बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1–10

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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SHRI JA Please re Q1: 242 1832 15 N9 Shankara BrihadranyaKopanishada.

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II Q1: 24 1832 III II I I III I I III 15N9 Tranz 2.6 H31E SHRI JAGADGURU VISHWARADHYA JNANAMANDIR दुविधविद्या ( LIBRARY ) -CB.H.U. ) JANGAMAWADIMATH, VARANASI Please return this volume on or before the date last stamped 1832 Overdue volume will be charged 1 / - per day. 1360

पृष्ठ 4

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Peden tain eae sapere ere

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I I I I II बृहदारण्यकोपनिषद् ( सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित ) प्रकाशक-गीताप्रेस गोरखपुर

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प्रकाशक मोतीलाल जालान गीताप्रेस गोरखपुर ह 21: 24 * ( 1589 1360 सं ० १६ से २०१४ तक ११,२५० सं ० २०२५ चतुर्थ संस्करण ५,००० अक ३ निषद ऐसी एक f श्रोता शास्त्र के प्र कुल १६,२५० SRI JAGADGURU JNANA VISHWARADHYA SIMHASAN JNANAMANDIR Jangamwadi LIBRARY, Math. VARANASI Acco, 1832 मूल्य लिये नहीं है-महाग्र महिम रूप म बृहदा अन्त तथा छः रुपये पचास पैसे

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स पैसे श्रीहरिः प्रथम संस्करणकी प्रस्तावना

यस्य बोधोदये तावत्- स्वप्नवद् भवति भ्रमः ।

तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥

( अष्टावक्रगीता ) आज प्राय: इक्कीस वर्ष होते हैं जब मैंने पहले - पहले बृहदारण्यक उप-निषद्का एक वाक्य सुना था । वह क्षण इस जीवन में कभी भूल सकूँगा ऐसी आशा नहीं है । उस समय मैं आगरा कालेजका विद्यार्थी था । एक दिन स्थानीय डी ० ए ० वी ० हाईस्कूल में कोई उत्सव था । एक श्रोताके रूपमें मैं भी वहां बैठा था । मेरे श्रद्धेय बन्धु श्रीधर्मेन्द्रनाथजी शास्त्री, तर्कशिरोमणिका भाषण हो रहा था । उन्होंने याज्ञवल्क्य - मैत्रेयी-के प्रसङ्गकी चर्चा करते हुए मैत्रेयीके ये शब्द कहे— ' येनाहं नामृतास्यां किमहं तेन कुर्याम् । ' ( २ । ४ । ३ ) उस समय से यह वाक्य मेरा पथप्रदीप बन गया । वैराग्यको जागृति के लिये इसकी जोड़का कोई दूसरा वाक्य मैंने सम्भवतः अपने जीवन में नहीं सुना । इससे अधिक मर्मस्पर्शी कोई दूसरी बात कही जा सकती है - ऐसी मेरी कल्पना भी नहीं है । अस्तु, आज करुणामय प्रभुने उसी उज्ज्वल रत्नकी खानि इस महाग्रन्थको जनताके सामने रखनेका मुझे सौभाग्य दिया है । इसकी महिमा का वर्णन करना सूर्यको दीपक दिखाना है । वस्तुतः उपनिषद् ही तत्त्वज्ञान के आदि स्रोत हैं । उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूप में विकसित हुई ज्ञान- गङ्गा जीवोंके संसार - तापको शमन करती है ।. बृहदारण्यक उपनिषद् यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेय ब्राह्मण के अन्तर्गत है । कलेवरकी दृष्टिसे यह समस्त उपनिषदोंकी अपेक्षा बृहत् है तथा अरण्य ( वन ) में अध्ययन की जानेके कारण इसे ' आरण्यक ' कहते

