ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 251–260

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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* ब्रह्मविज्ञान के कारण सब पदार्थों का संबन्ध परमेश्वर कहा जा सकता है । अर्थात् देवसङ्घ, भूतसङ्घ इन दोनों के लोक और इन सब के सूत्र ये सब ईश्वर की दशा में उत्पन्न होने के कारण ईश्वर की ही भक्ति है । परमेश्वर की भक्ति न होने पर भी परमेश्वर में रहते अवश्य हैं । इसी प्रकार दश इन्द्रियां, सात धातु, तीन धातु और मल, नाड़ी, मस्तिष्क आदि शरीर सस्था, दो प्रकार के कर्म, उन के तीन प्रकार के विपाक अविद्या, पांच प्रकार के क्लेश, छ प्रकार की ऊर्मयां ये सब पदार्थ परमेश्वर तथा ईश्वर में रहते हुए भी इन दोनों की भक्ति नहीं है किन्तु जीव की ही भक्ति कही जाती है । जिस प्रकार भिन्न - भिन्न प्रदीपों का प्रकाश या किरण आकाश में फैले रहने पर भी वे गृहाकाश की भक्ति नहीं हैं, किन्तु भिन्न - भिन्न किरणें भिन्न २ प्रदीप ( दीपक ) की भक्ति होने के कारण उसी प्रदीप की उत्पत्ति विनाश के साथ २ उत्पन्न विनष्ट होते रहते हैं । उगी प्रकार जीव ईश्वर में भी समझना चाहिये । २ जीव का मुख्य स्वरूप लक्षण आत्मा जोकि मन, प्राग, बाकू, इन तीनों का समुच्चय रूप है । उस में मन को चिनू कहते हैं । चित् का ग्रथं चुनाव करने वाला है । यह चित् अपनी इच्छावृत्ति से प्राण अर्थात् बल को उठाकर उस के द्वारा वाक् पर चिति करता है । अर्थात् वाक् के ऊपर मन के व्यापार से विकृत हुए प्राण के साथ अन्य वाक् का प्रचय ( चुनाव ) करता है । वही एक वाक् के, ऊपर दूसरी वाक् की चिति कही जाती1 है | यह चिति ३ बार होती है । बीजचिति, देवचिति, भूतचिति अर्थात् आत्मा के निज रूप शुद्ध वाक् के ऊपर जो प्रथम बार अन्य वाक् का प्रचय हुआ उस में बल इन दोनों वाकों को बाँध कर विलक्षण एक रूप देकर कृतकृत्य हो गया, वह स्वरूप बीजचिति के नाम से प्रथम त्रिति आत्मा में सिद्ध होती है । फिर इस आत्मा के मन की दूसरी इच्छा उठने पर दूसरा बल उन दोनों वाकों की ग्रन्थि पर तीसरी वाक् प्रत्रय करता है वह दूसरी चिति देवचिति के नाम से कही जाती है । इसी प्रकार तीसरी बार अन्य वाक् का प्रचय होने पर तीसरी चिति भूतचिति के नाम से प्रसिद्ध होती है । इस प्रकार इन तीन चितियों की चिति जो वाक् पर होती है उसका करने वाला आत्मा का मन भाग है इसलिये वह चित् कहलाता है । इन तीन चितियों से बनी हुई चिति कोही माया कहते हैं । माया का अर्थ आश्चर्यमय ग्रद्भुत तत्व है । जिसका वास्तव कारण समझ में न आवे किन्तु प्रमाण से सिद्ध हो | ये तीनों चितियाँ माया इसलिये कही जाती हैं कि इन चितियों के लिये अथवा इस प्रकार की चितियों के लिये ग्रात्मा में सर्वप्रथम इच्छा क्यों उठी और तीन ही बार इच्छा क्यों हुई, चौथी बार इच्छा क्यों नहीं हुई इत्यादि प्रश्न हो सकते हैं किन्तु इनका उत्तर कदापि दिया नहीं जा सकता केवल परीक्षा करने से जिस प्रकार जितनी चितियां स्पष्ट भासती हैं वे प्रमाण सिद्ध होने से अवश्य ही मानी जा सकती हैं | इसलिये जबकि ये दीखती हैं किन्तु इनका कारण नहीं जाना जाता इसी से सिद्ध हुआ कि ये तीनों ही एक माया है । ( माया नाप करने वाली, परिछिन्न करने वाली माया कहलाती है । ) इस प्रकार इस माया के इन तीनों भागों को हम तीन नाम से कहेंगे । बीजचिति, देवचिति और भूतचिति ये तीनों ही क्रम से आत्मा का आवरण होते हैं, इसलिये प्रथम आवरण बीजचिति को कारण शरीर, दूसरे आवरण देवचिति को सूक्ष्मशरीर और तीसरे ग्रावरण भूतचिति को स्थूल शरीर कहते हैं । [ २१६ ]

