ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 461–468

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 461–468

पृष्ठ 461

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 461 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * " पार " है । ऐसा होने पर भी ब्रह्म व्यापक होने से ग्रवार में भी सर्वत्र व्याप्त है, किन्तु यह कर्म पार में व्याप्त नहीं इसलिने अवार में ब्रह्म वर्जित नहीं होता, किन्तु पार में मृत्यु अर्थात् कर्म की सर्वथा मुक्ति हो जाती है | यह कर्म दो प्रकार का है - प्रवृत्तिरूप और निवृत्ति । पहला कर्म संसार के लिये और दूसरा कर्म निस्तार के लिये होता है । पहले कर्म में ब्रह्म से मन, प्राण, वाक् भूत और भौतिक ये पांच धारायें-उत्तरोत्तर कर्म की ग्रन्थि पर ग्रन्थि होने को कहते हैं । यह घोर मार्ग है इसमें ब्रह्म का भाव अर्थात् सत्ता-ज्ञान और ग्रानन्द का भाव उत्तरोत्तर घट जाता है और कर्म का भाव अर्थात् इच्छा, क्रिया, आवरण का भाव बढ़ता जाता है इसलिये इसको घोर मार्ग कहते हैं । आत्मा के लिये इस मार्ग में पड़कर परतन्त्र होना भयङ्कर है । किन्तु इसके विरुद्ध निवृत्ति कर्म में भौतिक भूत, वाक्, प्राण, मन होकर प्रतिसञ्चर होता है अर्थात् एक ग्रन्थि के उघड़ने से धीरे - धीरे सब ग्रन्थियें खुल कर सब विकार नष्ट हो जाते हैं । जिससे भौतिक, भूत वाक् प्रारण, मन ये सब भी असली दशा में आकर निर्विकार ब्रह्म वन जाते हैं । यही भूमोदकं मुक्ति है यह श्रेष्ठ मार्ग है, क्योंकि आत्मा के सब रोग नष्ट होकर स्वास्थ्य अर्थात् अपनी असली दशा उत्पन्न होती है । इसी प्रकार ब्रह्म में कर्म के द्वारा उत्पन्न हुए सब विकारों को अर्थात् मन, प्राण, वाक्, भूत गौतिक को लोह के कीट के अनुसार मल समझकर तपो बल के द्वारा निविकार आत्मा से परिमार्जित ( छूटना ) कर दिया जाय । फेन को छोड़कर शुद्ध जल के अनुसार शुद्ध आत्मा रूप रह जाने से भी कैवल्य मुक्ति होती है परन्तु यह क्षीरगोदर्क मुक्ति है और यह भी श्रेयोमार्ग है क्योंकि वैकारिक अंश छूटकर इसमें भी आत्मा शुद्ध सच्चिदानन्द रह जाता है । इसलिये निवृत्ति मार्ग को ही श्रेयो मार्ग कहते हैं, क्योंकि ये दोनों कैवल्य मुक्ति निवृत्ति कर्म से ही सिद्ध होती हैं । इन दोनों में भेद इतना ही है कि भूमोदक में विकारों का कर्म के द्वारा वैकारिक भाव ही निवृत्त होता है किन्तु उसमें बैठा हुआ ब्रह्म-रस निवृत्त न होकर ज्यो का त्यों बना रहता है किन्तु क्षीणोदर्क में विकारों का विकार भाव नष्ट नहीं होता किन्तु ग्रात्मा सहित सब निवृत्त हो जाते हैं । किन्तु इतना भेद रहने पर भी निवृत्ति क्रिया दोनों में विद्यमान है, इसलिये ये दोनों कैवल्य मुक्ति निवृत्ति रूप से ही मानी जाती है । ( ४ निर्वाण ) इन उपरोक्त कैवल्य मुक्तियों में " श्रमणक " या वैनाशिक विद्वानों का पूर्व पक्ष है । उनका मत है कि कैवल्य मुक्ति श्रेयो मार्ग माननानितान्त भूल है, क्योंकि कैवल्य मुक्ति से ब्राह्मणों ने परमानन्द प्राप्ति मानी है, परन्तु वह संभव नहीं क्योंकि ग्रानन्द का अनुभव होना बुद्धि की विचार शक्ति से होता है । प्रथम इन्द्रियों के द्वारा आये हुए विषयों की पर्यालोचन ( गौर ) करके मन उनको बुद्धि में समर्पित करता है, बुद्धि उसको ग्रात्मा में समर्पित करती है, उसी को ग्रात्मा का भोग कहते हैं, सुख या दुःख ये ही दो भाग हैं तो इससे सिद्ध हुआ कि प्रानन्द का अनुभव करने के लिये श्रात्मा के पास बुद्धि मन और इन्द्रियों की भी ग्रावश्यकता है । जड़ पदार्थों में ग्रात्मा के रहते भी बुद्धि मन इन्द्रियों के न रहने से जैसे आनन्द का अनुभव नहीं होता, उसी के सदृश कैवल्य मुक्ति में भी आत्मा को ग्रानन्द का अनुभव नहीं हो सकता इसलिये कैवल्य मुक्ति में ग्रानन्द नहीं है । दूसरी बात यह है कि कैवल्य को मुक्ति मानना यह भी भूल क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्म से मन, प्राण, वाक् आदि की सृष्टि कर्म के द्वारा मानी गई है उसी प्रकार ब्रह्म का स्वरूप भी कर्म से ही बना हुआ है ब्रह्म से अतिरिक्त विकारों को कर्म से मानना और ब्रह्म को अकर्म [ ४२६ ]