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( 8 ) हैं । इस प्रकार ' बृहत् ' और ' आरण्यक ' होनेके कारण इसका नाम ' बृहदारण्यक ' हुआ है । यह बात भगवान् भाष्यकारने ग्रन्थके आरम्भ में ही कही है । किन्तु उन्होंने केवल इसकी आकारनिष्ठ बृहत्ताका ही उल्लेख किया है; वार्त्तिककार श्रीसुरेश्वराचार्यं तो अर्थतः भी इसकी बृहत्ता स्वीकार करते हैं— ' बृहत्त्वाद्ग्रन्थतोऽर्थाच्च बृहदारण्यकं मतम् । ' ( सं ० वा ० 8 ) उनकी यह उक्ति अक्षरशः सत्य है । भाष्यकारने भी जैसा विशद और विवेचनापूर्ण भाष्य बृहदारण्यकपर लिखा है वैसा किसी दूसरे उपनिषद्पर नहीं लिखा । उपनिषद्भाष्यों में इसे हम उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति कह सकते हैं । इस प्रकार सामान्य दृष्टिसे विचार करके अब हम संक्षेपमें इसके कुछ प्रधान प्रसङ्गोंका दिग्दर्शन करानेका प्रयत्न करते हैं । ग्रन्थके आरम्भमें अश्वमेघ ब्राह्मण है । इसमें यज्ञीय अश्वके अवयवोंमें विराट्के अवयवोंकी दृष्टिका विधान किया गया है । इसके कुछ आगे प्रजापति के पुत्र देव और असुरोंके विग्रहका वर्णन है । इन्द्रियोंकी देवी और आसुरी वृत्तियाँ देव और असुररूपसे भी मानी जा सकती हैं । इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुखही हैं-: ' पराश्चि खानि व्यतरगत स्वयम्भूः । ' ( क ० उ ० २।१।१ ) अतः सामान्यतः वैषयिक या आसुरी वृत्तियोंकी ही प्रधानता रहती है । इसीसे असुरोंको ज्येष्ठ और देवोंको कनिष्ठ कहा गया है । पुण्य और पापसंस्कारोंके कारण इन दोनों प्रकारकी वृत्तियोंका उत्कर्ष और अपकर्ष होता रहता है । शास्त्रविहित कर्म और उपासनासे देवी वृत्तियों का उत्कर्ष होता है और उन्हें छोड़कर स्वेच्छाचार करनेसे आसुरी वृत्तियोंका बल बढ़ जाता है । एक बार देवताओंने उद्गीथके द्वारा असुरोंका पराभव करनेका निश्चय किया । उद्गीथ एक यज्ञकर्म-का अङ्ग है, उसके द्वारा उन्होंने आसुरी वृत्तियोंको दबानेका विचार किया । उन्होंने वाक्, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र और त्वक्के अभिमानी देवताओंसे अपने लिये उद्गान करनेको कहा । उन देवताओंमेंसे प्रत्येक किया; यह ज उसका वृत्ति ह इसक अनास कृपासे सोती उसके देवताओ पापवृद्ध कुछ भी हो सक संसार क इस अजातश दृप्त-- ज्ञ ब्रह्मका मुद्रा भेंट महानुभा करते हैं जिसकी अपनी अ जिन आ अजातश विशिष्ट अपनी बु

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का नाम आरम्भ में उल्लेख बृहत्ता TO 8 ) सा विशद सी दूसरे सर्वोत्कृष्ट में इसके | ग्रन्थ विराट्के जापति आसुरी वभावतः १। १ ) ता रहती है । य कर्ष और से देवी - करनेसे उद्गीथके यज्ञकमं-विचार भिमानी ताओं में से ( ५ ) प्रत्येकने अपने - अपने कर्मद्वारा देवी वृत्तियोंकी प्रबलताकेलिये उद्गान किया; किन्तु उस कर्मका कल्याणमय फल स्वयं ही भोगना चाहा । यह उनका स्वार्थं था । ऋत्विक्का धर्म है कि वह ज कुछ क्रिया करे उसका फल यजमानके लिये ही चाहे । यह स्वार्थ स्वयं ही आसुरी वृत्ति है, इसलिये उनका वह कर्म व्यर्थ हो गया । अन्तमें मुख्यप्राणसे इस कर्म के लिये प्रार्थना की गयी । प्राण परम उदार और सर्वथा अनासक्त है | वह किसी भी विषयको स्वयं नहीं भोगता तथा उसकी कृपासे सारी इन्द्रियाँ अपने विषयोंको भोगती हैं । अन्य सब इन्द्रियाँ सोती भी हैं और जागती भी, किन्तु प्राण सर्वदा सजग रहता है । अतः उसके उद्गान करनेपर असुरोंका दाँव बिलकुल खाली गया और देवताओं की विजय हुई | इस आख्यायिकासे श्रुति यही बताती है कि पापवृत्तियोंका मूल वस्तुतः स्वार्थ ही है; जबतक हृदयमें स्वार्थका कुछ भी अंश है तबतक जीव भोगासक्तिरूप पापमय बन्धन से मुक्त नहीं हो सकता और जिसने स्वार्थका सर्वथा त्याग कर दिया है उसपर संसारके किसी भी प्रलोभनका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता । इसके बाद द्वितीय अध्यायके आरम्भ में दृप्तबालाकि गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद है । काशिराज अजातशत्रु तत्त्वज्ञ था और गार्ग्य छप्त — ज्ञानाभिमानी था । उसने जब अजातशत्रु से कहा कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करता हूँ तो राजाने उसे उसी क्षण एक सहस्र सुवर्णं-मुद्रा भेंट किये । इससे श्रुति यह सूचित करती है कि जो सच्चे महानुभाव होते हैं वे दूसरेके दोषकी ओर न देखकर उसका आदर ही करते हैं । साथ ही इससे ब्रह्मविद्याकी महत्ता भी सूचित की है, जिसकी केवल प्रतिज्ञा करनेपर ही गुणग्राही विद्वान्ने वक्ता प्रति अपनी अनुपम उदारता व्यक्त कर दी । इसके पश्चात् गार्ग्यने जिन-जिन आदित्यादिके अभिमानी पुरुषोंमें ब्रह्मत्वका आरोप किया, राजा अजातशत्रुने उन्हें परिच्छिन्न दवमात्र बताकर उनकी उपासनाका भी विशिष्ट फल बताते हुए उन सबका निषेध कर दिया । इस प्रकार अपनी बुद्धि की गति कुण्ठित हो जानेसे गार्ग्यका अभिमान गलित हो

