ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 261–270
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 261–270
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' ' ब्रह्मविज्ञान उस समय ज्ञान का ज्ञेय के रूप में वदलने के नियमानुसार जीव का ज्ञान ईश्वर रूपी ज्ञेय में बदल कर कुछकाल के लिये ईश्वरमय बन जाता है । ईश्वर के स्वभाव में कोई भी पाश नहीं रहते इसी कारण ईश्वर का ज्ञान होते समय जीव के मन में भी सब प्रकार के पाश अर्थात् क्लेश, कर्म विकाप आदि अविद्या के लक्षण नहीं रहने पाते । इसी से जीव ईश्वर के रूप में आ जाता है और इसी को सगुणमुक्ति कहते हैं । इसी को निर्विकल्पक, समाधि, योग कहते हैं । अर्थात् इस समाधि में जीव जो ज्ञाता है वह ज्ञेय अर्थात् ईश्वर को अपने से पृथक् नहीं समझता । ज्ञाता ज्ञेय का द्वैतभाव सर्वथा ही नहीं रहता किन्तु वह सविकल्पक समाधियोग है । जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैतभाव बना रहता है अर्थात् हम किसी वस्तु को देख रहें हैं, इस प्रकार जीव को ज्ञाता, ज्ञेय का भेद ज्ञान भी वना रहता है इसलिये इस योग को सविकल्पक ( विकल्प - खण्ड ) कहेंगे । इस समाधियोग में भी जीव यदि ईश्वर का ज्ञान करें तो उस से भी क्लेश नष्ट हो जाते हैं । और उस जीव के जन्म मृत्यु नहीं होते किन्तु यह ग्रवर मुक्ति है । अब मान लीजिये कि निर्विकल्पक वा सविकल्पक दोनों प्रकार की समाधि नहीं हुई किन्तु केवल ध्यान मात्र से जीव दिव्य देह की प्राप्ति करके ऐसा ऐश्वर्य पाता है कि मानों ईश्वर की ओर उन्मुख हुत्रा । जीव की श्रात्मा का ईश्वर की आत्मा के साथ समाधियोग न होने पर भी दोनों का ग्राभिमुख्य हो जाय तो उस समय भी जीव में ईश्वर की झलक या छाया पड़ने से जीव में वह शक्ति उत्पन्न हो जती है; जिस से संकल्प मात्र के द्वारा जीव सव कामनाओं को प्राप्त कर लेता । ये भी संप्रदायों की मुक्ति है । इस मुक्ति में जीव कदापि ईश्वर नहीं होता किन्तु ईश्वर से पृथक् रह कर ही ईश्वर के अनुग्रह से ईश्वर के समान ऐश्वर्य पाता है और ईश्वर को अपना स्वामी समझता है । = जो जहां कुछ मैं देख रहा हूँ ये सब ज्ञेय हैं । ये समस्त ज्ञेय मेरी आत्मा में ठहरा हुआ है और मेरी आत्मा ज्ञान रूप है अर्थात् जिस ज्ञान में ये समस्त ज्ञेय अन्तर्गत होकर भासता है वही ज्ञान मेरी ग्रात्मा है पूर्वोक्त के अनुसार ज्ञान ही ज्ञेय रूप में परिणित होता है इस कारण ये समस्त ज्ञेय मेरी आत्मा का ही रूपान्तर है । ज्ञेय को ही जगत् कहते हैं । इसलिये अन्तर्जगत् जीव ग्रात्मा से भिन्न नहीं है । वह जीव ईश्वर का ज्ञेय रूप है इसीलिए जीव, ईश्वर का जगत् है उक्त नियमानुसार जीव भी ईश्वर से भिन्न नहीं हैं इस प्रकार जगत्, जीव और ईश्वर ये तीनों मिलकर त्रिवृत रूप ज्ञान ही एक ब्रह्म है कि जिस प्रकार तिल में तेल और दूध में घी व्याप्त रहता है । उसी प्रकार इस जगत् के प्रत्येक पदार्थ में गुप्त होकर व्याप्त इस जीव श्रात्मा को जानना चाहिए और उसी प्रकार जीवों में छिपा हुआ व्याप्त उस ईश्वर को समझना चाहिये । यद्यपि जीव को प्रत्येक पदार्थ में हम विद्या के द्वारा जान सकते हैं, किन्तु जीवों में यह ईश्वर, विद्या, सत्य और तप के द्वारा देखा जा सकता है । चाहे जीव हो या ईश्वर हां ग्रथवा परमेश्वर ही ये तीनों ही ज्ञान के ही नाम हैं । परमेश्वर पर प्रधान है, ईश्वर ग्रक्षर प्रधान है और जीव क्षर प्रधान है । ज्ञान तीन प्रकार का है । इनमें वे तीनों ही प्रत्येक क्षर और ग्रक्षर इस प्रकार दो - दो धर्मों से बने हुए हैं । अर्थात् प्रत्येक स्वरूप में बाह्य भाग क्षर है और उसके अन्तर्गत भाग ग्रक्षर है ये दोनों ही एक के बिना एक नहीं रह सकता इसी प्रकार क्षर, अक्षर से बने हुए जीव और ईश्वर तथा परमेश्वर ये तीनों मिलकर एक ब्रह्म का समृद्धरूप कहा जाता है । किन्तु [ २२६ ]
