ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 451–460

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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ब्रह्मविज्ञान * १ ब्रह्मरन्ध्र - मुक्ति पितृस्वर्ग | २ कंठ- देवस्वर्ग ३ - हृदय- पितृस्वर्ग 6 ३ नरक ४ पिल्लू स्वर्ग बाग्रन्थिनरक ] [ ४१६

पृष्ठ 452

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* ब्रह्मविज्ञान क जाते हैं । इस प्रकार रुख एक होने पर भी देवयान के चारों मार्ग हृदय से ही भिन्न भिन्न अपना रुख रखते हैं | हृदय से सीधे ब्रह्मरन्ध्र की ओर जो एक नाड़ी गई है वही ब्रह्मपथ के विद्यामार्ग का प्रथम पर्व है | ब्रह्मरन्ध्र से ग्रचि, अहः, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, पूर्ण सम्वत्सर इन सबका प्रसङ्ग रूप से स्पर्श करता हुआ चन्द्रमा में होकर एकदम एक निमिषकाल के भी अत्यन्त सूक्ष्मकाल में सूर्य में जाता हूँ । किन्तु चिति मार्ग वाले ब्रह्मपथ में ग्रचि आदि सब स्थानों में कुछ विहार करता हुआ विलम्ब से सूर्य में जाता है । शरीर में उसके ब्रह्मरन्ध्र वाली मुख्य नाड़ी न होकर मस्तक की ओर जाने वाली और नाड़ियां हैं । इसलिये हृदय से मस्तक तक प्रथम पर्व, मस्तक से चन्द्रमा तक दूसरा पर्व, चन्द्रमा से सूर्य की ग्राहव-नया यतन प्रर्थात् २१ वें स्तोम तक तीसरा पर्व और एकविंश से ३३ वें स्तोम तक काम प्रलोक है, यह चौथा पर्व है | यही चौथा पर्व इस चितिमार्ग का वास्तविक गन्तव्य लोक है । इस प्रकार ब्रह्मपथ दोनों दिखाये गये अब इनसे नीचे दो देवपथ हैं । इनमें यज्ञमार्ग की भूमिका तीन हैं - हृदय से चक्षु तक, चक्षु से चन्द्रमा तक, चन्द्रमा से एकविस्तोम तक । इस मार्ग में तीसरा पर्व ही गन्तव्य लोक है, यह मार्ग यहाँ ही पूर्ण होता है । एक विशस्तोम से आगे नहीं जाता और निरग्निकों के पुण्यमार्ग की भी तीन ही भूमिका हो सकती है हृदय से ऊपर की नाड़ी और वहां से चन्द्रमा तक दूसरा पर्व और चन्द्रमा से पूर्ण सम्बत्सर तक तीसरा पर्व | इस प्रकार कुछ कुछ भेद रखते हुए चारों देवयानों की मार्ग प्रणाली सूर्य की ओोर ही जाती हुई सिद्ध होती है । पृथ्वी से सूर्य की ओर जाते हुए देवयानमार्ग का अनुक्रम सूर्य के आगे बदल जाता है । अर्थात् सूर्य से ध्रुव की ओर जाकर काम प्रलोक में जाता है । इस प्रकार चारों देवयान मार्गों के हृदय से गन्तव्य स्थान तक भिन्न - भिन्न चार शाखा जाननी चाहिये । श्रगति में नरक गति के अनुसार प्राणोत्क्रमण हृदय से नीचे वाली नाड़ियों से होकर प्रथम पर्व पूरा करता है और शरीर से भूवायु के १२ योजन ऊपर तक दूसरा पर्व पूरा करता है, यही दूसरा पर्व उसका गन्तव्यस्थान है । वह आत्मा भूवायु में ही इतस्ततः चक्कर लगाया करता है । अब सबसे उत्तम परमगति श्रर्थात् समवलय गति में मार्ग के एक भी पर्व नहीं है और न कोई मार्ग है और न मार्ग में गति है | जहां ग्रात्मा इस समय बिद्यमान है वहां पर ही जो प्रथम परिच्छिन्न होकर हृदय में रहने वाला कहा जाता था, वही ग्रपने हृदय की सीमा या शरीर की सीमा या अविद्या कर्मों का प्रावरण इत्यादि सभी परिच्छेदों को निर्मूल तोड़कर कहीं भी गति न करके अपने स्थान पर ही व्यापक चिदात्मारूप हो जाता है । जो पूर्व में हृदय मात्र ब्यावी था वही अब असीम होकर सर्व जगत् व्यापी हो जाता है यही आठों गतियों का सार है । तप मुक्तियां पांच प्रकार की हैं - १ - प्राकाम्य, २ - सम्पत्तिकैवल्य ( कार्य का अपने रूप में आना ) ३– अपवर्गकैवल्य, ४ – निर्वाण ( ब्रह्मनिर्वारण ), ५ – समवलय । ( १ - प्राकाम्य ) प्राकाम्यमुक्ति में कामनायें होकर पूरी होती रहती हैं और स्पति, वरुण, इन्द्र और सच्चिदानन्द ( प्रजापति ) तक सब " कामप्रलोक सूर्य " से कहलाते प्रारम्भ हैं करके । इनमें विद्युत जाकर , ब्रह्मणः वहां [ ४२० ]

