथजी महाराज शुद्धाद्वैत संप्रदायाचार्य बम्बई के सभापतित्व में रामनिवास बाग के अलबर्ट हाल में हीरकजयन्ती ( Diamond Jubilee ) मनाई गई थी जिसमें बाहर के अनेक प्रसिद्ध विद्वान् म.म. हाथी भाई शास्त्रीजी राजपण्डित जामनगर ( काठियावाड़ ) म. म. पं. मथुराप्रसादजी दीक्षित राजपंडित सोलन ( पंजाब ) विद्यामार्त्तण्ड पं. सीताराम शास्त्री भिवानी, पं. विद्यावर शास्त्रीजी एम. ए. प्रोफेसर, डूंगर कालेज बीकानेर आदि भी सम्मिलित हुए थे । संस्कृतरत्नाकर मासिकपत्र का ( वेदाङ्क ) नाम का विशेषाङ्क और ग्रभिनन्दनपत्र पंडितजी महाराज को समर्पित किया गया था । और इस अङ्क में संस्कृत तथा हिन्दी में पंडितजी महाराज का जीवन चरित्र भी प्रकाशित हुआ है इसके अतिरिक्त श्रापका जीवन चरित्र ' सुधा ' में छपा है । पूर्णरूपेण आपका विस्तृत जीवन चरित्र पुस्तकाकार में प्रकाशित करने का भी विचार है । वि. सं. १ ९ ६६ भाद्रपद शुक्ला १५ को केवल दो तीन दिन ही का अचानक स्वर्गवास हो गया । स्थानीय सिविल सर्जन का कथन था का आघात हृदय पर हुआ ॥ पंडितजी के परिवार में ग्रापके सहोदर भाई भतीजे कोई भी न थे, आपकी धर्मपत्नी का स्वर्ग-वास वि. सं. १ ९ ६२ में ही हो चुका था और फिर आपने विवाह नहीं किया । केवल एक मात्र पुत्र पंडित प्रद्युम्नजी उन दिनों अलवर नरेश के पास थे जिन्हें आपके अस्वस्थ होते ही तार द्वारा बुला लिया गया था । पंडितजी ने अपने अन्तिम समय में स्वरचित ग्रन्थों के प्रकाशित करने की एक मात्र इच्छा अपने पुत्र से प्रकट की जिसके लिए आपके सुपुत्र ने दृढ़ प्रतिज्ञा की । उस दिन सम्पूर्ण नगर में शोक छाया हुआ था । राजकीय उच्च कर्मचारियों व राज के लवाजमे के साथ आपका शवविमान श्मशान पहुंचाया गया, वहाँ शव को स्नान कराकर विभूति तिलक धारण
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ब्रह्मविज्ञान कर जो सूर्याभिमुख बैठाया गया तो मुख पर विज्ञानज्योति का ऐसा अद्भुत दर्शन हुआ कि सब लोग ग्राश्चर्य चकित हो प्रणाम करने लगे । यह वैदिक विज्ञान का प्रत्यक्ष चमत्कार था । आपकी उत्तरक्रिया श्राद्धा-दिक शास्त्रीय विधि विधान तथा राज्य के सम्मान के अनुसार आप के सुपुत्र ने बड़ी श्रद्धा से किया । मासिक क्षयाह में ब्राह्मण भोजनादिक होते रह कर वार्षिक श्राद्ध के अनन्तर ही पितृपक्ष में पं. प्रद्युम्नजी ने गया श्राद्ध भी सविधि सम्पन्न कर डाला । पंडितजी के स्वर्गारोहण के अवसर पर समाचार पत्रों में " वैदिक विज्ञान का सूर्य अस्त " यह हैडिङ्ग निकला था । अलवर, दरभंगा आदि कई नरेशों तथा महामना पं. मदनमोहनजी मालवीय, प्रयाग के वाइस चांसलर डा ० गङ्गानाथ झा आदि अनेक गण्यमान्य व्यक्तियों के समवेदना सूचक बहुत से तार व पत्र ग्राये थे और बहुत स्थानों में शोक सभाएं हुई । जयपुर में भी रायबहादुर पं. अमरनाथजी ग्रटल एम. ए, फाइनेन्स मिनिस्टर के सभापतित्व में महाराजाज़ संस्कृत कॉलेज में बड़े - बड़े सरदारों, उच्च कर्मचारियों, विद्वानों तथा गणमान्य