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* ब्रहाविज्ञान ब्रह्म का वह रूप जिसमें जीव, ईश्वर, परमेश्वर का भेद पृथक् - पृथक् उद्घट रूप से प्रतीत नहीं होता किन्तु उन्मुग्ध रूप से एक ग्रव्यक्त भाव माना जाता है वह सर्वथा शान्त स्वरूप है । ये सब विषय जो कुछ कहीं हम देखते हैं उसी को हम ज्ञान कहते हैं । यह दीखना दो प्रकार से हो सकता है । १ ग्रप्राप्य-कारी इन्द्रियों से, २ प्राप्यकारी इन्द्रियों से । जब कि ये माना जाय कि इन्द्रियां ग्रीर वस्तुएं आपस में मिलते नहीं केवल उन दोनों के बीच में पर्दा आकर दोनों आमने - सामने रहे तो वस्तु दीख आता है । यह इन्द्रिय और वस्तु का स्वभाव है इसी को अप्राप्यकारी कहते हैं । किन्तु यदि यह माना जाय कि और इन्द्रियों में तो वस्तु के भाग ही इन्द्रियों के पास श्राते हैं, किन्तु ग्राँख में उलटा है, ग्राँख ही वस्तु के पास जाकर वस्तु को देखता है । यदि ऐसा न होता तो काच में मुँह न दीखता क्योंकि काव में मुँह नहीं है केवल हमारी ग्रॉस काच पर जाकर उलट जाती है और उलटकर काच पर रहकर मेरे मुँह को देखता है | वह मुँह यद्यपि श्रादमी के बड़ पर है, काच पर बिलकुल नहीं है किन्तु ग्राँख काच पर है । इसलिए ग्रपनी जगह मुँह को देखता है यह इन्द्रिय की विपय देशगामिता है । दूसरा मत यह हैं कि जैसे अन्य २ इन्द्रियाँ विषय देश में नहीं जाते उसी प्रकार ग्राँख भी विषय देश में नहीं जाती विषयों से मिलकर आते हुए सूर्य किरणों के साथ वस्तु का रूप ग्रांख पर पहुंचता है तब ही ज्ञान होता है, यही इन्द्रियों की वास्तविक प्राप्यकारिता है । ( अर्थात् व्याप्त करने वाली ) यह तीन सूरतें ज्ञान की उत्पत्ति के लिये हो सकती है | इन तीनों सूरतों में ज्ञान उत्पन्न होने के लिए बाहर किसी वस्तु का होना बहुत ही ग्रावश्यक है । यदि बाहर कोई वस्तु वास्तव में न मानी जाय तो न ये तीनों सूरतें हो सकती हैं, न ज्ञान ही हो सकता है, इससे सिद्ध हुआ कि बाहर वस्तु की सत्ता रहने से ही ज्ञान उत्पन्न होता है वस्तु सत्ता न रहने से ज्ञान भी न होता तो जब ज्ञान के लिये वस्तु सत्ता का होना मूल कारण है तो यह ज्ञान उस वस्तु सत्ता का प्रमाण अवश्य हो सकता है । अर्थात् उस वस्तु के ज्ञान होने से उस वस्तु की बाहर सत्ता हम अनुमान कर सकते हैं इसलिये सिद्धांत के अनुसार जब हमको जगत् की सब वस्तुओं का ज्ञान होता है तो उसी से उन सब वस्तुयों की सत्ता को भी निश्चित या सिद्धांत रूप से कह सकते हैं । उपरोक्त नियम के अनुसार समस्त दार्शनिकों का यह सिद्धांत है कि जगत् में जिन - जिन पदार्थों का सत्र को ज्ञान हो रहा है उन पदार्थों की सत्ता ज्ञान के बाहर भी वास्तविक रूप में कहीं पर है | किन्तु इस पर वेदान्त के अनुसार यह तर्क ( अर्थात् विवाद करने के लिए ) किया जाता है कि ज्ञान से सत्ताका अनुमान करना असङ्गत | क्योंकि व्याप्ति रहने से अनुमान होता है । जैसे धूम से अग्नि का अनुमान हो जाता है । क्योंकि जहां - जहां घूम है तहाँ तहाँ सभी जगह ग्रग्नि है । यह ग्रन्वयव्याप्ति है और जहाँ अग्नि नहीं है तहाँ घूम भी नहीं है, यह व्यतिरेक व्याप्ति भी है । इस प्रकार दोनों व्याप्ति रहने से ही व्यापक का व्याप्य से अनुमान हो सकता है । इसी नियम के अनुसार यहाँ भी जहाँ - जहाँ ज्ञान है तहाँ - तहाँ सभी जगह् वस्तु रहती है श्रीर जहाँ वस्तु सत्ता नहीं है तहाँ ज्ञान भी नहीं है । इस प्रकार दोनों व्याप्ति रहने से ही वस्तु ज्ञान से वस्तु सत्ता का अनुमान हो सकता है ग्रन्यथा नहीं तो ऐसी स्थिति में ज्ञान से सत्ता का अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि व्याप्ति में व्यभिचार है । जहाँ - जहाँ ज्ञान है तहाँ - तहाँ सभी जगह वस्तु सत्ता का प्रभाव होना नहीं पाया जाता । [ २३० ]
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* ब्रह्मविज्ञान * भ्रम की जगह और स्वप्न - सृष्टि की जगह ज्ञान रहने पर भी वस्तु सत्ता नहीं है और वस्तु सत्ता न रहने पर भी ज्ञान है तो ऐसी दशा में जबकि विना सत्ता के भी ज्ञान होता है तो ऐसा ज्ञान वस्तु सत्ता का अनुमान अर्थात् ज्ञान के बाहर किसी वस्तु के होने का अनुमान नहीं कहा सकता । हारकर मुझको केवल अपने ज्ञान पर ही निर्भर करना पड़ेगा । यह सब जगत् के बल मेरे ज्ञान का ही बना हुआ है अथवा यों कहिये यह सब जगत् मेरा ज्ञान है ज्ञान के अतिरिक्त किसी वस्तु की सत्ता नहीं है । केवल मैं अपने ज्ञान की सत्ता को लेकर ही वस्तुओं की सत्ता बना रहा हूँ यही कारण है कि भ्रम की हालत से उलट कर जब मै सच्चे ज्ञान पर प्राता हूँ तो मैं अपने पहले ज्ञान के साथ - साथ उस ज्ञान के विषय को भी खारिज कर देता हूं तो ज्ञान के साथही उस वस्तु की सत्ता भी नष्ट होजाती है । इसलिये ज्ञान की सत्ता ही वस्तु की सत्ता है ज्ञान के बाहर पृथक् वस्तु सत्ता कुछ नहीं है, यह सिद्ध हो गया है । श्वेताश्वेतर ऋषि ने जैसा उपनिषद् में कहा है: -उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म । तस्त्रियं सुप्रतिष्ठाक्षरं च ॥