पृष्ठ 462

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 462 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान कै मानना ऐसा भेद करने में कोई प्रमाण नहीं है क्योंकि ब्रह्म भी ज्ञान या ग्रानन्द के अतिरिक्त कुछ नहीं माना गया है वह ज्ञान अवश्य ही क्रिया रूप है । ग्रन्यान्य पदार्थों के अनुसार ज्ञान भी एक पदार्थ है और उनका भी उत्पति, स्थिति और नाश होता है । इसी प्रकार ग्रानन्द का भी उत्पति स्थिति नाश है, और जैसे ग्रन्यान्य पदार्थ परस्पर विभिन्न हैं वैसे ही ज्ञान और ग्रानन्द भी परस्पर भिन्न हैं, तो फिर क्या कारण है कि ब्रह्म को कर्म न माना जाय । बहुत संभव है कि कर्म दो प्रकार का होकर कभी प्रवृत्ति वाक् भी निवृत्ति रूप हो, उसकी निवृत्ति का क्रम भौतिक, भूत, वाक्, प्राग़ मन पर ही समाप्त न होकर ब्रह्म तक जाता है | ब्रह्म की निवृत्ति पर शेष कुछ नहीं बचता है, जिस प्रकार केले का थम्भ उबेड़ने से परि-शेष में कुछ नहीं बचता, छकड़े के प्रत्येक ग्रङ्ग उधेड़ने से अन्त में शकट ( छकड़े ) की ग्रात्मा कुछ नहीं बचती । दीपक को गुल कर देने पर ज्योति का कुछ भी अंश परिशेष नहीं बचता । ऐसे ही उल्का जलते-जलते निःशेष हो जाती है । उसी प्रकार ग्रात्मा भी एक दीपक है, यह भी निवृत्ति क्रिया के क्रम से अन्त में गुल हो जाता है परिशेष में कुछ नहीं बचता इसे ही निर्वाणमुक्ति कहते हैं । ( निर्वाण का अर्थ दीपक का गुल करना है ) यदि कोई प्रश्न करे कि इस मत में मुक्ति घोर अन्धकार स्वरूप है । इससे मुक्ति के लिये ग्रात्मा का प्रयत्न करना अनुचित होगा क्योंकि अपने सर्व नाश का कोई भी विद्वान् अनुमोदन नहीं कर सकता, तो इस प्रश्न का उत्तर यह है कि संपूर्ण जगत् दुःख ही दुःख है, सम्पूर्ण दुःख रूप है । ग्रात्मा को उत्पन्न करके उसको चक्र में डालकर सर्वदा भ्रमण कराते हुए दुःख मय बनाते हैं । उस दुःख से शान्ति तभी संभव है जब कि ग्रात्मा को उत्पन्न करने वाली कर्म ग्रन्थि सर्वथा विलुप्त हो जाय और ग्रात्मा का भी कोई अस्तित्व न रहें । जगत् में जितने आनन्द अनुभव होते हैं वे सब किसी न किसी दुःख की ही निवृत्ति है । धन, पुत्र ग्रादि के प्रभाव से जो दुःख हुआ है वह उनके मिलने से नष्ट होकर ग्रानन्द होता है | रोग से जो दुःख हुआ है वह आरोग्य से नष्ट होकर सुख होता है । तात्पर्य यह कि सर्वत्र ही दुःख की मात्रा का नष्ट होना ही सुख की मात्रा है, वास्तव में सुख कोई वस्तु नहीं । ऐसी अवस्था में जबकि संपू संसार का दुःख हमारा निर्वाण मुक्ति से नष्ट हो जाता है तो उस मुक्ति को हम अवश्य ही परमानन्द रूप श्रेयष्कर मानेगे, इसलिये निर्वाण मुक्ति के लिये भी प्रवृत्ति करना इस मत में अच्छा है । इस मत के खण्डन में ब्राह्मणों का मत यह है कि श्रमणूक या वैनाशिकों की दो विषयों पर विप्रतिपत्ति ( नाइत्त-फाकी ) है । एक यह है कि आत्मा भी कर्म मय होने से विनश्वर है । दूसरी यह है कि सम्पूर्ण जगत् दुःखमय है जगत् रूप होने से श्रात्मा भी दुःखमय है इसलिये सब कुछ दुःख ही दुःख है । इस दुःख " के क्षणिक अभाव को ही सुखनाम दिया गया है वास्तव में सुख कहकर कोई वस्तु नहीं है । इस पर दूसरा सिद्धांत मत है कि ग्रात्मा कर्ममय न होकर ज्ञानमय है, श्रीर विनश्वर न होकर अविनाशी है जैसा कि ऋषियों ने कहा है-" अविनाशी वा अरे अपमात्मा अनुच्छितिधर्म्मा " अर्थात् यह आत्मा अविनाशी है और इसका मूल से उच्छेद ( उखड़ना ) नहीं होता । इसका कारण यह है कि यदि यह कर्ममय होता तो मानों कि जिस समय यह कुछ न था तो एक इस आत्मा की उत्पत्ति की क्रिया का उद्भूत होना असंभव होगा । क्रिया जो स्वयं असतुरूप है त्रिक्षण ४३० ]