पृष्ठ 252

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ॐ ब्रह्मविज्ञान इनमें प्रथम ग्रावरण वीजचित में तीन भाग हैं । मन और प्राण के मिलने से एक नया रूप विज्ञानमय प्राण है, इसी को विद्या कहते हैं । इसी प्रकार वाक् और प्राण मिलने से दूसरा नया रूप उत्पन्न होता है जिसे ही अविद्या कहते हैं जो कि वास्तव में एक प्रकार का वाङ्गमय प्राण है । इन दोनों प्राणों में क्रम से प्रथम में मन की और दूसरे में वाक् की मात्रा बढ़ी हुई है किन्तु यदि प्रारण अन्य दोनों मात्रायें कम हो अर्थात् प्राण की मात्रा अधिक हो अर्थात् तीनों मात्रा सम हों तो उसमिलाव से सिद्ध हुए रूप को कर्म कहते । यही कर्म तीन प्रकार का है - सम मात्रा होने से सत् कर्म और अल्प ज्ञान मिले हुए प्राण को विकर्म तथा ग्रल्प-वाक् मिले हु ज्ञान मात्रा रहित प्राण को ग्रकर्म्म कहेंगे । तात्पर्य यह है कि प्रथम वीज चिति के मन, प्राण, वाक् इन तीनों के विकार से विद्या, कर्म और अविद्या ये तीन रूप सिद्ध होते हैं ये तीनों आत्मा के अर्थात् शुद्ध मन, प्राण, वाक् के प्रथम ग्रावरण होते हैं इसलिये इन्हीं को कारण शरीर कहते हैं और इन्हीं तान र्का सांख्य वाले प्रकृति कहते हैं । प्रकृति का अर्थ कारण है । ज्ञानात्मक सब ही विकार विद्या से और क्रियात्मक सब ही विकार कर्म से और अर्थात्मक सब ही विकार अविद्या से उत्पन्न होते हैं । इसीलिये ये तीनों ही ग्रात्मा की भोग सामग्री की प्रकृति कहलाते हैं । इनमें विद्या को सत्व गुण और कम्मं को रजोगुण श्रीर श्रविद्या को तमोगुण नाम देकर सांख्य शास्त्र में व्यवहार किया गया है । किन्तु जिस ग्रात्मा का यह बीजचिति प्रथम प्रावरण होता है उसी को सांख्य में पुरुष कहा है । इसके प्रथम श्रावरण विद्याकर्म और श्रविद्या के सम्बन्ध से ही यह आत्मा जीव कहलाता है । अर्थात् भूतचिति और देवचिति इन दोनों प्रावरणों के मिट जाने पर भी जब तक यह वीजचिति आत्मा से न हटे तब तक आत्मा ग्रावरण से बद्ध रहता है और परिछिन्न होने से जीव मा ईश्वर किसी कहलाता है । परन्तु यदि उपाय से यह बीजचिति का आवरण भी आत्मा से दूर हो जाय होकर तो वह आत्मा आवरण से मुक्त व्यापक हो जाता है परिछिन्न न रहने से जीव या ईश्वर न संसार कहला कर परमेश्वर कहलाता है और के बीजरूप उस बीज चिति के नष्ट होने से देवसृष्टि पाती या भूत सृष्टि भी उस आत्मा में नहीं होने इसलिये उस ग्रात्मा का बन्धन फिर कभी नहीं होने इसके पाता इसी को प्रपवर्ग मोक्ष कहते हैं । किन्तु विरुद्ध जब तक आत्मा में बीजचिति का बन्धन का मुख्य स्वरूप लक्षण है | भूतचिति के या स्थूलशरीर है तब के नष्ट तक उस होने ग्रात्मा को मौत को ( जीव मृत्यु ) कहते कहते हैं हैं यही , देवविति जीव या सूक्ष्म शरीर के नष्ट होने से सालोक्य, सामीप्य सारूप्य , सायुज्य , कारण शरीर के नष्ट होने से अपवर्ग मुक्ति मुक्ति होती हैं किन्तु वीजचितिया होती है जो सब से बढ़कर मुक्ति है के नष्ट होने स्थूलशरीर से मृत्यु, सूक्ष्मशरीर के नष्ट होने से ईश्वर और कारण शरीर नष्टहोने से परमेश्वर होता है । ३ जीव का लक्षण - अविद्या जीव की ग्रात्मा के मन प्राण वाक् में से , प्राणकी वृति छ प्रकार की हैं । उत्पत्ति, विनाश, प्रगति, गति, अविद्या और विद्या ये छों वृत्तियां यद्यपि के प्रारण की है तथापि निमित्त मन है मन 1. संयोग के तारतम्य से ही प्राण में इनका के उपयुक्त छ भेद उत्पन्न हो जाते हैं के संयोग । इसी प्रकार प्रारण तारतम्य से मन में भी भिन्न - भिन्न प्रकार के वृत्तिभेद निद्रा, स्मृति, विपर्यय, विकल्प | किसी वस्तु के भाव को अर्थात् उत्पन्न सत्ता हो जाते हैं और ये पांच हैं – प्रमारण, का अवलम्बन करती हुई [ २२० ] वृत्ति HTC

पृष्ठ 253

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ॐ ब्रह्मविज्ञान * को प्रमाण कहते हैं और प्रभाव को अवलम्बन करती जन्य संस्कार को अबलम्बन करती हुई वृत्ति स्मृति है हुई वृत्ति को निद्रा कहते हैं और प्रभा ( ज्ञान ) की वृत्ति उत्पन्न करे और दूसरे भाव पर बैठ कर यदि मन दूसरे भाव तो वह भ्रम है इसको हीं विपर्यय तो उसे विकल्प कहते हैं । और किसी भाव को अवलम्वन न करें कहते हैं । इन अवस्था में मन की पाँच वृत्तियों में से विपर्यय को भ्रम कहा है । इसी को किसी क्लेश कहते तम को हैं । यह क्लेश पाँच प्रकार के हैं । अविद्या अस्मिता ग्रभिनिवेश विद्या,, राग, द्वेष, इनमें , कहते हैं अर्थात् मोह को अस्मिता ग्रन्य वस्तु को ग्रन्य वस्तु के रूप में ग्रहण करना ही अविद्या है ॥१ ॥

