बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 11–20

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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जा उसका क पुरुषके स, सोम, कारनेपर वह तुरंत कि जितने T नहीं है; होनेपर भी ही सबका नी उसीकी भी नहीं का भी का संवाद नी । उनमें बुद्धिवाली । पञ्चम स्पष्ट कही उन्होंने दोनों कात्यायनी के • उस धन में थी श्रेयः-नवी मेरी हो न से अमरता-षोंका जैसा ' बस, अब - ' जिससे मैं तो वही बात ( ७ ) बताइये जिससे मैं अमर हो सकूँ । ' वस्तुतः यही विवेक और वैराग्य-का सच्चा स्वरूप है, जिसके हृदयमें यह वृत्ति जाग्रत् नहीं हुई वह किसी भी प्रकार परमार्थं तत्त्वको ग्रहण नहीं कर सकता । मैत्रेयी की उत्कट जिज्ञासा देखकर भगवान् याज्ञवल्क्यने उसे ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया । उन्होंने ब्रह्म और आत्माका अभेद प्रतिपादन करते हुए आत्मा-के लिये ही सबकी प्रियता, आत्मज्ञानसे ही सबका ज्ञान, आत्मा भिन्न किसी भी वस्तुको देखने में पराभव, आत्मा से ही सम्पूर्ण भूतों के उत्पत्ति और प्रलय तथा अज्ञानमें ही अनात्मवस्तुओं की सत्ता बताकर अन्तमें यह उपदेश किया कि जिसकी दृष्टिमें सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कर्ता, क्रिया और करणका सर्वथा अभाव हो जाता हैं । वहाँ सूचना, सुनना, मनन करना और जानना आदि कोई क्रिया नहीं रहती तथा वह आत्मतत्त्व किसीका ज्ञेय भी नहीं है, क्योंकि सबका ज्ञाता तो वह स्वयं ही है । इसके आगे मधुब्राह्मण है! मधु अनेकों प्रकारके पुष्पोंका सार या कार्य होता है तथा पुष्प उसके कारण होते हैं । मधु उपकार्य है और पुष्प उपकारक हैं । यह उपकार्य उपकारकभाव ही इस ब्राह्मण-में ' मधु ' नामसे कहा गया है । अतः यहाँ यह दिखाया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् और दिशा आदि सभी पदार्थं चारों भूतोंके कार्य हैं तथा भूत उनके कारण हैं । इस प्रकार उनका परस्पर उपकार्य- उपकारक सम्बन्ध है और इस नाते से वे एक दूसरे मधु हैं । यह तो हुई व्यावहारिक दृष्टि, किन्तु परमार्थतः उनका अधिष्ठान वह ज्योतिर्मय अमृतमय पुरुष ही है । वही उनका अध्यात्म - मूलभूत अर्थात् वास्तविक स्वरूप है । इसीका नाम आत्मा है और यह आत्मा ही अमृत ब्रह्म और सर्वरूप है । इस प्रकार इस ब्राह्मण में अधिष्ठान दृष्टिसे सम्पूर्ण प्रपञ्चकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन किया गया है और ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' ( २ । ५ । १६ ) इस श्रुतिसे स्पष्ट कह दिया है कि वह आत्मतत्त्व ही अपनी मायाशक्तिसे अनेकों आकार धारण करके क्रीडा कर रहा है ।

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( ८ ) यहाँ मधुकाण्ड समाप्त होता है । इसके आगे दो अध्याय याज्ञवल्कीय काण्डके हैं । इसके आरम्भ में ही राजा जनकके बहुत दक्षिणावाले यज्ञका प्रसङ्ग है । उनके यहाँ पाञ्चालदेशके सभी विद्वान् ब्राह्मण एकत्रित हु । उन्होंने यह घोषणा कर दी कि जो उनमें सबसे बड़ा ब्रह्मज्ञानी हो वह मेरी गौशाला में बँधी हुई दस सहस्र गौएँ जिनके सींगोंमें दस-दस सुवर्णमुद्रा बँधे हुए हैं, ले जाय । एकत्रित ब्राह्मणोंमेंसे किसीका ऐसा साहस न हुआ जो ब्रह्मज्ञानी जनकके सामने अपनेको सर्वश्रेष्ठ तत्त्ववेत्ता घोषित कर सके । उस समय याज्ञवल्क्यने उठकर अपने ब्रह्मचारीको आज्ञा दी कि इन गौओंको खोलकर ले जाओ । इससे ब्राह्मणों में बड़ा क्षोभ हुआ और उनमें से एकने पूछा कि क्या तुम ही हम सबमें विशेष ब्रह्मज्ञानी हो? इसपर याज्ञवल्क्यने जो उत्तर दिया वह एक सच्चे महानुभावके अनुरूप ही था । वे बोले ' ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी इच्छावाले हैं । ' इसके पश्चात् एक - एक करके उनमेंसे कई ब्राह्मणोंने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किये और उन्होंने उन्हें समाधानकारक उत्तर देकर शान्त कर दिया । अन्तमें गार्गी खड़ी हुई । ब्रह्मवादिनी गार्गीने इस लोकसे आरम्भ करके उत्तरोत्तर प्रत्येक कारणका कारण पूछा । अन्तमें जब ब्रह्मलोकका भी कारण पूछा तो याज्ञवल्क्यने उसे रोक दिया, क्योंकि यह अति प्रश्न था । जहाँ किसी विषयका निर्णय करनेके लिये प्रश्नोत्तर होता है वहां निःसन्दिग्ध वस्तुके विषय में भी सन्देह करना एक अपराध माना जाता है । इसी प्रकारके नियमको भङ्ग करनेसे शाकल्यका सिर कट गया था, जिसका आगे नवें ब्राह्मण में उल्लेख है । इसके पश्चात् याज्ञवल्क्यने प्रश्न किये, किन्तु उपस्थित ब्राह्मणों में से कोई भी उनका उत्तर देनेका साहस नहीं कर सका । इस प्रकार तृतीय अध्याय समाप्त होता है । चतुर्थं अध्यायके प्रथम ब्राह्मण में जनक और याज्ञवल्क्यका संवाद है | जनकने भिन्न - भिन्न आचार्योंसे वाक्, प्राण, चक्षु आदिको ही ब्रह्म-रूपसे सुना था । याज्ञवल्क्यने उनमेंसे प्रत्येकके आयतन ( गोलक ) और प्रतिष्ठा ( अधिष्ठान ) पूछे । किन्तु जनकने उन आचार्योंसे उनके f प्र f उ घ f II च य ग इ f ह स उ घ म स व

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ज्ञवल्कीय क्षणावाले एकत्रित ब्रह्मज्ञानी गोंमें दस-किसीका सर्वश्रेष्ठ. कर अपने । इससे मही हम वह एक नमस्कार क करके होंने उन्हें खड़ी हुई । कारणका ज्ञवल्क्यने विषयका के विषय में नियमको ब्राह्मण में उपस्थित नका । इस का संवाद - ही ब्रह्म-गोलक ) से उनके ( 2 ) विषय में कुछ सुना नहीं था । तब याज्ञवल्क्यजीने उनके आयतन और प्रतिष्ठा बताकर उनकी भिन्न - भिन्न प्रकारसे उपासना करनेका विधान किया और उनमें से प्रत्येककी उपासनासे देवलोककी प्राप्ति बतलायी । जनकने प्रत्येक उपासनाका फल सुननेपर उसीको परम पुरुषार्थं मानकर याज्ञवल्क्यको एक हजार गौ देना चाहा । किन्तु - याज्ञवल्क्यने कहा कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना धन लेना मेरे पिता सिद्धान्तके विरुद्ध है, इसलिये मैं यह दक्षिणा स्वीकार नहीं कर सकता । द्वितीय ब्राह्मण में जनकको अधिकारी समझकर याज्ञवल्क्यजी ने विराट्का वर्णन करते हुए उस सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार करके परब्रह्मका उपदेश किया है । इससे जनक कृतकृत्यताका अनुभव करके अपना सारा राज्य गुरुदेव के चरणों में समर्पण कर देते हैं । इस प्रकार इस प्रकरणका उपसंहार होता है । इस अध्यायके तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें भी जनक और याज्ञवल्क्यका ही संवाद है । इस प्रकार यद्यपि याज्ञवल्क्य इस संकल्पसे गये थे कि मैं स्वयं जनकसे कुछ नहीं कहूँगा । परन्तु पहले वे उन्हें इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर दे चुके थे । इसलिये उन्होंने स्वयं ही प्रश्न कर दिया कि ' यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? ' बस, यहींसे प्रश्नोत्तरके क्रमसे इन दोनों ब्राह्मणों में आत्मतत्त्वका बड़े विस्तापूर्वक विवेचन हुआ है । यहाँ विविध प्रकारसे यही निर्णय हुआ है कि आत्मा ही चरम ज्योति है । वह स्वयंप्रकाश है । स्वप्नावस्था में वही सम्पूर्ण दृश्यको खड़ा कर लेता है । सम्पूर्ण विषयोंका भोक्ता होनेपर भी वह सर्वथा असंग है । सुषुप्तावस्था में वह सारे प्रपञ्चका उपसंहार करके अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित रहता है । वही द्रष्टाकी दृष्टि, घ्राताकी प्राति, रसयिताकी रसनाशक्ति, वक्ताको उक्ति, श्रोताकी श्रुति, मन्ताकी मति और विज्ञाताकी विज्ञाति है । इस प्रकार सबका स्वरूप होनेसे उसका कभी अभाव नहीं होता, क्योंकि जब जो कुछ रहता है उसका वास्तविक स्वरूप स्वयं आत्मा ही है । इस प्रकार जब वही सबका स्वरूप है तो उक्त दृष्टि आदिके विषय भी उससे भिन्न नहीं हैं । अतः