पृष्ठ 463

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 463 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * स्थायी है उसकी उत्पत्ति और अनेक क्रियाओं का सन्तान ( सिलसिला ) और उन अनेक क्रियाओं का सन्तान और उन अनेक क्रियाओं का परस्पर सम्बन्ध जो दीखता है वह बिना एक सत आधार के हो नहीं सकता । इसलिये एक एक क्षरण में बदलती हुई ग्रनन्तानन्त क्रियाओं का आधार भूत कोई क्रिया से पृथक् वस्तु अवश्य ही माननी होगी वह क्रिया से भिन्न है । इसलिये क्रिया की अपेक्षा भिन्न धर्म रखता है अर्थात् क्रिया अनेक हैं वह एक है, किया विनश्वर है वह अविनाशी है, क्रिया में सत्ता नहीं है वह सत्ता रूप है, क्रिया दुःखमय हैं वह ग्रानन्द स्वरूप है, क्रिया क्षणिक है वह शाश्वतिक है, वह क्षुब्ध है यह शांत है इन्हीं भेदों के कारण जगत् में स्थिति और परिवर्तन दोनों प्रत्येक वस्तु में साथ प्रतीत होते हैं । यदि क्रिया से भिन्न धर्म वाली कोई वस्तु सर्वथा न होती तो जगत् की प्रत्येक वस्तु में स्थिति और गति ये दोनों भेद कदापि प्रतीत न होते इसलिये ग्रात्मा क्रिया से भिन्न होने के कारण प्रक्रिय ज्ञान रूप है और क्रिया दुःख रूप है, इसलिये वह ग्रात्मा प्रानन्दरूप है । इसलिये ग्रात्मा का निर्वाण हो नहीं सकता । श्रात्मा परम कल्याण रूप अस्तित्ववान् है, कर्मों का भी निर्वाण न होकर केवल उसी अविनाशी आत्मा में ही लय हो जाता है । लय हो जाने पर बिना कर्म का केवल एक ग्रात्मा ही शेष रह जाता है, इसलिये उस मुक्ति अवस्था को नैष्कर्म्य या कैवल्य के नाम से ही व्यवहार करना चाहिए न कि निर्वाणपद से और वह कैवल्य दो ही प्रकार का है, सम्पत्ति कैवल्य श्रीर अपवर्ग कैवल्य इस मुक्ति के निमित्त यज्ञ करना भी आवश्यक है । कैवल्यआत्मा ज्ञानानन्द स्वरूप है इसलिये इसी एक ब्रह्म में सब कर्मों का निर्वारण होता है इसलिये इस कैवल्य को ब्रह्म निर्वाण भी कह सकते हैं । ( ५-- समवलय ) पहले तप तीन प्रकार से कहा गया है- कर्मयोग से, भक्ति योग से और ज्ञानयोग से । इनमें कर्म-योग से नरक ग्रौर स्वर्ग इन दोनों भोगों के अतिरिक्त अग्निचयन यज्ञ आदि विशिष्ट कर्मयोग से मुक्ति भी मिलती है, इस मुक्ति को प्राकाम्य मुक्ति कहते हैं और भक्तियोग से केवल प्राकाम्य मुक्ति ही मुख्य करके मिलती है और किसी प्रकार की मुक्ति इससे नहीं मिलती, किन्तु तीसरे ज्ञानयोग से शेष ४ प्रकार की मुक्तियां प्राप्त होती हैं । जिनमें ब्राह्मणों के मतानुसार २ प्रकार की तो कैवल्य मुक्ति है -भूमोदर्क और क्षीणोदर्क श्रौर तीसरी समवलय मुक्ति है । श्रमणकों के मतानुसार चौथी मुक्ति निर्वाण है इस प्रकार ५ तरह की मुक्ति सिद्ध है, जिनमें चार का तो वर्णन हो चुका है व पांचवा समवलय का वर्णन इस प्रकार है— इस शरीराभिमानी प्राण को ही आत्मा कहते हैं । यह आत्मा मुख्य करके चार संस्थाओं में बंटा है | चिदात्मा, विज्ञानग्रात्मा, महान् आत्मा और भुतात्मा- इनमें शास्त्र का तात्पर्य मुख्य करके दो श्रात्मानों से है | चिदात्मा और भूतात्मा से क्योंकि ऊपर की तीन आत्मायें भूतात्मा से मिले रहने के कारण जब भूतात्मा पृथ्वी से सम्बन्ध रखता है, तब तीनों आत्मायें पृथ्वी में बद्ध रहती हैं, किन्तु शरीर के द्वारा पृथ्वी का बन्धन टूटने पर चिदात्मा के ही ग्राकर्षण से उसी की ओर नीचे की तीनों आत्मायें श्राक्कृष्ट हो जाती है । इनमें भूतात्मा का उन तीनों आत्माओं के स्थान में जाना ही भूतात्मा की गति है । [ ४३१ ]

