ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 221–230
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 221–230
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ब्रह्मविज्ञान है और उसी में से टटोल कर नया ज्ञान लाभ करके जगत् में उसका प्रचार करता है यह सब परमेश्वर के जगत् का कुछ आभासमान प्रमाण है किन्तु वास्तव में ईश्वर के जगत् से भी दूर होने के कारण परमेश्वर के जगत् को यथार्थ में नहीं जान सकते तथापि पृथक् पृथक् तीन जगतों का होना और उन तीनो जगत् का पृथक् वृथ तीन आत्माओं के अधीन होना कुछ कुछ अनुभव किया जा सका है इन तीनों तन्त्रों के तीनों जगतों का हमारे जीव के तन्त्र में मेल अवश्य ही है । बाहर के तीन तन्त्र जीव शरीर के अनुसार बाहर जगत् में भी तीन ही तन्न ग्रापस में मिलेजुले प्रतीत होते हैं । यदि इन सब पदार्थों पर दृष्टि डालें तो बहुत से पदार्थ इनमें परमेश्वर से बहुत से ईश्वर से और बहुत से जीव से भी उत्पन्न प्रतीत होगे - साधारणतः बाहर के पदार्थों को हम दो भागों में विभक्त करेंगे –१ कृत्रिम और २ प्राकृत । इनमें कृत्रिम तो वे हैं जिनको प्रकृति ने नहीं बनाया है जैसे मकान कुर्सी इत्यादि इनको जीव ने अपने विचार के द्वारा उत्पन्न करके ईश्वर की सृष्टि में उनको डाल दिया है । रूई प्राकृत, यद्यपि ईश्वर की सृष्टि है तथापि उसका वस्त्र जीव की ही सृष्टि से होगा । औषधियां ईश्वर की सृष्टि हैं किन्तु उनसे बने हुए औषध जीव की सृष्टि है । इनते अतिरिक्त जो कुछ पृथ्वी में वृक्ष, पशु आदि हैं अन्तरिक्ष में विद्युत, इन्द्रधनुष, मेघ आदि द्यौ में जो तारामण्डल, आकाशगङ्गा, घूमकेतु उत्पन्न होते हैं वे सब प्राकृत हैं और ईश्वर की सृष्टि हैं । अब इन दोनों के अतिरिक्त तीसरी वह वस्तु हैं जो इन दोनों में सामान्य भाव से पाई जाती है । जैसे प्रत्येक वस्तु की सत्ता, प्रत्येक वस्तु का भासना अर्थात् प्रतीत होना और जगत् का भूमा अर्थात् एक विस्तृत अनन्त रूप में सबका संनिवेश होकर विकास होना, ये तीनों परमेश्वर के तन्त्र से आये हुये धर्म प्रतीत होते हैं । इन तीनों पृथक् तन्त्रों का पृथक् पृथक् तीन श्रात्माओ से संबन्ध होने पर भी परस्पर सम्मिलित रूप होकर एक जगत् का रूप धारण करते हैं । त्रैलोक्य व्यवस्था जिस प्रकार जल स्थल के भिन्न भिन्न जीवों में शरीर के धातु भिन्न भिन्न प्रकार के पाये जाते हैं इसी तरह ईश्वर के शरीर में भी मनुष्यादि जीवों की अपेक्षा भिन्न प्रकार के ही शरीर धातु प्रतीत होते हैं जैसा कि ऋक् साम, यजु ये तीनों वेद ही ईश्वर के शरीर में रसरूप हैं । पञ्चभूतों का प्रपञ्च ही भूत निकाय है और पर्वत ही अस्थि रूप है और यज्ञ उनके शरीर में चेष्टा है किन्तु जीव शरीर के अनुसार ईश्वर के शरीर में न लोम है न चर्म है । जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में, योनि से नाभि तक पहला, नाभि से हृदय तक दूसरा और हृदय से कण्ठ तक तीसरा, इस प्रकार तीन भाग हैं, और तीनों के अधिष्ठाता स्वरूप अग्नि, वायु, इन्द्र ये तीन प्राण हैं, उसी प्रकार ईश्वर के शरीर में भी पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौः ये तीन भाग हैं और इन तीनों के अधिष्ठातृ स्वरूप अग्नि, वायु, इन्द्र ये तीन प्रारण हैं । भेद इतना ही है कि जीव शरीर में इन तीनों प्राणों को वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ कहते हैं और ईश्वर के शरीर में इन तीनों प्राणो को विराट् हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी या सर्वज्ञ कहते हैं । इनके अतिरिक्त जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में उपर्युक्त तीनों भागों का [ १८६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान एक ही अधिष्ठाता पृथक् एक मस्तक है । उसी प्रकार ईश्वर के शरीर में तीनों लोक से परं उन तीनों काष्ठाता एक ही कोई सच्चिदानन्द नाम का ज्योतिर्वन है वही ईश्वर का मस्तक है । कहीं - कहीं पर ऋषियों ने उदर को पृथ्वी, वक्षस्थल को ग्रन्तरिक्ष और द्यौः को सिर कहा है, वह छोटे ईश्वर के अधुरोध से कहा जा सकता है अथवा द्यौः