अत्रान्तरं ब्रह्मविदोविदित्वा । लीना तत्परायोनिमुक्ता ॥
विद्या और कर्म का सहयोग प्रत्येक जीव आत्मा की जीवन - यात्रा में मुख्य दो कारण है- १ कर्म और २ विद्या, इन दोनों के तारतम्य से जीव ग्रात्मा की स्थिति भिन्न - भिन्न प्रकार की बदलती रहती है । जिसमें कर्म्म के बल के तारतम्य से ग्रात्मा में जगत् का बन्धन तारतम्य से बढ़ता रहता है । किन्तु कर्म के बल का घटाव होने से अपने आप विद्या उद्बुद्ध होकर ग्रात्मा में जगत् के बन्धन की मुक्ति होती रहती है । कर्म के तारतम्य से विद्या की दशा छ प्रकार की हो जाती है १ प्रथम तो वह विद्या है जिसमें कर्म का लेश भी नहीं रहता । २ दूसरी विद्या वह है जो अपने अनुकूल कर्म से युक्त रहती है । ३ तीसरी विद्या कर्म का मिश्रित हिलमिल है और दोनों बराबर दरजे के होकर एक दूसरे का उपकार करते हैं जैसे जीव का जीव । ४ चौथी विद्या कर्म से दबी हुई होती है । वह मिश्रित कर्म है । ५ पांचवी विद्या वह है जिसके पश्चात् पतनीय ( पापकर्मों ) का भोग होता है । ६ छठी विद्या कर्म के दबाव से ढकी जाकर लुप्तसी हो जाती है । इस प्रकार विद्या के सर्वत्र एक रूप रहने पर भी केवल कर्म के ही वैचित्र्य से विद्या में वैचित्र्य उत्पन्न हो जाता है जिसके द्वारा जीव ग्रात्मा की भी गति भिन्न - भिन्न प्रकार की होती है । यदि जीव की विद्या काम ( कामना ) और कर्म से सर्वथा रहित हो जावे तो उसकी सद्योमुक्ति होती है अर्थात् उसका प्राण किसी लोक - लोकान्तर में न जाकर यहाँ ही व्याप्त हो जाता है क्योंकि गति का कारण कर्म औौर काम है | इन दोनों के न होने से गति नहीं हो सकती किन्तु ग्रात्मा का परिच्छेद या सीमाबन्धी टूट जाने से जीव आत्मा व्यापक होकर ब्रह्म में लीन हो जाती है । उसके देवयान, पितृयान दोनों मार्ग नहीं होते । [ २३१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान 8 ( २ ) यदि जीव ग्रात्मा ईश्वर की उपासना से वीरे - धीरे शुद्ध होकर सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य पाकर क्रम से ईश्वरता पा जावे तो इसे ही क्रममुक्ति कहते हैं, यद्यपि ईश्वर की उपासना भी एक प्रकार का कर्म है तथापि यह कर्म विद्या के अनुकूल होकर विद्या को बढ़ाता है, जिससे जीव ग्रात्मा स्वच्छ होकर ईश्वर में लीन हो जाती है । उसके लिये गति, ( जाने का मार्ग ) देवयान है । वह प्रथम अग्नि में, फिर वायु में, फिर ग्रादित्य में, फिर चन्द्रमा में, फिर विद्युत् में जाकर अशोकमहिम लोक में जाता हैं पश्चात् ब्रह्म लोक में पहुँचता है, जहाँ जाने से फिर पुनरावृत्ति नहीं होती । ( ३ ) इसी प्रकार यज्ञादि कर्म देवलोक प्राप्ति में निमित्त होता है । जिन कर्मों के बल से देवया-नमार्ग होकर स्वर्गं पहुँचता है और वहाँ पूर्ण ऐश्वर्य पाकर प्राकाम्य की सिद्धि होती है अर्थात् इच्छानुसार सुख मिलता है किन्तु मुक्ति नहीं होती । स्वर्ग सुख भोगने के पश्चात् फिर पृथ्वी में जन्म होता है । ( ४ ) जब कि विद्या कर्मों से दबी हुई होती है तो वह जीवात्मा पितृयानमार्ग पर सवार होकर प्रथम पितृ - लोक में जाती है, वहां सुख भोग करके कर्म क्षय होने पर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेती है । ( ५ ) जब विद्या पतनीय कर्मों से पृथक् - पृथक् युक्त होती है तो वह जीव - ग्रात्मा पितृलोक में जाकर चौरासी नरकलोकों में से कर्मानुसार कितने ही नरकों में दुःख भोग करके फिर पृथ्वी पर जन्म लेती है । ( ६ ) जिनमें कर्म और विद्या दोनों ही पृथक् पृथक् भाव से कुछ प्रभाव न रखते हो वो उस दशा में भी शुक्रमार्ग यानि देवयान या कृष्णमार्ग अर्थात् पितृयान दोनों ही न होकर जीवात्मा की ऊर्ध्वगति नहीं होती केवल चन्द्रमा के नीचे चिरकाल तक अन्तरिक्ष में गन्धर्व देह से रहती है, अथवा पृथ्वी में डांस, मच्छर ग्रादि छोटे जन्तु होकर यहां ही जीती मरती रहती है । इस प्रकार पाप या पुण्य कर्मों का जितना बल हो उसके अनुसार विद्या भी अपना प्रभाव करती है । इन दोनों में जितना विद्या का बल होगा उतना ही अमृत भाग सम्पन्न होगा और जितना कर्म का भाग का प्रभाव जीवात्मा में रहता है । इस प्रकार जीवात्मा की गति विद्या बल होगा उतना ही मृत्यु और कर्म इन्हीं दोनों के अधीन है । ब्रह्म गायत्री मन, प्राण, वाक् के भेद से त्रिवृत् जो भूमा रस है वह सर्व जगत् में व्याप्त ग्रानन्द माना जाता है 1 ) अर्थात् एक ग्रानन्द ही भूमा अर्थात् सर्व जगत् व्यापक रस है उसी के मन, प्राण, वाक् ये तीनों भेद हैं । इनमें से वाक्. दो प्रकार से जगत् में काम आती है । एक तो वह " गायत्री " अर्थात् पदार्थों का सम्पादन स तु दीर्घ कालादर नैरन्तर्य सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि ॥ योगदर्शन ॥ १ । १ । १४ मन का संयम ( दीर्घकाल, ग्रादर, लगातार ) व्याकरण के अनुसार गायत् सम्पादन करता हुआ त्रत्राण करने वाला जो हो उसी को गायत्र कहते हैं वही स्त्रीलिङ्ग में गायत्री है । [ २३२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * करती है और फिर " त्रायते " अर्थात् सम्पादन किये को त्राण करती है, अर्थात् बिगड़ने से बचाती है और “ गायति ” और “ त्रायते " इन दोनों शब्दों के योग से वह वाकु गायत्री कहलाती है । जिसका अर्थ है बनाने वाली और बचाने वाली इस प्रकार पैदा करना और रक्षा करना जो वाक् का धर्म कहागया है वास्तव में ग्रानन्द का ही धर्म है । इस जगत् में जहां जो कुछ उत्पन्न होता है वह आनन्द से ही होता है श्रर ग्रानन्द ही सदा रक्षा करता है । विश्वास करना चाहिये कि जिन स्त्री पुरुषों से वालक उत्पन्न होता है वह उन दोनों के आनन्द में मग्न होने पर ही होता है । ससार में जो जहां कुछ जीता है वह उसका जीवन ग्रानन्द का ही रूप है । जिस समय ग्रानन्द की मात्रा घटते घटते सर्वदा नष्ट हो जाती है, उसे ही मृत्यु कहते हैं । मृत्यु से बढ़कर कोई भी दुःख नहीं है । श्रानन्द के न होने को ही दुःख कहते हैं । तो इससे सिद्ध हुआ कि सबसे बड़ा दुःख मृत्यु अर्थात् वस्तु का नाश जब तक न होवे तत्र तक उस वस्तु में अथवा जीव में ग्रानन्द की मात्रा अवश्य है । इससे कहना होगा कि मौत से बचाने वाला आनन्द ही त्राण करने वाला है, तो इससे सिद्ध हुआ कि आनन्द से ही जीव उत्पन्न होता है और आनन्द से ही त्राण होकर उसकी जीवन सत्ता बनी रहती है । इसलिये आनन्द को अर्थात् जगत् व्यापक भूमा रस को ही गायत्री कह सकते हैं वह भूमा रस ब्रह्म है, इसलिये गायत्री भी ब्रह्म है । जब कोई प्राणी किसी नवीन देश में जाता तो थोड़े समय तक उसको निवास करना भले ही न रुचे, किन्तु जब चिरकाल तक वह निवास कर लेता है तो फिर वह स्थान उसको रुचने लगता है । जो प्राणी जिस शरीर में रहता है वह शरीर उसको इतना रुचता है कि वह उस शरीर को छोड़ना नहीं चाहता । जो वस्तु उसके अधीन हो जाती है उसमें स्वभाव से ही प्रेम उत्पन्न हो जाता है और जो न भी प्राप्त है उसको प्राप्त करने के लिये प्रत्येक प्राणी इच्छा रखता है । इससे सिद्ध हुआ कि यह संपूर्ण जगत् के पदार्थ ग्रानन्दमय हैं, इसी से रुचिकर हैं । क्षण भर भी कोई प्राणी जी नही सकता था यदि उसके चारों ओर का आकाश दुःखमय होता । प्रायः सभी प्राणी अपने स्वस्थ, शान्तिमय मन से ही जीवन धारण कर सकते हैं और शान्ति में ही रहना चाहते हैं । इस प्रकार ग्रानन्द सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करता है औौर रक्षा करता है । इसलिये इस ग्रानन्द रस को भी गायत्री कह सकते हैं । इसी ग्रानन्द से यह पृथ्वी उत्पन्न हुई है जो कि एक प्रकार की बाक् है । इसलिये इन भूतों को उत्पन्न करने वाली और धारण करने वाली पृथ्वी रूपी वाक् को भी गायत्री कह सकते हैं । इस पृथ्वी से प्राणियों का देह उत्पन्न हुआ है जो देह भी एक प्रकार की वाक् होने से गायत्री है क्योंकि इसी देह के कारण हमारी ग्रात्मा उत्पन्न होकर रक्षित रहती है, फिर इस देह के कारण हमारी आत्मा उत्पन्न होकर रक्षित रहती है, फिर इस देह के रसों से हृदय उत्पन्न होता है यह हृदय भी वाक् है इसलिये गायत्री है क्योंकि हृदय में ही शरीर के देवता उत्पन्न होकर रक्षित रहते हैं । इस प्रकार श्रानन्द, पृथ्वी, देह, हृदय, ये चारों ही सिल-सिले वार परस्पर बँधे हुए एक रूप होकर चार चरण वाली एक ही गायत्री कही जाती है । जिनमें पृथ्वी, देह, हृदय ये तीन पाद जगत् के अन्तर्गत हैं किन्तु इसका तुरीय ( चौथा ) पाद जो ग्रानन्द है वह इस जगत् से बाहर मुक्तिरूप है । ये चारों पाद जो कि वास्तव में वाक् रूप हैं इनके प्रत्येक पाद में मन और प्राण भी नित्य ही रहते हैं जिनके मन से प्रवृत् हुए प्रारण में छ - छ स्तोम नियम रहते हैं । [ २३३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान १ - प्रथम त्रिवृत् जो अग्नि