पुरवासियों की उपस्थिति में एक विराट् शोक सभा की गई । पडितजी महाराज के पुत्र पण्डित प्रद्युम्नजी ओझा का वाल्यकाल से अपने पूज्य पिताजी के पास ही अधिकांश रहन सहन व पठन पाठन का प्रबन्ध रहा था, यह अपने पिता के इकलौते पुत्र थे ग्रतः इनका लालन पालन भी प्रत्यधिक प्यार से होता था । आपकी शिक्षा संस्कृत हिन्दी तथा अंग्रेजी में हुई । यह भी अपने पिता के साथ स्वर्गीय जयपुर नरेश महाराज माधवसिंहजी के समीप जाया करते थे और महाराज भी इनको छोटे पण्डितजी के नाम से राम्बोधित कर बड़ा वात्सल्य प्रकट किया करते थे । ये बाल्यकाल से ही बड़े बुद्धिमान् और चंचल प्रकृति के हैं । इनकी बुद्धिमता से प्रसन्न होकर महाराजाधिराज ने इन्हें अपने पास ग्राने जाने के लिए स्वतन्त्र श्राज्ञा प्रदान कर रखी थी और इनके लिये भी अपने खासा अस्तबल सवारी के लिये घोड़ा अलग नियुक्त कर दिया था । साथ ही जहां कहीं भी महाराज विदेश पथारते वहां आपके पूज्य पिताजी तो साथ होने ही थे, ये भी महाराज की प्राज्ञानुसार बहुत सी यात्राग्रों में साथ रहा करते थे । जब यह कुछ बड़े हुए तो पंडितजी के स्वदेश ग्रादि जाने पर या ग्रस्वस्थ होने पर महाराज इन्हीं को पुस्तकशाला, मौजमन्दिर ( धर्मसभा ) आदि कार्यों पर पंडितजी के स्थानापन्न नियुक्त कर कार्य लिया करते थे और उस समय के प्रधानमंत्री स्व ० बाबू संसारचन्द्रसेनजी, सी ० प्राई ० ई ० तथा स्व ० नवाब मुस्ताजुद्दौला सर फैयाजग्रलीखांजी, के ० सी ० आई ० ई ० एम ० वी ० प्रो ० और राय बहादुर पुरोहित स्व ० सर गोपीनाथजी, सी ० प्राई ० ई ० इनके कार्य से परम संतुष्ट तथा प्रसन्न रहते थे इस प्रकार इन्होंने पूर्ण नीतिकुशलता और सभाचातुरी प्राप्त करली और महाराज के कृपापात्र बन गये । जब स्वर्गीय दरभंगा नरेश श्रीमान् श्री १०८ रमेश्वरसिंहजी जयपुर पधारे थे तो भूतपूर्व जयपुर नरेश ने इन्हीं पं ० प्रद्युम्नजी प्रोभा को उनके ग्रातिथ्य सत्कार पर प्रमुख नियुक्त किया था उस समय दरभंगा नरेश इनके प्रबन्ध से बहुत प्रसन्न हुए थे और तब से वह इनकी विशेष प्रेम और कृपा की दृष्टि से देखने लगे । वर्तमान दरभंगा नरेश श्रीमान् महाराजाधिराज श्री १०८ श्री कामेश्वरसिंह भी इन पर उसी प्रकार पूर्ण कृपा रखते हैं और इस ग्रंथ प्रकाशन कार्य में उनकी भी सहानुभूति रहती है । कुछ समय पं ० प्रद्युम्नजी को अपनी संपत्ति के प्रबन्ध के लिये स्वदेश जाकर भी रहना पड़ा था वहां उच्च यूरोपियन ग्राई ० सी ० एस ० आफिसर ने इनकी नीति निपुणता देखकर एक इलाके का इन्हें [ १४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कै प्रेसीडेन्ट नियुक्त कर दिया जिसमें दीवानी तथा फौजदारी विभाग का कार्य इन्होंने कई वर्ष तक बड़े न्याय निपुणता से किया जिससे पब्लिक बड़ी परितुष्ट रही श्रीर उस अरसे में जो जो यूरोपियन आफिसर बदल कर आये वे सभी इनके कार्य से परम संतुष्ट रहे और इसके लिये उन्होंने लिखित प्रमाण पत्र भी इन्हें दिये हैं साथ ही जब वहां बहुत से लाईसेंस