पृष्ठ 453

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* ब्रह्मविज्ञान के भांगों को प्राप्त करना ही प्राकाम्यमुक्ति है । इस मुक्ति में लोकों की स्थिति पिण्डमय है । पृथ्वी चन्द्र के अनुमार सूर्य, वरुण आदि लोक भी पिण्डरूप हैं । उनमें भी सुख दुःख भोगने पड़ते हैं और भोगने वाली श्रात्मा में जिस प्रकार यहां पुद्गल ( शरीर ) का सम्बन्ध है, उसी प्रकार वहां भी है । विशेषता यह है कि पृथ्वी का रस नहीं रहता और पृथ्वी पर किये हुए कर्मों के बन्धन नष्ट हो जाते हैं किन्तु उस आत्मा का शरीर परिच्छिन्न बना रहता है, हृदय और इन्द्रियां बनी रहती है, सुख दुःख की वासनायें बनी रहती है और स्वाभाविक कर्मों की स्थिति बनी रहती हैं । इतना होने पर भी । इसलिये उसको कामप्रलोक मुक्ति इसलिये में कहते हैं कि सूर्य के स्कम्भ में जाने पर पृथ्वी का रस श्रात्मा में शेष नहीं रहता गयी हुई ग्रात्मा लौटकर पुनर्वार पृथ्वी में नहीं प्राती । - मुक्ति में आत्मा अपने यहां प्रश्न होता है कि आत्मा की दो अवस्थायें हैं भुक्ति और मुक्ति अनुकूल या प्रतिकूल रूप बाहर से श्राये हुए धर्मों के प्रभाव से जो कुछ परिवर्तन होता है उसको हैं । अपने किन्तु में मुक्ति में इसके विपरीत से अनुभव करती है । इस अनुभव करने न गया लेकर मुक्ति अपने कहते धर्म को भी छोड़ता है । कर्म या संस्कार होता है अर्थात् बाहर से किसी धर्म को अपने में गये हों उनके छोड़ने को ही मोक्ष या ग्रन्तरङ्ग धर्म में संलग्न ( ग्रासक्त ) हो या वहिरङ्ग जितने आत्मा । 1 या मुक्ति कहते हैं ऐसी स्थिति में प्राकाम्य मुक्त को मुक्ति नहीं कहना चाहिये का सभी अन्तरङ्ग बहिरङ्ग कर्म और उनकी वासनाओं निर्मूल उत्तर यह है कि प्राकाम्य मुक्ति त्याग में है यद्यपि । तथापि पृथ्वीलोक में किए हुए कर्मों का संस्कार निर्मूलत्याग नहीं है, न अविद्या का विशेता यह है कि इस मुक्ति में सुख की भुक् नष्ट हो हैं । केवल इसमें से जाता है, इसलिए मुक्ति कह सकते होती हैं वे देश और काल भी संयुक्त है नीचे के सब लोकों में जितनी भुक्तियां हैं । परन्तु कामप्रलोक से कभी समाप्त हो जाती , और न परिच्छिन्न होने से मात्रा परिच्छिन्न है और कभी रहती है इसी से इस सान्त हैं अर्थात् और अनन्त काल तक काम प्रलोक यथेच्छ होती हे की मुक्ति नियमानुसार न होकर का फल मुक्ति को मुक्ति कहते हैं । हुआ करती है, अर्थात् उन तीनों से ये दोनों अवस्थायें उत्पन्न यज्ञ, तप, दान इन तीनों भिन्न प्रकार के वे तीनों भिन्न -मुक्ति के लिये नहीं | यह भुक्ति श्री मुक्ति दोनों हया करती हैं । किन्तु भुक्ति और मुक्ति देने वाले यज्ञ से भुक्ति । होते हैं अर्थात् जिन यज्ञों से भुक्ति होती है उनसे मुक्ति नहीं और है और किसी यज्ञ से नहीं से ही होती कामप्रलोक की मुक्ति जिसे प्राकाम्य मूक्ति कहते हैं, वह चयनयज्ञ इस प्रकार यज्ञ से होने वाली भुक्ति या मुक्ति कही गई हैं । शरीर-है । तप का अर्थ होती है वह कही जाती मुक्ति जिस प्रकार अग्नि है अर्थात् शरीर अग्नि से तात्पर्य इनमें अब तप के द्वारा भुक्ति या प्राण, वाक् श्रग्नि से वैश्वानर गार्हपत्य और ग्राहवनीय हैं । मन, के क्षोभ अग्नि के मूल कारण आत्मा के तीन अवयव । इनमें प्राण का क्षोभ है चुका है कि को श्रम कहते हैं और । पूर्व प्रकरण में कहा जा के क्षोभ शरीर से निकल जाना और वाक व्यय मन के क्षोभ को इच्छा प्रारण के क्षोभ को तप गति उत्पन्न होकर तप में प्रारण का से तात्पर्य, आत्मा है उसकी तप कहते हैं । यह है कि शरीर में जो स्थिर होना इसे ही उसके समावेश स्थान पर किसी विशिष्ट प्राण का [ ४२१ ]