पृष्ठ 464

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 464 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ॐ ब्रह्मविज्ञान के किन्तु भूतात्मा महान् के सम्बन्ध से सूर्य में जा सकता है, किन्तु जब तक यह भूतात्मा पृथ्वी का भूतरस, चन्द्रमा का सोमरस और सूर्य का अग्निरस इन तीनों प्राणों से मुक्त न होवें तब तक यह भूतात्मा चिदात्मा के लोक में नहीं जा सकता । उन तीनों रसों की मुक्ति का प्रतिबन्धक अथवा उन तीनों रसों से बन्धन कराने वाला ग्रथवा यों कहिये कि भूतात्मा को भूतात्मा बनानेवाला या कायम रखने वाला जो इसमें धर्म है वह “ काम ” के नाम से कहा जाता है । काममय होना ही इस ग्रात्मा में भूतात्मापता है ग्रथवा यों समझना चाहिए कि चिदात्मा ही असंख्य कामनाओं के ग्रावरण से ढका हुआ होकर भूतात्मा कहलाता है कामनाओं ही के श्राकर्षण से पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य यादि अनेकानेक लोकों की ओर खिचाव होने के कारण यह शुद्ध चिदात्मा के लोक में नहीं जा सकता, इसलिए जब तक यह ग्रात्मा सकाम रहेगा तब तक इसकी परामुक्ति नहीं हो सकती, परन्तु इस कामना की निवृत्ति केवल विद्या से ही हो सकती है । यह विद्या लोकान्तर में आत्मा की गति होने पर धीरे - धीरे कर्म भोगों के द्वारा क्षीण होने पर हो सकती है, अथवा अनेक जन्मों के सदाचार के द्वारा ग्रन्तःकरण धीरे - धीरे शुद्ध होते - होते इस पृथ्वी पर केवल प्रारब्ध कर्म के द्वारा जन्म लेने पर उस कर्म के भोग के अन्त में ग्रात्मा नैष्कर्म्य होकर ज्ञानस्वरूप वन जाता है । कहने का तात्पर्य यह है कि विद्या की प्राप्ति एकाएक नहीं हो सकती धीरे -२ कर्मों की निवृत्ति होते-होते किसी समय नैष्कर्म्यं प्राप्ति कदाचित् सूर्यादि लोकान्तर में गति होने पर वहां भी हो सकती है और कदाचित् पृथ्वीपर भी हो सकती है । इन दोनों ग्रवस्थाओं में यदि स्वर्ग भोग के अन्त में ग्रथवा प्राकाम्य मुक्ति का समय यदि नैष्कर्म्य के द्वारा ज्ञानोदय होकर ग्रात्मा निष्काम हो जावें तो उसे सद्योमुक्ति कहते हैं । इसी सद्योमुक्ति को * समवलय मुक्ति कहते हैं । यह मुक्ति जीवन मुक्तों की होती है । इस मुक्ति में प्राणी का शरीर छोड़ने के ग्रनन्तर लोकान्तर में जाने के लिए प्राण का उत्क्रमण नहीं होता । सर्वत्र व्यापक चिदात्मा में भूतात्मा वाली चिदात्मा लीन होकर एक हो जाती है । उत्क्रमण अर्थात् गति का निमित्त आत्मा में काम, शुक्र और अविद्या हैं | व्यापक चिदात्मा ही काम, शुक्र, श्रविद्या के द्वारा परि-च्छिन्न होकर गति के योग्य होता है । किन्तु इन कामादि तीनों के नाश होने पर वह् चिदात्मा पूर्ववत् अपने रूप में ग्रा जाता है, और अपरिच्छिन्न व्यापक रूप में थाने से उसकी गति नहीं होती । यह गति न होना या निरावरण निरञ्जन होना यही श्रात्मा के समवलय मुक्ति का लक्षण है । ऐसा ही उपनिषद्