वापस लिये जाकर कमी की जा रही थी उस समय इनकी सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिये दुनाली अंग्रेज बन्दूक का लाइसेंस देकर बिहार गवर्नमेन्ट ने इन्हें राजभक्त रूप से सम्मानित किया था । पं ० प्रम्नजीपने पिता के समक्ष वर्तमान श्रीमान् अलवर महाराज श्री १०८ श्री तेजसिंहजी के राज्य सिंहासनारोहण के अवसर से ही उनके बड़े कृपापात्र तथा पूर्ण विश्वास पात्र होकर उनके श्रात्मीय परिजनों में सम्मानित हुए और उनके पास ही रहा करते थे । वे धार्मिक सभी कार्य इनके परा-मर्शानुसार करते और समय समय पर अन्य विषयों पर भी परामर्श लिया करते थे, साथ ही शस्त्र तथा अश्व के कार्य में भी सुयोग्य होने के कारण इन्हें महाराज ने अपना ए ० डी ० सी ० नियुक्त कर आखेट ( शिकार ) आदि में भी अपने साथ रखते थे । पिता के ग्रस्वस्थ होते ही पं ० प्रद्युम्नजी को जयपुर ग्रा जाना पडा । वर्तमान श्रीमान् महाराजा जयपुर ने इनके पिताजी की जीविका इनको यथावत् प्रदान कर दी । श्रीमान् महाराज अलवर की पं ० जी में पूर्णभक्ति और उनके पुत्र पं ० प्रद्युम्नजी पर पूर्ववत् अतुल कृपा है और श्रीमान् पण्डितजी की इन महान् कृतियों से पूर्ण परिचित हैं ग्रतः श्रीमान् का इस ग्रंथ प्रकाशन कार्य में पूर्ण सहयोग है । पं ० श्रद्युम्नजी ने अपने पिता के अन्तिम इच्छा ग्रंथ प्रकाशन की उनके समक्ष प्रतिज्ञा कर उन्हें परितुष्ट किया था उस प्रतिज्ञा के अनुसार इस कार्य में प्रागपरण से जुटे हुए हैं । इन तीन वर्षों में आपने ६–७ ग्रन्थ प्रकाशित कर डाले हैं और कई विभिन्न प्रेसों में मुद्रणार्थ दिये जा चुके हैं, साथ ही ग्रागे कार्य-क्रम जारी कर रखा है । जोकुछ सम्पत्ति पूज्य पण्डितजी ने छोड़ी है उसे ये एकमात्र ग्रन्थ प्रकाशन में ही लगा रहे हैं, और तो क्या आपका यहां तक संकल्प है कि यदि द्रव्य का अभाव होगा तो मकान ग्रादि बेच कर इस कार्य को यथा सम्भव सम्पन्न करेंगे । किन्तु प्रश्न यह है कि क्या देश में गुणग्राहकता का इतना अभाव हो गया है कि वह ऐसा होने देगा? इसका उत्तर भविष्य देगा ।
वेदज्ञमाविष्कृतदिव्यशक्ति लोकेषु गीतार्जुनकीर्तिमर्च्यम् ।
प्रद्युम्नतातं समदर्शिनं च गुरुं भजे श्रीमधुसूदनार्यम् ॥
( पं ० ब्रह्मदत्त शर्मा शास्त्री ग्रायुर्वेदाचार्य सम्पदित, संस्कृत रत्नाकर के वेदात से उद्धृत ) ॥ इति ॥ [ १५ ।
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विषय - सूची विषय १- मङ्गलाचरण ( वैज्ञानिक विवेचना ) 17 २- प्रतिज्ञा ४- सप्त विकल्पसूत्र १ प्रत्ययाद्वैतवाद २ प्रकृत्यद्वैतवाद . ३ तादात्म्यवाद ४ अभिकार्यवाद ५ आत्मगुणवाद ६ सामञ्जस्यवाद ७ ग्रक्षरवाद ५ - मूलोपनिषद् ( १ ) १ ग्रभ्व ६ - संशयोपनिषद् ( २ ) १ स्यादवादसूत्र २ मूलाशुद्धिसूत्र ३ तुलाशुद्धिसूत्र ४ दोपमूल का प्रामाण्यखण्डनसूत्र " मनः प्रामाण्यखण्डनसूत्र ६ श्रात्माप्रामाण्यखण्डन सूत्र ७ ग्रात्मप्रामाण्यखण्डनसारांश [ क ] पृष्ठ १ १ २ २ ३ ४ ४ ५ ७ 9 9 is is ७ ह १० १४ १६ १६ १७ १८ १६ २१ २१ २४ ३ - विकल्प निर्देश - सद्सद्वादविकल्प ( त्रिपक्षीसूत्र )