से बाहर वाले सच्चिदानन्द को भी साधारण शब्दों में दीप्यमान होने के कारण द्यौः शब्द से भी कह सकते हैं | तात्पय्यं यह है कि ईश्वर के शरीर में अथवा जीव के शरीर में समान रूप से तीन - तीन लोक अपना पृथक् - पृथक् तन्त्र रखते हुए भी तीनो । सम्मिलित होकर एक ही जिसी ईश्वर के या जीव के शरीर का संगठन करते है । मनुष्य के शरीर में तीन लोक होने के कारण तीन ग्रात्माएं हैं । प्रत्येक ग्रात्मा में मन, प्राण, वाक् के तीन - तीन भाग हैं इरा प्रकार मनुष्य शरीर में आत्मा के भाग हैं जो परस्पर मिले जुले होते. के कारण सूत्ररूप हैं, यही नव सूत्र ब्रह्म का लक्षण है । जीव शरीर के अनुसार ईश्वर के शरीर में भी यही ६ सूत्र है और भी ब्रह्म के लक्षण है । इन्ही नव सूत्रों को यज्ञ सूचक कहते हैं । जिनको ब्राह्मण लोग उपासना की दृष्टि से शरीर के ऊपर धारण करते हैं । जीवस्वरूप निर्णय जगत् में सूक्ष्म या स्थूल जो कुछ वस्तु बिना किसी मनुष्य व्यापार के अपने श्राप जब स्वरूप धारण करता है तो वह अवश्य ही वर्तुलवृत्त होता है जैसा कि शब्द किसी बिन्दु से उत्पन्न होकर नीचे चारों ओर वर्तुलवृत्त रूप से ही फैलता है । ग्रग्नि का प्रकाश भी वर्तुलवृत्त होकर ही फैलता है वायु को किसी वस्त्र या भस्त्रा ( बोंकनी ) में भरें तो वह गोल होकर चारों ओर फूलेगा । मेघ से जब जल गिरता है तो वह यावे मार्ग में आकर अपने आप गोल बिन्दु में परिणत हो जाता है । मृत्तिका परमाणुत्रों ने मिलकर जो सबसे प्रथम इस पृथ्वी का रूप धारण किया है वह भी गोल है सूर्य, चन्द्रमा आदि प्रकृति सिद्ध सभी पिण्ड गोल ही दीखते हैं । इन सबके गोल होने का कारण यदि सूक्ष्म विचार करें तो साधारण रीति से इन सबमें व्यापक होकर विद्यमान कोई एक ग्रात्मा ही कारण प्रतीत होता है । इन वर्तुलवृत्तों में नाभि को मुख, इनके अन्तस्थ पृष्ठ का शरीर और बहिरङ्ग पृष्ठ को पद और अन्तस्थ पृष्ठ से बहिरपृष्ठ तक चारों ओर जो समुखता के सूत्र हैं, उनको ग्रक्षी कहते हैं । सभी गोल वस्तुग्रों में इस प्रकार ही प्रङ्ग प्रत्यङ्ग की कल्पना सभवतः मानी जाती है । पृथिवी, सूर्य, चन्द्र याद सभी पिण्डों में ग्रङ्गां की ऐसी ही व्यवस्था होती है । इस नियम के अनुसार हमारे शरीर की ग्रात्मा भी अपनी प्रकृति से वर्तुलवृत्त ही सम्पन्न होती है । यह जीव ग्रात्मा ईश्वर से उत्पन्न होती है, ईश्वर का शरीर गोल होने पर भी पृथ्वी के अवरोध से ग्राधे रूप में ही आकर जीव के शरीर में प्रवेश करता है । इसीलिये जैसे नीबू की आधी फांक की जाय उसी तरह हमारे शरीर में जब ग्रात्मा भी वर्तुलवृत्त के आधे भाग के रूप में स्वरूप धारण करता है । हमारा पीठ आत्मा का पीठ है मेरी छाती की ओर ग्रात्मा की गोलाई नहीं है । कारण हमारी ग्रात्मा ग्रागे की ओर [ १६० ]
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* ब्रह्मविज्ञान खाली होने के कारण उस अंश को पूरा करने के लिये सर्वदा सन्नद्ध होकर आगे अपने को बढ़ाना चाहता है । उसीलिये हम अपने ग्रांस, मुख की तरफ काम करने को जितना बलपाने हैं उतना पीठ की तरफ नहीं पाते यह पुरुष की कमी स्त्री के संयोग से किसी तरह पूरी की जाती है जीव के प्राधे होने के कारण से ही जगत् भर के जीवमात्र दो भागों में बटे हैं १ – पुरुष, २ – स्त्री । यह सर्वथा निश्चित विषय है कि यदि जीव आत्मा वर्तुलवृत होता तो जीवों में स्त्री, पुरुष का विभाग कदापि नहीं होता- इसी कारण प्राचीन वैदिक महर्षियों ने और देशान्तर के यवनाचार्यों ने भी एक ही ईश्वर के दो भाग करके स्त्री पुरुष का होना माना है । इन दोनों भागों में उत्तर दक्षिण दिशा का संबन्ध होने के कारण अग्नि श्रीर सोम की अधिकता एक - एक में होने से स्त्रीपुरुष के स्वरूप में परिवर्तन हो गया है । दक्षिण दिशा के संबन्ध से अग्नि की प्रबलता मे पुरुष की उत्पत्ति होती है उत्तर दिशा की सोम की प्रधानता से स्त्री की उत्पत्ति होती है । इस विषय में बहुत सी बातें निर्णय करने की हैं, जिनका विस्तार स्वतन्त्र रूप से अन्यत्र किया गया है | यहाँ इतना ही और कहना आवश्यक है कि इस प्राधी कमी के अतिरिक्त जीव- प्रात्मा