में कहा है-यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते, कामा येऽस्य हृदिस्थिताः ।

अथ मर्त्योऽमृत्यो भवति, अत्र ब्रह्म समश्नुते ॥

अर्थात् जब सब कामनायें दूर हो जाती हैं जो कि इस प्राणी के हृदय में जमी हुई हैं तो उस दशा में यह मर्त्य अर्थात् मरण - धर्मा जीव अमृत अर्थात् जन्म, मृत्यु बन्धन से रहित हो जाता है और यहां ही ब्रह्ममय व्याप्त हो जाता है । * समवलय = सम - एक, अव वरा, लय होना । [ ४३२ ]

पृष्ठ 465

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 465 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * दान आत्मा अपनी व्याप्ति के द्वारा अपनी संस्था को पञ्चपर्वा वित्त । इनमें जाया और प्रजा तो अन्तरङ्ग हैं और पशु, वित्त, बहिरङ्ग बनाता हैं है ॥ इन ग्रात्मा, जाया, प्रजा, पशु, अङ्गहीन ग्रात्मा अपूर्ण रहता है, इसीलिए इन चारों श्रङ्गों को आत्मीय ( श्रात्मा सम्बन्धी दोनों ग्रङ्गों के विना श्रीर श्रात्मा भी कहते हैं । मुख्य श्रात्मा की इन चारों पर ममता रहती है, इससे ये चारों ) ग्रात्मीय भी कहते हैं हैं । किन्तु इन चारों के बिना ग्रात्मा भी अपूर्ण रहती है इसलिए ये पांचों एक साथ रहकर एक ग्रात्मा की संस्था बनती है | आत्मा की तीन संस्थायें होती हैं- प्रन्तरङ्ग, बहिरङ्ग, साधारण, प्रत्येक संस्था पञ्चांग है - ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, ग्रग्नि, सोम ये पांच दैवत्व अन्तरङ्ग संस्था हैं आत्मा, जाया, प्रजा, पशु, वित्त ये पञ्चगर्ना वह्निङ्ग संस्था है और आत्मा, कुटुम्ब, समाज, जाति श्रीर विश्व ये साधारण संस्था हैं । मुख्य ग्रात्मा का इन चारों ग्रात्मीयों पर एक सम्बन्ध सूत्र नियत रहता है और वह प्राणमय है-यह तीन प्रकार का है । भर्ग, मह और यश हमारी आत्मा में जितना आग्नेय भाग है वह सब भर्गप्राण है में और सब वायव्य मह प्राण है और सव सौम्य यशः प्राण हैं । चौथा आदित्य प्राण भी प्राग्नेय प्राण ग्रन्तर्गत है इसलिए तीन ही के हैं । इन सब प्राणों को हमारे शरीर में क्षर जाति के सब प्रारण प्रकार दैवप्राण कहते हैं ग्रहों के या नक्षत्र राशियों के सम्बन्ध से । ज्योतिष शास्त्रानुसार सूर्य, चन्द्र आदि जो आत्मा परिणत होती है । पर कुछ विशेषता होती है वह इन्हीं तीनों प्राणों के रूप में हैं उसका भी शुभ इनके अतिरिक्त जो कुछ हम ज्ञान पूर्वक अथवा अज्ञानता से शुभ अशुभ कर्म धर्म करते है इस प्रकार देव अशुभ श्रतिशय ग्रात्मा में उत्पन्न हुआ करता है वह भी हमारी आत्मा का और कर्म है नाना प्रकार का हो जाता है । इन दोनों धर्मों को लिए हुए हमारा महा प्रारण जो वायु रूप || देव श्रतिशय कस्तूरी केसर और चन्दन, कमल, और कर्म अतिशय के परिवर्तन के अनुसार जैसे कर्पूर,, देव संस्कार चम्पक आदि गन्धों होता है, उसी भांति के सम्बन्ध से वायु भिन्न - भिन्न प्रकार का अनुभूत से निकलता है और या कर्म के शरीर संस्कार के सम्बन्ध से महवयु भी भिन्न - भिन्न होकर मुख्य आत्मा जानता उन चारों आत्मा जानता हो या न ग्रङों में जिनमें आत्मा का ममत्व रूप स्वत्व है, चाहे उन्हें के साथ हो केवल और उसी प्राण सूत्र के द्वारा आत्मा स्वत्वमात्र से उन पर महवयु का संसर्ग होता है तो, वे चारों संस्कार या कर्म संस्कार उत्तम श्रङ्ग संबद्ध रहते हैं ऐसी स्थिति में यदि आत्मा का देव तो वे चारों प्रङ्ग भी उस ग्रात्मा निकृष्ट हैं के चारों में व्याप्त होंगे अथवा निकृष्ट अङ्ग उसके उत्तम प्राण होंगे जैसा कि महाभारत के राजनीति प्रसंग में कहा है-समे समाः । राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः तथा प्रजाः ॥ राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा से प्रजा भी समान होने से पापात्मा, और अर्थात् राजा के धर्मात्मा होने से धर्मात्मा, पापी होने होती है । सम होती होता है वैसी प्रजा है । प्रजा राजा का अनुकरण करती है जैसा राजा [ ४३३ ]