पृष्ठ 454

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* ब्रह्मविज्ञान अवश्य होता है । किन्तु यह प्रारण का व्यय तीन प्रकार से होता है, इसीलिए तप भी तीन ही प्रकार का है । कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग । इनमें कर्मयोग से अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग मुक्ति और भक्ति योग से अवरमुक्ति और ज्ञानयोग से परामुक्ति, इस प्रकार यज्ञ के अनुसार तप से मुक्ति और मुक्ति ये दोनों अव-स्थायें आत्मा की होती हैं । विशेषता यह है कि यज्ञ से स्वर्गभुक्ति ही हुआ करती है, नरकभुक्ति नहीं होती । किन्तु तप में कर्म के दोष से कभी - कभी आत्मा का पतन भी हो जाता है । तात्पर्य यह है कि कर्म दो प्रकार का है शुभ और अशुभ- यद्यपि विज्ञान में शुभ अशुभ कोई शब्द नहीं है, सब कर्मों को शुभ या अशुभ कह सकते हैं, तथापि आपेक्षिक भावनाओं को लेकर इन दोनों शब्दों का व्यवहार होता हैं | हम आगे चलकर भूतात्मा के स्वरूप का वर्णन करेंगे, उसमें पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य प्रादि कितने ही आकाश में दीखते हुए पिण्डों के भिन्न - भिन्न प्रकार के रस न्यूनाधिक रूप से इस आत्मा में प्रवेश निर्गम करते हैं । उन रसों में परस्पर विरोधी भी है और मैत्री भी है, इसलिए जो रस सूर्य रस के विरोधी हैं उनको अशुभ और जो सूर्य रस के मित्र हैं उनको शुभ कहते हैं । इस प्रकार के रस जिन - जिन कर्मों से आत्मा में ग्राते हैं उनको भी शुभ अशुभ कहते हैं । इनमें सूर्य रस के मित्र रसों को शुभ और विरोधी को अशुभ इसलिये कहते हैं कि हमारी ग्रात्मा में सूर्य रस की वृद्धि से श्रात्मा सूर्य की ओर जाती है, किन्तु उसके विरोधी रस ग्राने से सूर्य के विरुद्ध दक्षिण दिशा में आत्मा जाती है । यद्यपि ग्रात्मा में दोनों प्रकार के रस ग्राये हैं, तथापि जिन रसों की अधिकता होती है उबर ही ग्रात्मा का झुकाव हो जाता है | परन्तु मेरी आत्मा का मूल भाग सूर्य के रस से उत्पन्न है । इसलिए सूर्य की ओर जाने से उसे अधिक आनन्द मिलता है इसी से उसे शुभ कहते हैं और सूर्य के विरुद्ध दिशा में जाने से ग्रन्थकार के कारण दुःख होता है इसलिए उसको अशुभ कहते हैं । यही शुभ अशुभ की परिभाषा है । ग्रशुभ कर्मों को X प्रत्ययवाय या पतनीय पातक कहते हैं और शुभ कर्मो को अभ्युदय या पुण्य कहते हैं । यदि आत्मा कर्मयोग करता हुआ प्रज्ञापराध से प्रत्ययवाय कर्मों से योग करें तो आत्मा बन्धन में आ जाता है तो उससे उसका पतन होता है किन्तु शुभ कर्मों के योग से अभ्युदय या स्वर्ग होता है परन्तु यज्ञ में अनिष्ट या पतन नहीं होता । यद्यपि यहां प्रश्न होता है कि यज्ञ भी एक प्रकार का कर्म है श्रौर कर्मशुभ, अशुभ दोनों होते हैं । तो सम्भव है कि किसी अशुभ यज्ञ से प्रत्ययवाय हो जैसा + अभिचारि-कश्येन यज्ञ से प्रत्यवाय होना सांख्यवालों ने माना है और यज्ञ के विधान ठीक न होने से भी श्रनिष्ट होने की विधि ठीक न होने से यज्ञ निष्फल जाता है, किन्तु कोई अनिष्ट नहीं होता है और अभिचारक X प्रत्यवाय = प्रति, अव, श्रय पीछे नीचे जाना * अभ्युदय = अभि उत्, ग्रय । सामने ऊपर जाना + अभिचार = ( दूसरे का नुकसान ) [ ४२२ ]