और सव प्रकार से गोल है | मस्तक से पांव तक जितनी इसकी लम्बाई है - भुजा के पसार में भी उतनी ही चौड़ाई है | इस गोलाई के विरोध में अन्य बहुत से कारण उपस्थित हैं । जिनका वर्णन शारीरक विचार में होगा किन्तु किसी शरीर की स्थिति देखते हुए शरीर के ग्रात्मा को वर्तुलवृत के रूप में ही स्वीकार किया जाता है । ईश्वरस्वरूपनिर्णय जिस प्रकार जीव के मुख, ग्रक्षि ( दृष्टि ), पद आदि अवयव एक नियत दिशा में होते है, इसी कारण जीव नियत रूप से ही इन ग्रवयवों से काम ले सकता है । तात्पर्य्य यह है कि पांव से प्रांख़ का काम, मस्तक से पांव का काम नहीं ले सकता, परन्तु ईश्वर में ऐसा नहीं है ईश्वर के लिये ऋषियों ने कहा है: -सर्वतः पाणिपादं तत्, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके, सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो, विश्वतो बाहुरुत विश्वतःस्यात् ।
बाहुभ्यां मति संपतत्रं, र्द्यावाभूभोजनयन् देवएकः ॥२ ॥
एकोहि देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः, पूर्वोहजातः सगर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ ३ ॥
तस्मात् परं ना परमस्ति किञ्चित्, तस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वक्षइवस्तब्धोदिवितिष्ठत्येक, स्तेनेद पूर्णपुरुषेण सर्वम् 11811 [ १६१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान *
मूर्द्धानं यस्य विप्रा वदन्ति, संबै नाभि चन्द्रसूर्य्यो व नेत्रं ।
दिशः श्रोत्रे विद्विपादौ क्षितिं च सोऽचिन्त्यात्मा सर्वभूत प्रणेता ॥५ ॥
परमेश्वरस्वरूप निर्णय अब यदि परमेश्वर के स्वरूप का हम विचार करते हैं तो हमको विश्वास होता है कि दिक्, देश, काल और द्रव्य इन सबसे अनवच्छित होने के कारण उसके नाभि हो सकती है और न उसके कही पीठ कल्पना की जा सकती है क्योंकि वह असीम है इसीलिये न परमेश्वर का कोई मुख हो सकता है न उसकी दृष्टि हो सकती है न उसका पांव हो सकता है । तात्पर्य यह है कि ईश्वर में सब ओर मुख, दृष्टि और पाद कहे जा सकते हैं किन्तु परमेश्वर में किसी ओर भी मुख दृष्टि और पाद की कल्पना नहीं हो सकती परन्तु इतना होने पर भी देखना, सुनना, चलना, फिरना इत्यादि जितनी शक्तियाँ जो जहाँ कुछ हैं वे सब इसी सर्वत्र व्यापक परमेश्वर में कहे जा सकते हैं । उसके अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है । इसीलिये ऋषियों ने परमेश्वर का स्वरूप इस प्रकार कहा है-अपारिण बादो जबनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्ण: । सवेत्तिवेद्यं नच तस्यवेत्ता, तमाहुरग्यं पुरुषं पुराणम् ॥१ ॥
पाणि पादोइह मचिन्त्यशक्तिः, पश्यामचक्षुः श्रृणोम्यकर्णः ।
श्रहं विजानामि विविक्तरूपो, न चास्ति वेत्ता ममचित्सदाहम् ॥२ ॥
वेदैरनेकँ रहमेवत्रेद्यो, वेदान्तकृद्वेद विदेव चाहम् ।
न पुण्यपापे ममनास्तिनाशो, न जन्म देहेन्द्रिय बुद्धिरस्ति ॥ ३ ॥
अणोरणीयानहमेवतद्वन् महानहं विश्वमह विचित्रम् ।
पुरातनोऽहं पुरुषोहमशो, हिरण्मयोऽहं शिवरूपमस्मि ॥ ४ ॥
इसी प्रकार ग्रन्यान्य ऋषियों ने भी शान्त, क्षुब्ध, घोर परमेश्वर का स्वरूप वर्णन करते हुए कहा है कि उसके वाकू, प्राग, चक्षु, श्रोत्र मन ये पांचों प्राण नहीं हैं | शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांचों भूतगण नहीं हैं । आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी इन पांचों महाभूतों से बना हुआ उसका शरीर नहीं है और उसमें भीतर बाहर का स्थूल सूक्ष्म का, ह्रस्व दीर्न का, मुख और पैरों का भेद नहीं है, न उसमें भार है, न परिमाण है, न कोई ग्राकार है, न ग्रन्धकार है, न छाया है, न उसमें शोणित है न चर्म है, वह असंग है, अक्षर है, न ग्रन्न है न ग्रन्नाद, उसके शासन में सूर्य और चन्द्र अग्नि, वायु, द्य और पृथिवी ये सब नियत व्यवस्था के अनुसार भिन्न भिन्न अपने काम करने में कदापि त्रुटि नहीं करते, सब कुछ उसी से पकड़ा हुआ जहाँ का तहां स्थिर होकर इस संसार चक्र को चला रहा है । किन्तु वह परमे-श्वर नहीं दीख सकता है न सुनने की वस्तु है न जानने और समझने की वस्तु है । परन्तु जो जहाँ कुछ [ १६२ ]
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है ब्रह्मविज्ञान " बचता है, गुना जाना है. बाबा और नमका जाता है सभी जगह वही एक देखने वाला है, सुनने वाला है, जानने और समने वाला है, उसके अतिरिक्त न कोई इष्टा है, न धोता है, न मानता है न विज्ञाता है । परमेश्वर में कामना का न होना जीव और ईश्वर में कामना पाई जाती है जिसमें जीव की कामना श्रनित्य है कभी होती है और कभी नहीं यहाँ तक कि जिस जीव को जिस वस्तु की एक समय कामना होती हैं उसी को उसी वस्तु की दूसरे समय में कामना नहीं रहती, परन्तु ईश्वर की कामना ऐसी नहीं है उसकी कामना प्रत्येक वस्तु में एक रूप से सदा रहती है और जितनी कामनाएँ ईश्वर में उत्पन्न हुई वे सब इच्छा होते ही पूर्ण होती रहती हैं इसीलिये ईश्वर को सर्वकामनामय और आप्त काम कहते हैं परन्तु परमेश्वर काम है कदाचित् भी कोई कामना उसमें उत्पन्न नहीं होती क्योंकि प्राप्त वस्तुओंों की कामना हुआ करती है सो जो ग्रात्मा परिच्छिन्न हो उसी में संभव है किन्तु इस जगत् में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो परमेश्वर में न हो वा परमेश्वर से बाहर हो इसीलिये उसको काम कहते हैं । जीव त्रितन्त्र है, वह जितने अंश में स्वतन्त्र है उतने में ही फल की इच्छा से कर्म किया करता है, परन्तु यदि दूसरे दोनों तन्त्र बाधक हो और प्रबल हो तो उसकी कामना सिद्ध नहीं होती, कर्म निष्फल हो जाता है | चिकित्सा करने पर भी रोगी मर जाता है, परन्तु ईश्वर द्वितन्त्र है वह भी किसी श्रंश में परमेश्वर के परतन्त्र है तथापि उसकी परिमित शक्ति इतनी बढ़ी हुई और प्रबल है जिसके द्वारा उसको कोई वस्तु ग्रप्राप्य नहीं है, सब कुछ उसको नित्य प्राप्त है इसीलिये उसको किसी फल की कदाचित् भी कामना नहीं होनी चाहिये, किन्तु फल की अपेक्षा न रख करके भी कर्त्तव्य दृष्टि से वह सब कामना करता है और नित्य उसको सब काम प्राप्त होते रहते हैं उदाहरण के लिये सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, पृथिवी को लीजिये ये सब अपने अपने कामों को नियमानुसार कुछ भी फल की अपेक्षा न रख कर कर्तव्य दृष्टि से करते रहते हैं और क्रिया का फल भी पाते रहते हैं सूर्य के तपने से जल सूख कर सूर्य की ओर जाता है और उसे ग्रहण करता है किन्तु सूर्य को उस जल की किञ्चित् भी श्रावश्यकता नहीं है तथापि वह जल को ग्रहण करने की सर्वदा कामना रखता है और सर्वदा उसकी किरणों में जल भरा भी रहता है इसी उदाहरण से ईश्वर को भी जानना चाहिये । यद्यपि ईश्वर को कोई वस्तु प्रप्राप्य नहीं है, इसीलिये उसको किसी वस्तु की इच्छा भी नहीं होती है तथाहि वह सर्वदा काम करता ही रहता है और सब वस्तु भी उसमें विद्यमान रहती हैं और उन सब वस्तुय्रों को वह सर्वदा अच्छी तरह जानता भी रहता है । क्योंकि उसमें मन और सर्वज्ञ है और प्रारण के , प्राण, वाक् रहते | मन के कारण मनस्वी, सर्वकाम कारण वह सर्व शक्तिमान् है सर्वदा कर्म्म करता ही रहता है और वाक् के कारण सर्वगुण सम्पन्न सर्व-धर्मोपपन्न है अर्थात् सर्व प्रकार के ग्रंथों से सम्पन्न है । अब यदि परमेश्वर की ओर दृष्टिपात करते हैं तो उसको जीव और ईश्वर दोनों से भिन्न प्रकार का पाते हैं किसी कर्म या किसी कर्म के फल में उसकी कामना नहीं है क्योंकि कोई भी कामना प्रत्येक प्राणी के हृदयवर्ती ग्रात्मा से ही उठती है किन्तु परमेश्वर में कोई नाभि नहीं है इसीलिये न उसका हृदय [ १६३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * है न किसी प्रकार की कामना का उठना संभव है इसी से परमेश्वर को सर्वथा निष्काम कह सकते हैं । किन्तु प्रकारान्तर से यदि देखा जाय तो ग्रनन्तानन्त ईश्वरों में या ग्रनन्तानन्त जीवों में जो जहाँ कुछ क्रियाएँ होती हैं या जीव ईश्वर में जो कुछ कामनाएँ उठती हैं वे सब ही परमेश्वर में मानी जा सकती हैं । परमेश्वर या जीव जो कुछ कामनाएँ करते हैं या कर्म करते हैं वे सब परमेश्वर की ही कामना या कर्म कहे जासकते हैं क्योंकि कामना या कर्म किसी शक्ति पर निर्भर है और उन सब शक्तियों का घन केवल मात्र एक परमेश्वर ही है इसीलिये सब कर्म ही