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( ६ ) गया और उसने ब्रह्मज्ञान के लिये राजाकी ही शरण ली । राजा उसका हाथ पकड़कर महलके भीतर ले गया और वहां सोये हुए एक पुरुषके पास जाकर प्राणके अभिमानी चन्द्रमाके ' बृहत्, पाण्डरवास, सोम, राजन् ' इत्यादि नाम लेकर पुकारा । किन्तु इन नामोंसे पुकारनेपर वह पुरुष नहीं उठा । तब राजाने उसे हाथसे दबाया और वह तुरंत उठकर खड़ा हो गया । इस प्रसङ्गद्वारा श्रुति यह बताती है कि जितने भी नाम - रूपाभिमानी देव हैं वे वस्तुतः विज्ञानमय आत्मा नहीं हैं; विज्ञानात्मा नाम - रूपसे परे है । सामान्यतया सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी हृदय देशमें उसकी विशेष अभिव्यक्ति होती है । वस्तुतः वही सबका प्रेरक और सच्चा भोक्ता है, अन्य इन्द्रियाभिमानी देव भी उसीकी विभूतियां हैं, उसकी सत्ता के बिना उनकी स्वतन्त्र शक्ति कुछ भी नहीं है । इन्द्रियोंको प्रेरित करनेके कारण ये प्राण हैं किन्तु प्राणोंका भी प्रेरक होनेसे वह प्राणोंका प्राण है । इसी अध्यायके चौथे ब्राह्मणमें याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है । याज्ञवल्क्यकी दो स्त्रियां थीं- मैत्रेयी और कात्यायनी । उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी स्त्रियोंके समान बुद्धिवाली । सम्प्रदायभेदसे इसी उपनिषद् में यह प्रसङ्ग चतुर्थं अध्यायके पञ्चम ब्राह्मण में फिर आया है । वहीं इन दोनोंके विषय में यह बात स्पष्ट कही है । जब याज्ञवल्क्यकी इच्छा संन्यास लेनेकी हुई और उन्होंने दोनों स्त्रियोंको अपनी सम्पत्ति बाँटनेका प्रस्ताव किया तो कात्यायनी के मुखसे तो कुछ निकला नहीं, क्योंकि वह प्रेयः कामिनी थी, उस धनमें ही उसका सारा सुख निहित था; किन्तु मैत्रेयी थी श्रेयः-बताइ का किसी उत्कट किया के लि भिन्न उत्पि अन्तम जाता हैं । नहीं सबका या का और ' मध जल, सभी प प्रकार वे एक उनका अध्यात कामिनी । उसने कहा, ' यदि धनसे भरी हुई यह सारी पृथिवी मेरी हो है और जाय तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी? ' ' याज्ञवल्क्य बोले, ' धन से अमरता - ब्राह्मण की आशा तो नहीं की जा सकती; हाँ, सम्पन्न पुरुषोंका जैसा किया भोगमय जीवन होता है वैसा ही तुम्हारा हो सकता है? ' बस, अब श्रुतिसे मैत्रेयीको सच्ची कुंजी हाथ आ गयी और उसने कहा, ' जिससे में अनेको अमर नहीं हो सकती उसे लेकर मैं क्या करूंगी? मुझे तो वही बात