कहते हैं अर्थात् जहाँ दृश्य और दृष्टि वस्तु को मैं देखता इनका भेद न हो अर्थात् देखता हुआ भी किसी अर्थ है इस बात का के साथ ज्ञान न हो उसको अस्मिता कहते हैं || २ || सुख को लेते हुए किसी बंध जाना ही प्रकार बाँधती राग है । राग में सुख की मात्रा ही हमारे मन को किसी वस्तु के साथ इस के है कि जिससे साथ बँधता मन परतन्त्र हो जाता है अपनी स्वतन्त्रता को खो बैठता है और जिस वस्तु , है उससे कुछ लाभ कुछ लाभ नहीं नहीं उठाता किन्तु बन्धन के कारण अन्य वस्तुओं से संबन्ध करके भी उठा सकता हुए किसी अर्थ इसीलिये राग भी एक प्रकार का दोष है || ३ || इसी प्रकार दुःख को लेते , बचाव का तम से बँधना के लिये द्वेष है || ४ || ग्रनिष्ट की संभावना से भय पाकर अपनी आत्मा के तीनों छिपाने का राग प्रयत्न करना अभिनिवेश है || ५ || राग में काम, लाभ, तृपा प्रायः होते हैं, ये के ही विकार विवेक हैं । इसी प्रकार क्रोध मद मत्सरता ये तीनों द्वेष के विकार हैं और मोह, ,, , अनवधान ( फाँसी यदि अस्मिता के रूप हैं जीव के बन्धन के लिये " पाश " ) कहे । ये सब मिलकर श्रात्मा जाते हैं । इन्हीं केद्वारा जीव ग्रात्मा सर्वदा फँसा रहता है । होती इस है प्रकार जो पांच क्लेश कर्म के विपाकों की उत्पत्ति के । जिन में कर्म कहे गये हैं उन्हीं से कर्म के प्राशयों की और योग से दो प्रकार के हैं और कर्मों के विपाक तीन प्रकार के हैं । इन्हीं कर्म और विपाकों यह श्रात्मा क्लेश कहते है बँध कर क्लेश पाता है । इसीलिये इनके मूलभूत अविद्या आदि पांचों को । इनमें हैं इसीलिये अस्मिता अभिनिवेश ये चारों ही अविद्या से उत्पन्न होते हैं । श्रविद्यामय , राग द्वेष ,, तनु संक्षेप में अवस्थाये हैं - उदार , प्रसुप्त इन को अविद्या ही कहते हैं । इन सब क्लेशों की फिर पाँच, को पूर्ण, छिन्न विप्लुष्ट आदि अपने कार्यों , और ये क्लेश जब पूर्ण ब्रोज में रहते हैं तो बन्धन हो रूप से दिखाते सब में दुर्बल जायें तो हैं उसी अवस्था को उदार कहते हैं और ये सब यदि सूक्ष्मता की दशा प्रभाव इन से जो वे दूसरे कर्मों के से दब कुछ बन्धनादि कार्य उत्पन्न होते हैं वे शिथिल होते हैं और प्रबल प्रभाव जाते हैं ऐसी किसी कर्मों के दबाव से इनका , अवस्था का जब सर्वथा नष्ट तनु कहते हैं । और कि दूसरे हो जायें तो हो जाय किन्तु इनकी रहे और दबाव हटते ही ये फिर प्रबल निर्मूल जाने की जड़ बनी यदि ज्ञानशक्ति के प्रभाव से इनकी शक्ति ही करदी अवस्था को प्रसुप्त कहते हैं और उत्पन्न जाय भी से कोई वृत्ति की नहीं होती तो इनकी निज की सत्ता रहने पर भी ज्ञान का दबाव हटाने पर इन उगने जिस प्रकार जौ को एक बार अग्नि में तपा देने से उन प्रकार की शक्ति यदि ग्रन्न के बीजों होते उसी , गेहूं, धान, । इन जाती रहती है में बोने पर भी अंकुर उत्पन्न नहीं उत्पादक क्लेशों । उन को जमीन की के जीव होने के कारण इन में बन्धन शक्ति ग्रात्मा में रहने पर भी ज्ञानाग्नि से तप्त भी उन कमों से जाती रहती कर्म करते हुए । है, इसीलिये जीवनमुक्त की आत्मा में सब ऐसी दबी हुई, [ २२१ ]

पृष्ठ 254

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* ब्रह्मविज्ञान कोई भी ग्रदृण्ट संस्कार उत्पन्न नहीं होता । ऐसी जली हुई दशा को विप्लुष्ट कहते हैं । किन्तु यदि ज्ञान की अधिकता से ग्रथवा कर्म के भोग से कर्म सर्वथा ही निर्मूल नष्ट हो जाय तो उसे छिन्न कहते हैं । इसी दशा में जीव ग्रात्मा को शेप कर्म बन्धनों से सर्वथा मुक्त होकर परमेश्वर वा ब्रह्मता हो जाती है इस प्रकार उपरोक्त पांचों क्लेशों की पाँच अवस्था में होती रहती हैं । इन्हीं क्लेशों से सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों का ग्रात्मा में अधिकार उत्पन्न होता है और उन्हीं गुणों के अधिकार से फिर उसमें कारण कार्य का सिलसिला जारी हो जाता है । कर्म से उत्पन्न कुछ ग्रदृष्ट अतिशय, आत्मा में संयुक्त हो जाते हैं । उन ग्रतिशयों के द्वारा फिर कर्म उत्पन्न होता है और कर्मों से फिर दूसरे क्लेशों का सिलसिला जारी हो जाता है, इस प्रकार एक कर्म से दूसरे कर्म का अथवा प्रथम क्लेश से उत्तर क्लेश के उत्पत्ति विनाशक क्रम का चक्र अनादि काल से इस जीव ग्रात्मा में जारी हुम्रा दीखता है | यह सव से प्रथम चक्र कब प्रारम्भ हुग्रा यह कहना तो संभव है । किन्तु जीव ग्रात्मा में क्लेश पर क्लेश के सिलसिले का चक्र अवश्य देखते में प्राता है । वह चक्र जिस क्रम से बदलता है वह यहां ऊपर दिखलाया गया है । क्लश विशेध के द्वारा ही कर्म का ग्राशय उत्पन्न होता है और क्लेश विशेष से ही कर्म का विपाक भी उत्पन्न होता है । कर्म का विपाक तीन प्रकार है— १ किसी जाति विशेष में जन्म लेना, २ जन्म लेकर नियत समय तक ठहरना जिसे ग्रायु कहते हैं औौर ३ जब तक ग्रायु रहे तब तक सुख या दुःख का भोगना ग्रर्थात् जन्म, मृत्यु और इन दोनों के बीच का जीवन थे तीनों ही कर्म के विपाक कहलाते हैं । इस प्रकार जाति, ग्रायु और भोग इन तीनों के अतिरिक्त और कोई भी कर्म का विपाक नहीं हैं । किन्तु जिस प्रकार तुप निकालने पर धान के बोन से अंकुर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार कर्मों की भी ज्ञान के द्वारा शक्ति नष्ट कर देने पर वह कर्म फिर अपने तीनों विपाकों को उत्पन्न नहीं करता । जिस प्रकार धान के उगने के लिये तुप ( भूस ) सहकारी होता है उसी प्रकार कर्म से कर्मविपाक कहाने के लिये ये कर्मों के ऊपर क्लेश का ग्रावरण भी ग्रावश्यक हैं | ग्रज्ञानी लोगों के स्वभाव से ही कर्मों पर क्लेश का आवरण उत्पन्न विनष्ट होता रहता है इसलिये उनकी मुक्ति कदापि नहीं होती । जाति, श्रायु, भोग, ये तीनों ही सिलसिलेवार एक के पीछे दूसरे उन में उत्पन्न होते रहते हैं किन्तु ग्रात्मा के ज्ञान होने पर यह क्लेश का ग्रावरण कर्मों पर से निकल जाता है इसलिये ज्ञान के साथ कर्मों के रहने पर भी विपाक उत्पन्न करने की शक्ति जाती रहती है इसलिये श्रात्मा जाति, आयु, भोग से छुटकारा पाकर बन्धन मुक्त हो जाता है । ये पाँचों क्लेश कर्माशय और विपाक आशय ये सब अविद्या के द्वारा ही जीव सम्बन्धी मन पर किसी कारण से उत्पन्न हो गये हैं, इन की स्थिति प्रविद्या के रहने तक अवश्य रहती है किन्तु इस ग्रविद्या का विद्या से नाश होना प्रत्यक्ष दीखता है । इससे संभव है कि यदि विद्या का वल किसी प्रकार बढ़ाया जाय तो उस से अविद्या का पूर्ण नाश होने पर जीव का जीवपना सर्वथा मिट जावे और वह विद्या के प्रभाव से ईश्वर हो जावे | [ २२२ ]