परमेश्वर के ही कहे जा सकते हैं तथापि जीव ईश्वर कर्मों के अतिरिक्त प्रातिस्विक रूप से परमेश्वर का कोई कर्म नहीं है । परमेश्वर की यात्मा में जो कुछ मन, प्राण, वाक् समर्पित हैं उनकी दो अवस्थायें कही जा सकती हैं— उद्बुद्ध और बुद्ध । इनमें जितने उद्धरूप हैं अर्थात् व्यक्त और व्याकृत हैं उनको ही ईश्वर, जीव या जगत् कहते हैं, उनमें जितनी क्रियाएँ हैं या कामनाएं हैं वे परमेश्वर के ही उद्बुद्धरूप हैं और वे ईश्वर और जीव के साथ ही संबद्ध है उनके अतिरिक्त जो मन, प्राण, बाकू हैं सो ग्रनुबुद्ध हैं इसी से परमेश्वर की कामना या क्रिया कुछ भी पृथक् रूप से कही नहीं जासकती । तात्पर्य यह है कि जीव ग्रनित्यकाम हैं ईश्वर सर्वकाम और आप्त-काम है किन्तु परमेश्वर सर्वथा निष्काम है | जीव अनन्त हैं-परमेश्वर में नभ्य ग्रात्मा का न होना शरीर के भिन्न होने से जीव भी भिन्न होते हैं । प्रत्येक जीव आत्मा के शरीर में दो - दो ग्रात्मा होते हैं एक नम्य और दूसरा सर्व । इनमें नभ्य ग्रात्मा वह है कि जो शरीर के केन्द्र में रहकर इस शरीर के धातु, रस आदि को निर्माण करता हुआ शरीर के अनुपयोगी पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल कर फेंकता रहता है, उसी के कारण शरीर का कोई भी अंश सड़ने नहीं पाता और शरीर को हलका बनाता हे परन्तु दूसरा सर्वश्रात्मा जीव का सम्पूर्ण चेतन शरीर है । इसी प्रकार ईश्वर भी अनन्त हैं उनका शरीर ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्ड के भेद से ही ईश्वर भिन्न - भिन्न माने जाते हैं, प्रत्येक ईश्वर के भी ब्रह्माण्ड में दो दो आत्मा होते हैं । एक ब्रह्माके केन्द्र में रहकर अपने से ही सब पदार्थों को उत्पन्न करता हुआ और उनको चारों प्रोर फैलाता हुआ ब्रह्माण्ड की रचना करता है उसको नम्य श्रात्मा कहते हैं और दूसरा सर्व ग्रात्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही कहते हैं । इस प्रकार जीव चौर ईश्वर दोनों में दो - दो ग्रात्मा पाये जाते हैं । किन्तु परमेश्वर में ऐसी दो ग्रात्मायें नहीं हैं वह एक ही है क्योंकि उसके शरीर को जगत् कहते हैंगो जगत् एक हैं और असीम है । असीम वस्तु की नाभि और परिधि दोनों ही नहीं कही जासकती, इसीलिये उसमें नभ्य श्रात्मा का होना सम्भव है । उसका प्रत्येक बिन्दु ही नाभि है और प्रत्येक बिन्दु से अनन्तानन्त शक्तियाँ उत्पन्न होकर अपना अपना विकास करती हैं, जिससे इस जगत् का स्वरूप बनता बिगड़ता रहता है, इसीलिये इस सम्पूर्ण जगत् को ही विश्वात्मा भगवान् परमेश्वर कहते हैं, जो ग्रसीग होने से किसी नियत स्थान पर नभ्यात्मा नहीं रखता उसका प्रत्येक बिन्दु ही नभ्य हो सकता है । परमेश्वर में दैशिक संस्था न होना जीव की शक्ति परिमित है इससे उसका शरीर भी परिमित ही उत्पन्न होता है, इसी प्रकार ईश्वर की शक्ति भी परिमित है, इसी से उसका ब्रह्माण्ड भी परिमित ही उत्पन्न होता है । यह ब्रह्माण्ड [ १६४ ]
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ब्रह्मविज्ञान दो प्रकार का है, एक छोटा जो उपेश्वर का शरीर है अर्थात् यह सूर्य अपने प्रकाश मण्डल से जितने ग्राकाश प्रदेश में व्याप्त होता है वही छोटा ब्रह्माण्ड है उसमें सूर्य, पृथिवी और अन्तरिक्ष के नाम से त्रैलोक्य की संस्था नियत रहती है, किन्तु महाण्ड वह है कि जिसमें असंख्य ऐसे सूर्य होने के कारण त्रैलोक्य संस्था भी असंख्य होती हैं । जिस प्रकार हमारी पृथिवी या अन्यान्य ग्रह इस सूर्य के चारों ओर फिरते हैं उसी प्रकार वे सब सूर्य भी जिस महासूर्य के चारों ओर फिरते हैं वही सच्चिदानन्द वन हमारा ईश्वर है | उसकी मत्ता चेतना और ग्रानन्द की किरणें चारों ओर जितने प्रकाश प्रदेश में परिव्याप्त हैं वही महाब्रह्माण्ड है और वहीं ईश्वर का शरीर है । यह महा ब्रह्माण्ड बहुत बड़ा होने पर भी परिमित है, सीमाबद्ध है, उसकी सीमा से बाहर भी इसी प्रकार के अनन्तानन्त ईश्वर परमेश्वर इस ग्रनन्त महा आकाश में इधर उधर अवश्य विद्यमान हैं, ऐसी सम्भावना की जासकती है और वे सब परिमित हैं किन्तु उन सबका प्रथम ग्रात्मा परमेश्वर है और वह एक है जितने