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( १० ) एक अलुप्तशक्तिस्वरूप द्रष्टा ही सर्वमय है, वही निरतिशय आनन्दस्वरूप है और उसीके लेशमात्र आनन्दसे अन्य सब विषय आनन्दरूप जान पड़ते हैं । वह आत्मा सर्वरूप है । जिसे ऐसा बोध हो गया है वह निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है । उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता । वह ब्रह्मरूप ही है और ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो जाता है । इसके आगे चतुर्थ अध्यायके अन्ततक याज्ञवल्क्यजीने बड़ी ओजपूर्ण भाषामें इसी तत्त्वका वर्णन किया है । फिर पञ्चम ब्राह्मणमें याज्ञवल्कीय काण्डकी पद्धतिसे पूर्वोक्त याज्ञवल्क्य -मैत्रेयि - संवादका ही वर्णन है और छठे ब्राह्मण--में आचार्यपरम्पराके उल्लेखपूर्वक मधुकाण्ड समाप्त होता है । इससे आगे पञ्चम अध्यायसे खिलकाण्ड आरम्भ होता है । इसमें कई प्रकारको उपासनाओंका वर्णन है । आरम्भमें ही एक बड़ा रोचक आख्यान है । प्रजापतिके पुत्र देव, असुर और मनुष्य अपने पिता के यहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका सेवन करते हैं और प्रजापतिसे उपदेश करनेकी प्रार्थना करते हैं । प्रजापति बारी - बारीसे उन तीनोंको एक ही अक्षर ' द ' का उपदेश करते हैं और इस एक ही अक्षरसे उन्हें अपने - अपने लिये उपयुक्त उपदेश मिल जाता है । भोगप्रधान देवता समझते हैं, ' पिताने हमें दमन ( इन्द्रियसंयम ) करनेका उपदेश किया है, ' क्रू रप्रकृति असुर समझते हैं, ' प्रजापतिने हमें दया करनेका आदेश किया है ' और अर्थलोलुप मनुष्य मानते हैं, ' पिताने हमें दान करनेकी आज्ञा दी है । ' इस प्रकार अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उपयुक्त उपदेश पाकर वे कृतकृत्य हो जाते हैं । इसके सिवा इस अध्यायमें और भी कई प्रकारकी उपासनाएँ हैं । फिर छठे अध्याय के प्रथम ब्राह्मणमें इन्द्रियोंके विवादद्वारा प्राणकी उत्कृष्टता दिखायी गयी है तथा द्वितीय ब्राह्मण में श्वेतकेतु और प्रवाहण-का प्रसङ्ग है । श्वेतकेतु केवल शास्त्राध्ययन करके ही अपनेको विद्वान् मानने लगा था । वह राजसभा में अपनी विद्याकी धाक जमानेके उद्देश्य-से पाञ्चालन रेश प्रवाहणकी सभा में आया । राजाने उसे अभिमानी समझकर पाँच प्रश्न किये । उन प्रश्नोंका सम्बन्ध था जीवन - मरणकी समस्यासे । श्वेतकेतुसे उनका कुछ भी उत्तर न बना । तब वह उदास

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I रूप पड़ते काम, ज्ञा । आगे इसी डकी ह्मण.. इसमें चिक यहाँ र्थना - का पयुक्त. दमन मझते मनुष्य पनी-हैं । हैं । की हण-विद्वान् -देश्य-मानी - की उदास ( ११ ) होकर अपने पिता और गुरु आरुणिके पास आया । उसने भी उन प्रश्नोंके विषय में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की । तब वे पिता - पुत्र दोनों प्रवाहणके पास गये और उससे उन प्रश्नोंका उत्तर पूछा । प्रवाहणने उन्हें पञ्चाग्निविद्याका उपदेश किया । इस प्रसङ्गका निरूपण छान्दोग्योपनिषद् में भी है । शाखाभेदसे एक हो विद्याका अनेक स्थानोंपर उल्लेख हो जाता है । इसके पश्चात् तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें क्रमशः श्रीमन्थ और पुत्रमन्थ कर्मोंका वर्णन है । ये दोनों कर्म परस्परसम्बद्ध हैं । इनका प्रधान