पृष्ठ 255

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* ब्रह्मविज्ञान क्लेश कर्म विपाकाशयै रपरा मृष्टः पुरुष विशेष ईश्वरः ॥ ( पातञ्जल योगसूत्र ) । जो कुछ हम देखते हैं उसमें पृथक् पृथक् तीन भाव किये जा सकते हैं । द्रष्टा, दृष्य और दृष्टि, इनमें द्रष्टा सदा एक रूप ही रहता है किन्तु दृश्य नाना प्रकार के बदलते रहते हैं और दृश्यों के भेद से उनकी दृष्टियां भी भिन्न भिन्न कही जाती हैं यहां प्रश्न यह उठता है कि इन दृष्टियों में जो भिन्न - भिन्न दृश्य ग्रन्तर्गत होते हैं वे कहां से आ जाते हैं? उत्तर इस प्रश्न का यह है कि कोई वस्तु वास्तव में दृश्य नहीं है | किन्तु वस्तु का रूप ही दृष्टि से गृहित होकर होकर हमारी आत्मा में आता है और उन रूपों ही के भेद से भिन्न भिन्न वस्तुत्रों की हम कल्पना कर लेते हैं । उन वस्तुओं के बाहर रहने पर भी हमारी श्रात्मा में केवल उनके रूप ही प्रवेश करते हैं किन्तु उन रूपों का अधिष्ठान वस्तु जहां की तहां बाहर ही ज्यों की त्यों ठहरी रहती है परन्तु उन वस्तुओं में ये रूप प्रायः बदलते रहते हैं जो काष्ठ पहले पीला रहता है जलाने पर वही काला कोयला हो जाता और अधिक जलाने पर सफेद भस्मी हो जाती है । यह काला रूप उसमें कहां से आया और सफेद होने पर कहां चला गया यही प्रश्न है तो इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि यह कहीं से नहीं आते और न कहीं जाते हैं केवल यह आत्मा ही नाना विचित्र रूपों में वदलता रहता है । यदि मान लिया जाय कि हमारे ज्ञान के बाहर भिन्न - भिन्न वस्तु एक ही पर विद्यमान हैं । उन पर ही हमारी दृष्टि अाक्रमण करती है । जव वे वस्तुएं हमारी दृष्टि की सीमा में श्री जाती हैं तो भी कहना होगा कि उन से दृष्टि के द्वारा संबन्ध होने पर द्रष्टा अर्थात् हमारी आत्मा ही उनके रूपों में परिवर्तित होकर भिन्न प्रकार का ज्ञान उत्पन्न करती है । इस प्रकार द्रष्टा का दृश्य बन जाना और इस प्रकार एक द्रष्टा का भिन्न भिन्न अनेक दृश्य हो जाना और दृष्टि में द्रष्टा और दृश्य का विपर्यय होना यही एक प्रकार का ग्रात्मा में बन्ध कहा जा सकता है, क्योंकि यद्यपि विचार करने से हम दृढ़ विश्वास करते हैं कि वहां द्रष्टा ही दृश्य हो गया है, द्रष्टा के अतिरिक्त कोई भी वस्तु हमारी श्रात्मा में प्रविष्ट नहीं हुई है तथापि ग्राश्वर्यं से कहना पड़ता है कि हमारी व्यवहार बुद्धि जोर देकर हमें कह रही है कि द्रष्टा से दृश्य भिन्न है । अर्थात् भिन्न भिन्न वस्तुओं को हम देख रहे हैं और इस देखने में द्रष्टा, दृश्य और दृष्टि ये इन तीनों की त्रिपुटी इस प्रकार प्रतीत होती है कि जिससे इन तीनों की भिन्नता में कुछ भी संशय नहीं रहता । बस इस स्थान में जो इन तीनों की एकता प्रतीत कराने वाली शक्ति है वही मेरी आत्मा में विद्या का भाग है और जिससे कि ये तीनों भिन्न भिन्न प्रतीत होते हैं वही मेरी आत्मा में विद्या का भाग है । विद्या और ग्रविद्या दोनों ही मेरी आत्मा में रहने के कारण हम व्यवहार दृष्टि से प्रत्येक ज्ञान में तीन भाग देखते हैं और उन्हीं में विचार दृष्टि से एकता को भी देखते हैं | वास्तव रूप में एकता ही के रहने पर भी जो तीन का भेद ज्ञान में आता है यही अविद्या का वास्त विक रूप है और यही अविद्या हमारी आत्मा का बन्धन है जिसके द्वारा एक ही हमारी आत्मा अनेक रूपों से बँधकर भिन्नता को धारण कर लेती है तथापि जगत् से बाहर की वस्तु चीज होकर वह आत्मा जगत् के रूप में श्रा जाता है । अर्थात् द्रष्टा होकर दृश्य के रूप में प्रा जाता है और दृश्य को ही जगत् कहते हैं इसलिये द्रष्टा होने के कारण जो जगत् न था सो दृश्य के रूप में होने के कारण जगत् कहलाता है । [ २२३ ]