पृष्ठ 455

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* ब्रह्मविज्ञान औ श्येनयज्ञ यद्यपि पाप कर्म अवश्य है तथापि उससे आत्मा का बन्धन नहीं होता । यज्ञ की प्रक्रिया की परीक्षा करके प्राचीन आचार्यों ने ऐसा ही माना है, जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है-" यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोयं कर्म बन्धनः " अर्थात् यज्ञ के कर्मों से अन्यत्र ( और कर्मों में ) कर्म का बन्धन ग्रात्मा में होता है, यज्ञ से नहीं । इसी से यज्ञ वेद में श्रेष्ठ कर्म और तप को द्वितीय कक्षा का कर्म कहा है । पांच प्रकार की मुक्तियों में से चयन यज्ञ के द्वारा सिद्ध होने वाली मुक्ति तो एक ही है जिसे प्राकाम्य मुक्ति कहते हैं । इस मुक्ति में चार मुक्ति सम्मिलित हैं । सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य । चयनयज्ञ की न्यूनाधिकता से अर्थात् सप्तविध चिति या एक शतविध चिति इत्यादिक क्रम से न्यूनाधिकता के कारण वे सब भिन्न २ मुक्तियां होती हैं । किन्तु ये ही मुक्तियां तप से भी हो सकती हैं । तप तीन प्रकार का कहा गया है । कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग । ( १– कर्मयोग, २ - भक्तियोग ) इनमें कर्म होने से केवल मुक्ति ही होती हैं मुक्ति नहीं होती । किन्तु मुक्ति दो प्रकार की है - स्वर्ग श्रर्थात् सुख भुक्ति और नरक अर्थात् दुःख मुक्ति । इसके पश्चात् भक्तियोग का कर्म है वह भी एक प्रकार का कर्मयोग है परन्तु उसमें ज्ञानयोग मिश्रित है । भक्तियोग का मुख्यतः तात्पर्य यह है कि यह जीवआत्मा ईश्वर का एक अङ्ग है, ईश्वर जो बहुत ही विस्तृत श्राकाश में व्याप्त होकर विराजमान है उसी के आत्म-भाग से क्षुद्र दो ग्रात्मायें उत्पन्न होकर पृथक् शरीर धारण करती है, किन्तु उनकी स्थिति ईश्वर की नासिका, कर्ण, चक्षु, हस्त, पाद आदि अङ्गों के अनुसार न होकर भ्रूण आदि कीटों के अनुसार होती है । इसलिये जीवों के जन्म मृत्यु, रोग शोक आदि विकार होने के कारण भी ईश्वर के शरीर में किसी त्रकार का विकार नहीं होता, तो ऐसी स्थिति में कहना होगा कि ईश्वर के शरीर में जीवात्मा की स्थिति के लिये कोई स्थान विशेष नहीं है, क्योंकि जीव आत्मा ईश्वर से उत्पन्न होने पर भी रस, रूप न होकर कीट ( जङ्ग ) रूप है, नियत रूप न होकर ग्रागन्तुक विकार है । इसलिये ईश्वर के शरीर में रहने पर भी ईश्वर के शरीर के साथ सम्बन्ध रखते हुए भी उसका विशेष सम्बन्ध नहीं हैं । विशेष सम्बन्ध न होने के कारण ही इस जीव ग्रात्मा में अविद्या, क्लेश, राग, द्वेष, पाप, पुण्य आदि कर्म, सुख दुःख आदि भोग इत्यादि नाना दोष उत्पन्न हो जाते हैं । ये सब दोष ईश्वर की आत्मा में कदापि नहीं थे इसलिये जीव-श्रात्मा को उचित है, कि इन दोषों को अपने में उत्पन्न न होने दे । इसका मुख्य उपाय एक ही है कि यह जीव ग्रपने को मलरूप न होकर ग्रपने को रस रूप बनावें, इसका भी उपाय ईश्वर शरीर के साथ विशेष सम्बन्ध नियत करना । वह् सम्बन्ध आगन्तुक रूप न होकर नित्यरूप से ईश्वर का अङ्ग बनना है । यह सम्बन्ध ईश्वर में मनोयोग से सम्भव है, किन्तु ईश्वर का शरीर बहुत विस्तृत और जीव का शरीर अति क्षुद्र होने के कारण सर्वात्मना व्याप्ति नहीं हो सकती । इसलिये ईश्वर के शरीर में किसी न किसी अङ्ग प्रत्यङ्ग भाग में हो मनोयोग करके अपने को उस ईश्वर अङ्ग की भक्ति बनाना होगा । इस प्रकार भक्ति [ ४२३ ]

पृष्ठ 456

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* ब्रह्मविज्ञान करने से यह जीवग्रात्मा ईश्वर के ग्रङ्ग का मुख्य भाग होकर उस ईश्वर शरीर का रस भागी बनता है और पृथक् श्रात्मा होकर भी ईश्वर का एक अङ्ग आत्मा बन जाता है, जिससे ईश्वर के ग्राठ गुण जो रस रूप से ईश्वर के शरीर में व्याप्त हैं, वह इस भक्त जीव ग्रात्मा में भी सच्चार करने लगता है । जिससे इस जीवप्रात्मा की ईश्वर के साथ सायुज्य सिद्ध होती है । जिसको एक प्रकार की मुक्ति कहते हैं, यही मुक्ति इस भक्ति क्रिया का फल है । इस मुक्ति के भी पूर्वरूप से वे ही तीन मुक्तियां सालोक्य, साम्य, सामीप्य सिद्ध होती हैं । इस सायुज्य मुक्ति में इस जीवात्मा के स्वर्ग या नरक भोग होने के साधन पुण्य या पाप कर्मों के संस्कार सव मुक्त हो जाते हैं, इसलिये भी उसको मुक्ति कहते हैं जैसा कि उपनिषद् में कहा है-यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूयनिरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ अर्थात् जब कि देखनेवाला देखता है सुनहरी रङ्ग को जिसने सम्पूर्ण संसार उत्पन्न किया जो ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला ईश्वर है । अथवा जिसकी प्राप्ति से ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है, उसका जब साक्षा-त्कार करता है तब पुण्य पापों को झाड़कर निर्मल होकर परम समानता को पा जाता है अर्थात् ईश्वर तुल्य हो जाता है । यद्यपि इस दिशा में आत्मा अपने पुण्य पापों से मुक्त हो जाता है, तथापि कितने ही प्राकृत कर्मों से मुक्त नहीं होता, इसलिये इसको कैवल्य मुक्ति नहीं कहते । इस समय आत्मा में जो कर्म विद्यमान हैं वे सब इस श्रात्मा के निज के किये हुए भोग साधन कर्म नहीं है, किन्तु ग्रनादि वासना से श्रीर अनादि काल से इस ग्रात्मा में संसृष्ट हैं जो अपने ग्राप इस आत्मा में लिङ्ग शरीर रूप से संयुक्त हैं, वह कैवल्यमुक्ति बिना मुक्त नहीं होता । इस कर्म के योग से यह श्रात्मा नाना कामनाओं को इच्छानुसार भोगता है अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य की कक्षा तक न्यूनातिशय का भाव बना रहता है इसलिये उन तीनों में लोकों नियत है और कामनाओं की पूर्ति की भी सीमा नियत है । कर्म की शक्ति के अनुसार ही लोकों में गति या कामनाओं की सिद्धि होती है । किन्तु सायुज्यमुक्ति होने पर वे सव कक्षायें या सीमायें टूटकर सच्चा प्राकाम्य हो जाता है अर्थात् फिर कामनाओं की अव्याहत ( बेरोक ) सिद्धियां होती हैं इसी को उपनिषद्