प्रयोजन सत्सन्ततिकी प्राप्ति है । पाँचवें ब्राह्मणमें खिलकाण्डकी आचार्य - परम्परा है । इस प्रकार यह उपनिषद् समाप्त होती है । यहाँतक संक्षेपमें इस महाग्रन्थके प्रधान - प्रधान प्रसङ्गोंपर दृष्टिपात किया गया है । इस उपनिषद्की प्रतिपादन शैली बहुत ही सुव्यवस्थित और युक्तियुक्त है । उपर्युक्त विवेचन के अनुसार इसमें दो - दो अध्यायों के मधु, याज्ञवल्कीय और खिलसंज्ञक तीन काण्ड हैं । इनमें से मधु और खिल काण्डों में प्रधानतया उपासनाका तथा याज्ञवल्कीय काण्डमें ज्ञानका विवेचन हुआ है । भाष्यकारने इसकी व्याख्या करते हुए अपना हृदय खोलकर रख दिया है । इसके भाषान्तरकी समाप्तिके साथ इन पंक्तियोंके लेखकके जीवनकी भी एक साथ पूरी हो जाती हे । आजसे प्रायः नौ वर्ष पूर्व इसके चित्तमें भगवान् शङ्कराचार्य के उपनिषद्भाष्यका अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था । वस्तुतः वह सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी ही प्रेरणा थी । उनको लीलाका मर्म कुछ जाना नहीं जाता । वे न जाने किससे क्या काम कराना चाहते हैं और फिर उसे किस प्रकार पूरा करा लेते हैं - यह एक गम्भीर रहस्य ही है | अपनी विद्या - बुद्धिको देखते हुए ऐसा संकल्प करना मेरा दुःसाहस ही था । कोई विधिवत् अध्ययनका भी तो बल नहीं था । किन्तु भगव-त्प्रेरणाके आगे सभीको झुकना पड़ता है; वे ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित कर देते हैं कि जिनके कारण शक्ति न देखते हुए भी मनुष्य साहस कर बैठता है । ऐसी किसी परिस्थितिने ही इसे भी इस

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( १२ ) महत्कार्य में नियुक्त कर दिया और कई प्रकारकी अड़चनों के पश्चात् आजसे प्रायः साढ़े चार वर्ष पूर्व इसकी पूर्णाहुति हो गयी । इस महान् कर्मका मेरे लिये तो वस्तुतः इतना ही लाभ हैं कि इसी बहाने शास्त्रचिन्तनमें समय बीत जाता है । अस्तु, जो कुछ हो, प्रभुके विधान में किसीका दखल भी तो नहीं चलता इन उपनिषद्भाष्यों के अनुवादमें मुझे जिन ग्रन्थोंसे सहायता मिली है उनके लेखकों का में सर्वदा ऋणी ही रहूँगा । हार्दिक धन्यवादके सिवा मेरे पास उस ॠणके परिशोधका कोई और साधन नहीं है । जिनके कृपामय सहयोगसे मुझे वे ग्रन्थ प्राप्त हो सके थे उन महानु-भावोंका भी में अत्यन्त कृतज्ञ हूँ । भाई साहब श्रीशंकरलालजी गगंने पं ० पीताम्बरजीका हिन्दी अनुवाद किया था । पूज्य पं ० श्रीकृष्णजी पन्तकी कृपासे मुझे पं ० दुर्गाचरण माजुमदारविरचित बंगला - अनुवाद मिला था तथा बन्धुवर कुँवर विजयेन्द्रसिंहजीने पं ० गंगानाथ झा और श्रीसीताराम शास्त्रीके अंग्रेजी अनुवाद दिये थे । छपाईके समय सम्मान्य सुहृद्वर पं ० श्रीरामनारायणजी शास्त्रीने इन सभी ग्रन्थोंका संशोधन और प्रूफ शोधन किया है । उनके अथक अध्यवसाय के बिना इनका इतने शुद्धरूप में प्रकाशित होना प्रायः असम्भव ही था । अतः उनका भी मैं सर्वदा ऋणी ही रहूँगा । अन्तमें, जिनकी असीम अनुकम्पा और बाह्य एवं आन्तर प्रेरणा-से यह दुष्कर कार्यं सुकरकी भाँति सम्पन्न हुआ है उन अपने हृदय-सर्वस्व पूज्यपाद श्रीगुरुदेव के पावन करकमलोंमें यह तुच्छ भेंट समर्पण करता हूँ । इसके द्वारा मैं किसी प्रकार उनके परम पवित्र पादपद्मोंका विशुद्ध प्रेम प्राप्त कर सकूँ — यही मेरो आन्तरिक अभिलाषा है । विनीत, अनुवादक वि 8 ६ ५ I ७ S १० ११ १२ १३ १४ १५ 10 १६ १७ १८ १६ २० २१

