ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 231–240

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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ॐ ब्रह्मविज्ञान * एक दृष्टि से परमेश्वर को यों भी देख सकते हैं कि इस विश्व में जितने मन, प्राण, वाक् हैं वे सब उसके वास्तविक रूप हैं और वेद, यज्ञ, प्रजा ये तीनों ही उसके शरीर हैं और जीव ईश्वर ये सभी उसके वित्त हैं । इन तीनों के अतिरिक्त उस परमेश्वर की ग्रात्मा अलक्ष्य गोचर निञ्जरन, निराकार है । वह अज्ञेय और ग्रनिर्वचनीय है इस प्रकार आत्मा, रूप, शरीर और वित्त इन चारों से चतुर्व्यूह वाला एक द्वितीय व्यूहानुव्यूह परमेश्वर है । इस परमेश्वर की न नाभि है, न संस्था है, न आदि है न ग्रन्त है, न इसका कोई दूसरा आधार है, अनन्त ईश्वर अनन्त जीव, इन सब में यह समान भाव से सर्वत्र व्याप्त है इसकी मुख्यतया दो प्रकार से भावना की जाती है, एक शान्त और दूसरा समृद्ध, इनमें अव्याकृत रूप से यह शान्त है और एकाकार है और एक ही ग्रात्मा है किन्तु समृद्ध भाव से यह अनन्ताकार है और सर्वात्मा है । भूमा रस - ( रस ग्रानन्द ) शान्त या समृद्ध कोई भी परमेश्वर का स्वरूप यदि मन में लाना चाहे तो वस्तु स्वरूप का सामान्य भाव किसी प्रकार से मन पर ग्राभी जाता है तथापि यदि उसकी सीमा की ओर दृष्टिपात करें तो एकाएक मन रुक जाता है । सीमा को यह मन कहीं भी स्थिर नहीं कर सकता वह इसकी असीमता ४ प्रकार की है- १ दिया से, २ देश से, ३ काल से, ४ द्रव्य से । यदि किसी बिन्दु पर मन को खड़ा करके परमेश्वर को चारों ओर देखें तो नीचे, ऊपर, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी ओर जहाँ तक मन घावा कर सकता है वह सर्वत्र उसी को पाता है, मन की शक्ति रुक जाती है किन्तु उसके आकार की सीमा नहीं मिलती इसलिये वह दिक् से अनन्त है और समीप से समीप, दूर से दूर और भीतर बाहर सर्वत्र उसको पाते हैं उसका कोई नियत देश नहीं हो सकता । इसलिये वह देश से भी अनन्त है यह सृष्टि जो परमेश्वर की समृद्धि मात्र है । यह कब उत्पन्न हुई और कब तक रहेगी इसका निर्णय कठिन ही नहीं किन्तु असंभव है । सम्भवतः हृदय इसी को स्वीकार करता है कि जगत् अनादि और अनन्त है । इसी-लिये परमेश्वर काल से भी अनन्त सिद्ध होता है इसी प्रकार यह द्रव्य से भी अनन्त है । यदि सामान्य दृष्टि से सबसे बड़े पदार्थ को ढूढे तो नाम मिलेगा । क्योंकि ये सब जो जहाँ कुछ है नाम ही नाम हैं, इसलिये नाम को भूमा कह सकते है किन्तु यह नाम वाक् से उत्पन्न होता है । भिन्न - भिन्न प्रकार के अनन्त नाम केवल एक वाक् ही वाक् है, इसलिये वाक् नाम से भी बड़ी होने के कारण भुमा है किन्तु यह सारी वाक् मन में प्रवेश कर जाती है । मन का प्रदेश वाक् से भी अधिक प्रतीत होता है इसलिये मन भूमा है किन्तु यह मन संकल्प के प्रवीन अपना रूप बदला करता है, संकल्प का अनुगामी होता है इसलिये ये संकल्प मन से भी बड़ा है और भूमा है किन्तु यह मंकल्प मेरे चित्त के कारण उठता है इस— लिये चित्त भूमा है किन्तु यह चित्त ध्यान के वशीभूत होकर ही संकल्प को उत्पन्न करता है इसलिये ध्यान भूमा है यह ध्यान मेरे विज्ञान के कारण से होता है इसीलिये विज्ञानभुमा है । विज्ञान बल के प्रभाव से न्यूनाधिक होता है इसलिये बल भूमा है किन्तु बल इस शरीर में ग्रन्न के ग्रधीन है ग्रन्न की न्यूनता में बल क्षीण हो जाता है । इसलिये अन्न ही भूमा है किन्तु ग्रन्न, जल से उत्पन्न होता है अन्न के बिना रहकर भी जल के बिना नहीं जी सकता इस वास्ते जल भूमा है किन्तु जल [ १६६ ]