पृष्ठ 466

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 466 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान जिस प्रकार सूर्य विम्ब पर मेघ का प्रावरण होने से पृथ्वी पर सूर्य प्रकाश में भी छाया का ग्राव-रण हो जाता है उसी प्रकार मुख्य आत्मा में भी शुभ या अशुभ जैसा संस्कार उत्तम होता है उसका असर उन सब अङ्गों पर जिनमें आत्मा की किरण पड़ती है तत्काल ही अवश्य संक्रान्त ( व्याप्त ) हो जाता है क्योंकि पांचों मिलकर एक ग्रात्मा का स्वरूप सिद्ध है, इसलिये मुख्य ग्रात्मा पर उत्पन्न हुआ संस्कार उन पांचों पर एक साथ ही व्याप्त होकर स्थिर रहता है । ग्रात्मा के इन पांचों पर्वों में से दो बहिरङ्ग अङ्गों का दान किया जा सकता है, क्योंकि वे दोनों विचाली हैं, परिवर्तनशील हैं । इनकी न्यूनाधिकता से ग्रात्मा की अधिक क्षति नहीं होती, किन्तु दोनों अन्तरङ्ग अङ्गों का या मुख्य श्रात्मा का दान करना निषिद्ध है ये तीनों श्रदेय नहीं देने योग्य ) माने जाते हैं । इनका देना धर्म नहीं किन्तु ग्रापत्तिकाल में इन तीनों को भी दे सकते हैं, किन्तु वह् आपद धर्म कहकर धर्म का पृथग् विभाग है । सहसा इन तीनों को कदापि नहीं देना चाहिये किन्तु दोनों बहिरङ्गों में से जितना अधिक दान किया जाय उतना अच्छा है । इन दोनों बहिरङ्गों के दान से देने वाले और लेने वाले इन दोनों की आत्माओं में अर्थात् प्राण में परिवर्तन होता है । देने वाले का धर्म जितना उन बहिरङ्गों में व्याप्त रहता है वह दान के द्वारा लेने वाले में संक्रान्त हो जाता है और देनेवाले का उतना धर्म कम हो जाता है । उसको यों समझना चाहिये कि किसी स्थान पर गदला पानी गिर पड़ा हो और उसको साफ करना हो तो एक कपड़े का टुकड़ा लेकर गदले पानी में भिगो भिगो कर एक बार या अनेकवार बाहर निचोड़ा जावे तो वह स्थान शुद्ध हो सकता है । इसी प्रकार किसी दान पात्र से अपने द्रव्यों का सम्बन्ध कराकर अपने धर्मों की निवृत्ति करके अपनी ग्रात्मा को शुद्ध कर सकते हैं । इस दान से तीन विषयों का संक्रमण या परिवर्तन होता है । १ प्रकृति, २ ग्रहष्ट या दैव, ३ कर्म यदि कोई व्यक्ति शान्त प्रकृति होने पर भी किसी क्रोधी, तामसी, दुराचारीप्रकृति के घर का अन्न नियम से भोजन करे तो क्रम क्रम कुछ कुछ परिवर्तन होते - होते उस भोजन करने वाले की प्रकृति अश्न देने वाले की प्रकृति से मिल जायगी याने सदृश हो जायगी । इसी प्रकार शान्त ग्रात्मा का ग्रन्न खाने से क्रोध प्रकृति का मनुष्य भी कुछ काल में शान्त प्रकृति हो सकता है । यह प्रकृति परिवर्तन हुआ । इसी प्रकार यदि किसी का दिन चक्र ( जीवनदशा ) या दुर्दैव या दुग्दृष्ट के कारण अधम हो, दुःखदाई हो तो उसके दान करने से उसका दुर्दैव या दुरदृष्ट लेने वाले में अवश्य संक्रान्त होगा और उससे दाता में उस दुर्देव की कमी होगी । जितनी मात्रा में दुर्दैव ज्योतिष शास्त्र के द्वारा निश्चित हो, न्यूनाधिक उतनी ही मात्रा का दान करने से सब दुर्दैव निवृत्त हो सकता है | किन्तु दुर्दैव की मात्रा से कम दान करने पर सब दुर्देव की निवृत्ति न होने पर भी दान मात्रा के अनुसार निवृत्ति अवश्य होगी, यह प्राकृत नियम है । इसी प्रकार पाप या पुण्य करने वाली ग्रात्मा का कर्म जन्य अतिशय दान लेनेवाले में जाता है । पापी का दान लेने से लेने वाला पाप का भागी होगा किन्तु दाता के पाप की निवृत्ति होगी । [ ४३४ ]