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आत् इस इसी ॥ श्रीहरिः ॥ भुके विषय - सूची नली है । नु-गंने जी वाद और न्य धन का का णा-दय-पंण T विषय १ - शान्तिपाठ प्रथम अध्याय प्रथम ब्राह्मण २- सम्बन्ध - भाष्य ३- अश्वके अवयवोंमें कालादि- दृष्टि... ४ – अश्वमेघसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिशें अहरादिदृष्टि द्वितीय ब्राह्मण ५- अश्वमेध सम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति ६ - जलसे विराट्रूप अग्निकी उत्पत्ति ७- विराट्रूप अग्निके अवयवों में प्राचीदिगादि - दृष्टि ८- संवत्सर और वाक्की उत्पत्ति... - ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास १० - प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका ११ - अश्वमेधोपासना और उसका फल तृतीय ब्राह्मण पृष्ठ ... २६ ३० ३६ ४५ ... ४८ ६७ ६६ ... ७२ ७५ निष्क्रमण ७८ ८० १२ - देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ - सम्बन्धी विचार... दद १३ - वाक्का उद्गान और उसका पापविद्ध होना...... १०७ १४- प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना. १११ १५ - मुख्य प्राणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल ११५ १६ - मुख्य प्राणका आङ्गिरसव * ११६ १७ - प्राणकी शुद्धताका प्रतिपादन... १२१ १८ - प्राणोपासक से मृत्यु दूर रहता है— इसकी उपपत्ति १२४ १६ - प्राणद्वारा वागादिका अग्न्यादि देवभावको प्राप्त कराया जाना १२७ २०- प्राणका अन्नाद्यागानं १३१ २१ - प्राणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनाका फल... १३३

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( १४ ) विषय २२- प्राणके आङ्गिरसत्वकी उपपत्ति २३- प्राणके बृहस्पतित्वकी उपपत्ति २४ - प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वको उपपत्ति २५- प्राणके सामत्वकी उपपत्ति... २६ - प्राणके उद्गीथत्वकी उपपत्ति ··· २७- उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिका २८ - सामके स्वभूत स्वरको सम्पादन करनेकी २६ - सामके सुत्रर्णको जाननेका फल ३० - सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल ३१- प्राणोपासकके लिये जपका विधान चतुर्थं ब्राह्मण ३२- ग्रन्थ - सम्बन्ध ... ... ... ... आवश्यकता पृष्ठ ... १३८ १४० १४२ १४४ • १४७ ... १४८ १५० १५२ १५३ १५५ : १६३ ३३- प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल १६४ ३४ - प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति १६८ ३५ - प्रजापति से मिथुनकी उत्पत्ति १७५ ३६ - मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि १७८ ३७ - प्रजापति की सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूप से उसकी उपासना करनेका फल... १८० ३८ - प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि १८.१ ३६ - अव्याकृत कारण ब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति, दोनोंका अभेद और इस अभेदोपासनाका फल १६० ४० - निरतिशय प्रियरूपसे आत्माकी उपासना २३६ ४१ - ब्रह्मने सर्वरूप होनेके विषय में प्रश्न २३६ ४२ - ब्रह्मने क्या जाना? -- इसका उत्तर और उस प्रकार जाननेका फल • २४३ ४३ - क्षत्रियसर्ग तथा ब्राह्मणजातिके साथ उसके सम्बन्धका वर्णन.. " २८६ ४४ - वैश्यजातिकी उत्पत्ति 300 २६० ४५ - शूद्रवर्णकी उत्पत्ति २६१ ४६ - धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन २६२ ४७ - आत्मोपासनकी आवश्यकता ४८- कर्माधिकारी जीव किन - किन कर्मोके कारण समस्त लोक है? ४६ - प्रवृत्तिके बीजभूत काम और पाङ क्तकर्मका वर्णन २६४ प्राणियोंका : ३०५ ...: ३११ ५० ५६ ५६ ५ ५४ ५५ ५६ ५७ ५६ ५६ ६० ६१ ६२ ६३ ६४ ६५ ६६ ६७ ६८ ६६ ७०० ७१-