पृष्ठ 232

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* ब्रह्मविज्ञान के तेज के अधीन है बिना तेज के जल का प्रवाह न होकर घन हो जाता है इसलिये तेज के ही कारण से जल का प्रवाह है इसलिये तेज भूमा है किन्तु यह सब तेज इस अनन्ताकाश में भरा हुआ है इसलिये वायु भूमा है किन्तु इस वायु से भी स्मरण भूमा है स्मरण से भी ग्राकाश भूमा है आकाश से प्राण भूमा है जितने पूर्व गिनाये गये हैं ये सब के सब प्राण ही प्रारण हैं प्रारण का ही यह सब विकार है, प्रारण से ही उत्पन्न होकर प्रारण ही के पकड़ से भिन्न - भिन्न ग्रपना स्वरूप धारण करते हुए प्रारण ही के ग्राधार पर सब विद्यमान हैं । नष्ट होने पर अन्त में इन सब की प्राण ही गति है इसलिये प्राण ही सत्य भूमा है । हमको उचित है कि सब स्थानों में सत्य को ही दृढे किन्तु यह सत्य विज्ञान के बिना नहीं मिल सकता यह विज्ञान मति के बिना नहीं प्रकट होता यह मति भी विना श्रद्धा के नहीं होती श्रद्धा भी बिना निष्ठा के नहीं हो सकती, निष्ठा भी विना क्रिया के नहीं होती और यह क्रिया विना सुख के नहीं की जाती । किसी भी काम में किसी को भी जब तक सुख नहीं मिलता तब तक उस काम के करने में प्रवृत्त नहीं होता । सुख ही को लक्ष्य करके इस जगत् में सब ही क्रिया की जाती है इसलिये इस विश्व में ही सुख मुख्य है और वही सब को सब काम करा रहा है, इसलिये ये सुख ही भूमा है हम यह भी देखते हैं कि यदि किसी प्राणी को अपनी परिस्थिति से जब कभी कुछ अधिकता प्राप्त होती है तो उसको सुख होता है । अधिकता ही को भूमा कहते हैं, इसलिये भूमा ही सुख और सुख ही भूमा है । जहाँ पर भिन्नता से नाना भाव सुने जायँ नाना भाव देखे जांयँ तो उन भावों को हम परिच्छिन्न कहेंगे और परिच्छिन्न होना ग्रल्पता का लक्षण है । अल्पता अर्थात् कमी होना ही दुःख का मूल है इसके विरुद्ध जहाँ कोई भाव न भिन्न रूप से सुना जाता है और न भिन्न रूप से देखा जाता है वहाँ पर एकता व्याप्त हो जाती है । एकता के कारण प्रत्येक पदार्थ का भेद भाव हट जाता है और सर्वत्र परिच्छिन्नता या जाती है यही अपरिच्छिन्नता भूमा और भुमा ही सुख है और सुख को ग्रानन्द कहते हैं इसलिये सिद्ध हुआ कि सब विश्व केवल एक आनन्द ही आनन्द है । जहाँ भूमा है वहाँ भिन्न - भिन्न पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, अर्थात् ज्ञान में से सब प्रकार के भेद भाव मिटकर एकता आ जाती है सब एक ही विज्ञान हो जाता है यही एक विज्ञान भूमा है इससे सिद्ध हुआ कि यह सब कुछ विज्ञान ही विज्ञान है इस विज्ञान में श्रानन्द रूप से भागता हुआ जो कुछ है वही सत्ता है और सत्ता ही विज्ञान हैं और ग्रानन्द है यही सत्ता विज्ञान और श्रानन्द तीनों खूब विचार करने पर ग्रन्त में भूमा ठहरते हैं इसलिये यही भूमा जिसको सच्चिदानन्द कहते हैं परमेश्वर का वास्तविक स्वरूप है । २१ - उपासना -४ जीव इस परमेश्वर की प्राराधना में सम्यक् प्रकार से समर्थ नहीं हो सकता - केवल ईश्वर की ही आराधना करने से परमेश्वर की भी प्राराधना सम्पन्न हो जाती है । जो कुछ ऐहिक, ग्रामुष्मिक, काम्य कर्म किया जाता है वह सब जीव के लिये और ईश्वर के लिये हो सकता है, किन्तु काम्य कर्मों का कुछ भी प्रभाव परमेश्वर में नहीं पड़ता परन्तु मन्यासी विद्वान् जो कुछ निष्काम होकर कर्म करते है । उनसे मोक्ष होता है । उन कर्मों से ग्रात्मा विशुद्ध होकर जीव धर्मों को छोड़कर परमेश्वर में लीन हो जाता है । [ २०० ]

पृष्ठ 233

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* ब्रह्मविज्ञान कै

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति, तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥

ग्रोम् - इत्येतत् प्रजापति के प्रधानता से तीन रूप माने गये हैं परमेश्वर, ईश्वर और जीव । इन तीनों के संक्षेप में तीन नाम हैं, ओम्, अहः ग्रहम् । इनमें भी श्रोम् ही ईश्वर श्रौर जीव इन दोनों को प्रतिष्ठा ( आधार ) है । ये तीनों शब्द दो - दो शब्दों से बने हैं-ग्रह - ग्रम् = यउ अम् = ग्रोऽम् = परमेश्वरः । ग्रह - अन् = ग्रहन् = ग्रहः = ईश्वरः । जीवः । ग्रह - ग्रम् = ग्रह ग्रम् = अहम् = इनमें ' अ ' कार से आत्मा समझी जाती है जो ( आत्मा, अ ) कि निर्विकार सूक्ष्म रूप है और ' ह ' कार से जगत् समझा जाता है क्योंकि जिस प्रकार प्रकार ही स्थूलता में आकर ह कार हो जाता है उसी प्रकार श्रात्मा ही स्थूलता में ग्राकर जगत् बन गया है । इन दोनों प्रकार हकार के आगे कहीं अम् कहीं अन् लगाया गया है, जिनमें ग्रम् का अर्थ संसृष्टि है अर्थात दो को मिलाकर एक करना है । तात्पर्य यह है कि आत्मा जगत् से और जगत् श्रात्मा से मिलकर जो एक रूप बना हुआ है उसी को ओम् या अहम् कहते हैं और अन् का अर्थ जीवन है ग्रात्मा और जगत् इन दोनों से जिसका जीवन है वही कारण रूप ईश्वर अहः कहलाता है । तात्पर्य यह है कि आत्मा जगत् और जगत् में आत्मा इसी को प्रोम् या श्रहम् कहते हैं और दोनों आत्मा या जगत् जिसका जीवन हो उसका नाम ईश्वर है । ईश्वरदर्शन २२ उपक्रम ( १२ ) परोरजाः ( रजलोक ) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः इन्हें त्रैलोक्य कहते हैं । द्यौ: से भी परे अर्थात् त्रैलोक्य के पीठ पर इस भौतिक सूर्य से भी एक बहुत बड़ा विलक्षण चिन्मय सूर्य है जिसकी किरणें सत्ता, चेतना और आनन्दमय है, वह कूटस्थ, अचल और ध्रुव है । इसीलिए उसे अक्षर कहते हैं । इसी ग्रक्षर ( जो नष्ट न हो ) की महिमा स्वरूप कितने ही त्रैलोक्य चारों ओर विद्यमान हैं । इसी अक्षर को हम यहां ईश्वर कहते हैं । इस ईश्वर के विषय में छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे प्रपाठक के १३ वें खण्ड का तथा नारायण उपनिषद् के कुछ प्रमाण उद्धृत करते हैं-अभ्भस्य पारे भुवनस्य मध्ये नाकस्य पृष्ठे महतो महीयान् 1 शुक्रेण ज्योतींषि समनुप्रविष्टः प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः ॥