पृष्ठ 256

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ॐ ब्रह्मविज्ञान अथवा सिद्धान्त रूप से हम यहां दूसरा मत दिखायेंगे । ज्ञान से बाहर किसी वस्तु की भी सत्ता है जिस का ज्ञान होता है इस प्रकार ज्ञान से भिन्न ज्ञेय की सत्ता मानने की आवश्यकता नहीं क्योंकि कोई केवल ज्ञान ही कहा जा सकता है । अर्थात् जब कुछ दीख आता है दीखता है तो न होना मानते हैं, तब किसी की सत्ता ज्ञान के ही हम कह सकते हैं कि कोई वस्तु है यह भी मेरा ज्ञान है और वस्तु तात्पर्य यह है कि हम अपने ज्ञान ही से सारे जगत् का होना है, क्योंकि हम किसी वस्तु के होने प्रमाण में पेश करके उस वस्तु भी वस्तु है या नहीं है इसका साक्षी तब हम वस्तु का होना मानते हैं, नहीं अधीन कहनी पड़ेगी तो ऐसी दशा में नहीं है यह भी मेरा ज्ञान ही है । समझ रहे हैं प्रौर जो किसी के ज्ञान में नहीं ग्राया वह वस्तु ही नहीं में प्रमाण लेते हैं तो वह प्रमाण ग्रपने या और किसी के ज्ञान ही को सत्ता सिद्ध करते हैं तो इससे यह सिद्ध हुआ कि जिसका ज्ञान नहीं उसकी सत्ता भी नहीं इस प्रकार जब कि वस्तु की सत्ता ज्ञान के ही अधीन है और ज्ञान में ही प्राप्त होती है तो पानी के बुलबुले के समान ज्ञान की भीतर वाली सत्ता को भी क्यों न ज्ञान ही माना जाय । इस पर यदि कोई प्रश्न करे कि यदि वस्तु न होती तो ज्ञान में ज्ञान से भिन्न भिन्न दो वस्तुनों को एक ही ज्ञान कैसे दिखा सकता? क्योंकि जव ज्ञान एक रूप है और ज्ञान के अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है तो भिन्न भिन्न प्रकार के दृश्य न दीखकर सर्वदा एक ही प्रकार का ज्ञान बना रहता तो इस प्रश्न के उत्तर में हम स्वप्न का दृष्टान्त देंगे । यह सबको विश्वास है कि स्वप्न में सिवाय मेरी ग्रात्मा के जो कुछ दीखता है वे सब कुछ भी नहीं रहते केवल हमारी ही ग्रात्मा जो ज्ञानरूप है वही सब दृश्यों के रूप में परिवर्तित होकर आप ही अपने को नाना वैचित्र्य में दीखता है तो इस से सिद्ध हुग्रा कि नाना दृश्य के रूप में ग्राने की शक्ति इस द्रष्टा में है तो इसी शक्ति के वल से जाग्रंतु में भी कहा जा सकता है कि जो कुछ द्रष्टा से भिन्न नाना दृश्य दिखाई दे रहे हैं ये सब भी द्रष्टा की ही करामात है । अर्थात् हमसे बाहर अनन्तानन्त पदार्थों का जो हमें ज्ञान हो रहा है ये ज्ञानपुञ्ज ही मेरी ग्रात्मा है वही मैं हूं और मुझ से अतिरिक्त कोई भी वस्तु कहीं भी कुछ नहीं है । यह मेरी विचार दृष्टि है और यही सत्य विद्या है किन्तु इतना होने पर भी जो मैं अपने से भिन्न अपने शरीर से बाहर नाना पदार्थों की सत्ता मान रहा हूँ यही प्रविद्या है अर्थात् विपर्यय है, भ्रम है, या मिथ्या ज्ञान है और इसी से आत्मा को क्लेश है, इसीलिये श्रविद्या को क्लेश कहते हैं । द्रष्टा, दृष्टि और दृश्य इन तीनों में केवल एक दृष्टि ही तत्त्व है इसलिये ग्रत ही कहा जा सकता है । यही दृष्टि पश्चात् द्रष्टा और दृश्य के भेद से दो खण्ड की हो जाती है । वह भाग जहाँ से दृष्टि प्रारम्भ होती है द्रष्टा कहलाता है किन्तु जो भाग बाहर के पदार्थ से ग्रनुरक्त होकर बाहर की चीज के रूप में श्रपना रूप पलटता है वही भाग दृश्य है । इस प्रकार द्रष्टा और दृश्य दोनों एक ही दृष्टि के दो खण्ड कहे जा सकते हैं । इन दोनों में भेद हम प्रत्यक्ष देखते हैं किन्तु जब ये दोनों ही एक दृष्टि ही के रूप हैं तो इनमें भेद कहाँ से कैसे प्रागया अर्थात् इनका भेदक कौन है यह स्पष्ट नहीं जाना जा सकता इसीलिये हमको अविद्या नाम से एक पदार्थ मानना पड़ता है और वही प्रविद्या ने एक दृष्टि के द्रष्टा और दृश्य का भेद उत्पन्न कर दिया है यह संभवतः कहा जा सकता है । यहाँ यदि कोई प्रश्न करे कि द्रष्टा और दृश्य ये दोनों स्वतः ही भिन्न भिन्न दो वस्तु है इनका वास्तविक द्वैत ही भेदक हो सकता है तो फिर विद्या क्यों मानी जाती है तो हम उत्तर में कहेंगे कि द्रष्टा और दृश्य ये दोनों भेद वास्तविक नहीं है क्योंकि [ २२४ ]