में कहा है-ये यं लोकं मनसा संविभाति, विशुद्ध सत्वः कामयते यांश्च कामान् ।

तं तं लोकं जायते तांश्च कामान्, तस्मात् ग्रात्मज्ञं ह्यर्चयेत भूतिकामः ॥

अर्थात् जिन - जिन लोकों को मनसे खयाल करता है और रजोगुण, तमोगुण के न रहने से केवल सत्वगुण वाला वह ग्रात्मा जिन - जिन कामनाओं को चाहता है उस उस लोक में और उन कामनाओं को प्राप्त करता है । इसलिये ग्रात्मज्ञान की प्रर्वा ( पूजा ) करनी चाहिये यदि सपना ग्रभ्युदय चाहें । इस प्रकार प्राकाम्य मुक्ति भक्ति योग तप कर्म योग, भक्तियोग, ज्ञानयोग इस प्रकार तप के से सिद्ध होती है यद्यपि सुगमता से समझने के लिये तीन भेद कहे गये हैं, किन्तु वास्तव में कर्म योग और [ ४२४ ]

पृष्ठ 457

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ज्ञानयोग ये दो ही नम के यज्ञ रूपी कर्म दो प्रकार का है, सावन न होकर मुक्ति साधन हैं । * ब्रह्मविज्ञान जानने चाहिये क्योंकि भक्ति भी ऊँचे दर्जे का एक कर्म ही है । जैसा कि एक मुक्ति साधन जिसे चयन यज्ञ कहते हैं और दूसरे सब यज्ञ मुक्ति इसी प्रकार तप में भी दो विभाग है एक ऐसा कर्म योग जिससे मुक्ति कहते हैं, किन्तु जिस कर्म से मुक्ति सिद्ध होती है उसे भक्ति योग भक्ति को कर्म से पृथक माना है । न होकर मुक्ति होती है उसे कर्म योग कहते हैं । मुक्ति होने के कारण ही इस ( ३- ज्ञानयोग ) ग्रव तप का तीसरा वेद ज्ञानयोग कहा जाता है, यह प्रथम कहा जा चुका है कि ग्रात्मा स्वयं विद्या रूप है । उसमें स्वयं उत्पन्न हुए बलकी चिति से ग्रविद्या क्लेश, कर्म आदि कषाय उत्पन्न होते हैं, इन्हीं के आवरण को कर्म कहते हैं । इस कर्म के द्वारा मुक्ति को आत्मा की सिद्धि कही गई है, किन्तु अब विद्या के द्वारा ग्रात्मा की स्थिति कही जाती है, किन्तु विद्या स्वयं आत्मा का स्वरूप है उसकी प्राप्ति ही को मुक्ति कहते हैं । इसलिये यह विद्या मुक्ति का द्वार नहीं हो सकती है, इसलिये गीता में कहा है कि-“ न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते " अर्थात् बिना कर्म किये सात्मा इन कर्मों से मुक्ति नहीं पा सकता है । इसलिये मुक्ति भी कर्म योग से ही सिद्ध होगी । तात्पर्य यह है कि कर्म दो प्रकार का है - एक विद्या रूपी श्रात्मा का प्रावरण करने वाला, उसको प्रवृत्तिकर्म कहते हैं और दूसरा कर्म आवरणों को दूर करने वाला होता है । जैसे जल में निर्मली डालने से जल का मैल दूर होता है, उसी प्रकार जिन कर्मों से विद्या रूपी ग्रात्मा के सब ग्रावरण या सब कर्म दूर हो जावें उस कर्म को ही ज्ञान योग कहते है । यहू कर्म निवृत्तिकर्म कहलाता है, और ये दो प्रकार का है - १ - भूमोदर्क, २ –क्षीगोदर्क | ( २ - संपत्ति कैवल्य ) ( भूमोदकं मुक्ति ) प्रत्येक प्राणी का शरीर तीन मात्रात्रों से बना हुआ पाया जाता है । प्रज्ञामात्र, प्राणमात्रा, भूत-मात्रा । हड्डी, मांस इत्यादि जो कुछ स्थूल पदार्थ इस शरीर में दृष्टि गोचर होते हैं, वे सब भूतमात्रा हैं, इन सबका परस्पर जोड़नेवाला या धारण करने वाला सब भूतों में अदृष्ट रूप से व्याप्त जो बल प्रतीत होता है वही प्राण मात्रा है । ये दोनों मात्रायें जड़ और चेतन दोनों में समान रूप से पायी जाती हैं, किन्तु जिससे जड़ की अपेक्षा चेतन में भिन्नता प्रतीत होती है, जिससे चेतन प्राणी अपने ग्रापका या जगत् का अनुभव करता है वही भाग इस शरीर में प्रज्ञा मात्रा है । ये तीनों मात्रायें जीवित प्राणी में में नित्य नई उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं, इसमें इन तीनों मात्राओं का आत्मा से ही उत्पन्न होना पाया जाता है । पहले कहा जा चुका है कि आत्मा के नित्य तीन धर्म हैं मन, प्राण और वाक् –इन में मन से [ ४२५ ]