यस्मिन्निंद सच, विचैति सर्वं यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः ।

तदेव भूतं तद्भव्यमा इदं तदक्षरे परमे व्योमन् ॥

[ २०१ ]

पृष्ठ 234

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* ब्रह्मविज्ञान भ्राजसा च । तेनावृतं खं च दिवं मही च येनादित्यस्तपति तेजसा यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः ॥ भूम्याम् यतः प्रसूता जगतः प्रसूतिः तोयेन जीवान् व्यससर्ज यदोषधीभिः पुरुषान्पशूश्च विवेश भूतानि चरा चराणि ॥

यतः परं नान्यदणीय सं हि परात्परं यन्महतो महान्तम् ।

यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥

तदेवतं तदसत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् । ॥

नाभिः इष्टापूर्त बहुधा जात जायमानं विश्वं बिर्भात भुवनस्य

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।

हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्य गेनके अमृतत्वमानशुः ।

परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥

तीन लोक ईश्वर को " परोरजाः " कहते हैं इसलिए कि ' रज ' नाम लोक का है और वह ईश्वर से पैर है, बहुत से त्रैलोक्य ईश्वर के चारों ओर विद्यमान हैं । में ईश्वर परमेश्वर के स्वरूप में व्यापक होने के कारण कोई नाभि अर्थात् केन्द्र नहीं था किन्त इसी हैं । एक नाभि नियत है और उसी नाभि के चारों ओर अगणित सूर्य या अगणित त्रैलोक्य फिरते बना से यह ईश्वर वर्तुलवृत्त, सीमाबद्ध एक परिच्छन्न मूर्ति है उसके मन तीनों द्रव्यों का इन्हीं पृथिवी , प्रारण, वाक् हुप्रा रूप है, और वेद, यज्ञ, प्रजा इन तीनों से व्याप्त उसका शरीर है और बहत से सूर्य, चन्द्र, आदि पिण्ड उसके वित्त हैं इसीलिए उस ईश्वर को प्रजापति कहते हैं । सृष्टिक्रम का यहाँ परोरजाः अपने प्रकाश में जिस रूप से व्याप्त होता है से अपनी सीमा अर्थात् जिस रूप चयन आकाश बनाता है वह उस का मुख्यरूप ' मन ' है इस हैं कि उसके मन को घित इसलिये कहते अर्थात् चुनाव से ' वाक् ' में प्रारण विचित्र सृष्टियां सिरजा करते है सृज्, | व्याकरण के नियमानुसार तीन का अर्थ संसर्ग अर्थात् एक में दूसरे का मिलना है केवल दो वास्तव में जगत् की सृष्टि और कुछ नहीं उन या अधिक रूढ़ तत्वों के परस्पर मिलाव से नया हैं रूप दीख आता है उसी को नई सृष्टि कहते रूढतत्त्वों का परस्पर से बिछड़ने को प्रत्ति सृष्टि अर्थात् वस्तुओं सबसे प्रथम अ के का नाश होना कहते हैं रूढ़ तत्त्व कुछ न थे केवल ईश्वर आत्मा के मन प्राण ही थे के ऊपर प्रारण ,, वाक ।इसीलिए वाक् हैं! द्वारा मन के ही चुनाव से अनन्तानन्त रूढ़तत्व उत्पन्न हुए हैं इसीलिए " चित्त " कहते उस मन को [ २०२ ]