पृष्ठ 257

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * ग्रात्मा की जान, स्वप्न, सुषुप्ति, मोह मूर्छा, मुक्ति इन छ: अवस्थायों में सर्वत्र ही एक रूप से दृष्टि बनी रहती है किन्तु उनमें केवल जाग्रत अवस्था में ही दृश्य का भाग दृष्टि में अनुरक्त हो जाता है तब दृष्टि के शेष भाग को ब्रा कहने लग जाते हैं । इस प्रकार जागत में ही दो खण्ड संभव होते हैं किन्तु सुषुप्ति ग्रादि चार ग्रवस्थाओं में बाह्य वस्तु के संसर्ग न होने के कारण दृश्य का अनुराग दृष्टि में नहीं होता इसी कारण शेण भाग को द्रष्टा भी नहीं कह सकते । इस दशा में द्रष्टा और दृष्टि का भेद कहा नहीं जा सकता इसलिये उन चार अवस्थाओं में अद्भुत रूप से केवल एक दृष्टि ही रहती है । ग्रव जाग्रत को भी लीजिये जिस समय हम किसी वस्तु का अनुभव करते रहते हैं उसी दशा में द्रष्टा दृश्य का भेद रहता है किन्तु वह दृश्य जबकि हमारी दृष्टि - धरातल से अलग हो जाती है तो मानों इस जगत् से ही उसकी सत्ता जाती रहती है । फिर उसकी सत्ता के कहीं रहने में कोई भी प्रमाण शेष नहीं रह जाता इस प्रकार छः ग्रात्मा की अवस्थाओं में दृष्टि के बने रहने पर भी दृश्य का संबन्ध सर्वदा बना नहीं रहता इसी से कहा जा सकता है कि दृश्य वास्तव में मिथ्या है । स्वप्न के अनुसार जाग्रत में भी दृष्टि ने ही दृश्य की कल्पना कर ली है तो ऐसी स्थिति द्वैत का भेदक मानना यथार्थ नहीं है । अतएव एक ही दृष्टि के रहते द्रष्टा और दृश्य की भेद दिखाने वाली ग्रविद्या श्रवश्य ही माननी पड़ेगी । जिस प्रकार जवा के पुष्प के सन्निधान से स्फटिक में अनुराग होता है उसी प्रकार हमारी दृष्टि में ग्रविद्या के द्वारा बाह्य वस्तु के रूप का ग्रनुराग हो जाता है । अथवा जिनके मत में बाह्य वस्तु कुछ है ही नहीं उनके मन में इसी ग्रविद्या के द्वारा हमारी दृष्टि का एक भाग दृश्य के मिथ्या रूप में विवर्तित अर्थात् जिस प्रकार रस्सी सर्प के रूप में बदल जाता है किन्तु किसी सर्प का उसमें संबन्ध नहीं है उसी प्रकार हमारी दृष्टि दृश्य के रूप में बदल चाती है किन्तु किसी वाह्य दृश्य से उसका काई संबन्ध नहीं है । इस प्रकार विवर्त-वाद अथवा मतभेद से अनुरक्तवाद दोनों ही श्रविद्या के ही द्वारा होते हैं । इस प्रकार दृष्टि पर विषय का अनुराग तथा विवर्त इन दोनों ही को ज्ञान के असली स्वरूप का आवरण करने वाला एक भिन्न रूप समझना चाहिये । इसी ग्रावरण को अविद्या कहते हैं । और यह विद्या से विलक्षणरूप की होती है । क्योंकि विद्या सती अर्थात् नित्य एक रूप बनी रहती है । किन्तु अविद्या सती असती दोनों हैं प्राकृतिक नियमानुसार सर्वदा सामान्यरूप से श्रर्थात् किसी न किसी विशेष रूप से बनी ही रहती है इसलिये सती है | किन्तु यदि कोई ग्रात्मा किसी उपाय से विद्या का बल बढ़ाकर अविद्या का बल घटाना चाहे तो तो संभव है कि अनेक जन्म के प्रयत्न से यह अविद्या विशेष निर्मूल नष्ट हो जाये इस प्रकार नष्ट होने से वह असती भी कही जाती है । ऐसी दशा में वह अविद्या अनादि सान्त है । दृष्टि और दृश्य अनुराग मतानुसार इन दोनों का जो तादात्म्य योग है उसका कारण दृष्टि में ठहरी हुई अविद्या है किन्तु ज्ञान के द्वारा यदि ग्रविद्या का क्षय अर्थात् नाश कर दिया जाय तो ऐसी स्थिति में बाह्य वस्तु का विद्या अर्थात् ज्ञान पर पूर्ण राम्वन्ध होने पर भी ज्ञान के प्रसङ्ग निर्दोष होने के कारण उस वस्तु का संस्कार कुछ नहीं होता प्रत्युत दृष्टि राव वस्तुओं को ग्रहण करती हुई भी न ग्रहण करने के बराबर केवल शुद्ध रूप से बनी रहती है । १ - ऐसी दशा को विदेहमुक्ति अर्थात् जीवनमुक्ति कहते हैं । [ २२५ ]

पृष्ठ 258

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* ब्रह्मविज्ञान २ - यह अविद्या आठ प्रकार की समभी जा सकती है । प्रथम वाङ्मय वल ग्रर्थात् वाक् और प्राण दोनों के घनिष्ट सम्बन्ध से जो प्रारण का स्वरूप सिद्ध होता है वही अविद्या है, किन्तु दूसरी अविद्या वह है जिसने इस वाक् को प्राण के साथ मिलाकर इस प्रकार की ग्रविद्या का स्वरूप संपादन किया अर्थात् वल और वाक् को मिलाने वाला बल भी विद्या है । इसी प्रकार द्रष्टा, दृष्टि और दृश्य इस त्रिपुटी में द्रष्टा अर्थात् ज्ञान के ऊपर जो दृश्य का ग्रर्थात् ज्ञेय का रूप प्रतिविम्ब होता है, अर्थात् ज्ञान से बाहर घटादि पदार्थों का जो ज्ञान के ग्रन्दर छाया पड़ती है और जिस छाया से ज्ञान का असली रूप न दीलकर ज्ञेय का रूप ही प्रत्येक्ष होता है वही शेय रूपी छाया, ज्ञान से शिन्नवस्तु होने के कारण अविद्या कहलाती है, यही तीसरी अविद्या है । किन्तु साथ ही जिस बल ने बाहर के वस्तु की छाया को ज्ञान के भीतर प्रवेश कराया और ज्ञान से बांधकर ज्ञान में ही ठहरा दिया और बाहर की वस्तु से उसका सम्बन्ध तोड़ दिया वह बल भी विद्या अर्थात् ज्ञान से भिन्न वस्तु है इसलिये यह भी चौथी विद्या है । इसी स्थल में दूसरा मत है कि ज्ञान से रिक्त बाह्य वस्तु की कोई सत्ता ही नहीं है, इसलिये ज्ञान से बाहर के वस्तु की छाया का ज्ञान पर पड़ना सत्य नहीं माना जा सकता, किन्तु वास्तव में हमारा ज्ञान ही भिन्न - भिन्न ज्ञेय के रूपों में विवर्त ( बदल ) किया करता है तो इस मत में भी कहना होगा कि ज्ञान जिन - जिन रूपों में बदल कर ज्ञेय वन गया है वह ज्ञेय का भाग अविद्या है । क्योंकि एक प्रकार के ज्ञान में भिन्न - भिन्न लाखों प्रकार का ज्ञेय बदल ने पर भी वे सब रूप न ठहर कर बदलते रहते हैं इसलिये ग्रविद्या कहने योग्य है । सत्य ज्ञान के भाग में इस प्रकार बदलता हुआ वह जितना मिथ्या भाग वही विद्या है । इसको पांचवी अथवा मत भेद से तीसरी ग्रविद्या कही जा सकती है । इस मत में भी जिस बल के संयोग से ( ४ ) यह सत्य ज्ञान मिया रूप अज्ञान में बदल दिया जाता है वह ज्ञान पर लगा हुग्रा बल भी छठे, मत भेद से चौथी श्रविद्या कही जा सकती है | इनके अतिरिक्त इस ग्रविद्या को सांख्य वालों ने तम, मोह, महामोह तामिस्र, ग्रन्वता - मित्र इस प्रकार पञ्चपर्वा माना है अर्थात् इन पांचों को एक साथ अविद्या कहते हैं ( ५ ) इसी पञ्च पर्वा अविद्या को योग शास्त्रकार पतञ्जलि ने क्रम से अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश इन पाँचों क्लेशों को अविद्या नाम दिया है यह सातवीं अविद्या कही जा सकती है अब इस सातवीं अविद्या में ही पाँच क्लेशों में से पहला क्लेश मुख्य करके अविद्या शब्द से ही कहा गया है । यही अविद्या अन्य चार क्लेशों का भी कारण है और यह तमरूप अर्थात् प्रकाश स्वरूप ज्ञान का या विद्या का विरोधी है इसलिये अविद्या कही जाती है, यह विद्या याठवीं है । इस प्रकार अविद्या का स्वरूप निरूपण ग्राठ होने पर भी यथार्थ में एकही स्वरूप का है क्योंकि मन के प्रकाश को ही विद्या कहते हैं । ग्रव जिन प्रकार - जिन से कारणों से मन के प्रकाश को हानि पहुँच या कभी - कभी दो ग्रावरण हो वह सब विद्या, विद्या के विरोधी होने के कारण एक शब्द से ही विद्या कही जा सकती 1 विद्या भङ्गः सिद्धिः सम्पूर्ण विश्वमण्डल का उद्गीथ ग्रर्थात् जहां से उठता है जिसमें ठहरा रहता है और जिसमें लीन होता है वह मूलतत्त्व अव्याकृत को समझना चाहिये । इस अव्याकृत में तीन प्रकार की प्रतिष्ठा उद्भूत होती हैं जिनको अक्षर कहते हैं । इन्हीं तीनों के ठहरने की जगह को पृथक् - पृथक् जीव, ईश्वर, परमेश्वर [ २२६ ।