पृष्ठ 458

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 458 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * प्रज्ञा मात्रा, प्राण से प्राण मात्रा और वाक् से भूतमात्रा उत्पन्न हुआ करती हैं । ये तीनों भी एक ही को ग्रव्यय या पर कहते किसी सूत्र में बंधे हुए है उसी सूत्र हैं, ग्रथवा यों समझिये कि मन, प्राण, वाक् ये तीनों ग्रक्षर एक ही किसी ग्रव्यय आत्मा के विकास स्वरूप हैं और उन तीनों मन, प्राण, वाक् के विकास स्वरूप ये तीनों मात्रायें हैं । ये प्रत्येक मात्रायें अनन्त रूप होने पर भी स्थूल रूप से प्रत्येक पांच प्रकार के कहे जाते हैं, जिनको पांच ज्ञानेन्द्रिय या पांच कर्मेन्द्रिय या पांच भूत कहते हैं । इनमें यदि भूत का ही विचार करें तो पृथ्वी जल से, जल तेज से, तेज वायु से और वायु श्राकाश से अर्थात् शब्द घन से उत्पन्न होते हुए दीखते हैं । ऐसी स्थिति में पृथ्वी से पैदा होते हुए जगत् में जितने भूत भौतिक सङ्घ ( ढेर ) उन सबको एक शब्द से मिट्टी कह सकते हैं यह भी विज्ञान का नियम है कि कारण की सत्ता को लेकर कार्य में सत्ता प्राती है जैसा कि पगड़ी की सत्ता कपड़े से और उसकी सूत से और सूत की रुई से और रुई की मिट्टी से सत्ता मिलती है । अथवा यों कहिये कि मिट्टी की सत्ता ही पगड़ी तक जाकर विद्यमान है । इसलिये यदि इस पगड़ी की मिट्टी नष्ट कर दी जावे तो उसके साथ- साथ ही उसका रूई, सूत, कपड़ा और पगड़ी सत्र नष्ट हो जायेंगे । यदि इन सत्र में सत्ता जुदी - जुदी होती तो ऐसा नहीं होता । इसी प्रकार साक्षात् या परम्परा से जितनी वस्तुयें मिट्टी से बनी हैं उन सब की सत्ता मिट्टी की ही सत्ता है इसलिये सब मिट्टी है । इसी प्रकार पानी के विकार सब पानी है, और तेज के विकार सब तेज, वायु के विकार वायु और ग्राकाश के विकार आकाश सिद्ध हुये । इस प्रकार जगत् में कुल पांच ही सत्ता सिद्ध होती हैं । अब यदि इन पांचों पर विचार करें तो सिद्ध होगा कि मिट्टी पानी से, पानी तेज से, तेज वायु से, वायु ग्राकाश से उत्पन्न हैं । इसलिये ग्राकाश की सत्ता ही इन पांचों की सत्ता है । इस प्रकार ग्रन्त में समस्त जगत् की एक ही मूल सत्ता सिद्ध होती है, और इसी सत्ताघन को वाक् कहते हैं । इस प्रकार वाक् सत्ता की शाखा सिद्ध हुई । इसी प्रकार जगत् की कुल चेष्टा या क्रियाओं को लेकर प्राण की शाखा सिद्ध है, तथा समस्त ज्ञान ( एकता का ज्ञान ) विज्ञान ( विविध ज्ञान विभेद ) की एकता सिद्ध होने से मन की शाखा सिद्ध होती है । तात्पर्य यह है कि जगत् भर में तीन ही सत्ता सिद्ध होती हैं, किन्तु जब इन तीनों पर भी विचार करते हैं तो ये तीनों भी किसी एक ही ग्रव्य तत्व के विकास हैं, इस अन्त में एक ही ग्रात्मा की सत्ता सिद्ध होती है । यही " एकता " की विद्या है— इस विद्या पर अभ्यास करने से भिन्न - भिन्न वस्तुयें जो मेरे शरीर में दीखती है या शरीर से बाहर जगत् में दृष्टि गोचर होते हैं उन सब की एक ही सत्ता सिद्ध होती है । ग्रथवा यों कहिये कि ये सब एक ही ग्रात्मा सिद्ध होते हैं या ग्रात्मैकत्व विज्ञान ही ग्रात्मज्ञान कहा जाता है । यदि यह गुरु का उपदेश रूप केवल शब्द ज्ञान मात्र ही न रहकर आत्मा में पूरा निश्चय अनुभव होने लगे तो यह आमा अपने कुल परिकर ( लवाजमा ) परिग्रह वित परिवारों ( Family ) को आत्मा में ही परिणत कर लेता है । जिससे भिन्न-भिन्न वस्तुओं का भाव न रहकर केवल एक ही ग्रात्मा परिशेष रह जाता है यही आत्मा का सम्पत्ति X कँवल्य है या भूमोदर्क है । इस मुक्ति में ग्रात्मा का कोई अंश छोड़ा नहीं जाता प्रत्युत जितने विकार इस समय श्रात्मा के साथ हैं वे सब ज्यों के त्यों बने रहते हैं । किन्तु उनमें आत्मा से भिन्नता का भाव * कार्यों का कारण रूप में होना अथवा कामरूप नाश होना । X सम्पत्ति के द्वारा एकता । [ ४२६ ]