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* ब्रह्मविज्ञान ॐ विषय सत्य - ज्ञानाश्वयतासूत्र ६ जीवखण्डन सूत्र १० ईश्वर ( ग्रानन्द ) खण्डनसूत्र ( क ) प्रकारान्तर से ( ख ) 13 ( ग ) ११ सर्वसिद्धान्तखण्डन सूत्र १२ अज्ञानश्रेयस्त्वसूत्र ७ असत्योपनिषत् ( ३ ) ८ विशिष्ट - त्रिसत्योपनिषत् ( ४ ) १ ज्ञानप्रामाण्यसिद्धिसूत्र २ प्रत्यक्षप्रामाण्यस्थापनसूत्र ( सारांश ) 17 " 1 ३ मनः प्रामाण्यसिद्धि ( क ) ( सारांश ) ४ जीवसिद्धिसूत्र ( क ) ( सारांश ) अर्थ धारकजीवसिद्धि सूत्र ( ख ) ( सारांश ) ५ ] अन्तर्जगत सिद्धिसूत्र ( सारांश ) ६ जीवानन्त्य सिद्धिसूत्र ( सारांश ) ७ अन्तर्जगदानन्त्य सिद्धिसूत्र ( सारांश ) अन्तर्जगतो ग्रहमालम्बनत्व सिद्धिसूत्र ( सारांश ) ६ बहिर्जगत् सिद्धिसूत्र [ ख ] पृष्ठ २४ २४ २५ २६ २७ २६ ३० ३१ ३३ ३३ ३४ ३६ ४७ ४६ ४६ ५१ ५३ ५४ ५५ ५५ ५६ ५७ ५७ ५८ II ५६ ६० ६१ ६२
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* ब्रह्मविज्ञान * विषय १० अन्तर्जगद् बहिर्जगतो: पृथकत्व सिद्धिसूत्र ११ ज्ञानोपपादन सिद्धिसूत्र ( सारांश ) १२ ईश्वर सिद्धिसूत्र उदाहरण नास्तिक प्रश्नों का उत्तर ईश्वर सिद्धिसूत्र का सारांश १३ जीव और ईश्वर का साधर्म्य वैधर्म्य सूत्र ( सारांश ) १४ जीव ईश्वर की पृथक् सत्ता ( सारांश ) १५ ज्ञान और सत्ता का पौर्वापर्य सूत्र ( सारांश ) ( उपसंहार ) १६. उपासनासूत्र ( सारांश ) ९ - शुक्लत्रिसत्योपनिषत् ( ५ ) १ प्रजापति परिच्छेद का प्रथम मूलैकत्वसूत्र मूलैकत्वसूत्र का सारांश ( संक्षेप ) पविकल्प सम्बन्ध २ व्युत्पत्तिसूत्र ३ आत्मनिर्वचनसूत्र ४ श्रात्माप्रतिपत्तिसूत्र १ प्रकारिकरूढ़ २ त्रैकारिकरूढ़ ३ योगरूढ़ ४ यौगिकरूढ़ ५ यौगिक ६ व्यूह [ ग ] पृष्ठ ६२ ६४ ६८ ७० ७२ ७५ ७ ९ 6.69 ७७ ८५ ६० ६१ हर ६३ ६४ ६५ १०० १०० १०४ १०६ १०६ १०७ १०८ १०८ ११० ११० १११ ११२ ११३ ११३ १ सृष्टि और इसके मूल कारण ब्रह्मा, इन दोनों का आपस में
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* ब्रह्मविज्ञान * विषय २ वैकारिकरूढ़ या सत्यत्रयसूत्र मन के लक्षण प्रारण के लक्षण वाक् के लक्षण मन, प्राण और वाक् का साधर्म्य वैधर्म्यं २ दूसरा अधिकार ३ तीसरा अधिकार ४ चौथा अधिकार ५ पाचवां अधिकार ६ छठा अधिकार . ३ योगरूढ़ १ प्रजापति रूप निरूपणसूत्र २ आदि प्रजापतिसूत्र ४ यौगिकरूढ़ [ वेदसूत्र ] १ वेद का निरूपण २ रसवेद ३ यजुः के विषय में अनेक ऋषियों के मतभेद ४ साम ५ यजुः ६ यज्ञ ७ वेदों का उदाहरण वितान वेद छन्दवेद १० छन्द वेद का ऋक् ११ साम " " १२ वेद साधारण रसवेद का उपयोग वितानवेद का उपयोग [ घ ] पृष्ठ ११३ ११५ ११६ ११७ ११६ १२० १२१ १२२ १२२ १२३ १२३ १२३ १२४ १२४ १२७ १३१ १३१ १३१ १३२ १३३ १३४ १३४ १३५ १३६ १३७ १३८ १३८ १४४ १४४ १४५ १ श्रवैकारिकरूढ़ या परात्पर श्रात्मासूत्र १ मन, प्राण और वाक् का अधिकार अर्थात् पदार्थों में उपयोग