पृष्ठ 259

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ॐ ब्रह्मविज्ञान कहते हैं । इन्हीं तीनों प्रतिष्ठाओं पर यह सम्पूर्ण विश्वमण्डल प्रतिष्ठित ( ठहरा हुआ ) है इनमें जीव के अन्तर से ईश्वर की और ईश्वर के ग्रन्तर से परमेश्वर को जानने पर जीव परमेश्वर में लीन होकर मुक्त हो जाता है और फिर उसका जगत् नष्ट हो जाता है अर्थात् जीव का जगत् जीव में और ईश्वर का जगत् ईश्वर में लीन होता है, तथा जीव ईश्वर में और ईश्वर परमेश्वर में लीन होता है । इस प्रकार जगत् स्थिति नहीं रहती । जो हां कुछ देखते हैं ये सब व्यक्त है, इसमें सब मत्यं है, इसलिये इसको क्षर कहते हैं । इन सब क्षरों में अव्यक्तरूप से अक्षर निगुड़ रहता है, उसको प्रमृत कहते हैं । ये क्षर अक्षर दोनों सर्वदा युक्त ही रहते हैं, इन दोनों के योग से ईश्वर का स्वरूप उत्पन्न होता है । ईश्वर शब्द का अर्थ सर्व-शक्तिवन ह वो सब शक्तियों के प्रभाव से स्वतन्त होकर यथेच्छ सृष्टि के पदार्थों पर समर्थ होता है किन्तु यह जीव ईश्वर के समान स्वतन्त्र नहीं है । प्रविद्या के कारण कर्म जन्य संस्कारों से रङ्ग जाया करता है । ईश्वर के रायश प्रकाश स्वरूप होने पर भी इन कर्म जन्म संस्कारों से रङ्ग जाने के कारण वह कलुषित होकर असमर्थ हो जाता है इसलिये ईश्वर नहीं ला सकता । किन्तु शुभ कर्म अर्थात् विद्या प्रधान होने के कारण निवृत्ति मार्गी कर्मो के गंवोग में को संस्कार उत्पन्न होता है वह कतकरन ( निर्मली ) के अनुसार स्वभाव से ही कर्मजन्य सरकारों को दूर कर देता है जिससे मैल छँटकर स्वाभाविक निज के प्रकाश से ही वह जीव आत्मा प्रकाशित हो जाता है और इस प्रकार अविद्या के नाश होने से जीव ईश्वर का भेद भी जाता रहता है अर्थात् वह जीन साक्षात् ईश्वर हो जाता है इसी अवस्था को मुक्ति कहते हैं । ईश्वर विद्यामय होने के कारण सर्वज्ञ है, किन्तु जीव ग्रविद्यामय होने के कारण अल्पज्ञ है | जीव को पशु और ईश्वर को पशुपति और ईश्वर से जीव का भेद कराने वाली अविद्या को पाश कहते हैं । जीव और ईश्वर ये दोनों ही यद्यपि अज हैं और दोनों ही एक जाति के तत्त्व से बने हैं किन्तु जिस विद्या और विद्या से इन दोनों का भेद संभव है वे दोनों ही माया कही जाती है । और यह माया भी एक दूसरी अजा है और यह नित्य जीव ईश्वर के साथ रहती है । अथवा दूसरा मत यह है कि विद्या और अविद्या इन दोनों में से विद्या आत्मा से पृथक कोई वस्तु नहीं है विद्या ही को श्रात्मा या ईश्वर कहते हैं । उस ईश्वर को विद्यायुक्त न समझ कर विद्या रूप ही से समझना चाहिये | किन्तु यह अविद्या अवश्य ही आत्मा से पृथक् वस्तु है । और वह आत्मा में अपने आप ही उत्पन्न होकर ग्रात्मा के स्वरूप को अर्थात् विद्या को कलुषित करती हैं और वह ग्रात्मा से हटाई जा सकती है । ज्ञान के पेट में ज्ञेय का प्रवेश होना ही भोग कहलाता है । इस से भोग्य की भोक्ता के साथ एकता उत्पन्न हो जाती है । इसमें विद्या ही भोक्त्री है । वह भोग्य अर्थात् विद्या के साथ युक्त होती है उसके योगदान होने में जो बल लगता है जो कि अविद्या का विद्या के साथ योग करता है वह बल भी श्रविद्या ही है । ईश्वर के अनुसार जीव भी विद्या रूप ही है । उसके गुणों से जीव पराधीन हो जाता है । जीव में संयुक्त जो अविद्या है उसका जीव के साथ योग कराने वाला बल भी ग्रविद्या ही है | वह जब तक जीव में रहता है तभी तक जीव, जीव कहलाता है । जिस प्रकार रज्जू सर्प के रूप में भासती है उसी प्रकार ज्ञान ज्ञेय से अपना रूप बनाकर भासता है वही अध्यास है और वही प्रविद्या है उसमें ज्ञान प्रर्थात् भासना ही सच्ची वस्तु है । किन्तु उस ज्ञानने जिस ज्ञेय से अपना रूप बना लिया है वह ज्ञय रज्जु के सर्प के समान मिथ्या है । शेय जो ज्ञान में भासता है वह वाक् है और एक [ २२७ ]