जीव और जितने ईश्वर इस अनन्त बाकाय मण्डल में कहीं हैं उन सबको यदि एक दृष्टि से देखकर खयाल में लाया जाय तो वही परमेश्वर का रूप है । अर्थात् जो जहाँ कुछ है सां सब जगत् ही परमेश्वर का शरीर । उस जगत् का आदि, जन्त होना असम्भव है इसीलिये वह प्रसीग है | यदि किसी सीमा बद्ध ग्रायतन को ही शरीर कहें तो परमेश्वर में देश की संस्था न होने के कारण उसको शरीर ही कहना पड़ेगा । क्योंकि उसके शरीर से बाहर कुछ खाली जगह नहीं हैं । परमेश्वर में कालिक संस्था का न होना जीवग्रात्मा को सभी शक्तियाँ परतन्त्र से मिलती हैं अर्थात् ईश्वर से प्राप्त होती हैं जिससे नंमि-तिक और प्रनित्य हैं और ईश्वर आत्मा की सभी शक्तियां भी परतन्त्र से मिलती हैं, अर्थात् परमेश्वर से प्राप्त होती हैं । इसीलिये वे भी नैमिलिक और अनित्य हैं किन्तु परमेश्वर की सभी शक्तियाँ दूगरे किसी से प्राप्त नहीं होती हैं । वे स्वतन्त्रता से विद्यमान हैं क्योंकि परमेश्वर सर्वशक्तिचन है, उनकी निज की शक्तियाँ नित्यस्वयंभू हैं किन्तु उस परमेश्वर के जगत् में ग्रनन्तानन्त ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो होकर नष्ट होते रहते हैं और फिर उत्पन्न होते रहते हैं, इस प्रकार यह उत्पत्ति विनाश क्रम इस जगत् में यों ही श्रनादि-काल से होते चले जाते हैं और ग्रागे को भी इसी प्रकार अनन्तकाल में होते रहेंगे, जिस प्रकार से सृष्टि विनाशक्रम हम याज देख रहे हैं संभव है कि वह इसी प्रकार आगे को भी सर्वदा बना रहेगा । परमेश्वर की श्रात्मा में जो मन, प्रारण, वाक् ये तीन धातु हैं उनसे यद्यपि पृथक् पृथक् नाना प्रकार के भाव उत्पन्न होते रहते हैं और उन विकारों से फिर भी उनके अवान्तर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो होकर नष्ट होते रहते हैं, तथापि उन सब विकारों में मन, प्राण, वाक् इन तीनों का संबन्ध नित्य एक रूप से ही रहता है । सभी भाव वाङ्मय, प्राणमय, मनोमय कहे जासकते हैं और अनादिकाल से अनन्तकाल तक इसी प्रकार रहेंगे क्योंकि इस असीम परमेश्वर में दैशिक सीमा के अनुसार कालिक सीमा भी नहीं है । जगत् कारणता का विचार इसी विश्व का प्रभव और प्रतिष्ठा और परायण अर्थात् जिसके अंश से उत्पन्न होता है और जिसके अन्तर्गत आधार से ठहरा रहता है और नष्ट होकर अन्त को जिसमें लीन हो जाता है वह ईश्वर [ १६५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * है । इसलिये ईश्वर को विश्व का कारण कहते हैं जिस प्रकार वृक्ष पृथिवी के अंश से उत्पन्न होकर पृथ्वी के ही आधार से ही ठहरा रहता है और अन्त में पृथ्वी में ही लीन हो जाता है और जिस प्रकार मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होकर मिट्टी में ही रहकर ग्रन्त में मिट्टी ही हो जाता है । उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व का या ईश्वर प्रभव प्रतिष्ठा और परायण है । ईश्वर सर्वशक्तिमान् है और सर्वज्ञ है इसी प्रकार अपनी शक्ति श्रीर ज्ञान के कारण अपने विश्व को अपनी इच्छानुसार रचना किया करता है । यद्यपि संसार में समवायि अर्थात् उपादान कारण और निमित्त कारण भिन्न - भिन्न होते हैं । घड़े का उपादान मिट्टी है वह घड़े को नहीं बनाता, बनानेवाला कुम्हार है उस कुम्हार का घड़ा नहीं बनता । इसलिये ग्राश्चर्य मान कर ईश्वर में कितने ही लोग शङ्का करेंगे कि वह यदि सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् होकर निमित्त कारण है तो वह उपादान नहीं हो सकता । अर्थात् प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण नहीं होसकता और यदि वह उपादान है तो निर्माता नहीं हो सकता । यह श्राशङ्का सत्य है, परन्तु यह नियम विश्व का है और ईश्वर विश्व से पृथक् है, इसीलिये विश्व के नियम का प्रक्षेप ईश्वर में लागू नहीं होसकता । यथार्थ तो यह है कि यह ईश्वर मन, प्राण, वाक् इन तीनों तत्त्वों से बना है इसीलिये जितनी उसमें मन की मात्रा है उसके अनुसार वह सर्वज्ञ और ग्रपनी प्रारणमात्रा के अनुसार सर्वशक्तिमान् है । इसी प्रकार अपनी वाङ्मात्रा से विश्व का रूप बनाता है इसी कारण वाक् के अनुरोध से