पृष्ठ 459

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* ब्रह्मविज्ञान नष्ट होकर सब एक ही श्रात्मा सम्पन्न हो जाती है और आत्मा का परिणाम जो पहले छोटा समझा गया था वह बहुत विस्तृत होकर सर्व जग व्यापक होकर केवल एक ही असीम ग्रात्मा सिद्ध हो जाती हैं, दूसरे का भाव नष्ट हो जाता है । भय या दुःख दूसरे से होता है जब कि आत्मा ही सब हो गया तब स्वतन्त्र होकर वह नित्य परमानन्द रूप हो जाता हैं, यही उसका मुक्तिपना है । अर्थात् भेदभावका मुक्त होना मुक्ति है यही वेद में लिखा है— “ द्वितीयाद्वैभयं भवति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाऽभूत् केन कं पश्येत् " अर्थात् दूसरे से भय होता है जब कि सब आत्मा ही हो गया तब कौन किसको देखें । ( ३- अपवर्ग कैवल्य ) ( २ - क्षीणोदर्क मुक्ति ) क्षीणोदर्क - छोटे से छोटा परिणाम है जिसका यज्ञ आत्मा मन, प्राण, वाक् इन तीनों तत्त्वों से बना हुआ है । इन तीनों से पृथक् - पृथक् प्रज्ञामात्रा, भूतमात्रायें उत्पन्न होती हैं । आत्मा के चारों ओर इन ही तीनों मात्रात्रों के समष्टि रूप आवरण को ही शरीर कहते हैं । यह शरीर उसी आत्गा के आधार या विवरण ( पकड़ ) से स्थिर रहता है, किन्तु यह शरीर क्षुद्र होने के कारण बाहर वायु, सूर्य आदि वल-वान अन्नाद् पदार्थ प्रतिक्षण इस शरीर के अंशों को आकृष्ट करते हुए चूमते रहते हैं, जिसके कारण शरीर की प्रत्येक मात्रायें बाहर निकलते रहने के प्रवाह से क्षीण होती रहती हैं । उनकी क्षीणता के कारण श्रात्मा वुभुक्षित ( भूखा ) हो जाता है और उन तीनों के घन जहां कही बाहर मिलते हैं उनको श्राकृष्ट ( खींच ) करके अपने ग्रहार को ले लेते हैं ये उस कमी को पूरा करते हैं । इस प्रकार यदि अन्न यह ग्रात्मा न खावे तो उसका शरीर स्थिर नहीं रह सकता । प्राण की चार जाति हैं - प्राप्यप्राण, सोम्यप्राण, आग्नेयप्राण और परोरजाप्राण । प्राण को ही अन्नाद ( ग्रन्न खाने वाला ) कहते हैं किन्तु वह प्रारण आत्मा के प्राण भाग में रहता हुआ मनो भाग और वाक् भाग में भी कमी की पूर्ति के लिये प्रवेश करके अन्न खाता रहता है, इसलिये आत्मा तीनों भागों से अपने प्राण के द्वारा बाहर से प्रज्ञात्मा, प्राणमात्रा या वाक्मात्राओं को प्रतिक्षण लेता रहता है । प्रारण की चार जातियों में प्राप्यप्राण से पृथ्वी बनी हुई है, यह पृथ्वी पिण्ड या पांचों भूत ( भौतिक ग्राम ) सब आप्यप्राण है । उसको आत्मा अपने वाक् रूपी मुख के द्वारा पृथ्वी से प्रतिक्षण लेता रहता है, जिससे भूतमात्रा की कमी की पूर्ति होती रहती है । इसी प्रकार ग्रात्मा अपने प्राण रूपी मुख सौम्यप्राण को चन्द्रमा से और ग्राग्नेयप्राण को सूर्य से लेता हुआ अपनी प्राणमात्रा की कमी को पूरा करता है । ऐसे ही अपने मन रूपी मुख से परोरजाप्राण को त्रिलोकी वहिर्भूत ईश्वर चिदात्मा से लेता हुआ अपनी प्रज्ञा-आत्मा की कमी को पूरा करता है । इस प्रकार यह आत्मा प्रतिक्षण ४ भिन्न - भिन्न अन्नों को ४ भिन्न-भिन्न स्थानों से भोजन करता है जिससे वह क्षीण नहीं होने पाता, यह लोकस्थिति ( जगत् का नियम ) है । ऐसी स्थिति में यदि आत्मा अपने इन प्रज्ञामात्रा, प्राणमात्रा, भूतमात्रा इन तीनों प्रावरणों का जिनसे कि वह बद्ध है या जिससे वह परतन्त्र होकर उन मात्राओं के संयोग से सुख दुःख का भोग परवश [ ४२७ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