पृष्ठ 260

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* ब्रह्मविज्ञान प्रकार का वल है, वह वाक् रूपी बल, सीमा रहित सदा एक रूप रहनेवाले ज्ञान में प्रवेश करके अपने सीमावद्ध विचित्र रूपों से उसे में भी परिच्छिन्नता और नानात्व उत्पन्न करदेता है । वल ग्रादि ग्रविद्या अर्थात् ज्ञान से भिन्न पदार्थों से जो यह विद्या ग्रर्थात् ज्ञान एकता को पा जाता उस एकता को देने वाला बल भी ग्रविद्या ही है उस वल को प्रारण विशेष कह सकते हैं । यह प्राण अर्थात् वल जीव में हीं उत्पन्न होता है, ईश्वर में कदापि नहीं होता क्योंकि ईश्वर में माया का भाग विद्या ही है और माया का दूसरा भाग ग्रविद्या जीव का ही लक्षण है । यह ज्ञान ज्ञेय रूपी वल को पाकर इस प्रकार एक रूप हो जाता है कि जिस से वास्तव में अविद्या में सत्ता न रहने पर भी वह सत्तावाली हो जाती है । यही कारण है कि ऋषि लोग इसी विद्या को सती और ग्रसती दोनों दृष्टि से देखते हैं । असती इसलिये कि अविद्या में निज की सत्ता सर्वथा ही नहीं है, किन्तु वह अविद्या ज्ञेय के रूप में होकर ज्ञान के साथ जो ग्रभिन्न हो गई है दोनों भिन्न - भिन्न प्रतीत न होकर प्रभिन्न प्रतीत होते हैं इसीलिये ज्ञान की सत्ता ही ज्ञेय की सत्ता होजाती है, जिस से ज्ञेय ही सत्य प्रतीत होता हैं । किन्तु वास्तव में ज्ञेय सत्य नहीं है क्योंकि जिस समय घट का ज्ञान था उस समय घट ज्ञान में प्रत्यक्ष भासता हुग्रा सत्य ही प्रतीत होता है किन्तु जव घट के ज्ञान के उत्तरकाल में पट का ज्ञान हुआ तो उस समय पहला विषय घट, ज्ञान के धरातल से उतरकर सर्वथा नास्ति हो जाता है उसकी सत्ता त्रिलोकी भर में कहीं नहीं रहती । विचार का स्थान है कि यदि वह ज्ञेय वास्तत्र में सत्य होता तो अपनी सत्यता के लिये ज्ञान के प्रायतन की अपेक्षा न रखता, ज्ञान का संसर्ग छूटने पर भी उसकी सत्ता अवश्य कहीं रहती । जो दूसरे की सत्ता लेकर सत्ता वाली वस्तु है वह अवश्य ही ग्रवस्तु अर्थात् ग्रसती है । इस ही कारण ज्ञेय मात्र को असत्य कह सकते हैं । और ज्ञेय ही यह जगत् है इसलिये जगत् भी ग्रविद्या हैं सती अर्थात् मिथ्या है यद्यपि श्रविद्या जीव में ही होती है, ईश्वर में नहीं होती ऐसा कहा गया है तथापि वाक् या वल ये दोनों ही ईश्वर में भी अवश्य पाये जाते हैं । क्योकि अर्थ और क्रिया इन दोनों से ईश्वर कदापि खाली नहीं रहता और ये वाक् और विद्या से भिन्न होने के कारण श्रविद्या कहे जा सकते हैं । इसलिये अविद्या ईश्वर में भी अवश्य मानी जा सकती है किन्तु यह विद्या जिस प्रकार जीव के स्वातन्त्र्य को नष्ट कर देती हैं उसी प्रकार ईश्वर के स्वातन्त्र्य पर कुछ भी बाधा नहीं डालती इसी से ग्रविद्या के रहने पर भी अविद्या के बन्धन न रहने के कारण ईश्वर में ग्रविद्या का न होना ही माना जाता है । अब हम परमेश्वर को यदि देखें तो वह ग्रनन्त ग्रात्मा विश्वरूप है । न वह ज्ञान स्वरूप है न ग्रज्ञान स्वरूप है ग्रर्थात् विद्या और ग्रविद्या दोनों ही उसमें नहीं हैं | न वह जीव के अनुसार भोक्ता और न ईश्वर के अनुसार कर्ता है । ये तीनों अर्थात् परमेश्वर, ईश्वर और जीव की जो समष्टि है वह तीनों से भिन्न होने के कारण चौवा तुरीव ब्रह्म कहा जा सकता है । बाहर क्षर और उसके भीतर अक्षर इन दोनों पर व्यास होकर इन दोनों के प्रतिरिक्त तीसरा ईश्वर इन दोनों का शासन करता रहता है । यदि जीव ग्रर्थात् क्षर संयुक्त ग्रक्षर ध्यान ते, योग वल से, ईश्वर के साथ मिल जाये तो अविद्याके क्षर होने से वह जीव भी ईश्वर ही हो जाता है क्योंकि ध्यान और योग से जीव का ज्ञान ईश्वर के रूपमें अधिक काल रहता है और ईश्वर में ग्रविद्या का अङ्ग नहीं इसलिये ध्यान योग में जीव ज्ञान धीरे - धीरे अपनी ग्रविद्या को छोड़ता रहता है । ग्रन्त में सर्वथा अविद्या ही न होकर ईश्वर रूप हो जाता है । ग्रथवा यों समझो कि यदि जीव का मन ईश्वर में लगता है तो [ २२८ ]