उसको विश्व का उपादान कह सकते हैं, किन्तु प्राण के अनुरोध से वही ईश्वर विश्व का श्रसमवायि अर्थात् प्रयोजक कारण है और मन के अनुरोध से वही ईश्वर विश्वका निर्माता निमित कारण भी है इसी प्रकार एक ही वस्तु के ग्रंश भेद से तीनों कारणों का समा-वेश इस विश्व में भी देखा जाता है । जैसे मकड़ी अपना जाला बनाने में श्राप ही उपादान है और निमित्त भी है इसी प्रकार ईश्वर को भी समझना चाहिये । परन्तु दूसरी आत्मा जो परमेश्वर है वह यद्यपि ज्ञान, सभी बल और सभी अर्थों का निधि है तथापि किसी बात की इच्छा नहीं रखता क्योंकि वह निष्काम है और सृष्टि बिना इच्छा, तप और श्रम के नहीं होती । इसीलिये वह इस विश्व को उत्पन्न नहीं करता अतएव वह कारण भी नहीं कहा जा सकता यद्यपि जीव और ईश्वर जो कुछ करते हैं वह भी परमेश्वर ही करता है इस अनुरोध से ईश्वर का कारण होना ही परमेश्वर का भी कारण होना है किन्तु जीव और ईश्वर को पृथक् रखकर यदि स्वतन्त्र रूप से परमेश्वर को देखें तो कहा जासकता है कि परमेश्वर कारण नहीं हैं । इसी अभिप्राय से वेद कहता है ।
" नतस्य कार्यं करणं च विद्यते ।
नतत्समश्चाभ्यधिकश्चदृश्यते ॥ १ ॥
परास्य शक्ति विविधैव श्रूयते ।
स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च ॥२ ॥
तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् ।
तंदैवतानां परमं दैवतम् ॥३ ॥
[ १६६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान *
स कारणं करणाधिपाधिपो ।
न चास्य कश्चिज्जनितानचाधिपः " ॥४ ॥
ईश्वर या जीव जो कुछ क्रिया करते हुए अपना जीवन धारण करते हैं वे सभी क्रिया परमेश्वर में ही मानी जा सकती हैं, क्योंकि परमेश्वर के अविनाभूत उसके बिना नहीं होने लायक हैं । वाक्, प्राण, मन जो जहाँ कुछ जीव में या ईश्वर में पाये जाते हैं अथवा और किसी जड़ जगत् में हैं अथवा जगत्, जीव, ईश्वर जो जहाँ कुछ है इन सब को ही परमेश्वर कहते हैं । यह परमेश्वर ईश्वर से या जीव से कदापि खाली नहीं रह सकता, यद्यपि कहीं कोई ईश्वर जीव के अनुसार नष्ट भी होजाता है तथापि दूसरे ईश्वर की उत्पत्ति हो जाने से यह परमेश्वर सदा ही ईश्वरों से परिपूर्ण रहता है । किसी ईश्वर के नष्ट होने को प्रलय कहते हैं, यह प्रलय दो प्रकार का है जब ईश्वर सो जाता है अर्थात् एक ब्रह्माण्ड में सभी तत्वों की वृत्तियाँ बन्द हो जाती हैं उसको क्षुद्र प्रलय कहते हैं, किन्तु यदि तत्त्वों का ही नाश होजाय तो उसको ईश्वर का ही नाश कहेंगे । वृत्ति नाश तत्वों का नाश नहीं होता जैसे मौन धारण में वाक् इन्द्रिय नष्ट न होकर इन्द्रिय वृत्ति होती है शयन की दशा में सब इन्द्रियों के रहते भी सब इन्द्रियों की वृत्तियाँ नष्ट होती हैं । किन्तु जीभ काटने पर, श्राँख फूटने पर ग्रथवा मृत्यु होने पर इन्द्रियाँ ही नष्ट होजाती हैं इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में भी वृत्तिनाश से ईश्वर का शयन और तत्त्वनाश से ईश्वर की मृत्यु जाननी चाहिये यद्यपि ईश्वर की उत्पत्ति और मृत्यु मानने में विशेष प्रमाण नहीं है तथापि विनाशी पदार्थों के घन होने के कारण प्रकृति नियम के अनुसार प्रत्येक ब्रह्माण्ड की भी उत्पत्ति और नाश होना सम्भवतः प्रतीत होता है! वेद के अनुसार प्रत्येक जन्म पदार्थ जिस घन में से बाहर निकल कर व्यक्त रूप में आता है और ग्रन्त को जिसमें लय होकर ग्रव्यक्त होजाता हैं उसको ईश्वर कहते हैं, किन्तु ये ईश्वर भी सब जिस घन से निकल कर प्रकट होते हैं और ग्रन्त को जिसमें लीन हो जाते हैं वे ही निधि ( ईश्वरों का ) परमेश्वर है । इस परमेश्वर के इस जगत् से संबन्ध के कारण द्वादशगुण है जैसा की गीता में लिखा है—
गतिर्भर्ताप्रभुः साक्षी, निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥१ ॥
जो मैं जीव ग्रात्मा हूँ उसको ईश्वर ही जानना चाहिये क्योंकि मैं ईश्वर का ही अंश लेकर उत्पन्न हुआ हूँ इसी प्रकार ईश्वर भी परमेश्वर का ग्रंश लेकर ही उत्पन्न हुआ है इसलिये वह भी परमेश्वर ही है । तात्पर्य यह कि यदि हम व्यापक दृष्टि से देखें तो क्या जगत्, क्या जीव क्या, ईश्वर सब ये एक परमेश्वर ही परमेश्वर हैं- परमेश्वर के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं है । सबका आत्मा होना जिस प्रकार देह की आत्मा जीव है उसी प्रकार इस जीव की भी आत्मा ईश्वर है और उन ईश्वरों की भी आत्मा परमेश्वर है परन्तु परमेश्वर स्वरूपतः प्रङ्गी होने के कारण आत्मा है, न कि कारण होने से जिस प्रकार कार्य की आत्मा कारण है उसी प्रकार प्रङ्गों की आत्मा श्रङ्गी है ये, सब परमेश्वर के अङ्ग हैं । परमेश्वर उनका श्रङ्गी है इससे वह ईश्वरों की आत्मा है । [ १६७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जिस प्रकार मैं स्वयम् एक आत्मा हूँ उसी प्रकार मुझ में विद्यमान ईश्वर मेरी दूसरी श्रात्मा है । और उस आत्मा में भी विद्यमान परमेश्वर मुझ में तीसरी ग्रात्मा है । इसी प्रकार यह ईश्वर भी जो स्वयं एक ग्रात्मा है उसमें विद्यमान परमेश्वर उस ईश्वर की ग्रात्मा है अब तीसरा वह परमेश्वर स्वयं ही एक आत्मा है उसकी कोई दूसरी ग्रात्मा नहीं हो सकता । ग्रात्मानों का इस विभाग के अतिरिक्त प्रकारान्तर से भी विभाग किया जाता है उसके अनुसार हमारे जीव ग्रात्मा में ५ आत्माएँ हैं । इन ग्रात्माओं की स्थिति शरीर में त्रिलोकी संस्था के कारण सपन्न होती है । इसीलिये ईश्वर में भी ये पांचों आत्माएँ विद्यमान रहती हैं क्योंकि उनमें भी त्रिलोक संस्था है । जीव की पांचों ग्रात्मा और ईश्वर की पाँचों ग्रात्मा परस्पर में अन्न अन्नाव भाव से रहती हैं । ईश्वर की ग्रात्माएँ जीव की ग्रात्माओं का रस सर्वदा चूसा करती हैं किन्तु जीव की आत्मा भी ईश्वर की उन्हीं ग्रात्मानों से रस लेकर अपनी इस कमी को पूरा करती है । इस प्रकार यद्यपि जीव ईश्वर दोनों में पाँच - पाँच ग्रात्मा संभव होती हैं । किन्तु परमेश्वर में इन पांचों में से एक भी ग्रात्मा नहीं है क्योंकि भूतों से उसका सम्पर्क नहीं | इसलिये एक उसमें भूतात्मा नहीं है । परमेश्वर ने स्वयम् सूत्ररूप होकर सब को अपने में बांध रक्खा है, किन्तु परमे-श्वर किसी सूत्र से बँधा हुआ नहीं है । इसलिये उसमें दूसरी सूत्रात्मा नहीं है ग्रीर जीव, ईश्वर का शरीररूपी क्षेत्र परिच्छिन्न होने के कारण क्षेत्र का ग्रभिमानी क्षेत्रज्ञात्मा हो सकता है किन्तु परमेश्वर का शरीर अपरिच्छिन्न होने के कारण कोई नियत क्षेत्र नहीं हो सकता । इसलिये उसमें तीसरी क्षेत्रज्ञात्मा नहीं । और जीव ईश्वर में भिन्न - भिन्न योनि का विभाग करने वाली महान् ग्रात्मा होती है । परिच्छिन्न होने के कारण जीव ईश्वर में भिन्न - भिन्न प्रकार की योनियों का भेद होना सम्भव है । इसीसे भिन्न - भिन्न योनि स्वरूप, भिन्न - भिन्न महान् ग्रात्मा भी होती हैं किन्तु परमेश्वर अपरिच्छिन्न है । किसी प्रकार की योनि का भेद उसमें सम्भव नहीं इसीलिये परमेश्वर में चौथी महान् ग्रात्मा भी नहीं है । इन चारों ग्रात्मानों के अतिरिक्त पाचवीं चिदात्मा जो ईश्वर या परमेश्वर से ही जीव और ईश्वरों में सम्प्राप्त होता है । किन्तु परमेश्वर स्वयं चिदात्मा है उसमें किसी दूसरे से चिदात्मा का आना सम्भव नहीं । इसीलिये उसमें यह ग्रात्मा भी नहीं हैं । अथवा प्रकारान्तर से परमेश्वर को यों देखिये कि ईश्वर या जीव में जितनी आत्मायें हैं वे सब परमेश्वर से बाहर नहीं हो सकती क्योंकि परमेश्वर के बाहर कोई प्रदेश ही नहीं है । जहां किसी का होना माना जावे इसीलिये ये अनन्त जीव ईश्वर की ग्रात्माएँ परमेश्वर की ही ग्रात्माएँ दूसरे इतना विशेष फिर भी है कि ईश्वर या जीव में पांच - पांच ग्रात्मा होने के कारण परिमित हो ग्रात्माएँ सकती हैं किन्तु परमेश्वर में आत्माएँ ग्रनन्त हैं इसीलिये परमेश्वर को सर्व प्रात्मक और सर्व ग्रात्मा हैं सकते हैं । सब ग्रात्माऐं उसकी आत्माएं हैं इसीलिये वह सर्व ग्रात्मक है किन्तु जगत् दोनों कह सभी का वही एक ग्रात्मा है इसीलिये वह सर्व प्रात्मा भी है । जीव, ईश्वर इन अणु से भी अणु और महान् से भी महान् वह है । कृष्ण, शुक्ल, पीत, हरित सब कुछ वह ही सत् और असत् है । तात्पर्य यह है कि इस विश्वभर में जितने बिरोध भाव हैं वे सब इस परमेश्वर में ग्राकर अविरुद्ध रूप से विद्यमान हैं । [ १६८ ]