पृष्ठ 235

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ॐ ब्रह्मविज्ञान के यह चित्त उस प्रारण के बिना कदापि चयन की न्यूनाधिकता नहीं रहता है । इसी ३. रूपप्रकाश के प्राण के द्वारा जो चित का चयन होता है कारण वाङ्मय । है । यद्यपि वित्त प्रारण तीन प्रकार के हो जाते हैं? । चयन स्वयं स्वप्रकाश, २ परप्रकाश होना अमृत रूप है किन्तु बल रूप प्रकार के मृत्यु का मृत्यु के योग से उसका चयन हो हो काम है उसी मृत्यु के जाता को जाते हैं सम्बन्ध के तारतम्य से ही इन तीनों को चयन किये हुए प्रारण, के रूप तीन मयं कहते मर्त्य कहते हैं जाता हैं । अमृत और मृत्यु इन दोनों के मेल से उत्पन्न है उसी जब कि मन के चयन में हुए रूप अर्थात् को स्वप्रकाश बल का अधिक जोर लगता है तो उसमें कहते प्रकाश प्रकट हो दूसरे के हैं, यही प्रथम सृष्टि है । किन्तु भी कम प्रकाश को बल का प्रभाव कम होने से परप्रकाश बल का ग्रहण करने की सामर्थ्यवाला आँख से प्रभाव पड़ने द्रव्य उत्पन्न होता है यह दूसरी सृष्टि है । इससे देखते देखे जाते पर रूप प्रकाश द्रव्य केवल हैं किन्तु उत्पन्न होता है यह तीसरी सृष्टि है । ये तीनों द्रव्य , बल की देखा ज्ञान कमी से एक चौथी सृष्टि और होती है जिसको कि आँख से नहीं से ही उसका नहीं जाता उसमें अनुमान करते हैं । इस प्रकार ये चार सृष्टि हुई जिनमें जो आकर्षण, अदृश्य रूप की मात्रा रहने पर भी अत्यन्तकम होने के कारण उसको अमृत ही कहते हैं किन्तु शेष तीनों को मर्त्यकहते हैं । से इनमें मृत्यू स्वप्रकाश का सम्बन्ध को अग्नि घनता परप्रकाश को सोम और को हैं तीनों में फिर होने के कारण, रूपप्रकाश आप कहते इन आपोमयपिण्ड आकर तीस दो - दो भाव से स्थिति होती हैं । अधिक मृत्यु के योग से इन तीनों में प्रकार के पिण्ड विद्यमान को उत्पन्न होती हैं । अग्निपिण्ड को सूर्य, सोमपिण्ड को चन्द्र और कहेंगे रहती है पृथ्वी कहते हैं । इन तीनों में के दूसरी , इन्हीं उसमें पिण्डों बिना पिण्ड अवस्था सूक्ष्म रूप से है दोनों मृत्यु बल कम होने के कारण उसको पिण्ड -- १ - सोमसंयोगी अवस्थाओं अमृत कहते है, किन्तु रूप को मर्त्य, पृथक् को चित्य और चितेनिधेय भी अग्नि फिर २ प्रकार करता और २ सोमविरोधी कहते हैं । इनमें, का -यही है तो । सोमविरोधी को यम कहते है । वह जब सोम को अग्नि से संयोग चार वस्तु का स्वरूप रूढतत्व नष्ट हो जाता है इस प्रकार १– अग्नि २ - यम, ३ – सोम, आप् के सबसे बड़े विशाल तारतम्य प्रथम मन प्राण से उत्पन्न और चारों के चयन अर्थात् परस्पर से ग्रनन्त,, वाक् हुए इन अन्न जगत् प्रकार के रूढ, यौगिकरूढ और यौगिक पदार्थों ने उत्पन्न हो हो कर इतने मनकर का रूप का विकास परस्पर धारण कर लिया है । इनमें तीनों मत्यं चाकू रूप हैं और चौथा अमृत का है के भोग से परिवर्तन होता रहता है यही ब्रह्म ब्रह्म ही । इसी इस समस्त जगत् के रूपों का सर्वदा से कहा ब्रह्म है । जाता है कि यह सम्पूर्ण विशाल जगत् आत्मा से ही उत्पन्न होने के कारण जिसे अग्निमय २४ सत्यज्ञानरूप मिलकर पृथ्वी पिण्ड कहते हैं जिसे सूर्य कहते हैं, सोममय पिण्ड जिसे चन्द्रमा कहते हैं और आपोमय पिण्ड है वह जो इन तीनों में सूर्य और है उसमें परमात्मा की ज्योति सब रूप उत्पन्न चन्द्र से जो ज्योति उत्पन्न होती मिलता सूर्य होता है उसे ही हैं । जगत् में जो जहाँ कुछ ज्ञान का रूप दीखता चन्द्र की ज्ञान कहते इस है उसके ज्योति से प्रत्येक के द्वारा मस्तिष्क में जाकर मन से. संयोग वस्तु का रूप बनकर चक्ष से ही जीवों सूर्य की ज्योति के बिना रूप का सब ज्ञान उत्पन्न होता है । चन्द्र [ २०३ ]

पृष्ठ 236

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* ब्रह्मविज्ञान के न होने से किसी प्रकार का भी ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता, इसीलिये गाढ़ निद्रा की अवस्था में मन का प्रकाश पूर्ण रहने पर भी किसी वस्तु के रूप का सम्बन्ध न होने से कुछ ज्ञान उत्पन्न नहीं होता । इस विज्ञान में भौतिक प्रकाश का सम्बन्ध है उसी के द्वारा इस विज्ञान में ग्रानन्द का अनुभव होता है इसलिये इस श्रानन्दमय विज्ञान को ईश्वर का स्वरूप कहते हैं । इसी प्रकार आपोमय प्रारण के साथ संयोग करके जो " परज्योति चित् " का रूप बनता है उसको स॒त्य कह॒ते हैं । यह सम्पूर्ण विश्वमण्डल आपोमय है आप के सम्बन्ध विना कहीं कुछ नहीं बनता किन्तु " इस में ही सत्य का भाग है इसीलिये संपूर्ण जगत् के प्रत्येक अर्थ में यह सत्य पाया जाता है । यद्यपि जगत् के पदार्थ भिन्न - भिन्न ग्रनन्त प्रकार के हैं तथापि उन सबमें यह एक ही सत्य भिन्न - भिन्न रूप होकर भिन्न - भिन्न कार्य करता है, यही सत्य प्रत्येक वस्तु को भिन्न - भिन्न रूप में उत्पन्न करता है और उनमें भिन्न-· भिन्न रूप से बैठकर भिन्न - भिन्न चेष्टा करता है । इस भिन्न रूप में आये हुये सत्य को " वस्तुशक्ति " कहते हैं, इसी को अन्तर्यामी भी कहते हैं उसी के लिये यह गौतम ऋषि का वाक्य है—

अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधाम्यन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् ।

सजूर्देवेभिरवरैः परैश्चान्तर्यामे मघवन् मादयस्व ॥ १ ॥

पृथ्वी, ग्रग्नि, मेघ, जल, बिजली, दिशा, व्योम, वायु, आदित्य, चन्द्र, तारा, भूत, लोक, वेद, यज्ञ, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, त्वचा, रेत, तम्, तेज और ग्रात्मा इत्यादि जो जहाँ कुछ वस्तु हैं सबके अन्दर इस प्रकार वह सत्य विद्यमान है कि जिसको ये सब वस्तु अपने ग्रन्दर बैठे हुए को भी नहीं पहचानते हैं किन्तु जैसा वह करता है वैसा ही करते और उसको अपना करम समझते हैं । वह अन्दर बैठा हुआ सब का नियमन करता है ( अर्थात् मर्यादा में रखता है ) इसीलिये उसको अन्तर्यामी भी कहते हैं किन्तु वही सत्य है, वही वस्तु का धर्म है, वही शक्ति है और वही नियति या प्रकृति है । नियति या वस्तुशक्ति का उल्लङ्घन करके न कोई कुछ कार्य करता है और न जीवन ही धारण कर सकता है इस सत्य के ही वल से सूर्य और पृथ्वी ग्रादि पिण्ड अपने - अपने स्थान पर स्थिर हैं । ग्राग जलती है सूर्य तपता है, वायु चलती है तात्पर्य यह है कि सब कुछ सत्य के ग्राधीन है । यही सत्य जो प्रत्येक वस्तु में शक्तिरूप से प्रकट होता है वे इसके शक्ति रूप भिन्न - भिन्न अनन्त प्रकार के हैं उनमें से तीन अथवा अधिक यहां तक कि सब शक्तियों के समूह को ही सत्ता कहते हैं । जहां किसी वस्तु की सत्ता कहीं जाय वहां कितने ही प्रकार की शक्तियों का घनपुञ्ज समभाना चाहिये । वस इस प्रकार एक सत्ता रूप सिद्ध हुआ और पूर्व में विज्ञान रूप का वर्णन हो चुका है इन दोनों में ही तीसरे आनन्द की मात्रा का भी अनुभव होता है वस्तु की मात्रा का भी अनुभव होता है वस्तु की सत्ता की कमी होने पर ही दुःख का अनुभव होता है, कहना . होगा कि यह सत्ता प्रानन्दमय है । इस प्रकार विचार करने से ग्रानन्द, विज्ञान और सत्ता ये तीनों ही भाव इस जगत् के सर्व व्यवहार के हेतु पाये जाते हैं इसलिये इन तीनों भावों को मिलाकर जो एक रूप उत्पन्न होता है उसे ही " सच्चिदानन्द " कहते है और वही हमारा ईश्वर है । [ २०४ ]