देवता से संबन्ध रखता है । २ – दूसरा पञ्चदश जो इन्द्र का संबन्धी है । ३ – तीसरा एकविंश जो सूर्य का संबन्धी है । ये तीनों अग्नि के ही भेद है । इनके आगे चौथा सप्तविंशस्तोम जो चन्द्रमा से संबन्ध रखता है । पांचवा त्रयस्त्रिंशस्तोम जो दिक् से संबन्ध रखता है । ये चौथा और पांचवा दोनों सोम के रूप हैं । इन तेतीस देवताओं का मध्य सप्तदश होता है 1 । इसलिये छठा सप्तदश स्तोम प्रजापति का रूप है । इस प्रकार एक - एक पाद में प्राणों का छ - छ खण्ड बन जाता है, यही गायत्री के प्रत्येक पाद के छ छ अक्षर हैं । छ - छ अक्षरों के चारपाद से चौबीस २४ अक्षर की गायत्री सिद्ध होती है जो जगत् से बाहर परब्रह्म परमात्मा आनन्द घन से प्रारम्भ करके पृथ्वी, देह, हृदय के द्वारा हृदय निवासी प्रानन्दकन्द हमारी आत्मा तक विद्यमान होती है इसी का नाम ब्रह्मगायत्री है । इस ब्रह्मगायत्री कां यदि जीव सर्वदा ध्यान करता रहे तो इसके द्वारा जीवात्मा का परमात्मा के साथ लगाव रहने से मुक्ति का द्वार सहज हो जाता है । इस ब्रह्मगायत्री के चारों चरण प्राण रूप हैं इन प्राणों की स्थिति के लिये चार ही प्रकार के श्राकाश कहे जाते हैं जो कि आपस में दहरोत्तर रूप से है । अर्थात् पूर्व २ आकाश में पर श्राकाश अन्तः प्रविष्ट रहता है । जिस प्रकार भौतिक वायु के लिये भौतिक श्राकाश श्रवपन होता है उसी प्रकार प्राण रूपी दैविक वायु के लिये यह आवपन रूप मन ही आकाश है । यह मन प्रारण के लिये ठीक वैसा ही काम करता है जिस प्रकार वायु के लिये आकाश करता है इसलिये मन को भी आकाश ही कहते हैं । इनमें सबसे प्रथम आकाश वह मन है जिसमें प्रानन्द रूप भूमा रस परिपूर्ण रहता है । उस आकाश के अन्तर्गत पृथ्वी का आकाश है । इस प्रकार ये दो श्राकाश शरीर से बाहर रहते हैं । इसके अन्तर्गत शरीर का आकाश है और उसके अन्तर्गत हृदय ग्राकाश है । इन चारों ग्राकाशों में प्राण, वाक् पर्याप्त रहते हैं और जिस प्रकार आकाश के अन्तर्गत आकाश भिन्न रूप से रहता है उसी प्रकार प्रत्येक आकाश के प्राण, वाक् भी भिन्न - भिन्न रूप से रहते हैं । किन्तु जितने धर्म महा आकाश में हैं वे सब छोटे से छोटे हृदया-काश में भी पाये जाते हैं, केवल मात्रा में उनका भेद है । यह हृदयाकाश अप्रवर्ति है इसलिये हृदयाकाश के अन्तर्गत फिर दूसरा आकाश उत्पन्न नहीं होने पाया । इस प्रकार चारों प्रकाशों में विद्यमान चार प्रकार के प्राणों का संघात ही चार पाद बनकर गायत्री का स्वरूप सिद्ध होता है, जिसको ब्रह्मगायत्री कहा गया है यह पहली गायत्री हुई । जिस प्रकार ब्रह्म अर्थात् आनन्द से प्रारम्भ करके हृदय तक चतुष्पाद ब्रह्मगायत्री सिद्ध होती है, उसी प्रकार सूर्य से प्रारम्भ करके भी वही पृथ्वी, शरीर, हृदय के भेद से चतुष्पाद सूर्य गायत्री जाननी चाहिये । प्रत्येक पाद में छ छ स्तोम के छ छ प्रक्षर पूर्वोक्तरीति के अनुसार यहाँ भी जानों और चारों आकाश भी पूर्ववत् मानो । इसी प्रकार चन्द्रमा से आरम्भ करके पृथ्वी, शरीर, हृदय के द्वारा चन्द्रगायत्री भी सिद्ध होती है इस प्रकार ये तीनों गायत्री भिन्न - भिन्न तीन स्थानों में से भिन्न - भिन्न तीन प्रकार के रसों को हमारे हृदय तक पहुंचाकर हमारी आत्मा के स्वरूप को संपन्न करती गायत्रियों के अतिरिक्त तीन गायत्रियां और भी हैं जिनका हमारों आत्मा से कोई हैं । इन तीनों उसी ब्रह्म प्रर्थात् ग्रानन्द मूर्ति से प्रारम्भ करके चन्द्रमा श्रौर वहाँ के भौतिकशरीर संबन्ध और नहीं उनके । हृदय जैसा कि तक [ २३४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जो रसों की एक शाखा जाती है वह भी ब्रह्म गायत्री है । किन्तु उससे चन्द्र निवासी जीवों की आत्मा सम्पन्न होती । इसी प्रकार सूर्य से प्रारम्भ करके भी चन्द्रमा, शरीर, हृदय तक सूर्यगायत्री होती है, ऐन्द्रमण्डल में ये दो ही गायत्री हैं । इनके अतिरिक्त एक और भी ब्रह्मगायत्री है जो आनन्द से सूर्य में जाकर वहाँ के निवासियों के शरीर और हृदय तक पहुंच कर आत्मा संपन्न करती है इस प्रकार छ गायत्रियाँ हुई जिनमें पृथ्वी पर तीन, चन्द्रमा पर दो, सूर्य में एक है ये छत्रों गायत्रियाँ इस त्रैलोक्य में कही जाती हैं किन्तु सूर्य असंख्य हैं, प्रत्येक सूर्य में बहुत सी पृथ्वी और बहुत से चन्द्रमा हैं । प्रत्येक में ब्रह्म अर्थात् ग्रानन्द मूर्ति परमात्मा से इन गायत्रियों के ही द्वारा रस आकर भिन्न - भिन्न वहाँ के जीब आत्माओं का स्वरूप उत्पन्न होता रहता है और इन्हीं गायत्रियों के द्वारा सभी जीवआत्मा प्रतिक्षरण उस श्रानन्दघन परमात्मा से सम्बन्ध करते रहते हैं । छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे प्रपाठक के बारहवें खण्ड में गायत्री का स्वरूप वर्णन हुआ है । इनके अतिरिक्त वाजसनेयश्रुति में महर्षि याज्ञवल्क्य ने एक और ही गायत्री का कथन किया है वह यह है - तीन लोक, तीन वेद, तीन प्राण, इस प्रकार तीन पाद के साथ तुरीयपाद परोरजा का अर्थात् उसी आनन्द मूर्ति परमात्मा के मिलाने से चार पाद की गायत्री सिद्ध होती है । यह गायत्री प्रत्येक जीव के शरीर में स्थित होकर शरीर के ( गय ) अर्थात् प्राणका त्राण करती है, इसी कारण यह चतुष्पाद ब्रह्मरस गायत्री कहलाती है । यह याज्ञवल्क्य की गायत्री चौथे प्रकार की है । इसी ब्रह्मगायत्री को यों भी दूसरे प्रकार में समझ सकते हैं कि ईश्वर से लेकर जीव तक जो सूत्र ग्रा रहा है उसके छ भाग हैं । १ परोरजा, २ सूर्य ३ चन्द्र, ४ पृथ्वी, ५ शरीर, ६ हृदय, ये छ भाग ही छ अक्षर कहे जाते हैं । इन छत्रों भागों में जितने पदार्थ हैं वे ४ भाग में बंटे हैं । १ लोक २ वेद, ३ देव, ४ चौथा भूत लोक अवस्था विशेष का नाम है । प्रत्येक पदार्थ तीन अवस्थाओं में रहता है । स्थूल, सूक्ष्म, कारण इन्हीं को लोक कहते हैं वेद से तात्पर्य ऋक् यजु साम से है । छनों स्थानों में जितने पदार्थ हैं उनमें प्रत्येक के साथ ये तीनों वेद लगे रहते हैं । वेदों के बिना किसी वस्तु की मूर्तक या स्वरूप सिद्धि नहीं होती । देवों से तात्पर्य तीन अग्नि और दो सोम से है । छनों स्थानों में कोई भी पदार्थ इन देवताओं के बिना नहीं बना है और इस प्रकार भूत से तात्पर्य तेज; आप्, ग्रन्न से है । छों स्थानों में जितने विरल, तरल, घन पदार्थ हैं प्रत्येक में दो - दो भाग होते हैं । बाहर में भूत और उनके ग्रन्तर में देव । देव या भूत ये दोनों एक के बिना एक नहीं रहते और इन देव भूतों की बनी हुई प्रत्येक वस्तु की तीन तीन अवस्था अथात् लोक होते हैं । और प्रत्येक पदार्थ के तीन - तीन वेदस्वरूप बनाते हैं, इस प्रकार छत्रों स्थानों में एक - एक वस्तु का स्वरूप इन चारों से अर्थात् लोक, वेद, देव, भूत से बने होते हैं । इसलिये ईश्वर से जीव तक इन चारों का सिलसिला बराबर बनता हुआ आता है जो छ स्थान में हैं । इसलिये हर सिलसिले में २४ भाग अर्थात् २४ ग्रक्षर सिद्ध हो जाते हैं | इसलिये इस सिलसिले को ब्रह्मगायत्री कहते हैं । इस ब्रह्मगायत्री से जीव आत्मा का परमात्मा में मिलाव सिद्ध होता है । तीसरे एक और प्रकार से भी ब्रह्मगायत्री समझी जाती है । वह यह प्रकार है कि इस जगत् में जितने स्थूलपिण्ड हैं वे सब भूत हैं और भूतों की सृष्टि अत्यन्त सूक्ष्मभाव से आरम्भ करके [ २३५ ]
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* ब्रह्मविज्ञानं किसी स्थूल दशा तक पहुंचती है । कल्पना करो कि यह पृथ्वी किसी समय बहुत दूर - दूर तक फैली हुई प्रथम वाक् रूप में थी इसी वाक् को आकाश कहते हैं । इस वाक् का केन्द्र भाग धीरे धीरे घनतर में प्राकर वायु रूप में परिणत हो गया, वायु का भी केन्द्र भाग घनता में ग्राकर तंत्र हो गया, तेजका भी केन्द्र भाग घनता में आकर जल हो गया, उस जलका भी केन्द्र भाग घन होकर पृथ्वी बन गई, जितनी घनता हो सकती थी उतनी होकर पृथ्वी हुई उसके अधिक बनता तात्विक दृष्टि में हो नहीं सकती इसलिये आगे की घनता बन्द होकर भूत की पांच जाति सिद्ध हुई । सब से बाहर १ वाक् है २ उसके भीतर क्रम से वायु, तेज, जल, पृथ्वी हैं । सबसे बड़ा ग्राकाश वाक् का है उसके अभ्यन्तर में पृथ्वी का ग्राकाश है । अब इस पृथ्वी का | भाग लेकर शरीर बनता है इसलिये पृथ्वी आकाश के भीतर शरीर का ग्राकाश है उसके भीतर हृदय आकाश है । इस प्रकार पृथ्वी के सम्बन्ध से चार ग्राकाश सिद्ध हुए वाक्, पृथ्वी, शरीर, हृदय । जिस प्रकार पृथ्वी एक स्थूलपिण्ड है । उसी प्रकार जितने भूतपिण्ड हों उन सब में भी पृथ्वी के अनुसार ही सृष्टि-क्रम मानना पड़ेगा । इसलिये चन्द्रमा, सूर्य, परोरजा या ग्रभिजित् तथा ईश्वर और परमेश्वर इन छत्रों | में भी वाक् आदि चार चार भाग होंगे उन सब भागों से हमारा शरीर बना है है इसलिये हमारा शरीर षाट्कौशिक है अर्थात् छः छः कोशों से बना हुआ है । और जिस प्रकार मेरा शरीर भिन्न भिन्न छः कोशों से बना है उसी प्रकार छः