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पृष्ठ १३८ १४० १४२ १४४ १४७ १४८ १५० १५२ १५३ १५५ १६३ १६४ १६८ १७५ १७८ १८० १८.१ ( १५ ) विषय पञ्चम ब्राह्मण ५० - सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या ५१ - आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन ५२ - आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार ५३ - आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार ५४ - इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल 98 ३१६ ३४२ ३४८ ३५२ ३५३ ५५- आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूप से उपासना करनेका फल ॰॰॰ ३५५ ५६ - तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश... ३५७ ५७ - अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है ३६२ ५८ - लोकत्रयकी प्राप्ति के साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन... ३६४ ५६ - सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम ६० - सम्प्रतिकर्मकर्ता में वागादि प्राणोंके ६१ - व्रतमीमांसा - अध्यात्मप्राणदर्शन ६२ - अधिदैवदर्शन... ६३ - प्राणव्रतकी स्तुति में मन्त्र षष्ठ ब्राह्मण ६४ - पूर्वोक्त अविद्याकार्यंका उपसंहार -६५ - रूपसामान्य चक्षुका वर्णनं... आवेशका प्रकार नामसामान्यभूता वाक् ६६ - कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना ३६६ ३७४ २३८१ ... ३८६ ३८८ ३६२ ३६५ ३६६ १ ९ ० २३६ २३६ २४३ २८६ २६० २६१ २६२ २६४ ३०५ ३११ द्वितीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण ६७ - उपक्रम... ४०० ६८ - ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये अपने पास आये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना ४०४ ६६ - गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ४०६ ७० – गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ४०८ ७१- गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ४१०

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( १६ ) विषय ७२- गार्ग्यद्वारा आकाश - ब्रह्मका उपदेश और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ७३ - गार्ग्यद्वारा वायु - ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ७४ - गार्ग्यद्वारा अग्नि- ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ७५ – गार्ग्यद्वारा जलान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ७६ - गार्ग्यद्वारा आदर्शान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ७७ - गार्ग्यद्वारा प्राण- ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ७८ - गार्ग्यद्वारा दिग्ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ७६ - गार्ग्यद्वारा छाया ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान... ८०- गार्ग्यद्वारा देहान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ८१ - गार्ग्यका पराभव और अजातशत्रुके प्रति उसकी उपसत्ति ८२ - गार्ग्यका हाथ पकड़कर अजातशत्रुका एक सोये हुए पुरुषके पास जाना और प्राणोंके नामसे न उठनेपर उसे हाथ दबाकर जगाना ८३ - सुषुप्ति में विज्ञानमयकी स्थितिके विषय में अजातशत्रुका प्रश्न ८४ - विज्ञानात्मा के शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन... ८५ - स्वप्नवृत्तिका स्वरूप ८६- सुषुप्तिका स्वरूप ८७ - आत्मासे जगत्की उत्पत्ति में ऊर्णनाभि और अग्नि - विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त द्वितीय ब्राह्मण ८८ - शिशुसंज्ञक मध्यम प्राणका उसके उपकरणों सहित वर्णन ८६ - मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात अक्षितियाँ ११ I ४१२ I I ... ४१३ I ६ ६ ४१४ I ४१४ ... ४१५ ६ १० १० ४१६ १० १० ४१७ १० ४१८ १० ४१६ १० १० ... ४२१ १० ४३६ १० ४३६ ४४२ ११ ४४८ ११ ४५७ ११ ५०२ ... ५०६