पृष्ठ 237

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ॐ ब्रह्मविज्ञान २४ प्राणसृष्टि मन, प्राण, वाङ्मय जो परोरजा कहा गया है उसमें मन भाग से ज्ञान, वाक् भाग से सत्य का निरूषण हुआ है इनमें तीसरा जो प्राण है उसकी सृष्टि जानना भी आवश्यक है । प्रथम तो यह प्राण, मन की इच्छा से नाना जाति का असंख्य रूढ़तत्त्व के रूप में उद्भूत हुआ । यह प्रत्येक रूढ़तत्व जो कि दूसरे रूढ़तत्व से बिना मिले पृथक् रूप धारण करते हैं इन सब को ऋषि कहते हैं । यद्यपि ऋषि प्राण ही को कहते हैं तथापि प्राण की दो अवस्थायें हैं १ - रूढ़, २ - यौगिक । इनमें रूढ़ प्राण ही को ऋषि शब्द से व्यवहार होता है, इन्हीं रूद्र रूपी ऋषियों का यौगिक अवस्था होने पर स्वरूप परिवर्तन होता है, इसलिये उनको ऋषि नहीं कहते हैं, किन्तु ऋषि के पश्चात् ऋषियों के योग से पितर उत्पन्न होते हैं, फिर पितृ-प्राणों के योग से देव और असुर उत्पन्न होते हैं, उनके पश्चात् मनुष्य और गन्धर्व उत्पन्न होते हैं, सब ऋषि, पितर देव, असुर, मनुष्य, गन्धर्व ये सब प्राण के ही भेद है । इनमें ऋषियों के भेद असंख्य होने पर भी प्राचीन विद्वानों ने जिन - जिन को पहचान कर परीक्षा करके निरूपण किया है उनमें कुछ के नामये हैं— १ – भृगु २- अङ्गिरा ३- अत्रि ४- वशिष्ठ १२- अन्वेतोगण १३- नारद १४ – पर्बत ५- मत्स्य ६- अगस्त्य ७- पुलस्त्य ८- पुलह ६ - ऋतु १०- मरीचि ११ - सनकगरण १५ - अयास्य १६ - गौतम १७- घोर १८- प्रनाथ १६- श्रथर्वा २०- भरद्वाज २१ – वामदेव २२- शुनक २३ - जमदग्नि २४ - विश्वामित्र २५- कश्यप २६- कण्व २७ - कौशिक २८ - गृत्समद २६ - शंयु ३० - जरदष्टि ३१ - बृहस्पति ३२- सवर्त्त ३३- दक्ष इत्यादि इन्हीं ऋषियों के परस्पर योग से सोम को ग्रहण करने वाली वस्तु उत्पन्न हो जाती है जब उसमें ऊपर सोम रस भी मिल जाता है तब उसे पितर कहते हैं । इन पितरों की भी दो जातियाँ है १ अमूर्त जो निराकार है । २ मूर्त जो रूपवान् है इनमें अमूर्त के तीन भेद हैं- १ सोम सत् २ बर्हिपत् ३ अग्निष्वात्ता और ये तीनों वास्तव में ३ ऋतुत्रों के नाम हैं - ऋतुस्रों में ही सब उत्पन्न होते हैं इसलिये ऋतुयों को पितर कहते हैं । इनके प्रतिरिक्त ४ पितर मूर्त अर्थात् रूपवान् हैं १ - सोमपा २ - प्राज्यपा ३-हविर्मुक्, ४ - सुकाल | ये सातों पितर त्रिलोकी में व्याप्त हैं और चन्द्रमा इनका मुख्य स्थान है । इन्हीं पितरों से देव और असुर उत्पन्न होते हैं जिनमें देवताओं के पांच भेद हैं - ग्रग्नि, २ यम, ३ सोम, ४ ग्राप् ५ उपा । इनमें अग्नि के भेद हैं जिनको ' वसु ' कहते हैं और वायु के ११ भेद हैं जिनको ' रुद्र ' कहते हैं । इन रुद्रों से फिर दूसरे प्रकार के वायु उत्पन्न होते हैं जिनको मरुतु कहते हैं इन मरुतों के [ २०५ ]

पृष्ठ 238

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ॐ ब्रह्मविज्ञान सात - सात के सात थोक हैं अर्थात् ४६ भेद हैं और वरुण ग्रादि १२ ग्रादित्य के भेद हैं इनमें सब को ग्रर्थात् ८ वसु, ११ रुद्र, ४ ९ मस्त, १२ ग्रादित्य और २ अश्विनीकुमार ये सब ८२ अग्नि के ही प्रभेद हैं ये सभी देवता सूर्य से सम्बन्ध रखते हैं उन्हीं के किरणों में रहने के कारण प्रायः ये दिन में ही पाये जाते हैं । किन्तु ये ही देवता जब रात्रि में या अन्धकार में प्राते हैं तो देवता भाव को छोड़कर काले रूप में हो जाते हैं । उनको ही असुर कहते हैं ये प्रसुर चन्द्रमा या पृथिवी दोनों के काले भाग में अर्थात् सूर्य की विरुद्ध दिशा में सर्वदा विद्यमान रहते हैं । देवताओं से ज्ञान की वृद्धि होती है और असुरों वल की वृद्धि होती है । जाति आज तक ६६ पहिचानी गई हैं जिनमें वृत्त, नमुचि, जम्भ, वल, शम्बर श्रादि प्रधान हैं । इन देवता और असुरों के योग से ही स्थावर जंगम सब सृष्टियाँ उत्पन्न हुई हैं उनमें देवताग्रों की अधिकता से दैवी सम्पत्ति देखने में ग्राती है और असुरों की अधिकता से आसुरी सम्पत्ति जिनका वर्णन गीता ग्रादि में विस्तार पूर्वक है । इसी प्रकार गन्धर्व की सृष्टि है जो कि चन्द्रमा के उपग्रह होकर चन्द्रमा के चारों ग्रोर किरते हैं वे अभी तक २७ गिने गये हैं उन सब उपग्रहों के किरणों में जो प्राण है वे भी गन्धर्व ही कहलाते हैं ये सब प्रकार के ऋषि, पितर, देव, असुर, गन्धर्ब, ये पांचों पंचजन कहलाते हैं और ये सब प्राण के भेद है इन सब की सृष्टि उसी जगदीश्वर सच्चिदानन्द परोरजाः से हुई है | पञ्चस्कन्द नाभि से उठा हुआ मन, प्राण, वाक् जिसका रूप है और वेद, यज्ञ, प्रजा इन तीनों से जिसकी शरीर संस्था बनी है और बहुत से अनेक शाखावाले अनन्तग्रह जिसके चारों और वित्त के रूप में विद्यमान हैं उसको हम ईश्वर कहते है । ये ऐसे ईश्वर सहस्रों से भी अधिक हैं इनमें ईश्वर जिसके शरीर के ग्रन्त-र्गत हमारी सत्ता है उसी का हम निरूपण कर सकते हैं । उसी प्रकार से अथवा कुछ भिन्न भाव से अन्यान्य ईश्वरों को भी जानना चाहिये । हमारे ईश्वर में नाभि से लेकर भिन्न - भिन्न वित्तों तक भिन्न - भिन्न शाखा पूरी होती है उनमें भी जिन शाखाओंों में हमारी सत्ता है उसी का हम वर्णन करेंगे । ग्रन्यान्य शाखाओं का भेद भी उसी प्रकार अथवा कुछ न्यूनाधिक विशेष प्रकार से जानना चाहिये । सभी शाखायें ईश्वर की नाभि से ही उठती हैं जो वास्तव में ज्ञानमय ज्योति का घन है उसी स्थान से सभी शाखायें प्रतान के अनुसार चारों ओर फैलती है । इनमें वह शाखा जिसमें हमारी सत्ता है वह पञ्चस्कन्ध का है । पहला स्कन्ध वही है जो ईश्वर की नाभि से ज्ञानमय ज्योति की रश्मि चारों ओर फैलती है । उसी शाखा में कुछ दूर हटकर दूसरा स्कन्ध सूर्य कहलाता है जिसके प्राणमय ज्योति की रश्मि चारों ओर फैलती है उस सूर्य से भी भिन्न ग्रहों के रूप में नाना उपशाखायें चारों ओर फैली हुई हैं जिनमें से एक उपशाखा वह है जिसमें हमारी पृथिवी है यह पृथिवी तीसरा स्कन्ध है । इसके भी चारों ओर प्रणाखा फैलती हैं जिन पर चन्द्रमा है यह चन्द्रमा चौथा स्कन्ध है । इस चन्द्रमा के भी चारों चोर सोममय रश्मियों की उपशाखा फैलती है जिन पर गन्धर्व रहता है यह गन्धर्व पाँचवां स्कन्ध है । इस प्रकार पाँच स्कन्ध बहुतों ने माना है किन्तु विचार [ २०६ ]