पृष्ठ 467

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 467 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान यह वस्तु भी जाननी चाहिये कि यदि प्रति उपकार बदले में कुछ मिलने की दृष्टि से किसी जान पहचान के आदमी को दान दिया जाय तो दाता के ग्रात्मा में से दैव या कर्म की निवृत्ति नहीं होती । जिस वस्तु के पाने के अभिप्राय से दान दिया गया हो तो दिये हुये द्रव्य के बदले में उसी अभिप्रेत ( इच्छित ) वस्तु पर दाता का दुरदृष्ट या कर्म अवलम्बित होकर रह जाता है । इसी तरह यश या कीर्ति के अभिप्राय से दान देना भी निष्फल होता है गुप्तदान की महिमा इसीलिये अधिक है, क्योंकि उसके बदले में कोई चीज नहीं चाही जाती । एक बात और जाननी चाहिये कि दाता अपने ग्रदृष्ट या कर्म जिसकी निवृत्ति के लिये दान देना चाहता है, उस पाप की कमी लेनेवाले में अवश्य ही होनी चाहिये । क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि पानी भरे हुए खड्ढे में पानी नहीं जा सकता खाली खड्डे में जाता है । इसलिये यदि दाता अपनी पाप निवृत्ति के लिये दानं करे तो उसको पवित्र, सदाचारी, पुण्यात्मा विद्वान् ब्राह्मण जो अग्नि स्वरूपं हैं या जो प्राये हुए पाप को अग्नि के सदृश्य दाह करने में समर्थ है ऐसा सर्वाङ्ग सम्पन्न दान पात्र ढूंढना चाहिये क्योंकि उस ग्रात्मा में उसके शरीर का निर्माण ( बनावट ) और विद्या आदि सद्गुणों के द्वारा पुण्यात्मा होना या पाप की कमी होना निश्चित् है । इसलिये उसमें दान देने से उसमें पाप बहुत शीघ्र संक्रान्त हो सकता है । किन्तु अङ्गहीन मूर्ख, दुराचारी आदि निकृष्ट पात्र जिनमें पहले ही से पाप भरा उसको दान देना निष्फल होगा । इसलिये इस दान के द्वारा जहां तक सम्भव हो यदि पापों को निः-शेष निवृत्त कर सकें तो उससे नरक भोग की निवृत्ति हो सकती है यही दान का फल है, और यदि पाप न रहने पर भी हम दान करें तो उसमें लेने वाले का पुण्य दाता में आकर सश्चित होता है । इससे उसके पुण्य को लेकर स्वर्ग भोग भी प्राप्त कर सकते हैं और यदि निरन्तर सब प्रकार के दान करते करते हम अपने पुण्य पाप दोनों को निःशेष निवृत्त करदें केवल प्राकृत कर्म ही हम में शेष रह जावे तो सम्भव है कि इस दान से ब्रह्मलोक की प्राकाम्य मुक्ति भी मिल सकती है । यहां प्रश्न हो सकता है कि—