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ॐ ब्रह्मविज्ञान छै पाता है और इन मात्राओं के संयोग को त्याग करने की इच्छा करें तो तीन काम करने पड़ेगे । अनशन-व्रत, अमनस्कयोग और विद्या की प्राप्ति अनशन व्रत से स्थूल शरीर का बल कम हो जाता हैं जिससे पृथ्वी का रस लेने का सामर्थ्य कम हो जाता है । पहले कहा जा चुका है कि प्रत्येक प्राणी सात प्रकार का अन्न खाता है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, शब्द, बल, ज्ञान और अनशन व्रत का तात्पर्य इन सातों की न्यूनता करने से है । ज्यों ज्यों इनकी मात्रायें कम होगी उससे ग्रात्मयज्ञ कम होगा । वेद के अनुसार अन्न, ऊर्कं, प्रारण इन तीनों के ग्रन्योन्य ( ग्रापस के ) परिग्रह ( पकड़ ) को ही यज्ञ कहते हैं । ग्रन्न से प्रथम ऊर्क होकर वही ऊर्फ प्रारण बनता है और वह प्राण फिर श्रन्न का ग्रहण करता है । प्राणरुपी अग्नि में रूपी सोम की ग्राहुति पड़ने से ऊर्क रूपी ज्वाला उत्पन्न होना ही यज्ञ कहने से तात्पर्य है । इन तीनों का यह चक्र ( चक्कर - दौरा ) उस अनशन क्रिया से बन्द हो जाता है, और प्राण की न्यूनता या जाती है | प्राण की न्यूनता से वाक् प्रोर मन ये दोनों भी न्यून हो जाते हैं, जिससे श्रात्मा के प्रावरण के लिये फिर ग्रावरणों का उत्पत्ति क्रम निवृत्त हो जाता है और प्राण की बुभुक्षा भी धीरे - धीरे कम हो जाती है । यही एक उपाय है । इस प्रकार स्थूल शरीर की क्षीणता हो जाती है और इस क्षीणता से सूक्ष्म और कारण शरीर में भी क्षीणता या जाती है | इसके साथ - साथ यदि * श्रमनस्कयोग ( लययोग ) किया जाय तो मन का ग्रात्मा में क्रम - क्रम से लय हो जाता है । मन की प्रेरणा से ही प्रारण वाक् से सृष्टि उत्पन्न करता है, अतएव मन के लय होने से प्राण की क्रिया भी बन्द हो जाती है यह दूसरा उपाय है । इससे सूक्ष्म शरीर भी क्षीण हो जाता है । अब कारण शरीर को भी क्षीण करने के लिये तीसरा उपाय विद्या लाभ है | ज्यों - ज्यों आत्मज्ञान की वृद्धि की जाय त्यों - त्यों कर्म का बल ग्रात्मा में नष्ट होता जाता है और श्रात्मा शुद्ध ज्ञान स्वरूप होता जाता है । इसका फल यह होता है कि प्राण मृत्युकाल में जिस प्रकार पार्थिव शरीर को छोड़कर उत्क्रमण करता है तो प्रथम चन्द्रमा में जाकर वहां से भी उसी प्रकार उत्क्र-मण करता हुआ श्रद्धामय सौम्य शरीर को भी चन्द्रमा में ही छोड़ जाता है । सूर्य में जाने के पश्चात् विद्या के बल से वह विद्युत् लोक के लिये उत्क्रमण करता हुआ ग्राग्नेय शरीर को भी वही छोड़ देता है, जिससे सौम्य आप्य प्राण, प्राण, श्राग्नेय प्राण इन तीनों के हटने से प्राणी की ग्रात्मा केवल परोरजा प्राण रूप कही जाती है, यही उसका कैवल्य है । किन्तु इस कैवल्य में इस परोरजा ग्रात्मा से भूतमात्रा, प्राण-मात्रा, प्रज्ञामात्रा इन तीनों मात्रात्रों की निवृत्ति होकर इन तीनों का उक्य ( जड़ कारण ) मन, प्राण, वाक् भी निवृत्त हो जाते हैं । परीरजा प्राण को चिति कहते हैं, इसलिये उस समय वह ग्रात्मा शुद्ध चिदात्मा हो जाता है और सब उसके आवरण क्षीण हो जाते हैं । इसलिये इस प्रक्रिया को क्षीणोदर्क कहते हैं और इसमें चिदात्मा ग्रावरणों से छूटता है इसलिये इस चिदात्मा के केवल्य को श्रपवर्ग ( छुटकारा ) कैवल्य मुक्ति कहते हैं । इस प्रकार दो कैवल्य मुक्ति कही गई हैं । ये दोनों ही निवृत्ति पक्ष के तप से सिद्ध होती हैं क्योंकि प्राचीन देवताओं के एक मन में अमृत और मृत्यु इन दोनों से ही सृष्टि मानी गई है । इन दोनों को ब्रह्म कर्म अथवा ज्ञान क्रिया कहते । इन दो से अतिरिक्त जगत् का कुछ भी रूप नहीं है, अथवा यों कहिये कि मृत्यु अर्थात् कर्म ही जगत् का रूप है वह " प्रवार " है । और ग्रमृत अथवा ब्रह्म जगत् का * अमनस्क बेमन का [ ४२८ ]