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ब्रह्मविज्ञान एष्टि से देखने पर ईश्वर और सूर्य के मध्य में एक और सूर्य जिसको ' अभिजित ' कहते हैं एक भिन्न स्कन्ध मानने से ६ सब की शाला हो जाती है । इनमें कितने ही विद्वान् ग्रभिजित् स्कन्ध को मानते हुए गन्धर्व स्कन्ध को नहीं मानते हैं उनके मत से भी पांच ही स्कन्ध हैं किन्तु जैसे सूर्य्य के चारों ओर के एक पृथ्वी घूमती हैं और उन पृथ्वियों के चारों ओर चन्द्रमा घुमता है उसी प्रकार चन्द्रमा के भी चारों ओर एक प्रकार के उपग्रह अवश्यं घूमते हैं जिनको गन्ध कहते हैं ये गन्धर्व अत्यन्त छोटे होने के . कारण नहीं दीयते किन्तु बहुतों का विश्वास है कि इन्हीं गन्धर्वो के परम्परा घर्षण में एक दुर्बल गन्धर्व अपने मार्ग से च्युत होकर कभी - कभी पृथिवी तक गिरके श्रा जाता है और कभी आकाश में ही विलीय-• मान हो जाता है ऐसे ही गिरते हुए गन्धर्वो को उल्का या धिष्ण्या कहते हैं इन हर छोटे - छोटे जीवों का होना भी सम्भव है, इनके पतन के साथ - साथ उन जीवों का भी नाश हो जाता है इसी कारण से भारत-वर्ष में इन उल्का और विप्ण्या के पतन को अमाङ्गलिक समझते हैं । इस प्रकार छः स्कन्धों में सूर्य और पृथिवी इन्हीं दो स्कन्धों को लेकर त्रिलोकी कही जाती है जिसमें सूर्य को द्यो लोक र पृथिवी को पृथिवी लोक कहते हुए इन दोनों के बीच के ग्राकाश को अन्तरिक्ष के नाम से तीसरा लोक कहते हैं । चन्द्रमा गन्धर्व सहित इसी अन्तरिक्ष में माना जाता है इसीलिए वह त्रिलोकी के अन्तर्गत है, किन्तु परोरजाः अभिजित् सहित इस त्रिलोकी से बाहर माना जाता है अभिजित् और परोरजाः ये दोनों ही ब्रह्मलोक कहे जाते हैं । इनमें अभिजित् को कार्य ब्रह्मलोक या प्रवर ब्रह्मलोक कहते हैं और परोरजाः को कारण ब्रह्मलोक या परब्रह्म या उत्तम ब्रह्मलोक कहते | कितने ही गन्धर्व " पूगों से यह चन्द्रमा घिरा हुआ है, चन्द्र पूगों से पृथिवी घिरी हुई है, और पृथिवी पूगों से सूर्य घिरा हुआ है, इसी प्रकार सूर्य पूगों से अभिजित् और अभिजित् पूगों से परमात्मा या परोरजाः । गन्धर्वों की श्रेणी जहां तक पूर्ण होती है वहां तक चन्द्रमा की महिमा अर्थात् प्रकाश मण्डल व्याप्त रहता है | इसी प्रकार चन्द्र श्रेणी भी पृथिवी की महिमा में, और पृथ्वियों की श्रेणी सूर्य की महिमा में सूर्य की श्रेणी अभिजित् की महिमा में और अभिजित् की श्रेणी परोरजा: की महिमा में अन्तर्गत हैं । परोरजाः की महिमा ज्ञानमय है, अभिजित् की महिमा प्राणमय 1 सूर्य की महिमा देवमय, पृथिवी की महिमा भूतमय, चन्द्र की महिमा सोममय, और गन्धर्वो की महिमा प्रापोमय है । इस प्रकार ये सब पदार्थ इन्हीं पिण्डों से उत्पन्न होकर या निकलकर इस विशाल जगत् में सर्वत्र व्याप्त हैं एक ही ईश्वर की महिमा में इन सब का समावेश होने के कारण ये सब पदार्थ परस्पर मिल जुलकर नाना प्रकार के पदार्थों को उत्पन्न करते रहते हैं । ! 52 ये सब यद्यपि अपनी अपनी महिमा में स्वतन्त्र होते हुए भी अपने ऊपर वाली महिमा की अपेक्षा परतन्त्र हैं, जैसा गन्धर्व चन्द्रमा में, चन्द्रमा पृथिवी में, पृथ्वी सूर्य में, सूर्य अभिजित् में और अभिजित् परोरजाः के परतन्त्र हैं, अथवा ग्रभिजित् यादि सब परोरजाः के प्राधीन हैं । इसी प्रकार सूर्य आदि सब अभिजित के, पृथिवी ग्रादि सब सूर्य के चन्द्र श्रादि पृथिवी के और केवल गन्धर्व चन्द्रमा के आधीन है । ! २०७ ]