कोशी का केन्द्ररूप हृदय भी छः होंगे । इस प्रकार से छः व्यूहों के प्रत्येक चार चार भाग लेने से २४ चौबीस खण्ड प्राप्त होते हैं । इस चौबीस खण्डों को अक्षर मानने से भी एक बड़ी ब्रह्म॒गायत्री सिद्ध होती है । जिस ब्रह्मगायत्री के अन्दर यह परम विशाल संपूर्ण जगत् श्रोत-प्रोत हुआ दीखता है । इस प्रकार जो छः हृदयों से बना हुआ एक हृदय है जिसमें गुस्य हृदय पर परमे-श्वर सम्बन्धीवह हृदय एक अद्भ ुत दिव्यज्योति विद्यमान रहकर इस सम्पूर्ण विशाल जगत् का प्रकाश करती हुई उसका ग्रानन्द हमें दिखा रही है । वह सब ज्योतियों की ज्योति है । क्योंकि उसी से हम जीव, सूर्य, चन्द्र यदि ज्योतियों को और उनके अभाव में अन्धकार को भी देखते हैं और दूसरी दूर की वस्तुओं को और अत्यन्त परोक्ष वस्तुओंों को भी जिसके प्रकाश से हम देखते हैं और उसी के आश्रय से पाँच पञ्चजन विद्यमान रहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार यह पृथ्वी सूक्ष्म वाक् से स्थूलरूप धारण करने के कारण पाँच भूतों वाली बनी है । ग्रर्थात् वाक्, बायु, तेज, जल, पृथ्वी इस प्रकार क्रम से स्थूल हुई है ऐसे ही इसी पृथ्वी के ग्रनुसार चन्द्रमा, सूर्य, पर्जन्य, ग्राकाश ये ४ चारों भी वाक् श्रादि पांच पांच अब-यवों के द्वारा स्थूलरूप में प्राये हैं । इसलिये पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, पर्जन्य, ग्राकाश ये पाची ही बाकू, वायु, तेज, जल, पृथ्वी रूप पाँच पांच ग्रत्रयवों के कारण पञ्चजन कहलाते हैं । ये पाँचों ही पश्चजन उस छठे परमेश्वर के बाबार से अपनी ग्रपनी सत्ता रखते हुए अपना कार्य करते हैं । अर्थात् इस शरीर के भिन्न-भिन्न चार कार्यों को पूरा करते हैं इन पांचों के सम्मिलित पाँच हृदय इस जीव के हृदय में पृथक् पृथक् पाँच प्राणों के पांव पाँच छिद्रों में निकलने हुए इस शरीर के भिन्न भिन्न चार कार्य पूरा करते हैं या संपा-दन करते हैं । एक एक स्रोत के प्रत्येक प्राण चार रूप में होकर चार चार काम करते हैं । जिनके ये नाम है पांच अन्तश्वर प्राप् हैं प्राण, व्यान, अपान समान, उदान ये पांचों ही शरीर के भीतर रहकर शरीर के 3 सात धातुओं को उत्पन्न करते हैं और उनको यथा स्थान सन्निवेश करके शरीर का स्वरूप [ २३६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान संगठन करते हैं और १ वाक् २ प्राण, ३ चक्षु ४ श्रोत्र, ५ मन ये पांचों बहिश्वर प्राण हैं । ये इन्द्रिय छिद्रों के द्वारा बाहर के भूतों में से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और विचारणीय विषयों को ग्रहण करके उस छठे परमेश्वर के प्रकाशमय हृदय में पहुँचाया करते हैं । २ अग्नि, चन्द्र, सूर्य, पर्जन्य, आकाश ये पांचों देवता स्वर्गचर पांच प्रारण हैं ये सब ग्रपने स्थान से अपने अपने रसों को लेकर जीव के हृदय तक पहुँचाते हैं और जीव शरीर के रसों को लेकर उल्टा स्वर्ग में ले जाते हैं । इस प्रकार प्रतिक्षरण मनुष्य के हृदय से स्वर्ग के पदार्थों का आगम निगम होता रहता है । तीसरा और चौथा उपास्य प्राण है अर्थात सूर्य से तेज और चन्द्रमा से श्री और यश और पृथ्वी की अग्नि से ब्रह्मवर्चस तथा पर्जन्य से कीर्ति और व्युष्टि और ग्राकाश से ओज और मह प्राप्त होते हैं । इनको उपास्य प्राण कहते हैं । २४ तात्पर्य यह है कि हृदय के पांच स्रोतों से पांच प्राण निकलकर प्रत्येक प्राण चार चार काम करते हैं एक तो शरीर के भीतर धातुग्रों को बनाते हैं, दूसरा बाहर भूतों से भूत गणों को भीतर लाता है, तीसरा स्वर्ग से देवों के रसों को भीतर लाता है और चौथा शरीर को उत्तम करने के लिये अर्थात् अच्छे बुरे का भेद दिखाने के लिये शरीर पर कितने ही उत्तम गुणों का आधार करता है । यह चौथा काम सब जीवों के शरीर पर रखते हैं साधारण तौर से नहीं होता, किन्तु कहीं अधिक कहीं कम और कहीं सर्वदा प्रभाव भी होता है वह सुन्दर न होकर खराब माना जाता है । ये पाँचों प्राण जो चार - चार काम करते हैं उन सब उस छठे परमेश्वर की भी सत्ता विद्यमान रहती है । इसलिये उस की भी चारों क्रिया मानी जा सकती है । इस प्रकार छः आत्माओं की चार चार क्रिया सिद्ध होने से २४ सिद्ध होती है । इन्हीं को २४ ग्रक्षर मानकर इस जीव आत्मा की जीवन क्रिया को गायत्री कह सकते हैं अर्थात् गायत्री से ही इस जीवन का जीवन है, ऐसा सिद्ध होता हैं । छान्दोग्य उपनिषद् में तीसरे अध्याय के १३ वें खण्ड में निम्नलिखित