न कर्मणा न प्रजया धनेन, त्यागे नैके अमृतत्व मानषुः ।

परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति ॥

अर्थात् न कर्म से, न सन्तान से, न धन से, न दान से ग्रमृतत्व याने मोक्ष मिल सकता है सातवां देवस्वर्ग जो नाक कहलाता है उससे भी परे छिपी हुई जगह में जो ज्योतिष: स्वरूप विराजमान है उसमें यति ( ग्रात्मदर्शी ) लोग ही प्रवेश करते हैं । इस वेद वचन के अनुसार दान से मुक्ति का न मिलना कहा गया है, फिर यहां दान से ब्रह्मलोक मोक्ष मिलने प्राप्ति कहना अनुचित है । तो इसका समाधान यह होगा कि यह वेद वाक्य साक्षात् दान का निषेध करता है | किन्तु विशेष प्रकार के दान से श्रात्मा और अन्तः करण विशुद्ध होकर ज्ञान का उदय हो जाता है । इसलिये परम्परा से दान के द्वारा भी अवर मुक्ति मिल सकती है । इसके अतिरिक्त यहां यह भी जानना चाहिये कि दान अनन्त प्रकार के होने पर भी विशेषतया तीन प्रकार का है । द्रव्यदान, अभयदान और विद्या दान – इनमें द्रव्यदान का विषय ऊपर कहा जा चुका है । उसमें भूमिदान, ग्रन्न - वस्त्र दान, पशु दान, स्वर्णादि धन दान ये सब शामिल हैं इनसे भी अधिक [ ४३५ ]

पृष्ठ 468

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 468 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ॐ ब्रह्मविज्ञान 8 मात्रा में दान होने पर ऊपर कहे अनुसार परम्परा से कदाचित् ज्ञान उत्पन्न हो जावे तो ग्रवर मुक्ति मिल सकती है किन्तु इन सब द्रव्यदानों की अपेक्षा ऊँची कक्षा का दान प्रभय दान है, जिसको प्राण दान भी कहते हैं । जिसका वध होना उपस्थित हो या शत्रु सङ्कट से मृत्यु के समान कप्ट उपस्थित हो या किसी प्रकार का प्रातक प्रारण बाधा का भय हो तो उस समय प्राण विह्वल हो उठता है और विह्वलित होकर अपना स्थान छोड़ने लगता है तो उस समय अभयदान देना जीवन दान है इस के द्वारा भी दाता की आत्मा का बल बहुत बढ़ जाता है, इसका अर्थ यह है कि दाता की आत्मा में इन्द्र की सत्ता अधिक-मात्रा में आ जाती है जिसके प्रभाव से दाता का ग्रात्मा यज्ञ वल के अनुसार नियमतः स्वर्ग लोक में जाता है । इसी प्रकार इस प्राण दान की अपेक्षा भी उँची कक्षा का विद्यादान है, जिससे ग्रात्मा के मूल स्वरूप विद्या की वृद्धि होती है, इससे आत्मा वनती है क्योंकि ग्रात्मा ज्ञान मय है । ज्ञान की वृद्धि के द्वारा ग्रात्मा की वृद्धि होती जाती है और सब अन्य दान आत्मा के ग्रङ्गों का दान है । किन्तु विद्या से मुख्य अङ्गी का दान होता है इससे दाता की आत्मा विशुद्ध होकर मुक्ति के योग्य अवश्य हो जाती है । ऐसे दाता आत्मा को भी यति कह सकते हैं । इसलिये उस ग्रात्मा को भी नाक लोक से परे विराज मान ज्योतिः स्वरूप श्री भगवान् सच्चिदानन्द ईश्वर अवश्य प्राप्त हो सकता है । विद्या दान, कन्यादान, शालिग्राम का दान, गोदान, भूमि दान ये पांच दान दाता और दान पात्र दोनों का कल्याण करते हैं । ( उपसंहार ) इस प्रकार सिद्ध हो गया कि यज्ञ तप और दान देवआत्मा की शक्ति बढ़ाकर उसे सूयं मण्डल में जाने का अवसर देते हैं इससे उसे अपने कारण में पहुंचकर लीन हो जाने का सौभाग्य मिलता है । यों भिन्न - भिन्न आत्मा और उनकी भिन्न गतियों का संक्षिप्त निरूपण किया गया । वस्तुतः आत्मा के पृथक् भाव रूप बन्धन मुक्त होकर अपना परम भाव प्राप्त करने में मन ही मुख्य कारण है । इसलिये शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि-न देहो न च जीवात्मा, नेन्द्रियाणि परन्तप । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः ॥ अर्थात् बन्धन और मोक्ष का कारण न केवल देह है ( क्योंकि वह तो पीछे बनता है ) न शुद्ध जीव ग्रात्मा है ( क्योंकि बिना ग्रागन्तुक सम्बन्ध के शुद्ध ग्रात्मा में विकार ही क्यों होता ) न इन्द्रियां ही स्वतन्त्र रूपसे बन्धन मोक्ष का कारण हो सकती हैं ( क्योंकि देहकी तरह वे भी पीछे उत्पन्न होने वाली हैं इसलिये मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का मुख्य कारण मन ही है । जैसा कि पूर्व निरूपण प्रक्रिया में स्पष्ट हो चुका है । समाप्तम् [ [ ४३६ ]