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* ब्रह्मविज्ञान जिस प्रकार परीरजाः में नभ्य आत्मा बिराजमान है उसी प्रकार वही एक नभ्य श्रात्मा अभि-जित्, सूर्य, पृथिवी, चन्द्र और गन्धर्व में भी विराजमान होकर भिन्न सृष्टि की रचना करता है और अनिरुक्त, ग्रात्मगुण, शरीर और वित्त इस प्रकार चतुर्व्यूह भिन्न - भिन्न रूप से सभी स्थानों में के उत्पन्न ग्रनन्त करता है । इस प्रकार छः स्कन्धों के छः चतुर्व्यूहों से अथवा यों कहिये कि अनन्त स्कन्धों चतुथ्यू हों से भरी हुई परोरजाः की महिमा अथवा परोरजाः का चतुर्व्यूह ही ईश्वर का स्वरूप सिद्ध है । यह परोरजा: ईश्वर, ज्ञान, क्रिया, और अर्थ इन तीनों से पूर्ण रहने के कारण सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-मान् ( और विश्वमूर्ति कहकर प्रसिद्ध है । यदि इस ईश्वर की स्तुति करते हुए शक्तिवश परमेश्वर कहें तो मिथ्या न होगा क्योंकि मुख्य एक परमेश्वर की आत्मा ही सब ईश्वर और सब जीवों के रूप में प्रकट हुई है । ईश्वर की पाँच आत्मायें प्रथम हम जीवका वर्णन करते हैं, इस जीव में ५ कोश हैं, कोश वह है कि जिससे किसी वस्तु का ( श्रावरण ) ढकना हो, जैसे तलवार का म्यान, इसी प्रकार जीव ग्रात्मा भी जिन म्यानों के भीतर तक रहता है उन्हीं को जीव के पाँच कोश कहते हैं । इन्हीं पाँच कोशों से चयन होकर ग्रात्मा से शरीर जीव का स्वरूप बना हुआ है । अर्थात् प्रत्येक प्राणी के शरीर को लेकर भीतर ग्रात्मा तक ६ भाग किये गये हैं, जिनमें सब के भीतर वाला एक आत्मा ही मुख्य द्रव्य है उसी के ग्रावरण रूप ५ कोश एक है । 1 ऊपर एक चुने हुए हैं जिनमें सबसे बाहरी आवरण को ग्रन्नमय कोश कहते है, जिसका नाम शरीर इसके भीतर क्रम से प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश इस प्रकार आत्मा के शरीर सहित ५ कोश हैं । के की इस प्रकार जैसे जीव ५ कोशों का बना हुआ है वैसे ही ईश्वर में भी ५ कोशों की सम्भावना जाती है, किन्तु उसके अन्नमय कोश को ' वसुधान कोश ' कहते हैं कोश डिब्बे के अनुसार , इस का स्वरूप है, जिसकी पृथिवी तो पैदा है और द्यो उसका ढक्कन है ग्रन्तरिक्ष है और दिशायें उसकी , उसका मध्य कीर हैं | ब्रह्माण्ड के सारे पदार्थ उसमें रक्खी हुई तीन लोक वस्तु हैं । जीव के शरीर में जिस प्रकार और प्रारण समूह तथा देवता और भूत मण्डल परिव्याप्त हैं उसी के ' वसुधान प्रकार ये सब पदार्थ ईश्वर में कोश ' में भी परिव्याप्त हैं । और ये सब पदार्थ ईश्वर के कोश वसुधान कोश में जीवों के अन्नमय सर्वदा आया करते हैं और साथ ही यहाँ से वहाँ जाया करते हैं, ऐसा ऐतरेय ऋषि ने कहा है । वह् वसुधान कोश ईश्वर का वास्तविक शरीर है जिसमें ईश्वर विज्ञान, आनन्द-का प्राण, मन, | / मय कोश जीव के ग्रनुसार ही विद्यमान है और इसी ईश्वर के आत्मा शरीर में जीव शरीर के अनुसार भी रहती है जिनका वर्णन क्रम से किया जाता है— ( २ ) परज्योति = चिदात्मा = परोरजा = परात्मा ' ' इस ईश्वर के ' परात्मा'- ' सूर्य ', चन्द्र,' पृथिवी ' ॥ देवता और भूत ' ये सभी इस ईश्वर की ग्रात्मा हैं । इनमें से तीन पृथिवी, चन्द्र और सूर्य इन तीनों लोक समझे जाते हैं किन्तु इस त्रैलोक्य से बाहर जो ' परज्योति ' है लोकों में होता वह भी इन तीनों हुआ जीव में पहुंचता है, वह परज्योति इस त्रैलोक्य में और उससे होने के कारण बाहर भी सर्वत्र व्याप्त [ २०८ ]