विवेचन है-अन्तश्वर वहिश्वर स्वर्गचर उपास्य अथवा शरीरचर भूतचर देवचर देहचर हृदय के पूर्व सुपर प्रारण चक्षु ग्रादित्य तेज दक्षिण व्यान श्रोत्र चन्द्र श्रीयश " 33 पश्चिम " " " ग्रपान वाक् अग्नि ब्रह्मवर्चस उत्तर " समान मन पर्जन्य कीर्ति व्युष्टि " ऊर्ध्व उदान 25 वायु आकाश ग्रोज. महः ( सुपिर = सुख, क्षत्री का भ्राजस, वैश्य का द्युम्न, देव का सुम्न ) वायु अव्यवथित है अर्थात् न थका हुआ । इस वायु को अनस्तमिता देवता भी कहते हैं । ( जो अस्त नहीं होता । ) [ २३७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान यद्यपि इस प्रकार छः मूततत्त्वों के प्रत्येक चारपाद कल्पना करने से २४ अक्षर की गायत्री कही गई है तथापि सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर हृदय, शरीर, पृथ्वी और वाक् इन चारों का ग्राकाश पृथक्-पृथक् चार न होकर एक है, और उस ग्राकाश में वाक् से लेकर हृदय तक समानभाव से सजातीय पदार्थ परिव्याप्त हैं । जितने पदार्थ जिस प्रकार से वाक् के आकाश में हैं उतने ही पदार्थ उसी प्रकार से हृदय आकाश में भी हैं तो सिद्ध हुआ कि पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य्य आदि छओं देवताओं अपने - अपने भिन्न - भिन्न असाधारण पदार्थं अपने - अपने वाक् के ग्राकाश से प्रारम्भ करके अपने - अपने हृदय ग्राकाश तक विद्यमान हैं । इसलिए जीव के हृदय में जो कि छ हृदयों का एक समूह है उसमें छ देवताओं के भिन्न - भिन्न पदार्थ सम्मिलित हैं । अर्थात् भौमहृदय के कारण शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांचों तत्त्व उस हृदय में रहते हैं । ग्रर्थात् सौम्य हृदय के कारण सङ्कल्प र काम उस हृदय में | सौर हृदय के कारण ३३ देवता और कर्म्म इस हृदय में हैं । ग्रभिजित् अर्थात् ब्रह्मा हृदय के कारण सब वेद और यज्ञ इस हृदय में हैं ओह ईश्वर हृदय के कारण यह हृदय इन सबको पकड़े हुये मन, प्राण, वाक् संयुक्त है और सत्ता, चेतना व ग्रानन्द युक्त है और परमेश्वर के हृदय के कारण यह वाङ्गमनस के ग्रगोचर है । इस प्रकार ये छः प्रकार के भिन्न - भिन्न धर्म भिन्न - भिन्न स्थानों से लाकर पृथक् - पृथक् छः हृदयों में सन्निविष्ट हैं । किन्तु ये छओं हृदय एक ही किसी विन्दु में ग्राकर इस प्रकार बँध गये हैं कि उनकी एक गांठ सी हो गई है इसी से उसको हृदयग्रन्थि कहते हैं । इसी हृदयग्रन्थि के कारण भिन्न भिन्न छः हृदय मिलकर एक हृदय के अनुसार प्रतीत होते हैं इसीलिये जो हमारी आत्मा परमेश्वर और ईश्वर से ग्राई हुई शुद्ध सच्चिदानन्द रूपा है उसी आत्मा से सब देवता संकल्प, काम या गन्ध, रूप, रस यादि भूत धर्म सब विद्यमान से प्रतीत होते हैं परन्तु यदि यह हृदयग्रन्थि मुक्त हो जाय अर्थात् खुल जाय तो पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा के धर्म सब अलग होकर हम शुद्ध सच्चिदानन्द रूप रह जावें यह ही परम पुरुषार्थ है और इसे ही मुक्ति कहते हैं । अथवा दूसरा प्रकार मुक्ति का क्षीणोदर्क यह है कि जिस प्रकार चार पादों के चार ग्राकाशों को एक एक आकाश समझा जाता उसी प्रकार इन छः देवताओं को भी वास्तव रूप में एक ही देवता समझें क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी से, पृथ्वी सूर्य से सूर्य ब्रह्मा से, ब्रह्मा ईश्वर से और वह परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं । इसलिये सब भी वास्तव में एक ही परमेश्वर हैं । ऐसा विश्वास होने पर गन्ध, रस, रूप ग्रादि भिन्न पदार्थों के ज्ञान से भिन्नता नष्ट हो जाती है । ये सब ज्ञान ही ज्ञान समझ में आने लगते हैं, जिससे द्वैतभाव मिटकर हृदयग्रन्थि अपने ग्राप मुक्त हो जाती है और एक ही सच्चिदानन्द के रहने से कैवल्यमुक्ति हो जाती है और यही परम पुरुषार्थ है इसको भूमोदर्क मुक्ति कहते हैं । सिद्धि तप से ही हो सकती है तप का अर्थ योगाभ्यास है । योग भक्तियोग और ज्ञानयोग जिनमें भक्तियोग भी चार प्रकार का राजयोग इनमें प्रथम दो सामान्य कक्षा के हैं, किन्तु अन्तिम दो राजयोग मुख्य है । मन्त्रयोग में मूर्तियों का पञ्चोपचार या षोडसोप-मुख्य वहिरङ्ग साधन है और मन्त्र, पुरश्चरण, जप आदि अन्तरङ्ग-क्षणोदर्क या भूमोदमुक्ति की यद्यपि तीन प्रकार का है, कर्मयोग, है, हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग और उच्च कक्षा के हैं, इन दोनों में भी चार पूजन आदि ही योग का साधन हैं । [ २३८ ]